Friday, April 4, 2025
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सार्वजनिक परिवहन पर बड़ा फैसला: अब वाहनों पर दिखेगा ‘पशुओं पर दया करो” स्लोगन

अब सड़कों पर दौड़ते सार्वजनिक परिवहन वाहनों पर पशु कल्याण से जुड़ा एक सशक्त संदेश नजर आएगा। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के सचिवों को निर्देश जारी किया है कि सभी बसों और सार्वजनिक वाहनों पर  “Be Kind to Animals” (पशुओं पर दया करो) स्लोगन को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाए। यह फैसला पशुओं के प्रति दयालुता बढ़ाने और सड़क पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है।

श्रमण डॉ पुष्पेंद्र ने जानकारी देते हुए बताया कि केंद्र द्वारा 25 फरवरी 2025 को जारी अधिसूचना के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद  51A {g} के तहत, हर नागरिक पर प्राकृतिक पर्यावरण और जीव-जंतुओं की रक्षा करने का कर्तव्य है। इसी उद्देश्य से पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 लागू किए गए हैं। अब इस संदेश को और प्रभावी बनाने के लिए, मंत्रालय ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि इस स्लोगन को 150 मिमी ऊंचाई के अक्षरों में बसों के बाहरी हिस्से पर लिखा जाए, ताकि यह आसानी से पढ़ा जा सके। इसे पेंट या स्टिकर के रूप में लगाया जा सकता है। आगामी 1 अप्रैल 2025 से यह नियम सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों पर लागू होगा। सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से लोगों में पशु कल्याण को लेकर जागरूकता बढ़ेगी और सड़क पर आवारा या घरेलू जानवरों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।

हनुमानगढ के दीनदयाल शर्माः बाल मन के कुशल चितेरे

बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा राजस्थान के ऐसे रचनाकार है जिनकी पहचान देशभर में हैं। शायद ये देश के पहले ऐसे रचनाकार हैं जो ”  दीनदयाल की चौपाल ” के नाम पहचान बनाते हैं। इस चौपाल के माध्यम से ये  जनवरी, 2022 से यूट्यूब चैनल दीनदयाल की चौपाल पर देशभर के बाल साहित्यकारों की कहानियां और बाल कविताओं का वाचन करते हैं, जिन्हें न  केवल बच्चे वरन् बड़े भी बड़े चाव से सुनते हैं और इनकी नई रचना सुनने का इंतज़ार करते हैं।
बाल साहित्य कैसा हो इस पर अपनी चिंता व्यक्त कर बताते हैं ” हम बच्चों के लिए स्तरीय लेखन करें ताकि बच्चे साहित्य से जुड़ सकें। यदि स्तरहीन रचनाएं लिखी जाती रहे तो पर्यावरण का तो नुकसान होगा ही क्योंकि जब पुस्तकें छपती हैं तो न जाने कितने पेड़ों को बलिदान देना पड़ता है। स्तरहीन लिखी गई रचनाओं को बच्चे पढ़ेंगे तो वे बाल साहित्य की हल्की रचनाओं के बाद स्तरीय रचनाएं भी नहीं पढ़ेंगे क्योंकि उन्हें बाल साहित्य से नफ़रत हो जाएगी। ” उनका यह भी मानना है कि हम बच्चों से बात करें। उनकी भावनाओं को समझें। बच्चों से जुड़ाव के कारण हम उनके स्तर की अच्छी बाल रचनाएं सृजित कर सकते हैं। बच्चों को हर खुशी के मौके पर स्तरीय बाल साहित्य की पुस्तक भेंट में दें। जिसे पहले आप पढ़ें।
कहते हैं बच्चा बन कर और बच्चों की तरह सोच कर , उनके समझ के स्तर को देखते हुए सरल भाषा में  बच्चों की कविताएं और कहानियां ऐसी हों जिन्हें वे रुचि ले कर पढ़े। उनका मनोरंजन भी हो और कोई न कोई जीवन उपयोगी संदेश भी उनको मिले। उनकी एक बाल कविता ” किताबें ” की पंक्तियां देखिए………….
कहाँ सिर झुकाना / कहाँ तन कर खड़ा होना है।
 सारी बातें / सिखाती हैं किताबें।।
ज्ञान की गंगा / लगाइए डुबकी।
मन की मलिनता  / मिटाती हैं किताबें।।
गागर में सागर है / पाइए मोती।
 ज्ञान धन  सदा / लुटाती हैं किताबें।।
जीवन में अंधेरा /  छा जाए जब ये। /
प्रकाश अपना / फैलाती हैं किताबें।।
मिले इस ज्ञान को / चुरा न पाए कोई भी।
अनगिन तजुर्बे / सिखाती हैं किताबें।
पढ़ने वाला पाएगा / आगे बढ़ जाएगा।
जीवन को बेहतर / बनाती हैं किताबें ।
समय निकाल कर / जरूर आप पढ़िए।
ढेर सारा प्यार / लुटाती हैं किताबें ।।
कविता की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है, सभी कुछ अपने आप में स्पष्ट है।
इस सहज और सरल कविता के माध्यम से उन्होंने किताबों का महत्व बच्चों को जिस रोचक तरीके से समझाया है वह न  केवल काबिले तारीफ है  साथ ही साथ ही बाल रचनाकारों के लिए प्रेरक भी हैं। उनके संग्रह की एक और कविता ” नानी ” की पंक्तियां दृष्टव्य हैं…………
नानी तू है कैसी नानी
नहीं सुनाती नई कहानी।
नानी बोली प्यारे नाती
नई कहानी मुझे न आती।
मेरे पास तो वही कहानी
एक था राजा एक थी रानी।
नई बातें कहाँ से लाऊँ
तेरा मन कैसे बहलाऊँ।
तुम जानो कम्प्यूटर बानी
तुम हो ज्ञानी के भी ज्ञानी।
मैं तो हूँ बस तेरी नानी।
तुम्हीं सुनाओ कोई कहानी।।
कविता की विशेषता इस में है कि परम्परागत नानी की कहानियां सुनाने वाली नानी भी आधुनिक युग के कंप्यूटर का महत्व जान कर बच्चें को कहती है अब तो तेरे पास ज्ञानी कंप्यूटर है, मैं तो राजा – रानी की पुरानी कहानी ही जानती हूं, तेरे लिए नई कहानी कहां से लाऊं। मैं तो तुम्हारी नानी हूं अब तो तुम ही सुनाओ कोई कहानी। नानी का स्थान कंप्यूटर ने ले लिया और नानी की कहानियां तो पुरानी हो गई। जिस सहजता से रचनाकार ने बच्चे को नानी के माध्यम से कंप्यूटर से जोड़ा वह अपने आप में उनकी परिकल्पना का अनूठा उदाहरण है।
 रचनाकार हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में बाल साहित्य का सृजन करते हैं। इन्होंने  वर्ष 1975 से हिंदी भाषा में और वर्ष 1985 से राजस्थानी भाषा में लिखना शुरू किया। दोनों ही भाषाओं पर इनका सामान अधिकार हैं। इनकी मूल विधा: हिन्दी-राजस्थानी बाल साहित्य ही है।
 लेखन की विशेषता है की आपकी कई रचनाएं दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात आदि कई राज्यों के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में रचनाएं शामिल की जा चुकी हैं। आपकी अब तक हिन्दी और राजस्थानी में  63 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। राजस्थानी बाल साहित्य की तीन विधाओं में पहली पुस्तक होने का गौरव आपको प्राप्त हैं। ये हैं  संस्मरण पुस्तक ‘बाळपणै री बातां’ (2009), एक टाबर री डायरी (2021) और आलोचना पुस्तक ‘बाळपणै री बातां ” (2024)। आपने आंग्ल भाषा में भी एक पुस्तक ” द ड्रीम्स ” लिखी जिसका लोकार्पण 17 नवम्बर, 2005 को तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा राष्ट्रपति भवन में किया गया। युवा कवि और बाल साहित्यकार दुष्यन्त जोशी और वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवयित्री डॉ. मेघना शर्मा के संपादन में वर्ष 2018 में “कुछ अनकही बातें”  पुस्तक में देशभर के 101 साहित्यकारों की ओर से बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखी गद्य-पद्य रचनाओं की पुस्तक है। आप बच्चों के लिए टाबर टोली’ (पाक्षिक बाल समाचार पत्र ) 2003 से लगातार प्रकाशित कर रहे हैं।
 डॉ. अरूप कुमार दत्ता की अंग्रेजी पुस्तक का राजस्थानी भाषा में अनूदित ‘असम रो रणबंको : लाचित बरफुकन’ (2023) देशभर से चुने हुए 32 रचनाकारां की पांच-पांच हिन्दी बाल कविताएं राजस्थानी भासा में अनूदित और संपादित ‘राजस्थानी बाल बत्तीसी’ (2024)।  दीनदयाल शर्मा के बाल साहित्य पर प्रोजैक्ट निर्माण (2011), एम. फिल (2010) और पीएच. डी. (2019) की गई।
आपके पुरस्कार और सम्मान की सूची काफी बड़ी हैं। प्रमुख रूप से राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से हिन्दी बाल कहाणी पुस्तक ‘चिंटू-पिंटू की सूझ’ पर डॉ. शम्भूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार 1988 में प्राप्त हुआ। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी, बीकानेर से राजस्थानी बाल नाटक पुस्तक ‘शंखेसर रा सींग’ पर पं. जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार 1998 में प्राप्त हुआ। केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से राजस्थानी बाल संस्मरण पुस्तक ‘बालपणै की बातां’ पर राजस्थानी बाल साहित्य के राष्ट्रीय पुरस्कार से 2012 में सम्मानित हुए। पं. जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, जयपुर से ‘प्रेरणाप्रद बाल पहेलियां’ पर श्री मोहनलाल ओझा ग्रामीण बाल साहित्य पुरस्कार से 2022 में सम्मानित हुए और इसी अकादमी से 2023 में बाल साहित्य मनीषी सम्मान से नवाजा गया।
परिचय :
बाल साहित्य के क्षेत्र में नाम कमाने वाले रचनाकार दीनदयाल शर्मा का जन्म हनुमानगढ़  जिले की तहसील नोहर के ग्राम जसाना में पिता  प्रयाग चंद जोशी एवं माता महादेवी के आंगन में 15 जुलाई 1956 को हुआ। आपने   एम. कॉम. और पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त की। आपने 1984 में राजस्थान साहित्य परिषद् तथा 1986 में
 राजस्थान बाल कल्याण परिषद् की स्थापना की। वर्तमान में आप निरंतर बाल साहित्य लेखन में लगे हैं।
चलते – चलते……….
जब भी खोलू से खिड़की/  झट से भीतर वह आ जाता।
कब जाता है बाहर जाने /जादू उसको आता ॥
कमरे में आता है तब ये /महक फूल की लाता ।
कर देता तरोताजा मुझको /जब-जब यह आता।।
हवा का झोंका बहुत ही प्यारा / मेरे मन को भाता।
घर के दरवाजे से देखो /वह घर में घुस जाता।।
बड़ा मस्त स्वभाव है उसका / रहे सदा मुस्काता।
ऐसे मित्र पर गर्व करूं मैं / मुझको स्वस्थ बनाता ।।
खेत, पार्क या जाऊ कहीं भी / मेरा साथ निभाता ।
हुआ निहाल मैं उसको पा कर / मेरा सच्चा भ्राता ।।
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

डॉ दीपक कुमार श्रीवास्तव को सम्मान

 नई दिल्ली। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय  परिसर स्थित दीक्षा भवन में लाइब्रेरी प्रोफेशनल एसोसिएशननई दिल्ली एवं विश्वविद्यालय प्रशासन के संयुक्त तत्वाधान में हीरक जयंती समारोह के उपलक्ष्य मे आयोजित इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑन नॉलेज आर्गेनाइजेशन इन एकेडमिक लाइब्रेरीज (आई-काल 2025) मे राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय कोटा राजस्थान मे संभागीय पुस्तकालयाध्यक्ष पद पर कार्यरत डॉ दीपक कुमार श्रीवास्तव को कार्यक्रम मुख्य अतिथि प्रो. डा संजय श्रीवास्तव कुलपति महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय मोतीहारी बिहार, प्रो. डा पूनम टंडन कुलपति दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर,  लाइब्रेरी प्रोफेशनल एसोसिएशननई दिल्ली के महासचिव डा. सालेक चन्द, अध्यक्ष डा रामानन्द मालवीय, सम्मेलन निदेशक आनंद अंजली झा, सम्मेलन संयोजक विश्वविद्यालय के ग्रंथालयी डा. बिभाष कुमार मिश्रा , सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. रजनी कान्त पाण्डेय एवम कुलसचिव धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने संयुक्त रूप से दुनिया मे सार्वजनिक पुस्तकालय के क्षेत्र मे अग्रणी योगदान के लिए “बेस्ट पब्लिक लाईब्रेरीयन नेशनल अवार्ड -2023 से सम्मानित किया | 

गौरतलब है की डा श्रीवास्तव हाल ही मे आर्टीफ़ीशीयल इंटेलीजेंस के पोपुलरिटी एवम एक्टीव लाईब्रेरीयन्स की शृंखला मे देश मे सर्वोच्च स्थान पर है |

इस अवसर पर लाइब्रेरी प्रोफेशनल एसोसिएशननई दिल्ली के महासचिव डा आनंद अंजलि झा ने बताया कि – विभिन्न केटेरीज़ मे अवार्ड के 300 से अधिक प्रविश्ठिया प्राप्त हुई यूनामे से बेसटेस्ट फ़्रोम बेस्ट के सिद्धान्त पर चयन किया गया |

 

इस अवसर पर डा दीपक कुमार श्रीवास्तव ने इंटरनेशनल कांफ्रेंस के प्रथम दिवस के प्रथम सत्र को चेयर सेशन किया | वही इंटरनेशनल कांफ्रेंस के द्वितीय दिवस के सातवे एवम आठवे तकनीकी सत्र मे क्रमश :”सिनेमा बियोण्ड साईट : ए जर्नी टुवार्ड्स इंक्ल्यूजीटीवीटी फॉर विजुअली  इम्पाइरड“एवम “अनलॉकिंग लिटिल माइंड्स : हार्नेसिंग माईक्रो –एक्सप्रेशन टू ईगनाईट रीडींग हेबिटस इन किड़स – एन इमोशनल मेपिंग स्टडी ऑफ राजस्थान पब्लिक लाईब्रेरीज़” विषय पर प्रस्तुत किया | दोनों शोध पत्रो के सहलेखक क्रमश : डा के.पी. सिंह आई आई एल एम विश्वविधालय दिल्ली एवम मधुसूधन चौधरी गीतांजली चिकित्सा महाविधालय जयपुर रहे |

सुखी जीवन के १२ शिव सूत्र

आदिनाथ शिव यानि भारतीय संस्कृति के अद्भुत देव,एक प्रेरणा जो समाज के हर वर्ग के अतृप्त ह्रदय पर शीतलता का लेप हैं ऐसे परमदेव जिनके हर मन्त्र और कथा व्रतांत में एक सन्देश छुपा है. समाज की हर त्याज व उपेक्षित वस्तु उनके लिए परम प्रिय . हर प्राणी और वस्तु  में समता और स्वीकार्यता परन्तु दीनता के भाव से नहीं बल्कि सर्वोपरियता का विचार है.उत्पत्ति और विनाश शक्ति के द्वारा ही संभव होता है। शक्ति का रूप बदलता है, लेकिन नाश नहीं होता। ब्रह्मांड में गति शक्ति के द्वारा ही दिखाई देती है। हमारे शरीर में प्राणों की गति भी इसी शक्ति से होती है। जन्म, जीवन और मृत्यु इसी शक्ति से है। शिव और शक्ति अलग नहीं, बल्कि एक दूसरे से अभिन्न हैं.शिव में जो ई की मात्रा है, वह शक्ति का ही प्रतीक है और अगर शिव से ई की मात्रा हटा दी जाए, तो वह महज शव रह जाता है। शक्ति जब शांत होती है, तब वह शिव कहलाती है।ये दोनों तत्व ब्रह्मांड का आधार हैं। शिव के हाथ में त्रिशूल उनकी तीन मूल भूत शक्तियों इच्छाशक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान का प्रतीक है।

स्त्री शक्ति का सम्मान
शिव जी का अर्धनारीश्वर रूप उनके शक्ति रूप का प्रतीक है। वही एकमात्र देव हैं जिनका आधा रूप पुरुष और आधा स्त्री का है। शक्ति बिना सृष्टि संभव नहीं है। बिना नारी के किसी का जन्म नहीं हो सकता। शिव एवं शक्ति दोनों सृष्टि के मूलाधार हैं। शिव और शक्ति एक-दूसरे के पर्याय हैं। शिव के तीनों नेत्र शिवा के ही प्रतीक हैं जो क्रमश: गौरी के रूप में जीव को मातृत्व व स्नेह देते हैं, लक्ष्मी के रूप में उसका पोषण करते हैं तथा काली के रूप में उसकी आंतरिक तथा बाहरी बुराइयों का नाश करते हैं। शिव के ललाट पर सुशोभित तीसरा नेत्र असल में मुक्ति का द्वार है।

प्रेम
शिव सांसारिक होते हुए भी महायोगी हैं यानि प्रेम की जीवन में उपस्थति को योग में बढ़ाना.  स्त्री को शक्ति और प्रेरणा की तरह स्वीकार किया जाना चाहिये .सत्य तो यह है की जीवन में सच्चे प्रेम के कारण मूढ़ भी सफलता के सोपान छू लेता है

निराभिमानी
शिव भोले बाबा हैं .स्रष्टि के हर  जीव से उनका ऐसा तारतम्य है के वो उन्हें अपने शिशु सा ही प्रेम करते हैं. यही वजह है की शिव गण में भूत-प्रेत और भयंकर जानवर शामिल हैं जिनके लिए संसार में कहीं कोई स्थान प्राप्त नहीं है उनके लिए कैलाश धाम है .ऐसे सरल ढंग से जीने का अंदाज ही हमें निराभिमानी बना सकता है.

निर्भयता
शिव कभी भी हिंसा के पक्षधर नहीं हैं वो महायोगी हैं साधनारत स्वरुप में हैं .मगर राक्षसों के उत्पाती और अत्याचारी रूप का संहार करने में कभी नहीं रुके. इस प्रकार ये जरूरी है की सांसारिक जीवन जीने के बाद भी आवश्यकता और परिस्थती के अनुकूल निर्भय होना जरूरी है.

समय का महत्त्व
सृष्टि निर्माण व विनाश के मूल में समय ही प्रमुख है। शिव अपने तन पर विभूति रमाते हैं। वह अपना श्रृंगार श्मशान की राख से करते हैं। उनका एक रूप सर्वशक्तिमान महाकाल का भी है। वह जीवन, मृत्यु के चक्र पर भी नियंत्रण रखते हैं।यह काल के देवता हैं और काल का अर्थ समय है.

संतुलन
शिव के हाथ में त्रिशूल उनकी तीन मूल भूत शक्तियों इच्छाशक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान का प्रतीक है। इसी त्रिशूल से शिव प्राणी मात्र के दैहिक, दैविक एवं भौतिक तीनों प्रकार के शूलों का शमन करते हैं। इसी त्रिशूल से वह सत्व, रज और तम तीन गुणों तथा उनके कार्यरूप उनकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु, राम ने भी की है। सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की, विष्णु जी पालक और रक्षक का दायित्व निभाते हैं इसके चलते सृष्टि में जो असंतुलन पैदा होता है उसकी जिम्मेदारी भोले बाबा संभालते हैं। इसलिए उनकी भूमिका को ‘संहारक’ रूप में जाना जाता है। वह संहार करने वाले या मृत्यु देने वाली भूमिका नहीं निभाते हैं, वह तो मृत्युंजय हैं। वह संहार कर नए बीजों,  मूल्यों के लिए जगह खाली करते हैं। उनकी भूमिका उस सुनार व लोहार की तरह है जो अच्छे आभूषण एवं औजार बनाने के लिए सोने व लोहे को पिघलाते हैं, उसे नष्ट करने के लिए नहीं। इस प्रक्रिया के उपरांत ही सुंदर रूप में आभूषण व उपयोगी औजार का निर्माण होता है।

स्वीकार भाव
शिव शक्ति के अनन्य स्रोत हैं। वह संसार की बुरी से बुरी, त्याज्य से त्याज्य वस्तुओं से भी शक्ति ग्रहण कर लेते हैं। भांग, धतूरा जो सामान्य लोगों के लिए हानिकारक है वे उससे ऊर्जा ग्रहण करते हैं। यदि वह अपने कंठ में विष को धारण नहीं करते तो देवताओं को कभी अमृत न मिलता।शिव सब के हैं कम से कम साधनों में भी कोई भी उन्हें प्रसन्नं कर सकता है.

रमना (समर्पण )

हिमालय में ध्यानमग्न शिव समर्पण का उदाहरण है .जीवन में अपने उद्देश्य के लिए पूर्ण समर्पण और धैर्य का सन्देश शिव की महिमा में छुपा है .बिना समर्पण के कोई नही मकसद पूरा नहीं किया जा सकता है .कई प्रलोभनों को पार करके ही उद्देश को पाना संभव हो पता है

नवीनता .

संसार में प्रतिदिन पुराना जाता है और नया आता है यही प्रकृति का सत्य है.पुराने पत्ते टूटते हैं तभी नई कोपलें आती हैं .महामृतुन्जय मन्त्र में भी यही सत्य परिलक्षित है .जन्म नवीनता का प्रतीक है ,म्रत्यु परिवर्तन का .मनुष्य होने के नाते इस व्यवस्था का पालन करना ही हमारी नियति है. अतः जीवन में परिवर्तनों से न घबराते हुए उन्हें स्वीकार करना ही शिव सन्देश है.

सकारात्मकता और जनकल्याण
शिव जन जन के देव हैं उनकी हर कथा में उनके जनकल्याणकारी स्वरुप की महिमा है. जीवन को सकारात्मक कार्यों में लगाते हुए जनकल्याण करना ही मानव का उद्देश होना चाहिये.अपनी ओर से छोटा बड़ा कोई भी प्रयास हो मगर वह जनकल्याण के लिए सुनिश्चित हो .यही शिव सूत्र है.

तपस्या
भगवान शिव सदैव ही एकांत एवं निर्जन स्थान पर एकाग्र भाव से तपश्चर्या एवं ध्यान में लीन रहते हैं। इससे व्यक्ति सांसारिक भावों से दूर हो जाता है। इसके कारण संसारजनित विकार काम, क्रोध, लोभ से मुक्ति संभव है .जीवन भी तपस्या की तरह है हर दिन हम हजारों पाप के अवसरों का सामना करते हैं ऐसे में बहुत कम लोग हैं जो अपने मन को विचलित किये बगैर आगे बढ़ पाते हैं.

न्यूनतम आवश्यकताएं

भगवान शिव शरीर पर भस्म धारण करते हैं तथा मृगछाल पहनते हैं। हाथ में जल भरने हेतु कमंडल रखते हैं तथा खड़ाऊं धारण किए हैं। उनकी आवश्यकताएं अत्यंत सीमित हैं। जीवन को कम से कम आवश्यकताओं में भी प्रसन्नता से जीना भी एक कला है.

पुराण कहते हैं कि परमात्मा के विभिन्न कल्याणकारी स्वरूपों में भगवान शिव ही महाकल्याणकारी हैं। जगत कल्याण तथा अपने भक्तों के दुख हरने के लिए वह असंख्य बार विभिन्न नामों और रूपों में प्रकट होते रहते हैं जो मनुष्य के लिए तो क्या, देवताओं के लिए भी मुक्ति का मार्ग बनता है।

आज समाज में मानव संबंधों में इतना विष भर चुका है कि समुद्र मंथन का विष भी कम पड जाए .धर्म जाति,लिंग वर्ग और संस्कृति के नाम पर खून के प्यासे हुए लोगों को शिव चरित्र से मार्गदर्शन मिल सकता है.आज शिव चरित्र का स्मरण और आत्मसात करना समय की जरूरत है .धार्मिक पक्ष के इतर व्यवहारिक रूप से भी शिव एक सम्पूर्ण पुरुष हैं उनका नाम ही शक्ति और पुरुष के संतुलन को सिद्ध करता है .शिवरात्रि के पावन पर्व पर आवश्यक है की हम जीवन से नकारात्मकता का गरल हर तरीके से हटायें और शिव भक्ति के अमृत में डूब जाएँ.इस उद्देश में शिव के सूत्र जरूर लाभकारी सिद्ध होंगे.

अत्यंत कठिन कार्य है बाल साहित्य की समीक्षाः दिनेश माली

(  देश में विख्यात ओडिशा के बाल साहित्य आलोचक श्री दिने कुमार माली से लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का साक्षात्कार )

बाल साहित्य की दशा,दिशा, संभावनाएं तथा समीक्षा कर्म विषय पर तालेचर, ओडिशा के  देश के विख्यात बाल साहित्य आलोचक श्री दिनेश कुमार माली से लंबी चर्चा हुई। उनके साक्षात्कार में विषय पर महत्वपूर्ण बातें सामने आई। साक्षात्कार से निकल कर आई महत्वपूर्ण बात यही रही कि आज के तकनीकी युग में बाल साहित्य की दशा और दिशा में काफी बदलाव आया है और बाल साहित्य की समीक्षा अत्यंत कठिन कार्य है। बच्चों और किशोरों के लिए लेखन में भाषा बच्चों के समझ के स्तर की हो न कि रचनाकार की अपनी स्वयं की भाषा हो। इस साक्षात्कार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूं।

दिनेश कुमार माली  बाल साहित्य के आलोचना कर्म पर कहते हैं किसी भी बाल साहित्य पर आलोचना-कर्म करना अत्यंत ही कठिन कार्य है, क्योंकि आलोचना-कर्म करते-करते मन-मस्तिष्क बाल-सुलभ कोमल भावों से परे जा चुका होता है। यही वजह है कि हमारे देश में बाल-साहित्य पर काम करने से आलोचक वर्ग कतराता है, परिणामस्वरूप अच्छे-अच्छे बाल साहित्यकार भी नजर अंदाज हो जाते है। एक दशक पूर्व उन्होंने राजस्थान में सलूंबर की प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. विमला भंडारी के समग्र बाल-साहित्य पर आधारित अपनी पहली आलोचना पुस्तक ‘डॉ. विमला भंडारी की रचना धर्मिता’ लिखी थी, उस समय इन्होंने अपने भीतर इस दुविधा को गहराई से अनुभव किया था और धीरे-धीरे यह दुविधा और गहराने लगी।
कहते हैं बाल साहित्यकारों की किताबों का मंथन कर उन पर लिखने से पहले कई सवाल  उठ खड़े होते है ।  क्या बड़ा व्यक्ति छोटे बच्चे की भाषा को लक्ष्य बनाकर उसके मन-मस्तिष्क में चलने वाली विचार तरंगों का अध्ययन कर सकता है? छोटे बच्चे का मन-मस्तिष्क तो पूरी तहत निर्मल और खाली होता है, उसमें देश-विदेश की किसी भी कठिन से कठिनतम भाषा के शब्दों को भरा जा सकता है। उनके दिमाग की संरचना ऐसी होती है कि वे सब-कुछ सहज तरीके से सीख जाते हैं। ये सवाल वे केवल बाल-साहित्यकारों के लिए छोड़ते हैं।
 बाल साहित्य पर उनका कहना है बच्चों के कोमल अहसास, अनगिनत अठखेलियाँ, शरारतें, उनकी तुतलाहट, झट से रूठ जाना और तुरंत ही राजी हो जाना, हँसने-खेलने-दौड़ने-भागने-नाचने-गाने,आश्चर्यचकित कर देने वाले प्रश्नों की झड़ी लगाने, तरह-तरह के क्रिया-कलापों और किस्से-कहानियों से भरी संवदेनाओं के संसार में ले जाने वाला साहित्य बाल-साहित्य है। उसे कोई बच्चा लिखे या बुजुर्ग, कहलाता ‘बाल साहित्य’ ही है, क्योंकि इस साहित्य के पाठक, श्रोता, दर्शक-सभी बालक होते हैं। यह दूसरी बात है, कभी-कभी बड़े भी अपने बचपन को याद करने या समय बिताने के लिए बाल-साहित्य का आनंद उठाते है, मगर बाल-साहित्य का उद्देश्य यहाँ पर पूर्ण नहीं होता है। बाल-साहित्य बाल-मनोविज्ञान की कई परतों को खोलता है और बाल-साहित्यकार अपने बचपन के अहसासों को अत्यंत गइराई तक ले जाते हैं। इन्हीं अहसासों के आधार पर बाल-साहित्यकार अपने देश-काल-पात्र के अनुसार बाल मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं को उकेरते हुए अपनी रचनाओं में स्थान देते हैं। यह सृजन पहले भी हो रहा था और आज भी अनवरत जारी है।
वे आगे कहते हैं समकालीन बाल-साहित्य के बहाने इस विषय की पूरी परिक्रमा करने का इन्हें अवसर प्राप्त हुआ है। बाल-साहित्य कैसे बना? आज क्या स्थिति है आगे कैसी अवस्था होगी? बहुत सारे सवालों पर चिंतन-मनन करना अपरिहार्य शर्त है। जैसे कि सर्वविदित है, भारत के ग्राम्य ही क्या, शहरी अचंलों में भी माँ अपने लाड़लों को ‘सो जा बेटे, सो जा’ जैसी लोरियाँ सुनाकर पालने में सुलाती थी, जैसे पौराणिक काल में यशोदा माता कृष्ण ‘हलरावै, दुलरावै, मोरे कान्हा को आजा निंदरिया’ कहकर हिलोड़ा झुलाती थी। हिन्दी में ही नहीं, भारत की हर भाषा में यह प्रचलन था और अभी भी है। इनको आज भी याद है कि बचपन में इनके  दादा-दादी अक्सर छोटी-छोटी कहानियाँ सुनाते थे। कभी ऊँट की, तो कभी चोर-सिपाही की। ये कहानियाँ बाल-साहित्य का एक रूप ही तो थी। ये लोरियाँ, लोक-गीत और लोक-कथाएँ ही बाल-साहित्य की पहली सरणी है। इनके लेखक अज्ञात है, मगर बाल-साहित्य की यह मौखिक परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही। जब इसे लिपिबद्ध किया जाने लगा तो बाल-साहित्य के लेखन का नया स्वरूप हमारे सामने प्रकट होने लगा। बाल-साहित्य के विकास की पहली सीढ़ी, फिर प्रिंटिंग-प्रेस और उसके बाद बाल-साहित्य की रंगीन दुनिया का आविष्कार होता है।
अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं कि बाल-साहित्य पर आलोचना कर्म अत्यंत ही जटिल है तो मुझे ऐसा लगता है कि व्यस्कों की तुलना में बच्चों के लिए लिखना कठिन कार्य है। कम से कम सरल, आकर्षक शब्दों में बाल-सुलभ क्रियाओं  के मनोभावों को अभिव्यक्त करना इतना सहज नहीं है। इसके अतिरिक्त, लेखक की भाव-प्रवणता भी उस स्तर को स्पर्श करने वाली होनी चाहिए, निश्चल, निष्पाप-जो आपाधापी के इस आधुनिक युग में संभव नहीं है। जहाँ लेखकों की मनोवृत्तियाँ भी बदल रही है, वहीं लक्षित बाल-पाठकों की अभिरूचियाँ भी। दोनों के बीच सामंजस्य बैठाना बहुत मुश्किल प्रतीत होता है। यही वजह है, आज बाल-साहित्य ‘खतरे’ के नजदीक पहुँचता जा रहा है। बच्चों के चंचल मनों को लुभाने के लिए बड़े-बड़े अक्षरों वाली आकर्षक शब्दावली की नितांत आवश्यकता होती है, वहीं उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले पृष्ठ और मनोहर सुंदर चित्रावली की भी। किताबें भले ही दिखने में छोटी लगे, इन आकर्षक किताबों के प्रकाशन में बहुत ज्यादा खर्च आता है, जो आम बाल साहित्यकार की वित्तीय सीमा से परे होती है। जब तक बहुत ज्यादा संख्या में अगर ये किताबें प्रकाशित नहीं की जाए अथवा किसी सरकारी संस्था या पुस्तकालय में थोक-मात्रा में इनकी खरीद नहीं की जाए तो लेखक और प्रकाशक दोनों बाल-साहित्य से दूरी बनाते हुए नजर आएंगे।
यह देखते हुए ये हर बाल-साहित्यकार को श्रद्धापूर्वक नमर करते  हैं और सोचता हैं जहाँ बाल-साहित्यकारों को पुरस्कृत कर उनकी हौसला अफजाई करना अत्यंत आवश्यक है, वहीं उनके बाल-साहित्य पर समीक्षात्मक विश्लेषण कर आलोचना पुस्तकें लिखना भी नितांत जरूरी है। समय के सापेक्ष बाल-साहित्य में भी परिवर्तन अत्यावश्यक है ताकि साहित्य के धुरंधर आलोचकों के ध्यान से वे कृतियाँ अछूती न रह जाए।
 बाल-साहित्य का मुख्य उद्देश्य बताते हुए उनका कहना है कि बाल पाठकों के लिए मनोरंजन करने के साथ-साथ उनमें ज्ञान और सर्जनशीलता की वृद्धि करना है। प्राचीन भारतीय साहित्य में पंचतत्र का नाम तो सभी ने अवश्य सुना होगा। पंचतंत्र यानि पांच भागों में लोक कथाओं का संकलन बच्चों के ज्ञान वृद्धि का प्रमुख माध्यम था। किससे दुश्मनी करनी है, किसे दोस्त बनाना है, कब अप्रत्याशित परिस्थितियों में अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना है, कौन-सी नीतियों का अनुपालन करना है-सारे प्रश्नों के उत्तर पंचतंत्र की लोक-कथाओं में सहजता से मिल जाते हैं और वे भी आजीवन स्मृति-पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हुए।
आठ से बारह साल के बच्चों को लोक कहानियाँ, परियों की कहानियाँ, जानवर -गाथा के साथ-साथ साहसिक किस्से बहुत पसंद आते हैं। उदाहरण देते हुए बताते हैं इन्हीं विषयों पर आधारित पुस्तकों में ‘दादी का मटका(सुमित्रा कुमारी सिन्हा),  ‘प्रभाती (शिव मंगल सिंह ‘सुमन’), ‘अत्याक्षरी(भारत भूषण अग्रवाल), ‘मेरी गुडिया कुछ तो बोल’ (धर्मपाल शास्त्री), ‘चाचा नेहरु के गीत’ (निरंकार देव सेवक), “मिर्च का मजा’(दिनकर) प्रमुख थी। नाटकों में ‘आओ बच्चों नाटक खेंले(अनिल कुमार),‘पैसों का पेड़’(कमलेश्वर),‘नटखट नंदू’(दया शंकर मिश्रा), ‘हंसिए हंसाए’(स्नेह अग्रवाल) आदि ने नागार्जुन, इलाचंद्र जोशी, अमृतलाल नागर और जैनेन्द्र कुमार की बचपन की खट्टी-मीठी कहानियों का संकलन है।
वे कहते हैं कि तेरह से अठारह आयु के बच्चों में परिवार, इतिहास, हँसी-मजाक, जानवरों, परियों एवं  हाऊ  टू डी इट ?’ शृंखला वाली रचनाएं ज्यादा पसंद की जाती है।  बचपन की याद करते हुए कहते हैं उस समय में आने वाली पत्रिकाएँ आज भी स्मृति-पटल पर तरोताजा है, जिनमें चंदामामा, बालभारती, पराग, नंदन, चंपक, इंद्रजाल कॉमिक्स और अमरचित्र कथा प्रमुख है। सन् 1956 से मद्रास (वर्तमान चेन्नई) से प्रकाशित होने वाली ‘चंदा मामा’ का पूरे भारत पर एक छत्र राज्य था। देश के विभिन्न भाषाओं में जैसे गुजराती, हिंदी, कन्नड, मराठी, तमिल, तेलगु  आदि ने उसका अनुवाद खूब बिकता था। वैसी ही सन् 1968 में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली बाल-पत्रिका ‘चंपक’ भी हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी, तमिल, तेलगु और मलयालम में प्रकाशित होती थी।
वे बताते है जब ये पांच साल के थे, तो टाइम्स ऑफ इंउिया प्रेस की ‘इंद्रजाल कॉमिक्स’ तथा इंडियन बुक हाउस एजेकुशन ट्रस्ट की ‘अमर चित्र कथा’ का बजार अपने शीर्ष पर था। और जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती गई, स्कूलों के पुस्तकालय में आने वाली टाइम्स की ‘नंदन’ पत्रिकाएँ इनको आकर्षिक करती थी। जब पन्द्रह साल की उम्र हुई, तब एनबीटी द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में मीराबाई, प्रेमचंद, रेड-क्रॉस, खेल कूद, जीव-जंतु एनसीईआरटी की बाल मित्र विज्ञान माला के अतिरिक्त धर्मयुग, कांदबरी, सरिता जैसी पुस्तकें  ज्ञानवर्धन करती थी। इन किताबों के अध्ययन से हम भारत के गौरव इतिहास पुरुष जैसे महात्मा गांधी, गोपाल कृष्ण गोखले, चितरंजन दास, जवाहर लाल नेहरु, सुभाष चंद्र बोस की जीवनी के साथ-साथ भारत की लोक कथाएं, भूगोल, नदी-नालों, सांस्कृतिक धरोहरों, नृत्य-संगीत,साधु-संतों, स्थापत्य-कला, तीर्थ-स्थलों, खेल-कूदों तथा चित्रकारी-नक्काशी जैसी कलाओं से अवगत होते थे वहीं सचित्र विश्व-कोश के माध्यम से देश-दुनिया के कोनों-कोनों की जानकारी अर्जित करते थे।
बचपन की इन नींव की ईंटों पर निर्मित भवन न केवल बाल साहित्यकार के लिए अपरिहार्य है, वरन् हमारे देश के अच्छे नागरिक के लिए भी उतना ही जरूरी है। अतः   कह सकते हैं कि सुदृढ़ परिमार्जित बाल-साहित्य ही आगे जाकर देश की संस्कृति, साहित्य, राजनीति और सुव्यवस्थित सामाजिक प्रबंधन की आधारशिला बनती है।
कहते हैं  बाल-साहित्य का बचपन से ही गहन अध्येता रहे हैं। घर में दादी माँ पालने में इन्हें और उनके भाईयों को सुलाते समय अक्सर लोरियाँ सुनाती थी। यह ही नहीं, माँ के पास भी स्नान कराते समय, स्तन-पान कराते समय भी उनके पास अलग-अलग कविताएँ तैयार रहती थी। उनका भावात्मक कंठ, हाव-भाव, सरल मधुर भाषा और भाव-भंगिमाओं का प्रस्तुतीकरण आज भी दिलो-दिमाग पर छाया हुआ है। जो बचपन में था, आज पचपन में भी मन-मस्तिष्क पर अंकित है। दादी और माँ भले ही अनपढ़ थी, मगर उसकी अपनी भाषा थी। तो क्या उसका यह मौखिक शिशु साहित्य नहीं है? तो क्या उसका बड़े हुए, ‘अपारा’ (आज की भाषा में नर्सरी) में पढ़ने गए तो पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियाँ, देश भक्ति के गीत तथा देश-विदेशों की लोक-कथाएँ हमारे बाल-साहित्य की सामग्री बनी। विपुल शब्दों का संग्रह और सही उच्चारण हमारे स्वभाव में प्रवेश करने लगा।
 यह सत्य है, बाल- साहित्य बाल पाठकों के मनोविज्ञान उनके स्वभाव, रूचि, इच्छा आकांक्षा, कल्पना की उड़ान को तेज गति प्रदान करती थी। बड़ों के साहित्य की तरह उनके गीतों में बिंब, प्रतीक और मानसिक बोझलता का भाव नहीं रहता था। आज भी याद है, हमारे घर के पास बने श्रीयादेवी मंदिर में कृष्ण जन्मोसव के समय ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की,’ प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में कबड्डी खेलते समय ‘छल कबड़ी आल ताल, तेरी मूछें लाल-लाल, मर गए बिहारी लाल’और मछलीधर में तैरती मछलियों को देखकर मुहँ से स्वतः ‘भरा समंदर/गोपी चंदर/बोल मेरी मछली कितना पानी/कितना पानी’ जैसी अनेक बाल- कविताएँ निकलने लगती थी।
किशोरावस्था में प्रवेश करने लगे तो इनकी पसंद भी बदलने लगी थी, सरिता, धर्मयुग, उपन्यास, वैज्ञानिकों और साहित्यकारों की जीवनी पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ने लगी और आठवीं कथा में मुझे ‘पुस्तकालय को सर्वाधिक पुस्तकों’को पढ़ने के लिए वार्षिकोत्सव में सम्मानित किया गया। प्रधानाध्यापक द्वारा उनके हस्ताक्षर वाला प्रमाण-पत्र भी दिया गया, जिसे आज भी अपने पास संभाल कर रखा है ।  बचपन से ही इनको बाल-साहित्य के प्रति अगाध-प्रेम आनंदित करता रहा है।
 बाल साहित्य-पढ़ते समय कभी-कभी मन में पात्रों के प्रति करूणा पैदा होती थी, तो कभी-कभी खलनायक पात्रों के प्रति मन में क्रोध। कभी उत्साह, कभी प्रेरणा, कभी शांति, कभी अंतर्द्वनद,। उस समय यह पता नहीं था कि शृंगार, रौद्र, हास्य, वात्सल्य, वीर करूणा, शांत, भयानक आदि साहित्य के रस होते हैं। यह भी पता नहीं था कि बाल साहित्य की रसानुभूति से स्थायी भावों का संचरण होकर मेरा व्यक्तित्व में बदलाव हो रहा है। केवल इतना ही महसूस होता था कि वे किताबें पढ़ना अच्छी लगती थी। ग्यारहवीं के विज्ञान छात्र होने के कारण धीरे-धीरे पढ़ने का दायरा बढ़ता है।
उनका कहना है, जब अपने बच्चों के बाल-साहित्य पर दृष्टिपात करता हूँ तो अपने आप को असहाय पाता हूँ। आज घर में चंपक, नंदन, चंदा मामा, पराग, बाल भारती जैसी कोई पत्रिका नहीं आती है। आज घर में बच्चों के हाथ में पत्रिकाओं की जगह प्ले स्टेशन के बटन है जिससे वे कंप्यूटर गेम्स खेलते हैं। बच्चों की कहानियों की जगह मोबाइल में तरह-तरह के एप पर काम करते हैं। भाषा शैली भी पूरी तरह बदल गई है। बाल पाठक अंग्रेजी में काम करता है, कहीं ऐसा न हो जाय कि आगामी पीढ़ी के लिए यह राजभाषा बन जाए। हिन्दी के कठिन शब्द उन्हें समझ में नहीं आते हैं। साधारण बाल साहित्य उन्हें पसंद नहीं आ रहा है। उन्हें चाहिए हैरी पॉटर, स्पाइडर मैंन, हल्क आदि जैसी फिल्में। उन्हें चाहिए हिंदी और अंग्रेजी की मिली-जुली भाषा।  बचपन बदल रहा है। बच्चे बहुत जल्दी ही युवा और व्यस्क होते जा रहे हैं। जिन चीजों की जानकारी कभी हमें हमारी उम्र के विशेष पड़ाव तक नहीं होती थी, आज वे सारी जानकारियां उनकी उंगलियों की पहुंच में हैं।
आज बच्चें  डिजिटल मीडिया पर ई-बुको का वाचन करते हैं और मनोरंजक कम्प्यूटर गेम्स खेलते हैं। किताबों के विषय भी बदल गए हैं। परियों की कहानियों की जगह ‘एलिस फॉर द आइपैड’ प्रकाशित होती है। इन आई पैड पुस्तकों को पढ़ने की जरूरत नहीं है, एक बटन दबाने से किसी के द्वारा पुस्तक पढ़ने की आवाज आती रहती है, जिसे आप सुन सकते हैं। आप अपनी आवाज में उस पुस्तक का रिकॉर्ड कर सकते हैं। निस्संदेह विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है। कोई भी साहित्य अब स्थानीय साहित्य नहीं रहा, मल्टी-मीडिया संस्करण के कारण वैश्विक साहित्य में बदल चुका है। आज बचपन भी किसी विशेष ग्राम्यांचल से सबंधित नहीं रहा, वह भी पूरे विश्व से प्रभावित होने लगा है। आज हम परिवर्तन के दौर से गुजर रहे है।  अप्सराओं की क्लासिक डिज्नीलैंड की कहानियों पर फिल्में बन गई है। कहानी कहने के तरीके भी पूरी तरह बदल चुके हैं।  डिजिटल बुक, फिल्म ग्राफिक नॉवेल, एनिमेशन, कम्प्यूटर गेम्स सभी ने मुद्रित पुस्तकों की दुनिया में काफी बदलाव लाया है।
बचपन से ही बच्चे को कंप्यूटर की ओर आकर्षित किया जाता है। मल्टी मीडिया परिवेश में रहने वाला बच्चा अगर बहुत कुछ पाता है तो बहुत कुछ खोता भी है। कहानियाँ अपना रूप बदल रही है। हैरी पॉटर की कहानियाँ रपइटिंग के किताबों में मिलती है तो फिल्मों में भी अंतराष्ट्रीय पटल पर देश-विदेश की विभिन्न भाषाओं में बच्चों के पढ़ने का ढंग भी अभिसारित हो गया है। कहानियाँ बहुऐन्द्रिक संवेदनाओं का मिश्रण बन गई हैं अर्थात् अब कहानियाँ पढ़ी जाती है, सुनी जाती है देखी जाती हैं और इस प्रकार के बाल-साहित्य को ‘चिल्ड्रन लिटरेचर इन कन्वर्जेन्स कल्चर’ कह सकते हैं अर्थात् मल्टी मीडिया के सहयोग से निर्मित साहित्य। आज जब समय बदल रही है तो बाल साहित्य का रूप भी अपने रंग बदल रहा है। आधुनिक बाल साहित्य में स्कूलों की संसद की राजनीति, फैंटेसी परिवार, यथार्थवाद, इतिहास, युद्ध आदि के कथानकों पर आधारित कहानियाँ, काव्य, सुखांत और दुखांत नाटकों की विधाओं पर लेखन किया जा रहा है।
 देखा जाए तो संपूर्ण संसार में समकालीन बाल-साहित्य के संरक्षण तथा उसमें नई-नई प्रवृत्तियों को जोड़ने के लिए तरह-तरह के अभिनव प्रयोग किए जा रहे हैं। सुंदर सस्ती आकर्षक किताबें, खिलौने नये मीडिया वाले फार्मेट, गेम्स भाषा-शैली में बदलाव जारी है। मेक्डॉवेल माइल के अनुसार बच्चों की किताबें छोटी, मगर आत्मावलोकन वाली और प्रथम पुरुष में लिखी जानी चाहिए। जो बच्चों पर केन्द्रित हो, जिसमें आशावदिता के स्वर प्रस्फुटित होते हो और जो बच्चों में साहस, सादगी और नैतिकता की शिक्षा दे सके।
 बाल साहित्य की भाषा भद्दी नहीं होनी चाहिए, उसमें हिंसा और यौन कथानक नहीं हो और किताब के भीतर और बाहर का बालक निराशावादी कुंठाग्रस्त नहीं हो। बच्चे निर्दोष होते हैं, उनमें क्रूरता और हिंसा के भाव नहीं होते हैं, अतः बाल साहित्यकार को इस दिशा में अपने लेखन के दौरान पूर्ण रूपेण सचेत रहना चाहिए। उसे हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि वह व्यस्क है और बच्चे के लिए लिख रहा है तो उसकी आवाज में बच्चे के सुर होने चाहिए, न कि उसके अपने। उसकी भाषा, विवरण, स्पष्टीकरण-सभी में बच्चे का चेहरा झलकना चाहिए, न कि लेखक को अपना चेहरा। पीटर हॉलिनडेल अपने आलेख ‘साइन ऑफ चाइल्डनेस इन चिल्ड्रन’ज बुक’ में बाल्यावस्था और किशोरावस्था की योजक सीमा रेखा पर विशेष गुणवत्ता का ध्यान रखने का आह्वान किया है, क्योंकि उनका मानना है हर बच्चे में एक छुपा हुआ किशोर पाठक होता है हर किशोर में एक बच्चा अपनी पुनरावस्था को प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है।
अंत में वे कहते हैं कि इतना कहा जा सकता है कि किसी भी बाल-साहित्य पर आलोचनात्मक निबंध लिखना अत्यंत ही जटिल कार्य है, जिसमें बाल-पाठकों के मनोविज्ञान के अध्ययन के साथ-साथ साहित्यिक आलोचना के सिद्धान्तों के अनुरूप उनका विश्लेषण करना ज्यादा जरूरी है। आधुनिक युग में बच्चों की अभिरूचियाँ पूरी तरह से बदल चुकी है, अतः पारंपरिक बाल-साहित्य को भी अपना कलेवर बदलना आवश्यक है। नए-नए विषयों से कथानकों और अंतर्वस्तुओं की चयन कर नई भाषा-शैली में प्रस्तुतीकरण करना ही बाल-साहित्य को अक्षुण्णता की प्रमुख शर्त है।
संपर्क
दिनेश कुमार माली
क्वार्टर न॰ सी/34 ,लिंगराज टाउनशिप,
पो:-हंडिधुआ,तालचेर,
जिला:- अनुगुल 759102 (ओड़िशा)
मोबाइल : 9437059979, 94388783
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हलीम आईना राष्ट्रीय काव्य साहित्य सृजक सम्मान से अलंकृत

कोटा 25 फरवरी/ सरस्वती साहित्य संगम रावतसर (हनुमानगढ़ )के तत्वावधान में राष्ट्रीय कवि हलीम आईना को उनके चर्चित कविता संग्रह ‘आईना बोलता है!’ के लिए स्व. उषा देवी लालचंद सोनी स्मृति राष्ट्रीय काव्य साहित्य सृजक सम्मान -2025 से अलंकृत किया गया।        आईना को यह सम्मान द साइंस एकेडमी सभागार में मुख्य अतिथि डॉ. राजूराम बिजारणिया (लूनकरणसर ), अध्यक्ष विमल चाण्डक, मंच संचालक-सचिव डॉ.सुभाष सोनी ‘अनाम ‘एवं उनके परिजनों द्वारा  सम्मान -पत्र, शॉल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह ,तथा, इक्कावन सौ नकद राशि देकर सम्मानित किया।
इस अवसर पर हलीम आईना ने सबरस काव्य पाठ कर सब का मन मोह लिया।यह जानकारी देते हुए संस्था अध्यक्ष बद्री लाल दिव्य ने बताया कि हलीम आईना के अब तक तीन कविता संग्रह (हँसो भी, हँसाओ भी, हँसो, मत हँसो, आईना बोलता है ) प्रकाशित होकर चर्चित हैं। विगत चार दशकों से इनकी कविताएँ देश -विदेश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं एवं संकलनों में प्रकाशित होती रही हैं। साहित्य एवं काव्य मंचों पर हलीम आईना जाना पहचाना नाम है।
आईना के सम्मानित होने पर चाँद शेरी, डॉ. अतुल चतुर्वेदी, डॉ. कृष्णा कुमारी, डॉ. पुरुषोत्तम यक़ीन, डॉ. लखन शर्मा, आनन्द राठी, नेवालाल गुर्जर, डॉ. चंद्र शेखर सुशील, भगवती प्रसाद गौतम, किशन वर्मा, डॉ. अनिता वर्मा, रामदयाल मेहरा, समद राही, सिराज अहमद, लियाकत अंसारी, रजाक अंसारी आदि साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों ने बधाई प्रेषित की है।
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सम्मुख में विजय जोशी द्वारा सम्पादित ” सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक वैभव ” पर चर्चा

कोटा / जवाहर कला केंद्र जयपुर के कृष्णायन सभागार में “सम्मुख” के अन्तर्गत मंचासीन अतिथि अभीषेक तिवारी, नंद भारद्वाज और ईश्वर चंद्र माथुर के सान्निध्य में लेखक साहित्यकार नंद भारद्वाज, देवांशु पद्मनाभ एवं विजय जोशी की पुस्तकों पर चर्चा और कविता पाठ हुआ।
 मंचासीन अतिथियों ने अपने उद्बोधन में चर्चित पुस्तकों पर कहा कि अपनी संस्कृति और सामाजिक संरचना को समझने के लिए ऐसी पुस्तकों को पढ़ना आवश्यक है जो अपने समय को जानने और परखने का अवसर देती हैं।
इस अवसर पर कथाकार एवं समीक्षक विजय जोशी ने अपने संपादन में प्रकाशित ’’सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक वैभव“ के बारे में बताया कि इसमें पुरातत्वविद् रमेश वारिद के समय-समय पर अपनी समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक गरिमा और वैभवशाली पुरासम्पदा पर लिखित एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित चयनित आलेखों का संचयन है। इन आलेखों में शैव दर्शन, शिव पूजन परम्परा और पुरातात्विक सांस्कृतिक एवं कलात्मक चिंतन गहराई से विवेचित हुआ है।
लेखक साहित्यकार नंद भारद्वाज एवं देवांशु पद्मनाभ ने चर्चा में अपनी पुस्तकों का परिचय देकर उनके विशेष सन्दर्भों को उल्लेखित किया। कवयित्री अभिलाषा पारीक, कामना राजावत और शारदा कृष्ण सहित युवा कवि किशन प्रणय ने कविताओं की प्रस्तुति से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया।
कार्यक्रम के संयोजक प्रमोद शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बताया कि साहित्य एवं कला को प्रोत्साहित करने के लिए हर माह यह कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। संचालन अभिलाषा पारीक ने किया।
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न्यायप्रिय और शौर्य की प्रतिमूर्ति महाराज विक्रमादित्य

(विक्रमोत्सव-2025 के अवसर पर विशेष )
भारतवर्ष का इतिहास अनेक न्यायप्रिय और अदम्य साहस दिखाने वाले शासकों से पुष्पित-पल्लवित है। दुर्भाग्य से ऐसे शासकों के प्रति हमारी नवागत पीढ़ी अनजान सी है या उन्हें आधी-अधूरी जानकारी दी गई। मालवा के महाराज विक्रमादित्य से भला कौन परिचित नहीं है? लेकिन नवागत पीढ़ी को यह नहीं मालूम कि विक्रमादित्य के शौर्य भारत के अलावा आसपास के देशों में भी रहा है। विक्रमादित्य पर विपुल साहित्य लिखा गया। महाराज विक्रमादित्य ने किस तरह विक्रम संवत की स्थापना की। विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन विक्रमादित्य द्वारा उज्जैन से किया गया। उज्जैन परम्परा से ही काल गणना का एक प्रमुख केंद्र माना जाता रहा और इसीलिए अरब देशों में भी उज्जैन को अजिन कहा जाता रहा। सभी ज्योतिष सिद्धांत ग्रंथों में उज्जैन को मानक माना गया है। आज जो वैश्विक समय के लिए ग्रीनविच की स्थिति है, वह ज्योतिष के सिद्धांत काल में और उसके बाद सैंकड़ों वर्षों तक उज्जैन की रही। यह भी निर्विवाद है कि ज्योतिर्विज्ञान उज्जैन से यूनान और एलेक्जेंड्रिया पहुँचा। काल गणना केंद्र होने से उज्जैन को विश्व के नाभि स्थल की मान्यता भी रही है- ‘स्वाधिष्ठानं स्मृता कांची मणिपूरमवंतिका। नाभि देशे महाकालस्यन्नाम्ना तत्र वै हर:।’ साथ ही महाकालेश्वर की उज्जैन में अवस्थिति काल के विशेष संदर्भ की द्योतक है। इस प्रकार विक्रम सम्वत् ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार भी एक विशेष महत्व रखता है।
भारतवर्ष में विक्रमादित्य युग परिर्वतन और नवजागरण की एक महत्वपूर्ण धुरी रहे हैं। और उनके द्वारा प्रवर्तित विक्रम सम्वत् हमारी एक अत्यंत मूल्यवान धरोहर है। यह भारतीयजन के लिए एक शक्ति और आत्माभिमान का स्रोत भी है। यह भी एक बड़ा कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने भारत गौरव तथा ज्ञान संपदा के प्रमाणों, साक्ष्यों, पुस्तकों, स्थापत्यों के सुनियोजित विनाश का अभियान चलाया। हमारी संपदा को विध्वंस किये जाने के प्रमाण लगातार मिलते रहे हैं। इस अभियान को उपनिवेशवादी इतिहासकारों ने भी अपना भरपूर समर्थन दिया। इन सभी की दुरभिसंधि यही थी कि भारत ज्ञान, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, आर्थिकी का नहीं बल्कि अंधेरे का क्षेत्र भर था, जिसके उद्धार के लिए गोरांगप्रभु जन ने देश को लूटा, मिटाया और फिर आधुनिक युग में प्रवेश का टिकट दिया, कृपा पूर्वक। उन्होंने दुनिया की तमाम सभ्यताओं के साथ यही कुछ किया. पश्चिम अभिमुख मानस के इतिहासकारों ने इसी क्रम में विक्रमादित्य को भी ध्वस्त करने की सचेत कोशिश की। ऐसे ही एक इतिहासकार डी. सी. सरकार ने विक्रमादित्य की परंपरा को अनैतिहासिक सिद्ध करने का सघन प्रयास किया। उन्होंने एन्शिएंट मालवा एंड दि विक्रमादित्य ट्रेडिशन की भूमिका में दो टूक कहा कि ईस्वी पूर्व प्रथम शती में पारंपरिक विक्रमादित्य के लिए कोई जगह नहीं है. अलबत्ता उन्होंने माना कि विक्रम सम्वत् की स्थापना विक्रमादित्य ने ही की। लेकिन वह उज्जैन के विक्रमादित्य नहीं हैं. लेकिन विक्रम सम्वत् का अस्तित्व उन्होंने या उन जैसे इतिहासकारों ने स्वीकार किया।
मालव गणों ने शकों को पराजित ही नहीं किया बल्कि उन्हें भारत भूमि छोड़ेने को विवश किया। मालव गणों ने शकों को परास्त कर अवंति क्षेत्र को मालवभूमि बनाया। इसी तिथि से अवंति मालवा कहलाने लगी और विजय तिथि के स्मारक स्वरूप विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन हुआ, जिसे कभी-कभी कृत और मालव सम्वत् के रूप में भी संबोधित किया जाता रहा। सम्वत् प्रवर्तन के साथ साथ नये सिक्के भी चलाये गये।
सिक्कों पर अंकित किया गया- ‘मालवान (नां) जय(य:)’. इसी विजय और गण के अवंति में प्रतिष्ठित होने के समय से आगे की काल गणना के लिए मालव सम्वत् या कहें कि विक्रम सम्वत् प्रशस्त हुआ।
भारतीय संस्कृति पर अभिमान करने वालों के लिए यह निश्चय ही गौरव करने योग्य है कि आज भारत वर्ष में प्रवर्तित विक्रम सम्वत्सर बुद्धनिर्वाणकाल गणना को छोड़ कर संसार के प्राय: सभी ऐतिहासिक सम्वतों में प्राचीन है। यह भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना है। विक्रम सम्वत् के उद्भव तक विशुद्ध वैदिक संस्कृति का काल, रामायण और महाभारत का युग, महावीर गौतम बुद्ध का समय, चंद्रगुप्त मौर्य एवं प्रियदर्शी अशोक, पुष्यमित्र शुंग की साहसगाथा, वेद, पुराण, सूत्रग्रंथ एवं स्मृतियों की रचना भारतवर्ष में हो चुकी थी, वैयाकरण पाणिनी और पतंजलि और चाणक्य के पांडित्य तथा राजनीतिक बुद्धिमत्ता चतुर्दिक फैल चुकी थी। विक्रमादित्य का समय भारशिवनागों, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, यशोवर्मन, विष्णुवद्र्धन के बल और प्रताप की चमक से विश्व को चमत्कृत करने का समय था, यह ही वह समय था जब दुनिया कई भागों में भारत की संस्कृति व भारत के धर्म की सुगंधि विस्तारित थी। कालिदास, भवभूति, भारवि, भतृहरि, वराहमिहिर, माघ, दंडी, बाणभट्ट, धन्वन्तरि, कुमारिल भट्ट, आद्य शंकराचार्य, नागार्जुन, आदि की रचनाप्रतिभा चतुर्दिक व्याप्त थी।
विक्रमादित्य के अस्तित्व की गुत्थी भी विक्रम सम्वत् की वजह से अधिक उलझी लगती है क्योंकि विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन विदेशी आक्रांता शकों की पराजय और उन्हें देश से बाहर भगाने से आबद्ध हैं। और उपनिवेशवादी मानस इस बात को स्वीकारने के लिए तत्पर ही नहीं है कि भारतवर्ष में विदेशियों को मार भगाने का साहस कभी रहा भी था। विक्रमादित्य उन चुनिंदा शासकों में से थे जिन्होंने देश को विदेशी हमलावरों से मुक्ति दिलाई और इस महती उपलब्धि के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य ने विक्रम सम्वत् का प्रवर्तन किया। मान्यता यह भी है कि जनता के ऋण मुक्त होने के अवसर पर उज्जैन में ऋण मुक्तेश्वर महादेव मंदिर तत्समय ही स्थापित हुआ होगा। कथा सरित्सागर में उल्लिखित है ही कि -‘‘न मे राष्ट्रे पराभूतो न दरिद्रो न दुखित:।’ विक्रमादित्य सब लोगों के हितों की रक्षा करता था। उसके राज्य में न कोई दुखी था,न दरिद्र था और न कोई पराभूत। शकों पर अप्रतिम विजय के कारण विक्रमादित्य शकारि भी कहलाये और अप्रतिम साहस प्रदर्शन के कारण साहसांक भी।
मध्यप्रदेश सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रदेश है और इस श्रृंखला में विक्रमोत्सव का आयोजन प्रदेश को एक नई पहचान देगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि नेपाल जैसे राष्ट्र में विक्रम संवत से कैलेंडर प्रचलन में है. सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन और अन्य महत्वपूर्ण पक्षों की जानकारी पाठ्यक्रम में भी सम्मिलित की जाए। विक्रमोत्सव की सम्पूर्ण परिकल्पना मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की है।  विक्रमोत्सव महाशिवरात्रि से आरंभ होकर सृष्टिकर्ता महादेव के महोत्सव से सृष्टि के आरंभ दिवस वर्ष प्रतिपदा 30 मार्च तक चलेगा। इस विराट आयोजन में सम्राट विक्रमादित्य के युग, भारत उत्कर्ष, नवजागरण और भारत विद्या पर केंद्रित रहेगा. इसके तहत साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही ज्योतिर्विज्ञान, विचार गोष्ठियां, इतिहास और विज्ञान समागम, विक्रम व्यापार मेला, लोक एवं जनजातीय संस्कृति पर आधारित गतिविधियां संचालित होंगी।
विक्रमोत्सव में 27 फरवरी से आर्ष भारतीय ऋषि वैज्ञानिक परंपरा, विक्रमकालीन मुद्रा एवं मुद्रांक, श्रीकृष्ण की 64 कलाएँ (मालवा की चितरावन शैली में), श्रीकृष्ण होली पर्व, चौरासी महादेव, जनजातीय प्रतिरूप, सम्राट विक्रमादित्य और अयोध्या, प्राचीन भारतीय वाद्य यंत्र, देवी 108 स्वरूप और देवी अहित्या पर निर्मित स्थापत्य पर प्रदर्शनियां लगाई जाएंगी. साथ ही शैव परंपरा एवं वास्तु-विज्ञान, भारत में संवत परंपरा-वैशिष्ट्य एवं प्रमाण पर शोध संगोष्ठी होगी. वायलिन वादक अनुप्रिया देवेताले अपनी प्रस्तुति देंगी. एक से 3 मार्च 2025 तक वैचारिक समागम के अंतर्गत सम्राट विक्रमादित्य का न्याय विषय पर मंथन होगा. आठ मार्च को लोक रंजन में बोलियों का अखिल भारतीय कवि सम्मेलन होगा. विक्रमोत्सव में दस से 12 मार्च तक अंतर्राष्ट्रीय इतिहास समागम होगा. पन्द्रह से 16 मार्च तक संहिता ज्योतिष एवं वैशिष्ट्य एवं आचार्य वराह मिहिर पर संगोष्ठी, 21 मार्च से महादेव शिल्पकला कार्यशाला तथा प्रतिदिन मांडना शिविर लगाए जाएंगे. इसी क्रम में 21 से 25 मार्च तक पौराणिक फिल्मों का अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव, आदि बिम्ब के अंतर्गत जनजातीय संस्कृतिक पर केंद्रित फिल्मों का प्रदर्शन होगा. साथ ही 21 से 29 मार्च तक विक्रम नाट्य समारोह, वेद अंताक्षरी, 22 मार्च को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, 26-28 मार्च को राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन और विज्ञान उत्सव होगा.
(लेखक स्तंभकार हैं और कला व संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन करते हैं)

महाकुंभ ने रचा इतिहास : योगी सरकार का अतुल्य प्रयास

उत्तर प्रदेश के प्रयाग में आयोजित महाकुंभ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। चूंकि उत्तर प्रदेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध राज्य है, इसलिए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। इसके अंतर्गत योगी सरकार ने महाकुंभ के भव्य आयोजन के लिए 6,990 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। उन्होंने महाकुंभ के सफल आयोजन के लिए संबंधित अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए थे।
उल्लेखनीय है कि प्रयागराज में 13 जनवरी को पौष पूर्णिमा स्नान के साथ कुंभ मेले का शुभारंभ हुआ था तथा 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान के साथ इसका समापन हो गया। इस समयावधि में 50 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने स्नान किया। शाही स्नान 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर, 29 जनवरी को मौनी अमावस्या पर, 3 फरवरी को बसंत पंचमी पर, 12 फरवरी को माघी पूर्णिमा पर तथा 26 फरवरी को महाशिवरात्रि पर हुआ। इन विशेष दिनों में श्रद्धालुओं की अत्यधिक भीड़ अधिक देखी गई।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ सहित देश के लगभग सभी राजनेता, अभिनेता, खिलाड़ी, व्यवसायी आदि संगम में स्नान कर चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संगम में डुबकी लगाई। इसके पश्चात उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि महाकुंभ में आज पवित्र संगम में डुबकी लगाकर मैं भी करोड़ों लोगों की तरह धन्य हुआ। मां गंगा सभी को असीम शांति, बुद्धि, सौहार्द और अच्छा स्वास्थ्य दें।
गृहमंत्री अमित शाह ने संगम में स्नान करने के पश्चात कहा कि कुंभ हमें शांति और सौहार्द का संदेश देता है। कुंभ आपसे यह नहीं पूछता है कि आप धर्म, जाति या संप्रदाय से हैं। यह सभी लोगों को गले लगाता है। इससे पूर्व उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था कि महाकुंभ’ सनातन संस्कृति की अविरल धारा का अद्वितीय प्रतीक है। कुंभ समरसता पर आधारित हमारे सनातन जीवन-दर्शन को दर्शाता है। आज धर्म नगरी प्रयागराज में एकता और अखंडता के इस महापर्व में संगम स्नान करने और संतजनों का आशीर्वाद लेने के लिए उत्सुक हूं।
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी संगम में दुबकी लगाई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
आज तीर्थराज प्रयागराज में, भारत की शाश्वत आध्यात्मिक विरासत और लोक आस्था के प्रतीक महाकुंभ में स्नान-ध्यान करके स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूं।
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विगत दिसंबर में महाकुंभ के दृष्टिगत प्रयागराज में लगभग 5500 करोड़ रुपये की विभिन्नम विकास परियोजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्याृस किया था। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह विश्व के सबसे बड़े समागमों में से एक है, जहां 45 दिनों तक चलने वाले महायज्ञ के लिए प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं का स्वागत किया जाता है और इस अवसर के लिए एक नया नगर बसाया जाता है। प्रयागराज की धरती पर एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि महाकुंभ, देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को नए शिखर पर ले जाएगा। उन्होंने कहा कि एकता के ऐसे महायज्ञ की चर्चा संपूर्ण विश्व में होगी।
भारत को पवित्र स्थलों और तीर्थों की भूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि यह गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और कई अन्य असंख्य नदियों की भूमि है। प्रयाग को इन नदियों के संगम, संग्रह, समागम, संयोजन, प्रभाव और शक्ति के रूप में वर्णित करते हुए तथा कई तीर्थ स्थलों के महत्व और उनकी महानता के बारे में बताते हुए उन्होंने  कहा कि प्रयाग केवल तीन नदियों का संगम नहीं है, अपितु उससे भी कहीं अधिक है। यह एक पवित्र समय होता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब सभी दिव्य शक्तियां, अमृत, ऋषि और संत प्रयाग में उतरते हैं। प्रयाग एक ऐसा स्थान है जिसके बिना पुराण अधूरे रह जाएंगे। प्रयाग एक ऐसा स्थान है जिसकी स्तुति वेदों की ऋचाओं में की गई है। प्रयाग एक ऐसा स्थान है, जहां हर कदम पर पवित्र स्थान और पुण्य क्षेत्र हैं। प्रयागराज के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने एक संस्कृत श्लोक पढ़ा और इसे समझाते हुए कहा कि त्रिवेणी का प्रभाव, वेणीमाधव की महिमा, सोमेश्वर का आशीर्वाद, ऋषि भारद्वाज की तपस्थली, भगवान नागराज वसु जी की विशेष भूमि, अक्षयवट की अमरता और ईश्वर की कृपा यही हमारे तीर्थराज प्रयाग को बनाती है। प्रयागराज एक ऐसी जगह है, जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों तत्व उपलब्ध हैं। प्रयागराज केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, यह आध्यात्मिकता का अनुभव करने की जगह है।
उन्होंने कहा कि महाकुंभ हमारी आस्था, आध्यात्म और संस्कृति के दिव्य पर्व की विरासत की जीवंत पहचान है। हर बार महाकुंभ धर्म, ज्ञान, भक्ति और कला के दिव्य समागम का प्रतीक होता है। संगम में डुबकी लगाना करोड़ों तीर्थ स्थ लों की यात्रा के बराबर है। पवित्र डुबकी लगाने वाला व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। आस्था का यह शाश्वत प्रवाह विभिन्न सम्राटों और राज्यों के शासनकाल, यहां तक कि अंग्रेजों के निरंकुश शासन के दौरान भी कभी नहीं रुका और इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि कुंभ किसी बाहरी ताकतों द्वारा संचालित नहीं होता है। कुंभ मनुष्य की अंतरात्मा की चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, वह चेतना जो भीतर से आती है और भारत के हर कोने से लोगों को संगम के तट पर खींचती है। गांवों, कस्बों, शहरों से लोग प्रयागराज की ओर निकलते हैं और सामूहिकता और जनसमूह की ऐसी शक्ति शायद ही कहीं और देखने को मिलती है।
एक बार महाकुंभ में आने के बाद हर कोई एक हो जाता है, चाहे वह संत हो, मुनि हो, ज्ञानी हो या आम आदमी हो और जाति-पंथ का भेद भी खत्म हो जाता है। करोड़ों लोग एक लक्ष्य और एक विचार से जुड़ते हैं। महाकुंभ के दौरान विभिन्न राज्यों से अलग-अलग भाषा, जाति, विश्वास वाले करोड़ों लोग संगम पर एकत्र होकर एकजुटता का प्रदर्शन करते हैं। यही उनकी मान्यता है कि महाकुंभ एकता का महायज्ञ है, जहां हर तरह के भेदभाव का त्याग किया जाता है और यहां संगम में डुबकी लगाने वाला हर भारतीय एक भारत, श्रेष्ठ भारत की सुंदर तस्वीर पेश करता है।
उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में कुंभ के महत्व पर बल दिया और बताया कि कैसे यह हमेशा से संतों के बीच महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों और चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श का मंच रहा है। उन्होंने कहा कि जब अतीत में आधुनिक संचार के माध्य्म मौजूद नहीं थे, तब कुंभ महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तनों का आधार बन गया, जहां संत और विद्वान राष्ट्र के कल्याण पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए और वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया, जिससे देश की विचार प्रक्रिया को नई दिशा और ऊर्जा मिली। आज भी कुंभ एक ऐसे मंच के रूप में अपना महत्व बनाए हुए है, जहां इस तरह की चर्चाएं जारी रहती हैं, जो पूरे देश में सकारात्मक संदेश भेजती हैं और राष्ट्रीय कल्याण पर सामूहिक विचारों को प्रेरित करती हैं। भले ही ऐसे समारोहों के नाम, उपलब्धि और मार्ग अलग-अलग हों, लेकिन उद्देश्य और यात्रा एक ही है। कुंभ राष्ट्रीय विमर्श का प्रतीक और भविष्य की प्रगति का एक प्रकाश स्तंभ बना हुआ है।
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर मौजूदा सरकार के तहत भारत की परंपराओं और आस्था के प्रति गहरा सम्मान है। केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें कुंभ में आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं प्रदान करना अपनी जिम्मेदारी मानती हैं। सरकार का लक्ष्यक विकास के साथ-साथ भारत की विरासत को समृद्ध करना भी है।
कुंभ सहायक
केंद्र एवं राज्य सरकारों ने महाकुंभ में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा। कुंभ के लिए पहली बार एआई और चैटबॉट तकनीक के उपयोग को चिह्नित करते हुए ‘कुंभ सहायक’ चैटबॉट का शुभारंभ किया गया, जो ग्यारह भारतीय भाषाओं में संवाद करने में सक्षम है। इससे लोगों को बहुत लाभ हुआ।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गत 10 जनवरी को प्रयागराज स्थित सर्किट हाउस से महाकुंभ 2025 को समर्पित आकाशवाणी के विशेष एफएम चैनल‘कुंभवाणी एवं ‘कुंभ मंगल ध्वनि का लोकार्पण किया। उन्होंने कुंभ मंगल ध्वनि का भी लोकार्पण किया। उन्होंने कहा था कि कुम्भवाणी द्वारा प्रसारित आंखों देखा हाल उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभदायक होगा, जो कुंभ में भाग लेने के लिए प्रयागराज नहीं आ सकेंगे। यह इस ऐतिहासिक महाकुंभ के माहौल को देश व दुनिया तक पहुंचाने में सहायक होगा। देश के लोक सेवा प्रसारक प्रसार भारती की ये पहल न केवल भारत में आस्था की ऐतिहासिक परंपरा को बढ़ावा देगी, अपितु श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण जानकारी देगी व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का घर बैठे अनुभव करवाएगी।
उल्लेखनीय है कि योगी सरकर ने महाकुंभ से पूर्व प्रयागराज के ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया। इसके साथ-साथ मंदिरों का नवीनीकरण भी किया गया। इसके अतिरिक्त राज्य में हरित क्षेत्र के विस्तार को बढ़ावा दिया गया। विशेषकर प्रयागराज जिले में सड़कों के किनारे पौधे लगाए गए। यह भी उल्लेखनीय है कि स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया गया। क्षेत्रों को पॉलीथिन से मुक्त रखने का भी प्रयास किया गया। इसके अंतर्गत महाकुंभ में सिंगल यूज्ड प्लास्टिक पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। मेले में प्राकृतिक उत्पाद जैसे दोना, पत्तल, कुल्हड़ एवं जूट व कपड़े के थैलों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया। योगी सरकार ने श्रद्धालुओं की प्रत्येक सुविधा का ध्यान रखा। इसके अंतर्गत यातावात की भी समुचित व्यवस्था की गई। प्रयागराज आने वाली बसों, रेलगाड़ियों एवं वायुयान की संख्या में वृद्धि की गई। महाकुंभ के लिए रेलवे द्वारा लगभग 1200 रेलगाड़ियां तथा परिवहन विभाग द्वारा सात हजार बसों का संचालन किया गया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं हवाई जहाज से मेला स्थल का निरीक्षण किया। इसलिए यह कहना उचित है कि महाकुंभ के सफल आयोजन के लिए योगी सरकार बधाई की पात्र है।
लेखक – लखनऊ विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर है।

पश्चिम रेलवे का लोअर परेल कारखाना : एक घड़ी जो इतिहास की विरासत है

एक शताब्दी से भी अधिक पुरानी हेरिटेज घड़ी और ट्यून्ड बेल रेलवे के  समृद्ध इतिहास की जीवंत गवाही प्रस्‍तुत कर रही है

लोअर परेल वर्कशॉप की हेरिटेज घड़ी: एक कालातीत विरासत

मुंबई के पश्चिम रेल्वे के लोअर परेल वर्कशॉप में मुख्य प्रवेश द्वार के सामने स्थित फिएट बोगी शॉप की दीवार पर हेरिटेज क्लॉक लगी हुई है – जो इतिहास का एक उल्लेखनीय पन्‍ना है, जो 1889 से अनवरत चल रही है। इंग्लैंड के क्रॉयडन की मेसर्स गिलेट एंड कंपनी द्वारा निर्मित यह प्रतिष्ठित घड़ी न केवल एक समय मापने वाला उपकरण है, बल्कि शिल्प कौशल, विरासत और लोअर परेल वर्कशॉप की स्थायी विरासत का प्रतीक है।

हेरिटेज क्लॉक को 1889 में इंग्लैंड के क्रॉयडन में यूनियन रोड सुविधा में मेसर्स गिलेट एंड कंपनी द्वारा तैयार किया गया था, जो 1844 से अपनी घड़ी बनाने की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध कंपनी है। इसकी स्थापना लोअर परेल वर्कशॉप की स्थापना के साथ हुई, जिससे यह वर्कशॉप के गौरवशाली अतीत का एक अभिन्न अंग बन गया। दशकों से घड़ी ने कारखाने के विकास को देखा है, जो समय बीतने के मूक प्रहरी के रूप में आज भी विद्यमान है।

हेरिटेज क्लॉक मैकेनिकल इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है। 213 सेमी के समग्र व्यास और 152 सेमी के डायल व्यास के साथ यह एक प्रभावशाली संरचना है जो ध्यान आकर्षित करती है। घड़ी पीतल के घटकों से बने एक सावधानीपूर्वक डिज़ाइन किए गए गियर ट्रेन के माध्यम से संचालित होती है, जिसे जंग के प्रतिरोध के लिए चुना जाता है। घड़ी को चालू रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा एक धातु स्प्रिंग में संग्रहीत होती है, जिसे निर्बाध संचालन सुनिश्चित करने के लिए सप्ताह में एक बार घुमाया जाता है।

इस घड़ी को जो चीज वाकई उल्लेखनीय बनाती है, वह है इसकी सादगी और मजबूती। इसके कॉम्पैक्ट मैकेनिज्म को न्यूनतम रखरखाव की आवश्यकता होती है, जो इसके रचनाकारों की सरलता का प्रमाण है। अपनी उम्र के बावजूद, घड़ी सटीकता के साथ काम करना जारी रखती है, जो 19वीं सदी की शिल्पकला को ट्रिब्‍यूट है।

लोअर परेल स्थित कैरिज एंड वैगन वर्कशॉप के मुख्य कारखाना प्रबंधक श्री परिवेश साहू सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण और रख-रखाव को महत्‍व देते हैं। यह एक सराहनीय प्रयास है जो इस लंबे और संजोए हुए इतिहास की सुरक्षा में योगदान देता है।

हेरिटेज घड़ी के रख-रखाव का काम लोअर परेल वर्कशॉप के मिलराइट शॉप के दो वरिष्ठ तकनीशियनों, श्री राजकुमार सरोज और श्री नॉर्बर्ट डिमेलो को सौंपा गया है, जो अपने समर्पण के साथ 1990 से इस प्राचीन घड़ी के संरक्षक रहे हैं।

इन तकनीशियनों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, जिन्हें न केवल हेरिटेज घड़ी बल्कि कारखाना के भीतर सभी GA कार्ड टाइम-पंचिंग घड़ियों के रख-रखाव की जिम्मेदारी दी गई है। उनकी अटूट प्रतिबद्धता यह सुनिश्चित करती है कि ये ऐतिहासिक घड़ियाँ सुचारू रूप से चलती रहें, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए अपनी विरासत को संरक्षित रखें।

इस जगह के ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाने के लिए एक ट्यून्ड घंटी भी है, जिसे 1890 में मेसर्स गिलेट एंड कंपनी ने बनाया था। हेरिटेज क्लॉक के ठीक नीचे स्थित इस घंटी पर कास्ट नंबर 122 अंकित है और इसका वजन 57 किलोग्राम है। 425 मिमी व्यास और 430 मिमी की ऊंचाई के साथ यह कंपनी की शिल्पकला का एक बेहतरीन उदाहरण है। साथ में, घड़ी और घंटी एक सामंजस्यपूर्ण जोड़ी बनाते हैं, जो लोअर परेल वर्कशॉप के समृद्ध इतिहास को प्रतिध्वनित करते हैं।

हेरिटेज घड़ी और ट्यून की गई घंटी सिर्फ़ कलाकृतियाँ नहीं हैं; वे हमारे पहले आए लोगों की सरलता और समर्पण की जीवंत याद दिलाती हैं। वे लोअर परेल वर्कशॉप की स्थायी भावना और अपनी विरासत को संरक्षित करने की प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में खड़े हैं।

जैसे-जैसे घड़ी चलती रहती है और घंटी बजती है, वे हमें सटीकता, शिल्प कौशल और हमारे अतीत का सम्मान करने के महत्व के कालातीत मूल्यों की याद दिलाती हैं। हेरिटेज घड़ी सिर्फ़ इतिहास का अवशेष नहीं है – यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक प्रकाश स्तंभ है।