Monday, May 20, 2024
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मध्य प्रदेश में बना दुनिया का सबसे ऊंचा जैन मंदिर

मध्‍य प्रदेश (Madhya Pradesh) के दमोह जिले (Damoh District) के कुण्डलपुर में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (Bhagwan Aadinath) का दुनिया का सबसे उंचे मंदिर का बन चुका है। कुण्डलपुर में बन रहे इस जैन मंदिर (Jain Mandir) का निमार्ण कार्य पिछले 17 सालों से चल रहा है। बताया जा रहा है कि मध्य प्रदेश के कुण्डलपुर में बने दुनिया के सबसे ऊंचे मंदिर को बनाने में एक हजार करोड़ से ज्यादा की लागत लगी है। इस मंदिर में 12 लाख घन मीटर पत्थरों का उपयोग किया जा चुका है।

मंदिर में प्रत्येक खंड में 108 मूर्तियों की स्थापना की गई है। मंदिर के तीनों खंड में 324 मूर्तियां स्थापित की गई है। इसमें हर खंड पर 108 मूर्तियां विराजेंगी। ऐसे में मूर्तियों की ऊंचाई 27, 36, 45, 54 और 63 इंच तक है। इसके अलावा 45 फीट का गर्भ गृह भी बनाया गया है जिसमें 8 मंडप और सीढिय़ों का निर्माण किया गया है। वहीं, मंदिर निर्माण का काम गुजरात और राजस्थान से आए 250 से ज्यादा कारीगरों ने किया है। हालांकि मंदिर के चारों तरफ की बाउंड्री पर 240 पत्थरों पर जैन धर्म का इतिहास को दिखाया गया है। साथ ही जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों का परिचय और आचार्य श्री के संबंध में जानकारी दर्शाई गई है।

इस मंदिर की परिकल्पना साल 1993 में की गई थी। वहीं, तीन खंडों में 288 प्रतिमाएं विराजमान होंगी, जिनमें 12 मूलनायक भगवान होंगे। इसके हर एक खंड पर चार चौबीसी होंगी। फिलहाल जिनालय का निर्माण जैसलमेर के पीले पत्थरों से किया जाएगा, इसके चारों दिशाओं में हाथी की मूर्तियां इस तरह लगाई जाएंगी, जिससे प्रतीत होगा कि मंदिर उनकी पीठ पर रखा हुआ है। वहीं, जैन समाज का दावा है कि यह दुनिया का अब तक का सबसे ऊंचा जैन मंदिर होगा। यह एक एकड़ क्षेत्रफल में बनेगा।

इस मंदिर को बनाने में एक हजार करोड़ से ज्यादा की लागत आई है।

इस मंदिर में करीब एक हजार साल पुरानी भगवान आदिनाथ की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर का पुननिर्माण भूकंप से पुराना मंदिर टूट जाने के बाद किया गया है। यह मंदिर 500 फीट ऊंची पहाड़ी पर बना है, जिसका शिखर 189 फीट ऊंचा है। दुनिया में अब तक इतना ऊंचा जैन मंदिर नहीं बना है।

इस मंदिर में 12 लाख घन मीटर पत्थरों का उपयोग किया जा चुका है। बात करें इस मंदिर की डिजाइन की तो इसकी डिजाइन सोमपुरा बंधुओं ने तैयार की है। खास बात यहा है कि इन पत्थरों को सीमेंट और लोहे का इस्तेमाल किए बिना जोड़ा गया है। राजस्थान के तीन प्रकार के पत्थरों से नागर शैली में बड़े बाबा भगवान आदिनाथ के मंदिर का निर्माण किया गया है। इस मंदिर में मुख्य शिखर की ऊंचाई 180 फीट, गुड मंडप 99 फीट, नृत्य मंडप, रंग मंडप ग्राभ गृह 67 फीट ऊंचा है।

मुख्य मंदिर के सामने सहस्त्रकूट में 1008 मूर्तियां स्थापित होगी। इसी तरह त्रिकाल चौबीसी, वर्तमान चौबीसी, पूर्व चौबीसी और भविष्य चौबीसी में मूर्ति स्थापित हो रही है। इसी प्रकार 724 प्रतिमाएं पद्मासन 220 प्रतिमाएं खड्गासन में पत्थरों पर भी उकेरी गई हैं।

500 फीट ऊंची पहाड़ी पर बन रहे इस मंदिर का शिखर 189 फीट ऊंचा है। कहा जा रहा है की दुनिया में अब तक नागर शैली में इतनी ऊंचाई वाला मंदिर नहीं है। मंदिर की ड्राइंग डिजाइन अक्षरधाम मंदिर की डिजाइन बनाने वाले सोमपुरा बंधुओं ने तैयार की है। मंदिर की खासियत है कि इसमें लोहा, सरिया और सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। इसे गुजरात और राजस्थान के लाल-पीले पत्थरों से तराशा गया है। एक पत्थर को दूसरे पत्थर से जोडऩे के लिए भी खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

जैसलमेर के मूल सागर पत्थरों से बनाए गए गुण मंडप में देवी-देवताओं व नृत्यांगना आदि की मूर्तियों को बड़े ही शानदार तरीके से उकेरा गया है। जो देखने में बहुत दर्शनीय लग रही हैं। इस नक्काशी को देखने वाले भी लोग कारीगरों की प्रशंसा करने से खुद को रोक नहीं पाते हैं। मंदिर निर्माण में लगे सभी पत्थरों पर शानदार नक्काशी इसकी सुंदरता और भव्यता को और बढ़ाती हैं।

प्राचीन स्थान कुंडलपुर को सिद्धक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। यहां 63 मंदिर हैं जो 5वीं, 6वीं शताब्दी के बताए जाते हैं। क्षेत्र को 2,500 साल पुराना बताया जाता है। कुण्डलपुर सिद्ध क्षेत्र अंतिम श्रुत केवली श्रीधर केवली की मोक्ष स्थली है। यहां 1,500 साल पुरानी पद्मासन श्री 1008 आदिनाथ भगवान की प्रतिमा है, जिन्हें बड़ेबाबा कहते हैं।

भगवान महावीर के 500 शिष्य हुए हैं। जिनमें इंद्रभूति गौतम के भट्टारक ने भ्रमण किया था। भट्टारक सुरेंद्र कीर्ति ने कुंडलगिरी क्षेत्र से भगवान आदिनाथ की प्रतिमा खोजी थी। तब से यह माना जा रहा है कि भगवान महावीर का समवशरण 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व कुंडलपुर आया था। इस इलाके की पहाडियां कुंडली आकार में होने के कारण पहले इसका नाम कुंडलगिरी था। बाद में धीरे-धीरे इसका नामकरण कुंडलपुर पड़ गया, जो अब सबसे बड़ा तीर्थ क्षेत्र है। यह क्षेत्र 2500 साल पुराना बताया जाता है।

वैसे तो कुंडलपुर में विराजित भगवान आदिनाथ की 15 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा की खोज करने वाले के रूप में भट्टारक सुरेंद्र कीर्ति का नाम आता है, लेकिन एक किवदंती यह भी है कि पटेरा गांव में एक व्यापारी प्रतिदिन सामान बेचने के लिए पहाड़ी के दूसरी ओर जाता था। रास्ते में उसे प्रतिदिन एक पत्थर से ठोकर लगती थी, एक दिन उसने मन बनाया कि वह उस पत्थर को हटा देगा, लेकिन उसी रात उसे स्वप्न आया कि वह पत्थर नहीं तीर्थकर मूर्ति है। स्वप्न में उससे मूर्ति की प्रतिष्ठा कराने के लिए कहा गया, लेकिन शर्त थी कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। उसने दूसरे दिन वैसा ही किया। बैलगाड़ी पर मूर्ति सरलता से आ गई, जैसे ही आगे बढ़ा उसे संगीत और वाद्य, ध्वनियां सुनाई दीं। जिस पर उत्साहित होकर उसने पीछे मुड़कर देख लिया और मूर्ति वहीं स्थापित हो गई।

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