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4 अप्रैल को हनुमान जयंती पर चंद्र ग्रहण

हनुमान जयंती के दिन इस बार पूर्णिमा तिथि पड़ रही है। वर्षों बाद इसी दिन चंद्रग्रहण भी पड़ रहा है।  4 अप्रैल को दोपहर 3.46 बजे ग्रहण का सूतक लग जाएगा।  5.28 को मध्यकाल, 5.33 को अंत तथा 7.15 बजे ग्रहण का मोक्ष होगा। अर्थात 3.46 से 7.15 बजे तक चंद्रग्रहण का असर रहेगा। हनुमानजी के दर्शन मोक्ष होने के बाद रात 7.15 बजे के बाद ही किए जा सकेंगे।   सूतक काल में मंदिरों के पट भी बंद रहेंगे। इसी दिन शाम 6.15 बजे चंद्रोदय होगा। पूर्वोत्तर राज्यों में जल्द सूर्योदय होता है और असर भी जल्द हो जाता है। इसलिए मोघालय में चंद्रग्रहण अच्छे से दिखाई देगा।

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पत्रकार सलमा जैदी का निधन

बीबीसी से लंबे समय तक जुड़ी रहीं वरिष्ठ पत्रकार सलमा जैदी का रविवार को लंदन में निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थीं और वहीं उनका इलाज चल रहा था।

वह बीबीसी हिंदी रेडियो पर एक जानी-मानी आवाज थीं और हिंदी भाषा में डिजिटल दुनिया में काम कर रही चंद महिलाओं में शुमार थीं। उन्होंने बीबीसी में अपनी पारी की शुरुआत बीबीसी हिंदी रेडियो से की थी। बाद में वह बीबीसी हिंदी ऑनलाइन की प्रमुख बनीं। बीबीसी में उन्होंने महिलाओं, अल्पसंख्यकों और बच्चों से जुड़े विषयों पर विशेष काम किया।

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इ मेल मार्केटिंग को भारत में एक नया आयाम दिया है कल्पित जैन ने

ई-मेल मार्केटिंग बाजार की नई शैली है। दुनिया भर में 2.5 अरब ईमेल यूजर्स हैं और इसके जरिए कमर्शियल मेसेज भेजना एक लोकप्रिय ट्रेंड है। नेटकोर ( Netcore)  के सीओओ कल्पित जैन का मानना है कि आने वाले समय में यह नया बाजार खड़ा करेगा। पेश हैं कल्पित से एक बातचीत-

नेटकोर  ने कुछ साल पहले ई-मेल मार्केटिंग की शुरुआत की थी। तब से अब तक प्रचार और उपभोक्ताओं की आदतों में क्या बदलाव हुए हैं?

हमने पांच साल पहले इसकी शुरुआत की थी और अब हमारा रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट अच्छा है। देश में इंटरनेट उपभोक्ता बढ़े हैं और ईमेल्स भी। 

आपके ऑपरेशंस का स्केल क्या है?

हम हर महीने 300 से 350 करोड़ ईमेल भेजते हैं यानी हर मिनट करीब 1 लाख ईमेल। हम भारत के 1000 से 2000 ब्रैंड्स के साथ काम कर रहे हैं और ई-मेल मार्केटिंग के नंबर वन प्लेयर हैं।

भारत में ई-मेल मार्केटिंग का क्या सीन है?

हमारे देश में ई-मेल मार्केटिंग का कुल बाजार 125-150 करोड़ रुपए का है। पांच साल पहले यह 20-25 करोड़ रुपए का था। इस समय देश के कुल डिजिटल रेवेन्यू में ई-मेल मार्केटिंग की हिस्सेदारी 25-30 पर्सेंट है। हर साल ईमेल मार्केटिंग में 75 से 80 पर्सेंट की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण ई-कॉमर्स और BFSI हैं।

ई-मेल मार्केटिंग का अगला चरण क्या है?

अगला चरण मार्केटिंग ऑटोमेशन है। बहुत सी ई-कॉमर्स कंपनियां इस तरफ बढ़ रही हैं। इसलिए हम मार्केटिंग ऑटोमेशन जैसी क्षमता विकसित करने की दिशा में काम कर रहे है।

मोबाइल डिवाइस के बढ़ने से ग्राहकों के लिए ई-मेल देखना आसान हुआ है और मार्केटिंग कैंपेन्स पर भी असर हुआ है। आप क्या कहना चाहेंगे?

दो साल पहले सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत लोग ही मोबाइल पर ई-मेल्स चेक करते थे। आज 35 से 40  प्रतिशत लोग ऐसा करते हैं। ईमेल सबसे ज्यादा  प्रयोग किया जाने वाला ऐप है और इसका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ई-मेल कैपेन्स दूसरी ऐप्लीकेशंस, एसएमएस से भी जोड़े जा रहे हैं। इस प्रक्रिया को डीपलिंकिंग कहा जाता है। इसमें हम मल्टी चैनल कम्युनिकेशन करते हैं। इसके अलावा हमारा एक प्लेटफॉर्म है MARtech  जिसमें एक प्लेटफॉर्म पर इन सभी माध्यमों को जोड़ा जाता है। एक क्लाइंट अपनी मैसेजिंग के एक हिस्से को sms से तो दूसरे हिस्से को ई-मेल के जरिए भेज सकता है। यह ईमेल मार्केटिंग का अगला चरण है।

नेटकोर के लिहाज से, ई-मेल मार्केटिंग आने वाले सालों में आपके लिए कितनी महत्वपूर्ण होगी?

अगले दो से तीन सालों में ई-मेल मार्केटिंग से हमें 50 से 55 प्रतिशत राजस्व मिलेगा।

आपके अनुसार, दूसरे माध्यमों की तुलना में ई-मेल कितना लाभकारी माध्यम है?

देखिए ऐसी रिपोर्ट्स हैं जो कहती हैं कि हर ई-मेल, जिस पर आप 1 डॉलर खर्च करते हैं, आपको 40 डॉलर का रिटर्न मिलता है। ई-मेल दूसरी डिजिटल मार्केटिंग के मुकाबले एक पुश नोटिफिकेशन है। इसीलिए बहुत सी ई-कॉमर्स कंपनियां इसे चुनती हैं। हमारे कुल ई-मेल रेवेन्यू का 20 से 25 पर्सेंट हिस्सा ई-कॉमर्स सेक्टर से आता है। हमने यह भी सुना है कि ई-मेल्स न जाने के कारण कुछ क्लाइंट्स के बिजनेस में 40 से 45 पर्सेंट का घाटा भी हुआ है।

ऑटोमेशन और मल्टी चैनल कम्युनिकेशन के अलावा ई-मेल मार्केटिंग में नए डिजिटल ट्रेंड, जैसे विडियो मार्केटिंग कैसे फिट हो रहे हैं?  

कई कंपनियां ई-मेल में विडियो भी जोड़ रही हैं। दूसरी अवधारणा है- Dynamic Content, यह एक लाइव टिकर है। जितनी बार ई-मेल खोली जाती है, इस पर कंटेंट अपने आप बदल जाता है। पर्सनलाइजेशन और रेलेवेंसी भी एक ट्रेंड है। रेलेवेंसी यानी प्रासंगिकता बहुत महत्वपूर्ण है। Gmail जैसा सर्विस प्रोवाइडर इस बात के लिए बहुत सख्त है कि आपका कंटेंट कितना रेलेवेंट है वरना आपकी ई-मेल को spam फोल्डर में डाल दिया जाता है।

मेल्स को प्रमोशंस और प्राइमरी फोल्डर्स में बांटने से क्या फायदा या नुकसान हुआ है, जैसा कि जी मेल  पर किया जाता है?

शुरुआत में तो ऐडवर्टाइजर्स को लगा था कि इससे उनका विज्ञापन दिखेगा ही नहीं, लेकिन इसका नुकसान देखने को नहीं मिला। भले ही यूजर को ई-मेल दिखाई न दे लेकिन जब भी उसे समय मिलेगा, वह प्रमोशन फोल्डर में जाएगा जरूर। इसके लिए हमें कस्टमर से साथ एंगेज होना पड़ेगा।

जी मेल से आपको कुल कितना ट्रैफिक मिलता है?

भारत में, 60 से 70 प्रतिशत।

साभार- समााचार4मीडिया से 

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हिन्दी आती है तो कान में सीसा घोलकर सरकारी रेडिओ सुनें

अब तो हद हो रही है। एक ओर देश के प्रधान मंत्री इस और उनके करोड़ों प्रशंसक इस बात पर फूले नहीं समा रहे हैं कि प्रधान मंत्री जी पूरी दुनिया में बर मंच पर हिन्दी बोलकर देश की भाषा का सम्मान और गौरव बढ़ा रहे हैं दूसरी ओर प्रधान मंत्री के अधीन चलने वाला केंद्र का हर सरकारी विभाग जी खोलकर हिन्दी  की धज्जियाँ  उड़ा रहा है।
 
अन्य विभागों की बात तो जाने दें क्योंकि उनको देश के लोगों से कोई लेना देना नहीं है सब विभागों का पाला कार्पोरेट के दलालों से पड़ता है और उनका काम अंग्रेजी से चल जाता है, लेकिन आकाशवाणी जैसा माध्यम जिसमें प्रधान मंत्री श्री मोदी जान फूँकने में लगे हैं वह उसी तेजी से हिन्दी की हत्या करने पर आमादा है।
 
आकाशवाणी के एफएम चैनल 107.1 पर आज, सोमवार, 30 मार्च को  दोपहर 12 बजे कोई सुश्री, श्रीमती या सुकन्या जयशंकर प्रसाद की जीवनी अधकचरी हिन्दी और अंग्रेजी में पेश कर रही थी उसे सुनकर तो ऐसा लगा कि या तो किसी अंधे कुए में कूदकर आत्म हत्या कर लेना चाहिए या परमात्मा से ऐसा कोई वरदान माँग लेना चाहिए कि इस देश के हिन्दी भाषियों को जितनी भी थोड़ी बहुत हिन्दी आती है उन्हें ऐसा श्राप मिले कि वो कालिदास के अमर नाटक  शकुंतला की तरह हिन्दी ऐसे ही भूल जाए जैसे महर्षि कण्व के श्राप से राजा दुष्यंत शकुंतला को भूल गया था।
 
अब जरा आकाशवाणी के रेडिओ एफएम 107.1 पर हिन्दी की महान विद्वान सुश्री, श्रीमती या सुकन्या के शब्दों पर गौर फरमाएँ।  जयशंकर प्रसाद हिन्दी के उच कोटि के विद्वान थे, उन्होंने कमाईनी लिखी, (मुझे आश्चर्य हुआ कि उस मोहतरमा ने कामायनी को कमीयनी क्यों नहीं बोला) और भारत के वेद शास्त्रों की खूब स्टडी की वो बहोत बड़े विद्वान थे……
 
आगे सुनने की हिम्मत नहीं हुई इसलिए तत्काल चैनल बदल दिया, लेकिन मेरी इच्छा है कि जन हित में इस मोहतरमा की ये शानदार प्रस्तुति देश के सभी आकाशवाणी केंद्रों पर, दूरदर्शन पर बार बार प्रसारित की जाए ताकि जिन लोगों को हिन्दी का थोड़ा बहुत ज्ञान है वे अपने हिन्दी ज्ञान पर शर्मिंदा होकर आत्महत्या कर लें, जब इस देश का किसान आत्म हत्या कर सकता है तो हिन्दी वाले कौनसी अमर जड़ी खाकर आए हैं।
 
इस देश में आप किसी को घूरकर देखें तो आप पर अपराधिक मुकदमा चल सकता है मगर आप खुले आम देश की संस्कृति,  साहित्य, परंपरा, मूल्यों और राष्ट्रीयता को जीवित रखने वाली देश की भाषा से हर मंच पर खुलकर बलात्कार करें आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस देश के मीडिया को, अंग्रेजी के लेखकों को, पत्रकारों को और हिन्दी के नाम से सरकारी टुकड़े तोड़ने वाले हर शख्स को ये छूट मिली हुई है कि वह हिन्दी को इतने घटिया तरीके से पेश करे कि सुनने वाला आत्म हत्या कर ले।
 
आश्चर्य और शर्म की बात ये है कि जो लोग हिन्दी में अंग्रेजी का ज़हर घोलने को सही बताते हैं वही ये कबी नहीं कहते कि अंग्रेजी अखबारों में या टीवी चैनलों में कौन माई का लाल हिन्दी के शब्द प्रयोग में लाता है। अगर अंग्रेजी चैनलों पर या अंग्रेजी अखबारों में हिन्दी का प्रयोग नहीं होता है तो फिर हिन्दी चैनल और अखबार वालों ने अपनी हिन्दी में अंग्रेजी का ज़हर क्यों घोल रखा है। 

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अपने मकसद में कितना कामयाब रहा फिक्की फ्रैम का सालाना जलसा

फिक्की फ्रेम्स फेडरेशन आफ चैम्बर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज और भारतीय फिल्म जगत की साझा वार्षिक पहल है, यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जिस पर फिल्म और मनोरंजन जगत के प्रतिनिधि, फेडरेशन के दिग्गज और सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के प्रमुख एकत्रित हो कर समस्याओं पर चर्चा करते हैं और सरकार को अपनी रीति नीति की दिशा तय करने में मदद मिलती है। बहुत लोगों को शायद यह सुन कर हैरानी होगी कि धीरे धीरे करके भारतीय मनोरंजन उद्योग का अर्जन डॉलर 17 बिलियन यू एस डॉलर तक पहुँच गया है, इसी के साथ अब यह व्यवसाय कोई 19 लाख रोजगार अवसर प्रदान कर रहा है। यही वजह है पिछले दस वर्षों में यह इवेंट देखा जाय तो एशिया की इस प्रकार की सबसे बड़ी इवेंट बन गयी है जिसमें हालीवूड से लेकर ब्रिटिश, कनाडा , ऑस्ट्रेलिया मनोरंजन के नामचीन लोग अपने लिए संभावना तलाशने के लिये शामिल होते हैं। 

इस बार ऐसा लगा कि दुनिया भर के लोगों को तो बालिवुड और भारतीय मनोरंजन व्यवसाय वेहद महत्वपूर्ण लगता है लेकिन अपनी ही सरकार को विशेष चिंता नहीं है, गौर तालाब बात यह है कि अरुण जेटली, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, जर्नल वी के सिंह , विदेश राज्यमंत्री डा राहुल खुल्लर अध्यक्ष ट्राई , बिमल जुल्का, सचिव केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, देवेन्द्र फड़नवीस, मुख्य मंत्री महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण सरकारी लोग आमंत्रित किये जाने के वावजूद परिदृश्य पर नहीं दिखाई दिए. सुचना मंत्रालय के एक अवर सचिव को भेज कर सरकारी कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गयी. शायद यही वजह है कि मनोरंजन जगत के महत्वपूर्ण लोगों के चेहरे पर सरकारी पहल को ले कर हताशा साफ़ दिखाई दी. इन दिनों दुनिया भर में सरकारें अपने देश की आमदनी बढ़ने के लिए पर्यटन पर फोकस कर रही हैं , इस के लिए अपने यहाँ शूटिंग के लिए फिल्म निर्माताओं को सब्सिडी, निर्बाध शूटिंग अनुमति , आवश्यक मूल बहुत ढांचा प्रदान करने की होड़ में दिखती हैं , अपने यहाँ हाल यह है कि बाहर के देशों की फिल्मों की बात कौन करे , अपने ही निर्माताओं को विवश हो कर शूटिंग के लिए बाहर जाना पड़ता है। मुझे इस प्रसंग में राकेश रोशन, ऋतिक रोशन की कृश श्रंखला की पहली फिल्म की याद आ गयी , वे लोग कहानी की डिमांड के अनुसार नैनीताल में शूटिंग के लिए गए, वहां स्थानीय प्रशासन और स्थानीय जनता ने क्रू को इतना सताया कि शूटिंग बीच में ही छोड़ कर आना पड़ा , बाकी शूटिंग कनाडा जा कर बिना किसी परेशानी के पूरी की और जहाँ तक मेरा ख्याल है इस के लिए वहां की सरकार ने सब्सिडी भी दी। 

फिल्म टूरिज्म की क्षमता के दोहन विषय पर आयोजित सत्र में माइक एलिस, अध्यक्ष , एशिया पैसिफिक मोशन पिक्चर एसोशिएशन , कालीन बॉरोज , प्रमुख स्पेशल ट्रीट प्रोडक्शंस , रिचर्ड बेले , कनाडा के मुंबई स्थित काउंसिल जनरल , थॉमस एल वाजदा, अमेरिका के मुंबई स्थित काउंसिल जनरल शामिल थे, वहीं फिल्म जगत की और से फिल्म और टीवी प्रोडूसर्स गिल्ड के अध्यक्ष मुकेश भट्ट शामिल थे. चर्चा में वालसा नैयर सिंह मुख्य सचिव पर्यटन एवं संस्कृति , महाराष्ट्र शासन आमंत्रित किये जाने के वावजूद शरीक नहीं हुए. जहाँ माइक एलिस और रिचर्ड बेले ने हॉलीवुड की अनेक फिल्मों के कनाडा और विशेषकर वहां के ब्रिटिश कोलंबिया राज्य में शूटिंग किये जाने से इस क्षेत्र में पर्यटन की आय में वृद्धि के बारे में बताया.यही नहीं केन्द्रीय यूरोप के चेक गणराज्य , हंगरी , बुल्गारिया , क्रोशिअ और खूबसूरत माल्टा भी फिल्मों को शूटिंग के लिए सब्सिडी और अन्य सुविधा प्रदान कर रहे हैं। जब मुकेश भट्ट की बारी आयी तो उन्होंने सीधे सीधे भारत सरकार को आइना दिखा दिया। उनका कहना है की फिल्म को शूटिंग की अनुमति देने के मामले में सरकार के विभिन्न विभाग जिस तरह से फिल्म वालों को परेशान करते हैं और जिस तरह का भ्रष्ट आचरण करते हैं वह बहुत ही उबाऊ, थका देने वाला है, नतीजन फिल्म बनाने की कीमत बढ़ जाती है और समय भी ज्यादा लगता है। 

उन्होंने स्पष्ट कहा कि याही कारण है कि देश में बेहतरीन लोकेशन होने के वावजूद ज्यादातर निर्माता विदेशों में शूटिंग करना पसंद करते हैं , अपना उदाहरण देते हुए बताया कि वे स्वयं पिछले बीस वर्षों में 35 देशों में शूटिंग कर चुके है जहाँ उन्हें अपने शेडूल के अनुसार बिना किसी परेशानी के काम करने का मौक़ा मिला। मुकेश का कहना है कि यदि सरकार स्थिति को लेकर ज़रा भी गंभीर है तो फिर फिल्म कमीशन का गठन करे जिसमें राजनैतिक लोग न रखें जाएँ। राज्य सरकारें ऐसे ही राज्य स्तर पर कमीशन गठित करें , कमीशन आवयशक परमिशन प्रदान करने के लिए सिंगल विंडो के रूप में काम करें। विदेशी फिंकारों को भी अनुमति देने के मामले में त्वरित निर्णय लिए जाए. इस पर श्रोताओं में से हेमंत संगानी ने उनसे पूछा कि जहाँ एक और भारतीय फिल्म निर्माता विदेश में शूट करने जाते हैं तो वहां के वेहतऱीन दृश्यों को कैद करते हैं वहीं विदेशी निर्माता भारत आ कर यहाँ की केवल गंदगी ही शूट करने आते हैं ऐसा क्यों ? इसका उत्तर भी सब्सिडी में छुपा हुआ है।

लेखक वरिष्ठ फिल्म व संगीत समीक्षक हैं -ये लेख उनके चर्चित ब्लॉग http://desireflections.blogspot.in/  से साभार लिया गया है 

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युवा संसद में भूमि अधिग्रहण बिल पर हंगामा

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में युवा संसद प्रतियोगिता का आयोजन

भोपाल। भूमि अधिग्रहण बिल पर बहस के दौरान युवा संसद में जमकर हंगामा हुआ। बिना बहस के बिल को पास करने पर विपक्ष सदन से वाक आउट कर गया। विपक्ष ने बिल को किसान विरोधी और कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुँचाने वाला बताया। जबकि सरकार की ओर से प्रधानमंत्री ने बिल को विकास के लिए जरूरी बताया। आखिर में भूमि अधिग्रहण बिल पर  सरकार की ओर से लाए गए विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। सदन में रक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मसलों पर भी जमकर हंगामा हुआ। यह नजारा था माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (एमसीयू) के सभाकक्ष का, जहां युवा संसद का आयोजन किया गया। इसमें विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

      पं. कुंजीलाल दुबे राष्ट्रीय संसदीय विद्यापीठ की ओर से एमसीयू में आयोजित युवा संसद में छात्रों ने सरकार और विपक्ष की भूमिका निभाई। मॉक संसद के प्रश्नकाल में शिक्षा, कुपोषण, भारत पाकिस्तान सीमा पर बढ़ रहे तनाव और मछुआरों की गिरफ़्तारी के साथ ही कई राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस की। इससे पहले प्रधानमंत्री की भूमिका में छात्र अविनाश त्रिपाठी ने सदन के सामने पूर्व प्रधानमंत्री और संसद के सदस्य रहे अटल बिहारी वाजपयी को भारत रत्न मिलने पर ख़ुशी जाहिर करते हुए पटल पर धन्यवाद प्रस्ताव रखा।

      कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री राहुल रंजन ने भूमि अधिग्रहण बिल को सदन में पेश किया। जब बिल पर वोटिंग की बात आई तो विपक्ष बहस की मांग करने लगा। विपक्षी सांसद हंगामा करते हुए अध्यक्षीय आसंदी तक पहुँच गए। बहस की मांग पूरी नहीं होने पर नारेबाज़ी करते हुए विपक्ष सदन से वाक आउट कर गया। अध्यक्ष और संसदीय कार्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद विपक्षी सांसद शांत हुए। बाद में, अध्यक्ष महोदय छात्र अभिषेक मिश्र ने बिल पर बहस की अनुमति दी। बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष शशांक शेखर ने कहा कि बिल को पढने के बाद यह ही लग रहा है कि सरकार किसानों की ज़मीन हड़पकर धन्नासेठों को सौंपना चाहती है। अंग्रेजों के रोलेट एक्ट की तरह इस बिल में भी किसानों को दलील, वकील और अपील की आज़ादी नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष किसानों के हित में सड़कों पर इस बिल का विरोध करेगा।

ध्वनि मत से भूमि अधिग्रहण बिल लोकसभा में पारित : 
भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार का पक्ष रखते हुए प्रधानमंत्री अविनाश त्रिपाठी ने कहा कि बिल को लेकर विपक्ष देश में भ्रम का वातावरण बना रहा है। बिल किसान विरोधी नहीं है बल्कि किसान हितैषी है। जो काम पिछली सरकारें नहीं कर सकीं वह हम कर रहे हैं। देश का सारा बोझ खेती पर नहीं डाला जा सकता। उद्योग बढ़ने होंगे, इसके लिए ज़मीन चाहिए। लेकिन, उद्योंगों के लिए उपजाऊ ज़मीन नहीं ली जाएगी। जिन किसानों की ज़मीन लेंगे उन्हें उचित मुआवजा और एक सदस्य को रोजगार देंगे की गारंटी बिल में है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में विपक्ष से विकास के मुद्दे पर साथ आने की अपील की। प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिल को बहुमत से पास कर दिया गया।

राजनीति बुरी नहीं हैं, युवाओं को वहां जाना चाहिए : 
युवा संसद की कार्रवाई को देखने के लिए एम.वी.एम. कॉलेज की प्राध्यापक श्रीमती संध्या त्रिवेदी, संसदीय कार्य विभाग के अवर सचिव श्री एम.के. राजौरिया, पं. कुंजीलाल दुबे राष्ट्रीय संसदीय विद्यापीठ के उप संचालक बीआर शर्मा और श्रीमती सरोज दुबे मौजूद थे। विश्वविद्यालय की ओर से जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी और प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ. अविनाश वाजपयी भी इस दौरान मौजूद थे। इस मौके पर श्रीमती संध्या त्रिवेदी ने कहा कि तीन गोले हमेशा याद रखने चाहिए। बाहर वाला गोला शरीर, बीच वाला मन और आखिरी गोला अन्तःकारण है। हमें अपने अन्तःकारण को ठीक करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कीड़ों की उत्पत्ति को रोकना है तो कीचड़ को साफ़ करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि राजनीती बुरी नहीं है बल्कि बुरे लोगों ने उसे बुरा बना दिया है। आप जैसे युवा जाकर राजनीती को अच्छा भी बना सकते हैं। 

इन्होंने निभाई युवा संसद में भूमिका : 
कविता भदौरिया (लोकसभा अध्यक्ष), अभिषेक मिश्रा (उपसभापति) अमित गुप्ता  (महासचिव लोकसभा), सिद्धार्थ तिवारी (मार्शल), दीपिका शर्मा (रिपोर्टर), अविनाश त्रिपाठी (प्रधानमंत्री), अमरेन्द्र कुमार (गृहमंत्री),  राहुल रंजन  (कृषि मंत्री), रितिका चौहान (महिला एवं बाल विकास मंत्री), शिवानी जैन (रक्षा मंत्री), श्रीतिका मिश्र (मानव संसाधन विकास मंत्री ), कमल नयन पटेल  (संसदीय कार्यमंत्री ), अजय कुमार (सदस्य ), शुभम दिवेदी (सद्स्य), विजय भानू प्रताप सिंह (सद्स्य), शिवांगी चौहान (सदस्य) अक्षय दीक्षित (सदस्य),शशांक शेखर  (नेता प्रतिपक्ष), धीरेन्द्र गर्ग (उप नेता प्रतिपक्ष) आरजू स्निग्धा (सांसद), अश्विनी कुमार मिश्र (सांसद), कोमल बडोदेकर  (सांसद), देवेश प्रताप सिंह (सांसद), मोहम्मद अनस (सांसद), सुशांत  कनिष्का तिवारी (सांसद) । 
 

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भवदीय
लोकेन्द्र सिंह 
Contact :
Department Of Mass Communication
Makhanlal Chaturvedi National University Of 
Journalism And Communication
B-38, Press Complex, Zone-1, M.P. Nagar,
Bhopal-462011 (M.P.)
Mobile : 09893072930
www.apnapanchoo.blogspot.in

Go Green – Save Earth

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सुशांत सिंह राजपूत व अजय बिजली ने की पी.वी.आर. संगम सिनेमा की शुरूआत

नई दिल्ली। आर.के. पुरम दिल्ली के जाने-माने सिनेमा संगम, जो कि एक समय पर किफायती सिंगल स्क्रीन के रूप में जाना जाता था। एक बार फिर दिल्लीवासियों को लुभाने व उनका मनोरंजन करने को तैयार है अपने नये अंदाज, नये अवतार व नये नाम के साथ। संगम से पी.वी.आर. संगम के रूप में पुर्नःनिर्मित इस मल्टीप्लेक्स की शुरूआत हाल ही में अपनी नयी फिल्म ‘डिटेक्टिव व्योमकेश बक्शी’ के प्रचार के सिलसिले में दिल्ली आये अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत व पी.वी.आर. लिमिटेड के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक अजय बिजली ने की। 

दक्षिणी दिल्ली के अन्तर्गत आर.के. पुरम स्थित पी.वी.आर. संगम की शुरूआत के साथ ही पी.वीआर. की दिल्ली/एन.सी.आर. के अन्तर्गत लगभग 140 सिनेमाघर हो गये हैं। औपचारिक लोकार्पण के साथ मल्टीप्लेक्स को शुक्रवार को सिनेप्रेमियों के लिए खोल दिया गया।

पुनर्निमित पी.वी.आर. संगम में अब दो स्क्रीन उपलब्ध होंगी जिनके माध्यम से दो आॅडी में लगभग 392 सीट (300 व 92) हैं। लगभग 13000 स्क्वेयर फुट क्षेत्र में फैले इस सिनेमा में 2के डिजीटल प्रोजेक्शन, 7.1 चैनल साउंड सहित 3डी के लिए तैयार बड़ी स्क्रीन मौजूद हैं और उम्मीद है कि हमेशा की तरह इस क्षेत्र के लोग यहां अपनी पसन्दीदा फिल्मों का लुत्फ उठा सकेंगे।

सिनेमा के विषय में बताते हुए अजय बिजली ने कहा कि, संगम सिनेमा के मालिकों ने इसे मिनी-माॅल / फिल्म-फूड हब में तब्दील करने की योजना बनायी जहां दर्शक फूड के साथ-साथ खान-पान का भी आनन्द दे सकें। हमें यह जगह मिली और हमने इसे अच्छी गुणवत्ता वाली स्क्रीन व साउण्ड के साथ आधुनिक मल्टीप्लेक्स के रूप में तैयार करने की अवधारणा तैयार की और हमें उम्मीद है कि दर्शक इस नये अनुभव को पसन्द करेंगे।

 

शुक्रवार को आम जनता हेतु शुरू किये गये इस सिनेमा की शुरूआत दम लगा के हईशा, ड्रैगन ब्लेड और एन.एच. 10 के शो के साथ हुई। ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी’ व ‘फास्ट एंड फ्युरियस 7’ के साथ नयी फिल्मों का दौर 3 अप्रैल से शुरू होगा।  

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दो देशों के बीच मधुर सम्बन्ध बनाता है मीडिया

भोपाल।  लास एंजेल्स टाइम्स के दक्षिण एशिया के संवाददाता शशांक बंगाली ने छात्रों और पत्रकारों से बातचीत करते हुए पारंपरिक मीडिया और नविन मीडिया पर जानकारी साझा की l उन्होंने कहा न्यू मीडिया पर गुणवत्ता युक्त पत्रकरिता करने से अपनी पहचान बने जा सकती है l सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे युवाओं को व्यक्तिगत फोटो और कंटेंट की जगह अर्थपूर्ण सामग्री पोस्ट करनी चाहिए l श्री बंगाली माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में आयोजित विशेष व्याख्यान में मौजूद थे l इस मौके पर अमेरिकी व दक्षिण एशिया के लिए संवाददाता की एक विशेष व्याख्यान, लॉस एंजिल्स टाइम्स ने गुरुवार को भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित किया गया था। मुंबई से आये अमेरिका महावाणिज्य दूतावास के प्रेस अधिकारी जेफरी एलिस और सहायक मीडिया सलाहकार कार्तिक बी चव्हाण ने भी इस मौके पर अपने विचार व्यक्त किये l
 
         

श्री बंगाली ने बताया की संकटपूर्ण स्थितियों में परम्परागत मीडिया और सोशल मीडिया पर किस तरह महतवपूर्ण मुद्दों  को कवर किया जाता है l उन्होंने किसी भी स्टोरी को रचनात्मक और पठनीय बनाने वाले तत्वों पर भी प्रकाश डाला l सूचनाओं के स्रोत और स्टोरी आईडिया को विकसित करने के तरीके भी मीडिया के छात्रों को बताये l इसके अलावा प्रेस अधिकारी जेफरी एलिस ने बताया कि दो देशों के बीच रिश्तों को मजबूत करने में पारंपरिक और सोशल मीडिया की अहम् भूमिका रहती है l राजनयिकों और नागरिकों को एक दुसरे के साथ जोड़ने के लिए सोशल मीडिया एक सशक्त मंच उपलब्ध करता है l अंतर्राष्ट्रीय और विदेश रिपोर्टिंग पर भी दोनों विद्वानों ने मीडिया छात्रों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया l इसके साथ ही भारत और अमेरिका की पत्रकारिता पर अपने अनुभव साझा किये l इस मौके पर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकारों सहित विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन निदेशक श्री आशीष जोशी, न्यू मीडिया विभाग की अध्यक्ष डॉ पी. शशिकला, जनसंपर्क निदेशक डॉ पवित्र श्रीवास्तव एवं अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी मौजूद थे l
 
                                                                                                            डॉ पवित्र श्रीवास्तव
                                                                                                            (निदेशक, जनसंपर्क)

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बैंक ने लोन नहीं दिया तो आदिवासी महिलाओं ने बनाया खुद का बैंक

बड़वानी. महिलाओं का सहकारी बैंक। यथा नाम तथा गुण ‘समृद्धि ’। पहले अपने गांव की जरूरतमंद महिलाओं को सशक्त बनाया। 70 लाख रुपए का लोन भी बांटा। अब दूसरे गांव की महिलाओं को सबल करने निकल पड़ी हैं। ये वे ही महिलाएं हैं जिन्हें कुछ साल पहले बैंक ने लोन देने से मना कर दिया था। तब इन्होंने खुद का बैंक खोलने का न सिर्फ निश्चय किया बल्कि सफलता से कर भी दिखाया।
कामयाबी और महिला सशक्तिकरण की यह मिसाल कायम की है  मध्यप्रदेश के  बड़वानी जिले के गंधावल की आदिवासी महिलाओं ने। खुद में गांव में महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के बाद इन्होंने पाटी में बैंक की एक शाखा खोल दी। इस बैंक में भी अध्यक्ष से लेकर तमाम स्टाफ महिलाओं का ही है। ब्रांच खोलने से पहले इसी बैंक की महिलाओं ने पाटी में ट्रेनिंग सेंटर भी खोला।

जिद करके ऐसे निकलीं दुनिया बदलने
करीब चार साल पहले गंधावल की इन महिलाओं ने खेती के लिए एक राष्ट्रीयकृत बैंक से ऋण मांगा था, लेकिन उन्हें मना कर दिया। महिलाएं तो जिद्दी थीं। दुनिया बदलना चाहती थीं। गंधावल बैंक की अध्यक्ष रेवाबाई ने बताया कि उन्होंने खुद की बैंक खोली। मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से 2011 में समृद्धि स्वायत्त साख सहकारी संस्था मर्यादित बैंक का पंजीयन कराया।
बैंक खोलने का मकसद था महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। उसे िजले के दो बैंक, नर्मदा झाबुआ व बैंक ऑफ इंडिया ने साख के आधार पर एक साल में िलमिट 11 लाख रुपए बढ़ा दी। 2013 में बैंक ने 13 लाख रुपए लिमिट तय की थी। 2014 में इसे बढ़ाकर 24 लाख कर दिया है। बैंक अब तक करीब 98 लाख रुपए का लोन बांट चुकी है। बचत है 30 लाख रुपए और 2800 लोग अब बैंक से लोन लेकर तरक्की कर रहे हैं।

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साभार- दैनिक भास्कर से

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‘सरल’ मन से रचे गए ‘अटल’व्यक्तित्व का अलोक

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से अलंकृत किया गया।
प्रसंगवश आज उनकी कविताओं के प्रेरक संसार से एक बार फिर गुजरने का मन किया।
कहते हैं कि कवि, रचयिता और दृष्टा भी अगर हो तो उसकी रचना प्रक्रिया में वह खुद भी रचा जाता है। कहना न होगा कि देश में राजनेता तो अनेक हुए और हैं, आगे भी होंगे किन्तु कौन नहीं मानेगा कि अटल जी की ओजस्वी वक्तृता और कवि रूप में उनकी संवेदनशीलता ने उन्हें औरों से अलग पहचान दी है।

मैं यह मानता हूँ कि अटल जी की कविताओं में उनकी गहन अनुभूति के अलावा जीवन संघर्ष को हर्ष में बदलने के अचूक सूत्र छुपे हुए हैं। यही कारण है कि महज़ राजनीति के लिए राजनीति उन्हें कभी रास नहीं आई। अक्सर वे कभी बेचैन तो कभी बदलाव के लिए बेबस दिखाई पड़ते रहते रहे तो कभी हालात को न समझने की लोगों घोर की लापरवाही से खिन्न भी हुए।

बहरहाल, आइये, अदम्य जीवट,ज़ज़्बे और जीवंतता को समर्पित अटल जी के सरल और निर्मल मन के साथ-साथ उनके निश्चल मस्तिष्क से निकली काव्यधारा की कुछ तरंगों में उनकी अपराजेय जिजीविषा को हम एकबारगी फिर जी कर देखें। मन की गांठें खोलें। दूरियों के दर्द से दूर करें। मन-मुटाव के भटकाव को अलविदा कहें। अंध प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता के द्वंद्व से किनारा करके देखें। ज़िंदगी के लिए कोई नया नज़रिया तलाश करें।

तो ये रहे भारत रत्न अटल जी के सफल जीवन के प्रमाण बने कुछ अनमोल काव्य मोती –

सत्ता
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मासूम बच्चों,
बूढ़ी औरतों,
जवान मर्दों की लाशों के ढेर पर चढ़कर
जो सत्ता के सिंहासन तक पहुंचना चाहते हैं
उनसे मेरा एक सवाल है :
क्या मरने वालों के साथ
उनका कोई रिश्ता न था?
न सही धर्म का नाता,
क्या धरती का भी संबंध नहीं था?
पृथिवी मां और हम उसके पुत्र हैं।
अथर्ववेद का यह मंत्र
क्या सिर्फ जपने के लिए है,
जीने के लिए नहीं?

आग में जले बच्चे,
वासना की शिकार औरतें,
राख में बदले घर
न सभ्यता का प्रमाण पत्र हैं,
न देश-भक्ति का तमगा,

वे यदि घोषणा-पत्र हैं तो पशुता का,
प्रमाश हैं तो पतितावस्था का,
ऐसे कपूतों से
मां का निपूती रहना ही अच्छा था,
निर्दोष रक्त से सनी राजगद्दी,
श्मशान की धूल से गिरी है,
सत्ता की अनियंत्रित भूख
रक्त-पिपासा से भी बुरी है।

पांच हजार साल की संस्कृति :
गर्व करें या रोएं?
स्वार्थ की दौड़ में
कहीं आजादी फिर से न खोएं।
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मरेंगे तो इसके लिए
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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।
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आओ फिर से दिया जलाएँ
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आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ
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ऊँचाई
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ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।

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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग, शासकीय दिग्विजय
स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
राजनांदगांव। मो.09301054300

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