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इंडोनेशिया में शुरु हुआ ‘जी-हिबुरान’

जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज लिमिटेड (जील) ने इंडोनेशिया में 'जी-हिबुरान' नाम से मनोरंजन चैनल लॉन्च किया है। अंग्रेजी में इसका मतलब है कि ‘जी एंटरटेनमेंट’ और हिंदी में ‘जी मनोरंजन’।

 नए चैनल में लोकप्रिय भारतीय धारावाहिकों को स्थानीय रूप में इंडोनेशियाई दर्शकों के लिए प्रसारित किया जाएगा। पिछले 14 महीने में समूह ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में यह तीसरा चैनल शुरू किया है। इससे पहले ‘जी बायोस्कोप’ और ‘जी नंग’ चैनल क्षेत्र में शुरू किए गए थे।

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मारवाड़ी सम्मेलन की गाजियाबाद शाखा का पदस्थापन समारोह

गाजियाबाद। दिल्ली प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन की गाजियाबाद शाखा का पदस्थापन समारोह होटल दिल्ली सीजल्स, सूर्यनगर में आयोजित किया गया जिसमें दिल्ली प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष श्री पवन कुमार गोयनका एवं महामंत्री श्री राजकुमार मिश्रा  मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। गाजियाबाद शाखा के अध्यक्ष श्री राजेश जालान एवं महामंत्री श्री शशि खेमका ने अतिथियों का स्वागत किया। 

नई शाखा के पदाधिकारियों के चयन पर अपनी शुभकामनाएं देते हुए श्री पवन कुमार गोयनका ने दिल्ली और एनसीआर में मारवाड़ी समाज के सुदृढ़ संगठन की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि मारवाड़ी समाज दिल्ली और एनसीआर में अपनी जनकल्याणकारी, सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों के लिए तत्पर हो। 
इस अवसर पर श्री राजकुमार मिश्रा ने कहा कि मारवाड़ी समाज के लोगों ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के जरिये हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल की है। श्री मिश्रा ने सम्मेलन के द्वारा दिल्ली और एनसीआर में संचालित गतिविधियों की जानकारी दी। 

गाजियाबाद शाखा के अध्यक्ष श्री राजेश जालान ने बड़ी संख्या में उपस्थित मारवाड़ी भाइयों का स्वागत करते हुए कहा कि आप लोगों ने मारवाड़ी समाज को एकजुट करने का जो बीड़ा उठाया है, उसके निश्चित ही सकारात्मक परिणाम आयेंगे। उन्होंने कहा कि मारवाड़ी समाज ने अनेक क्षेत्रों में सफलता हासिल की है, लेकिन वह राजनीति के क्षेत्र में पीछे है। समाज को एकजुटता के साथ इस क्षेत्र में आगे आना चाहिए। श्री जालान ने गाजियाबाद ने प्रतिभावान छात्रों को सम्मानित करने, वृद्धों के जीवन को खुशहाल बनाने एवं महिला उत्थान के कार्यक्रमों को बड़े पैमाने पर आयोजित करने का संकल्प किया। 

शाखा के नवनिर्वाचित महामंत्री श्री शशि खेमका ने राष्ट्र के निर्माण में मारवाड़ी समाज के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि हमारे समाज ने देश के कोने-कोने में जाकर उन क्षेत्रों का विकास किया, अनेक जनकल्याणकारी वृहद योजनाओं को आकार दिया। सेवा और परोपकार के कार्यों में एक अलग पहचान बनायी है। गाजियाबाद में भी सम्मेलन अनेक योजनाओं को हाथ में लेकर सामाजिक जागृति के उपक्रम करेगा। 

इस अवसर पर शाखा के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों का अभिनंदन किया गया। श्री ललित गर्ग, श्री राजेश गुप्ता, श्री ओम जालान, श्री मनीष जालान, श्री सुरेश अग्रवाल आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। 

 प्रेषकः
(बरुण कुमार सिंह)
311-312, देविका टावर्स
चंद्रनगर, गाजियाबाद-201011
मो. 9968126797

फोटो परिचयः 
दिल्ली प्रादेशिक मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष श्री पवन कुमार गोयनका सम्मेलन की गाजियाबाद शाखा के पदस्थापन समारोह को संबोधित करते हुए।

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राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएं रूप में कृष्ण कुमार यादव ने कार्यभार संभाला

राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के नए निदेशक डाक सेवाएं के रूप में भारतीय डाक सेवा वर्ष 2001 बैच के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव ने  16 मार्च 2015 को कार्यभार ग्रहण कर लिया। इस क्षेत्र के अधीन कुल 10  डाक मंडल हैं।  इनमें जोधपुर-जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चुरू, झुंझुनू, नागौर, पाली, सीकर, सिरोही-जालोर, श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ शामिल हैं। 

मूलतः उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के निवासी श्री यादव इससे पूर्व  इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं के पद पर कार्यरत थे। एक कुशल प्रशासक के रूप में श्री यादव इससे पूर्व सूरत, लखनऊ, कानपुर, अंडमान निकोबार एवं इलाहाबाद में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके है।  श्री कृष्ण कुमार यादव चर्चित हिन्दी साहित्यकार व ब्लाॅगर भी हैं और विभिन्न विधाओं में उनकी 7 पुस्तकें  प्रकाशित हो चुकी हैं। 

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प्रो.सूरज भान सिंह का लंबी बीमारी के बाद कल रात देहरादून में निधन !

प्रसिद्ध भाषा चिंतक और शिक्षाविद प्रो. सूरजभान सिंह का जन्म सन् 1936 में देहरादून में हुआ थ।  शिक्षाः अंग्रेज़ी, हिंदी और भाषाविज्ञान में एम.ए. और दिल्ली विश्वविद्यालय से भाषाविज्ञान में पीएच डी थे।  सन् 1988 से 1994 तक  नयी दिल्ली में भारत सरकार के वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष रहे।
आपके मार्गदर्शन में अंग्रेज़ी-हिंदी की पारिभाषिक शब्दावली और कोशविज्ञान का कंप्यूटरीकरण किया गया.

इससे पूर्व 10 वर्षों तक अर्थात् सन् 1995 तक आप केंद्रीय हिंदी संस्थान के नयी दिल्ली और आगरा के केंद्रों में प्रोफ़ेसरके रूप में कार्य करते रहे. सन् 1997 से 2004 तक  सी डैक, पुणे में आप सलाहकार रहे और इस पद पर कार्य करते हुए आप कंप्यूटर और वैब-आधारित ‘लीला’ हिंदी स्वयं शिक्षक  सीरीज़ और ‘मंत्र ’ नामक अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवाद प्रणाली के अनेक प्रोग्रामों से संबद्ध रहे. रोमानिया के बुकारेस्ट विश्वविद्यालय और फ्रांस के पेरिस विश्वविद्यालय में आप विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहे औरअमेरिका केपेन्सिल्वेनिया विश्वविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रहते हुए आपने कंप्यूटर-साधित अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवाद प्रणाली को सुगम बनाने के लिए हिंदी का कंप्यूटर व्याकरण विकसित किया.

प्रकाशनः ‘हिंदी का वाक्यात्मक व्याकरण’ ( 1985 ), ‘हिंदी भाषाः संरचना और प्रयोग’ (1991), ‘अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवाद व्याकरण’ (2003).

मान-सम्मानः  भाषाविज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट और प्रशंसनीय कार्य करने के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए।

संपर्क सूत्र

 पताः आई- 127, नारायण विहार, दिल्ली- 110028.  मोबाइलः 8587094808

परिवार जन

 श्रीमती उमा सिंह (धर्मपत्नी), पुत्रीः मीनाक्षी थापा, दामादः कर्नल थापा, 

पुत्रः 1. मनीष सिंह – सुनीता (पत्नी), 2.आशीष सिंह – अंजली (पत्नी)  3. विकास सिंह- अनीता (पत्नी)  

वैश्विक हिंदी सम्मेलन की ओर से 
 भाषाविद् प्रो. सूरजभान सिंहजी को सादर नमन व विनम्र श्रद्धांजलि।

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विदेशी कंपनिियाँ आगे आई मोदीजी का सपना परा करने के लिए

फ्रांस, जर्मनी, इटली और चीन समेत छह देशों की 12 प्रतिष्ठित कंपनियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रॉजेक्ट डायमंड क्वॉड्रिलैटरल बुलट ट्रेन प्रॉजेक्ट का ठेका लेने की दौड़ में शामिल हो गई हैं।

रेलवे मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'डायमंड क्वॉड्रिलैटरल हाई स्पीड रेल नेटवर्क प्रॉजेक्ट के तीन कॉरिडोर का संभाव्यता अध्ययन करने के लिए टेंडर में 12 इंटरनैशनल कंपनियां भाग ले रही हैं। दिल्ली एवं मुंबई, मुंबई एवं चेन्नै और नई दिल्ली-कोलकाता हाई स्पीड रेल कॉरिडोर्स के लिए संभाव्यता अध्ययन करने के लिए निविदाएं मंगाई जा रही हैं। सर्वे के इस ठेके को हासिल करने के लिए सियुआन समेत चीन की चार कंपनियां, जर्मनी की डीबी इंटरनैशनल, फ्रांस की सिस्टारा, स्पेन की सेनर और इटली की इटालसर के अलावा बेल्जियम की एक कंपनी ने निविदा में भाग लिया है।

अधिकारी ने बताया कि एक कंपनी को डायमंड क्वॉड्रिलैटरल प्रॉजेक्ट के सिर्फ एक ही कॉरिडोर का संभाव्यता अध्ययन ही करने दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस सप्ताह निविदा खोली गई और जुलाई तक चार महीनों के अंदर विजेताओं के बारे में निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि तीनों कॉरिडोर्स की अनुमति लागत करीब 30 करोड़ रुपये है।

2 लाख करोड़ के डायमंड क्वॉड्रिलैटरल प्रॉजेक्ट का लक्ष्य हाई स्पीड ट्रेनें चलाकर महानगरों के बीच यात्रा में लगने वाले समय को कम करना है। हाई स्पीड ट्रेन 300 किमी. प्रति घंटा की चाल से चलेगी। मौजूदा समय में सुपरफास्ट राजधानी एक्सप्रेस दिल्ली से मुंबई के बीच करीब 16 घंटे में दूरी तय करती है। हाई स्पीड ट्रेन के चालू होने का बाद यात्रा का समय करीब आधा रह जाएगा। इसी प्रकार दिल्ली एवं अन्य महानगरों के बीच लगने वाले समय में भी बुलट ट्रेन के चालू होने के बाद कमी आ जाएगी।

मौजूदा समय में डायमंड क्वॉड्रिलैटरल प्रॉजेक्ट के भाग के रूप में दिल्ली-चेन्नै रूट का संभाव्यता अध्ययन चीन कर रहा है।

साभार-इकॉनामिक टाईम्स से 

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दूसरों की मालिश कर पेट पाल रहे पहले हिंद केसरी पहलवान

वर्ष 1958 में देश के पहले हिंद केसरी पहलवान का खिताब जीतने वाले रामचंद्र केसरी आज दूसरों की मालिश व रोगियों का उपचार कर किसी तरह घर चला रहे हैं। 200 से ज्यादा पुरस्कार जीत चुके केसरी को पूर्व प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद भी अब तक 50 एकड़ जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी है।

नेपानगर के पुराने जर्जर मकान में पत्नी सीताबाई के साथ रह रहे 83 वर्षीय श्री केसरी आज भी युवाओं को कुश्ती के दांवपेंच सिखा रहे हैं। हालांकि अब वे अखाड़े नहीं जाते, लेकिन घर के आसपास रहने वाले युवाओं को स्वस्थ्य जीवन जीने की कला में पारंगत करते हैं। प्रशिक्षण देकर कई युवाओं को पहलवान बना चुके हैं।

250 से ज्यादा कुश्तियां लड़ीं

रामचंद्र पहलवान ने 1950 से 1965 तक 250 से ज्यादा कुश्तियां लडीं। 1992 तक नेपा मिल के अखाड़े में पहलवानों को कुश्ती के दांवपेंच सिखाए। करीब 40 साल के पहलवानी जीवन में उन्होंने छोटे-बड़े 100 से ज्यादा पहलवान तैयार किए। इनमें से रतन पहलवान, प्रताप पहलवान, घन्सुभाई पहलवान, मदनमोहन पहलवान आदि राज्य स्तर तक प्रतिभा दिखा चुके हैं।

पहली कुश्ती: ज्ञानीराम को पटखनी दी 

हिंद केसरी भारतीय शैली की राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियनशिप है। यह ऑल इंडिया एमेच्योर रेसलिंग फेडरेशन (एआईएडब्ल्यूएफ) से संबद्ध है। 1958 में इसकी शुरुआत हुई थी। 1 जून 1958 को पहली स्पर्धा हैदराबाद के गोसा महल स्टेडियम में हुई थी।

इसमें रामचंद्र ने थल सेना के नामचीन पहलवान ज्ञानीराम को मात्र सात मिनट में पटखनी देते हुए हिंद केसरी का खिताब जीता था। 2011 से पहली बार महिला प्रतिभागियों को भी हिंद केसरी स्पर्धा में भाग लेने की अनुमति प्रदान की गई। श्री केसरी ने बाद में इंदौर के नामचीन पहलवान अमरसिंह, जबलपुर के हन्‍नू पहलवान, हैदराबाद के सुभान पहलवान आदि को भी पटखनी दी।

महाभारत में ऑफर हुआ था भीम का रोल 

श्री केसरी के पिता बाबूलाल भी कुशल पहलवान थे। पिता की परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया। रामचंद्र को फिल्म निर्माता बीआर चोपड़ा ने प्रसिद्ध टीवी सीरियल महाभारत में भीम के रोल के लिए चयनित किया था, लेकिन जिस दिन उन्हें मुंबई पहुंचना था, उसके एक दिन पूर्व पिता का देहांत हो गया। इसके चलते वे मुंबई नहीं जा सके।

प्रधानमंत्री कर चुके हैं सम्मानित

1981 में दिल्ली में हुए एशियाई गेम्स में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने श्री केसरी को सम्मानित करते हुए 50 एकड़ जमीन देने की घोषणा की थी। इसके बाद राजस्व विभाग ने नेपानगर क्षेत्र में जमीन का चयन भी किया, लेकिन विभागीय प्रक्रियाओं में मामला अटक गया। 10 जून 2013 को मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने दो लाख का चेक देकर श्री केसरी का सम्मान किया था। रुस्तमे हिन्द स्व.दारासिंह के हाथों भी श्री केसरी सम्मानित हो चुके हैं।

कोरे आश्वासन मिले 

आज भी पुराने जर्जर मकान में रह रहा हूं। बारिश के दिनों में छत टपकती है। पूर्व प्रधानमंत्री की घोषणा के बावजूद मुझे अब तक जमीन नहीं मिल सकी। पेंशन और रेलवे पास के लिए भी मैंने गुहार लगाई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब क्षेत्र के जनप्रतिनिधि राष्ट्रपति पुरस्कार दिलाने का आश्वासन दे रहे हैं। अब देखते हैं इस आश्वासन का क्या होता है?

साभार: http://naidunia.jagran.com/ से 

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शुद्ध जल – भविष्य के लिए जल

उदयपुर।। विश्व जल दिवस के अवसर पर झील मित्र संस्थान , झील संरक्षण समिति व डॉ मोहन सिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित " शुद्ध जल – भविष्य के लिए जल " विषयक वृहत संवाद में समग्र जल प्रबंधन पर विचार विमर्श किया गया।

जल विशेषज्ञ डॉ अनिल मेहता ने कहा कि उदयपुर घाटी का अपना एक विशिष्ठ प्राकृतिक एवं भौतिक स्थान है।  घाटी का यह स्वरुप ही उदयपुर में जल की उपलब्धता एवं शुद्धता को सुनिश्चित करता है। बड़े पैमाने पर घाटी की पहाड़ियों की कटाई , वन विनाश से जल उपलब्धता कम हुई है तथा प्रदुषण का स्तर बढ़ा है। जल ग्रहण क्षेत्र में हुई विकृतियों के कारण भू जल पुनर्भरण , प्रवाह पर दुष्प्रभाव पड़ा है तथा मिटटी के कटाव में तेजी आई है।

झील मित्र संस्थान के तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि जल स्त्रोतों में विषैले रसायन , सीवर आदि समाहित हो रह है।  जल को भौतिक व रासायनिक रूप से साफ़ कर देना ही उसके स्वास्थ्य का सूचक नहीं है। जैव विविधता का होना ही जल स्त्रोतों के स्वास्थ्य का पैमाना है। एनएलसीपी ने एक अवसर उदयपुर की झीलों की गुणवत्ता सुधारने का दिया था किन्तु वह अवसर खूबसूरती बढ़ने की कवायद में खो दिया।  जल शुद्धता सुनिश्चित होनी चाहिए।

जलसंचयक महेश गढ़वाल ने कहा कि शहर की बढ़ती जल जरुरत को पूरा करने के लिए वर्षा जल संचयन के प्रयासों में तेजी लाये तो वर्त्तमान  भविष्य के लिए जल की बहुतायत हो जाएगी ।शासन प्रशासन को वर्षा जल संचयन हेतु सहायता एवं जो लोगव् संस्थान इसमें लगे हुए है  उन्हें मदद व् प्रोत्साहित करना चाहिए।

ट्रस्ट सचिव नन्द किशोर शर्मा ने कहा जल असीमित नहीं है।  जल का उपयोग मितव्ययी होना चाहिए। उदयपुर के लिए झीले पेयजल स्त्रोत है। झीलों में कचरा , पोलिथिन,खाद्य सामग्री आदि नहीं डाले ये कचरा पात्र नहीं है । जलीय गुणवत्ता ही मानव व प्रकृति के स्वास्थ्य को बचा सकती है। जलस्त्रोतों को बचाने  में नागरिकता का भाव जरुरी है। वरिष्ठ नागरिक रमेश सिंह ने कहा कि झीलों के किनारे शौच निवृति को रोका जाना चाहिये।

संवाद से पूर्व स्वरुप सागर से घरेलू कचरा,बदबू युक्त खाद्य सामग्री, सड़ा  मांस, शराब की बोतले, पॉलीथिन, जलीय घास निकाली। श्रमदान में रमेश सिंह राजपूत,रामलाल गेहलोत,अम्बालाल नकवाल,डालू गमेती,हरीश चन्द्र पुरोहित , बी  एल पालीवाल,अजय सोनी ,बंसी लाल मीणा,विक्की कुमावत,दीपेश स्वर्णकार, तेज शंकर पालीवाल ,नन्द किशोर शर्मा ने भाग लिया।

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मुस्लिम मानसः बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

 संवाद के अवसर हों, तो बातें निकलती हैं और दूर तलक जाती हैं। मुस्लिम समाज की बात हो तो हम काफी संकोच और पूर्वग्रहों से घिर ही जाते हैं। हैदराबाद स्थित मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूर्निवर्सिटी में पिछली 17 और 18 मार्च को ‘मुस्लिम, मीडिया और लोकतंत्र’ विषय पर हुए सेमीनार के लिए हमें इस संस्था का आभारी होना चाहिए कि उसने इस बहाने न सिर्फ सोचने के लिए नए विषय दिए बल्कि यह अहसास भी कराया कि भारत-पाकिस्तान की सामूहिक इच्छाएं शांति से जीने और साथ रहने की हैं।

    भारत और पाकिस्तान के लगभग तीस महत्वपूर्ण पत्रकारों, 20 से अधिक मीडिया अध्यापकों की मौजूदगी ने इस सेमीनार को जहां सफल बनाया। वहीं लार्ड मेघनाद देसाई, एन.राम, वैदप्रताप वैदिक, नजम सेठी, शेखर गुप्ता, राजदीप सरदेसाई, स्वपनदास गुप्ता, सीमा मुस्तफा, जफर आगा, विनोद शर्मा, शाहिद सिद्दीकी, सतीश जैकब, सैय्यद फैसल अली, कमाल खान, अंजुम राजाबली, हिलाल अहमद, शेषाद्रि चारी, किंशुक नाग,कुमार केतकर, जावेद नकवी, अकू श्रीवास्तव, मासूम मुरादाबादी, तहसीन मुनव्वर, अबदुस्स सलाम असिम जैसे पत्रकारों- बुद्धिजीवियों की मौजूदगी ने इस आयोजन में विमर्श के नए सूत्र दिए। पाकिस्तान से आए तीन पत्रकारों नजम सेठी, महमल सरफराज और इम्तियाज आलम के भाषणों से साफ पता चलता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ आम लोगों में खासा आक्रोश है और वे इस खूनी खेल से तंग से हैं। भारत के लोगों के संदेश देते हुए इनका साफ कहना था कि वे चाहें तो पाकिस्तान जैसे हो जाएं पर इससे उनकी जिंदगी नरक हो जाएगी। इन पत्रकारों का मानना था कि पिछले छः दशक तक वे जिस रास्ते पर चले हैं वह गलत है और मजहब और राजनीति के घालमेल से हालात बदतर ही हुए हैं।  
 
उर्दू और पापुलर कल्चरः
  हिंदुस्तानी मुसलमानों की मीडिया में उपस्थिति और उनकी प्रक्षेपित की जा रही छवि भी चर्चा के केंद्र में रही। वैश्विक मीडिया में मुसलमानों को लेकर जो कुछ बताया और छपाया जा रहा है उस पर काफी बातें हुयीं। आमतौर पर रूझान यही रहा कि जो कहा और बताया जा रहा है उसमें पूरा सच नहीं है। राजदीप सरदेसाई और कमाल खान के संयुक्त संचालन में हुए मीडिया कान्क्लेव में यह बातें उभरकर सामने आई कि मुसलमानों को इन सवालों पर सोचने और आत्ममंथन करने की जरूरत है। यदि वे अपने अंदर झांककर खुद को नहीं बदलते हैं तो यह छवि तोड़नी मुश्किल है। मुस्लिम मानस की चिंताओं के साथ वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने उर्दू की भी बात छेड़ी। उनका कहना था कि हिंदुस्तान में पापुलर कल्चर को उर्दू ने ही जिंदा रखा है। उन्होंने कहा वैश्विक आतंकवाद का चेहरा फिल्मों में भी दिख रहा है, इससे मुस्लिम समाज को जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा भारत की परिस्थितियां अलग हैं। यहां लोकतंत्र है और लोग अपने हकों के लिए आगे आ सकते हैं। अरब देशों से आतंकवादी अधिक इसलिए निकलते हैं क्योंकि वहां पर विरोध करने के अवसर नहीं हैं। इसलिए विरोध आतंकवाद की शक्ल में ही सामने आता है। उनका मानना था कि इस्लामोफोबिया से भारतीय मीडिया को बचाने की जरूरत है। मीडिया और मीडिया शिक्षण से जुड़े लोगों ने इस मौके पर भारतीय उपमहाद्वीप में उपस्थित चुनौतियों पर लंबी बातचीत की। उर्दू और उसकी समस्याओं पर भी चर्चा की।

अलग नहीं हैं मुसलमानों की चिंताएः
   मुस्लिम राजनीति के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैं, पर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्द, उनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र है, अतएव इसे हिंदू, मुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। यह अकारण नहीं है कि मंडल और मंदिर के भावनात्मक सवालों पर आंदोलित हो उठने वाला हमारा राजनीतिक समाज बेरोजगारी के भयावह प्रश्न पर एक देशव्यापी आंदोलन चलाने की कल्पना भी नहीं कर सकता। इसलिए मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखा, लेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारी, अशिक्षा, अंधविश्वास, गंदगी, पेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है।

बंटवारे के भावनात्मक प्रभावों से मुक्त होः
   सही अर्थों में भारतीय मुसलमान अभी भी बंटवारे के भावनात्मक प्रभावों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। पड़ोसी देश की हरकतें बराबर उनमें भय और असुरक्षाबोध का भाव भरती रहती हैं। लेकिन आजादी के साढ़े छः दशक बीत जाने के बाद अब उनमें यह भरोसा जगने लगा है कि भारत में रुकने का उनका फैसला जायज था। इसके बावजूद भी कहीं अन्तर्मन में बंटवारे की भयावह त्रासदी के चित्र अंकित हैं। भारत में गैर मुस्लिमों के साथ उनके संबंधों की जो ‘जिन्नावादी असहजता’ है, उस पर उन्हें लगातार ‘भारतवादी’ होने का मुलम्मा चढ़ाए रखना होता है। दूसरी ओर पाकिस्तान और पाकिस्तानी मुसलमानों से अपने रिश्तों के प्रति लगातार असहजता प्रकट करनी पड़ती है। मुस्लिम राजनीति का यह वैचारिक द्वंद्व बहुत त्रासद है। आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है।

  एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता है, वहीं दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। फिलवक्त की राजनीति में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता । भारतीय समाज में ही नहीं,हर समाज में सुधारवादी और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसे चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआ, जिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीर,नजीर अकबरवादी, अब्दुर्रहीम खानखाना, रसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी था, जिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी है, संवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थी, आज भी है। यही बात हिंदुत्व के संदर्भ में भी उतनी ही सच है।

जरूरी है संवाद और सांस्कृतिक आवाजाहीः
      वीर सावरकर और गांधी दोनों की उपस्थिति के बावजूद लोग गांधी का नेतृत्व स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन इसके विपरीत मुस्लिमों का नेतृत्व मौलाना आजाद के बजाए जिन्ना के हाथ में आ जाता है। इतिहास के ये पृष्ठ हमें सचेत करते हैं। यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्ना, जो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थे,मुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए ।

      मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैं, जहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । आजादी के बाद 1964 तक पं. नेहरु मुसलमानों के निर्विवादित नेता रहे । सच देखें तो उनके बाद मुसलमान किसी पर भरोसा नहीं कर पाया और जब किया तब ठगा गया । बाबरी मस्जिद काण्ड के बाद मुस्लिम समाज की दिशा काफी बदली है । बड़बोले राजनेताओं को समाज ने हाशिए पर लगा दिया है। मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिक, आर्थिक, समाज सुधार, शिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है।मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी ते होगी, समाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा । एक सांस्कृतिक आवाजाही, सांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है।जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ा, लिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । हैदराबाद में हुयी बातचीत मुसलमान, उर्दू के इर्द-गिर्द जरूर हुयी पर उसने एक बहस शुरू की है जिसमें हिंदुस्तानी मुसलमान की उम्मीदें दिखती हैं और यही उनके बेहतर भविष्य और सार्थक लोकतंत्र की राह बनाएगी।

(लेखक मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं)

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बारहवीं के बाद पत्राचार कोर्स की राहों पर एक नज़र

आजकल अक्सर बारहवीं के बाद क्या किया जाए जैसे प्रश्न पर चर्चा की जाती है।आज ही इस कालम के लेखक ने एक करियर मार्गदर्शन कार्यशाला में मुख्य वक्त के रूप में सहभागिता की। वहां भी दसवीं और बारहवीं के बाद की पढ़ाई पर बेहद कारगर बातें की गईं।  करियर बारे में नवीनतम जानकारी के साथ गति बनाए रखना वास्तव में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।विशेषकर पत्राचार पाठ्यक्रमों को लेकर जागरूकता का अभाव है। स्मरण रहे कि पत्राचार शिक्षा ने, देश की शिक्षा-प्रणाली में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन ला दिया है। यह अनुमान लगाया जाता है कि आने वाले समय में परम्परागत अध्यापन के अध्यापक उपग्रह संचार, लो पावर ट्रांसमीटर्स की सहायता से और सूचना सुपर-हाइवेज़ के माध्यम से देश भर की शिक्षा का लाइव प्रदर्शन कर सकेंगे। इस संबंध में शुरूआत हो चुकी है। 

उल्लेखनीय है कि हमारे देश में कई खुले विश्वविद्यालय तथा नियमित विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थाएं दूरस्थ यानी पत्राचार अध्ययन कार्यक्रम चलाते हैं। दूरस्थ शिक्षा पद्धत्ति कई श्रेणियों के शिक्षार्थियों को लाभ प्रदान कर रही है। खुले विश्वविद्यालय ऐसे लचीले पाठ्यक्रम विकल्प देते हैं, जिन्हें वे प्रवेशार्थी ले सकते हैं जिनके पास कोई औपचारिक योग्यता नहीं है किंतु अपेक्षित आयु के हो चुके हैं और लिखित प्रवेश परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुके हैं। ये पाठ्यक्रम छात्र की सुविधानुसार भी लिए जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों के दूरस्थ शिक्षा केंद्र न्यूनतम पात्रता रखने वाले उम्मीदवारों को प्रवेश देते हैं। 

अधिकांश अध्यापन-अध्ययन प्रक्रिया में मुद्रित अध्ययन सामग्री तथा नोडल केंद्रों पर मल्टीमीडिया सुविधा सेट-अप या दूरदर्शन अथवा रेडियो नेटवर्क के माध्यम से अध्यापन शामिल होता है। ये विश्वविद्यालय स्नातक पाठ्यक्रम, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम, एम.फिल, पी.एच.डी. तथा डिप्लोमा एवं प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम भी चलाते हैं, जिनमें से अधिकांश पाठ्यक्रम भविष्य उन्मुखी होते हैं।

निम्नलिखित संस्थाएं पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से शिक्षार्थियों को लाभान्वित कर रही हैं –

खुले विश्वविद्यालय
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1. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय, मैदान गढ़ी, नई दिल्ली

2. डॉ. बी.आर. आंबेडकर खुला विश्वविद्यालय, (बीआरएओयू) हैदराबाद, आंध्र प्रदेश

3. वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (वी.एम.ओ.यू.), कोटा, राजस्थान, रावतभाटा रोड, अखेलगढ़, कोटा राजस्थान 

4. नालंदा खुला विश्वविद्यालय (एन.ओ.यू), पटना, बिहार, तीसरी मंजिल, बिस्कोमॉन भवन, पश्चिम गांधी मैदान, पटना

5. यशवंतराव चौहान महाराष्ट्र खुला विश्वविद्यालय (वाईसीएमओयू), नाशिक, महाराष्ट्र

6. मध्य प्रदेश भोज खुला विश्वविद्यालय (एम.पी.बी.ओ.यू.) भोपाल, म.प्र. 

7. डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर खुला विश्वविद्यालय (बीएओयू), अहमदाबाद, गुजरात 

8. कर्नाटक राज्य खुला विश्वविद्यालय (के.एस.ओ.यू.) मैसूर, कर्नाटक

9. नेताजी सुभाष खुला विश्वविद्यालय (एन.एस.ओ.यू.), कोलकाता

10. उ.प्र. राजश्री टंडन खुला विश्वविद्यालय (यूपीआरटीओयू), इलाहाबाद, उ.प्र. 

11. तमिलनाडु खुला विश्वविद्यालय (टी.एन.ओ.यू.), चेन्नै, तमिलनाडु

12. पंडित सुंदरलाल शर्मा खुला विश्वविद्यालय (पीएसएसओयू), बिलासपुर, छत्तीसगढ़ विहार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

13. उत्तरांचल खुला विश्वविद्यालय, हल्द्वानी, (नैनीताल), उत्तरांचल – सौरभ माउंट व्यू के पास, भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी, नैनीताल

14. के.के. हैंडकि, राज्य विश्वविद्यालय, गुवाहाटी, असम

दूरस्थ शिक्षा राज्य विश्वविद्यालय
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1. जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
2. काकतिया विश्वविद्यालय, वरंगल, आं.प्र. 
3. उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
4. पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
5. श्री कृष्णदेवराया विश्वविद्यालय, अनंतपुर, आं.प्र. 
6. श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, आं.प्र. 
7. नलसार विधि विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आं.प्र. 
8. नागार्जुन विश्वविद्यालय, नागार्जुन नगर, आं.प्र. 
09. बंगलौर विश्वविद्यालय, बंगलौर, कर्नाटक
10. कन्नड विश्वविद्यालय, हम्पी, कर्नाटक
11. गुलबर्गा विश्वविद्यालय, गुलबर्गा, कर्नाटक
12. मैंगलोर विश्वविद्यालय, मंगलागंगोत्री, कर्नाटक
13. कुवेम्पु विश्वविद्यालय, शंकरागट्टा, कर्नाटक
14. मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर, कर्नाटक
15. गोवा विश्वविद्यालय, गोवा
16. डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय, डिब्रूगढ़, असम
17. गौहाटी विश्वविद्यालय, गुवाहाटी, असम
18. बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार
19. ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा, बिहार
20. पटना विश्वविद्यालय, पटना, बिहार
21. तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार
22. उड़ीसा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, उड़ीसा
23. सम्बलपुर विश्वविद्यालय, सम्बलपुर, उड़ीसा
24. बरहामपुर विश्वविद्यालय, बरहामपुर, उड़ीसा
25. उत्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, उड़ीसा
26. फकीर मोहन विश्वविद्यालय, बालासोर, ओडि़शा
27. नार्थ उड़ीसा विश्वविद्यालय, मयूरभंज, ओडि़शा
28. त्रिपुरा विश्वविद्यालय, त्रिपुरा
29. बर्दवान विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
30. विद्यासागर विश्वविद्यालय, मिदनापुर, पश्चिम बंगाल
31. जादवपुर विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल
32. रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
33. कल्याणी विश्वविद्यालय, जिला-नाडिया, पश्चिम बंगाल
34. गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा
35. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
36. एम.डी. विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा
37. एच.पी. विश्वविद्यालय, शिमला, (हि.प्र) 
38. जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू-कश्मीर
39. कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर
40. पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, पंजाब
41. पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला पंजाब
42. गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब
43. जी.बी.पंत विश्वविद्यालय, पंतनगर, उत्तरांचल
44. कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, उत्तरांचल
45. बी.आर. आम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा, उ.प्र. 
46. लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उ.प्र. 
47. गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
48. अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, म.प्र. 
49. बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, इंदौर, म.प्र. 
50. देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, भोपाल, म.प्र. 
51. डॉ. हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय, सागर, म.प्र. 
52. जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, म.प्र. 
53. एम.जी. चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट, म.प्र. 
54. रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर, म.प्र. 
55. शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर, म.प्र. 
56. एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, मुंबई, महाराष्ट्र
57. मुंबई विश्वविद्यालय, विद्यानगरी, मुंबई
58. अमरावती विश्वविद्यालय, अमरावती
59. स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, नांदेड, महाराष्ट्र
60. महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, कोट्टयम, केरल
61. कालीकट विश्वविद्यालय, कालीकट, केरल
62. कन्नूर विश्वविद्यालय, काल्लियासेरी, केरल
63. केरल विश्वविद्यालय, त्रिवेंद्रम, केरल
64. अलगप्पा विश्वविद्यालय, कराइकुडी, तमिलनाडु
65. अन्नामलै विश्वविद्यालय, अन्नामलैनगर, तमिलनाडु
66. भरथियार विश्वविद्यालय, कोयम्बत्तूर, तमिलनाडु
67. भारतीदासन विश्वविद्यालय, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
68. मदुरै कामराज विश्वविद्यालय, मदुरै, तमिलनाडु
69. मेननमणियम सुंदरनगर विश्वविद्यालय, तिरुनेलवेली, तमिलनाडु
70. मदर टेरेसा महिला विश्वविद्यालय, कोडईकनाल, तमिलनाडु
71. तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बत्तूर, तमिलनाडु
72. मद्रास विश्वविद्यालय, मद्रास, तमिलनाडु
73. पेरियार विश्वविद्यालय, सलेम, तमिलनाडु
74. तमिलनाडु डॉ. आम्बेडकर विधि विश्वविद्यालय, चेन्नै
पाठ्यक्रम

पत्राचार के माध्यम से डिग्री पाठ्यक्रम 
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•    बी.ए. (लगभग सभी विषय) 
•    बी.ए. (लगभग सभी विषय), बी.कॉम. 
•    एम.ए. (लगभग सभी विषय), एम.एस.सी. (लगभग सभी विषय), एम.कॉम. 
•    बी.बी.ए./बी.बी.एम./बी.बी.एस. 
•    बी.जे.एम.सी, बी.टेक, एम.टेक
•    पर्यटन स्नातक
•    बी.एड., एम.एड
•    बी.एल.आई.एस, एम.एल.आई.एस.v •    बी.बी.ए., एम.बी.ए. 
इन विश्वविद्यालयों द्वारा कई डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। 
चलाए जाने वाले कुल डिप्लोमा/प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम निम्नलिखित हैं –

इंजीनियरी से जुडे़ पाठ्यक्रम
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•    शर्करा प्रौद्योगिकी
•    औद्योगिक संरक्षा
•    रसायन प्रसंस्करण, इंस्ट्रूमेंटेशन एवं नियंत्रण
•    अनुप्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिकी
•    ऑटोमोबाइल प्रौद्योगिकी

कम्प्यूटर पाठ्यक्रम
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•    कार्यालय प्रबंधन/सेवा हेतु कम्प्यूटर
•    कम्प्यूटर अनुप्रयोग/कम्प्यूटर विज्ञान/कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग
•    कम्प्यूटर प्रणाली

कृषि एवं शिक्षा 
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•    बागवानी
•    उर्वरक प्रौद्योगिकी
•    मार्गदर्शन एवं परामर्श
•    शिशु शिक्षा एवं देखरेख
•    शैक्षिक नियोजन
•    विद्यालय प्रबंधन

व्यावसायिक
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•    सौंदर्य प्रसाधन विज्ञान
•    विज्ञापन
•    टी.वी. मेकेनिक्स
•    चिकित्सा प्रयोगशाला प्रौद्योगिकी
•    निर्माण प्रबंधन
•    बैंकिंग
•    बैंकिंग तथा वित्त में डिप्लोमा

स्वास्थ्य
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•    डाइट थेरेपी
•    खाद्य एवं पोषण
•    औद्योगिक प्रदूषण एवं नियंत्रण
•    औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन
•    पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा
•    समाज पोषण

विधि
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•    सामान्य विधि स्नातक (बी.जी.एल.) 
•    शैक्षिक विधि स्नातक (एलएलबीएके), एलएलएम
•    श्रम विधि में डिप्लोमा
•    कराधान विधि
•    कम्पनी विधि में डिप्लोमा
•    उपभोक्ता परिरक्षण विधि एवं विधि तथा सार्वजनिक सेवा में डिप्लोमा

तो फिर क्या, बस तैयार हो जाइए और अपनी स्थिति व पसंद को ध्यान में रखकर कोई अच्छा सा कोर्स चुन लीजिये। ऊपर दी गई सूची आपकी मदद करेगी। 

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 राजनांदगांव. संपर्क – मो.9301054300 

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जब हम चिड़िया की बात करते हैं

जब हम चिड़िया की बात करते हैं तो हम उम्मीद और प्यार की गर्माहट भरी दुनिया की बात करते हैं। जब हम चिड़िया की बात करते हैं तो एक छोटी और नन्ही उड़ान की बात करते हैं। इस दुनिया में चिड़िया गायब होने लगे तो दुनिया में जरूर एसा कुछ चल रहा है जो इस चिड़िया के लिए मुफीद नहीं है। चिड़ियों का चहचहाना और पेड़ पर उनका कलरव स्मृति के हिस्से हो चले हैं। जब नन्ही चिड़िया को दुनिया जीने नहीं दे रही है तो इंसानों के लिए यह किसी संकट की ही चेतावनी है।

'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' पंक्ति मैने कवि विनीत तिवारी की कविता 'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' से उधार ली है।

नन्ही गौरेया की किसी भी वातावरण में जीवित बने रहने की अकूत क्षमता होती है। गौरेया का लुप्त होना पर्यावरण के ह्रास और मानव जीवन के लिए खतरे का संकेत है। गौरेया के लुप्त होने के बारे में कई कयास हैं, लेकिन तथ्य यही है कि शहरी इलाकों में मनुष्य के रहन-सहन की बदलती जीवन शैली गौरेया के अनुकूल नहीं है। गौरेया की खास बात यही है कि वह दूसरे पक्षियों की तरह पेड़ के कोटरों के बजाय मानव बसाहटों में अपने लिए घोंसला बनाती है। यही कारण है कि गौरेया अन्य पक्षियों की तुलना में मनुष्य के अधिक नजदीक है। आधुनिक बिल्डिंगों में उन्हें भोजन के लिए छोटे कीड़े-मकोड़े नहीं मिलते हैं। मच्छरनाशक द्रव्यों के अधिक इस्तेमाल से ये कीड़े समाप्त हो चुके हैं, इसी के साथ गौरेया भी कम होती जा रही है। इमारतों में गौरेया के आने-जाने की कोई जगह नहीं होती। खिड़कियों पर एसी लगाकर उन्हें बंद किया जा चुका है। शहरों में गौरेया अक्सर घरों में पंखों, विद्युत मीटर और ट्यूबलाइट के पास अपना घोंसला बनातीं थीं। आज के आधुनिक घरों में उनके घोंसला बनाने की कोई जगह नहीं है। सड़कों पर वाहनों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण और उनसे निकलने वाली विषाक्त गैसों (कार्बन मोनोआक्साइड) ने उन्हें शहरों से दर-बदर कर दिया है। मोबाइल और इंटरनेट की तरंगों के संजाल के कारण भी गौरेया शहरी इलाकों का रुख नहीं करतीं। इंटरनेट को हम पर्यावरण मित्र कहते हैं। आज सभी फेसबुक और व्हाट्सऐप की आभासी दुनिया में इस कदर गाफिल हैं कि उन्होंने इस असल दुनिया के भीतर एक अपनी दुनिया बना ली है। यह दुनिया जिस इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों से चल रही है वही इस चिड़िया की उड़ान में बाधा बन रही है। नतीजतन सालों से मनुष्य के करीब रहती आई गौरेया ने शहर के शोरशराबे से दूर-दराज के इलाकों की ओर रुख कर लिया है।

पिछले 60 साल में जैवविविधता बड़ी तेजी से खत्म हुई है। नन्ही गौरैया का लुप्त होना इसी का सबूत है। घास के बीज गौरेया का प्रमुख भोजन है। बड़े शहरों में घास के मैदान खत्म हो गए तो गौरेया को भोजन मिलना बंद हो गया, जिससे उसने ग्रामीण इलाकों में अपना घर बना लिया। शहरों में बच्चों के लिए घास वाले खेल के मैदान का लुप्त होना और गौरेया का खत्म होना एक ही परिघटना है।

वैसे सेल फोन के आगमन से बहुत पहले ही गौरैया का लुप्त होना शुरू हो गया था। रसैल कारसन ने 1962 में अपनी बहुपठित किताब साइलेंट स्प्रिंग में चेतावनी दे दी थी कि हमारा सभ्य समाज 1939 के बाद से कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग कर रहा है जिससे हम जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं। इससे न केवल नन्हे कीट खत्म हो रहे हैं, पारिस्थितकीय तंत्र की खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो रही है।

गौरेया मोटे किस्म का अनाज, कई प्रकार के फल, घास के फूल-बीज आदि खाती है। इस प्रक्रिया में वह इनके बीज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है इस प्रकार प्रकृति में तमाम स्थानों पर बीज पहुंचते हैं और जैवविविधता और पर्यावरण संतुलन बना रहता है। गौरेया फसलों और पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कई प्रकार के कीड़ों, कृमियों और इल्लियों को भी अपना भोजन बनाती है, इस प्रकार फसलों और पेड़ पौधों का प्राकृतिक कीट नियंत्रण करती है। पारिस्थितिक तंत्र को स्वस्थ्य रखने में गौरेया की अहम भूमिका होती है। खाद्य श्रृंखला में गौरेया, बाज, गिद्ध और कुछ बड़े पक्षियों समेत सांप का प्रमुख भोजन होती है। इस प्रकार से यह खाद्यश्रंखला में दूसरे पायदान पर होती है। यानी यह बीज, फल, कीड़ो आदि को खाकर फिर बड़े पक्षियों का भोजन बनती है इस प्रकार खाद्य श्रंखला की महत्वपूर्ण कड़ी बनती है। यदि गौरेया कम होंगी तो बड़े पक्षियों और सांप को उनका भोजन नहीं मिलेगा और खाद्य श्रृंखला बिगड़ेगी प्राकृतिक असंतुलन पैदा होगा। गौरेया के साथ ही गिद्धों की संख्या में कमी का कारण गौरेया और गिद्ध में यह अंतर्सबंध भी हो सकता है। गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आई है जिससे और परोक्ष अपरोक्ष रूप से मानव जीवन का अस्तिव भी संकट में है। नन्ही गौरेया का अस्तित्व एक मानवीय और सभ्य दुनिया की आश्वस्ति है, जिसे हर हाल में बचाए रखने की जरूरत है।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से

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