Thursday, July 25, 2024
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सम्पन्नता,प्रसन्नता और प्रपन्नता

प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सभी प्रकार से संपन्न तथा प्रसन्न रहना चाहता है। सृष्टि के आरंभ से देवता,मानव और दानव अर्थ,धर्म,काम और मोक्ष की कामना करते रहे है और उपर्युक्त चारों ऐश्वर्यों की प्राप्ति ही उनके जीवन का लक्ष्य रहा। हमारे वेद, पुराण,उपनिषद,रामायण,महाभारत और गीता में भी मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रुप से प्रसन्न रहने के लिए भगवान विष्णु ने,मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने तथा रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण ने संपन्नता और प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए प्रपन्नता को अपनाने का पावन संदेश दिया है।

सप्त ऋषियों ने भी यही संदेश दिया है।प्रपन्नता का अभिप्राय ईश्वर की शरणागति,एकमात्र ईश्वर का सहारा और पूर्णरुप से उनमें अटूट विश्वास है।प्रपन्नता में किसी प्रकार के अहंकार की जगह बिलकुल ही नहीं होती है।ईश्वर के सामने आत्मसमर्पण होता है।ये तीनों आशीर्वाद सत्युग,त्रेता,द्वापर तथा कलियुग में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु,श्रीराम,श्रीकृष्ण तथा जगन्नाथ को दी।कलियुग में तो पुरी धाम के एकमात्र पूर्ण दारुब्रह्म भगवान जगन्नाथ अपने चतुर्धा देवविग्रहः जगन्नाथ,सुभद्रा,बलभद्र तथा सुदर्शन के रुप में क्रमशः चारों वेदों ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद और अथर्वेद के रुप में अपने रत्नसिंहासन पर जीवित वेद रुप में विराजमान हैं।रामराज बैठे त्रैलोका। हरषित भये गये सब सोका।।बयस न कर काहू सन कोई।रामप्रताप विषमता खोई।।

यही नहीं,दैहिक,दैविक,भौतिक तापा। रामराज काहु नहीं व्यापा।।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।

कारण राजा रामचन्द्र सभी प्रकार के प्रकोपों पर विजय पा लिये थे और उनकी प्रजा वेदों द्वारा बताई गई नीति (मर्यादा) में रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करती थी।प्रजा के पास सम्पन्नता,प्रसन्नता और प्रपन्नता थी।आज भी ऐसा देखा जाता है कि सकारात्मक सोचवाले व्यक्ति का आध्यात्मिक जीवन पूरी तरह से सम्पन्नता,प्रसन्नता और प्रपन्नता पर ही आधारित होता है।

प्रसन्नता से कई बीमारियों का इलाज सम्भव है। डॉक्टरों के अनुसार मन और मस्तिष्क के विकारी तत्वों को दूर करने में प्रसन्नता सहायक सिद्ध होती है।एक छोटी-सी मुस्कान आपसी रिश्तों को प्रगाढ़ बना देती है।राम,कृष्ण और जगन्नाथ सदा प्रसन्न रहते हैं और प्रसन्नता का पावन संदेश भी देते हैं। महाभारत की लडाई की कथा पर अगर विचार करें तो यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है।प्रसन्नता से हमारे अन्दर सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है जिससे हमारे कार्य करने की क्षमता और अधिक बढ होती है और हम मानसिक रूप से समृद्धि हो जाते हैं।एक बात अवश्य है कि प्रसन्नता का संपन्नता से कोई संबंध नहीं है।मोह-माया के बंधन बड़े विचित्र होते हैंलेकिन यब अज्ञान जनित भ्रम होता है और कुछ भी नहीं होता है।

इसीलिए माया को महाठगिनी कहा गया है।अगर यह कहा जाय कि यह मोह माया वृक्ष की छाया की तरह होती है। छाया का जिसप्रकार अपना कोई निजी अस्तित्व नहीं होता ठीक उसीप्रकार माया का भी नहीं होता है।अज्ञानता का वृक्ष स्वयं अंकुरित होता है।इसे दूर करने के लिए हमें सांसारिक सुखों का त्याग करना होता।

इसलिए हमें सकारात्मक सोच के साथ आपसी प्रेम,सद्भाव,मैत्री,परोपकार और अहिंसा आदि को अपनाना होगा और उसके लिए भी प्रपन्नता की नितांत आवश्यकता है।यह भी सच है कि मनुष्य जीवन की सार्थकता चार ऐश्वर्यों-अर्थ,धर्म,काम और मोक्ष की प्राप्ति में है।मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम प्रारब्धानुसार 14 वर्षों की वनवास की सजा का पूर्ण आनंद और प्रसन्नता के साथ भोगकर जब अयोध्या वापस लौटे तो उनका राज्याभिषेक साथ-साथ हुआ।

कुलगुरु वसिष्ठ ने यह सुझाव दिया कि राजा राम के राज्याभिषेक के लिए शुभ घडी अभी ही है और मर्यादा पुरुषोत्तम अयोध्यापति श्रीराम राजाधिराज बने तो अयोध्यावासियों ने खुशी में घर-घर में घी के दीये जलाये।दीपावली मनाई।कुलगुरु वशिष्ट ने सभी को संपन्नता,प्रसन्नता तथा प्रपन्नता का दिव्य आशीष दिया। प्राचीन यूनानी विचारक प्लेटो ने तो प्रसन्नता को मानवीय गुण बताया है।उसका यह मानना था कि मानव संपूर्ण रूप से प्रसन्न उसी समय होता है, जब उसकी आत्मा भविष्य जीवन की ओर लौट जाती है।

अरस्तू ने भी प्रसन्नता को ईश्वर का मानव के लिए अनुपम उपहार बताया है। वेदों,पुराणों,महाभारत,रामायण और गीता के अनुसार प्रसन्नता पांच प्रकार ही होती हैः शारीरिक,भौतिक,मानसिक,बौद्धिक तथा स्वेच्छिक होती है जैसाकि कालजयी रचना रामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास स्वयं कहते हैं –स्वांतः सुखाय रघुनाथ गाथा।कलियुग में भगवान जगन्नाथ भी पुरी धाम में अपने रत्नसिंहासन से अपनी दिनचर्या जैसे 56प्रकार के भोग,प्रतिदिन अनेकानेक श्रृंगार करके,वर्ष में 13 यात्राएं करते तथा प्रतिवर्ष देवस्नानपूर्णिमा के दिन महास्नानकर,आषाढ शुक्ल द्वितीया को अपनी विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा कर,अपनी बाहुडायात्रा कर,अपने सोनावेष धारणकर तथा अपनी नीलाद्रिविजय के माध्यम से स्वांतः सुखाय के माध्यम से भक्त-मानव को संपन्नता,प्रसन्नता तथा प्रपन्नता (दोनों हाथ ऊपर कर उनका वंदन और अभिनंदन करने का पावन संदेश देते हैं।

-(लेखक भुवनेश्वर में रहते हैं और ओड़िशा के सामाजिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विषयों पर लिखते हैं)

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