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अनुसंधान से संवारें सुखद भविष्य के सुनहरे सपने

प्रकृति ने संसार को अनेक चमत्कारों से नवाजा हैं। कुछ चमत्कारों की खोज भी एक लंबे अंतराल के शोध के बाद ही संभव हो सकी थी। यही कारण है कि किसी भी सत्य की खोज और उसकी पुष्टी के लिए शोध का होना अनिवार्य होता है। मानव की जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही शोध प्रक्रिया को जन्म दिया । किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है।

जैसे-जैसे समय बीत रहा हैं वैसे वैसे मानव की समस्या भी विकट होती जा रही है। हर दिन एक नई समस्या से उसे दो चार होना पड़ता है। ऐसे में शोध की महत्ता स्वतः ही पैदा हो जाती है। हालांकि मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचि, प्रकृति, व्यवहार, स्वभाव और योग्यता भिन्न – भिन्न होती है। इस लिहाज से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है। इस लिहाज से मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा। इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है। तथ्यों कर अवलोकन करके कार्य- कारण संबंध ज्ञात करना अनुसंधान की प्रमुख प्रक्रिया है।

किसी भी विषय पर अच्छा काम कर उसे उपयोगी और महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है। वैसे इन दिनों मानविकी और समाज विज्ञानों में दलित, आदिवासी, स्त्री, भूमंडलीकरण, गरीबी, निजीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद, किसान आदि से जुड़े विषयों का चलन है। प्राकृतिक विज्ञानों में कोई भी नई खोज या प्रयोग महत्वपूर्ण होता है जिसमें नए और उत्तेजक निष्कर्ष निकल रहे हों। चिकित्सा के क्षेत्र में नित-नई खोजें इसी प्रक्रिया का परिणाम हैं। माइक्रोबायोलॉजी और नैनो टैक्नोलॉजी इन दिनों प्राकृतिक विज्ञानों संबंधी शोधकार्यो में लोकप्रिय विषय हैं।

शोध का प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक पद्वति के प्रयोग द्वारा प्रश्नों के उत्तर खोजना है इसका उद्देश्य अध्ययनरत समस्या के अंदर छुपी हुई यर्थाथता का पता लगाना या उस सबकी खोज करना है जिसकी जानकारी समस्या के बारे में नहीं है। वैसे प्रत्येक शोध के अपने विशेष लक्ष्य होते है फिर भी सामाजिक शोध को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया हैं-
1 किसी घटना के बारे में जानकारी प्राप्त करना या इसके बारे में नवीन ज्ञान प्राप्त करना- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जाने वाली शोध को अन्वेषणात्मक अथवा निरूपणात्मक शोध कहते है।
2 किसी व्यक्ति परिस्थिति या समूह की विशेषता का सही चित्रण करने के लिए की जाने वाली शोध को वर्णनात्मक शोध कहते है।
3 किसी वस्तु या घटना के घटित होने की आवृत्ति निर्धारित करना या किसी अन्य वस्तु या घटना के साथ संबंध स्थापित करने के लिए निदानात्मक शोध उपयोग में लाई जाती है।
4 विभिन्न चरो में कार्य कारण संबंधों वाली उपकल्पनाओं का परीक्षण करने के लिए उपकल्पना परीक्षण अनुसंधान या प्रायोगिक शोध उपयोग में लाई जाती है।

आज अध्यापन के अलावा दूसरे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की बढ़ती मांग ने शोध के प्रति रुझान बढ़ाया है। आज विश्वविद्यालयी शोध के गिरते स्तर और शोधार्थियों को पेश आ रही मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए शोध के बारे में एक बुनियादी समझ बनाना जरूरी हो गया है।

बढ़ता रुझान
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नामी शोध संस्थानों से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले वर्षो में शोध उपाधियों में प्रवेश लेने के इच्छुक अभ्यर्थियों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। जवाहरलाल नेहरू विश्व-विद्यालय में जहां पांच साल पहले सामान्यत: एम.फिल़ और डायरेक्ट पीएच़ डी. में प्रवेश के लिए आवेदन करने वालों की संख्या क्रमश: 100-150 और 10-15 हुआ करती थी, वहीं अब यह संख्या 500-1000 और 50-100 तक पहुंच गई है।

शोध उपाधियों हेतु बढ़ते रुझान के दो प्रमुख कारण हैं- रोजगार के लिए शोध की बढ़ती अनिवार्यता और पिछले वर्षो में शुरू हुई विभिन्न शोधवृत्तियां। अच्छे उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन के लिए तो शोध अनिवार्य हो गया है।

इसके साथ ही निजी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों, गैर सरकारी संगठनों आदि में भी शोध उपाधि धारकों को वरीयता दी जाती है। सभी बड़े संस्थानों में रिसर्च एण्ड डवलपमेंट (आरएंडडी) विभाग होता है, इसके अलावा निजी संस्थानों और कंपनियों में ‘कॉपरेरेट सोशल रेसपॉन्सबिलिटी’ विभाग होता है, जहां पीएचडी धारकों को वरीयता दी जाती है। गैर सरकारी संगठनों में भी इनकी जरूरत होती है।

विषय चयन
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– विषय आपकी रुचि का हो, न कि किसी का थोपा हुआ क्योंकि थोपे हुए विषय पर आप न तो अच्छा शोध कर सकते हैं और न ही बाद में साक्षात्कार में अपेक्षित जवाब दे सकते हैं।
– विषय समयसामयिक महत्व का होना चाहिए। ऐसे विषय का चुनाव करें जिसकी आप साक्षात्कार में प्रासंगिकता स्पष्ट कर सकें।
– विषय में अधिक फैलाव से बचना चाहिए। विषय सीधे समस्या पर केंद्रित हो, इसलिए विषय चुनने से पहले समस्या की पड़ताल करें। उदाहरण के लिए अगर आपको भूमंडलीकरण से संबंधित विषय लेना है तो ‘दुनिया पर भूमंडलीकरण का प्रभाव’ की जगह किसी छोटे क्षेत्र पर भूमंडलीकरण के खास प्रभाव का अध्ययन ज्यादा अच्छा विषय होगा।

निदेशक का चुनाव
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जेएनयू जैसे कुछ विश्वविद्यालय गाइड (शोध निर्देशक) के चयन का अधिकार शोधार्थी को देते हैं। कई विश्वविद्यालयों में सीटों की उपलब्धता के आधार पर गाइड शोधार्थी का चयन करते हैं। अगर शोधार्थी के पास चयन की छूट हो तो गाइड के रूप में ऐसे व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए जिसका विशेषज्ञता क्षेत्र आपके शोध विषय से संबंधित हो।

सारांश निर्माण
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सिनॉप्सिस या शोध प्रारूप शोध का पहला चरण है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश के वक्त ही शोध प्रारूप ले लिया जाता है। सिनॉप्सिस आपके भावी शोध की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, इसलिए इसे बहुत सावधानी से बनाएं। विषय की बुनियादी जानकारी जरूरी है। अपने क्षेत्र से जुड़ी महत्वपूर्ण किताबें पढ़ने के बाद ही सिनॉप्सिस बनाएं।

अध्याय विभाजन
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क्षेत्र, उद्देश्य और संभावनाएं : इसमें शोधार्थी अपने विषय को स्पष्ट करता है और संबंधित विषय में शोध की उपादेयता सिद्ध करता है। एक हाइपोथीसिस (शोध परिकल्पना) प्रस्तुत करता है कि शोध के संभावित परिणाम कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

शोध की वर्तमान स्थिति : इसमें शोधार्थी को अपने विषय से संबंधित अब तक हुए शोध कार्यो का ब्यौरा देना पड़ता है। नई दिल्ली स्थित भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एसोशिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज) ने भारतीय विवि. में हुए तमाम शोध कार्यो के विषयों का एक वृहद कैटलॉग बनाया है। इससे शोधार्थी यह जान पाता है कि अपने शोध विषय जुड़े क्षेत्र में कहां कहां शोध कार्य हो चुका है। विषय के संबंध में सीनियर्स से बात करना भी अच्छा रहेगा।

शोध विषय में नवीनता : शोधार्थी का विषय और भावी शोध कार्य कैसे अलग और नया है, यह शोधार्थी को सिनॉप्सिस के इस हिस्से में स्पष्ट करना चाहिए। कई बार शोध का विषय पुराने विषय से बहुत मेल खाता है, ऐसी स्थिति में शोधार्थी को अपने कार्य की भिन्नता को विस्तृत रूप से बताना अनिवार्य होगा।

शोध विधि : यह शोध में अपनाई जाने वाली पद्धति है। यह हमारे विषय और अनुशासन पर निर्भर करता है कि हमें कौन सी शोध पद्धति ज्यादा उपयोगी लगेगी। तुलनात्मक, समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक आदि पद्धतियां मानविकी संबंधी शोधकार्यों में प्रचलित हैं।

अध्याय योजना : इसे आप अपने भावी शोध प्रबंध का मूलाधार कह सकते हैं। यह उन रेखाओं का नाम है जिनमें रंग भरकर हम मुकम्मल तस्वीर बनाते हैं। अच्छी अध्याय योजना बनाने के लिए विषय की समुचित जानकारी होना जरूरी है। सामान्यत: एम.फिल़ में दो या तीन अध्याय होते हैं और पीएच़डी़ में पांच से सात अध्याय होते हैं। शुरुआती अध्याय विषय से जुड़े सैद्धांतिक प्रश्नों से टकराते हैं और बाद के मूल विषय और समस्या से। अंत में निष्कर्ष या उपसंहार लिखने की परंपरा है।

संदर्भ ग्रंथ सूची : शोध कार्य के दौरान उपयोग में लाई गई किताबों की सूची को संदर्भ ग्रंथ सूची या बिबलियोग्राफी कहते हैं। कुछ शोध विषयों में हम कुछ पाठ (टेक्स्ट) का अध्ययन करते हैं। ऐसे शोध प्रबंध में हम संदर्भ ग्रंथ सूची को दो भागों में बाँटते हैं- प्राथमिक ग्रंथ (प्राइमरी सोर्स) और सहायक ग्रंथ (सैकेंडरी सोर्स)। इनमें किताबों के अलावा उपयोग में लाई गई पत्र-पत्रिकाएं, विश्वकोश, जर्नल, वेबसाइट आदि का भी ब्यौरा देना चाहिए।

शोधार्थी को अपने विषय का नयापन और महत्ता साबित करते हुए संभावित शोध का एक खाका पेश करना होता है। सिनॉप्सिस बनाने में शोधार्थी अपने गाइड की मदद ले सकते हैं। गाइड की सहमति के बाद विभाग के रास्ते विश्वविद्यालय की शोध समिति तक आपकी सिनॉप्सिस जाती है।

ऐसे होगी राह आसान
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पिछले वर्षों में शोध के प्रति रुझान बढ़ने का एक कारण यह भी है कि इस बीच भारत सरकार द्वारा नई-नई शोधवृत्तियां (फैलोशिप) शुरू की गईं हैं तथा यूजीसी की जूनियर रिसर्च फैलोशिप और सीनियर रिसर्च फैलोशिप को भी बढ़ाया गया है।

पहले विद्यार्थियों की समझ थी कि बेरोजगारी में शोध के लिए व्यर्थ समय और धन क्यों खर्च करें, लेकिन बढ़ती फैलोशिपों ने इस सोच को बदला है। वैसे भी सरकारी शोध संस्थानों में मानविकी आदि के क्षेत्रों में शोध में ज्यादा खर्चा नहीं आता है। विज्ञान संबंधी शोधों के लिए अतिरिक्त फैलोशिपों और कंटीजेंसी की व्यवस्था की गई है। इसलिए अब शोध करना आर्थिक दृष्टि से आसान हुआ है।

प्रमुख संस्थान
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मानविकी और समाज विज्ञानों के क्षेत्र में-
– जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
– हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
-टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई  इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
-कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता

प्राकृतिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में
– इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज, बंगलूरू
– आईआईटी, दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, कानपुर, रुड़की आदि।
– भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली (पूसा)
– स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़, (चिकित्सा)
– एम्स, नई दिल्ली।

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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से सम्मानित
शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर
महाविद्यालय, राजनांदगांव के प्रोफ़ेसर हैं।
मो.09301054300

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नरेंद्र मोदीः देश ने मान लिया दिल्ली कब मानेगी

   जमीन की जंग में नरेंद्र मोदी उलझ से गए लगते हैं। इसने पूरे विपक्ष को एकजुट तो किया ही है, साथ ही यह छवि भी प्रक्षेपित कर दी है कि सरकार को किसानों की चिंता नहीं है। अध्यादेशी आतुरता ने सरकार को दर्द के उस चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां से आगे जाने और पीछे जाने दोनों में खतरा है। सरकार चलाना इसीलिए संख्या बल से ज्यादा सावधानी का खेल है। जमीन को लेकर कौन क्या कहता रहा है, इसे छोड़कर वे सब सरकार के खिलाफ एकजुट हैं, जिन्होंने यूपीए के भूमिअधिग्रहण कानून पर ही सवाल उठाए थे। यह बात बताती है कि सारा कुछ इतना सरल और साधारण नहीं है, जैसा समझा जा रहा है।

दिल्ली में पराए हैं वेः
    साधारण सी राजनीतिक समझ रखने वाला भी जान रहा है कि गुजरात से दिल्ली की यात्रा नरेंद्र मोदी ने, जनता के अपार प्रेम के चलते पूरी जरूर कर ली है पर लुटियंस की दिल्ली में अभी वे पराए ही हैं। टीवी चैनलों के बहसबाजों, अखबारों के विमर्शकारों, दिल्ली में बसने वाले बुद्धिवादियों के लिए नरेंद्र मोदी आज भी स्वीकार्य कहां हैं? मोदी आज भी इस कथित बौद्धिक समाज द्वारा स्वीकारे नहीं जा सके हैं। इस छोटे से वर्ग का विमर्श सीमित, आत्मकेंद्रित, दिल्लीकेंद्रित और भारतविरोधी है। इसे न तो वे छिपाते हैं, न ही उन्हें एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के बाद अपने विमर्शों में संशोधन की जरूरत लगती है। नरेंद्र मोदी जिस विचार परिवार के नायक हैं, वह विचार परिवार ही इस वर्ग के लिए स्वीकार्य नहीं है बल्कि उसकी निंदा के आधार पर ही इन सबकी राजनीति बल पाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विचार परिवार की यात्रा ने जो लोकस्वीकृति प्राप्त की है वह चौंकाती जरूर है, किंतु हमारे बुद्धिजीवी उस संदेश को पढ़कर खुद में बदलाव लाने के बजाए मोदी की सरकार को नाहक सवालों पर घेरने में लगे हैं। शायद इसीलिए सरकार बनते ही मोदी पर जो हमले शुरू हुए तो मोदी ने इस खेल को समझकर ही कहा था-“ जिन्होंने साठ साल तक कुछ नहीं किया वे हमसे पांच महीने का हिसाब मांग रहे हैं।“

भारतद्वेषी बुद्धिजीवियों के निशाने परः
मोदी का संकट लुटियंस की दिल्ली में बसने वाले भारतद्वेषी बुद्धिजीवी तो हैं ही, उनके अपने परिवार में भी संकट कम नहीं हैं। दिल्ली में आए मोदी की स्वीकार्यता स्वयं दिल्ली के भाजपाई दिग्गजों में भी नहीं थी। परिवार की एक लंबी महाभारत के बाद वे दिल्ली की गद्दी पर आसीन तो हो गए पर परिणाम देने की चुनौती अभी भी शेष है। आज भी दिल्ली के टीवी चैनलों का विमर्श क्या है, वही निरंजन ज्योति या हिंदू महासभा के कुछ नेताओं के बयान। यह आश्चर्यजनक है कि एक ऐसा संगठन हिंदू महासभा, जिसकी कोई आवाज नहीं है। उसका कोई आधार शेष हो, इसकी जानकारी नहीं। किंतु किस आधार पर हिंदू महासभा को बीजेपी से जोड़कर मोदी से जवाब मांगे जाते हैं, यह समझना मुश्किल है। इतिहास में भी हिंदू महासभा और आरएसएस के रास्ते अलग-अलग रहे हैं। साध्वी निरंजन ज्योति के बारे में अशोक सिंहल कह चुके हैं वे विश्व हिंदू परिषद से संबंधित नहीं हैं। आखिर क्यों देश के प्रधानमंत्री को इन सबके बयानों के कठघरे में खड़ा किया जाता है? अपने चुनाव अभियान से आज तक नरेंद्र मोदी ने कोई कटु बात किसी भी समुदाय के बारे में नहीं कही है। वे आरएसएस से जुड़े हैं, इसे उन्होंने नहीं छिपाया है। स्वयं संघ के नेतृत्व ने ज्यादा बच्चों के बयान पर आगे आकर यह कहा कि “हमारी माताएं बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं हैं। वे बच्चों के बारे में स्वयं निर्णय करेंगीं।“

 संघ परिवार का राजनीतिक विवेक है कसौटी परः
जाहिर तौर पर नरेंद्र मोदी को विफल करने के लिए एक बड़ा कुनबा लगा हुआ है। जिसमें राजनीतिक दलों के अलावा, प्रशासन के आला अफसर, वैचारिक दिवालिएपन के शिकार बुद्धिजीवी, मीडिया के लोग भी शामिल हैं। यह एक सरकार का बदलना मात्र नहीं है। एक राजनीतिक संस्कृति का बदलाव भी है। देश की बेलगाम नौकरशाही यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वे मोदी को सफल होने देंगे इसमें संदेह है। सरकार की प्रशासनिक मिशनरी पर किस मन और मिजाज के लोग हैं, कहने की आवश्यक्ता नहीं है। मोदी उन्हें कस रहे हैं किंतु वे चपल-चालाक लोग हैं, जिन्होंने मनमोहन सिंह जैसे पढ़े-लिखे आदमी का सत्यानाश कर दिया। 10-जनपथ और प्रधानमंत्री निवास की जंग में देश ने अपने इतिहास के सबसे बुरे दिन देखे, किंतु नौकरशाही मस्त रही। 

आज वही नौकरशाही नरेंद्र मोदी के रास्ते में इतिहास का सबसे बेहतर प्रधानमंत्री हो सकने की संभावना में बाधक है। मोदी के आलोचक सड़कों पर उतर आए हैं और उनके समर्थक बिना किसी गलती के खुद को अपराधी समझने की मनोभूमिका में आ गए हैं। इस अवसाद को हटाना भाजपा संगठन की जिम्मेदारी है। राजनीतिक क्षेत्र में बदलाव के लिए लोग बैचेन हैं। बहुत उम्मीदों से वे नरेंद्र मोदी को एक असंभव सी दिखने वाली जीत दिला चुके हैं, किंतु अब डिलेवरी का वक्त है। इतिहास नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस सबसे हिसाब मांगेगा। यह नहीं चलेगा कि कड़वा-कड़वा थू और मीठा-मीठा गप। इसलिए संघ परिवार का राजनीतिक विवेक भी कसौटी पर है। उन सबकी पहली जिम्मेदारी सरकार को हमलों से बचाने की है। छवि को बनाए रखने की है और अपनी ओर से ऐसा कोई काम न करने की है, जिससे सरकार की गरिमा को ठेस लगे। संघ परिवार और भाजपा में बेहतर समन्वय के लिए अभी और प्रयासों की जरूरत है। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार पर भरोसा करते हुए उसकी निगहबानी की जरूरत है। भारत जैसे देश में जहां पिछले तीन दशकों से मिलीजुली सरकारों के प्रयोग हो रहे हैं, वहां पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आना एक उपलब्धि से ज्यादा जिम्मेदारी है। 

नरेंद्र मोदी इतिहास के इस क्षण में अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते। वे संवाद कुशल हैं। संवाद के माध्यम से उन्होंने एक गांव बड़नगर से दिल्ली तक की यात्रा तय की है। अब उनके सामने कुछ कर दिखाने का समय है। उन्हें बताना होगा कि जनता ने अगर उन पर भरोसा किया है तो यह गलत नहीं है। उन्हें अपने विरोधियों, आलोचकों को गलत साबित करना होगा। क्योंकि अगर उनके आलोचक गलत साबित होते हैं, तो देश जीतता हुआ दिखता है। उनके आलोचकों की पराजय दरअसल भारत की जीत होगी। भारत ने भारत की तरह देखना और सोचना शुरू कर दिया है। पर ये अभी पहला मुबारक कदम है नरेंद्र मोदी को अभी इस देश के सपनों में रंग भरने हैं। उम्मीदों से खाली देश में फिर से उम्मीदों का ज्वार भरना है। चुनावों के बाद नए चुनाव आते हैं, इनमें हार या जीत होती है। किंतु देश का नेता उम्मीदों और सपनों की तरफ जनप्रवाह प्रेरित करता है। मोदी में वह शक्ति है कि वे यह कर सकते हैं। नीतियों के तल पर, डिलेवरी के मोर्चे पर अभी बहुत कुछ होना शेष है। एक बड़ा हिंदुस्तान अभी भी अभावों से घिरा है। असुरक्षा से घिरा है। रोजाना रोटी के संघर्षों में लगा है। उसकी उम्मीदें हर नई सरकार के साथ उगती हैं और फिर कुम्हला जाती हैं। सत्ता के आतंक और सत्ता के दंभ के किस्से इस देश ने साठ सालों में बहुत देखे-सुने हैं। गुस्से में आकर सरकारें बदली हैं। मोदी ने भी इस गुस्से का लाभ लेकर अच्छे दिनों का वादा कर राजसत्ता पाई है। उन्हें हर पल यह सोचना होगा कि वे दिल्ली में आकर दिल्ली वालों सरीखे तो नहीं हो जाएंगे। उनके विरोध में आ रहे तर्क बताते हैं कि नरेंद्र मोदी बदले नहीं हैं। वे कुछ करेंगे यह भरोसा भी है। किंतु सबसे जरूरी यह है कि उनके अपने तो उन पर भरोसा रखें और थोड़ा धीरज भी धरें।   

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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लोग अब बरखा, अर्णव और इनके जैसे लोगों से उब चुके हैं

मुंबई में फिक्की फ्रेम्स 2015 के पहले दिन के पहले सत्र की शुरुआत टाटा स्काई के सीईओ और एमडी हरित नागपाल ने अपने इस धुँआधार वक्तव्य से चर्चा की शुरुआत की। चर्चा का विषय था- भारत किस तरह मीडिया और मनोरंजन की विश्वव्यापी महाशक्ति बन सकता है (‘How can India be the global Media and Entertainment superpower)। उन्होंने सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा, मेरे लिए यह बहुत सामान्य बात है क्योंकि इस समय भारत विश्व की 50 सबसे बड़ी मीडिया और मनोरंजन अर्थव्यवस्थाओं में से है। सबसे अच्छी बात यह है कि हमारी वृद्धि दो-अंकीय है। पिछले पांच सालों से यह उसी स्तर पर है। इसलिए हमारे लिए सबसे जरूरी यह है कि हम इससे आगे बढ़ें ताकि महाशक्ति बन सकें। हमें इस चरण पर खुद से दो सवाल करने चाहिए- क्या हम कुछ अलग करने वाले हैं और जो कर रहे हैं, उसमें ही थोड़ा सा अलग करेंगे?
 
उन्होंने कुछ भारतीय ब्रैंड्स के उदाहरण दिए जैसे निरमा, लिज्जत पापड़, घड़ी डिटर्जेंट और चिक जिन्होंने मीडिया की बदौलत इस प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनौती दी। मीडिया ने न सिर्फ उपभोग को बढ़ाया, बल्कि वह आम लोगों तक निर्माण और वितरण को भी लेकर गया।
 
हरित ने मीडिया और मनोरंजन उद्योग की मुख्य समस्याओं में से एक पर चर्चा की। उन्होंने कहा, हमारे यहां नए विचारों और रचनात्मकता का अभाव है। अगर किसी को एक सफल प्रारूप मिल गया, तो उसके पीछे 20 लोग आंखें मूंदकर कूद पड़ते हैं। लोग यह नहीं समझ पाते कि किसी और स्टार प्लस या जीटीवी की हमें जरूरत नहीं, और अरनब गोस्वामी भी सिर्फ एक हैं और बरखा दत्त भी एक ही हैं। इसलिए जैसे ही कोई नया मनोरंजन चैनल शुरू होता है और वह वही सब दिखाता है तो उसकी दर्शक संख्या और राजस्व गिरने लगता है। फिर वे 20 से 22 मिनट के विज्ञापनों पर दांव लगाना शुरू करते हैं। नियामक उनसे सवाल करते हैं और उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दूसरी बात यह है कि हमें निर्माण को बड़े शहरों से छोटे शहरों की ओर ले जाना चाहिए क्योंकि असली प्रतिभा हमारे देश के सुदूर इलाकों में बसती है।
 
इसके बाद हरित ने उन क्षेत्रों के बारे में चर्चा की जहां सरकार को तेजी दिखानी चाहिए जिससे मीडिया और मनोरंजन उद्योग को लाभ हो। उनके अनुसार, उद्योग पर ग्लैमर, प्रचार, रचनात्मकता और सशक्तीकरण जैसे शब्दों का ठप्पा लगा हुआ है जिसके लिए खुद उद्योग और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं। यह उद्योग किसी भी दूसरे उद्योग जैसा है जो लोगों को लाभ पहुंचाता है, रोजगार का सृजन करता है और अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है। इसने पिछले कई सालों में ऐसा किया भी है। जहां तक टाटा स्काई की बात है तो पिछले तीन-चार सालों में अगर 50 लाख लोग इसके डिजिटल ग्राहक बने हैं तो इसने सरकार को टैक्स भी ज्यादा दिया है और इसके कंटेंट प्रोवाइडर भी बढ़े हैं। अपनी ग्रामीण उद्यमिता दक्षता योजना के जरिए हम गांवों में 80 हजार नए उद्यमी तैयार करना चाहते हैं और उन्हें पूर्णकालिक रोजगार देना चाहते हैं। एक साल से भी कम समय में, हमने 20 हजार उद्यमियों को रोजगार दिया है। इसलिए यहां सिर्फ ग्लैमर नहीं है। यह कहा जाता है कि इस उद्योग ने 60 लाख लोगों को रोजगार दिया है। और मेरा मानना है कि यह संख्या बढ़ने वाली है।
 
उन्होंने कहा कि हमारे यहां कारोबार शुरू करना थका देनेवाली प्रक्रिया है क्योंकि किसी कारोबारी को सरकार की तरफ से कई तरह की अनुमतियां और स्वीकृतियां लेनी पड़ती हैं। हम 250 करोड़ रुपए के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय से अनुमति का इंतजार कर रहे हैं। परियोजना के लिए पैसा आ गया है। लेकिन अगर 48 घंटे में अनुमति नहीं मिली तो हमें विदेशी निवेशकों को पैसा लौटाना होगा।
 
अगले सत्र में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव जे.एस.माथुर ने इस पर खुलासा किया और कहा कि हमने एक महीने पहले ही अनुमति दे दी थी लेकिन फिर टाटा स्काई को लगा कि निवेश के लिए जो रास्ता वह अपनाना चाहती है, उसके लिए दोबारा आवेदन करने की जरूरत है। इसलिए समय लग रहा है।
 
हालांकि नई सरकार के कामकाज में तेजी है, फिर भी बड़ा सवाल यह है कि उद्योग में वृद्धि कैसे होगी। हरित के अनुसार, यह आत्म नियंत्रण के जरिए संभव हो सकता है। हम यहां सूचना देने के लिए हैं, अनुमति मांगने के लिए नहीं। अगर हम नियम तोड़ते हैं तो हमारे लाइसेंस रद्द कर दीजिए और सजा दीजिए। वरना, हर दिन लंबित अनुमतियों से कामकाज में व्यवधान पड़ता है। उद्योग पर भी असर होता है।
 
डिजिटलीकरण पर हरित ने कहा, घरों के डिजिटलीकृत होने से अधिक से अधिक निर्माता अपने निर्माण पर अधिक पैसा लगा पाते हैं। इसकी शुरुआत हो चुकी है, कितनी फिल्में सिर्फ केबल और सेटेलाइट चैनलों को अपने अधिकार बेचकर अच्छा कमा रही हैं। देश में 42 शहरों में डिजिटलीकरण हो चुका है। डिजिटलीकरण, ऑटोमेशन के बराबर है। लोकल केबल ऑपरेटर, मल्टी सिस्टम ऑपरेटर का सर्विस प्रोवाइडर बन गए हैं, पर वे उनके हिस्सेदार नहीं है। मेरे ख्याल से, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
 
साभार- समाचार4मीडिया से 

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रेल मंत्री के ये प्रयोग अगर सफल हो जाएँ

हादसे का वक्त इससे ज्यादा अपशकुन वाला नहीं हो सकता था। जिस दिन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नवाचार पर सुझाव के लिए कायाकल्प परिषद की कमान संभालने के लिए रतन टाटा को आमंत्रित किया, उसी दिन हुए रेल हादसे में 39 लोग मौत के शिकार हो गए। अगले दिन इसी अखबार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें अर्थशास्त्री विवेक देबरॉय की अगुआई वाली समिति की सिफारिशों को शामिल किया गया था, समिति का गठन रेलवे की गाड़ी को पटरी पर लाने में मदद के मकसद से किया गया था।
 
राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन और राहुल बजाज को इंडियन एयरलाइंस का चेयरमैन बनाया था ताकि नए विचारों और त्वरित फैसलों के साथ उन दोनों कंपनियों का कायाकल्प हो सके। राजीव गांधी का प्रधानमंत्रित्वकाल बहुत लंबा नहीं चला और हम जानते हैं कि बाद में इन दोनों कंपनियों के साथ क्या हुआ। एंप्रेस मिल्स और नेलको को संभालने में रतन टाटा को कामयाबी नहीं मिली लेकिन टाटा समूह को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका अदा की। यह संभवत: अत्यधिक सरलीकरण होगा लेकिन फिर भी सच है कि किसी एक कंपनी के प्रबंधन के मामले में रतन टाटा उतने कारगर नहीं रहे लेकिन जब किसी संगठन को एक दृष्टिïकोण देने की बारी आई तो वह बेजोड़ साबित हुए।

अभी रेलवे को सबसे पहले किस तरह के प्रबंधकीय उपचार की दरकार है? तात्कालिक रूप से विचार कितने प्रासंगिक होंगे? मेरे ख्याल से इस गंध को साफ करने के लिए आपात कदम उठाने की जरूरत है। सबसे बुनियादी स्तर आधारभूत खामी दुर्घटना के मामलों में नजर आ रही है जो वक्त के साथ और बदतर होती जा रही है। पिछले दस वर्षों के दौरान यात्री हादसों में चार गुना वृद्घि हुई है। मार्च, 2013 में लोकसभा सचिवालय द्वारा तैयार एक विवरणिका के अनुसार 2002-03 में प्रति दस लाख मुसाफिरों पर 0.03 के आंकड़े से 2011-12 में यह बढ़कर 0.126 हो गया। जब हम इन हादसों में हुई मौतों पर नजर डालते हैं तो तस्वीर और साफ होती है। वर्ष 1965-96 के बीच तीन दशकों तक अगर अपवादस्वरूप कुछ बुरे वर्षों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश वर्षों में दुर्घटनाओं में हुई मौतों का आंकड़ा 100 से कम के दायरे में ही रहा।
पिछले एक दशक में चीजें खराब होना शुरू हुईं। वर्ष 2003-04 से 10 में से नौ वर्षों के दौरान दुर्घटनाओं में मृतकों की संख्या 100 से ज्यादा रही जबकि इनमें से छह वर्षों में यह आंकड़ा 200 से अधिक और तीन वर्षों में 300 से अधिक रहा। पिछले कुछ वर्षों के दौरान रेलगाडिय़ों में आग लगने के भी काफी मामले सामने आए हैं। रेलगाडिय़ों के डिब्बे बनाने में, जिस सामग्री का इस्तेमाल होता है, वह वास्तव में अग्निरोधी है या नहीं, जैसा कि अनिवार्य होता है? विवरणिका के अनुसार अधिकांश हादसे प्रक्रियात्मक नाकामियों की वजह से होते हैं। सिग्नल और रूट रिले इंटरलॉकिंग जैसे तंत्र पुराने पड़ चुके हैं, जिनसे गड़बडिय़ां होती हैं और जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। 1990-91 में 16 लाख कर्मियों की तादाद को पिछले तीन वर्षों में घटाकर 13 से 14 लाख करने पर रेलवे ने बड़ी शाबाशी हासिल की लेकिन आखिर किस कीमत पर? लाखों सुरक्षाकर्मियों के पद रिक्त हैं।

तमाम हादसे गाड़ी के पटरी से उतर जाने, दो रेलगाडिय़ों की भिड़ंत और क्रॉसिंग पर गड़बड़ी के कारण होते हैं। इसकी वजह भी रेलवे की पुरानी पड़ चुकी पटरियां और गड़बड़ी वाला रॉलिंग स्टॉक है। खराब रखरखाव भी एक  महामारी है। हालिया हादसे में भी खुद रेलवे की ओर से आरोपों की झड़ी लगी। रखरखाव के लिहाज से रेलगाड़ी की हालत खराब थी और कर्मचारी संघ के नेताओं का आरोप है कि दो स्टेशनों पर कमजोर ब्रेकों की शिकायत पर संबंधित विभागों ने गौर ही नहीं किया। दुर्घटना का स्पष्टï कारण सिग्नल का अतिक्रमण करना था लेकिन यह कमजोर ब्रेक पावर के कारण हो सकता है। आने जाने के पूरे चक्कर के लिए रखरखाव पंजीकरण प्रत्येक दौरे के निरीक्षण के बाद दिया जाना चाहिए। कर्मचारी संघों के सदस्यों की तो छोडि़ए रेलवे के ही तमाम लोग निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि लागत में कटौती और लंबी प्रक्रियाओं से बचने की कवायद ही दुर्घटनाओं की असल वजह हैं।

विवेक देबरॉय समिति के बारे में माना जा रहा है कि वह रेलवे के पूरी तरह निजीकरण या व्यवसायीकरण के बजाय यात्री और मालगाडिय़ों के संचालन के अलावा रॉलिंग स्टॉक के उत्पादन के निजीकरण का सुझाव दे सकती है। इसमें निजी रेलगाडिय़ों द्वारा टै्रक के उपयोग को लेकर स्वतंत्र नियामक का प्रावधान हो सकता है। टै्रक सहित बुनियादी ढांचे का प्रबंधन एक मूल कंपनी के तहत स्वतंत्र कंपनी द्वारा किया जाना चाहिए।

रेल यातायात बहुत बढ़ा है, जिसमें कई रेलगाडिय़ां जुड़ी हैं और अधिक नौकरियां सृजित हुई हैं। ग्राहक सेवा, विश्वसनीयता, मुनाफा और सक्षमता में कोई खास सुधार नहीं हुआ लेकिन सुरक्षा रिकॉर्ड स्पष्टï रूप से सुधरा है। निजीकरण के साथ ही सरकारी नियंत्रण भी वास्तव में बढ़ा है, नतीजतन ढांचा और जटिल हुआ है। असली सबक यह नहीं है कि निजीकरण नाकाम हुआ है बल्कि यह है कि अनुभवों से सीखने वाला और कारगर युक्तियों को तलाशने वाला एक तंत्र है। अगर स्वास्थ्य रूपकों का इस्तेमाल करें तो देबरॉय समिति द्वितीयक देखभाल में परिर्वतन की सिफारिशें करेगी और रतन टाटा तृतीयक देखभाल के लिए एक दृष्टिïकोण को विकसित करेंगे लेकिन असल में रेलवे को इस समय प्राथमिक देखभाल की दरकार है। बुनियादी चीजों की ओर लौटना बेहद जरूरी है, पुराने ढांचे को बदलना होगा, रखरखाव के क्रम को लेकर सख्त होना होगा और प्रक्रियात्मक अभ्यास करना होगा ताकि आने वाले वर्षों में सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और कर्मियों की प्रतिबद्घता और हौसला बढ़े। उदासीनता और भ्रष्टïाचार की मौजूदा संस्कृति की जगह वास्तव में नए नेतृत्व की जरूरत है, जो वफादारी और प्रतिबद्घता वाला हो।
 
साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से

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आसाराम के बेटे नारायण साईं के घूस के 8 करोड़ जप्त

अहमदाबाद। प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) ने सूरत में दो लोगों के ठिकानों पर छापा मारते हुए 8.10 करोड़ रूपये जब्त किए हैं। बताया जाता है कि इन पैसों को आसाराम के बेटे नारायण सांई पर लगे रेप केस को कमजोर करने के लिए पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को घूस के रूप में दिया जाना था।
 
ईडी के सूत्रों का कहना है,  सूरत निवासी केतन पटेल के पास से आठ करोड़ और रीना वाघेला के पास से 10 लाख रूपये जब्त किए गए हैं और नारायण सांई के खिलाफ घूस देने का मामला दर्ज किया गया है। केतन पटेल जमीन व्यापारी है और रीना वाघेला घूस मामले में आरोपी हितेन्द्रसिंह वाघेला की पत्नी है। इस बारे में ईडी ने पिछले साल 27 नवंबर को नारायण सांई का बयान दर्ज किया था। नारायण सांई ने बताया था कि, उसने अपने साथी उदय सांघानी को पटेल से पैसे लेने और सूरत के नरेश मल्कानी को देने को कहा था। मल्कानी इस पैसे को पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को घूस के रूप में देने वाला था।
 
घूस कांड का खुलासा पिछले साल सूरत पुलिस क्राइम ब्रांच ने किया था। इसके अनुसार सांई की योजना के अनुसार डॉक्टरों, पुलिसवालों और न्यायिक अधिकारियों को केस को कमजोर बनाने के लिए पैसा दिया जाना था। इसके बाद पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ्तार किया था। उस समय केतन पटेल ने जांच में बताया था कि फ्लैट खरीदारों ने उसके एक प्रोजेक्ट के लिए यह पैसा उसे दिया था। हालांकि ईडी की जांच में उसकी पोल खुल गई।
 
सांई दिसंबर 2013 से ही सूरत जेल में बंद है। उसके और आसाराम के खिलाफ दो बहनों ने दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया था। छोटी बहन ने नारायण सांई पर आरोप लगाया कि उसने सूरत आश्रम में 2002 से 2005 के बीच उससे कई बार दुष्कर्म किया। वहीं आसाराम एक अन्य मामले में राजस्थान की जोधपुर जेल में बंद है। 

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पड़ोसियों से दोस्ताना संबंध न होना एक बड़ी समस्या

प्रधान मंत्री के सुरक्षा सलाहकार श्री अजीत डोभाल का कहना है कि ऎसा एक भी पड़ोसी देश नहीं है जिसके साथ भारत को परेशानी न हो। उन्होंने कहा कि मैनेजिंग सिक्यॉरिटी की सबसे बड़ी समस्या ही पड़ोसी देशों से ज्यादा दोस्ताना संबंध न होना है। इंटेलिजेंस ब्यूरो के चीफ रह चुके डोभाल ने कहा, "म्यानमार के साथ इनसर्जेसी की समस्या है, बांग्लादेश के साथ गैरकानूनी प्रवासी की समस्या है, तो नेपाल का इस्तेमाल कुख्यात एजेंसिया भारत के खिलाफ गलत इरादों को अंजाम देने के लिए करती हैं।"
 
डोभाल ने कहा, "भारत जैसे बड़े देश की सुरक्षा करना बड़ा काम है। देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा बड़ी है और पड़ोसी देशों से हमारे कुछ खास दोस्ताना संबंध भी नहीं हैं। इस पर सबसे बुरा यह है कि हमारे दो पड़ोसी देश परमाणु ताकत भी रखते हैं।" एयरफोर्स के एक इवेंट में डोभाल ने पाकिस्तान व इस्लामाबाद में रेडिकलाइजेशन पर चिंता व्यक्त की।
 
डोभाल ने कहा, "पाकिस्तान में रेडिकलाइजेशन और अफगानिस्तान में समस्याएं भी हमारे लिए चिंता का विषय हैं। हमें पाकिस्तानी सरकार पर संशय है कि वे अपनी सरजमीं पर इसे पूरी तरह से कंट्रोल में कर सकेंगे।" डोभाल ने कहा कि भारत पाकिस्तान के साथ तमाम समस्याओं को न्यायपूर्वक सुलझाना चाहता है और इसके लिए प्रयासरत है। 

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लापरवाह डॉक्टर को देना होगा 19 लाख का हर्जाना

कंज्यूमर फोरम ने मुंबई के एक डॉक्टर को निर्देश दिया है कि वह मलाड़ में रहने वाली एक महिला को 19 लाख रुपये हर्जाना दे। डॉक्टर के वक्त पर न पहुंचने की वजह से इस महिला ने डिलिवरी के कुछ ही देर बाद अपना बच्चा खो दिया था।
 
मुंबई सबअर्बन डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर फोरम ने कहा, 'बच्चे की मौत डॉक्टर की लापरवाही की वजह से हुई। परिवार को पहुंचे सदमे और नुकसान के लिए डॉक्टर ही जिम्मेदार है।' फोरम ने कहा, 'डॉक्टर को मालूम था कि महिला प्रेगनेंट है और डिलिवरी की नॉर्मल अवधि पार कर चुकी है। ऐसे में जन्म के वक्त डॉक्टर का मौजूद रहना और इस बारे में अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी था।'
 
बच्चे की मां सोनू करीर ने शिकायत की थी और केस पिता ने लड़ा। मामला 2003 का है। 18 अक्टूबर को वह चेकअप के लिए डॉक्टर के पास गईं, तो बताया गया कि बेबी कभी भी हो सकता है। डॉक्टर ने महिला को सलाह दी कि वह कांदिवली के एक अन्य अस्पताल में भर्ती हो जाए।
 
सोनू 28 अक्टूबर को 12.30 बजे लेबर पेन होने पर हॉस्पिटल ले जाई गईं। डॉक्टर 4 बजे आया और एग्जामिनेशन के बाद कहा कि 15 मिनट में डिलिवरी होगी। इसके बाद डॉक्टर घर के लिए रवाना हो गया। सोनू साढ़े 5 बजे तक दर्द से जूझती रहीं। जब उन्होंने डॉक्टर के बारे में पूछा तो बताया गया कि वह जल्दी आएंगे। इस बीच नर्स उन्हे ऑपरेशन थिएटर ले गईं। नर्स की मौजूदगी में ही बेबी हो गया। जब डॉक्टर आया तो उसने परिवार से कहा कि बेबी को तुरंत बच्चों के अस्पताल ले जाइए।
 
फोरम ने डॉक्टर का यह दावा खारिज कर दिया कि बच्चा मृत पैदा हुआ था और उसने उसे बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। यह पाया गया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह अननैचरल थी और ऑक्सिजन की कमी की वजह से उसकी जान गई थी। फोरम ने पाया कि गर्भनाल बच्चे के गले में लिपटी हुई थी और इस वजह से वह जोर-जोर से सांस ले रहा था। फोरम ने कहा कि इससे साबित होता है कि बच्चा मृत पैदा नहीं हुआ था।
 
साभार-
टाईम्स ऑफ इंडिया से 

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रेल बजट की खास बातें, जिनकी कहीं कोई चर्चा नहीं हुई

अब तक अधिकांश रेल मंत्री अपना बजट प्रस्तुत करते हुए तथ्यों की अपेक्षा आंकड़ों का सहारा लेने का ही प्रयास करते रहे हैं। संभवतः पहली बार हुआ है कि रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने एक साहसिक निर्णय लेते हुए सन् 2015-16 के लिए 1,00,011 करोड़ रुपए का रेल बजट प्रस्तुत किया। इस बजट में गत वर्ष की अपेक्षा आकार में 52 प्रतिशत की भारी वृद्धि की गई, लेकिन उसका भार आम जनता पर नहीं डाला गया। श्री सुरेश प्रभु ने रेल बजट में लोगों को लुभाने की अपेक्षा उन्हें रेल की वास्तविक स्थिति से अवगत कराने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने खुद को जनता की नाराजगी का शिकार भी नहीं होने दिया और यात्री किराए में वृद्धि करने की अपेक्षा माल भाड़े की दरों में 16 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की। भले ही यह विकासोन्मुखी बजट कई अर्थों में पहले के बजटों से अलग है परन्तु उन्होंने रेल उपभोक्ताओं को आंकड़ों के जाल में उलझाने का प्रयास कतई नहीं किया। इसके लिए उन्होंने अपने वित्तीय प्रबंध के कौशल का सहारा लिया। रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष श्री विवेक सहाय ने इसे बजट कम और विजन दस्तावेज कहना बेहतर समझा।

     

रेल बजट 2015 अगले पांच साल में कई लक्ष्यों को पूरा करने वाला साबित होगा। बजट में पूरे तौर पर 4 चीजों पर ध्यान दिया गया है। पहला लक्ष्य- यात्रियों को निरंतर मजबूत और स्थायी तौर पर सुविधा प्रदान करना है। अनुभव को जानकर उनके साथ संपर्क स्थापित करना रेल में सुरक्षित और आरामदायक यात्रा का विकल्प लोगों को देना है, रेलवे की आधारभूत संरचना और क्षमता का आधुनिकीकरण के साथ विस्तार करना एवं रेलवे को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए रेलवे ने पंचवर्षीय योजना तैयार की है। जिसके लिए रेलवे ने करीब साढ़े आठ लाख करोड़ रूपए निवेश की योजना बनाई है।

 

     

रेल मंत्री ने न तो किसी नई रेलगाड़ी की घोषणा की है, जैसा कि अधिकतर रेल मंत्री करते रहे हैं, और न ही रेलों के फेरों में बढ़ोतरी की बात की है। इस पर भी रेलवे के विकास पर होने वाले व्यय का बोझ उन्होंने रेल उपभोक्तओं पर डालने से परहेज किया। संभवतः उन्हें इस बात का विश्वास रहा होगा कि कुछ गाड़ियों में 24 के बजाय 26 कोच लगाने से अधिक किराया वसूला जा सकेगा। वर्तमान रेल लाइनों में 24 हजार किलोमीटर की बढ़ोतरी भी रेल के लिए अधिक कमाई का कारण बनेगी। रेल मंत्री ने अपना अनुमान यात्रियों की बढ़ने वाली संख्या के आधार पर लगाया है। उनका मत है कि वर्तमान में 2.10 करोड़ की अपेक्षा आने वाले समय में 3 करोड़ यात्री रेलवे का उपयोग प्रतिदिन करेंगे। मालभाड़े को एक समान बनाए जाने के लिए कदम उठाए गए है। इस कदम से दूरदराज के इलाके जैसे नॉर्थ ईस्ट के लोगों को अधिक मालाभाड़े का बोझ नही उठाना पड़ेगा।

     

साथ ही रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु ने रेलवे स्टेशनो को बेहतर बनाने के लिए आदर्श स्टेशन योजना का खाका भी पेश किया है। इस योजना के तहत 200 नए रेलवे स्टेशन का चयन किया गया है जिन्हे विश्वस्तरीय बनाया जाएगा। इसके अलावा यात्री सुविधाओं पर जोर देते हुए स्टेशनों पर वाई-फाई (wi-fi) की सुविधा प्रदान किए जाने की योजना का भी ऐलान किया। यात्रियों की सुविधा के लिए लिफ्ट और एस्कलेटर के साथ ही विकलांगों के लिए स्टेशनो को फ्रेंडली स्वरूप दिया जा रहा है। रेलवे स्टेशनों के आसपास खाली पड़ी जमीन पर कौशल विकास से जुड़ी गतिविधियां शुरु करने की भी योजना है, जिसके तहत युवाओं को रोजगार से जुड़े अलग-अलग कोर्सेज कराए जाएगें।

 

रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास और लॉजिस्टिक पार्क के लिए एक लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। ऐसा सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त निवेश से होना संभव है परन्तु इसके लिए भी रेलवे को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे और निजी पूंजी को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ आकर्षक प्रस्ताव लाने होंगे। प्रसन्नता की बात यह है कि उद्योग जगत ने इस बजट का दिल खोल कर स्वागत करते हुए कहा है कि रेल बजट में व्यापार आसान बनाने और इसमें निवेश बढ़ाने के लिए लंबी अवधि के उपाय किए गए हैं। उद्योग जगत ने उत्साहित होते हुए कहा है कि सरकार के पीपीपी मॉडल के जरिए रेलवे के सुधार की गति तेज़ होगी। संभवतः सरकार की नजर उन रेल डिब्बों के निर्यात पर भी रही है, जो प्रति वर्ष हमारे रेल के कारखानों में निर्मित होते हैं। स्मरणीय है कि हमारे कारखाने प्रति वर्ष लगभग 350 डिब्बों का उत्पादन करते हैं जिन्हें नई ट्रेनों में लगाने की बातें की जाती रही हैं। इन कारखानों के लिए प्रति वर्ष 2200 करोड़ रुपये के सामान का आयात किया जाता रहा है। प्रधान मंत्री के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अन्तर्गत इसमें 75 प्रतिशत की कमी करने की महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य किया जायेगा। 

 

रेलवे का राजस्व बढ़ाने के लिए रेल मंत्री ने पर्यावरण में सुधार और बिजली के उपयोग में बचत करने की योजना भी बनाई है। रेलवे अपनी भूमि, स्टेशनों और भवनों की छतों पर सौर ऊर्जा संयत्र लगाने की योजनाओं में तेजी से काम करेगा। रेल मंत्री के एक अनुमान के अनुसार इन से न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी बल्कि रेलवे आने वाले पांच वर्षों में कम से कम एक हजार मेगावाट क्षमता के संयत्र लगाने में सक्षम होगा। इसी प्रकार बिजली का अपव्यय रोकने का भी हर संभव प्रयास किया जायेगा। रेलवे अपने उपयोग के लिए बिजली खरीदने के लिए भी बिजली कम्पनियों में होने वाली प्रतिस्पर्धा का लाभ उठा कर कम से कम तीन हजार करोड़ रुपए की बचत करने में सफल हो सकेगा। श्री सुरेश प्रभु की योजना है कि पर्यावरण प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए गाडि़यों को चलाने में डीजल के साथ साथ सीएनजी का प्रयोग भी किया जायेगा। इतना ही नहीं उन्होंने वाटर हारवेस्टिंग सिस्टम के विस्तार का भी निर्णय लिया है। उन्होंने ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए रेल इंजिनों की आवाज कम करने का भी फैसला किया है। इस प्रकार की योजनाओं पर पहले न तो विशेष ध्यान दिया गया था और न इनके प्रति किसी प्रकार के गंभीर प्रयास ही किए गए थे। इन बातों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि रेल बजट भविष्योन्मुखी और यात्री केन्द्रित है जिसमें एक स्पष्ट नजरिया और उसे हासिल करने की निश्चित योजना का मिश्रण है। इससे सिद्ध होता है कि रेल मंत्री ने प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि को ध्यान में रखते हुए ही रेल बजट तैयार किया है। केन्द्रीय मंत्री श्री वेंकैया नायडू का भी यह मानना है कि बजट निश्चित रूप से रेल यात्रियों के लिए गति, सुरक्षा, संरक्षा और संतोष को सुनिश्चित करने वाला है।

 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की महत्वकांक्षी योजना बुलेट ट्रेन को अगले दो वर्षों में हकीकत में बदलने की कोशिश की जाएगी। इसके लिए रेलवे आवश्यक नेटवर्क तैयार करेगा। बुलेट ट्रेन न केवल प्रधानमंत्री का सपना है बल्कि वे भारत के भविष्य के लिए एक सुनहरी किरण भी है क्योंकि ऐसी गाड़ियों के चलने से यात्रा के समय में 20 प्रतिशत तक की बचत हो सकेगी।

 

इसके अलावा 9 रेलवे कॉरिडोर्स पर ट्रेनों की गतिसीमा को भी वर्तमान 110-130 किमी प्रति घंटा से बढ़ाकर 160-200 किमी प्रति घंटा करने की भी योजना है। रेल मंत्रालय की कोशिश रेल की औसत गति 100 किमी. प्रति घंटा करने की है। श्री प्रभु ने लोगों को प्रसन्न करने की बजाय एक प्रगतिशील रेल की योजना पर ध्यान दिया। इसी कारण इस बजट को लोकलुभावन बजट कहने की अपेक्षा एक प्रगतिशील और सुधारवादी बजट की संज्ञा दी गई।यात्री सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रेल बजट में रेलवे स्टेशनो पर बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाने का भी ऐलान किया। इसके साथ ही टोल फ्री नंबर 182 भी जारी किया जिस पर सुरक्षा संबंधित शिकायत दर्ज की जा सकती है, साथ ही 138 नम्बर पर 24 घंटे हेल्पलाइन की भी शुरूआत की गई। इसके अलावा चुनिंदा रेल मार्गों पर टीसीएस यानी ट्रेन कॉलिजन एवाएडेंस सिस्टम इंस्टॉल करने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। आने वाले वक्त में 3438 मानवरहित क्रॉसिंग को खत्म किया जाएगा, जिसके लिए बजट में 6581 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।  

 

रेल बजट में एन डी ए सरकार के स्वच्छता अभियान को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 650 स्टेशनों पर शौचालय बनाने की बात भी की है। रेल मंत्री ने कहा कि हमारा प्रयास होगा कि इस वर्ष रेलगाडि़यों में 17,000 जैव शौचालयों का प्रबंध हो सके और हाउस कीपिंग सेवा में भी सुधार किया जा सके। यह अपने आपमें बहुत बड़ी बात है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लगभग 7000 रेलवे स्टेशनों को साफ सुथरा रखने का दायित्व रेल विभाग पर होता है। इस पर भी उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया है कि रेलवे स्टेशनों की साफ सफाई का पहले की अपेक्षा कहीं अधिक ध्यान रखा जायेगा, इस लिहाज से स्वच्छता पर नई पॉलिसी बनाने का भी ऐलान किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अन्य अनेक छोटी छोटी परन्तु महत्वपूर्ण सुविधायें यात्रियों को उपलब्ध कराने की घोषणाएं भी की हैं, जिन के कारण अधिकांश यात्री अपमानित और स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते थे। शायद पहली बार यात्रियों को यह महसूस हुआ होगा कि रेलवे ने उन्हें एक उपभोक्ता के रूप में स्वीकार करते हुए उनके अधिकारों की ओर ध्यान दिया है।

 

बजटीय अनुमान के मुताबिक 2015-16 के लिए 100011 करोड़ रूपये की वित्तीय व्यवस्था की गई है जोकि पिछले बजट की तुलना में 52 प्रतिशत अधिक है। इस राशि का 41.6 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से आएगा जबकि 17.8 प्रतिशत आंतरिक संसाधनों द्वारा जुटाया जाएगा।

 

पहली बार रेल मंत्री ने सांसदों का आवाहन करते हुए उनसे अनुरोध किया कि वे सांसद निधि का कुछ भाग रेलवे के विकास के लिए इस्‍तेमाल करें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सांसद इस निधि का उपयोग अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने में करना चाहते हैं परन्तु अधिकांश सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों में कोई न कोई रेलवे स्टेशन भी होता है। यदि वहां पर कोई विकास कार्य किया जायेगा तो उससे सांसदों के मतदाताओं को ही सुविधायें मिलेंगी। प्रत्येक सुविधा प्रदान करने का दायित्व आज तक रेलवे विभाग का ही क्यों माना जा रहा है। क्या सांसदों का कार्य इतना ही है कि वे अपने अपने क्षेत्रों के लिए नई नई रेल लाइनों की ही मांग करते रहें और स्वयं रेलवे के विकास में योगदान देने से बचते रहें इस दृष्टि से रेल मंत्री के इस विचार का स्वागत किया जाना चाहिए। रेल मंत्री ने एक नया विचार सांसदों के सम्मुख प्रस्तुत किया है। कम से कम वे सांसद जिन की पूरी सांसद निधि का उपयोग नहीं हो पा रहा है वे तो इस दिशा में विचार कर ही सकते हैं। इसमें उनके क्षेत्र को भी लाभ होगा ही इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। रेल मंत्री ने लंबे समय को ध्यान में रखते हुए दूरगामी योजनाएं जनता के सामने रखीं हैं उनके फलीभूत होने का इंतजार तो किया ही जाना चाहिए।

 

(पीआईबी फीचर)
ईमेल: – featuresunit@gmail.com
himalaya@nic.in

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20-30 रु. में स्वादिष्ट खाना मिलता है बेंगलुरू में

20-30 रुपये खाने की ऐसी थाली जो स्वादिष्ट भी हो और पौष्टिक भी हो, शायद आज के समय हम-आप इसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। तेजी से बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा असर खाने-पीने और स्वास्थ्य के क्षेत्र पर काफी पड़ा है। इस वजह से अगर स्वादिष्ट और पौष्टिक खाना चाहिए तो कम से कम 50 रुपये तो जेब ढीली करनी पड़ती है।
 
ऐसे में गरीब-मजदूर वर्ग के लिए रोड किनारे लगी रेहड़ी, ढाबों आदि के अलावा खाने का सस्ता कोई और विकल्प नहीं था। लेकिन, गुड़गांव स्थित रेस्ट्रॉन्ट जनता मील्स 20-30 रुपये में स्वादिष्ट और पौष्टिक आहारों वाली थाली बेचकर अविश्वसनीय कारनामा अंजाम दे रहा है।
 
 
इस कंपनी की शुरुआत मई 2013 में हुई थी। इस का लक्ष्य गरीब वर्ग जो रेहड़ियों, ढाबा, छोटे रेस्ट्रॉन्ट या घर के पके खाने पर निर्भर रहते हैं, को 20-30 के हिसाब से सस्ता, साफ और पोषक खाना उपलब्ध करवाना है।
 
इस तरह का रेस्ट्रॉन्ट खोलने का विचार जेसी वान डे जैंड के भारत आने और जनता मील्स में निवेश करने वाले प्रभात अग्रवाल से उनकी मुलाकात के बाद आया था। जैंड अपनी कंपनी एन्विउ जो इन्कयुबेटर बनाती है, के प्रसार के लिए भारत आए थे। वह सोशल सेक्टर में किसी स्टार्टअप्स की तलाश में थे लेकिन अग्रवाल से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना बिजनस ट्रैक बदलने और खाने का बिजनस शुरू करने का निर्णय किया।
 
बहुत ही कम समय में जनता मील्स ने काफी तरक्की की है। अभी दिल्ली, मानेसर और गुड़गांव में इसके कुल 25 आउटलेट्स हैं जिनमें 8 से 16 सीटें होती हैं। इस रेस्ट्रॉन्ट का खाना सेंट्रल किचन में तैयार किया जाता है जो पूरे भारत में स्कूल लॉन्च प्रोग्राम चलाने वाली एनजीओ अक्षय पत्रा की संपत्ति है।
 
अग्रवाल ने बताया, 'हमारा टारगेट सेगमेंट गुड़गांव में रहने वाले करीब 10 लाख और दिल्ली एनसीआर में रहने वाले एक करोड़ या उससे ज्यादा लोग हैं।' कंपनी खाना सप्लाई का काम भी करती है और ज्यादातर सप्लाई गारमेंट फैक्ट्रियों, एनजीओ, झुग्गी-झोपड़ियों में चलने वाले स्कूल और इसके सेंट्रल किचन से नजदीक एक बड़े निर्माण स्थल पर की जाती है।
 
अग्रवाल ने बताया, 'हमारा खाना दो स्थानों पर खाया जाता है, या तो रेस्ट्रॉन्ट के अंदर या लोग अपने स्थान पर ले जाकर खाते हैं। इस व्यवस्था से हमारे टारगेट सेगमेंट को पोषक खाना मिल पाता है।'
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

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इंडिया रनवे वीक सीजन 4 के लिए फैशनिस्‍टा और आईएफएफडी एक साथ

शिक्षा के नजरिये से फैशन हमेशा युवाओं के लिए उत्‍सुकता और सृजनात्‍मकता का विषय रहा है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां कोई भी अपनी कल्‍पनाशक्ति से एक अलग मुकाम हासिल कर सकता है, यह रोजगार के लिए बेहतर विकल्‍प भी है। फैशनिस्‍टा स्‍कूल ऑफ फैशन टेक्‍नोलॉजी (फैशनिस्‍टा), नई दिल्‍ली ने इंडियन फेडरेशन फॉर फैशन डेवेलपमेंट (आईएफएफडी) के सहयोग से इंडियन रनवे वीक (आईआरडब्‍ल्‍यू) सीजन 4 – समर एडीशन 2015 में हिस्‍सा लिया है, यह फैशन की शिक्षा और फैशन के व्‍यापार को के प्रति लोगों के नजरिये को प्रोत्‍साहित करने के लिए है।

फैशन के क्षेत्र में युवा प्रतिभाओं को प्रोत्‍साहित करने के लिए फैशनिस्‍टा और आईएफएफडी मिलकर आईआरडब्‍ल्‍यू में एक फैशन शो का आयोजन 10 अप्रैल से 12 अप्रैल 2015 तक, होटल ओप्‍यूलेंट, छतरपुर नई दिल्‍ली में करेंगे।

फैशन, जैसा कि हम सभी जानते हैं यह रचनात्‍मकता और विचारों की स्‍वतंत्रता को बयां करता है। लेकिन सफल व्यवसाय को चलाने के लिए एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। इस फैशन वीक में फैशन के व्‍यापार के बारे में – सही विचार के साथ उत्‍पादों के सही प्रदर्शन और बेहतर उत्‍पाद को आगे लाने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी जायेगी, जिससे प्रतिभा लोगों के सामने आये।

इस फैशन वीक के दौरान छात्र यह सीखेंगे कि किस तरह से घरेलू और अंतर्राष्‍ट्रीय खरीदारों और डिजाइनरों के साथ एक बेहतर तालमेल बैठता है और कैसे डिजाइनर उपभोक्‍ताओं की मांग पूरा करने में सफल होते हैं। इसके अलावा छात्र यह सीखेंगे कि इस उद्योग में अपनी छवि को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।
फैशनिस्‍टा के प्रबंध संचालक, नीतू पवन मनीकटालिया के अनुसार, ''इंडिया रनवे वीक डिजाइनरों और फैशन के छात्रों को फैशन के बारे में सीखने और समझने के लिए एक अच्‍छा मंच है। इसमें उनको उनके खुद के अनुभव के साथ स्‍पष्‍ट जानकारी मिल जायेगी''

आईएफएफडी के संस्‍थापक अविनाश ने बताया, फैशन और शिक्षा के बीच यह सहयोग भारतीय युवा फैशन विरादरी के बीच जानकारी बांटने का एकीकृत प्रयास है।''
 

मीडिया संपर्क 

ख्याति मंगलानी

08527413948

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