Friday, April 4, 2025
spot_img
Home Blog Page 14

महाकुंभ में 30 करोड़ कमाने वाले नाविक ने जेवर गिरवी रखकर 70 नावें खरीदीं

तारीख- 4 मार्च…। जगह- UP विधानसभा। महाकुंभ में कारोबार का जिक्र करते हुए CM योगी ने कहा- ‘मैं एक नाविक परिवार की सक्सेस स्टोरी बता रहा हूं, जिनके पास 130 नौकाएं हैं। प्रयागराज महाकुंभ के 45 दिन में इन्होंने शुद्ध बचत 30 करोड़ रुपए की। यानी एक नाव से रोज 50 से 52 हजार रुपए इनकम थी।’

योगी ने जिस परिवार का जिक्र किया, उसकी पूरी कहानी क्या है? दैनिक भास्कर इसे जानने के लिए परिवार तक पहुंचा। परिवार के लोगों से बात की। सिलसिलेवार पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

अरैल घाट के करीब शुकलावती देवी का घर प्रयागराज का नैनी इलाका, जो अरैल घाट के करीब है। यहीं पर शुकलावती देवी का घर है, जिनके बेटे पिंटू महरा और परिवार का जिक्र CM योगी ने सदन में किया। ये मूलतः निषाद परिवार से हैं। नदी आधारित कारोबार इनका पेशा है। शुकलावती के परिवार में दो बेटे पिंटू और सतीश हैं।

नाविक पिंटू महरा का घर सामान्य लोगों की तरह ही है। मौजूदा समय में मकान के ऊपरी फ्लोर में मजदूर निर्माण के काम में लगे हैं। मकान के आगे वाले हिस्से में लोगों की भीड़ उसे बधाई देने के लिए बैठी है।

प्रयागराज के पिंटू महरा के पास खुद की 70 नाव हैं। महाकुंभ में परिवार और साथियों की मिलाकर 130 नाव श्रद्धालुओं को संगम स्नान करा रही थीं।

यहां हमारी मुलाकात सबसे पहले पिंटू (40) की मां शुकलावती (71) से हुई। वे बताती हैं, जून 2018 में पति बच्चा महरा की मौत ने पूरे परिवार को अनाथ कर दिया। बच्चों के सिर से पिता का साया क्या उठा, परिवार की 2 जून की रोटी का सहारा छिन गया था, लेकिन आज बेटे की मेहनत ने सारे जख्म अपनी मेहनत और लगन से भर दिए हैं। यह कहते हुए उनकी आंख में आंसू छलक आ गए।

यह पिंटू महरा का घर है। इसमें निर्माण कार्य चल रहा है।

शुकलावती ने बताया, बेटे पिंटू ने पत्नी सुमन के जेवर गिरवी रखे। नाव तैयार करने के लिए रुपए कम पड़े तो मुझसे भी घर के कागज और जेवर मांगे। मैंने उससे कहा- ‘पागलपन न करो।’

डर था कि बेटे का कारोबार न चला तो सब लोग सड़क पर आ जाएंगे। लेकिन पिंटू मेहनत के साथ नाव तैयार करने के लिए रुपए जुटाता रहा। पहले सिर्फ चार नाव थीं, सितंबर 2024 में घर के कागज-जेवर गिरवी रख उसने धीरे-धीरे कर 70 नाव तैयार कर लीं।

पिंटू, भाई सतीश और मां शुकलावती पुराने दिन याद कर भावुक हो जाते हैं।

शुकलावती ने कहा, पूरे परिवार ने महाकुंभ में बहुत मेहनत की, गंगा मैया ने हमारी बात सुन ली। हमारा कारोबार चमका और लोगों का आशीर्वाद भी हमें मिला।

CM योगी ने जिस नाविक पिंटू का जिक्र किया, उसकी उम्र 40 साल है। हमने पिंटू से पूछा, महाकुंभ से पहले दिमाग में क्या चल रहा था? पिंटू ने बताया सूबे के मुख्यमंत्री ने जब साल 2019 का अर्धकुंभ कराया था, तभी से उसने प्लानिंग शुरू कर दी थी। जिस सरकार में अर्धकुंभ इतना शानदार व भव्य हो सकता है, उसमें महाकुंभ कितना भव्य-दिव्य होने वाला है।

पिंटू ने महाकुंभ की सरकारी तैयारियों के बीच अपने प्लान को तैयार कर उसे हकीकत की जमीन पर उतारने की तैयारी शुरू कर दी। महाकुंभ आते-आते पिंटू ने 70 नाव खुद से खरीदीं। 100 लोगों के कुनबे के युवाओं को संगठित कर कुल मिलाकर 130 के करीब नाव महाकुंभ के लिए संगम की त्रिवेणी में श्रद्धालुओं को पुण्य की डुबकी लगवाने उतारीं।

सितंबर 2024 तक पिंटू के पास सिर्फ तीन-चार नाव ही थीं। कुंभ से पहले उन्होंने 70 नावों की व्यवस्था कर ली।

मां ने दी सीख- श्रद्धालुओं को सताकर पैसे मत लेना मां शुकलावती ने पिंटू से कहा था, एक बात गांठ बांधकर रखा लो, गंगा मां के आंचल में उतरकर कारोबार करने जा रहे हो, कभी किसी श्रद्धालु को सताकर रुपए न लेना। पिंटू ने कहा- उसने मां की बात को जेहन में रखा।

अपने परिवार व नाविक साथियों की मदद से किला घाट, VVIP घाट, वोट क्लब, अरैल समेत कई अन्य घाट पर श्रद्धालुओं के लिए नाव चलाईं। सरकार ने जितने रुपए निर्धारित किए थे, उतने लेकर श्रद्धालुओं को संगम में डुबकी लगवाई। पिंटू के अलावा परिवार में पत्नी और बेटा-बेटी हैं। घर में स्कॉर्पियो गाड़ी है।

हमने पिंटू से उनके नाव के पूरे कारोबार के बारे में पूछा। पिंटू ने बताया, 1 नाव बनाने में 10 से 15 हजार रुपए खर्च किए। साथ ही 7 मोटर बोट खरीदने में 7 लाख रुपए खर्च किए। कुंभ से पहले उनके पास 12 नाव खुद की और परिवार के लोगों की मिलाकर 80 नाव थीं।

पिंटू से जब पूरी कमाई के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि 30 करोड़ उसने अकेले नहीं, पूरे कुनबे ने मिलकर कमाए हैं। उसने कितने कमाए? इस सवाल पर कहा कि अभी हिसाब नहीं किया। इतने रुपए का करेंगे क्या? इस सवाल पर कहा, सबसे पहले कर्ज चुकाएंगे, इसके बाद अन्य कारोबार में रुपए लगाएंगे। बच्चों की पढ़ाई को बेहतर करने का काम होगा। परिवार की सुख सुविधा पर खर्च करेंगे।

क्या हमारे देश में हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है?

स्विट्जरलैंड में समुदाय विशेष मात्र 2% है और पढ़ा लिखा भी है फिर भी तार्किक सोच रखने वाले सलवान मोमिका की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी।

भारत में तो कन्वर्टेड हिंदू 20% हैं और ज्यादातर मदरसे में पढ़े हैं इसलिए 20 साल बाद गृहयुद्ध, नरसंहार, हत्या, बलात्कार और विभाजन निश्चित है।

लव जिहाद, लैंड जिहाद, ड्रग जिहाद, घुसपैठ जिहाद, धर्मांतरण जिहाद, जनसंख्या जिहाद के कारण भारत की डेमोग्राफी बहुत तेजी से बदल रही है।

यदि कठोर कानून तत्काल नहीं बना तो 20 वर्ष बाद या तो कन्वर्ट होना पड़ेगा अन्यथा यश चोपड़ा, प्रेम चोपड़ा, सुनील दत्त, देवानंद, राज कपूर, राजेन्द्र कुमार, गुलजार, मनमोहन सिंह, खुशवंत सिंह, मिल्खा सिंह, इंद्र कुमार गुजराल, राम जेठमलानी और आडवाणी जी की तरह मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार छोड़कर भागना होगा

यदि विकास करने से देश सुरक्षित होता तो विकास के मामले में फ्रांस और स्विट्जरलैंड हमसे बहुत आगे है

1805 में अफ़गानिस्तान के प्रधानमंत्री पंडित नंदराम टिक्कू ने बहुत विकास किया था और 10 साल बाद उन्हें खदेड़ दिया गया और आज वहां एक भी हिंदू जैन बौद्ध सिख नहीं बचा है

यदि मठ-मंदिर गुरुद्वारा बनाने से हिंदू जैन बौद्ध सिख सुरक्षित होते तो अफ़गानिस्तान पाकिस्तान बांग्लादेश में हज़ारों मठ-मंदिर और गुरुद्वारे थे।

यदि गौशाला, धर्मशाला, गुरुकुल बनाने से हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख सुरक्षित होते तो अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान बांग्लादेश में भी हज़ारों गौशाला, धर्मशाला और गुरुकुल थे।

यदि कथा, पूजा, दान, हवन, ध्यान, साधना करने से हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख सुरक्षित होते तो अफ़गानिस्तान पाकिस्तान बांग्लादेश में हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख का नामोनिशान नहीं मिटता

100 वर्ष पहले विश्व की सबसे बड़ी भगवान बुद्ध की मूर्ति अफ़गानिस्तान में थी लेकिन अब वहाँ न मूर्ति बची है और न बौद्ध।

१०० वर्ष पहले विश्व का सबसे बड़ा जैन मंदिर मुल्तान में था लेकिन अब वहाँ मदरसा चलता है और न तो भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति है और न तो कोई जैन।

१०० वर्ष पहले विश्व का सबसे बड़ा शिव मंदिर गांधार (अफ़गानिस्तान) में था लेकिन अब उसका नामोनिशान नहीं है। न शिवलिंग बचा है और न शिवभक्त।

१०० वर्ष पहले विश्व का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर कैकेय (पाकिस्तान) में था लेकिन अब उसका नामोनिशान नहीं है। न भगवान विष्णु की मूर्ति बची और न विष्णु भक्त।

1971 में बांग्लादेश को बनवाने के लिए हमारे 20 हज़ार सैनिकों ने बलिदान दिया था लेकिन अब वहां हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख को अपना मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार छोड़कर भागना पड़ रहा है

1990 में कश्मीर से हिंदुओं को अपना मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार छोड़कर भागना पड़ा और आजतक वापस नहीं मिला।

वोटजीवी, नोटजीवी और सत्ताजीवी नेता प्रतिदिन आरोप-प्रत्यारोप, तू-तू-मैं-मैं, नूरा-कुश्ती, बतोलेबाजी, भाषणबाजी और तू चोर मैं सिपाही करते हैं लेकिन आवश्यक मुद्दों पर संसद में चर्चा नहीं करते हैं।

गांधीवाद, लोहियावाद, अंबेडकरवाद, साम्यवाद, समाजवाद आपको भ्रमित करने वाले जुमले हैं। नेताओं का असली लक्ष्य है सत्ता और सत्ता से पैसा।

यदि अपना मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार और त्योहार बचाना चाहते हैं तो दल गुलामी छोड़िये और अपने सांसद से मिलकर लव जिहाद, लैंड जिहाद, ड्रग जिहाद, घुसपैठ जिहाद, धर्मांतरण जिहाद और जनसंख्या जिहाद रोकने के लिए कठोर कानून बनाने की मांग करिए।

यदि अपने बच्चों को सुरक्षित देखना चाहते हैं तो नेताओं की जय जयकार करने की बजाय अपने सांसद से मिलकर समान शिक्षा, समान नागरिक संहिता, समान कर संहिता, समान व्यापार संहिता, समान जनसंख्या संहिता, समान पुलिस संहिता, समान न्याय संहिता, समान प्रशासनिक संहिता लागू करने की मांग कीजिये।

याद रखिए, आज के नेता 20 वर्ष बाद आपका मकान, दुकान, खेत, खलिहान, उद्योग, व्यापार और त्योहार बचाने नहीं आएंगे लेकिन आज का कठोर कानून आपका धन, धर्म और परिवार को बचाएगा।

रास्ता दो है- चीन जैसा कठोर कानून और इजरायल जैसा शक्ति का उपयोग।

मेरा तो मानना है कि यदि शक्त कानून नहीं आया तो 10 साल बाद ही इस देश का प्रधान मंत्री, राष्ट्रपती, जज सभी मुस्लिम समुदाय के लोग होगें।
क्योंकि हमारे बच्चे शादियां ही नहीं कर रहे, यदि शादी करते हैं तो बच्चे नहीं कर रहे,तो जनसंख्या कैसे बढ़ेगी और उधर बच्चों की लाईन लग रही है तथा उन्हें मदरसा में ट्रेंड किया जा रहा है।आज हिन्दू 80 करोड़ हैं और मुस्लिम 30 करोड़ हैं,यह उल्टा हो जायेगा और हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे। अभी से सावधान हो जाएं।

जमा पूंजी 300 रुपये और 80 हजार किलोमीटर की यात्रा कर एकत्र किया देसी बीजों का खजाना

तमिलनाडु के मंगलम गांव के 32 वर्षीय किसान सलाई अरुण ने अपनी मेहनत और समर्पण से 300 से अधिक दुर्लभ देशी सब्जियों के बीजों का संरक्षण किया है। बचपन से खेती में रुचि रखने वाले अरुण ने 2011 में जैविक कृषि वैज्ञानिक जी. नम्मालवर से प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिससे उनका खेती के प्रति जुनून और बढ़ गया।
अरुण ने देखा कि किसानों के पास देसी सब्जियों के बीजों की कमी है। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने 2021 में देशभर की यात्रा करने का निर्णय लिया, हालांकि उस समय उनकी जमा पूंजी मात्र 300 रुपये थी। इसके बावजूद, उन्होंने लगभग 80,000 किलोमीटर की यात्रा की और 500 से अधिक किसानों से मिलकर 300 से अधिक दुर्लभ सब्जियों के बीज एकत्रित किए।
अपने गांव में अरुण ने एक छोटे से बगीचे में इन लुप्तप्राय देशी फल-सब्जियों को उगाना शुरू किया। उन्होंने ‘कार्पागथारू’ नाम से एक बीज बैंक की स्थापना की, जिसके माध्यम से वे लौकी की 15, बीन्स की 20, टमाटर, मिर्च और तोरई की 10-10 किस्मों सहित कई अन्य सब्जियों के बीज उपलब्ध करा रहे हैं।
अरुण की यह पहल न केवल जैविक खेती को बढ़ावा देती है, बल्कि देशी बीजों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है। उनकी कहानी प्रेरणादायक है और यह दर्शाती है कि समर्पण और मेहनत से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

विश्व का पवित्रतम रामेश्वरम युगल ज्योतिर्लिंग

दक्षिण भारत में 12 में से सिर्फ 2 ज्योर्तिलिंग हैं श्रीशैलम मल्लिकार्जुन शिवलिंग और रामनाथस्वामी ज्योतिर्लिंग। श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग, आंध्र प्रदेश के कुरनूल ज़िले में है। यह मंदिर भगवान शिव और पार्वती को समर्पित है। यह शैव और शक्ति दोनों हिंदू संप्रदायों के लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है।
भारत की पवित्र धरती पर कई ऐसे स्थान हैं जो आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व से जुड़े हुए हैं। इन्हीं में से एक है तमिलनाडु का रामेश्वरम, जो भारत के दक्षिणी भाग में स्थित एक प्रमुख राज्य है, जहाँ हिंदू धर्म का प्रभाव बहुत गहरा है। यहाँ की लगभग 88% जनसंख्या हिंदू धर्म को मानती है, और यह राज्य भारतीय हिंदू धर्म की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित रामेश्वरम मंदिर हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर है। यह हिंदू धर्म के चार धामों में से एक है।
तमिलनाडु के रामेश्वरम् में है रामनाथस्वामी ज्योर्तिलिंग, जिसे श्रीराम ने समुद्र के बालू की रेत से बनाया था।
कहा जाता है कि इस शिवलिंग का निर्माण उस समय हुआ था, जब श्रीराम लंका के राजा रावण से युद्ध करने की तैयारी कर रहे थे। तब भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए श्रीराम ने इस शिवलिंग का निर्माण कर उस पर जल चढ़ाया था। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसकी बनावट, पौराणिक महत्व और प्राकृतिक सौंदर्य इसे अद्वितीय बनाते हैं।  यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और पूरी दुनिया में अपनी खास पहचान रखता है। हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था, वास्तुकला और पौराणिक कथाओं का अद्भुत संगम है।
 
रामेश्वरम मंदिर की पौराणिक कथा:- 
भगवान राम जब 14 साल का वनवास खत्म करके और लंका पति रावण का वध करके मां सीता के साथ लौटे, तब ऋषि-मुनियों ने उनसे कहा कि उन पर ब्राह्मण हत्या का पाप लगा है। रावण ब्राह्मण कुल से था, इसलिए भगवान राम को ब्रह्महत्या का पाप लगा। इसलिए उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए शिवलिंग की स्थापना करने की सलाह दी गई। ऐसे में भगवान राम ने शिवलिंग लाने के लिए हनुमान जी को कैलाश पर्वत भेजा, लेकिन हनुमान जी को आने में देर हो गई। इस बीच माता सीता ने समुद्र तट पर रेत से शिवलिंग बना दिया। बाद में हनुमान जी द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी वहीं स्थापित किया गया। माता सीता द्वार बनाए लिंग को ‘रामलिंग’ और हनुमान जी द्वारा लाए गए लिंग को ‘विश्वलिंग’ कहा जाता है। उसके बाद भगवान राम ने रामेश्वरम के पास स्नान करके शिवलिंग की विधिवत पूजा की और अपने पापों से मुक्ति पाई।
कैलाश पर्वत से शिवलिंग लेकर जब हनुमान जी वापस लौटे तब तक शिवलिंग स्थापना का मुहूर्त बीत चुका था और भगवान राम माता सीता के साथ मिलकर वहां पर एक बालू के शिवलिंग की स्थापना कर चुके थे. यह सब देखकर हनुमान जी दुखी होकर रामजी के चरणों में गिर गए तब रामजी ने उन्हें कहा कि अगर तुम इस शिवलिंग को उखाड़ दो तो मैं यहां तुम्हारे द्वारा लाया शिवलिंग स्थापित कर दूंगा. हनुमान जी के बहुत प्रयास करने के बाद भी वह शिवलिंग को उखाड़ नहीं पाए और थोड़ी दूर जाकर गिर पड़े।
तब रामजी ने कहा कि यह मेरे और सीता के द्वारा स्थापित किया गया शिवलिंग है, इसे हटाया नही जा सकता है. यह समझाने के बाद रामजी ने हनुमान जी द्वारा लाए शिवलिंग को वहीं थोड़ी दूर पर स्थापित कर दिया और उस स्थान का नाम हनुमदीश्वर रखा गया था. यह गढ़कालिका से कालभैरव मार्ग पर जाने वाले ओखलेश्वर घाट पर श्री हनुमंतेश्वर महादेव का मंदिर विद्यमान है.
हनुमान जी द्वारा लाए गए लिंग को हनुमदीश्वर शिवलिंग भी कहा जाता है। यह शिवलिंग काले पाषाण से बना है. मान्यता है कि हनुमान जी ने इसे स्थापित किया था. कहा जाता है कि इस शिवलिंग के दर्शन करने से रामेश्वरम के दर्शन जितना पुण्य मिलता है. आज भी रामेश्वरम मंदिर में ये दोनों युगल शिवलिंग विराजमान हैं। इसकी विधिवत विधान से पूजा अर्चना किया जा रहा है।
विशाल आकार और अद्भुत वास्तुकला:- 
रामेश्वरम मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। 15 एकड़ में फैला यह मंदिर एक बड़ी दीवार से घिरा हुआ है। मंदिर का प्रवेश द्वार भव्य और आकर्षक है। यहां के गलियारे और मूर्तियां इसे दुनिया के सबसे सुंदर मंदिरों में से एक बनाते हैं। यह मंदिर करीब 1000 फुट लंबा और 650 फुट चौड़ा है। इसका प्रवेश द्वार 40 मीटर ऊंचा है। मंदिर की दीवारें और गलियारे द्रविड़ शैली की वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण हैं। बता दें कि इस मंदिर को बनाने के लिए पत्थरों को श्रीलंका से नाव के जरिए लाया गया था।
रामेश्वरम मंदिर का गलियारा विश्व प्रसिद्ध है। यह उत्तर से दक्षिण 197 मीटर और पूर्व से पश्चिम 133 मीटर लंबा है। यहां तीन गलियारे हैं, जिनमें से एक गलियारा 12वीं सदी का माना जाता है।
 
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

विश्‍व भारत की ओर देख रहा है उसे मानवता की दिशा देनी होगी – डॉ. मोहनराव भागवत

शारदा विहार आवासीय विद्यालय में पूर्णकालिक कार्यकर्ता अभ्‍यास वर्ग का शुभारंभ

भोपाल। विद्या भारती द्वारा आयोजित पांच दिवसीय पूर्णकालिक कार्यकर्ता अभ्यास वर्ग 2025 का शुभारंभ हुआ, जिसमें विद्या भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष श्री दूसी रामकृष्ण राव जी ने प्रस्तावना रखते हुए कहा कि विद्या भारती के कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण हमारा मुख्य लक्ष्य है, जिससे वे शिक्षा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकें। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सभी बिंदुओं को सम्मानित करते हुए, संगठन के लक्ष्यों में कुछ नई बातों को जोड़ने का भी प्रावधान किया गया है।

इस अवसर पर परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने कार्यक्रम के उद्घाटन में कहा विद्या भारती केवल शिक्षा प्रदान करने का कार्य नहीं करती, बल्कि समाज को सही दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विश्‍व भारत की ओर देख रहा है उसे मानवता की दिशा देनी होगी।

इस अवसर पर परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी ने कार्यक्रम के उद्घाटन में कहा विद्या भारती केवल शिक्षा प्रदान करने का कार्य नहीं करती, बल्कि समाज को सही दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विश्‍व भारत की ओर देख रहा है उसे मानवता की दिशा देनी होगी।

डॉ. भागवत ने कहा कि विद्या भारती अपने विचारों के अनुरूप शिक्षा कार्य कर रही है। यह शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रों के जीवन मूल्यों और संस्कारों का निर्माण भी करती है। उन्होंने कहा कि हमारी शिक्षा का कार्य व्यापक है, जो केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसका उद्देश्य समाज को नैतिक रूप से समृद्ध बनाना भी है।

उन्होंने कहा कि समय के अनुसार परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन इसमें निष्क्रिय होकर बैठना उचित नहीं होगा। मानव अपने मस्तिष्क के बल पर समाज में परिवर्तन लाता है और उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह परिवर्तन सकारात्मक हो।

आज के समय में तकनीक समाज के हर क्षेत्र में अपना प्रभाव डाल रही है। हमें टेक्नोलॉजी के लिए एक मानवीय नीति बनानी होगी। उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक में जो कुछ गलत है, उसे छोड़ना पड़ेगा और जो अच्छा है, उसे स्‍वीकार कर आगे बढ़ना होगा।

उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विशेषता पर जोर देते हुए कहा कि हमें विविधता में एकता बनाए रखनी होगी। भारत की संस्कृति ने हमेशा सभी को जोड़ने का कार्य किया है, और इसे बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। सब में मैं हूँ, मुझ में सब हैं डॉ. भागवत ने भारतीय दर्शन के इस मूल विचार को रेखांकित किया कि प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि वह समाज का अभिन्न अंग है और समाज भी उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दृष्टिकोण से हमें अपने कार्यों को संचालित करना चाहिए।

आज विश्व भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है। भारत ने सदैव सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपने मूल्यों को बनाए रखा है, और यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यदि समाज में परिवर्तन लाना है, तो सबसे पहले व्यक्ति में परिवर्तन लाना होगा। उन्होंने विद्या भारती की इस दिशा में भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करनी होगी, जो व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सहायक हो।

उन्होंने कहा कि हमारे प्रयास केवल एक वर्ग या समूह के कल्याण तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि हमें संपूर्ण समाज के कल्याण का लक्ष्य रखना होगा। उन्होंने कहा कि हमारी शक्ति और संसाधन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त समाज की उन्नति के लिए समर्पित होने चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में कई विचारधाराएँ हैं और हमें उन लोगों को भी साथ लेकर चलना है जो हमारे विचारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी का भी मत भिन्न हो सकता है, लेकिन कार्य की दिशा सही होनी चाहिए।

डॉ. भागवत ने कहा कि विमर्श का स्वरूप बदलना भी एक महत्वपूर्ण कार्य है। हमें सकारात्मक सोच और रचनात्मक विचारों के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए काम करना चाहिए।

विद्या भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष श्री रामकृष्ण राव जी द्वारा प्रस्तुत भूमिका एवं प्रस्तावना से यह स्पष्ट होता है कि विद्या भारती का मुख्य लक्ष्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना और शिक्षा को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाना है। परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी के इस उद्बोधन से यह भी स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम का ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बननी चाहिए।

परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन इसकी दिशा सही होनी चाहिए। विविधता में एकता बनाए रखना, तकनीक की मानवीय नीति बनाना और विरोधियों को भी साथ लेकर चलना—ये सभी बातें समाज को एक नई दिशा देने में सहायक होंगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सिद्धांतों को अपनाते हुए, विद्या भारती इस दिशा में अपने दायित्व को निभाते हुए शिक्षा के माध्यम से समाज को सशक्त करने के लिए संकल्पित है। कार्यक्रम में देश भर से अखिल भारतीय पदाधिकारी, क्षेत्रीय अधिकारी के साथ 700 से अधिक कार्यकर्ता, पदाधिकारी उपस्थित है।

प्रचार विभाग
विद्या भारती मध्‍यभारत

संपर्क सूत्र –
डॉ आशीष जोशी 942840000
चंद्रहंस पाठक 9425652963

प्राचीन भारत की गौरवशाली न्याय व्यवस्था

सामान्यतः ऐसा माना जाता है (और जो शालेय / महाविद्यालयीन शिक्षा से और दृढ होता गया है) कि, न्याय प्रणाली, न्यायालय, न्यायमूर्ती, वकील…. यह सब व्यवस्थाएं अंग्रेजो ने भारत मे लायी। अंग्रेज आने से पहले भारत मे यह कुछ भी नही था। यदि जनता की कोई शिकायते होती थी, तो वह सीधे राजा के सामने रखी जाती थी। राजा उसके मनमर्जी से, या उस समय उसकी जो मनस्थिती रही होगी, उस प्रकार निर्णय देता था।

परंतु वास्तविक चित्र क्या है?

हजारो वर्षों से अपने देश मे सुव्यवस्थीत न्यायप्रणाली कार्यरत थी। इस न्यायप्रणाली का आधार था – धर्मशास्त्रों का,अलग-अलग स्मृतियों का। इस न्यायव्यवस्था को समाज मान्यता थी। इस व्यवस्था के कारण उस समय के अखंड और विशाल भारत देश में स्वस्थ, सुदृढ और सशक्त समाज व्यवस्था का अस्तित्व था। महेश कुमार शरण ने उनके पुस्तक ‘कोर्ट प्रोसिजर इन एन्शंट इंडिया’ मे लिखा है –
‘It is just possible that elements of Hindu law were adopted by Romans thourgh Greek and Egyptian channels’
अर्थात, विश्व मे परिपूर्ण न्यायव्यवस्था सर्वप्रथम भारत मे ही विकसित हुई है। यह न्याय व्यवस्था ग्रीक और मिस्त्र देश के माध्यम से रोमन्स (युरोपियन्स) ने अपनायी होगी।

महेश कुमार शरणने आगे लिखा है –
‘It should be a pride and satisfaction to a Hindu to know that his / her ancestors had scaled great heights not only in literature, philosophy and religion, but had advanced very farin the domain of law’ – (Court procedures in Ancient India)

(अर्थात, एक हिंदू के लिए इसकी जानकारी होना अत्यंत गर्व और समाधान की बात है कि उसके पुरखों ने केवल साहित्य, दर्शन और धर्म मे ही अपनी कीर्ती ध्वजा फहराई थी, ऐसा नही है। तो न्याय के क्षेत्र में भी उन्होने कीर्तीमान रचा था।)

आगे लिखा है-

‘The  rule and evidence were as complete and perfect, as we can find them today. The administration of justice was regular and the system was well defined, as no aspect was left arbitrarily, capricious or uncertain. Judiciary had the highest regard and supreme position.

(अर्थात, ‘नियम’ और ‘प्रमाण’ इन की परिभाषा इतनी परिपूर्ण और निर्दोष थी, जितनी आज है। न्याय प्रणाली एक नियमित व्यवस्था थी। परिभाषा सुस्पष्ट थी। इसमे कोई भी अनियंत्रितता नही थी, अनिश्चितता नही थी। न्यायव्यवस्था सर्वोच्च स्थान पर थी और उस व्यवस्था को सर्वाधिक आदर और सम्मान मिलता था।)

इसी पुस्तक में महेश कुमार शरण ने आगे लिखा है –

Besides this, the whole procedure is completely indigenous and nothing has been imported into it from any other system, whatsoever.’

(अर्थात, इस न्याय व्यवस्था की संपूर्ण प्रक्रिया पूर्णतः स्वदेशी थी। इसमें कोई भी बाहरी (देशों से) बिंदु या व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया गया था।)

————–         ————-

भारत की यह संपूर्ण न्याय व्यवस्था, स्मृतियों के आधार पर खड़ी थी। कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति आदि प्रमुख स्मृतियां थी।

यह स्मृति क्या होती है? यह कितनी पुरानी है?

एक सुव्यवस्थित समाज रचना निर्माण करने के लिए, हजारों वर्षों से अपने पूर्वजों ने कुछ ग्रंथों का निर्माण किया हैं। इन ग्रंथो के अनुसार ही अपने समाज में प्रथा, परंपरा, व्यवस्थाएं निर्माण हुई। इन ग्रंथों के आधार पर अपना समाज चल रहा था। इसलिए, इतने सारे आक्रमणों के बाद भी हमारी पहचान कायम रही, बनी रही।

इन ग्रंथो में वेद है, उपनिषद है, श्रुति है, स्मृति है, पुराण है। हजारों वर्षों से हमारे ऋषि मुनियों ने, समाज महर्षियों ने, जिस ज्ञान का संचय किया है, वह संचय यानी स्मृतियां। एक प्रकार से परंपराओं का संकलन होने के कारण इन्हें ‘स्मृति’ यह नाम दिया गया है। यह स्मृति मानो हमारा धर्मशास्त्र है। भारत का और पौर्वात्य प्राचीन साहित्य का अध्ययन करने वाले जो पाश्चात्य विद्वान है, उनके अनुसार इन स्मृतियों की रचना ईसा पूर्व 500 वर्षों से लेकर तो ईसा के बाद पांचवें सदी तक हुई है। तक्षशिला विश्वविद्यालय में जिस काल खंड में आर्य चाणक्य अर्थशास्त्र लिख रहे थे, उसी कालखंड में स्मृतियों की रचना हुई है, ऐसा पश्चिम के विद्वानों का मत है। परंतु उपलब्ध संदर्भों के अनुसार स्मृतियों का कालखंड इससे भी बहुत प्राचीन है।

इन स्मृतियों में से ‘कात्यायन स्मृति’ यह ऋषि कात्यायन द्वारा लिखी गई है, ऐसा माना जाता है। कात्यायन यह याज्ञवल्क्य ऋषि के पुत्र थे। इनका कार्यकाल ईसा पूर्व कुछ हजार वर्ष माना जाता है। अर्थात ‘कात्यायन स्मृति’ यह ग्रंथ, कात्यायन ऋषि ने लिखे हुए सूत्र और उनके अन्य शिष्यों के साहित्य का संकलन है। इसलिए कात्यायन स्मृति में केवल ऋषि कात्यायन के श्लोक नहीं है। देवल  पितामह, प्रजापति, वशिष्ठ, मनु आदि ॠषियोंका सहभाग भी इस कात्यायन स्मृति में है।

इस स्मृति में कात्यायन ऋषि ने उनके पहले, इस न्याय के क्षेत्र में जिन्होंने काम किया था, उनका उल्लेख किया है। भृगु, बृहस्पति, गार्गीय, तम, कौशिक, लिखिता, मनु, मानव आदि..! प्राचीन भारत में जो न्याय प्रणाली विकसित हो रही थी, उसमें कात्यायन ऋषि के बाद, लगभग 1000 वर्ष तक, इसमें विशिष्ट सुधार होते रहे। कात्यायन स्मृति में उसका प्रभाव दिखता है। इस स्मृति में प्रत्यक्ष कात्यायन ऋषि ने लिखे हुए श्लोक अंत में दिए हुए हैं।

महामहोपाध्याय डॉक्टर पांडुरंग वामन काणे (1880 – 1972) ने प्राचीन भारतीय न्याय शास्त्र के क्षेत्र में, अत्यंत गहन शोध और भरपूर लेखन किया है। ‘भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास’ इस विषय पर उनका 6500 पृष्ठोंका का, पांच खंडो में लिखा हुआ साहित्य प्रकाशित हुआ है। स्वयं न्याय शास्त्र के विद्वान तो थे ही, साथ मे उन्होंने संस्कृत ग्रंथोका का गहन अध्ययन किया। वर्ष 1963 में महामहोपाध्याय काणे जी को भारत का सर्वोच्च सम्मान, ‘भारत रत्न’ दिया गया।

ऐसे पां. वा. काणेजी ने, कात्यायन स्मृति के बारे में बहुत कुछ लिख रखा है। वे लिखते हैं –  ‘कात्यायन स्मृति में न्याय प्रणाली के संदर्भ में जो विषय आएं है, वह अद्भुत और आश्चर्य जनक है। क्योंकि आज के आधुनिक न्याय शास्त्र जैसी पद्धति और नियम, कात्यायन स्मृति में हैं।’

[Some of his (sage Katyayan’s) rules, such as those about the contents and characteristics of good points and written statements, about the evidence of witness and about documents, about constructive res judicata are startling in their modernity].

कात्यायनी स्मृति में आए हुए विषय –

– न्यायालय, न्यायालय की प्रक्रिया / पद्धति
– कागजात
– परिक्षण (बहस)
– शपथ लेकर दी हुई साक्ष्य / बयान
– भागीदारी
– भेंट वस्तु (gift)
– अनुबंध तोड़ना
– जो मालिक नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति ने की हुई वस्तुओं की बिक्री
– परंपराओं का / नियमों का उल्लंघन
– विवादों की सीमा
– पैतृक संपत्ति का बंटवारा / विवाद
– वाकपारुष्य (आज की भाषा में ‘हेट स्पीच’)
– दंड पारुष्य (कठोर सजा)
– प्रकीर्णक (विविध / अनेक प्रकार के यम-नियम)

प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था / २
–   प्रशांत पोळसंपूर्ण कात्यायन स्मृति में, न्यायालय की परिभाषा से लेकर, विविध प्रसंगों में किस प्रकार से न्यायदान करना चाहिए, इस पर विस्तार से चर्चा की है।न्यायालय की परिभाषा-

धर्मशास्त्र विचारेण मूलसार विवेचनम्
यत्राधिक्रियते स्थाने, धर्माधिकरणम् हितत्  ।।52।।

[The place, where the decision of the truth of the plaint, i.e. lit, the cause or root of the dispute, is carried on by a consideration of the (rules of the) sacred law is (called) the Hall of Justice]

धर्माधिकरण याने न्यायालय.

मजेदार बात यह है कि, कात्यायन स्मृति में फिर्यादी को किस प्रकार के प्रश्न पूछने चाहिए इसका भी विस्तार से वर्णन किया है,।

प्रश्न प्रकार –

काले कार्यार्थिनं पृच्छेत प्रणतंपुरतःस्थितं ।
किं कार्य  का च ते पीडा मा भैषीब्रूहि मानव ।।86।।

केन कस्मिकंदाकस्मातपृच्छे  देवं सभागतः I
एवं पृष्ठः सयद्ब्रूयात्तत्सभ्यै ब्राह्मणैः सहः ।।87।।

विमृश्य कार्यं न्यायंचेदाव्हानार्थमतः परम्
मुद्रां वा निक्षेपेत्तस्मिन्पुरुषं वा समादिशेत ।।88।।

अर्थात, न्यायाधीश ने पक्षकार को (जो फरियाद लेकर आया है), न्यायालय के उचित समय पर, प्रश्न पूछना चाहिए। यह पूछते समय, पक्षकार ने न्यायाधीश के सामने आदब से खड़ा रहना है। न्यायाधीश पूछेंगे, “आपकी शिकायत क्या है? आपको कहीं चोट तो नही आई हैं? डरिए मत…” आदि।

इसके बाद न्यायाधीश ने पूछना है, “किसके कारण, कहां, कब, (दिन के किस समय) और क्यों ?आपको तकलीफ हुई, या आप क्यों शिकायत कर रहे हैं?” इन प्रश्नों पर पक्षकार जो कहता है, वह न्यायालय ने शांति से सुनना है। उस न्यायालय में उपस्थित मूल्यांकन कर्ताओं की (आज की भाषा में ‘जूरी सदस्य’) मदद से, उनकी सलाह पर, न्यायमूर्ति ने यह तय करना है कि यह शिकायत / यह प्रकरण न्याय प्रविष्ट होने योग्य है या नहीं? अगर है, तो न्यायमूर्ति ने संबंधित गुनहगार को हाजिर करने के लिए संबंधित अधिकारियों को आज्ञा देनी है।

कितना अद्भुत है यह सब..! पां. वा. काणे के कहे अनुसार, हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं, यह सब पढ़कर! कितने विस्तार से पूरी न्याय प्रणाली (न्याय की पद्धति / प्रक्रिया) समझायी है। सनद रहे, कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व, अपने देश में इतनी व्यवस्थित, और ठीक से दस्तावेजीकरण (Well  documented) की हुई, न्याय व्यवस्था अस्तित्व में थी।

और हमें पढ़ाया गया कि भारत में न्याय व्यवस्था लायी, वह अंग्रेजों ने..!

एक हजार से अधिक श्लोक कात्यायन स्मृति में है। यह ग्रंथ विस्तृत धर्मशास्त्र का एक हिस्सा है। इस का अर्थ है, हमारे पूर्वजों ने एक सुव्यवस्थित न्याय प्रणाली विकसित करके उसका उपयोग किया था।

इसीलिए समाज में किसी पर भी अन्याय नहीं होता था, और कानून व्यवस्था सही रूप में लागू की जा रही थी।

धर्मशास्त्र का (अर्थात न्याय शास्त्र का), विस्तृत विवेचन करने वाला कात्यायन स्मृति यह एकमात्र ग्रंथ नहीं था। साधारणत: ढाई हजार वर्ष पुराना, या उससे भी प्राचीन, ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ यह ग्रंथ भी, भारतीय न्याय पद्धति की विस्तृत विवेचना करता है। इस ग्रंथ में कुल 1003 श्लोक है, जो तीन खंडों में विभाजित है।

01. आचार कांड – इसमें तेरा अध्याय है। ब्रह्मचारी, विवाह, गृहस्थ, भक्ष्याभक्ष्य, द्रव्यशुद्धी, दान, श्राद्ध, राज धर्म इत्यादि विषयों पर इसमें विवेचन किया है।

02. व्यवहार कांड – 25 अध्याय के इस कांड में सीमावाद, स्वामीपालवाद, अस्वामी विक्रम, दत्तक प्रधानिक (गोद लेना), वेतन, दान, वाकपारूष्य आदि विषय और उनके यम-नियम का वर्णन है।

03.प्रायश्चित कांड – इसमें 6 अध्याय है।  शौच प्रकरण, आपधर्म प्रकरण, वानप्रस्थ, यति धर्म प्रकरण, प्रायश्चित प्रकरण जैसे विषय इसमें आते हैं।

अंग्रेजों का शासन भारत में जब तक अच्छी तरह स्थिर नहीं हुआ था, तब तक, मुख्य रूप से ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ के आधार पर न्यायदान के काम चलते थे। याज्ञवल्क्य ऋषि मिथिला के थे। शुक्ल यजुर्वेद और ‘शतपथ ब्राह्मण’ उपनिषद के रचयिता थे।

याज्ञवल्क्य स्मृति मे, पंचायत समिति (ग्राम पंचायत) में व्यवस्था कैसी होनी चाहिए इस विवेचन से लेकर, राज्य के मुख्य न्यायाधीशने, या राजा ने, किस प्रकार से न्याय देना चाहिए, इसकी विस्तार से चर्चा की है।

पिछले कुछ वर्षों से अपने देश में ‘मनुस्मृति’ की बहुत चर्चा हुई है। ‘भारत की प्राचीन समाज व्यवस्था और न्याय व्यवस्था मनुस्मृति के ही आधार पर चलती थी’ ऐसा चित्र निर्माण किया गया हैं। यह गलत है।

भारत के न्याय व्यवस्था के संदर्भ में मनुस्मृति यह मुख्य संदर्भ ग्रंथ कभी नहीं था। अनेक संदर्भ ग्रंथो में से एक था, यह सच है। ‘दंड विधान’ मे, अर्थात सजा देने मे मनुस्मृति का कुछ अंशों मे उपयोग होता था, यह भी सच हैं। किंतु केवल इतना ही..! जो महत्व कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति को था, उतना महत्व मनुस्मृति को निश्चित रूप से नहीं था।

किंतु ‘इन दो – ढाई हजार वर्ष पुरानी स्मृतियों के आधारपर ही, भारत की न्याय व्यवस्था चलती थी’ यह विधान पूर्ण सत्य नहीं है। यह अर्ध सत्य है।

प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था / ३
–   प्रशांत पोळ

प्राचीन भारत के न्याय व्यवस्था की चर्चा करते हुए पिछले भाग में हमने कुछ ‘स्मृतियों’ की चर्चा की। कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथ अपने प्राचीन न्याय व्यवस्था के आधार स्तंभ थे।मात्र इन दो – ढाई हजार वर्ष पुराने ग्रंथों के आधार पर भारत में न्याय होता था, यह कहना पूर्ण सही नहीं है। भारतीयों की, अर्थात हिंदुओं की, विशेषता है कि वह देश – काल – परिस्थिति अनुसार अपने व्यवस्थाओं और नियमों को युगानुकूल परिष्कृत करते जाते हैं। ‘जो पुराना है, प्राचीन है, वही सब अच्छा है’ यह कुएं के मेंढकों की मानसिकता अपनी (हिंदुओं की) नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे देश में ‘भाष्य’ यह समयानुसार, लिखे गए वेदों को / उपनिषदों को / स्मृतियों को परिष्कृत करने की एक सर्वमान्य पध्दति थी।इसी कारण धर्मशास्त्र पर (अर्थात न्याय प्रणाली पर) लिखे गए लगभग सभी ग्रथोंपर, समय-समय पर भाष्य लिखा गया। इस्लामी आक्रांता भारत में आने तक यह परंपरा कायम थी। आगे चलकर वह कम होती चली गई।

याज्ञवल्क्य स्मृति पर मिथिला नगर के वाचस्पती मिश्र ने भाष्य लिखा। सन 900 से 980 यह उनका कार्यकाल था। उनके अनेक ग्रथोंमें से ‘न्याय सूचि निबंध’ और ‘न्याय वर्तिका तात्पर्य टीका’, यह दो ग्रंथ न्याय व्यवस्था पर है। इनमें से पहला ग्रंथ अर्थात, ‘न्यायसूचि निबंध’ यह, अक्षय पद गौतम के ‘न्याय सूत्र’ इस ग्रंथ पर प्रमुखता से भाष्य करता है। अक्षयपद गौतम का कालखंड यह ईसा पूर्व 200 वर्ष का था। इसी ‘न्याय सूत्र’ पर, आगे चलकर उद्योतकर, भविविक्त, अविधा कर्ण, जयंत भट आदी अनेक विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं।

ग्यारहवी सदी मे, दक्षिण मे चालुक्योंके राज्य मे, ‘विज्ञानेश्वर’ नाम के न्यायाधीश ने याज्ञवल्क्य स्मृति पर भाष्य लिखा है। यह भाष्य ‘मिताक्षरा’ नाम से प्रसिद्ध है। इस ‘मिताक्षरा’ ग्रंथ में अन्य विषयों के साथ ही, ‘जन्म के साथ मिलने वाला उत्तराधिकार’ (Inheritance by birth) इस विषय पर विस्तृत विवेचन है।

विज्ञानेश्वर ने लिखे हुए इस ग्रंथ के लगभग 100 वर्षों के बाद, बंगाल के ‘जीमूतवाहन’ इस परिभद्र कुल के व्यक्ति ने ‘दायभाग’ यह ग्रंथ ‘उत्तराधिकार’ इसी विषय पर लिखा।

अगले 800 वर्ष, बृहद बंगाल (आज के बांग्लादेश सहित) और असम प्रांत में, उत्तराधिकारी संबंधित सभी न्याय दान में ‘दायभाग’ यह ग्रंथ प्रमाण माना गया है। लेकिन शेष भारत के उत्तराधिकार संबंधित मामलों में, ‘मिताक्षरा’ इस ग्रंथ के आधार पर न्याय दिया जाने लगा। आगे चलकर पन्द्रहवीं सदी में, चैतन्य महाप्रभु के सहपाठी रह चुके, बंगाल के ही रघुनंदन भट्टाचार्य ने ‘दायभाग’ पर भाष्य लिखा। कई स्थानों पर यह भाष्य प्रमाण माना जाता था। अंग्रेजों के शासन के प्रारंभिक काल खंड में, न्याय देते समय हिंदू विधि का उपयोग किया जाता था। अंग्रेजों की पहली सत्ता बंगाल में स्थापन होने के कारण देश का पहला हाई कोर्ट, वर्ष 1862 में कोलकाता में स्थापना हुआ। इस कोलकाता उच्च न्यायालय ने, उत्तराधिकार इस विषय में रघुनंदन भट्टाचार्य के ‘दायभाग’ पर लिखा गया भाष्य प्रमाण माना था।

‘मिताक्षरा’ यह शेष भारत में सर्वमान्य संदर्भ ग्रंथ माना जाता था, लेकिन उसके पांच अलग-अलग प्रकार (variants) थे।
1. काशी      2. मिथिला      3. मद्रास      4. मुंबई       5. पंजाबसन 2005 में न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने ‘मिताक्षरा का आज के संदर्भ में महत्व’ इस विषय पर एक दीर्घ लेख लिखा। इसमें वह कहते हैं कि, ‘पचास के दशक में भारतीय संसद ने सब पुराने हिंदू कानून रद्द करके नए कानून तैयार किये। इसलिए दैनंदिन न्याय प्रणाली में मिताक्षरा के संदर्भ समाप्त हुए। फिर भी, भारतीय न्यायालय व्यवस्था समझने के लिए मिताक्षरा आज भी उपयुक्त है।’अर्थात इन स्मृतियाओ॔ का, या उन पर लिखे गए भाष्य का, विचार किया तो साधारणतः ढाई से तीन हजार वर्ष पहले के ग्रंथो से हमें सुव्यवस्थित न्याय व्यवस्था का विस्तृत विवरण मिलता है। यह न्याय व्यवस्था केवल कात्यायन स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, मिताक्षरा, दायभाग ऐसे ग्रंथो तक सीमित नहीं थी, तो प्रत्यक्ष समाज में इसका उपयोग होता था। इस्लामी आक्रांताओं ने जो विध्वंस किया, उसके कारण हमारे पास पुराने आलेख, पुराने कागजात उपलब्ध नहीं है। लेकिन जो मिले हैं, जो शिलालेख, ताम्रपट मिलते हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि, भारत में एक परिपूर्ण सुव्यवस्थित न्याय व्यवस्था थी। सत्ता किसी की भी हो, राजा कोई भी हो, परंतु धर्मशास्त्र ने दी हुई यह न्याय व्यवस्था सर्वमान्य थी और सबके लिए बंधनकारक थी।

विजयनगर साम्राज्य (वर्ष 1336 -1646) के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य में और आगे चलकर, पेशवा के राज्य में भी, न्याय व्यवस्था अच्छी थी। विजयनगर साम्राज्य की जो पांडुलिपियां मिली है, उनसे उस समय की समाज व्यवस्था, न्याय पद्धति, दंड शासन आदि बातों का स्पष्ट चित्र हमारे सामने आता है। विजयनगर साम्राज्य के आदि गुरु विद्यारण्य अर्थात माधवाचार्य ने पाराशर स्मृति पर ‘प्रसार माधवीय’ ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथ के ‘व्यवहार कांड’ प्रकरण में न्याय व्यवस्था के यम – नियम विस्तार से दिए हैं। मंगलौर के भास्कर आनंद सालटोर की, विजयनगर साम्राज्य की न्याय व्यवस्था के संदर्भ में एक अच्छी पुस्तक उपलब्ध है, – ‘Justice System of Vijaynagara’। इसमें उन्होंने विजयनगर साम्राज्य के न्याय व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया है। साथ ही विजयनगर साम्राज्य में घटित अनेक महत्वपूर्ण न्याय दानों की, अर्थात, कानूनी मामलों के निर्णयोंकी, जानकारी भी दी है।

(क्रमशः)
–   प्रशांत पोळ जाने माने इतिहासविद हैं और भारतीय इतिहास , प्राचीन ज्ञान से लेकर आधुनिक भारत से जुडे़ विषयों पर खोजपूर्ण पूस्तकें लिख चुके हैं) 
(आगामी प्रकाशित ‘भारतीय ज्ञान का खजाना – भाग २’ के अंश)

रेल्वे का दो भागों में खुलने वाला अनोखा पुल पंबन पुल

पाम्बन पुल (Pamban Bridge) भारत के तमिल नाडु राज्य में पाम्बन द्वीप को मुख्यभूमि में मण्डपम से जोड़ने वाला एक रेल सेतु है। इस पुल के निर्माण का प्रयास 1870 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब ब्रिटिश सरकार ने श्रीलंका तक व्यापार संपर्क बढ़ाने का निर्णय लिया था। यह अगस्त 1911 से बनना शुरु हुआ और इसका उदघाटन 24 फ़रवरी 1914 में हुआ था। तब यह भारत का एकमात्र समुद्री सेतु था। यह सन् 2010 में बान्द्रा-वर्ली समुद्रसेतु के खुलने तक भारत का सबसे लम्बा समुद्री सेतु रहा। सन् 1988 में रेल पुल से  समांतर एक सड़क पुल भी बनाया गया जो राष्ट्रीय राजमार्ग 87 का भाग है।
दिसंबर 2022 में पुराने पुल पर रेल परिवहन को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया क्योंकि जंग के कारण बेसक्यूल खंड काफी कमजोर हो गया था । लगभग 2.2 किमी तक कुल और 143 खंभों वाले इस पुल को 1914 में आधिकारिक तौर पर चालू किया गया था। यह मुंबई का आउटलेट-वर्ली सी लिंक भारत का दूसरा सबसे लंबा समुद्री पुल है। पाम्बन रेलवे पुल भारतीय मुख्य भूमि और पाम्बन द्वीप के बीच 2.065 किलोमीटर लंबा फैला हुआ है। फ्लोरिडा के बाद यह दुनिया के सबसे संक्षारक वातावरण में स्थित है, जिससे इसका रखरखाव एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। यह स्थान एक चक्रवात-प्रवण उच्च वायु वेग क्षेत्र में भी आता है। पाम्बन रेल पुल शेज़र रोलिंग लिफ्ट तकनीक पर काम करता है, जिससे फ़ेरी की पेशकश होती है, जो 90 डिग्री के कोण पर ऊपर की ओर खुलती है। अरब सागर के नीले विस्तार के अद्भुत दृश्य पेश करने वाली रेल ड्रॉ के दौरान पंबन पुल हमेशा से ही लोगों को आकर्षित करता रहता है।
रेलवे पुल समुद्र तल से 12.5 मीटर (41 फीट) ऊपर स्थित है और 6,776 फीट (2,065 मीटर) लंबा है। पुल में 143 खम्भे लगे हुए हैं और इसमें दो-पतरों से बना एक बैस्क्यूल खंड बना हुआ है, जिसमें सेज़र रोलिंग टाइप लिफ्ट स्पैन होते हैं, जिन्हें जहाजों के आने-जाने के लिए उठाया जा सकता है। प्रत्येक पतरें का वजन 415 टन (457 टन) है।पुल के दोनों पतरे लीवर का उपयोग करके मैन्युअल रूप से खोले जाते हैं।
नए पंबन ब्रिज में 18.3 मीटर के 100 स्पैन और 63 मीटर का एक नेविगेशनल स्पैन शामिल है. यह मौजूदा पुल की तुलना में 3 मीटर ऊंचा है और समुद्र तल से 22 मीटर की नौवहन वायु निकासी प्रदान करता है. इसके निर्माण में इलेक्ट्रो-मैकेनिकल नियंत्रित सिस्टम का उपयोग किया गया है, जो इसे ट्रेन नियंत्रण प्रणालियों के साथ समन्वित करता है।
पुराने ब्रिज के बन्द होने का कारण  दिसंबर 2022 में पुराने पुल पर रेल परिवहन को स्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया क्योंकि जंग के कारण बेसक्यूल खंड काफी कमजोर हो गया था ।नया पंबन ब्रिज अक्टूबर 2024 से पूरी तरह चालू हो गया है। यह भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज है। फेसबुक के इस लिंक से इस पुल की घटना को और सुगमता से जाना जा सकता है।

‘ख़ैबर दर्रा’- पाठकों को बाँधने वाली अद्भुत क़िस्सागोई भी और चिंतन सूत्र भी

‘ख़ैबर दर्रा’ कथाकार, ग़ज़लकार, व्यंग्यकार और संपादक पंकज सुबीर का सद्य: प्रकाशित कहानी संग्रह है। इससे पहले उनके ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’, ‘महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ’, ‘कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन’, ‘चौपड़े की चुड़ैल’, ‘होली’, ‘प्रेम’, रिश्ते’, ‘जोया देसाई कॉटेज’, हमेशा देर कर देता हुईं मैं’ कहानी संग्रह आ चुके हैं। ‘ये वो सहर तो नहीं’, ‘अकाल में उत्सव’, ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था’ और ‘रूदादे सफ़र’ उनके उपन्यास हैं। ‘बुद्धिजीवी सम्मेलन’ उनका व्यंग्य संग्रह है। ‘अभी तुम इश्क़ में हो’ गजल संग्रह है।

‘ख़ैबर दर्रा’ जिसकी टैग लाइन- ‘हर क़स्बे हर शहर में होना चाहिए’ है, में उनकी नौ कहानियाँ संकलित हैं- ‘एक थे मटरू मियाँ एक थी रज्जो’, ‘हरे तीन की छत’, ‘ख़ैबर दर्रा’, ‘वीरबहूटियाँ चली गई’, ‘देह धरे का दंड’, ‘निर्लिंग’, ‘आसमाँ कैसे कैसे’, ‘कबीर माया पापणी’, ‘इजाज़त @घोड़ाडोंगरी’।

प्रथम कहानी ‘एक थे मटरू मियाँ एक थी रज्जो’ ‘वनमाली’ पत्रिका के सितंबर अक्तूबर संयुक्तांक 2024 में प्रकाशित हुई। यह 25-26 पृष्ठों की लंबी कहानी देश के वर्तमान स्नेरियों का पटाक्षेप करती है। कहानी में कुल चार पात्र हैं। व्यंग्य की पैनी धार कहानी में अनेक स्तरों पर प्रवाहित हो रही है। प्रमुख पात्र दुर्गादास त्रिपाठी के चरित्र में पत्रकार/ नेता के गुणों का पूरा एजेंडा खुला पड़ा है। वह जो तोड़-फोड़, मार-पीट, झगड़े-टंटे यानी नकारात्मक और ध्वंसात्मक कामों में सबसे आगे रह चुका हो, हत्याओं का सहयोगी या समर्थक हो, जेल यात्रा कर चुका हो। राजनेता वही है, जो पार्टी के हार जाने पर दल बदल ले, सत्तारूढ़ पार्टी में चला आए। अपने ऊँचे संपर्कों का झूठ बोलने में निष्णात हो। अपनी प्रशंसा के लिए भक्त मंडली पाले हो। नेता वही, जो शतरंज-सी चालें चलनी जानता हो। नायक मटरू देश का आम आदमी- आधा अधूरा- पढ़ाई के नाम पर आठवीं तक, पेशे के नाम पर अख़बार के दफ़्तर के मामूली काम, पार्टी वर्कर, आका दुर्गादास त्रिपाठी का वफ़ादार।

दामोदर इस पपेट शो का अदना-सा खिलाड़ी है। रजनी महत्त्वाकांक्षी, अवसरवादी, चुस्त युवती है। हर संपर्क का फ़ायदा उठाना उसे आता है। वह जानती है कि समय क़लम वाले पत्रकार का नहीं, कैमरे वाले पत्रकारों का है। अपने प्रशिक्षण और संपर्कों का फ़ायदा उठा वह राजधानी पहुँच जाती है। त्रासद और कारुणिक दृश्य यह है कि जर्जर पार्टी कार्यालय के नीचे आकार मटरू की मृत्यु हो जाती है और रजनी-मटरू की पत्रकार बेटी कैमरा मैन के साथ इस ख़बर का प्रसारण करती है, बिना यह जाने कि यह उसका बाप है। देश की प्रगति पर व्यंग्य यह भी है कि बस्तियों के लोग नहीं जानते कि स्कूल क्या चीज़ होती है, वे कभी स्कूल गए ही नहीं और छोटी बस्तियों में बाल श्रम कानून भी लागू नहीं होता। होश में आते ही बच्चे श्रमिक बन जाते हैं।

‘हरे टीन की छत’ मीरा और अर्जुन के किशोर प्रेम की, रागबोध की, प्राकृतिक छटा और सान्निध्य की कहानी है। काव्य पंक्तियाँ और सूत्र वाक्य प्राण तत्व बन कर आए हैं। जैसे- “एक गहरी सी धुंध में पूरी पचमढ़ी समाई हुई है। दूर सतपुड़ा की चोटियों पर कुछ बादल लुढ़क-पुढ़क होने के बाद साँस लेने के लिए रुके हुये हैं। जैसे कोई रुई का गोला पहाड़ से लुढकते हुये पहाड़ पर लगे दरख्त में उलझ कर रुक गया हो।” पृष्ठ 35

“हरापन भी यादों की तरह ही होता है, फुरसत के पलों की बरसात का स्पर्श पाते ही एकदम खिल उठता है।” पृष्ठ 38

“किसी की स्मृतियों को हमेशा सुंदर बनाए रखना चाहते हैं तो उसके पास लौटिए मत, लौटकर आने से स्मृतियों में बनी सुंदरता नष्ट हो जाती है।”

‘ख़ैबर दर्रा’ के कथ्य ने, कथागत मोड़ों ने, तभी एक सारा आकाश रच दिया था, जब पहली बार मैंने इसे ‘हंस’ के अक्तूबर 2024 अंक में पढ़ा था। दर्रे के दोनों ओर अलग-अलग संप्रदाय के लोग रहते हैं और एक दिन सांप्रदायिक आग भड़क जाती है, अनियंत्रित हो जाती है। कहानी मज़हब और इंसानियत के दुश्मनों की, सांप्रदायिकता और दंगों की, नेतागिरी और गुंडागर्दी की, अस्तित्व और संधर्ष की ही नहीं, अपितु मूल्यवत्ता और हृदय परिवर्तन की, संवेदनशीलता और मानवीयता की, धर्म और नैतिकता की है। अपाहिज पिता और कर्तव्यनिष्ठ बेटी की सदाशयता कुटिल युवक की दुर्भावनाओं को सद्भावनाओं में, दुश्मनी को आत्मीयता में, नकारात्मता को साकारात्मकता में परिवर्तित कर देती हैं और दिमाग में छाए कुविचार, अश्लील भाव कुछ ऐसे धुलते हैं कि वह उनका वेलविशर बन जाता है।

‘वीरबहूटियाँ चली गई’ भी पंकज सुबीर की लंबी कहानी है। यह प्रथमत: अक्तूबर 2024 में ‘जानकीपुल डॉट कॉम’ में प्रकाशित हुई थी। कहानी पाठक को तुलसी की रामायण और जायसी के पद्मावत मे वर्णित वीरबहूटियों की यादों को ताज़ा कर जाती है। कहानी आज की वस्तुवादी, बुद्धिवादी एप्रोच को चुनौती देती पाठक को वन्य प्रकृति के नैसर्गिक लोक की यात्रा पर ले जाती है। यह मनुष्य और प्रकृति के अंत: सम्बन्धों की कहानी है। बालमन के अबोध प्रेम की कहानी है। लोक विश्वास और प्रकृति प्रदत्त स्वास्थ्य सूत्रों की कहानी है। वन सौंदर्य की भिन्न छवियों की कहानी है। रूप, रस, गंध की कहानी है। बाल मन के दो अबोध/ मासूम झूठों की कहानी है।

पर्यावरण से दूरी बना रहे आज के मनुष्य की त्रासदी की कहानी है। कहानी की अनाम बालिका बीमार होने के कारण पर्यावरण की गोद में आई है। इमली और नींबू के पेड़, रंगीन क्रीपर की बेल, बोगनबेलिया, गुलमोहर, नींबू का पेड़, पीला कनेर, मेहंदी की झाड़ियाँ, मनी प्लांट, खजूर के पत्ते, झूले, फाख्ता पक्षी, झींगुर, गिरगिट, पगडंडियाँ, सियारों की आवाज़ें- देखती महसूसती वह नाव के आकार की कुर्सी पर कुछ देर बैठी रहती है। यहाँ पगडंडी से रोज़ एक बालक निकलता है, वह अक्सर उसके लिए बेकरी से कुछ लाता है और बताता है कि चिरमी के बीज, मख़मल जैसी वीरबहूटियाँ शारीरिक मानसिक सारी बीमारियाँ सोख लेती हैं। अगले परिच्छेद में वे बरसों बाद मिलते हैं, लेकिन अब यहाँ न इमली-नींबू के पेड़ हैं, न रंगून क्रीपर की बेल, न बोगनबेलिया, न गुलमोहर, पीला कनेर, मेहंदी की झाड़ियाँ, खजूर के पत्ते, फाख्ता पक्षी, झींगुर, गिरगिट, पगडंडियाँ, सियार। अब वन प्रदेश दो मंज़िला घरों, लोहे, पत्थर, ईंटों में बदल चुका है। अब शारीरिक मानसिक सारी बीमारियों को सोखने वाले चिरमी के बीज, मखमल जैसी वीरबहूटियाँ नहीं हैं। कुछ सूत्रात्मक पंक्तियाँ भी मिलती हैं-

“माँ अपने बच्चों को जल्दी-जल्दी बड़ा करना चाहती है, मगर दादियाँ-नानियाँ बच्चों को ज़िंदगी भर बच्चा बनाकर रखना चाहती हैं।” पृष्ठ 85

“ज़मीन और नदी एक सी होती हैं, सब कुछ अपने अंदर सोख लेती हैं।” पृष्ठ 96

‘आसमाँ कैसे कैसे’ में उस समय का वर्णन है, जब लोग ज़ुबान के पक्के होते थे। राजेश को अपने मित्र दिलीप की दुकान खरीदनी है, बेटा विनय एग्रीमेंट बनवा कर लाता है और राजेश उस अतीत में खो जाता है, जब आदमी भले ही मर जाये, पर उसकी मृत्यु के बाद भी परिवार सब तरह के लालचों के प्रति अनासक्त होकर अपनी ज़ुबान पर अडिग रहता था।

‘कबीर माया पापिणी’ कहानी कहती है कि पैसा सर्वोपरि है- मज़दूर के लिए भी और ऑफ़िसर के लिए भी। एक तुलनात्मक चित्र प्रस्तुत करते पंकज सुबीर लिखते हैं कि फ़ैक्टरी कर्मचारी की काम के दौरान दुर्घटना मृत्यु हो जाती है और माँ-बाप दाह संस्कार करने की बजाय सरकार से, फ़ैक्टरी मालिक से, बीमा कंपनी से मुआवजा लेने के लिए धरना दिये बैठे हैं। दूसरी ओर ज़िला कलेक्टर अरुण सिंह की माँ मृत्यु शैय्या पर है और वे आबकारी और शराब के ठेके से मिलने वाली एक करोड़ रिश्वत राशि के चक्कर में संवेदनाशून्य हो चुके हैं। माँ की मृत्यु हो जाति है, पर उनकी आँखों से एक आँसू तक नहीं गिरता, लेकिन जाना पड़ेगा और एक करोड़ का नुकसान हो जाएगा, सोचकर वे फूट-फूट कर रो देते हैं।

‘देह धरे का दंड’ होमोसेक्सुयालिटी की सोडोम वृति पर है। यह दो युवकों की कहानी नहीं, पूरे समाज में चल रहे दुराचारों का लेखा-जोखा है। स्कूल के अधिकांश अध्यापक, समाज के सम्मानित धर्मगुरु- सब इन युवकों के साथ दुराचार करते हैं। इन्हें तो पता ही नहीं था कि होमो सेक्सुएलिटी होती क्या है। यहाँ जलकर आत्महत्या करने का कारण समाज है। कानून ने भले ही होमो युवकों को साथ रहने की इजाज़त दे दी हो, समाज को यह कदाचित् स्वीकार नहीं। कहानी सरकारी अस्पतालों की जर्जर अवस्था के बहुमुखी चित्र भी लिए है। ‘निर्लिंग’ में भी थर्डजेंडर की उन वेदनाओं, यातनाओं और शारीरिक शोषण का धारावाहिक सिलसिला है, जो अंतत: आत्महत्या के लिए विवश करते हैं। ऐसे तुच्छ और क्षुद्र, महत्त्वहीन, कीड़े-मकोड़ों जैसे जीवन से तो मर जाना ही बेहतर है। समाज शारीरिक अंगों की बाकी कमियों को तो स्वीकार लेता है, लेकिन जननांग की कमी घृणा का, शोषण का कारण है। यह आत्महत्या नहीं, समाज द्वारा की गई हत्या ही है।

अंतिम कहानी ‘इजाज़त@ घोड़ाडोंगरी’ में धरा, ध्रुव और रवि के माध्यम से स्त्री पुरुष सम्बन्धों का, देह और प्रेम का दांपत्य के धरातल पर लेखा-जोखा मिलता है। ध्रुव उच्च जाति का सुंदर पुरुष है, लेकिन अपने सौंदर्य-सजग व्यक्तित्व के कारण, चेतन-अचेतन में समाये अतिरिक्त अभिमान के कारण वह धरा के जीवन का वह भाग नहीं बन पाता, जो एक आदिवासी रवि बन जाता है। लेखक ने धरा की तुलना करते हुये गुलज़ार की ‘इजाज़त’ फिल्म की बात की है, जिसमें रेखा पति नसीरूद्दीन शाह के पैर छूने के बाद शशि कपूर के साथ चली जाती है। ऐसा ही धरा ने किया, क्योंकि उसे ध्रुव तारे की नहीं, आसमान पर चमकते रवि की चाह है, उस रवि की जिसके पास प्रकाश, ऊर्जा और ऊष्मा- सब एक साथ हैं।

इन कहानियों में अवसरवादी राजनेता भी हैं, मृत मानवीय संवेदना वाले अफसर-मज़दूर भी तथा ईमानदार विश्वसनीय सच्चे और सुच्चे मनुष्य भी। होमो का बहुमुखी शोषण भी है और हृदयविदारक चीत्कार भी। किशोर प्रेम भी, दाम्पत्य जीवन के मानदंड और गलियारे भी। पाठकों को बाँधने वाली अद्भुत क़िस्सागोई भी और चिंतन सूत्र भी।

लेखक- पंकज सुबीर
प्रकाशक- राजपाल एंड सन्ज़, नयी दिल्ली
मूल्य- 325 रुपये / पृष्ठ- 176

समीक्षक
डॉ. मधु संधु, पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब
13 प्रीत विहार, आर. एस. मिल, जी. टी. रोड, अमृतसर, 143104, पंजाब
मोबाइल- 8427004610

ईमेल- madhu_sd19@yahoo.co.in

NEWS, FEATURE  AND PHOTO AGENCY
CONTACT US FOR ANY KIND OF NEWS, PHOTO OR FEATURE RELEASE

बस्ती जिले में नदियों की सफाई और नौका विहार की संभावनाएं

दिनांक 24 फरवरी 2025 को मुझे केरल के नेय्यार नदी पर  पूवर बोटिंग सफारी नौका विहार करने का अवसर  प्राप्त हुआ था। जो काफी रोमांटिक और शान्ति सकून भरा रहा। इस प्रकार के आयोजन उत्तर भारत के अनेक स्थलों पर भी विकसित किया जा सकता है। इससे जल परिवहन और नौका विहार के नए आयाम जुड़ेंगे और क्षेत्र के विकास में चार चांद लग सकते हैं।
जल परिवहन का उपयोग प्राचीन समय से ही किया जा रहा है और इसके कई फायदे हैं। यह एक सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन साधन है। कम लागत: जल परिवहन की लागत अन्य परिवहन चालकों की तुलना में कम लागत है। पर्यावरण के अनुकूल: जल परिवहन से प्रदूषण कम होता है, क्योंकि यह कम जल का उपयोग करता है। यह बहुत सस्ता है क्योंकि पानी का घर्षण ज़मीन की तुलना में बहुत कम है । जल परिवहन की ऊर्जा लागत कम है।
उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस विकल्प को विकसित करने के लिए प्रयासरत हैं। उन्होंने  कहा है कि बलिया से अयोध्या तक सरयू नदी में जल परिवहन सेवा शुरू की जाएगी।  अयोध्या स्थित सरयू नदी में जल मार्ग का विकास करने और इसे सुदृढ़ बनाने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। जल मार्ग में पानी की भरपूर व्यवस्था के लिए नदी तल का सिल्ट निकालने का कार्य किया जाएगा।  सरयू नदी में पानी का प्रवाह बढ़ाकर वाटर मेट्रो चलाने की तैयारी भी है। सरयू नदी में अयोध्या टांडा बडहल गंज को जोड़ते हुए यूपी की सीमा बलिया तक जल परिवहन को विकसित किया जा सकता है।सरयू नदी से मखौड़ा धाम को नदी मार्ग से नौका द्वारा जोड़कर पर्यटक को विकसित किया जा सकता है। टांडा से अयोध्या को नदी मार्ग से जोड़कर उमरिया देवरहा बाबा की जन्म भूमि को जोड़ते हुए पर्यटन स्थल विकसित किया जा सकता है।
कुवानो नदी सरयू (घाघरा) की सहायिका है। यह नदी तराई इलाके में बहराइच ज़िले के बसऊपुर गाँव के पास से एक सोते के रूप में निकलती है। नदी अपने मार्ग में बस्ती, संत कबीर नग़र और गोरखपुर जिले से होकर बहती है। इस नदी में नौका विहार की असीम संभावनाएं हैं। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुवानो नदी पर अमहट भद्रेश्वर नाथ और मुड़ घाट बारछत्तर सन्त रविदास बन बिहार आदि कुछ स्थल को जोड़ते हुए इस तरह के नौका विहार के लिए उपयुक्त है। बस्ती का संत रविदास पार्क कुवानों नदी के तट पर स्थित है. यहां पर आपको पार्क के साथ ही प्राकृतिक संसाधन देखने को मिल जाएंगे जो कि बेहद ही खूबसूरत हैं. इस पार्क में आपको मनोरंजन के साथ ही तरह तरह के जीव जन्त पशु पक्षी देखने को मिल जाएंगे. गर्मी के मौसम में यहां पर पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है। इसे नौका विहार द्वारा विकसित किया जा सकता है।
बिसुही नदी बहराइच जिले के इकौना परगना से निकलकर गोंडा की पश्चिमी सीमा में प्रवेश करती है। उतरौला तहसील में पहुंचकर यह सादुल्लानगर को मनकापुर से और बूढ़ापायर को बभनीपायर से अलग करती है। जिले में 70 मील की दूरी तय करके ये नदी कुआनो में मिल जाती है। इसका पाट भी कुआनो की तरह संकरा व गहरा है। जिले में प्रवेश करते समय नदी की चौड़ाई 10 से 15 गज तक ही है, जबकि पूर्वी सीमा पर पहुंचते-पहुंचते यह 40-50 गज तक चौड़ी हो गई है। नदी के तट व अधिकांश भाग जामुन के कुंजों से आच्छादित हैं। इन्हें छटवांकर अनुकूल बनाया जा सकता है।
मनोरमा नदी पर मखौड़ा से बस्ती के लाल गंज तक पण्डुल पांडव घाट से झुगी नाथ तक को नौका विहार द्वारा जोड़ा जा सकता है। मनवर रामरेखा और सरयू नदी को जोड़कर नौका विहार के स्पॉट बनाए जा सकते हैं। इसी प्रकार आमी, रामरेखा, घाघौवा नाला ,गरिया आदि नदियों को भी इस दृष्टि से जोड़ा जा सकता है।
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर +91 8630778321)

7 से 13 मार्च तक होलाष्टक, फिर 14 मार्च से 13 अप्रैल तक मल मास, शुभ कार्य 16 अप्रैल से प्रारंभ होंगे

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तक होलाष्टक की मान्यता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार होलाष्टक में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार इस बार 7 मार्च से होलाष्टक की शुरुआत होगी, 13 मार्च को होलिका दहन के साथ इसका समापन होगा।  होली से पहले 8 दिनों का समय होलाष्टक कहा जाता है। होली के 8 दिन पूर्व फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलाष्टक लग जाता है, जो पूर्णिमा तक जारी रहता है। ऐसे में इन 8 दिनों में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता। होलाष्टक के इन 8 दिनों को वर्ष का सबसे अशुभ समय माना जाता है। इन आठ दिनों में क्रमश: अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध एवं चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए माने जाते हैं जिसकी वजह से इस दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।
अपने नाम के अनुसार होलाष्टक होली के ठीक आठ दिन पूर्व शुरू हो जाते हैं। होलाष्टक के मध्य दिनों में 16 संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता है। यहां तक कि अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शांति कार्य किए जाते हैं। इन दिनों में 16 संस्कारों पर रोक होने का कारण यह है कि इस अवधि को शुभ नहीं माना जाता है।

लेकिन 14 मार्च से सूर्य मीन राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य की मीन संक्रांति को मलमास माना गया है। मलमास में भी शुभ मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। ऐसे में इस बार लगातार सवा महीना मांगलिक कार्य नहीं होंगे। 15 अप्रैल को मलमास समाप्त होने के बाद एक बार फिर शहनाई की गूंज सुनाई देगी।

होलाष्टक के शुरुआती दिन में ही होलिका दहन के लिए 2 डंडे स्थापित किए जाते हैं, जिनमें से एक को होलिका तथा दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार जिस क्षेत्र में होलिका दहन के लिए डंडा स्थापित हो जाता है, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। अन्यथा अमंगल फल मिलते हैं। क्योंकि होलिका दहन की परंपरा को सनातन धर्म को मानने वाले सभी मानते हैं, इसलिए होलाष्टक की अवधि में हिंदू संस्कृति के कुछ संस्कार और शुभ कार्यों की शुरुआत वर्जित है। लेकिन किसी के जन्म और मृत्यु के पश्चात किए जाने वाले कृत्यों की मनाही नहीं की गई है। तभी तो कई स्थानों पर धुलेंडी वाले दिन ही अन्नप्राशन संस्कार की परंपरा है। अत: प्रसूतिका सूतक निवारण, जातकर्म, अंत्येष्टि आदि संस्कारों की मनाही नहीं की गई है। देश के कई हिस्सों में होलाष्टक नहीं मानते। लोक मान्यता के अनुसार कुछ तीर्थस्थान जैसे शतरुद्रा, विपाशा, इरावती एवं पुष्कर सरोवर के अलावा बाकी सब स्थानों पर होलाष्टक का अशुभ प्रभाव नहीं होता है, इसलिए अन्य स्थानों में विवाह इत्यादि शुभ कार्य बिना परेशानी हो सकते हैं। फिर भी शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक की अवधि में शुभ कार्य वर्जित हैं। अत: हमें भी इनसे बचना चाहिए।