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मुकुंद घोष योगानंद बनकर दुनिया भर में योग गुरू के रूप में छा गए

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने योगी कथामृत के रचयिता और येगदा सत्संग सोसाइटी के संस्थापक परमहंस योगानंदजी की 125वीं जयंती पर 125 रुपए का सिक्का जारी किया है। सिक्के को जारी करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा-वह भारत के महान सपूत थे, जिन्होंने दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने लोगों को मानवता के प्रति वैश्विक रूप से जागरूक करने का काम तब किया, जब संचार के साधन भी सीमित थे। भारत को अपने इस महान सपूत पर गर्व है, जिन्होंने दुनिया भर के लोगों के दिलों में एकता का संदेश भरा। जानते हैं कौन हैं परमहंस योगानंद जी महाराज…

परमहंस योगानंद जी महाराज का जन्म पांच जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनके बचपन का नाम था मुकुंद नाथ घोष था। साल 1910 में उनकी मुलाकात स्वामी युक्तेश्वर गिरि से हुई और वहां से मुकंद की आध्यात्मिक यात्रा शुरू हो गई। 1915 में स्कॉटिश चर्च कॉलेज से इंटर पास किया फिर सीरमपुर कॉलेज से ग्रेजुएशन के बाद अपने गुरु से उन्होंने योग और ध्यान की बारीकियां सीखीं।

वह साल 1920 में बोस्टन में धर्म की अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रतिनिधि के रूप में शामिल होने के लिए अमेरिका चले गए। पांच साल बाद वह माउंट वाशिंगटन, लॉस एंजिल्स में आत्मानुभूति अपने मुख्यालय के साथ फैलोशिप की स्थापना की। वह साल 1952 तक अमेरिका में ही रहे। हालांकि, बीच में वह भारत भी लौटे, लेकिन फिर अमेरिका चले गए। वह साल 1935 में एक साल के लिए भारत आए और यहां आकर अपने इंस्टीट्यूट और गुरु के काम को आगे बढ़ाया। महात्मा गांधी ने उनके संदेश को लोगों तक पहुंचाया।

योगानंद पहले साधु थे जिन्होंने भारतीय योग को पश्चिमी देशों में पहुंचाया और वहां उन्हें योग के पिता के रूप में पहचान मिली। अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा में योगानंदजी ने भारत के महान योगी के साथ अपने आध्यात्मिक अनुभवों का विवरण दिया है। तब से उनकी किताब ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी दुनिया की सबसे बड़ी आध्यात्मिक किताब बन गई और इसका कई भाषाओं में अनुवाद किया गया।

7 मार्च 1952 की शाम को अमेरिका में भारत के राजदूत बिनय रंजन पत्नी के साथ लॉस एंजिल्स के होटल में खाने पर गए थे। रात्रिभोज के बाद योगानंदजी ने दुनिया की एकता पर भाषण दिया और इसके बाद उन्होंने अपनी देह त्याग दी, जिसे महासमाधि कहा जाता है। यह उनकी योग शक्ति का ही नतीजा था कि मृत्यु के कई दिनों के बाद भी उनका शरीर कई हफ्तों तक क्षय नहीं हुआ।

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