आप यहाँ है :

एक ही रेखा पर हैं काबा और काशी और बीच में है उज्जैन

धरती के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध के बीच 3 काल्पनिक रेखाएं खींची गई है:- 1. कर्क रेखा, 2. भूमध्य रेखा और 3. मकर रेखा। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों को खगोल विज्ञान की अधिक जानकारी थी। उन्होंने अपनी इस जानकारी को वास्तुरूप देने के लिए वहां-वहां मंदिर या मठ बनवाए, जहां का कोई न कोई खगोलीय या प्राकृतिक महत्व था। इसी क्रम में उन्होंने कर्क रेखा पर ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की। उज्जैन के राजा वि‍क्रमादित्य ने उक्त ज्योतिर्लिंगों को भव्य आकार दिया था।विक्रमादित्य भारत के महान सम्राट थे। उनके काल में उज्जैन ही विश्व की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन विक्रमादित्य के इतिहास को मिटा दिया गया। उनके द्वारा किए गए महान कार्यों के पन्नों को पहले बौद्धकाल, फिर मध्यकाल में फाड़ दिया गया।

सम्राट विक्रमादित्य के काल में भारत विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, नक्षत्र आदि विद्याओं का विश्वगुरु था। महान गणितज्ञ व ज्योतिर्विद वराह मिहिर उन्हीं के काल में हुए थे।विक्रम संवत के अनुसार विक्रमादित्य आज से 2285 वर्ष पूर्व हुए थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। नाबोवाहन के पुत्र राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे। कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया। -(गीता प्रेस, गोरखपुर भविष्यपुराण, पृष्ठ 245)।

क्या अरब तक फैला था विक्रमादित्य का शासन?विक्रमादित्य का शासन अरब तक फैला था। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में वर्णन मिलता है।

विक्रमादित्य की प्रतिद्वंद्विता रोमन सम्राट से चलती थी। महान सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जैन की सड़कों पर घुमाया था तथा बाद में उसे छोड़ दिया गया था। कारण था कि उसके द्वारा यरुशलम, मिस्र और सऊदी अरब पर आक्रमण और विक्रम संवत के प्रचलन को रोकना। बाद में रोमनों ने विक्रम संवत कैलेंडर की नकल करके रोमनों के लिए एक नया कैलेंडर बनाया जिसको ईसाई धर्म की उत्पत्ति के बाद ईसाइयों ने ईसा कैलेंडर बना लिया।ज्योतिर्विदाभरण अनुसार (ज्योतिर्विदाभरण की रचना 3068 कलि वर्ष (विक्रम संवत् 24) या ईसा पूर्व 33 में हुई थी) विक्रम संवत् के प्रभाव से उसके 10 पूर्ण वर्ष के पौष मास से जुलियस सीजर द्वारा कैलेंडर आरंभ हुआ, यद्यपि उसे 7 दिन पूर्व आरंभ करने का आदेश था। विक्रमादित्य ने रोम के इस शककर्ता को बंदी बनाकर उज्जैन में भी घुमाया था (78 ईसा पूर्व में) तथा बाद में छोड़ दिया। रोमनों ने अपनी इस हार को छुपाने के लिए इस घटना को बहुत घुमा-फिराकर इतिहास में दर्ज किया जिसमें उन्हें जल दस्युओं द्वारा उनका अपहरण करना बताया गया तथा उसमें भी सीजर का गौरव दिखाया है।विक्रमादित्य के काल में अरब में यमन, इराक में असुरी, ईरान में पारस्य और भारत में आर्य सभ्यता के लोग रहते थे। यह ‘असुरी’ शब्द ही ‘असुर’ से बना है। इराक के पास जो सीरिया है, वह भी असुरिया से प्रेरित है।

विक्रमादित्य के काल में दुनियाभर के ज्योतिर्लिंगों के स्थान का जीर्णोद्धार किया गया था। कर्क रेखा पर निर्मित ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख रूप से थे मक्का के मुक्तेश्वर (मक्केश्वर), गुजरात के सोमनाथ, उज्जैन के महाकालेश्वर और काशी के विश्वनाथ बाबा। माना जाता है कि कर्क रेखा के नीचे 108 शिवलिंगों की स्थापना की गई थी।यदि हम मक्का और काशी के मध्य स्थान की बात करें तो वह तो अरब सागर (सिंधु सागर) में होगा लेकिन सोमनाथ काज्योतिर्लिंग को बीच में मान सकते हैं और कर्क रेखा से सभी शिवलिंगों की बात करें तो इसराइल से लेकर चीन तक के बीच में उज्जैन के महाकालेश्वर को माना जा सकता है।

कर्क रेखा के आसपास 108 शिवलिंगों की गणना की गई है।विक्रमादित्य ने नेपाल के पशुपतिनाथ, केदारनाथ और बद्रीनाथ मंदिरों को फिर से बनवाया था। इन मंदिरों को बनवाने के लिए उन्होंने मौसम वैज्ञानिकों, खगोलविदों और वास्तुविदों की भरपूर मदद ली।नेपाली राजवंशावली अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसापूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के नेपाल आने का उल्लेख मिलता है। विक्रमादित्य के समय ज्योतिषाचार्य मिहिर, महान कवि कालिदास थे। बौद्ध, मुगल, अंग्रजों के नष्ट करने के बाद भी राजा विक्रम की महानता का भारत की संस्कृत, प्राकृत, अर्द्धमागधी, हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला आदि भाषाओं के ग्रंथों में विवरण मिलता है। उनकी वीरता, उदारता, दया, क्षमा आदि गुणों की अनेक गाथाएं भारतीय साहित्य में भरी पड़ी हैं।

कर्क रेखा उत्तरी गोलार्ध में भूमध्य रेखा के समानांतर 23°26′22″N 0°0′0″Wग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई कल्पनिक रेखा है। कर्क रेखा पृथ्वी के मानचित्र पर परिलक्षित होती है। 21 जून को जब सूर्य इस रेखा के ठीक ऊपर होता है, उत्तरी गोलार्द्ध में वह दिन सबसे लंबा और रात सबसे छोटी होती है। इस स्थिति को कर्क संक्रांति कहते हैं। भारत में कर्क रेखा मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर से निकलती है। हालांकि यह रेखा थोड़ी-बहुत आगे पीछे होती रहती है। इसका मतलब यह स्थायी नहीं है। मौसम अनुसार इसमें कुछ किलोमीटर का कम-ज्यादा फर्क होता रहता है।यह रेखा धरती पर नि‍म्न देशों से गुजरती है :-संयुक्त राज्य अमेरिका के हवाई द्वीप, मैक्सिको, मंजातनाल, प्रशांत महासागर के उत्तर में से होते हुए यह रेखा बहामास, पश्चिम सहारा (मोरक्को) रेगिस्तान, मुरितानिया, माली, अल्जीरिया, नाइजीरिया, लीबिया, चाड, मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन (मात्र गुआंगजोऊ के उत्तर से) और ताईवान।संपूर्ण धरती पर प्राचीनकाल में हिन्दुओं का ही साम्राज्य था।

उस काल में धर्म का कोई विशेष नाम नहीं होता था, लेकिन सभी शिव या विष्णु के रूपों को मानने वाले लोग होते थे। अमेरिका के रेड इंडियन जाति के लोग हों या प्राचीन मिस्र के लोग या फिर पिरामिडों को बनाने वाले लोग हों।इसराइल की प्राचीन जातियां, सीरिया, जॉर्डन के कबीले हों या सऊदी अरब, इराक या ईरान के स्थापित साम्राज्य हो, सभी पर वैदिक धर्म का प्रभाव था और सभी ऋषि मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, कृतु, स्वायम्भुव मनु, प्रचेता, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष, कंदर्भ, विश्‍वामित्र, वैवस्वत मनु आदि की ही संतानें हैं।इनमें से कुछ प्रमुख स्थानों का चयन करके हमारे खगोलविदों, ऋषियों और वास्तु शास्त्रियों ने शिवलिंगों की स्थापना कर भव्य मंदिरों का निर्माण किया था। आओ जानते हैं कि क्या सचमुच में ऐसा था। यदि था तो कहां-कहां था और इसके क्या सबूत हैं?

मैक्सिको : माया सभ्यता का गढ़ मैक्सिको बहुत ही प्राचीन स्थान है। पुराविदों ने मैक्सिको में माया जाति के लोगों का एक प्राचीन नगर खोज निकाला है। मैक्सिको का तेओतिहुअकान शहर अपने विशाल सीढ़ीदार पिरामिडों और मध्य में बने चौड़े रास्तों के लिए जाना जाता है। इसे ‘मौत का रास्ता’ भी कहा जाता है। इसे किसने बनवाया था, इसकी सही जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है।कृष्ण के प्रमुख शिष्य और महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा अर्जुन ने मैक्सिको की एक लड़की से शादी की थी। निश्चित ही वे मैक्सिको को मक्षिका कहते थे। मैक्सिको में एक खुदाई के दौरान शिव, गणेश और लक्ष्मी की प्राचीन मूर्तियां पाई गईं। भिक्षु चमन लाल की पुस्तक ‘हिन्दू अमेरिका’ में इसका उल्लेख मिलता है।

जीसस क्राइस्ट्स से बहुत पहले वहां पर हिन्दू धर्म प्रचलित था। कोलंबस तो बहुत बाद में आया। सत्य तो यह है कि अमेरिका, विशेषकर दक्षिण-अमेरिका एक ऐसे महाद्वीप का भाग था जिसमें अफ्रीका भी सम्मिलित था। भारत ठीक मध्य में था। अफ्रीका नीचे था और अमेरिका ऊपर था। वे एक बहुत ही उथले सागर से विभक्त थे। आप उसे पैदल चलकर पार कर सकते थे। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में इसके उल्लेख हैं। वे कहते हैं कि लोग एशिया से अमेरिका पैदल ही चले जाते थे। -ओशो

साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक एक गुफा में पुरातत्वविदों को महादेव की 6 हजार वर्ष पुरानी शिवलिंग की मूर्ति मिली जिसे कठोर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया है। इस शिवलिंग को खोजने वाले पुरातत्ववेत्ता हैरान हैं कि यह शिवलिंग यहां अभी तक सुरक्षित कैसे रहा?अफ्रीका में 6 हजार वर्ष पूर्व प्रचलित था हिन्दू धर्ममिस्र में शिव : कल्याण के शिवांक के अनुसार उत्तरी अफ्रीका के इजिप्ट (मिस्र) में तथा अन्य कई प्रांतों में नंदी पर विराजमान शिव की अनेक मूर्तियां पाई गई हैं। वहां के लोग बेलपत्र और दूध से इनकी पूजा करते थे।

माउंट ऑफ ओलिव्स पर टैम्पल माउंट या हरम अल शरीफ यरुशलम में धार्मिक रूप से बहुत पवित्र स्थान है। इसकी पश्चिमी दीवार को यहूदियों का सबसे पवित्र स्थल कहा जाता है। यहूदियों की आस्था है कि इसी स्थान पर पहला यहूदी मंदिर बनाया गया था। इसी परिसर में डॉम ऑफ द रॉक और अल अक्सा मस्जिद भी है। इस मस्जिद को इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। यह स्थान तीन धर्मों के लिए पवित्र है- यहूदी, ईसाई और मुसलमान। यह स्थान ईसा मसीह की कर्मभूमि है और यहीं से ह. मुहम्मद स्वर्ग गए थे।यहूदियों के गॉड : यहूदी धर्म के ईश्वर नीलवर्ण के हैं, जो शिव के रूप से मिलते-जुलते हैं। कृष्ण का रंग भी नीला बताया जाता है।

यहूदी धर्म में शिवा, शिवाह होकर याहवा और फिर यहोवा हो गया। शोधकर्ताओं के अनुसार यहां यदुओं का राज था, यही यहूदी कहलाए।सुलेमानी मंदिर : इस मंदिर का बाइबिल में प्रथम मंदिर के रूप में मिलता है। इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्‍दी ईसा पूर्व में हुआ था। यह मंदिर हिब्रू संप्रदाय से संबंधित था। ईसा के जन्म से हजारों वर्ष पूर्व से यहूदी इसराइल में निवास करते थे। लगभग 3 हजार वर्ष पूर्व डेविड (दाऊद) नाम का सम्राट वहां का शासक था। उसने अपने शासनकाल में यरुशलम नगर को इसराइल की राजधानी बनाया था। डेविड के पश्चात उसका पुत्र सोलोमन (सुलेमान) वहां का सम्राट बना। सोलोमन विद्वान, बुद्धिमान और धर्म में रुचि रखने वाला शासक था। उसने वहां विशालकाय मंदिर बनवाया था। उसके काल में भारत के कई ऋषि और जैन मुनि इसराइल और अरब के जंगलों में रहते थे।सुलेमान ईसा से लगभग 900 वर्ष पूर्व हुए थे। उस काल में यह धरती पर सबसे बड़ा मंदिर माना जाता था। सुलेमान के मंदिर और यरुशलम को बेबीलोनियों और रोमनों ने उजाड़ दिया।

सुलेमान की मृत्यु के बाद इसराइल और जूडा पुन: स्वतंत्र रियासतें बनीं। उनमें झगड़े शुरू हुए, तब असीरिया ने चढ़ाई की। वहां के विशाल मंदिर एवं भवनों में आग लगा दी और यरुशलम नगर भी ध्वस्त कर दिया। यहूदी पुरोहितों और सरदारों का संहार कर हजारों यहूदी परिवारों को कैद कर और गुलाम बनाकर बाबुल भेजा। वहां उन पर अनेक अत्याचार हुए और उन्हें नारकीय यातनाएं सहन करनी पड़ीं। परंतु जब ईरान ने बाबुल पर विजय पाई तो आर्य राजा ‘कुरु’ ने उन्हें स्वतंत्र किया। लूट का सारा धन जो बाबुल आया था, उसे यहूदी राजा के वंशज, जो वहां गुलाम थे, के सुपुर्द कर आदर के साथ उन्हें वापस फिलिस्तीन भेजा। राजा कुरु ने यरुशलम के मंदिर का अपने व्यय से पुनर्निर्माण कराया और पुराने पुरोहित के वंशजों को सौंप दिया। इस्लाम के उदय के बाद बहुत काल तक मुसलमानों ने यहां पर राज्य किया और यहां की ऐतिहासिक इमारतों और इतिहास को नष्ट कर दिया।सोलोमन के मंदिर में ईश्वर के प्रतीक पवित्र पत्थर (कलाल) को अतिपवित्र स्थान (गर्भगृह) के मध्य में रखा जाता था। मंदिर में बाहरी पवित्र स्थान मण्डप, कुंड, सामने नंदी, परिक्रमा पथ इत्यादि होते थे। बेबीलोनियन और रोमनों के आक्रमणों ने इन मंदिरों को नष्ट कर दिया। ‘कलाल’ प्राचीन सोलोमन-बेबीलोनियन काल से भी पहले से प्रयोग किया जाता रहा अति पवित्र शब्द है, जो त्रिनेत्रेश्वर रुद्र भगवान शिव के काल या कालाहारी (कालांतक) स्वरूप का द्योतक है।

जॉर्डन के पेत्रा शहर के प्राचीन खंडहरों का अध्ययन करने के बाद पता चला कि यह एक शिव मंदिर था। एक पहाड़ी की ढलान पर काटकर बनाए गए इस मंदिर को पेट्रा का अल-खजनेह (खजाना घर) कहा जाता है। पेत्रा एक ‘होर’ नामक पहाड़ की ढलान पर बना हुई है और पहाड़ों से घिरी हुई एक द्रोणी में स्थित है। यह अपने तरह-तरह की पत्थर की इमारतों के लिए प्रसिद्ध है, जो लाल चट्‌टानों से बनी हैं। पेत्रा शहर का निर्माण ईसा पूर्व चौथी सदी में हुआ। हालांकि मंदिर इससे भी प्राचीन है। पेत्रा नबातियन साम्राज्य की राजधानी थी। इस शहर को यह नाम रोमन व्यापारियों ने दिया।इस मंदिर पर उकेरी गईं मूर्तियां प्राचीन हिन्दू मंदिरों पर उकेरी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं। यहां दुर्गा की एक खंडित मूर्ति भी रखी हुई है। एक जगह एक शेर बना है तो दूसरी जगह बैल। मंदिर के मुख्‍य देवता को शरा कहा जाता है, जो बैल की सवारी करता है और देवी शेर की। यहां के खंडहरों को ध्यान से देखने पर सहज ही विश्वास हो जाएगा कि यह कभी शिव मंदिर रहा होगा। इस मंदिर को देखने पर आपको अजंता और एलोरा की गुफाओं की भी याद आएगी। -विभू देव मिश्रातुर्किस्थान के बेबिलन नगर में 1200 फुट का महाशिवलिंग है। कुछ वर्ष पूर्व ही कुवैत में एक गहरी खुदाई के दौरान कांसे की स्वर्णजड़ित गणेश की मूर्ति प्राप्त हुई। कुवैत के एक रहवासी ने उस मूर्ति को लेकर कौतूहल जताया था तथा इतिहासकारों से हिन्दू सभ्यता और अरब सभ्यता के बीच क्या अंतरसंबंध हैं यह स्पष्ट करने का आग्रह किया था, लेकिन इसको ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई।

सऊदी अरब में : 600 ईसा पूर्व इस्लाम से पहले अरब में 3-4 परंपराएं प्रचलन में थीं। एक अरब की पुरानी कौम जिसे साबिईन कहा जाता था तथा दूसरा एक पुराना धर्म जिसे दीने इब्राहीमी कहा जाता था। यह इब्राहीमी धर्म ही बिगाड़ का शिकार होकर मुशरिकों का धर्म बन चुका था। तीसरा यहूदी धर्म और चौथा ईसाई धर्म। इसके अलावा भी कुछ अन्य कबीले थे जिनमें जदीस, आद, समूद, सामी आदि प्रमुख हैं। ये सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। शैव धर्म के ही भिन्न-भिन्न संप्रदाय थे।मुशरिक अपने पूर्वजों और योद्धाओं की कब्रों की पूजा करते थे और उनसे आशीर्वाद मांगते थे। मुशरिक काबा को अपनी इबादतगाह मानते थे। काबा में 300 से ज्यादा मूर्तियां रखी थीं और उसके आसपास कब्रें थीं। यहूदी भी यहीं पूजा-प्रार्थना करते थे।

इसराइल के यरुशलम में जहां सोलोमन का प्राचीन मंदिर था, तो अरब के मक्का में काबा प्रमुख इबादतगाह था।मुशरिक बहुदेववादी और मूर्तिपूजक थे। बहुत से विद्वान मानते हैं कि ये सभी हिन्दू थे व इनका समाज मुशरिक था, लेकिन हिन्दू विद्वान इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। इस पर विवाद हैं। ‘मुशरिक’ का अर्थ होता है ईश्वर को छोड़कर या ईश्वर के अतिरिक्त अन्य को पूजने वाला बहुदेववादी। लेकिन हिन्दू तो एकेश्वरवादी धर्म है जिसमें बहुदेववादी धारा भी प्राचीनकाल से चली आ रही है। ठीक उसी तरह जिस तरह की बरगद के वृक्ष पर अनचाही लताएं भी आश्रय लेकर ऊपर तक चढ़ जाती हैं।इराक और सीरिया में सुबी नाम से एक जाति थी यही साबिईन है। इन साबिईन को अरब के लोग हिन्दू मानते थे। साबिईन अर्थात नूह की कौम। भारतीय मूल के लोग बहुत बड़ी संख्या में यमन में आबाद थे, जहां आज भी श्याम और हिन्द नामक किले मौजूद हैं। इस्लाम के बाद अरब की सभी प्राचीन कौमों, मंदिरों और अरब के प्राचीन इतिहास को खत्म कर दिया गया।विद्वानों के अनुसार सऊदी अरब के मक्का में जो काबा है, वहां भी प्राचीनकाल में ‘मुक्तेश्वर’ नामक एक शिवलिंग था जिसे बाद में ‘मक्केश्‍वर’ कहा जाने लगा। वहां के जमजम नामक कुएं से पानी लेकर लोग इस शिवलिंग पर चढ़ाते थे। यहां स्थित शिवलिंग की पूजा खजूर की पतियों से की जाती थी। कहते हैं कि उस शिवलिंग को आजकल ‘संगे अस्वद’ कहते हैं।

पशुपतिनाथ : पशुपतिनाथ क्षेत्र नेपाल में हिन्दुओं का सबसे पवित्र तीर्थस्थान है। यह मंदिर प्राचीन श्लेस्मांतक वन में बागमती नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल किया है। यहां पर मंदिरों की लंबी श्रृंखला, श्मशान घाट, धार्मिक स्‍नान और साधुओं की टोलियां देख सकते हैं।भगवान शिव को समर्पित पशुपतिनाथ मंदिर बागमती नदी के किनारे बना है। नेपाल में बागमती को गंगा नदी समान श्रद्धापूर्वक पवित्र माना जाता है। इस मंदिर को भगवान शिव का एक घर माना जाता है। प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु यहां दर्शनों के लिए आते हैं।

मुनेश्वरम्‌ : यह मंदिर रामायणकाल से भी अधिक प्राचीन है। मुनेश्वरम्‌ का अर्थ है (मुनि+ईश्वरम)। भगवान शिव का प्रथम मंदिर। शिवलिंगम यहां पहले से ही (श्रीराम के आने से पूर्व) स्थापित था। इसका अर्थ है कि राजा रावण इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करते थे। श्रीराम और रावण के युद्ध एवं रावण की मृत्यु के पश्चात् जब श्रीराम विमान से अयोध्या वापस जा रहे थे, तो ब्राह्मण की हत्या के दोष के कारण विमान में कंपन होने लगा और जब विमान मुनेश्वरम्‌ मंदिर के ऊपर पहुंचा तो कंपन रुक गया।श्रीराम जानते थे कि पंडित रावण प्रतिदिन मुनेश्वरम्‌ मंदिर में शिवजी की पूजा करने के लिए जाते थे अतः श्रीराम ने अपना विमान मुनेश्वरम्‌ में रोका और भगवान शिव से आगे का मार्ग दिखाने की प्रार्थना की। तब भगवान शिव ने सुझाव दिया कि ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति के लिए 4 लिंग मंदिरों की स्थापना चारों कोनों पर करो। इस आदेश के बाद श्रीराम ने श्रीलंका के चारों कोनों पर एक-एक लिंग की स्थापना की। इनमें से एक लिंग (रामेश्वरम्‌) भारत में है, बाकी लंकापुर में चारों कोनों पर मन्नावरी, तिरुकोनेश्वरम्‌ और तिरुकेथेश्वरम्‌ में शिवलिंग स्थापित हैं।

साभार https://hindi.webdunia.com/ से

image_pdfimage_print


Get in Touch

Back to Top