( देश में विख्यात ओडिशा के बाल साहित्य आलोचक श्री दिने कुमार माली से लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का साक्षात्कार )
बाल साहित्य की दशा,दिशा, संभावनाएं तथा समीक्षा कर्म विषय पर तालेचर, ओडिशा के देश के विख्यात बाल साहित्य आलोचक श्री दिनेश कुमार माली से लंबी चर्चा हुई। उनके साक्षात्कार में विषय पर महत्वपूर्ण बातें सामने आई। साक्षात्कार से निकल कर आई महत्वपूर्ण बात यही रही कि आज के तकनीकी युग में बाल साहित्य की दशा और दिशा में काफी बदलाव आया है और बाल साहित्य की समीक्षा अत्यंत कठिन कार्य है। बच्चों और किशोरों के लिए लेखन में भाषा बच्चों के समझ के स्तर की हो न कि रचनाकार की अपनी स्वयं की भाषा हो। इस साक्षात्कार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूं।
दिनेश कुमार माली बाल साहित्य के आलोचना कर्म पर कहते हैं किसी भी बाल साहित्य पर आलोचना-कर्म करना अत्यंत ही कठिन कार्य है, क्योंकि आलोचना-कर्म करते-करते मन-मस्तिष्क बाल-सुलभ कोमल भावों से परे जा चुका होता है। यही वजह है कि हमारे देश में बाल-साहित्य पर काम करने से आलोचक वर्ग कतराता है, परिणामस्वरूप अच्छे-अच्छे बाल साहित्यकार भी नजर अंदाज हो जाते है। एक दशक पूर्व उन्होंने राजस्थान में सलूंबर की प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. विमला भंडारी के समग्र बाल-साहित्य पर आधारित अपनी पहली आलोचना पुस्तक ‘डॉ. विमला भंडारी की रचना धर्मिता’ लिखी थी, उस समय इन्होंने अपने भीतर इस दुविधा को गहराई से अनुभव किया था और धीरे-धीरे यह दुविधा और गहराने लगी।
कहते हैं बाल साहित्यकारों की किताबों का मंथन कर उन पर लिखने से पहले कई सवाल उठ खड़े होते है । क्या बड़ा व्यक्ति छोटे बच्चे की भाषा को लक्ष्य बनाकर उसके मन-मस्तिष्क में चलने वाली विचार तरंगों का अध्ययन कर सकता है? छोटे बच्चे का मन-मस्तिष्क तो पूरी तहत निर्मल और खाली होता है, उसमें देश-विदेश की किसी भी कठिन से कठिनतम भाषा के शब्दों को भरा जा सकता है। उनके दिमाग की संरचना ऐसी होती है कि वे सब-कुछ सहज तरीके से सीख जाते हैं। ये सवाल वे केवल बाल-साहित्यकारों के लिए छोड़ते हैं।
बाल साहित्य पर उनका कहना है बच्चों के कोमल अहसास, अनगिनत अठखेलियाँ, शरारतें, उनकी तुतलाहट, झट से रूठ जाना और तुरंत ही राजी हो जाना, हँसने-खेलने-दौड़ने-भागने-नाचने-गाने,आश्चर्यचकित कर देने वाले प्रश्नों की झड़ी लगाने, तरह-तरह के क्रिया-कलापों और किस्से-कहानियों से भरी संवदेनाओं के संसार में ले जाने वाला साहित्य बाल-साहित्य है। उसे कोई बच्चा लिखे या बुजुर्ग, कहलाता ‘बाल साहित्य’ ही है, क्योंकि इस साहित्य के पाठक, श्रोता, दर्शक-सभी बालक होते हैं। यह दूसरी बात है, कभी-कभी बड़े भी अपने बचपन को याद करने या समय बिताने के लिए बाल-साहित्य का आनंद उठाते है, मगर बाल-साहित्य का उद्देश्य यहाँ पर पूर्ण नहीं होता है। बाल-साहित्य बाल-मनोविज्ञान की कई परतों को खोलता है और बाल-साहित्यकार अपने बचपन के अहसासों को अत्यंत गइराई तक ले जाते हैं। इन्हीं अहसासों के आधार पर बाल-साहित्यकार अपने देश-काल-पात्र के अनुसार बाल मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं को उकेरते हुए अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। यह सृजन पहले भी हो रहा था और आज भी अनवरत जारी है।
वे आगे कहते हैं समकालीन बाल-साहित्य के बहाने इस विषय की पूरी परिक्रमा करने का इन्हें अवसर प्राप्त हुआ है। बाल-साहित्य कैसे बना? आज क्या स्थिति है आगे कैसी अवस्था होगी? बहुत सारे सवालों पर चिंतन-मनन करना अपरिहार्य शर्त है। जैसे कि सर्वविदित है, भारत के ग्राम्य ही क्या, शहरी अचंलों में भी माँ अपने लाड़लों को ‘सो जा बेटे, सो जा’ जैसी लोरियाँ सुनाकर पालने में सुलाती थी, जैसे पौराणिक काल में यशोदा माता कृष्ण ‘हलरावै, दुलरावै, मोरे कान्हा को आजा निंदरिया’ कहकर हिलोड़ा झुलाती थी। हिन्दी में ही नहीं, भारत की हर भाषा में यह प्रचलन था और अभी भी है। इनको आज भी याद है कि बचपन में इनके दादा-दादी अक्सर छोटी-छोटी कहानियाँ सुनाते थे। कभी ऊँट की, तो कभी चोर-सिपाही की। ये कहानियाँ बाल-साहित्य का एक रूप ही तो थी। ये लोरियाँ, लोक-गीत और लोक-कथाएँ ही बाल-साहित्य की पहली सरणी है। इनके लेखक अज्ञात है, मगर बाल-साहित्य की यह मौखिक परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही। जब इसे लिपिबद्ध किया जाने लगा तो बाल-साहित्य के लेखन का नया स्वरूप हमारे सामने प्रकट होने लगा। बाल-साहित्य के विकास की पहली सीढ़ी, फिर प्रिंटिंग-प्रेस और उसके बाद बाल-साहित्य की रंगीन दुनिया का आविष्कार होता है।
अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं कि बाल-साहित्य पर आलोचना कर्म अत्यंत ही जटिल है तो मुझे ऐसा लगता है कि व्यस्कों की तुलना में बच्चों के लिए लिखना कठिन कार्य है। कम से कम सरल, आकर्षक शब्दों में बाल-सुलभ क्रियाओं के मनोभावों को अभिव्यक्त करना इतना सहज नहीं है। इसके अतिरिक्त, लेखक की भाव-प्रवणता भी उस स्तर को स्पर्श करने वाली होनी चाहिए, निश्चल, निष्पाप-जो आपाधापी के इस आधुनिक युग में संभव नहीं है। जहाँ लेखकों की मनोवृत्तियाँ भी बदल रही है, वहीं लक्षित बाल-पाठकों की अभिरूचियाँ भी। दोनों के बीच सामंजस्य बैठाना बहुत मुश्किल प्रतीत होता है। यही वजह है, आज बाल-साहित्य ‘खतरे’ के नजदीक पहुँचता जा रहा है। बच्चों के चंचल मनों को लुभाने के लिए बड़े-बड़े अक्षरों वाली आकर्षक शब्दावली की नितांत आवश्यकता होती है, वहीं उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले पृष्ठ और मनोहर सुंदर चित्रावली की भी। किताबें भले ही दिखने में छोटी लगे, इन आकर्षक किताबों के प्रकाशन में बहुत ज्यादा खर्च आता है, जो आम बाल साहित्यकार की वित्तीय सीमा से परे होती है। जब तक बहुत ज्यादा संख्या में अगर ये किताबें प्रकाशित नहीं की जाए अथवा किसी सरकारी संस्था या पुस्तकालय में थोक-मात्रा में इनकी खरीद नहीं की जाए तो लेखक और प्रकाशक दोनों बाल-साहित्य से दूरी बनाते हुए नजर आएंगे।
यह देखते हुए ये हर बाल-साहित्यकार को श्रद्धापूर्वक नमर करते हैं और सोचता हैं जहाँ बाल-साहित्यकारों को पुरस्कृत कर उनकी हौसला अफजाई करना अत्यंत आवश्यक है, वहीं उनके बाल-साहित्य पर समीक्षात्मक विश्लेषण कर आलोचना पुस्तकें लिखना भी नितांत जरूरी है। समय के सापेक्ष बाल-साहित्य में भी परिवर्तन अत्यावश्यक है ताकि साहित्य के धुरंधर आलोचकों के ध्यान से वे कृतियाँ अछूती न रह जाए।
बाल-साहित्य का मुख्य उद्देश्य बताते हुए उनका कहना है कि बाल पाठकों के लिए मनोरंजन करने के साथ-साथ उनमें ज्ञान और सर्जनशीलता की वृद्धि करना है। प्राचीन भारतीय साहित्य में पंचतत्र का नाम तो सभी ने अवश्य सुना होगा। पंचतंत्र यानि पांच भागों में लोक कथाओं का संकलन बच्चों के ज्ञान वृद्धि का प्रमुख माध्यम था। किससे दुश्मनी करनी है, किसे दोस्त बनाना है, कब अप्रत्याशित परिस्थितियों में अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना है, कौन-सी नीतियों का अनुपालन करना है-सारे प्रश्नों के उत्तर पंचतंत्र की लोक-कथाओं में सहजता से मिल जाते हैं और वे भी आजीवन स्मृति-पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हुए।
आठ से बारह साल के बच्चों को लोक कहानियाँ, परियों की कहानियाँ, जानवर -गाथा के साथ-साथ साहसिक किस्से बहुत पसंद आते हैं। उदाहरण देते हुए बताते हैं इन्हीं विषयों पर आधारित पुस्तकों में ‘दादी का मटका(सुमित्रा कुमारी सिन्हा), ‘प्रभाती (शिव मंगल सिंह ‘सुमन’), ‘अत्याक्षरी(भारत भूषण अग्रवाल), ‘मेरी गुडिया कुछ तो बोल’ (धर्मपाल शास्त्री), ‘चाचा नेहरु के गीत’ (निरंकार देव सेवक), “मिर्च का मजा’(दिनकर) प्रमुख थी। नाटकों में ‘आओ बच्चों नाटक खेंले(अनिल कुमार),‘पैसों का पेड़’(कमलेश्वर),‘नटखट नंदू’(दया शंकर मिश्रा), ‘हंसिए हंसाए’(स्नेह अग्रवाल) आदि ने नागार्जुन, इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर और जैनेन्द्र कुमार की बचपन की खट्टी-मीठी कहानियों का संकलन है।
वे कहते हैं कि तेरह से अठारह आयु के बच्चों में परिवार, इतिहास, हँसी-मजाक, जानवरों, परियों एवं हाऊ टू डी इट ?’ शृंखला वाली रचनाएं ज्यादा पसंद की जाती है। बचपन की याद करते हुए कहते हैं उस समय में आने वाली पत्रिकाएँ आज भी स्मृति-पटल पर तरोताजा है, जिनमें चंदामामा, बालभारती, पराग, नंदन, चंपक, इंद्रजाल कॉमिक्स और अमरचित्र कथा प्रमुख है। सन् 1956 से मद्रास (वर्तमान चेन्नई) से प्रकाशित होने वाली ‘चंदा मामा’ का पूरे भारत पर एक छत्र राज्य था। देश के विभिन्न भाषाओं में जैसे गुजराती, हिंदी, कन्नड, मराठी, तमिल, तेलगु आदि ने उसका अनुवाद खूब बिकता था। वैसी ही सन् 1968 में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली बाल-पत्रिका ‘चंपक’ भी हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी, तमिल, तेलगु और मलयालम में प्रकाशित होती थी।
वे बताते है जब ये पांच साल के थे, तो टाइम्स ऑफ इंउिया प्रेस की ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ तथा इंडियन बुक हाउस एजेकुशन ट्रस्ट की ‘अमर चित्र कथा’ का बजार अपने शीर्ष पर था। और जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती गई, स्कूलों के पुस्तकालय में आने वाली टाइम्स की ‘नंदन’ पत्रिकाएँ इनको आकर्षिक करती थी। जब पन्द्रह साल की उम्र हुई, तब एनबीटी द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में मीराबाई, प्रेमचंद, रेड-क्रॉस, खेल कूद, जीव-जंतु एनसीईआरटी की बाल मित्र विज्ञान माला के अतिरिक्त धर्मयुग, कांदबरी, सरिता जैसी पुस्तकें ज्ञानवर्धन करती थी। इन किताबों के अध्ययन से हम भारत के गौरव इतिहास पुरुष जैसे महात्मा गांधी, गोपाल कृष्ण गोखले, चितरंजन दास, जवाहर लाल नेहरु, सुभाष चंद्र बोस की जीवनी के साथ-साथ भारत की लोक कथाएं, भूगोल, नदी-नालों, सांस्कृतिक धरोहरों, नृत्य-संगीत,साधु-संतों, स्थापत्य-कला, तीर्थ-स्थलों, खेल-कूदों तथा चित्रकारी-नक्काशी जैसी कलाओं से अवगत होते थे वहीं सचित्र विश्व-कोश के माध्यम से देश-दुनिया के कोनों-कोनों की जानकारी अर्जित करते थे।
बचपन की इन नींव की ईंटों पर निर्मित भवन न केवल बाल साहित्यकार के लिए अपरिहार्य है, वरन् हमारे देश के अच्छे नागरिक के लिए भी उतना ही जरूरी है। अतः कह सकते हैं कि सुदृढ़ परिमार्जित बाल-साहित्य ही आगे जाकर देश की संस्कृति, साहित्य, राजनीति और सुव्यवस्थित सामाजिक प्रबंधन की आधारशिला बनती है।
कहते हैं बाल-साहित्य का बचपन से ही गहन अध्येता रहे हैं। घर में दादी माँ पालने में इन्हें और उनके भाईयों को सुलाते समय अक्सर लोरियाँ सुनाती थी। यह ही नहीं, माँ के पास भी स्नान कराते समय, स्तन-पान कराते समय भी उनके पास अलग-अलग कविताएँ तैयार रहती थी। उनका भावात्मक कंठ, हाव-भाव, सरल मधुर भाषा और भाव-भंगिमाओं का प्रस्तुतीकरण आज भी दिलो-दिमाग पर छाया हुआ है। जो बचपन में था, आज पचपन में भी मन-मस्तिष्क पर अंकित है। दादी और माँ भले ही अनपढ़ थी, मगर उसकी अपनी भाषा थी। तो क्या उसका यह मौखिक शिशु साहित्य नहीं है? तो क्या उसका बड़े हुए, ‘अपारा’ (आज की भाषा में नर्सरी) में पढ़ने गए तो पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियाँ, देश भक्ति के गीत तथा देश-विदेशों की लोक-कथाएँ हमारे बाल-साहित्य की सामग्री बनी। विपुल शब्दों का संग्रह और सही उच्चारण हमारे स्वभाव में प्रवेश करने लगा।
यह सत्य है, बाल- साहित्य बाल पाठकों के मनोविज्ञान उनके स्वभाव, रूचि, इच्छा आकांक्षा, कल्पना की उड़ान को तेज गति प्रदान करती थी। बड़ों के साहित्य की तरह उनके गीतों में बिंब, प्रतीक और मानसिक बोझलता का भाव नहीं रहता था। आज भी याद है, हमारे घर के पास बने श्रीयादेवी मंदिर में कृष्ण जन्मोसव के समय ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की,’ प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में कबड्डी खेलते समय ‘छल कबड़ी आल ताल, तेरी मूछें लाल-लाल, मर गए बिहारी लाल’और मछलीधर में तैरती मछलियों को देखकर मुहँ से स्वतः ‘भरा समंदर/गोपी चंदर/बोल मेरी मछली कितना पानी/कितना पानी’ जैसी अनेक बाल- कविताएँ निकलने लगती थी।
किशोरावस्था में प्रवेश करने लगे तो इनकी पसंद भी बदलने लगी थी, सरिता, धर्मयुग, उपन्यास, वैज्ञानिकों और साहित्यकारों की जीवनी पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ने लगी और आठवीं कथा में मुझे ‘पुस्तकालय को सर्वाधिक पुस्तकों’को पढ़ने के लिए वार्षिकोत्सव में सम्मानित किया गया। प्रधानाध्यापक द्वारा उनके हस्ताक्षर वाला प्रमाण-पत्र भी दिया गया, जिसे आज भी अपने पास संभाल कर रखा है । बचपन से ही इनको बाल-साहित्य के प्रति अगाध-प्रेम आनंदित करता रहा है।
बाल साहित्य-पढ़ते समय कभी-कभी मन में पात्रों के प्रति करूणा पैदा होती थी, तो कभी-कभी खलनायक पात्रों के प्रति मन में क्रोध। कभी उत्साह, कभी प्रेरणा, कभी शांति, कभी अंतर्द्वनद,। उस समय यह पता नहीं था कि शृंगार, रौद्र, हास्य, वात्सल्य, वीर करूणा, शांत, भयानक आदि साहित्य के रस होते हैं। यह भी पता नहीं था कि बाल साहित्य की रसानुभूति से स्थायी भावों का संचरण होकर मेरा व्यक्तित्व में बदलाव हो रहा है। केवल इतना ही महसूस होता था कि वे किताबें पढ़ना अच्छी लगती थी। ग्यारहवीं के विज्ञान छात्र होने के कारण धीरे-धीरे पढ़ने का दायरा बढ़ता है।
उनका कहना है, जब अपने बच्चों के बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करता हूँ तो अपने आप को असहाय पाता हूँ। आज घर में चंपक, नंदन, चंदा मामा, पराग, बाल भारती जैसी कोई पत्रिका नहीं आती है। आज घर में बच्चों के हाथ में पत्रिकाओं की जगह प्ले स्टेशन के बटन है जिससे वे कंप्यूटर गेम्स खेलते हैं। बच्चों की कहानियों की जगह मोबाइल में तरह-तरह के एप पर काम करते हैं। भाषा शैली भी पूरी तरह बदल गई है। बाल पाठक अंग्रेजी में काम करता है, कहीं ऐसा न हो जाय कि आगामी पीढ़ी के लिए यह राजभाषा बन जाए। हिन्दी के कठिन शब्द उन्हें समझ में नहीं आते हैं। साधारण बाल साहित्य उन्हें पसंद नहीं आ रहा है। उन्हें चाहिए हैरी पॉटर, स्पाइडर मैंन, हल्क आदि जैसी फिल्में। उन्हें चाहिए हिंदी और अंग्रेजी की मिली-जुली भाषा। बचपन बदल रहा है। बच्चे बहुत जल्दी ही युवा और व्यस्क होते जा रहे हैं। जिन चीजों की जानकारी कभी हमें हमारी उम्र के विशेष पड़ाव तक नहीं होती थी, आज वे सारी जानकारियां उनकी उंगलियों की पहुंच में हैं।
आज बच्चें डिजिटल मीडिया पर ई-बुको का वाचन करते हैं और मनोरंजक कम्प्यूटर गेम्स खेलते हैं। किताबों के विषय भी बदल गए हैं। परियों की कहानियों की जगह ‘एलिस फॉर द आइपैड’ प्रकाशित होती है। इन आई पैड पुस्तकों को पढ़ने की जरूरत नहीं है, एक बटन दबाने से किसी के द्वारा पुस्तक पढ़ने की आवाज आती रहती है, जिसे आप सुन सकते हैं। आप अपनी आवाज में उस पुस्तक का रिकॉर्ड कर सकते हैं। निस्संदेह विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है। कोई भी साहित्य अब स्थानीय साहित्य नहीं रहा, मल्टी-मीडिया संस्करण के कारण वैश्विक साहित्य में बदल चुका है। आज बचपन भी किसी विशेष ग्राम्यांचल से सबंधित नहीं रहा, वह भी पूरे विश्व से प्रभावित होने लगा है। आज हम परिवर्तन के दौर से गुजर रहे है। अप्सराओं की क्लासिक डिज्नीलैंड की कहानियों पर फिल्में बन गई है। कहानी कहने के तरीके भी पूरी तरह बदल चुके हैं। डिजिटल बुक, फिल्म ग्राफिक नॉवेल, एनिमेशन, कम्प्यूटर गेम्स सभी ने मुद्रित पुस्तकों की दुनिया में काफी बदलाव लाया है।
बचपन से ही बच्चे को कंप्यूटर की ओर आकर्षित किया जाता है। मल्टी मीडिया परिवेश में रहने वाला बच्चा अगर बहुत कुछ पाता है तो बहुत कुछ खोता भी है। कहानियाँ अपना रूप बदल रही है। हैरी पॉटर की कहानियाँ रपइटिंग के किताबों में मिलती है तो फिल्मों में भी अंतराष्ट्रीय पटल पर देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं में बच्चों के पढ़ने का ढंग भी अभिसारित हो गया है। कहानियाँ बहुऐन्द्रिक संवेदनाओं का मिश्रण बन गई हैं अर्थात् अब कहानियाँ पढ़ी जाती है, सुनी जाती है देखी जाती हैं और इस प्रकार के बाल-साहित्य को ‘चिल्ड्रन लिटरेचर इन कन्वर्जेन्स कल्चर’ कह सकते हैं अर्थात् मल्टी मीडिया के सहयोग से निर्मित साहित्य। आज जब समय बदल रही है तो बाल साहित्य का रूप भी अपने रंग बदल रहा है। आधुनिक बाल साहित्य में स्कूलों की संसद की राजनीति, फैंटेसी परिवार, यथार्थवाद, इतिहास, युद्ध आदि के कथानकों पर आधारित कहानियाँ, काव्य, सुखांत और दुखांत नाटकों की विधाओं पर लेखन किया जा रहा है।
देखा जाए तो संपूर्ण संसार में समकालीन बाल-साहित्य के संरक्षण तथा उसमें नई-नई प्रवृत्तियों को जोड़ने के लिए तरह-तरह के अभिनव प्रयोग किए जा रहे हैं। सुंदर सस्ती आकर्षक किताबें, खिलौने नये मीडिया वाले फार्मेट, गेम्स भाषा-शैली में बदलाव जारी है। मेक्डॉवेल माइल के अनुसार बच्चों की किताबें छोटी, मगर आत्मावलोकन वाली और प्रथम पुरुष में लिखी जानी चाहिए। जो बच्चों पर केन्द्रित हो, जिसमें आशावदिता के स्वर प्रस्फुटित होते हो और जो बच्चों में साहस, सादगी और नैतिकता की शिक्षा दे सके।
बाल साहित्य की भाषा भद्दी नहीं होनी चाहिए, उसमें हिंसा और यौन कथानक नहीं हो और किताब के भीतर और बाहर का बालक निराशावादी कुंठाग्रस्त नहीं हो। बच्चे निर्दोष होते हैं, उनमें क्रूरता और हिंसा के भाव नहीं होते हैं, अतः बाल साहित्यकार को इस दिशा में अपने लेखन के दौरान पूर्ण रूपेण सचेत रहना चाहिए। उसे हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि वह व्यस्क है और बच्चे के लिए लिख रहा है तो उसकी आवाज में बच्चे के सुर होने चाहिए, न कि उसके अपने। उसकी भाषा, विवरण, स्पष्टीकरण-सभी में बच्चे का चेहरा झलकना चाहिए, न कि लेखक को अपना चेहरा। पीटर हॉलिनडेल अपने आलेख ‘साइन ऑफ चाइल्डनेस इन चिल्ड्रन’ज बुक’ में बाल्यावस्था और किशोरावस्था की योजक सीमा रेखा पर विशेष गुणवत्ता का ध्यान रखने का आह्वान किया है, क्योंकि उनका मानना है हर बच्चे में एक छुपा हुआ किशोर पाठक होता है हर किशोर में एक बच्चा अपनी पुनरावस्था को प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है।
अंत में वे कहते हैं कि इतना कहा जा सकता है कि किसी भी बाल-साहित्य पर आलोचनात्मक निबंध लिखना अत्यंत ही जटिल कार्य है, जिसमें बाल-पाठकों के मनोविज्ञान के अध्ययन के साथ-साथ साहित्यिक आलोचना के सिद्धान्तों के अनुरूप उनका विश्लेषण करना ज्यादा जरूरी है। आधुनिक युग में बच्चों की अभिरूचियाँ पूरी तरह से बदल चुकी है, अतः पारंपरिक बाल-साहित्य को भी अपना कलेवर बदलना आवश्यक है। नए-नए विषयों से कथानकों और अंतर्वस्तुओं की चयन कर नई भाषा-शैली में प्रस्तुतीकरण करना ही बाल-साहित्य को अक्षुण्णता की प्रमुख शर्त है।
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दिनेश कुमार माली
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