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ये है दूसरी आज़ादी की योध्दाः श्रेया सिंघल

आईटी ऐक्ट के सेक्शन 66 ए को रद्द करने के ऐतिहासिक फैसले के पीछे दिल्ली की श्रेया सिंघल का बड़ा हाथ है। 21 साल की श्रेया ने ही सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल की थी जिसके पक्ष में यह फैसला आया है। श्रेया दिल्ली की रहने वाली हैं और कुछ ही समय पहले यूके में पढ़ाई खत्म करके लौटी हैं।

श्रेया को इस ऐक्ट के तानाशाही रवैये पर आपत्ति थी। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यामूर्ति श्री  अल्तमस कबीर ने भी कहा कि उन्हें हैरानी है कि इससे पहले किसी ने इस धारा को चुनौती क्यों नहीं दी? यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के अंतर्गत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन है। इस फैसले के बाद फेसबुक, ट्विटर सहित सोशल मीडिया पर की जाने वाली टिप्पणी के लिए पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ्तार नहीं कर पाएगी।

श्रेया कहती है कि वह एक छात्र प्रतिनिधि है। वह अपने मन की बात दूसरों से कहना पसंद करती है। हममें से हर व्यक्ति रोजाना कितनी बार अपने मन की बात कहता है। अगर हमें अपनी बात कहने नहीं दिया जाएगा तो हमारा समाज गूंगा हो जाएगा।

2013 में महाराष्ट्र में दो लड़कियों को शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे पर सोशल मीडिया में आपत्तिजनक पोस्ट करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इसी के बाद श्रेया सिंघल सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

श्रेया अपने परिवार की इकलौती संतान है। दिल्ली के वसंत वैली स्कूल की पढ़ी हुई है और उसने यूके की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी से एस्ट्रोफिजिक्स की तीन साल की पढ़ाई की है। अब वह कानून की पढ़ाई करने का इरादा रखती है। उसकी मांँ भी सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं जिन्होंने अपनी बेटी को हर तरह से प्रोत्साहित किया। श्रेया की नानी एक जज रह चुकी हैं।

वैसे श्रेया फेसबुक पर बहुत सक्रिय  नहीं रहती और ट्विटर पर उसका एकाउंट नहीं है।

साभार- समाचार4मीडिया से 

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हवाई जहाज में मरने पर 90 लाख का मुआवजा, मगर किसानों की चिंता नहीं

किसानों के हक में है कौन, यह सवाल चाहे अनचाहे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने राजनीतिक दलों की सियासत तले खड़ा तो कर ही दिया है। लेकिन देश में किसान और खेती का जो सच है उस दायरे में सिर्फ किसानों को सोचना ही नहीं बल्कि किसानी छोड़ मजदूर बनना है और दो जून की रोटी के संघर्ष में जीवन खपाते हुए कभी खुदकुशी तो कभी यूं ही मर जाना है। यह सच ना तो भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में कहीं लिखा हुआ है और ना ही संसद में चर्चा के दौरान कोई कहने की हिम्मत दिखा रहा है। और इसकी बड़ी वजह है कि 1991 के आर्थिक सुधार के बाद से कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आई हो किसी ने भी कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर कोई समझ दिखायी नहीं और हर सत्ताधारी विकास की चकाचौंध की उस धारा के साथ बह गया जहां खेती खत्म होनी ही है। फिर संयोग ऐसा है कि 91 के बाद से देश में कोई राजनीतिक दल बचा भी नहीं है, जिसने केन्द्र में सत्ता की मलाई ना खायी हो।

वाजपेयी के दौर में चौबीस राजनीतिक दल थे तो मनमोहन सिंह के दौर में डेढ़ दर्जन राजनीतिक दलों के एक साथ आने के बाद यूपीए की सरकार बनीं। लेकिन पहली बार कोई गैर कांग्रेस पार्टी अपने बूते सत्ता में आई तो वह भी विकास के उसी दलदल में चकाचौंध देखने समझने लगी जिसकी लकीर आवारा पूंजी के आसरे कभी मनमोहन सिंह ने खींची थी।

खेती को लेकर देश देश की अर्थव्यवस्था के पन्नों को अगर आजादी के बाद से ही पलटे तो 1947 में भारत कृषिप्रधान देश था। उस वक्त देश में 141 मिलियन हेक्टर जमीन पर खेती होती थी। देश में ग्यारह करोड़ किसान थे। साढ़े सात करोड़ खेत मजदूर। 1991 में खेती 143 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर होने लगी। लेकिन किसानों की तादाद ग्यारह करोड़ से घटकर दस करोड़ हो गई और खेत मजदूर की तादाद बढ़कर साढ़े नौ करोड़ पहुंच गई। 1991 में आर्थिक सुधार की हवा बही और उसके बाद ट्रैक वन, ट्रैक टू और ट्रैक थ्री करते हुए हर राजनीतिक दल ने सर्विस सेक्टर और इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर उघोगों के लिए खेती की जमीन हथियाने के जो नायाब प्रयोग शुरु हुए उसका असर 2014 तक पहुंचते पहुंचते यह हो गया कि खेती की जमीन घटकर 139 मिलियन हेक्टेयर पर आ गई और किसान घटकर 9 करोड़ पर आ गए। जबकि खेत मजदूर की तादाद बढ़कर 11 करोड़ हो गई । यह वह किसान और मजदूर है, जो सीधे खेती से जुड़े हैं।

इसके अलावा करीब आठ करोड़ किसान मजदूर परिवार ऐसे है, जिनके पास जमीन भी नहीं है और वह मजदूरी किसानों के लिए भी नहीं करते है बल्कि खेती की जमीन पर जो ठेकेदार खेती करवाता है इनके मातहत ये 8 करोड़ परिवार काम करते है और जिंदगी चलाते हैं। इनकी तादाद आजादी के वक्त करीब 75 लाख थी। अब यहां से आगे का बड़ा सवाल यही पैदा होता है कि हर राज्य में औघोगिक विकास निगम बनाया गया। हर राज्य में औद्योगिक क्षेत्र की जमीन पर उघोग लगाने के लिए बैको से कर्ज लिए गए । इनमें से सिर्फ बीस फीसदी उद्योग ही उत्पादन दे पाए। बाकि बीमार होकर बैको के कर्ज को चुकाने से भी बच गए। और देश को बीस लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो गया। लेकिन किसी सरकार के कभी सवाल नहीं उठाया। जबकि इसी दौर में उन्हीं उद्योगों की जमीन पर रियल स्टेट का धंधा पनपना शुरु हुआ। जो उघोग बीमार हो चुके थे।

रियल स्टेट के धंधे में पचास लाख करोड़ से ज्यादा की रकम सफेद और काले को मिलाकर लगी। लेकिन उसे रोकने के लिए कोई रास्ता किसी सरकार ने नहीं उठाया। ध्यान दें तो जिस सोशल इंडेक्स का जिक्र समाजवादी और वामपंथी हमेशा से करते रहे उनके सामने भी कोई दृष्टि है ही नहीं कि आखिर कैसे बाजार में बदल रहे भारत में उपभोक्ताओं की जेब देखकर विकास की बिसात ना बिछायी जाये या फिर उपभोक्ताओ की कमाई ज्यादा से ज्यादा कैसे हो इसकी चिंता में कल्याणकारी राज्य को स्वाहा होने से रोका जाए। यानी सुप्रीम कोर्ट का वकील एक पेशी के लिए 20 से पचास लाख रुपए ले तो भी सरकार को फर्क नहीं पड़ता और बिना इंश्योरेन्स इलाज कराने कोई निजी अस्पताल में जाए तो औसतन दो लाख से 10 लाख देने पड़ जाएं तो भी फर्क नहीं पड़ता और शिक्षा के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरफ खुल रहे संस्थानों की ट्यूशन फीस औसतन 6 लाख रुपए सालाना हो तो भी फर्क नहीं पड़ता। यानी कोई शाइनिंग इंडिया में खोये। कोई एसआईजेड के नाम पर औघोगिक विकास का नारा लगाने लगे। कोई किसानों की सब्सिडी खत्म कर किसानो को मुख्यधारा से जोड़ने की थ्योरी दे दें। तो कोई कॉरपोरेट को टैक्स में राहत देकर अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट टैक्स के बराबर होने का नारा लगाए। तो कोई उद्योगों को कई तरीके से टैक्स में राहत देकर किसानों की सब्सिडी से तीन गुना ज्यादा सब्सिडी की लकीर खींच दे। तो कोई यह कहने से ना चुके की भारत के बाजार में निवेश कराने के लिए मेक-इन इंडिया जरुरी है और उससे निकले पैसे को आखिर में किसान-मजदूर-गरीबों में ही तो बांटना है। कोई इन सबका विरोध करते हुए सत्ता में आए और फिर वह भी उसी रास्ते पर चल पड़े तो जनता करेगी क्या।

यह सवाल संयोग से कांग्रेस विरोधी हर सत्ता के दौर में उभरा है और हर सत्ता की दिशा भी ट्रैक टू के जरिए कांग्रेस के पीछे ही चल पड़ी है, इनकार इससे भी नहीं किया जा सकता। मनमोहन सिंह के दौर में सेज के लाइसेंस का बंदर बांट किसे याद नहीं होगा लेकिन जितनी जमीन सेज के नाम पर ली गई उसका साठ फीसदी हिस्सा बिना उपयोग आज भी जस का तस है लेकिन सरकार उस जमीन को मेक-इन इंडिया के लिए उपयोग में नहीं लाती है। बंजर जमीन का उपयोग कैसे हो कोई ब्लू प्रिंट किसी सरकार के पास नहीं है। खेती की जमीन पर दिए जाने वाले चार गुना मुआवजा के बाद भी किसान की हालत औसतन आठ से दस बरस बाद मजदूर से भी बदतर क्यों हो जाती है। यह सवाल ऐसे है जिसके जबाब में कोई सरकार नहीं फंसती। जबकि 1947 के बाद से खेती की जमीन पर तीन गुना बोझ बढ़ चुका है लेकिन किसानी छोड़ किसी दूसरे रास्ते किसानों के बच्चे कैसे जाएं इसके लिए कोई ब्लू प्रिंट कभी किसी सरकार ने नहीं दिया। मौजूदा वक्त में भी किसानों के खातों तक सरकारी पैसा सीधे बिना बिचौलिए के कैसे पहुंच जाए इसे ही उपलब्धि मान कर हर कोई अपनी पीठ ठोंकने से नहीं चूक रहा जबकि सच यह है कि संसद के भीतर ही नोबल से सम्मानित बांग्लादेश के मोम्मद युनुस ने ग्रामीण बैंक का पूरा पाठ हर सांसद को समझाया। और बांग्लादेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर भी ले आए। मोम्मद युनुस ने भारत के संसद में जब यह जानकारी दी कि अनुदान के जरिए गरीबी से नहीं निपटा जा सकता। दान से निर्भरता बढ़ती है और गरीबी का दुष्चक्र चलता रहता है। कर्ज से लोगों को आय प्राप्ति के नए जरिए मिलते हैं और खासकर गरीब,अशिक्षित और महिलाओं को माइक्रोफाइनेंस के जरिए मुख्यधारा में लाया जा सकता है। तो हर किसी ने तालिया पीटी थी।

लेकिन अब यह जानते हुए भी राजनेताओ की आंख नहीं खुल रही है कि बांग्लादेश ने इन्हीं उपायों से बीते बीस बरस में बीपीएल परिवारों की तादाद बीस फीसदी तक कम कर दी। 91-92 में 60 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी वह अब 40 फीसदी तक आ गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि बांग्लादेश में 1990-91 में 3 करोड़ 60 लाख लोग भूख की मार झेलते थे, जो अब 2.62 करोड़ रह गए हैं। लेकिन भारत तो विकास के नाम पर चकाचौंध की बेफ्रिक्री में कुछ ऐसा खोया है कि उसे किसानों की खुदकुशी या फसल बर्बाद होने पर कोई राहत या मुआवजा दिया जाना चाहिए इस पर ठोस नीति बनाने के बदले चार दिन पहले संसद ने हवाई यात्रा करने वालों के लिए नीतिगत फैसला ले लिया कि अब हवाई यात्रा के दौरान मरने वालों को 75 लाख की जगह 90 लाख रुपए मिलेंगे।

(साभार : prasunbajpai.itzmyblog.com)

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ओबामा सरकार अदालत में कहेगी, संघ आतंकवादी संगठन नहीं

अमेरिकी सरकार एक सिख समूह द्वारा भारत के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित करने की अर्जी का विरोध करेगी। अमेरिका की सरकार ने देश की एक अदालत में कहा कि वह आरएसएस कोआतंकवादी संगठन घोषित करने के लिए दायर मुकदमे को खारिज करने को याचिका दायर करना चाहती है और इसके लिए उसे 14 अप्रैल तक का समय चाहिए। इस मामले में सिख समूह ने अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी को तलब किया है। 

सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) की ओर से दायर याचिका में उनके वकील गुरपतवंत एस पन्नुन का आरोप है कि आरएसएस फासीवादी विचारधारा में यकीन रखता है, उसी का अनुसरण करता है और भारत को समान धर्म तथा सांस्कृतिक पहचान वाले हिन्दू राष्ट्र के रूप में तब्दील करने के लिए अनैतिक अभियान चला रहा है। न्यू यॉर्क के साउदर्न डिस्ट्रक्टि के अटॉर्नी प्रीत भराड़ा ने जज लॉरा टेलर स्वेन से आग्रह किया है कि एसएफजे की ओर से दायर 26 पृष्ठों वाली शिकायत पर जवाब देने के लिए सरकार को और अधिक समय दिया जाए। समूह ने जनवरी में मुकदमा दायर किया था और जॉन केरी को भी एक पक्ष बनाया गया था। केरी को मामले में समन जारी करते हुए कोर्ट ने जवाब देने के लिए दो महीने का वक्त दिया था। 

इसके हिसाब से शिकायत पर सरकार को 24 मार्च तक जवाब देना था और भराड़ा ने आवेदन दाखिल करने के लिए 14 अप्रैल तक का समय देने का आग्रह किया है। भराड़ा ने कहा, 'जवाब देने की जगह सरकार शिकायत को खारिज कराने की दिशा में बढ़ना चाहती है और अपने आवेदन व इससे संबंधित दस्तावेजों को अंतिम रूप देने के लिए उसे और अधिक समय की जरूरत है।' गुरपतवंत सिंह पन्नून ने कहा कि एसएफजे के मुताबिक, मुकदमा दायर करने के समय से भारतीय मीडिया में ईसाई समुदाय के खिलाफ हिंसा के कई मामले खबरों में छाए रहे हैं। 

पन्नून ने कहा कि 'धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ खतरे के बढ़ने और लगातार हिंसा के इस्तेमाल' को इसमें शामिल करने के लिए समूह शिकायत को संशोधित करेगा। भराड़ा के ऑफिस ने हालांकि यह स्वीकार किया कि इस मामले में सरकार की ओर से जवाब देने की अंतिम अवधि मंगलवार थी, जिससे सरकार चूक गई और इसलिए सरकार को अतिरिक्त समय की जरूरत है। भरारा के मुताबिक, सरकार हालांकि इस मामले में जवाब देने के बजाय शिकायत को रद्द करने को लेकर हलफनामा दायर करना चाहती है।

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भारतीय रेल का सुनहरा अध्याय लिखेगा ये रेल बजट

रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने अपने 2015-16 के रेल बजट में यात्री किराए में कोई बढ़ोत्‍तरी नहीं करके आम आदमी पर कोई बोझ नहीं डाला है और उच्‍च निवेश के लिए संसाधनों को जुटाने की दिशा में अपनी प्राथमिकता को रेखांकित किया है। रेल बजट में रेल ढुलाई वाले मार्गों की भीड़-भाड़ कम करने, रेलगाड़ियों की रफ्तार बढ़ाने, समय पर परियोजनाओं को पूरा करने, रेल यात्रियों को बेहतर सुविधाएं और सुरक्षा मुहैया कराने पर जोर दिया गया है ताकि रेलवे को जनमानस के यातायात का पसंदीदा साधन बनाया जा सके। रेल बजट 2015-16 में यात्रियों के हितों को ध्‍यान रखते हुए कई अच्‍छी पहल की गई है इसके अलावा रेलवे की माल ढुलाई क्षमता में बढ़ोत्‍तरी से रेलवे को समृद्ध बनाने के लिए निजी सरकारी सहभागिता पीपीपी/प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश के जरिए निजी निवेशकों को प्रोत्‍साहित करने का भी लक्ष्‍य रखा गया है।

बजट प्रस्‍तावों में अगले 5 सालों में भारतीय रेल की स्‍थिति में सुधार लाने के लिए चार उद्देश्‍य निर्धारित किए गए हैं, जिनमें यात्री सुविधाओं में सतत् एवं बेहतर सुधार, रेलवे को यातायात का सुरक्षित साधन बनाने रेलवे में बेहतर क्षमता विस्‍तार और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण एवं रेलवे को वित्‍तीय रूप से पूरी तरह आत्‍मनिर्भर बनाना शामिल है। इन उद्देश्‍यों को हासिल करने के लिए बजट में 5 कारकों को उल्‍लेख किया गया है, जिनमें एक श्‍वेत पत्र समेत मध्‍यम अवधि वाली एक भावी योजना, दृष्‍टिकोण 2030 दस्‍तावेज और एक पांच वर्षीय कार्य योजना है। इसके अलावा लघु अवधि के लिए वित्‍तीय एवं विदेशी तकनीक के लिए महत्‍वपूर्ण हितधारकों के साथ सहयोग, अंतिम छोर तक रेलवे संपर्क में सुधार रॉलिंग स्टॉक में विस्‍तार और स्‍टेशनों से जुड़ें आधारभूत ढांचे का आधुनिकीकरण शामिल है। रेलवे में अगले पांच वर्षों में 8.05 लाख करोड़ रूपए के निवेश की योजना है और रेलवे अन्‍य अतिरिक्‍त संसाधन भी जुटाएगी। रेलवे वर्ष 2015-16 में लक्षित संचालन अनुपात को 88.5 प्रतिशत करने के उद्देश्‍य को हासिल करने के लिए प्रबंधन तकनीकों, प्रणालियों, प्रविधियों और मानव संसाधनों के प्रबंधन में नई विधियां अपनाएगी। इन उद्दश्‍यों को हासिल करने के लिए त्‍वरित निर्णय प्रक्रिया, कड़ी जवाबदेही, बेहतर प्रबंधन सूचना प्रणाली और मानव संसाधनों के बेहतर प्रशिक्षण एवं विकास को भी कार्य योजना का हिस्‍सा बनाया जाएगा।
      
भारतीय रेलवे की यात्रा को एक सुखद अनुभव बनाने के लिए बजट में साफ-सफाई एवं स्‍वच्‍छता पर विशेष ध्‍यान दिया गया है और स्‍वच्‍छ रेल स्‍वच्‍छ भारत अभियान के तहत स्‍टेशनों एवं रेलगाड़ियों की साफ-सफाई के लिए एक नए विभाग का भी प्रस्‍ताव दिया गया है। 650 अतिरिक्‍त स्‍टेशनों पर नए शौचालय बनाए जाएंगे हैं और इस्‍तेमाल के बाद फेंके जाने योग्‍य बिस्‍तरबंद की ऑनलाइन बुकिंग भी उपलब्‍ध होंगी। इस बजट में लगातार काम करने वाले हेल्‍पलाइन नम्‍बर 138, यात्रियों की सुरक्षा से संबंधित शिकायतों के लिए नि:शुल्‍क नंबर 182 का भी प्रस्‍ताव है।
      
टिकट प्रणाली को यात्रियों के हितों के लिए अधिक अनुकूल बनाने के लिए बजट में अनारक्षित टिकटों को जारी करने के लिए ऑपरेशन 5 मिनट का प्रस्‍ताव है इसके अलावा हॉट बटन, कोइन वेंडिंग मशीन, नि:शक्‍त यात्रियों के लिए रियायती ई-टिकटों की सुविधा और अन्‍य भाषाओं में टिकट बुकिंग करने के लिए एक ई-पोर्टल को भी विकसित किया जाएगा। बैंकों के जरिए बकाया राशि लेने और स्‍मार्ट फोन पर अनारक्षित टिकट उपलब्‍ध कराने की सुविधा का भी प्रस्‍ताव है। बजट प्रस्‍तावों में स्‍मार्ट कार्ड आधारित एवं करेंसी विकल्‍प वाली ऑटोमेटिक टिकट मशीनों के विस्‍तार, रेल सह सड़क टिकट  की तर्ज पर समन्‍वित टिकटिंग प्रणाली और रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए वारंट प्रणाली को समाप्‍त कर रक्षा यात्रा प्रणाली को विकसित करने की बात भी कही गई है। रेल में यात्रा करने वालो को बेहतर खान-पान संबंधी सुविधाएं उपलब्‍ध कराने के लिए रेल बजट में ई-कैटरिंग के जरिए मनपसंद भोजन को भी चुनने का अधिकार है। इसमें टिकटों की बुकिंग के समय आईआरसीटीसी वेबसाइट के जरिए भोजन का ऑर्डर देने, इस परियोजना में बेहतर भोजन श्रृंखलाओं को एकीकृत करने और बेहतर गुणवत्‍तायुक्‍त भोजन उपलब्‍ध कराने के लिए जानी-मानी एजेंसियों की ओर से आधार रसोईघर की स्‍थापना और पानी के लिए वैंडिंग मशीनों के विस्‍तार पर भी जोर दिया जाएगा।
      
महिला रेल यात्रियों की सुविधा के लिए मुख्‍य लाइन के चुनिंदा कोचों और उप शहरी क्षेत्र में चलने वाली रेलगाड़ियों के महिला डिब्‍बों में प्रायोगिक आधार पर निगरानी कैमरे भी उपलब्‍ध कराए जाएंगे।
     
अब, आदर्श स्‍टेशन योजना के तहत 200 और स्‍टेशनों को शामिल किया जाएगा और बी-श्रेणी के स्‍टेशनों में वाई-फाई की सुविधा चलाई जाएगी तथा स्‍टेशनों में यात्रियों के लिए खुद इस्‍तेमाल किए जाने वाले लॉकर उपलब्‍ध कराए जाएंगे। कुछ चिन्‍हित की गई रेलगाड़ियों की यात्री क्षमता में बढ़ोत्‍तरी की जाएगी और सामान्‍य श्रेणी के डिब्‍बों में बढ़ोत्‍तरी की जाएगी। रेलवे ने उपरी सीट पर चढ़ने के लिए बेहतर सीढ़ियों के संबंध में एनआईडी से भी विचार-विमर्श किया है। रेल बजट में वरिष्‍ठ यात्रियों के लिए निचली सीटों की संख्‍या में और बढ़ोत्‍तरी किए जाने का प्रस्‍ताव है। रेल गाड़ी में टिकट निरीक्षकों को वरिष्‍ठ नागरिकों, गर्भवती महिलाओं और नि:शक्‍तजनों को निचली सीट लेने में मदद करने के बारे में प्रशिक्षित किया जाएगा। रेलगाड़ियों में बीच वाले डिब्‍बें महिला और वरिष्‍ठ नागरिकों के लिए आरक्षित किए जाने का प्रस्‍ताव है। विभिन्‍न स्‍टेशनों पर लिफ्ट एवं एस्‍क्‍लेटर्स की सुविधा के लिए 120 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। नवनिर्मित डिब्‍बो में दृष्‍टिहीन यात्रियों की सुविधाओं के लिए ब्रेल आधारित सूचना प्रणाली भी होगी। विकलांग लोगों को चढ़ने-उतरने में आसानी के लिए डिब्‍बों के प्रवेश द्वार चौड़े बनाए जाएंगे और यात्रियों की सुविधाओं के लिए आवंटन में 67 प्रतिशत बढ़ोत्‍तरी की गई है। देश के लभगभ सभी राज्‍यों तक पहुंच बनाने वाले 9400 किलोमीटर लंबे 77 रेल प्रोजेक्‍टों की (डब्‍लिंग/ट्रिप्‍लिंग और क्‍वाड्रूपुलिंग कार्यों के लिए) 96182 करोड़ रूपए दिए जाएंगे। यातायात सुविधा के कार्यों को शीर्ष प्राथमिकता दी गई है इसके लिए 2374 करोड़ रूपए का प्रावधान है। रेलवे में विद्युतीकरण की रफ्तार को बढ़ाने के लिए वर्ष 2015-16 में 6608 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग को मंजूरी दी गई है जो पिछले वर्ष की तुलना में 1330 प्रतिशत ज्‍यादा है।
      
बजट प्रस्‍तावों के अनुसार 9 रेल गलियारों में मौजूदा रफ्तार 110  और 130 किलोमीटर/घंटे से बढ़ाकर 160 से 200 किलोमीटर/घंटा की जाएंगी। ताकि दिल्‍ली कोलकाता और दिल्‍ली–मुंबई की यात्रा एक रात में पूरी की जा सकेगी। भरी हुई माल गाड़ियों की रफ्तार 75 किलोमीटर/घंटे और खाली माल गाड़ियों की औसत रफ्तार 100 किलोमीटर/घंटे की जाएगी।
      
रेल यात्रियों की सुरक्षा को रेलवे के लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण घोषित करते हुए दुर्घटना संभावित क्षेत्रों के लिए एक कार्य योजना प्रस्‍तावित की गई है। बजट में 3438 लेवल क्रोसिंग को समाप्‍त करने, 970 रेल उपरीगामी सेतू (ओवरब्रिज) और रेल भूमिगत सेतू (अंडरब्रिज) के लिए कुल 6581 करोड़ रूपए का प्रावधान है जो पिछले वर्ष के मुकाबले 2600 प्रतिशत ज्‍यादा है। चुनिंदा मार्गों पर जल्‍द से जल्‍द रेल सुरक्षा चेतावनी प्रणाली और रेल टक्‍कर बचाव प्रणाली को स्‍थापित किया जाएगा।
      
रेलवे में निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने के लिए रेलवे की निजी सरकारी सह भागिता की इकाई का पुनर्गठन किया जाएगा, विदेशी रेल तकनीकी सहयोग योजना शुरू की जाएगी। केंद्रित परियोजनाओं के विकास के लिए संसाधन जुटाने, भूमि अधिग्रहण, परियोजना क्रियान्‍वयन और महत्‍वपूर्ण रेल परियोजनाओं के निगरानी के लिए राज्‍य सरकारों के साथ संयुक्‍त उपक्रम स्‍थापित किए जाएंगे। नई रेल लाइनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के साथ संयुक्‍त उपक्रम स्‍थापित किए जाएंगे।
      
भारत रेल को अधिक से अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए 100 डीईएमयू को सीएनजी एवं डीजल से चलने लायक बनाया जाएगा। एलएनजी से चलने वाली रेलगाड़ियों को बनाने की प्रक्रिया अभी चल रही है। इसके अलावा रेलगाड़ियों के ध्‍वनिस्‍तर को अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों के अनुसार रखा जाएगा ताकि वन क्षेत्रों से गुजरने वाली रेलगाड़ियों के कारण वन्‍यजीवों को कम से कम ध्‍वनि प्रदूषण का सामना करना पड़े।
 
सामाजिक सरोकारों के हिस्‍से के रूप में रेल स्‍टेशनों और प्रशिक्षण केंद्रों को अब कौशल विकास के लिए उपलब्‍ध कराया जाएगा। असाधारण भारत के लिए असाधारण रेल की शुरूआत की जाएगी और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कोंकण रेलवे की तर्ज पर ऑटोरिक्‍शा चालकों और टैक्‍सी चालकों को टूरिस्‍ट गाईड के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के महात्‍मा गांधी के 100 वर्ष के अवसर को एक प्रतीक के रूप में मनाने के लिए आईआरसीटीसी पर्यटकों को आकर्षित करने के मद्देनजर गांधी सर्किट को बढ़ावा देने की दिशा में काम करेगी। इसके अलावा खेती एवं विपणन तकनीक केंद्रों के लिए विशेष किसान यात्रा योजना का भी प्रस्‍ताव है। बजट अनुमानों के अनुसार 2015-16 के लिए 1,00,011 करोड़ रूपए के योजना परिव्‍यय का प्रस्‍ताव है जो पिछली योजना से 52 प्रतिशत अधिक है। इसमें से 41.6 प्रतिशत संसाधन केंद्र सरकार के सहयोग से और 17.8 प्रतिशत आंतरिक स्रोतों से जुटाए जाएंगे।
     
 
 
*श्री सौरभ कुमार पत्र सूचना कार्यालय नई दिल्‍ली में सहायक निदेशक (आईआईएस प्रशिक्षु हैं)

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अतीत के खंडहर और भविष्य के हवा महल से निकलने की ज़रुरत

अभी के दौर में आर्थिक शब्दावली कुछ ज्यादा ही चलन में है, लिहाजा जीवन मूल्यों को भी आयात-निर्यात की नजर से देखा जाने लगा है। लेकिन भारत ने अपने मूल्य न तो अभी तक किसी पर थोपे हैं, न ही उनका निर्यात किया है। इनमें से जो भी दुनिया को अपने काम का लगता है, उसे वह ग्रहण करती है, ठीक वैसे ही, जैसे अन्य समाजों से हम ग्रहण करते हैं। जिस दौर में दुनिया अहिंसा को एक भारतीय मूल्य के रूप में अनुकरणीय मानती थी, भारत की धरती पर उस दौर में संसार का सबसे बड़ा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन अहिंसा के सिद्धांत पर ही संचालित हो रहा था।

राम मनोहर लोहिया ने उस समय आइंस्टाइन से अपनी बातचीत के दौरान अहिंसा को एटॉमिक पॉवर से भी ज्यादा शक्तिशाली और संभावनामय बताया था और उनकी इस प्रस्थापना पर आइंस्टाइन ने हामी भी भरी थी। बाद में अहिंसा का ऐसा ही प्रयोग साउथ अफ्रीका में रंगभेदी व्यवस्था से मुक्ति के लिए दोहराया गया, लिहाजा यह मानना गलत होगा कि अहिंसा पर भारत का कॉपीराइट है। हां, इस महान मूल्य का रिश्ता अगर हमें दोबारा भारत से जोड़ना है तो किसी को हिम्मत करके एक बार फिर अहिंसा के बड़े राजनीतिक प्रयोग के रास्ते पर बढ़ना होगा।

इधर लेखक गिरिराज किशोर के अनुसार दलाई लामा ने ठीक ही कहा है कि अहिंसा का निर्यात हम बहुत कर चुके, अब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत हमारे ही देश में है। बुद्ध के समय से हम अहिंसा का निर्यात करते आ रहे हैं। अशोक और गांधी के बाद नेहरू का पंचशील भी यही था। लेकिन हमारे यहां से बुद्ध और गांधी, दोनों ही विदा हो गए तो उनकी मान्यताएं कहां रहनी थीं। दरअसल बात यह है कि गांधी के जाने के बाद देश और राजनीति ने जो रास्ता पकड़ा, वह अहिंसा का नहीं रहा। स्वार्थ इतना बढ़ गया कि दूसरों की सुख-सुविधा के बारे में सोचने की इच्छा ही नहीं रही।

जब यही नहीं है तो अहिंसा का मूल, यानी दूसरों को दुख देना या दूसरों के अधिकार छीनना ही हिंसा है, यह कौन समझेगा। दूसरों के अधिकार छीनना हमें ही दुख पहुंचाएगा, जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक न्याय नहीं कर सकते। गांधी ने हिंद स्वराज में ग्राम स्वतंत्रता की बात की थी, और कहा था कि बगैर उसके समानता नहीं आ सकती। लेकिन हुआ क्या? नेहरू ने गांधी को लिखा कि अंधियारे गांव देश को क्या प्रकाश देंगे? तब से हमारे देश में नेहरू की नीतियां चल रही हैं, गांधी की नहीं।

यही गलत हुआ। आज दुनिया के अनेक देशों में स्वायत्तता निचली इकाइयों तक पहुंची हुई है, लेकिन हमारे देश में इसका उलटा है। जब तक हम इस बारे में मूल रूप से सोचना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देश में हिंसा होती रहेगी। हमें दूसरों के दुख के बारे में सोचना होगा। दलाई लामा यह कह सकते हैं क्योंकि वे वैसा ही जीवन जी रहे हैं। हमारे पास आयात करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन निर्यात करने के लिए अहिंसा के अलावा कुछ नहीं। लेकिन जो निर्यात करते हैं, उसे अपने लिए भी तो उपयोगी मानें।

जी हां, कुछ इसी तरह राजकुमार सिद्धार्थ अपने महल से निकले थे खुशी की तलाश में और रास्ते में उन्होंने बूढ़े, बीमार और मुर्दे को देखा। ये दुख के ही रूप हैं। गम कुछ इसी तरह से राजकुमार सिद्धार्थ की राह में खड़े थे। फिर क्या था? उन्होंने महल और रथ को छोड़कर दुख दूर करने का उपाय ढूंढने निकल पड़े। महात्मा बुद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसी के दुख को देखकर दुखी होने से अच्छा है, उसके दुख को दूर करने के लिए उसे तैयार करना।

दुख मन में होता है और कष्ट शरीर में। महात्मा बुद्ध का यह यूनिवर्सल विजन है कि सारे संसार में सबका दुख सदा-सदा के लिए कैसे दूर हो? निराला की कविता की एक लाइन है- 'दुख ही जीवन की कथा रही।' यह सच है कि दुख ही जीवन की कथा और परेशानी है। मगर इस परेशानी का अंत कैसे होगा? यही शिक्षा महात्मा बुद्ध ने दी है। राजकुमार सिद्धार्थ रथ पर सवार होकर महल से निकले, रास्ते में बूढ़े को देखा और झटका लगा कि वह भी बूढ़े होंगे। फिर उन्होंने बीमार को देखा, फिर उन्हें झटका लगा, उन्हें लगा कि वह भी बीमार पड़ेंगे। फिर उन्होंने मुर्दे को देखा और वे उन्हें जोर से झटका लगा कि वह भी मरेंगे। उन्होंने दुख को देखा और दुख के झटके से उनकी आंखें खुल गईं। दुख ने उनको जगा दिया।

इंसान चलते-फिरते, बोलते, काम करते हुए भी एक गहरी नींद में डूबा रहता है। दुख का पहाड़ इंसान को नींद से जगा देता है। दुख जगाता है। यही दुख का प्रभाव है। यही उसकी प्रासंगिकता भी है। हर दुख और पीड़ा एक संदेश देती है। जीवन जीने का संदेश। हर दुख एक चिट्ठी है। हर पीड़ा एक संदेश है। मगर हमारी आंखों पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है, इसलिए उस संदेश को हम पढ़ नहीं पाते हैं। हम न खुद को जानते हैं और न भविष्य को। हम दुख को भोगते हैं। खुद का कोसते हैं। दूसरों को दोष देते हैं। यहां तक कि भगवान को भी दोष देते हैं। गीत गाने लगते हैं –

भगवान वो घड़ी जरा इंसान बन के देख, धरती पे चार दिन कभी मेहमान बन के देख।' हिंदी फिल्मों के मंदिर में भगवान को दोष देते हुए कई सीन आपने देखे होंगे और ऐसे सीन आगे भी दिखाए जाएंगे। मगर दुख से संदेश ग्रहण करने का चलन हमारे यहां है ही नहीं। दुख से संदेश तो कोई बुद्धिमान ही लेता है। महात्मा बुद्ध का एक मूल सवाल है। जीवन का सत्य क्या है? यह प्रश्न हमारी पीड़ा से जुड़ा है। भविष्य को हम जानते नहीं है। अतीत पर या तो हम गर्व करते हैं या उसे याद करके पछताते हैं। भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। दोनों दुखदायी है।

महात्मा बुद्ध ने वर्तमान का सदुपयोग करने की शिक्षा दी है। बुद्ध ने अतीत के खंडहरों और भविष्य के हवा महल से निकाल कर मनुष्य को वर्तमान में खड़ा रहने की शिक्षा दी है। बौद्ध दर्शन की रेल दया और बुद्धि की पटरी पर दौड़ती है। दया माने सबके लिए कल्याण की भावना। बिहार के बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। उनके ज्ञान की रोशनी पूरी दुनिया में फैली। चीन की कहावत है- बांस के जंगल में बैठो और निश्चिंत होकर चाय पीओ। जैसे कि चीन के प्राचीन साधु-संत किया करते थे। यानी कि जीवन की परेशानियों के बीच शांत होकर बैठना। यह ताओवाद है। जापान में बुद्धिज्म की एक शाखा है जिसका मतलब है शांति, स्थिरता और निश्छिलता। भगवान बुद्ध की प्रतिमा देखकर इसी का अहसास होता है। दुख से छुटकारा पाना है, तो बुद्धं शरणं गच्छामि।

अंत में राहत इंदौरी साहब के ये मुक़म्मल शेर मुलाहिज़ा फरमाइए –

ज़िंदगी को ज़ख्म की लज़्ज़त से मत महरूम कर
रास्ते के पत्थरों से खैरियत मालूम कर

मत  सिखा लहज़े को अपने बर्छियों के पैंतरे
ज़िंदा रहना है तो लहज़े को ज़रा मासूम कर
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प्राध्यापक,हिन्दी विभाग,शासकीय दिग्विजय
पीजी,स्वशासी महाविद्यालय, राजनांदगांव

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पागलपन और गतिविधियों का व्यंगात्मक नजरिया है ‘डेमोक्रेजी’ – द पाॅलीटिकल स्पूफ

नई दिल्ली, मार्च 2015; जैको पब्लिशिंग हाउस ने हाल ही में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में लेखक अतुल्या महाजन द्वारा लिखित पुस्तक ‘डेमोक्रेजी – द पाॅलीटिकल स्पूफ’ का विमोचन समारोह आयोजित किया, जहां जानी-मानी स्टेंडअप काॅमेडियन नीति पाल्टा ने पुस्तक का विमोचन किया और लेखक के साथ चर्चा भी की। पुस्तक का प्राक्कथन अभिनेत्री गुल पनाग ने लिखी है।

डेमोक्रेजी आज के भारत में विद्यमान पागलपन और गतिविधियों का व्यंगात्मक नजरिया है, जहां जो जैसा दिखता है वैसा कतई नहीं है। यहां पाॅवर या सत्ता सबसे महत्वपूर्ण है और यहां सभी इसकी भाग-दौड़ में सक्रिय हैं।

रिलीज के अवसर पर नीति पाल्टा ने कहा कि आज तक जितनी भी पुस्तक मैंने पढ़ी हैं, मैं इस पुस्तक को एक सर्वश्रेष्ठ पुस्तक में शुमार करना चाहूंगी। अतुल्य ने जिस अंदाज में काल्पनिक चरित्रों के साथ आज के दौर का यथावत चित्रण किया है जो सशक्त व जबरदस्त है। इसका शीर्षक डेमो-क्रेजी अपने आप में एक क्रेजीनेस को बयां करता है।

मौके पर अतुल्य महाजन ने कहा, डेमोक्रजी पूरी तरह से फिक्शनल है, जहां किसी भी व्यक्ति अथवा व्यक्तित्व की भावना को आहत नहीं किया गया है। यह एक मनोरंजक अंदाज में हंसी-मजाक के साथ राजनैतिक चहल-पहल, उनकी प्रतीक्रिया और तैयारियों पर कटाक्ष है साथ ही यह देश की आम जनता की हर रोज की जिंदगी के कोलाहल के बारे में भी गहरा विश्लेषण है। आज जो व्यकित साधन संपन्न है उसका दिन सोशल मीडिया, तेज आवाज में टीवी, राजनैतिक डिबेट के बगैर ना तो शुरू होता है नाहीं खतम। इसी का नाम डेमोक्रेजी है।

गुल पनाग द्वारा पुस्तक के प्राक्कथन के बारे में पूछने पर अतुल्य ने बताया कि गुल बहुत शानदार व्यक्तित्व हैं। जब मैंने उन्हें पुस्तक की मेनूस्क्रिप्ट भेजी और उनकी प्रतिक्रिया मांगी, उसे पढ़ने के बाद उन्होंने यह प्राक्कथन लिखा। मैं बहुत उत्साहित हूं कि उनको यह पसन्द आयी।

कार्यक्रम के दौरान नीति व अतुल्य ने मस्ती भरे हैशटैग क्विज भी खेले और दो सर्वश्रेष्ठ उत्तर देने वाले श्रोताओं को आॅटोग्राफ पुस्तक भी भेंट की।
पुस्तक का एक और आकर्षण है किताब पर लोकप्रिय काॅमेडियन पापा सी.जे. की टिप्पणी। जिसमें उन्होंने कहा है, कि जिस तरह से एक प्रोफेशनल काॅमेडियन की तरह यह पुस्तक शुरूआती दो मिनट में आपको आकर्षित करती है और अंत तक बांधे रखती है। अतुल्य बेहद प्रतिभाशाली हैं और उनका यह दूसरा शानदार प्रयास है।

लेखक के बारे में; अतुत्य महाजन एक लेखक और व्यंग्यकार है। उनका पहला उपन्यास अमरिकनदेसी – मास्टर्स आॅफ अमेरिका 2013 में प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त वह इसी शीर्षक से लोकप्रिय व्यंग्य ब्लाॅग व ट्वीट्स लिखते हैं। पूर्व में भी हास्य कॉलम लिखते रहे हैं।

अधिक जानकारी के लिए कृपया संपर्क करें; शैलेश नेवटिया – 9716549754

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भाजपा सांसद ने 4 महीने में पूरा किया मोदीजी के आदर्श गाँव का सपना

गुजरात के नवसारी से भाजपा सांसद सीआर पाटिल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आदर्श गांव योजना को सबसे पहले जमीन पर उतार दिया है। पाटिल ने तीन गांव आदर्श गांव बनाने के लिए गोद लिए थे। इनमें से एक चिखली आदर्श गांव बनकर तैयार हो गया है, जबकि अन्य सांसद अभी कागजी योजनाएं ही बना रहे हैं। पाटिल ने मात्र चार माह में यह कमाल किया है।

छोटे कस्बे जैसा है गांव

1. 60 हजार की आबादी वाला चिखली एक छोटे क़स्बे जैसा है मगर ग्राम पंचायत होने के नाते इसे गांव ही कहा जाता है।

2. सबसे पहले गांव से गुजरने वाले हाइवे की खस्ता हालत सुधारी और उसके बाद छोटी-छोटी गलियां और अंदरुनी सड़कें बनाई।

3. पहले जहां पैदल चलना मुश्किल था वहां अब घर के दरवाजे तक दुपहिया या चार पहिया वाहन जा सकते हैं। 4. सर्वे में पता चला कि गांव में करीबन दस हजार से ज्यादा घरों में शौचालय नहीं थे। इन घरों में शौचालय बनवाए गए।

5. जिनके पास घर नहीं है, उन्हें विशेष प्रकार के घर भी देने का काम शुरू कर दिया है।

6. सुरक्षा की दृष्टि से सीसीटीवी कैमरे भी लगाए हैं। इनका सीधा कनेक्शन थाने से जोड़ा गया है।

7. गांव में वाई-फाई की सुविधा भी शुरू की गई है।

4 माह 6 दिन में बनाया आदर्श

देश के इस पहले आदर्श गांव की खासियत यह है कि यह मात्र 4 महीने और 6 दिन में तैयार हो गया है। रिवर फ्रंट व हेलिपेड भीगांव में कावेरी नदी किनारे लोगों की तफरीह के लिए रिवर फ्रंट व हेलिपेड भी बनाया गया है।

सफाई का सबसे ज्यादा ख्‍याल

सांसद पाटिल ने इस आदर्श गांव में स्वछता का विशेष ध्‍यान रखा है। वे खुद जब यहां आते हैं तो गांव वालों के साथ झाड़ू चलाते हैं।

मोदी ने की थी तारीफ

चिखली गांव को देखने गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल कुछ दिनों पहले यहां आकर सांसद को बधाई दे चुकी हैं। हाल ही में दिल्ली के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी चिखली गांव की सार्वजानिक रूप से प्रशंसा कर चुके हैं।

अनिवासी भी खुश हुए

पीपीपी यानि की पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत आदर्श बने चिखली आदर्श गांव की अब दशा ही बदल गई है। विदेशी धरती पर रहने वाले इस गांव के लोग गांव के विकास के लिए सांसद को धन्यवाद देते नहीं थक रहे हैं।
साभार- http://naidunia.jagran.com/ से

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वीके सिंह की मजबूरी छा गई सोशल मीडिया पर

नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग में पाकिस्तान दिवस के कार्यक्रम से लौटने के बाद विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने लगातार कई ट्वीट करके इस कार्यक्रम में शामिल होने पर 'सफाई' दी और अपनी 'खीज' निकाली।

 

हालांकि अपने एक ट्वीट में उन्होंने ये भी कहा कि ये उनका कर्तव्य था जिसे करने के लिए वो बाध्य थे। इस कार्यक्रम में पाकिस्तान उच्चायोग ने अलगाववादी नेता मसरत आलम को भी आमंत्रित किया था लेकिन मसरत ने तबियत खराब होने की बात कहकर कार्यक्रम में शामिल होने से इनकार कर दिया था।

उधर विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह के लगातार ट्वीट्स को लेकर ट्विटर पर जबर्दस्त प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने लिखा है, “ये उम्मीद करना कितना बेतुका है कि वीके सिंह पाकिस्तान के राष्ट्रीय दिवस समारोह में न जाते।

 

ऐसे कूटनीतिक मौकों पर जाना बतौर विदेश राज्य मंत्री उनका काम है।”वहीं पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, “क्या वीके सिंह इस सरकार में पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने सरकार से अपनी असहमति दिखाई है। और इस बार भी ट्विटर पर।”

 

जबकि कांग्रेस नेता मनीष तिवारी कहते हैं कि यदि वीके सिंह को इतनी ही शर्मिंदगी महसूस हो रही है तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। मनीष तिवारी ने ये भी लिखा है कि पहले कई मंत्री पाकिस्तान उच्चायोग के के आयोजनों में जाने से इनकार कर चुके है।

 

वहीं एक यूज़र अर्षित पाठक ने वीके सिंह और मनीष तिवारी दोनों के ट्वीट्स पर टिप्पणी की है और लिखा है, "वीके सिंह की नाराज़गी उनका कर्तव्य है जबकि मनीष तिवारी का काम ही नाराज़ होना है।"

 

पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने भी वीके सिंह के ट्वीट्स पर आश्चर्य जताया है कि और कहा है कि यदि वो अपनी इच्छा से नहीं गए तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

 

जे अंबादी अपने अकाउंट पर लिखते हैं, "नाराजगी को ट्विटर पर लाने में वीके सिंह को एक घंटा लग गया और बाद में इसका दोष उन्होंने मीडिया पर मढ़ दिया।"

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सोशल मीडिया पर किसी के खिलाफ लिखना कानूनी जुर्म नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने साइबर कानून की व‌िवादित धारा 66ए को रद्द कर दिया है। सोशल मीडिया पर ‌टिप्‍पणी करने के मामले पुलिस अब आननफानन गिरफ्तारी नहीं कर सकेगी। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आईटी एक्ट की धारा 66ए संव‌िधान के अनुच्छेद 19(2) के अनुरूप नहीं है।

 

उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 19(2) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता का ‌अधिकारी देती है। सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसला 66ए समेत कुछ अन्य धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनाया है।

 

इस फैसले से पहले आईटी एक्ट की धारा 66ए के तहत सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने पर पुलिस किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती थी, जिसकी संवैधानिक वैधता को कई लोगों ने चुनौती दी थी। इस मुद्दे पर सरकार की ओर से तर्क पेश किए जाने के बाद न्यायाधीश जे चेलमेश्वर और न्यायाधीश आरएफ नरीमन की पीठ ने 26 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

 

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 66A को रद्द करते हुए कहा कि कि ये धारा सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को झटका है। हालांकि कोर्ट ने अपने फैसले में साफतौर से कहा है कि सोशल साइट पर बेलगाम होकर कुछ नहीं लिखेंगे। कुछ लिखने या पोस्ट करने से पहले विचार करना जरूरी होगा।

 

हालांकि सरकार की ओर से सुनवाई के दौरान कोर्ट में तर्क दिया गया था कि अगर ये एक्ट खत्म होता है तो इसके दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाएगी।

 

आपको बता दें कि इस फैसले से पहले धारा 66ए के तहत सोशल नेटवर्किग साइट्स पर विवादास्पद पोस्ट डालने पर तीन साल तक की कैद का प्रावधान था।

 

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से आए इस फैसले के बाद किसी की भी आनन-फानन में गिरफ्तारी नहीं होगी। जिसकी मांग याचिकाकर्ताओं की ओर से की गई थी।

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चर्चों के गोरखधंधों का पर्दाफाश करती है फादर लोमियो की ये पुस्तक

मदर टैरेसा पर उठा विवाद अभी थमा भी नही है कि एक ईसाई संगठन से जुड़े कैथोलिक विश्वासी पी.बी.लोमियों की हालही में आई पुस्तक ‘‘ ऊँटेश्वरी माता का महंत” ने ईसाई समाज के अंदर चर्च की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल उठा दिये है।

“ऊँटेश्वरी माता का महंत”  र्शीषक से लिखी गई 300 रु. की यह पुस्तक एक येसु समाजी (सोसाइटी ऑफ जीजस) कैथोलिक पादरी (फादर एंथोनी फर्नांडेज) जिन्होंने अपने जीवन के 38 वर्ष कैथोलिक चर्च की भेड़शलाओं का विस्तार करने में लगा दिए, चर्च की धर्मांतरण संबधी नीतियों का परत दर परत खुलासा करती है और साथ ही चर्च नेतृत्व का फरमान न मानने वाले पादरियों और ननों की दुर्दशा को बड़ी ही बेबाकी से उजागर करती है।

“ऊँटेश्वरी माता का महंत” र्शीषक से लिखी गई यह पुस्तक कैथोलिक चर्च व्यवस्था, रोमन कूरिया, जेसुइट कूरिया पर कई स्वाल खड़े करते हुए ‘‘उतरी गुजरात”  के कुछ हिस्सों में चर्च द्वारा अपनी भेड़शलाओं को बढ़ाने का चौंकाने वाला खुलासा करती है – कि, विदेशी मिश्नरियों की धर्म प्रचार क्षमता का लोहा मानना पड़ेगा। स्पेनिश फादर गैर्रिज ने यह देखा कि ‘ऊँट इस क्षेत्र का प्रधान पशु है’-(रेगिस्तान का जहाज) यह इस बंजर जमीन पर रहने वालों का परिवारिक अभिन्न अंग है व्यापार का साधन भी है। अतः ऊँट से संबधित रक्षक देवी के रुप में उन्होंने मदर मेरी को एक ‘नया अवतार’ प्रदान किया, ‘‘ऊँटेश्वरी माता” -ईशूपंथियों, ऊँट-पालकों की कुल माता!

विदेशो से आर्थिक सहायता प्राप्त कर उन्होंने मेहसाना क्षेत्र के बुदासान गांव में 107 एकड़ का विशाल भूखण्ड खरीद कर पहाड़ी नुमा जमीन पर एक विशाल वृक्ष के नीचे एक ‘डेहरी’ (चबूतरा) का निमार्ण करवाया और घोषणा की, कि यह डेहरी ऊँटेश्वरी माता की ‘डेहरी’ है। यह देवी जगमाता है। जो ऊँटों की रक्षा करती है।

फादर एंथोनी फर्नांडेज को आदिवासियो व मूल निवासियों को ईशुपंथी बनाने के काम पर लगाया गया था। उन्होंने जब वस्तु स्थिति का सामना किया तो उन्हें मिशनरियों की कुटिलता और धोखेबाजी का आभास होता गया। फादर एंथोनी इस तथ्य से बहुत आहत थे कि विदेशी मिशनरियों का मुख्य उदे्श्य, उत्तरी गुजरात के आदिवासियों और अनुसूचितजातियों का धर्मांतरण करवाना ही था, चाहे इसके लिए कोई भी नीति क्यों न अपनानी पड़े। वास्तव में उनके विकास से उनका कोई लेना देना नहीं था। सभी योजनाएं चाहे वह समाज सेवा, शिक्षा एवं स्वस्थ्य सेवाएं हो, वे केवल उन्हें लालच वश ही प्रस्तुत की जा रही थी।

इस हकीकत को सामने लाने का प्रयास करने वाला अब नहीं हैं – उनका देहान्त पिछले साल  11 मई  2014 को बनारस में हो चुका हैं – वह व्यक्ति थे फादर एन्थनी फर्नांडेज – येसु समाजी – एक कैथोलिक प्रीस्ट – एक सच्चा सन्यासी, एक सच्चा संत और एक राष्ट्रभक्त हिन्दुस्तानी।

महात्मा गांधी की भूमि – गुजरात में जन्मा – पला – बढ़ा, यह कैथोलिक प्रीस्ट गुजरातियों की धार्मिक आस्था का पर्याय था। गुजरात के महान संत नरसिंह मेहता के गीत और भजनों में रमा हुआ था – ’’वैष्णव जन तेने कहिए, जो पीर पराई जाने रे” – पराई पीर को दूर करने, पीड़ितों का कल्याण करने की साफ नीयत लिये हुए फादर एन्थनी फर्नांडेज, जेसुइट समाज (कैथोलिक चर्च) का अंग बन गया। उत्तरी गुजरात, जो अक्सर कम वर्षा का शिकार रहता हैं – के गरीब किसानों और आदिवासियों के लिए कैथौलिक जेसुइट मिशनरियों द्वारा चालयें जा रहे राहत कार्यों में अपने सुपीरियरों और प्रोविंशियलों द्वारा लगा दिया गया। लेकिन जब उसे इन देशी विदेशी मिशनरियों की धूर्ता और देश के प्रति षड्यंत्रों से साक्षात्कार हुआ तो उसने उनका पुरजोर विरोध करने के उपाय तलाशना शुरू कर दिया। लेकिन क्या यह ’’अकेला चना”  भाड़ फोड़ सका?

ईसाइयत में शुरु से ही पूरी दुनियां को जितने का एक जानून रहा है और इसके इस कार्य में जिसने भी बाधा खड़ी करने की कौशिश की वह इस साम्राज्यवादी व्यवस्था से सामने ढेर हो गया। भारत में भी पोप का साम्राज्यवाद उसी नीति का अनुसरण कर रहा है। अगर कोई पादरी या नन व्यवस्था के विरुद्व कोई टिप्पणी करते है तो उनका हाल भी फादर एंथोनी फर्नाडिज जैसा ही होता है क्योंकि चर्च व्यवस्था में मतभिन्नता के लिए कोई स्थान नहीं है। इसी कारण भारत में कैथोलिक चर्च को छोड़ चुके सैकड़ों पादरी ओर नन चर्च व्यवस्था के उत्पीड़न से बचने के लिए ‘‘कैथोलिक चर्च रिफॉर्मेशन मूवमेंट (केसीआरएम) का गठन कर रहे है।

“ऊँटेश्वरी माता का महंत”  के नायक फादर एंथोनी फर्नांडेज को भी ‘ईसा की तरह कू्रसित’ (सलीबी मौत) करने का लम्बा षड्यंत्र चल पड़ा। इस संघर्ष में वह अकेला था – उसके साथ कोई कारवां नहीं था। ईसा भी तो अकेले ही रह गये थे – उनके शिष्य उन्हें शत्रुओं के हाथ सौंप कर भाग गये थे और जिस यहूदी जाति के उद्धार के लिए वे सक्रिय थे वही जनता रोमन राज्यपाल पिलातुस से ईसा को सलीब पर चढ़ाये जाने के लिए प्रचण्ड आन्दोलन कर रही थी। यही हुआ था – ऊंटेश्वरी माता के इस महंत –  फादर टोनी फर्नांडेज़ के साथ।

प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक श्री कुमारप्पा (जो कि स्वयं कैथोलिक ईसाई थे) का विचार था: – पश्चिमी देशों की सेना के चार अंग हैं – ’”थल सेना, वायु सेना और नौसेना तथा चर्च (मिशनरी) ।“  इन्हीं चार अंगीय सेना के बलबूते पर पश्चिमी देश पूरे विश्व पर राज्य करने की योजना रचने में माहिर हैं।“  आज की परिस्थतियों में एक और सेना भी जोड़ी जा सकती हैं – वह पांचवी सेना हैं ’’मीडिया”

वर्तमान समय में अविकसित या अर्द्धविकसित देशों की प्राकृतिक सम्पदाओं – तेल – वनों – खनिजों की जितनी समझ पाश्चात्य देशों की हैं, उतनी समझ या जानकारी स्वयं इन देशों की सरकारों को नहीं हैं।

इस पुस्तक में स्पेनिश मिशनरियों द्वारा अपनाई गई ’’ऊँट की चोरी” करने की नायाब तरकीब बताई गई हैं – इस चोरी की विधि में केवल ऊँट ही नहीं चुराया जा सकता हैं अपितु ऊँट पालकों की जर जमीन, मान मर्यादा, धर्म-संस्कृति आदि सभी पर हाथ साफ किया जा सकता हैं। यहाँ तक की आदिकाल से चली आई सामाजिक एकता और समरसता को भी आसानी से विभाजित किया जा सकता है।

इन विदेशी मिशनरियों की सोच है किः – ’’यदि कोई ’’ईसाई युवती”  अपनी पूर्व जाति के, ’’गैर-ईसाई” युवक से विवाह करना चाहती है, तो उसे मना मत करो – कालान्तर में वह अपने पति व सास-ससुर तक को ईसाई बना लेगी और उसके बच्चे तो पैदायशी ईसाई होंगे ही।’’

आपने कई बार ’’समानान्तर सरकार”  शब्द भी सुना होगा या पढ़ा होगा। लेकिन समानान्तर सरकार या पैरलल गवन्रमेंट का असली स्वरूप क्या होता है? कैसा होता हैं? इस तथ्य से शायद रू-ब-रू नहीं हुए होंगे – ‘‘ऊँटेश्वरी माता का महंत” में आप को यह तथ्य भी समझ में आ जायेगा। कुल 107 एकड़ तिकोनी जमीन पर स्थापित ’’वेटिकन नगर राज्य”  किस प्रकार से विश्व के तमाम देशों में किस तरह अपनी समानान्तर सरकार चला रहा है यह तथ्य फादर टोनी की कहानी पढ़कर ही जाना जा सकता है।

“ऊँटेश्वरी माता का महंत”  पुस्तक में चर्च के साम्राज्यवाद का जिक्र जिस तरीके से किया गया है उसे पढ़कर देशभक्त भारतवासियों की आँखें खोल देने वाला है।  पुस्तक का लेखक बताता है कि भारत में वेटिकन की ’’समानान्तर सरकार”  स्वतंत्रता से पूर्व 1945 में ही स्थापित हो गई थी (जब यहाँ कैथोलिक बिशप्स कान्फ्रेंस ऑफ इण्डिया ;ब्ठब्प्द्ध का गठन हो गया था तथा वेटिकन का राजदूत (इंटरनुनसियों) नियुक्त हो गया था। भारत सरकार और राज्य सरकारों तथा उच्चधिकारियों पर इसकी कितनी मजबूत पकड़ हैं – को भी आप स्पष्ट रूप से देख-समझ सकेंगे – समाज सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के खेल द्वारा यह समानान्तर सरकार जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को अपने पॉकिट में किस तरह और किस ठसक से रखती हैं, आप कल्पना ही नहीं कर सकते! इस कार्य में पांचवी सेना ’’मीडिया” भी अपना अहम रोल अदा करती हैं।

“ऊंटेश्वरी माता का महंत”  पुस्तक उन लोगों को अवश्य ही पढ़ना चाहिए जो राष्ट्रीयता, स्वाभिमान और सार्वभौमिकता के मायने समझते हैं और उन्हें भी पढ़ना चाहिए जो धर्मों की चारदीवारी में कैदी जीवन बिता कर कूपमण्डूक स्थिति में जीवित रहकर, स्वयं को सार्वभौम समझे हुए है। इस पुस्तक में अप्रत्यक्ष रूप से उन लोगों के लिए भी संदेश उपस्थित हैं, जो धर्मान्तरितों की ’’घर वापसी”  चाहते हैं।

यह पुस्तक धर्मांतरित ईसाइयों की दयनीय स्थिति और चर्च नेतृत्व एवं विदेशी मिशनरियों द्वारा भारत में धर्मांतरण के लिए अपनाई जाने वाली घातक नीतियों और चर्च के राष्ट्रीय – अतंरराष्ट्रीय नेटवर्क का भी खुलासा करती है। पुस्तक में आज की परिस्थितियों का सही आंकलन हैं और इसके घातक परिणामों को रोकने के कुछ उपाय भी ढूंढने के प्रयास किये गए हैं।

“ऊंटेश्वरी माता का महंत” पुस्तक बताती है कि धर्मों की स्थापना, मानव समाज को विस्फोटक स्थिति से बचाए रखने के लिए, ’’सेफ्टी वाल्व”  के रूप में हुई है। लेकिन जब यह ’’सेफ्टी डिवाइस” (रक्षा उपकरण) गलत और अहंकारी लोगों की निजी संपत्ति बन जाते हैं, तो मानवता के लिए खतरा बढ़ जाता है। वर्तमान समय में, ऐसे ही स्व्यंभू धर्म माफियाओं की जकड़ में प्रायः प्रत्येक धर्म आ गया है। अतः अब समय आ गया है, कि ऐसे तत्वों को सिरे से नकारा जाये ताकि मानवता सुरक्षित रहे।“

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साभार- http://dalitchristian.com/ से

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