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​मौत पर भारी मैच …!!​

क्रिकेट का एक मैच यानी हजारों सहूलियत का कैच। बाजार के लिए यह खेल बिल्कुल गाय की तरह है। जो हमेशा देती ही देती है। नाम – दाम और पैसा बस इसी खेल में है। दूसरे खेलों के महारथी जीवन – भर सुख – सुविधाओं का रोना रोते हैं, जबकि यही सुख – सुविधाएं  मानो क्रिकेट खिलाड़ियों के चरण में लोटने को तरसती रहती है। दुनिया के  विकासशील देशों में क्रिकेट आम – आदमी से लेकर महान हस्तियों यहां तक कि प्रधानमंत्री जैसे पद पर रहने वालों को सीधे प्रभावित करता है।  तो इसकी सबसे बड़ी सुविधा यह है कि घंटों करते रहिए मैच के हर कोण का पोस्टमार्टम। जीते तो भी हारे तो भी। मैच हारे तो हार की लाश के पोस्टमार्टम के बहाने घंटों खींच सकते हैं। और यदि जीत गए तो फिर कई दिनों की बल्ले – बल्ले।  

मैच जिताऊ  क्रिकेट खिलाड़ियों को असाधारण से लेकर अवतारी पुरुष तक बनाने की यहां छूट है। बुलंद सितारे वाले खिलाड़ियों के परिजनों से लेकर दोस्त, प्रेयसी , बांधवी व गर्ल फ्रेंड तक का लंबा इंटरव्यू दिखाया जा सकता है। वर्तमान में चल रहे खिलाड़ियों की महिमा का बखान करने के बहाने आप उन चेहरों पर भी  घंटों फोकस बनाए रख सकते हैं, जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं और हाशिये पर पड़े है। इस बहाने पेज थ्री कल्चर का बखूबी पोषण हो सकता है। दुनिया के तमाम दूसरे खेल फूल की तरह है, जो खेले यानी खिले और चंद  मिनटों में खत्म यानी मुर्झा गए। लेकिन क्रिकेट का मामला हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है। जैसे मान लीजिए कि बारिश के चलते कोई मैच हुआ ही नहीं। फिर भी आंकड़ों के जरिए यहां यह बताने की गुंजाइश है कि इससे पहले कब – कब बारिश के चलते मैच रद हुआ था। 

कोई टीम लगातार हारती ही जा रही है तो भी आंकड़ों के जरिए बताया जा सकता है कि हारने के मामले में अब तक दूसरी टीमों का रिकार्ड क्या रहा है। यह संभावना दूसरे खेलों में नहीं है।  खबरों की दुनिया के लिहाज से आकलन करें तो हादसों में मौत और सैनिकों पर आतंकवादी हमला सबसे ज्यादा नेगलेक्टेड और ओवरलुक की जाने वाली खबरे हैंं। इसका इस्तेमाल बस फीलर या रुटीन खबरों की तरह ही होता है। बहुत हुआ तो सुर्खियां दिखाने के दौरान कुछ फुटेज दिखा दिए। स़ड़क हादसों में होने वाली मौत तो खबरों की दुनिया के लिए कभी चिंतनीय प्रश्न रहा ही नहीं। हां रेल हादसों का मसला काफी हद तक समय और परिस्थिति पर  निर्भर करता है। बिल्कुल शेयर मार्केट की तरह। कभी तो किसी मालगाड़ी के बेपटरी हो जाने की खबर देर तक चलती रहती है और कभी बड़े हादसों को भी वह महत्व नहीं मिलता। जो मिलना चाहिए। क्योंकि एेसी दुर्घटनाओं में मरता तो बिल्कुल आम आदमी ही है। जैसे उस दिन हुआ। विश्व कप क्रिकेट में बांग्लादेश पर भारतीय टीम की जीत के बाद मानो चैनलों ने पूरे दिन दर्शकों को क्रिकेट के रंग में रगने की अग्रिम  तैयारियां कर रखी थी। 

एंकरों पर इसका नशा कुछ इस कदर चढ़ा हुआ था कि सफल खिलाड़ियों का  बखान ही नहीं महिमामंडन करने की जैसे  होड़ सी मची थी। । लेकिन तभी जम्मू कश्मीर में आतंकवादी हमला…. तीन जवान शहीद… और रायबरेली में ट्रेन हादसा, 32 की मौत की खबर अाई। लेकिन चैनलों पर क्रिकेट पुराण जारी था। हादसे से जुड़ी खबरों को बिल्कुल चलताऊ तरीके से निपटाया जा रहा था। मसलन  रेल राज्य मंत्री ने की   मुआवजे की घोषणा…  दिए जांच के आदेश। सुर्खियां दिखाने के दौरान बस एकाध बार रेल राज्य मंत्री का चेहरा और फिर दुर्घटनास्थल का सामान्य फुटेज। जिसमें साफ नजर आ रहा है कि सरकारें बदलने के बावजूद यह वही रेल है, जिसे हम  सालों से इस्तेमाल करते आ रहे हैं।  विश्व कप  क्रिकेट पर भारत की बांग्लादेश पर जीत न हुई होती तो चार लोग चैनलों पर बहस के लिए बैठाए भी जा सकते थे। रेल व्यवस्था पर छाती पीटने के लिए। लेकिन ….।
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लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और दैनिक जागरण से जुड़े हैं। 
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तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर पश्चिम बंगाल ः721301 जिला पश्चिम मेदिनीपुर संपर्कः 09434453934 

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म.प्र. विधान सबा के दरवाजे आम आदमी के लिए भी खुले

भोपाल। सीएम हेल्पलाइन की तरह मध्य प्रदेश विधानसभा भी आम आदमी की शिकायत न सिर्फ सुनेगी, बल्कि सुलझाएगी भी। विधानसभा अब लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की तर्ज पर वाच डॉग की भूमिका भी निभाएगी। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा की पहल पर नया प्रयोग किया जा रहा है। इससे आम आदमी भी व्यक्तिगत, योजनाओं के क्रियान्वयन, गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या स्वयं के साथ हो रहे भेदभाव की शिकायत विधानसभा सचिवालय से कर सकेगा। इसकी जांच विधानसभा की याचिका समिति से कराई जाएगी।

अभी तक आम आदमी की का सीधा जु़़डाव विधानसभा से नहीं था। समस्या या शिकायत को विधायक प्रश्न या याचिका के माध्यम से उठाते थे लेकिन इसका दायरा सीमित था।

 

नए नियमों के अनुसार अब विधायकों के साथ आम आदमी भी विधानसभा में सीधे शिकायत कर सकता है। इसके लिए व्यक्ति को शिकायत के साथ दस्तावेज भी देने होंगे। इनका परीक्षण करने के बाद विभाग से जवाब तलब होगा। यदि जरूरत महसूस हुई तो समिति विभागीय मंत्री और आला अफसरों को भी बुलाकर पूछताछ कर सकेगी। समिति की सिफारिशें सदन में रखी जाएंगी। अधिकारियों का कहना है कि यदि कोई मामला नियम, प्रक्रियाओं से जु़़डा होगा तो समिति अपने प्रतिवेदन में उसको लेकर भी सिफारिश करेगी। प्रतिवेदन पर पालन प्रतिवेदन भी प्रस्तुत होते हैं, इसलिए इसकी गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

 

कहां और कैसे दर्ज होगी शिकायत

विधानसभा सचिवालय में अध्यक्ष या प्रमुख सचिव के नाम शिकायत या आवेदन देना होगा। इसे परीक्षण के लिए याचिका समिति शाखा को भेजा जाएगा। यहां आवेदक द्वारा दिए गए दस्तावेज की जांच करने के बाद प्रतिवेदन अध्यक्ष के सामने रखा जाएगा। अध्यक्ष प्रकरण को देखने के बाद याचिका समिति को जांच पड़ताल के लिए देने योग्य पाते हैं तो आगे बढ़ा देंगे। समिति विभागीय मंत्री और आला अफसरों को बुलाकर पूछताछ भी कर सकेगी।

किस तरह की शिकायतों की होगी सुनवाई

-क्षेत्र में घोषणा के बाद काम नहीं हो रहा।

-भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण या अनियमितता ।

-योजनाओं का फायदा पहुंचाने में भेदभाव।

-व्यक्तिगत मामला, जिसमें सुनवाई नहीं हो रही।

आम आदमी की भागीदारी होगी सुनिश्चित

 

विधानसभा की इस पहल से आम आदमी की निभर्रता विधायक पर कम होगी और उसकी भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी । वहीं, विधानसभा ने नई व्यवस्था में विधायकों पर ये पाबंदी लगा दी है कि वे एक दिन में एक से ज्यादा याचिका सूचना नहीं दे सकेंगे।

 

आम आदमी का फायदा

इस कदम से आम आदमी को फायदा होगा। उसे न्याय पाने के लिए कहीं भटकना नहीं प़़डेगा। तर्क और विधिसंगत शिकायत की सुनवाई याचिका समिति से करवाई जाएगी। इसके लिए नया नियम ही बना दिया है- डॉ. सीतासरन शर्मा, अध्यक्ष, विधानसभा।

 

विस के दरवाजे खोले

विधानसभा के दरवाजे अब आम आदमी के लिए खोल दिए हैं। यदि किसी के जायज सार्वजनिक या व्यक्तिगत काम नहीं हो रहे हैं तो वो दस्तावेज सहित अपनी बात खुद रख सकता है। कोशिश होगी कि विधानसभा आने वाले व्यक्ति को न्याय मिले- भगवानदेव ईसरानी, प्रमुख सचिव, विधानसभा।

 

साभार- www.jagran.com/ से

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गुटखा बेचना गैर जमानती अपराध होगा महाराष्ट्र में

मुंबई। राज्य में पाबंदी के बावजूद गुटखे की बिक्री हो रही है। पडोसी राज्यों में इस पर प्रतिबंध न होने की वजह से महाराष्ट्र में इसकी तस्करी हो रही है। राज्य पुलिस को निर्देश दिया जाएगा कि गुटखा जप्ती के मामले में दोषियों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं में मामले दर्ज किए जाए। सोमवार को विधानसभा एफडीए मंत्री गिरीश बापट ने प्रश्नकाल के दौरान यह जानकारी भाजपा के मंगल प्रभात लोढ़ा को दी।

    विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान भाजपा के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढा ने पूछा कि गुटखा बेचते पकड़े जाने पर क्या सरकार उन दुकानों के लाईंसेंस रद्द करेगी। इस पर मंत्री ने कहा कि गुटखा के बेचने के लिए अलग से लाईसेंस नहीं दिया जाता। किसी भी दुकान पर गुटखा बेचने के मामले पकड़े जा सकते हैं। जो दुकान गुटखा बेचते पकड़े जाएंगे उनके लाईसेंस रद्द करने की बाबत सरकार विचार करेगी। इस दौरान भाजपा के मंगल प्रभात लोढा ने पूछा कि गुटखा बेचते पकड़े जाने पर क्या सरकार उन दुकानों के लाईंसेंस रद्द करेगी। इस पर मंत्री ने कहा कि गुटखा के बेचने के लिए अलग से लाईसेंस नहीं दिया जाता। किसी भी दुकान पर गुटखा बेचने के मामले पकड़े जा सकते हैं। जो दुकानवाले गुटखा बेचते पकड़े जाएंगे उनके लाईसेंस रद्द करने की बाबत सरकार विचार करेगी। कांग्रेस के नसीम खान ने राज्य में पाबंदी के बावजूद धडल्ले से गुटखा बेचे जाने की बात कही। 

उन्होंने कहा कि विधानभवन के बाहर भी गुटखा बेचा जा रहा है। इस मामले में सरकार क्या कार्रवाई कर रही है।  इसके जवाब में एफडीए मंत्री बापट ने कहा कि गुटखा बिक्री रोकने के लिए राज्य सरकार कार्रवाई कर रही है। 72 हजार दुकानों की तलाशी ली गई है। 32 करोड़ रुपए मूल्य का गुटखा जप्त किया गया है। उन्होंने कहा कि गुटखा जानलेना है। विधायक लोढ़ा ने कहा कि पुलिस को जो अघिकार है, उनके मुताबिक गुटखा के मामले में पुलिस भारतीय दंड संहिता की धारा 328 का इस्तेमाल कर सकती है। यह गैरजमानती धारा है। लेकिन पुलिस ऐसा नहीं कर रही है। इसलिए पुलिस को निर्देश दिया जाए कि गुटखा बिक्री के आरोपियों के खिलाफ गैरजमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाए। मंत्री श्री बापट ने कहा कि अब गुटखे की अवैध बिक्री के 1538 मामले अदालत तक ले जाए गए हैं। इसके लिए हमने टोल फ्री नंबर भी शुरु किया है। लोग इस नंबर गुटखा बेचे जाने की जानकारी दे सकते हैं।

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हिन्दी वाले ही हिन्दी की कर रहे चिंदी चिंंदी

चंडीगढ़ में दस साल रहा हूँ। जयपुर की तरह जब-तब वहाँ के अखबारों को नेट पर देख आता हूँ। इस तरह शहर से एक रिश्ता बना रहता है। कुछ मीठी यादें, कुछ सोए गम जाग जाते हैं।

कल ही उधर का एक बड़ा हिंदी अखबार देख रहा था। एक खबर यों शुरू होती थी : 'सॉपिंस स्कूल-32 में वीरवार को एनुअल स्पोर्ट्स डे के मौके पर रिमोट कंट्रोल्ड हेलिकॉप्टर की उड़ान स्टूडेंट्स के लिए सरप्राइज पैकेज रही।' ऊपर अखबार के कई खाने थे। सिर्फ पहले का नाम हिंदी में था – संघ राज्य क्षेत्र। यह यूनियन टेरिटरी का अनुवाद हुआ। हम केंद्रशासित प्रदेश लिखा करते थे।

बहरहाल, अखबार के बाकी खाने नागरी में यों थे : न्यूज; इवेंट; बेस्ट ऑफ सिटी; सिटी ब्लॉगर; सिटी डायरेक्टरी; गैलरी; ई-पेपर।

मैंने 'बेस्ट ऑफ सिटी' का पन्ना खोला। कुछ बानगी देखिए : ''ट्राईसिटी चंडीगढ़ में शॉपिंग के लिए सेक्टर-17 एक स्वर्ग की तरह है। यहां दुनिया भर के मशहूर ब्रैंड्स अपनी स्टोर्स के साथ मौजूद हैं। शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, रेस्तरां, बैंक, डिस्को और पब सेक्टर-17 को शहर का मोस्ट हैप्पनिंग प्लेस बनाते हैं।… दोस्तों के साथ हैंगआउट करने के लिए सेंट्रा मॉल यंगस्टर्स का फेवरेट हॉट स्पॉट हैं। मस्ती और फन के साथ यहां फूड कोर्ट की जबरदस्त वैरायटी हैं। साथ ही यहां के स्टोर्स शॉपर्स के लिए बेहद कूल हैं। दोस्तों के साथ गप्पे मारने के बाद आप फोर-स्क्रीन पीवीआर सिनेमा में मूवी इंज्वॉय कर सकते हैं।… चंडीगढ़ में सिटी म्यूजियम जाकर हैंग आउट करने वालों में एडल्ट के साथ यंगस्टर्स की संख्या भी अच्छी खासी है।''

कभी एक पत्रिका में स्तंभ छपा करता था- ''यह किस देश-प्रदेश की भाषा है?'' आज लगता है यह प्रश्न बेमानी होगा। क्या खुद पत्र-पत्रिकाओं की भाषा देखकर पूछने को मन न होगा कि यह कहाँ की भाषा है?

हालाँकि भाषा की नई चाल के नमूने लेने के लिए चंडीगढ़ तक जाने की जरूरत नहीं। ये दिल्ली में भी बहुत मिल जाते हैं। इतना जरूर है कि प्रादेशिक अखबारों या संस्करणों में इस तरह की 'भाषा' का इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। इंदौर, उज्जैन, जयपुर और जोधपुर आदि शहरों के दौरे में भी इस प्रवृत्ति के दर्शन पहले होते रहे हैं। लेकिन अब महसूस होता है कि बीमारी किसी महामारी का रूप ले रही है। मैं हिंदी का विशेषज्ञ नहीं हूँ, विधिवत उसे पढ़ा भी नहीं है, पर खराब हिंदी के प्रसार को भाँप सकता हूँ।

मजे की बात यह है कि ऐसी भाषा इसलिए नहीं लिखी जा रही कि संपादक और उसके सहयोगी सही शब्दों का प्रयोग नहीं जानते। वे हिंदी के शब्द गलत लिख सकते हैं, पर अँगरेजी शब्दों के हिंदी पर्याय उन्हें खूब पता हैं। मगर ऐसी भाषा लिखने का फैसला उनका नहीं है, यह प्रतिष्ठान के व्यापारिक महकमों का निर्णय है जो आजकल के संपादकों को मानना होता है। संपादकों को समझाया जाता है कि समाज अब ऐसी भाषा बोलता है (समझाने वाले की भाषा ही इसका प्रत्यक्ष प्रमाण होगी!), इसलिए हमें समाज को उसकी भाषा में अखबार देना होगा।

बुनियादी रूप से विज्ञापनों की यह भाषा अभी स्थानीय खबरों में ज्यादा प्रयोग की जाती है। धीमे-धीमे वह मुख्य पन्नों की ओर बढ़ रही है। हो सकता है किसी समय संपादकीय पन्ने तक जा पहुँचे। दरअसल, ऐसी भाषा की शुरुआत कभी एक टीवी चैनल ने की थी। उसमें विवेक जागा और 'नीति' बदल दी। पर अखबारों ने इस नीति को जल्द अपना लिया, भले ही प्रयोग के बतौर और चुनिंदा पन्नों के बीच। सर्वेक्षण के आधार पर व्यापार वालों का मानना है कि 'प्रयोग' सफल रहा। यानी अब वह अपने पाँव पसारेगा।

टीवी और अखबारों में भाषा के प्रयोग को लेकर एक व्यावहारिक भेद है। टीवी के प्रस्तोता बोलते हैं और अँगरेजी राज-काज के अनुगामी देश में बोलचाल में अँगरेजी शब्द टपक पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन अखबार तो घड़ी-घड़ी की खबर नहीं उछालते। उनके पास पर्याप्त समय और भाषा की देखभाल के साधन होते हैं।

व्यापार विभाग का तर्क मुट्ठी भर शहरी युवकों पर लागू हो सकता है। लेकिन जितनी अँगरेजी भरी हिंदी यह हिंदी-भाषी तबका बोलता होगा, क्या अँगरेजी पढ़ने वालों की बोलचाल की अँगरेजी में उससे ज्यादा खराबी नहीं मिलेगी? फिर अँगरेजी अखबार जान-बूझ कर खराब अँगरेजी में क्यों नहीं निकाले जाते, उस अँगरेजी में जो आम भारतीय पाठक बोलता-समझता है?

मीडिया को भटकने से बचाने की हमारे यहाँ बहुत चिंता होती है। वह वाजिब भी है। सरकार, प्रेस परिषद या एडिटर्स गिल्ड आदि में आचार संहिता की बात होती है, पेड न्यूज की बात होती है, संपादक के पद के अवमूल्यन की फिक्र होती है, मीडिया प्रतिष्ठानों में देसी-विदेशी व्यापारिक घरानों के निवेश की बात की जाती है, लेकिन क्या हिंदी अखबारों के हाथों हिंदी के पतन की चिंता कहीं उस स्तर पर आपने सुनी?

यह तो हुई व्यापारिक दबाव में हिंदी के अँगरेजीकरण की बात। इसके साथ दुखद सच्चाई यह भी है कि संपादकों और सहयोगी पत्रकारों में अच्छी हिंदी के प्रति जागरूकता निरंतर घटती जा रही है। भाषा और वर्तनी के स्तर पर अखबारों या टीवी-रेडियो में हिंदी का कोई मानक रूप प्रचलित नहीं है। प्रतिष्ठान इस तरफ से उदासीन हैं। अस्सी के दशक में जब मैं 'राजस्थान पत्रिका' में काम करता था, प्रधान संपादक कर्पूरचंद कुलिश ने हिंदी विद्वान भगवान सहाय त्रिवेदी को सिर्फ हिंदी-विमर्श के लिए नियुक्त किया था। त्रिवेदी जी ने एक भाषा-नीति बनाई और मानक शब्दावली दी। वे रोज अखबार की भाषिक त्रुटियों का परीक्षण कर सुझाव भी देते थे।

त्रिवेदी जी की भाषा-नीति का प्रभाष जी ने अध्ययन किया और उसे काफी-कुछ अपनाते हुए अपने सुझावों के साथ 'जनसत्ता' में लागू किया। उसमें मामूली संशोधन मैंने भी किए हैं। मसलन त्रिवेदी जी और प्रभाष जी ने 'द्वारा' शब्द को निषिद्ध घोषित किया था। 'द्वारा' को सब जगह 'ओर से' कर दिया जाता था। अब, इसमें गोली 'दिनेश द्वारा' और 'दिनेश की ओर से' मारी गई में जुदा अर्थ ध्वनित होंगे। 'द्वारा' में खुद गोली दागने का भाव आता है जो 'ओर से' कर देने पर दूसरों पर चला जाता है। हालाँकि बेहतर प्रयोग होगा कि गोली दिनेश ने या दिनेश के लोगों ने चलाई।

बहरहाल, मैं किसी शब्द को निषिद्ध घोषित करने के हक में नहीं हूँ। कोई शब्द कब कहाँ काम आ जाय, कौन जानता है। यहाँ पर प्रयोजन कुछ ही वर्ष पहले तक भाषा के प्रति बरती जा रही नीतिगत सजगता की तरफ ध्यान दिलाना भर है। नीति छोड़िए, अब तो सामान्य प्रयोग के हिंदी शब्द भी पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर गलत मिलते हैं। ऐसे शब्दों की संख्या पाँच सौ से ऊपर होगी। कुछ नमूने देखिए; साथ में कोष्ठक में गलत रूप : ब्योरा (ब्यौरा), न्योता (न्यौता), बनिस्बत (बनिस्पत), अधीन (आधीन), अध्यात्म (आध्यात्म), अंत्येष्टि( (अंत्येष्ठि), व्यावसायिक (व्यवसायिक), गुरु (गुरू), तबीयत (तबियत), संन्यास( (सन्यास), पश्चात्ताप (पश्चाताप), परखचे (परखच्चे), स्रोत (स्त्रोत), चरागाह (चारागाह), सौहार्द (सौहार्द्र), शलाका (श्लाका), अभयारण्य (अभ्यारण्य) आदि।

गलत लिखे जा रहे ऐसे शब्दों में मैं वे शब्द शामिल नहीं कर रहा, जो दूसरी भाषाओं से आए और हिंदी में उपसर्ग और प्रत्यय के जोड़ से या उच्चारण बदलकर रूपांतरित हो गए। मसलन हलवाई (हलवा+ई), जिम्मेवारी (जिम्मा+वारी), कानवाई (कॉनवॉय), पलटन (प्लैटून), पतलून (पैंटालून), लालटेन (लैंटर्न) आदि। इन्हें गलत भी नहीं मानता हूँ। यह परदेसी शब्दों का हिंदीकरण है।

शब्दों के रूप बदलने में हमने संस्कृत से भी बहुत छूट ली है। संस्कृत के 'राष्ट्रिय' शब्द को हम 'राष्ट्रीय' लिखते हैं। आत्मा वहाँ पुल्लिंग है, हिंदी में उसका स्त्रीलिंग रूढ़ है। ऐसे ही, संस्कृत में 'अ' और 'अन्' उपसर्ग हैं, जो शब्दों का अर्थ उलट देते हैं- ज्ञान/अज्ञान, उचित/अनुचित। संस्कृत में व्यंजन से शुरू होने वाले शब्द से पहले 'अ' उपसर्ग जुड़ता है और शब्द स्वर से शुरू होता हो तो 'अन्'। अब देखिए हिंदी क्षेत्र में विकसित हुए अपने उपसर्ग 'अ' और 'अन', जिनके सहारे हिंदी ने बेधड़क ढेर अलग शब्द बना लिए हैं: अछूत, अबूझ, अनचाहा, अनजान, अनबन, अनपढ़, अनगिनत आदि। अधकचरा, अड़चन, आढ़तिया, अठन्नी, अगाड़ी, अकुलाहट, अचकचाना, अललबछेड़ा, अलगाव, अहेरी जैसे सैकड़ों शब्द हिंदी में ही जन्मे और पनपे हैं।

कहना न होगा, यह सिलसिला आगे भी बढ़ता है इसलिए बात-बात पर संस्कृत स्रोत की दुहाई या शुद्धिकरण की टेर का मैं पक्षधर नहीं। अनुशासन जरूरी मानता हूँ, लेकिन प्रयोग और चलन में भी मान्यता की गुंजाइश लेकर चलता हूँ।

मेरे गुरु अज्ञेय प्रयोगवादी माने जाते हैं (हालाँकि उन्होंने इसका हमेशा खंडन किया); कविता में प्रयोग को उन्होंने जरूरी माना- लेकिन भाषा के मामले में वे और उस दौर के अनेक साहित्यकार और संपादक लगता है कुछ शुद्धिवादी थे।

अज्ञेय मास्को को, शुद्ध उच्चारण के अनुरूप, मस्क्वा लिखते-लिखवाते थे। दुविधा को द्विविधा लिखते। मुझे लगता है मास्को हिंदी में इतना रूढ़ हो गया कि उसका हिंदीकरण स्वीकार्य होना चाहिए। लेकिन असम को आसाम की जगह सही लिखने-लिखवाने का आग्रह हमें क्यों नहीं करना चाहिए? निकट के नाम जाने-अनजाने बिगड़ जाएँगे तो दूर के सुधारने का क्या औचित्य होगा?

जो नाम रूढ़ नहीं हुए और जानकारी के अभाव में अलग-अलग रूपों में लिखे जाते हैं, उनका सुधार भी जरूरी लगता है। जैसे चे गेवारा को ग्वेरा या गुएवारा लिखने से रोका जा सकता है। अभी ऊगो चावेज की मृत्यु हुई, नाम का प्रामाणिक उच्चारण (इंटरनेट इसमें बहुत मददगार है) मालूम कर हमने उसे ह्यूगो शावेज के विचलन से भरसक बचाया। यह शुद्धिवाद शायद नहीं, बस जिम्मेवारी का तकाजा है। (जिम्मेदारी जानबूझ कर नहीं कहता क्योंकि उसमें सरोकार से बढ़कर दायित्व या 'ड्यूटी' का भाव आ जाता है। उर्दू के जानकार जिम्मेदारी की जगह जिम्मेवारी देखकर जरूर चौंकते हैं। पर बाबू श्यामसुंदर दास ने शब्दसागर में उसे हिंदी प्रत्यय से बना हिंदी शब्द ही माना है।

अपने यात्रा-वृत्तांत 'मुअनजोदड़ो' में मैंने मोहनजोदड़ो के भ्रामक प्रयोग की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की। कोई मोहनजोदड़ो लिखे तो उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वह इसी रूप में प्रयोग होता आया है। उ और ओ की आपसी आवाजाही (मुहम्मद/मोहम्मद, मुहल्ला/मोहल्ला/, उसामा/ओसामा) और ह और अ की आपसदारी (स-ह, य-ज, र-ल की तरह) में मुअन-जो-दड़ो (मुर्दों का टीला) अकारण मोहनजोदड़ो या मोहेंजोदाड़ो हो गया। पाकिस्तान यात्रा में पाया कि सिंधी समाज इस क्षेत्र में मुअनजोदड़ो बोलता है। मोहन कृष्ण का नाम है, जिनका जन्म सिंधु सभ्यता के बहुत बाद हुआ, अगर हुआ। इस विभ्रम से बचने के लिए मैंने वह नाम प्रयोग किया, जो सिंध में बोला जाता है।

जो हो, आप समझ सकते हैं कि मैं भाषा की शुद्धि और अशुद्धि के बीच उलझता रहता हूं। क्योंकि यह मेरा पेशा है और थोड़ा सरोकार भी। इसी के चलते अपनी भाषा में सुधार के प्रयत्न भी जारी रहते हैं। अक्सर मानक कोश की शरण जाता हूँ।

कोई कोश भाषा नहीं सिखा सकता, भाषा समाज में पनपती है। लेकिन भाषा का मानकीकरण कोश ही करते हैं। प्रयोग और विचलन का लिहाज कोशकार करते हैं, लेकिन बहुत उदार होकर नहीं। यह उचित भी है। वरना एक रोज वही हिंदी मानक कहलाने लगेगी जो कभी जीटीवी या आज के बहु-वितरित अखबार इस्तेमाल करते हैं। यह जरूर है कि हिंदी में कोश-संशोधन अँगरेजी की तरह नियत अवधि में नहीं होते। अपनी भाषा के बिगड़े हुए शब्दों को भी अँगरेजी कोश खास तवज्जोह नहीं देते, लेकिन नए शब्द जरूर जोड़ते रहते हैं।

अगर हम मानते हैं कि भाषा में प्रयोगों की छूट के साथ एक अनुशासन भी कायम रहना चाहिए तो कोश के मानक समर्थन की हमें अक्सर दरकार होगी। इसके साथ हिंदी की शब्द-शक्ति बढ़ाने और सामान्य अनुशासन से भाषा को फिसलने न देने के लिए साहित्यकारों, पत्रकारों और हिंदी शिक्षकों का सजग और सक्रिय रहना भी जरूरी होगा।

हिंदी के शिक्षक, मुझे लगता है, इस मामले में सबसे उदासीन बिरादरी हैं। कभी वे सबसे ज्यादा सक्रिय हुआ करते थे। महत्त्वपूर्ण ग्रंथ और मानक हमें भाषाविज्ञानी और साहित्य के शिक्षक दे गए। आखिर साहित्यकार से तो हम अभिव्यक्ति की अपेक्षा ही ज्यादा करते हैं, बजाय शब्दविज्ञान या भाषाविज्ञान के कौशल के। लेकिन शिक्षकों का हाल बेहाल है। उनकी तर्क-पद्धति संदिग्ध है। वे ''शुद्ध भाषा'' के समर्थक भी हो सकते हैं और नितांत अशुद्ध प्रयोगों के भी। अगर वे अशुद्ध भाषा के हामी- बहुत संभव है अपनी सीमाओं के कारण- निकले तो उनके छात्र किस धारा की ओर जाएँगे। अगर वे विद्यार्थी लेखक, पत्रकार या प्रूफ-संशोधक बन गए तो भाषा में किस मत का पालन करेंगे?

ताजा अनुभव बयान करता हूँ। एक कॉलेज में पढ़ाने वाले हिंदी व्याख्याता को कहा कि 'सामर्थ्य' और 'सोच' के स्त्रीलिंग रूप चलन में भले हों, पर वे कोशसम्मत नहीं हैं। वे नहीं माने। तर्क देते रहे, पर कोई कोश उठाकर नहीं देखा। मुझे ही हवाले ढूँढ़ने पड़े। ऐसे कुछ प्रसंग और हैं।

लेकिन पिछले पखवाड़े दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी शिक्षक आशुतोष कुमार (नाम इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि वे 'बहस' में शिरकत को आतुर हैं) ने फेसबुक पर कहीं 'गाली-गलौच' लिखा। सोशल मीडिया जल्दबाजी का माध्यम है, सो मैंने पाती भेजकर पूछ लिया कि 'गाली-गलौज' सही होगा या 'गाली-गलौच'? उन्होंने कोश से पुष्टि कर ली होगी। बोले, ''सही तो वैसे 'गलौज' ही है। लेकिन 'ज' को 'च' कर देने से गाली की कड़वाहट तनिक हल्की नहीं हो जाती?''

गाली में गलौज जोड़ने से तो गाली का असर बढ़ जाएगा। लेकिन 'गाली की कड़वाहट हल्की' करने का ख्वाहिशमंद गाली देगा ही क्यों?

उन्होंने मुझे समझाया कि गाली की नहीं ''लफ्ज की कड़वाहट कम करने की बात है। गलौज से गलाजत झाँकती है तो गलौच से- हद से हद- गले या गालों की मश्क।'' फिर उन्होंने पंजाबी के एक कोशकार का हवाला दिया, कि पंजाबी में गाली-गलौच ही चलता है।

गले और गालों की मश्क? जो युग्म शुद्ध हिंदी क्षेत्र की उपज है, जो हिंदी शब्दसागर से लेकर मानक कोश तक 'गलौज' ही है, उसके लिए पंजाबी की मिसाल? वह भी अपने गलत प्रयोग को सही साबित करने के लिए? पंजाब में कीचड़ को चीकड़, मतलब को मतबल और निबंध को प्रस्ताव कहते हैं। क्या हम भी इन्हें अपना लें? दिल्ली में करा-करी-करिए प्रयोग प्रचलित हो गए हैं, आप कहाँ जा रहे हो, आपके मम्मी कहाँ गए हैं आदि प्रयोग भी खूब सुने जाते हैं। क्या इन्हें भी हम आदर्श मानकर विश्वविद्यालय में पढ़ाएँ? 'गाली-गलौच' की तरह कृप्या, धुम्रपान, आर्शीवाद जैसे अनेक अशुद्ध शब्द दिल्ली में सार्वजनिक स्थलों पर नजर आ जाते हैं। लेकिन ये जानकारी के अभाव में होने वाली त्रुटियाँ हैं, हिंदी शिक्षक तो ऐसी त्रुटियाँ करते या उनका पक्ष लेते नहीं देखे जाते। क्या अखबारों की तरह विश्वविद्यालयों में यह किसी नई प्रवृत्ति की पदचाप है? या कोई हीनता का अहंकार है?

इस पर व्यापक चर्चा के लिए मैंने फेसबुक पर यह प्रसंग छेड़ा। पर आशुतोष कुमार का नाम नहीं दिया। वे वहां अपने नाम (और चित्र तो होता ही है) सहित खुद आ गए। 'गलौच' को सही साबित करने के लिए नए-नए तर्कों के साथ। मुख्यतः उनका कहना था कि ''भाखा बहता नीर है।… अगर 'गालीगलौच' लफ्ज प्रचलन में है तो कोई तानाशाह उसे हिंदी से खारिज नहीं कर सकता।… गलौच की आदत हिंदी के संपादकों में पाई जाती है, अध्यापकों में नहीं।''

प्रचलन से कितना भारी तर्क बनता है, मुझे नहीं पता। लेकिन 'प्रचलन' का परिमाण जानने के लिए मैंने गूगल में गाली-गलौच टाइप किया। उससे अंदाजा लगता है कि हजारों लोग वाकई गलत प्रयोग करते हैं। फिर मैंने गाली-गलौज टाइप किया। उसके प्रयोगों की संख्या तो लाखों में निकली। यानी ज्यादा प्रचलन सही वर्तनी का ही है। फिर जिद काहे की?

सबसे हैरान करने वाली चेष्टा यह हुई कि उन्होंने प्रूफ की गलतियों वाली किताबों को प्रमाण मानकर बड़े लेखकों को भी 'गलौच' लिखने वाला मान लिया! पहले के लेखक हाथ से लिखते थे, पर कंपोज और त्रुटि-सुधार का काम प्रायः और लोग करते थे। लेखक के न रहने पर छपने वाले संस्करणों में भाषिक त्रुटियों की आशंका और बढ़ जाती है। ऐसे में यह कहना हास्यास्पद होगा कि वे लेखक सही हिंदी का प्रयोग नहीं जानते थे।
सबसे पहले अज्ञेय को; एक कहानी (सभ्यता का एक दिन) उद्धृत कर कहा: ''यह मेरी नहीं 'अज्ञेय' की पंक्ति है। 'गाली-गलौच' जैसे लफ्ज पर हिंदी के मेरे जैसे 'अयोग्य' अध्यापक का एकाधिकार नहीं है।'' अज्ञेय का उद्धरण उन्होंने शायद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित अज्ञेय अज्ञेय रचनावली से लिया था।

मैंने हाथ बढ़ाया और अज्ञेय के जीते-जी प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह, समग्र कहानियों के खंड 'छोड़ा हुआ रास्ता' और संपूर्ण कहानियों के एकल संस्करण को पलटा: सब में उस कहानी में 'गाली-गलौज' ही मुद्रित था। फिर उस बहस में उनके समर्थन में कोई मैथिली गुप्ता उतरे। उन्होंने किताबों के पन्ने पेश कर साबित करने की कोशिश की कि प्रेमचंद, रेणु, कमलेश्वर, भीष्म साहनी, भगवतीचरण वर्मा, सियारामशरण गुप्त आदि भी 'गलौच' लिखते थे। कुतर्क की भी सीमा होती है। मैथिली गुप्ता के दावे (जितने मैं जाँच सका गलत निकले। नए कंप्यूटरकृत संस्करणों में (जिनमें प्रूफ की त्रुटियों की पर्याप्त आशंका रहती है) उन्हें 'गलौच' शब्द मिल गया था, लेकिन ठीक उन्हीं रचनाओं में – जो प्रेमचंद, रेणु, सियारामशरण गुप्त की किताबों के पुराने संस्करणों में छपी थीं- मुझे 'गलौज' ही छपा मिला।

मुझे अजीबोगरीब बात यह लगी कि छापे की गलती के आधार पर हिंदी शिक्षक महान हिंदी लेखकों की भाषा की खराबी कैसे घोषित कर सकते हैं। पहले के लेखक हाथ से लिखते थे, पर कंपोज और त्रुटि-सुधार का काम प्रायः और लोग करते हैं। लेखक के न रहने पर छपने वाले संस्करणों में भाषिक त्रुटियों की आशंका और बढ़ जाती है। ऐसे में यह कहना हास्यास्पद होगा कि वे लेखक सही हिंदी का प्रयोग नहीं जानते थे।
सबसे मजेदार बात यह रही कि इतने मूल संस्करणों के प्रमाण सामने आ जाने के बाद भी आशुतोष कुमार यह बोले: ''मुझे मालूम था कि बात प्रूफ पर आएगी।''
यानी अभी भी वे सही थे! प्रेमचंद, अज्ञेय, रेणु, सियारामशरण गुप्त आदि सब गलत, जिन्हें वे अपने समर्थन में मान रहे थे, पर वे निकले नहीं। प्रचलन के आँकड़े भी सही नहीं निकले। उनका यह कहना बिलकुल ठीक है कि भाषा बहता नीर है। लेकिन यह भी समझना चाहिए वह बहता नीर है, बहता नाला नहीं है। गलत वर्तनी का इस किस्म का समर्थन नीर को कैसा नीर रहने देगा?

हिंदी समय की टिप्पणी : हिंदी अपने देश में ही इतने बड़े इलाके की भाषा है कि उस पर स्थानीय प्रभाव पड़ना अत्यंत स्वाभाविक है। गाली-गलौज और गाली-गलौच के विवाद का स्रोत संभवतः यही है। जिस तर्क से अमेरिका में labour को labor लिखते हैं, उसी तर्क से क्या गलौच को गलौज का एक अन्य रूप नहीं माना जा सकता? फिर, हमारे यहाँ तत्सम और तद्भव, दोनों रूप चलते हैं, जैसे यमुना और जमुना, योगी और जोगी। पूड़ी को कई जिलों में पूरी कहते हैं। वर्तनी का मानकीकरण होना ही चाहिए, परंतु मानकीकृत वर्तनी में भी सुअर और सूअर तथा पेच और पेंच, दोनों लिखने की छूट हो, तो क्या हर्ज होगा? आखिर हिंदी किसी एक क्षेत्र की भाषा नहीं है – यह भारत संघ की भाषा है। गैर-हिंदीभाषियों द्वारा लाए गए विकारों का क्या किया जाए, यह एक अलग मुद्दा है।

लेखक हिन्दी दैनिक  जनसत्ता के संपादक हैं।

साभार-  http://www.hindisamay.com/ से

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अंग्रेजी राज के सिक्कों से आदिवासी निकालते हैं सुरीली तान

जगदलपुर । हवा में लहराकर बांसुरी की मीठी धुन सुनने वाले बस्तर के आदिवासी अपनी परंपरागत बांसुरी में आज भी 72 साल पुराना सिक्‍का उपयोग करते हैं। 1943 का छेदवाला वह तांबे का सिक्का नहीं मिलता, तो नट-बोल्ट के साथ उपयोग किए जाने वाले वॉसर से काम चला लेते हैं।

बस्तर की हाथ बांसुरी का उपयोग वनांचल में लंबे समय से होता आ रहा है। राह चलते या नृत्य करते हुए इसे हवा में लहरा कर ग्रामीण इसकी मीठी धुन का आनंद लेते हैं। इसे बनाने के लिए सबसे जरूरी होता है। धातु का एक छल्ला।

बस्तर का आदिवासी छल्ले के रूप में करीब 72 साल से 1943 में ब्रिटिश सरकार व्दारा जारी एक पैसे का उपयोग करता आ रहा है,चूंकि इस सिक्के के मध्य में बड़ा छेद होता है।तांबे के इस सिक्के को बस्तर में काना पैसा तो छग के मैदानी इलाकों में भोंगरी कहा जाता है।

दुर्लभ हो गया है सिक्‍का

वर्षों से ग्रामीण इसे सहेजकर रखते रहे हैं, परन्तु 72 साल पुराना यह सिक्का अब दुर्लभ हो गया है, इसलिए हाथ बांसुरी बनाने के लिए मिल नहीं पाता। मोहलई करनपुर के समरथ नाग बताते हैं कि उनके गांव में करीब 10 परिवार हाथ बांसुरी बनाने का काम करता है। क्षेत्र के हाट- बाजारों में इस बांसुरी की मांग है। वहीं जगदलपुर स्थित शिल्पी संस्था से भी पर्यटक इसे खरीदकर ले जाते हैं।

इन्‍होने बताया कि 1943 का यह तांबे का सिक्का बड़ी मुश्किल से मिलता है, इसलिए कारीगरों ने विकल्प ढूंढ लिया है। पहले वे एल्यूमिनियम के पुराने बर्तनों को काट कर सिक्के की जगह लगाते रहे, परन्तु अब बाजार में उपलब्ध नट-बोल्ट के साथ उपयोग किए जाने वाले वॉसर से काम चला रहे हैं।

भागवत बघेल ने बताया कि बस्तर में हाथ बांसुरी के पुराने शौकीन अभी भी सौ रुपए की बांसुरी में पुराना सिक्का लगाकर देने पर मुंहमांगी कीमत देने को तैयार रहते हैं चूंकि तांबे के सिक्के वाले बांसुरी की आवाज स्पष्ट और बेहतर होती है।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

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सुप्रिया शर्मा को चमेली देवी पुरस्कार

सर्वश्रेष्ठ महिला पत्रकार के लिए मीडिया फाउंडेशन द्वारा प्रदत्त 'चमेली देवी जैन पुरस्कार' इस बार ऑनलाइन पत्रकार सुप्रिया शर्मा को दिए जाने की घोषणा की गई है।

 

मीडिया फाउंडेशन ने सोमवार को इसकी घोषणा की। ऐसा पहली बार है कि यह पुरस्कार ऑनलाइन न्यूज पोर्टल पर काम करने वाली किसी पत्रकार को दिया जा रहा है।

 

‘स्क्रॉल डॉट इन’ की न्यूज एडिटर ने यह पुरस्कार हाशिए पर जीने को मजबूर व उपेक्षित समुदायों पर रिपोर्ताज और समसामयिक मुद्दे उठाने के लिए दिया जा रहा है। यह सम्मान राष्ट्रीय राजधानी स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 19 मार्च को दिया जाएगा, जिसके बाद एक व्याख्यान होगा।

 

इस साल जूरी में मिंट के आर.सुकुमार, एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार और इंडिया टुडे ग्रुप की कावेरी बामजई थीं।

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कूपन दुनिया ने रफ्तार.इन से हाथ मिलाया

CouponDunia.in  ने कूपन को हिंदी में प्रचारित करने के लिए  हिंदी वेबसाइट Raftaar.in से हाथ मिलाने की घोषणा की है। इस समझौते के बाद रफ्तार के उपभोक्‍ता इसके होम पेज पर‘कूपन टैब’ के द्वारा इसके योजनाओं की जानकारी हासिल कर सकेंगे।  इसके अलावा दर्शक मोबाइल, शिक्षा, सौंदर्य,, फैशन,रिचार्ज, खेल और यात्रा में से कूपन की विविध सुविधाओं का लाभ ले सकेंगे।  ऐसे में कूपन उन्‍हें उस वेबसाइट के बारे में बताएगी जहां से खरीदारी कर वे पैसे बचा सकते हैं।
 
इस समझौते के बारे में CouponDunia.in  के संस्‍थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी  समीर परवानी ने कहा, ‘भारत में विभिन्‍न क्षेत्रीय भाषाए हैं और इस प्रकार वहां की स्‍थानीय भाषा पर पकड़ बनाकर छोटे कस्‍बों और शहरों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है। इस समझौते के द्वारा हमारा उद्देश्‍य ज्‍यादा से ज्‍यादा हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी पहुंच बनाना है और उन्‍हें डिजिटल शॉपिंग के फायदों से परिचित कराना है।
 
Raftaar.in के श्री  सुरजीत सिंह ने कहा, ‘अभी तक ऑनलाइन शॉपिंग की पहुंच अंग्रेजी में पकड़ रखने वाले लोगों में ज्‍यादा है। इन दिनों स्‍मार्टफोन पर भी ऑनलाइन शॉपिंग का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी और ऑनलाइन ट्रैवल पोर्टल ने लोगों की इस जरूरत को समझकर उन पर काम करना शुरू कर दिया है और उन्‍हें हिंदी में बेस्‍ट ऑनलाइन ऑफर देना शुरू कर दिया है। रफ्तार ने  कूपन के कंटेंट को ज्‍यादा से ज्‍यादा सुविधाजनक बनाने के लिए उसे हिंदी में अनुवादित करने के लिए अपनी Natural Language Processing (NLP) ती खूबी का इस्‍तेमाल किया है। 

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शाहरुख खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश

मुंबई की जानी मानी एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती आभा सिंह की लगातार कानूनी लड़ाई का नतीजा ये रहा है कि बाल आयोग ने मुंबई पुलिस को शाहरुख खान के खिलाफ एपआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं।

उल्लेखनीय है कि शाहरुख खान ने वानखेड़े स्टेडियम में एक क्रिकेट मैच के दौरान बच्चों से� बदतमीजी की थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस पर श्रीमती आभा सिंह ने ये मामला अपने हाथ में लिया और आज बाल आयोग ने आईपीसी बाल एवं किशोर न्याय अधिनियम 2006 के तहत पुलिस को शाहरुख खान के खिलाफ एफआईर दर्ज करने के साथ ही इस बात के भी आदेश दिए हैं कि ये एफआईआर अभी तक दर्ज क्यों नहीं की गई।

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कृषि वि.वि.में एनएसएस प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण देंगे डॉ.चन्द्रकुमार जैन

राजनांदगांव। संस्कारधानी के प्रखर वक्ता और राज्य अलंकरण से सम्मानित दिग्विजय कालेज के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक डॉ.चन्द्रकुमार जैन, इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय,रायपुर में राष्ट्रीय सेवा योजना के प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में व्याख्यान देने आमंत्रित किये गए हैं। प्रशिक्षण कार्यक्रम का केन्द्रीय विषय है – सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता एवं मानवाधिकार। खेल एवं युवक कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय सेवा योजना, राजीव गांधी राष्ट्रीय युवा विकास संस्थान, तमिलनाडु, राष्ट्रीय सेवा योजना,क्षेत्रीय केंद्र भोपाल एवं विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस पांच दिवसीय प्रशिक्षण के अंतर्गत डॉ.जैन 20 मार्च को अपने निर्धारित विषय – 'जीवन शैली, आतंरिक द्वंद्व एवं समाधान' पर व्याख्यान और राष्ट्रीय सेवा योजना अधिकारियों को प्रशिक्षण देंगे।  

प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉ.चन्द्रकुमार जैन सहित आमंत्रित प्रतिष्ठित वक्ताओं में हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के संचालक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश नैयर, छत्तीसगढ़ बाल आयोग की अध्यक्ष श्रीमती शताब्दी पांडे, डॉ.समरेंद्र सिंह, डॉ. मो.इकबाल, डॉ.जी.के.श्रीवास्तव, डॉ,प्रीता लाल, श्री सुशील त्रिवेदी, श्री दीपक बिस्तुते, डॉ.आर.पी.अग्रवाल, डॉ. श्रीमती जया गांगुली और डॉ.शकील हुसैन शामिल हैं। दिग्विजय कालेज के प्राचार्य डॉ.आर.एन.सिंह ने इस राष्ट्रीय महत्व के विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षण देने के लिए आमंत्रण को महाविद्यालय के लिए विशेष गौरव का विषय निरूपित करते हुए प्रभावी सहभागिता हेतु डॉ.चन्द्रकुमार जैन को शुभकामनाएं दीं हैं।
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केदारनाथ यात्रा- फिर गुमराह कर रहे हैं उत्तराखंड के मुख्य सचिव

RUDRA PRAYAGक्‍या आप चार धाम यात्रा के लिए उत्‍तराखण्‍ड आने की सोच रहे हैं तो यह खबर आपके लिए हैं, सूबे के अपर मुख्य सचिव राकेश शर्मा ने केदारनाथ यात्रा तैयारियों का जायजा लिया। शायद तभी राज्‍य सरकार केदारनाथ यात्रा के बारे में ऑल इस गुड का संदेश दे रही है, ज्ञात हो कि यह वही राकेश शर्मा है जिन्‍होंने केदारनाथ आपदा की त्रासदी को कमतर आंक कर तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री को गुमराह किया था, जिससे उन्‍हें कुर्सी गंवानी पडी थी, – चन्‍द्रशेखर जोशी की एक्‍सक्‍लूसिव रिपोर्ट- # चारधाम यात्रा शुरू होने को कुछ ही माह का समय शेष� #हाईवे की स्थिति बेहद खराब #खाद्यान्न सामग्री ले जाना मुश्किल #भू धंसाव का दौर जारी #केदारनाथ आठ फीट तक बर्फ #सड़क की स्थिति ठीक नहीं #पैदल मार्ग खतरनाक होने के साथ ही खड़ी चढ़ाई #गौरीकुंड में वीरानी#आज भी यहां आपदा के मलबे से भरी दुकान #अभी तक कोई रोड मेप तैयार नहीं #आपदा के बाद� मार्ग कई स्थानों पर जानलेवा #आपदा के बीस माह� भी इस स्थान को ठीक करने के लिए कोई स्थाई समाधान नहीं #पचास करोड़ के कार्य केदारनाथ में होने हैं,� धन के अभाव से अभी शुरू नहीं #पहाड़ियों से हिमखंड का टूटने का सिलसिला शुरू #मुख्यमंत्री ने यात्रा शुरू होने से पूर्व रोपवे निर्माण करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक कार्य भी शुरू नहीं� #बाढ़ सुरक्षा कार्यो के निर्माण में मानकों की अनदेखी # केदारनाथ में सिंचाई विभाग से किए जाने वाले सुरक्षा कार्य अभी शुरू नहीं� #कई गांवों के सम्पर्क मार्ग बंद # मरीजों का उपचार नहीं

मई 2015 से शुरू होने वालीRAKESH SHARMA 4DHAM केदारनाथ यात्रा इस बार गौरीकुंड के बजाय सोनप्रयाग से संचालित होगी। यात्रा शुरू होने में डेढ़ महीना ही शेष बचा है,� इस बार की चार धाम यात्रा यात्रियों के लिए मुसीबत बनने वाली है।� ‘गौरीकुंड की स्थिति जैसी आपदा के समय थी, वैसी आज भी है। गौरीकुंड की सुरक्षा के लिए अभी तक कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए है। इसका असर यहां के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। ‘सोनप्रयाग से लेकर गौरीकुंड तक हाईवे की स्थिति बेहद खराब है। ऐसे में खाद्यान्न सामग्री ले जाना मुश्किल हो गया है। यात्रा सीजन में यात्रियों के लिए भारी परेशानियां होगी।’

गौरीकुंड हाईवे पर स्थित सेमी जोन तीर्थयात्रियों और प्रशासन के लिए परेशानी का सबब बन सकता है। आपदा के बीस माह बाद भी इसके स्थाई समाधान के लिए कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी है, जबकि इस स्थान पर भू धंसाव का दौर जारी है। वर्तमान में केदारनाथ आठ फीट तक बर्फ जमी है। बारिश होने पर यहां भारी वाहन फंस जाते हैं, जिससे घटों जाम की स्थिति पैदा हो जाती है।� रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड हाईवे पर सेमी गांव में आज भी सड़क की स्थिति ठीक नहीं है। दो साल पहले जून में मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ से ऊखीमठ विकास खंड के सेमी गांव में नदी के कटाव से गांव के नीचे से पूरी पहाड़ी दरक गई थी। ग्रामीणों के आवासीय भवन जमीन में धंस गए थे। सेमी गांव के साथ ही गौरीकुंड हाईवे को खासा नुकसान पहुंचा था।� केदारनाथ आपदा के कारण पूर्व रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके पैदल मार्ग को दुरूस्त तो किया गया, लेकिन लिनचौली से केदारनाथ बेस कैंप तक बनाया पैदल मार्ग खतरनाक होने के साथ ही खड़ी चढ़ाई का है। 2013 में 16-17 जून में आई आपदा से हुई तबाही केदारनाथ का मुख्य व सड़क मार्ग से जुड़ा अंतिम पड़ाव गौरीकुंड में वीरानी छाई हुई है। आज भी यहां आपदा के मलबे से भरी दुकानों को साफ देखा जा सकता है। इस मुख्य कारण गौरीकुंड तक सड़क मार्ग का सही न बन पाना है। साथ ही आपदा में यहां बने बस अडडा बाजार का बहने से यहां पर पुनर्निर्माण की जरूरत है, लेकिन इसके लिए अभी तक कोई रोड मेप तैयार नहीं हो सका है।

अब चारधाम यात्रा शुरू होने को कुछ ही माह का समय शेष बचा हुआ है। इस बार चारधाम यात्रा के दौरान सेमी गांव में बना स्लाइडिंग जोन प्रशासन और तीर्थयात्रियों के लिए मुसीबतों भरा हो सकता है। आपदा के बीस माह से ज्यादा का समय बीतने के बाद भी इस स्थान को ठीक करने के लिए कोई स्थाई समाधान नहीं किया गया है। बारिश होते ही यहां पर जमीन दलदल का रुप ले ले रही है। इससे आवाजाही करने वाले भारी वाहन बीच हाईवे पर ही फंस जाते हैं। अभी तक करीब एक दर्जन से अधिक वाहन यहां फंस चुके हैं। इससे जब-तब घंटों जाम की स्थिति बन जाती है।� यात्रा के दौरान केदारनाथ पहुंचने वाले शिव भक्तों को इस बार भी लिनचौली की खड़ी चढ़ाई से पार कर ही केदारपुरी पहुंचना होगा। चढ़ाई को देखते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री ने यात्रा शुरू होने से पूर्व रोपवे निर्माण करने की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक कार्य भी शुरू नहीं हो सका है। लिनचौली से केदारनाथ की दूरी करीब पांच किमी है। इस बार भी भक्तों को खड़ी चढ़ाई पार कर बाबा के दर्शन करने पड़ेंगे। �

गौरीकुंड से केदारनाथ तक का पंद्रह किमी का सफर देश विदेश से भोले बाबा के दर्शन को आने वालों भक्तों के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होता। खड़ी चढ़ाई का यह सफर काफी कठिन होता है। घोड़े, खच्चर भी इसी मार्ग से गुजरते हैं, लेकिन कई स्थानों पर मार्ग संकरा होने से स्थिति काफी खतरनाक हो जाती है। कई यात्री पैदल मार्ग पर घोडे़, खच्चरों की आवाजाही के दौरान टक्कर से घायल भी हो जाते हैं। आपदा के बाद यह मार्ग कई स्थानों पर जानलेवा बना हुआ है। मार्ग पर कई स्थानों पर नीचे की ओर रेलिंग तक नहीं बनी है, जो कि दुर्घटना का कारण भी बन जाता है।� मुख्य डेंजर जोन- गौरीकुंड घोड़ा पड़ाव, घिनुरपाणी, जंगलचट्टी, भीमबलि, लिनचोली, केदारनाथ बेस कैंप से पहले पचास करोड़ के कार्य केदारनाथ में होने हैं, उन्हें धन के अभाव से अभी शुरू नहीं किया गया है।� केदारनाथ मार्ग पर उच्च हिमालय से हिमखंड टूटने लगे हैं। चटक धूप के बाद लिनचौली में पहाड़ियों से हिमखंड का टूटने का सिलसिला शुरू हो गया है। गत फरवरी माह में भी हिमखंड टूटने से भीमबली में पैदल मार्ग पर बना पुल पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है।
केदारनाथ के पुराने घोड़ा पड़ाव में जीएमवीएन का अतिथि गृह समेत कई भवन पूर्व में हिमखंड टूटने से क्षतिग्रस्त होते रहे हैं। इस वर्ष भी भीम बली का पैदल पुल हिमखंड से क्षतिग्रस्त हो चुका है। इस वर्ष भारी बर्फबारी से केदारनाथ की खड़ी चट्टानों से हिमखंड टूटने का खतरा अधिक बढ़ गया है।

लिनचोली से केदारनाथ तक का पूरा क्षेत्र हिमखंड टूटने की दृष्टि से काफी खतरनाक है। लिनचोली में भी हिमखंड टूटने लगे हैं, हालांकि इससे अभी कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, लेकिन लिनचोली में बने प्रीफेब्रिकेट हट समेत पैदल रास्ते को इससे खतरा बना हुआ है। लोक निर्माण विभाग अधिशासी अभियंता गुप्तकाशी केएस नेगी का कहना है कि पूरे केदारनाथ पैदल मार्ग पर हिमखंड का खतरा है। लोक निर्माण विभाग पैदल मार्ग पर प्रत्येक वर्ष पुलों का हटा देता है, ताकि हिमखंड से इनको नुकसान न पहुंचे।

सरकार करोड़ों की राशि खर्च कर सुरक्षा दीवारों का निर्माण तो करा रही है, लेकिन घटिया गुणवत्ता के चलते यह पीड़ितों के दर्द को कम करने के बजाय बढ़ाने का काम कर रहे हैं। विगत वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा ने केदारनाथ से रुद्रप्रयाग तक ऐसा कोहराम मचाया था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। नदी किनारे बने आवासीय भवन बड़ी संख्या में आपदा की भेंट चढ़ गए थे। कई स्थानों पर मंदाकिनी नदी के कटान से आवासीय भवनों को खतरा पैदा हो गया था। खतरे को देखते हुए सरकार ने इन स्थानों को चिह्नित कर यहां बाढ़ सुरक्षा कार्यो को स्वीकृति दी थी। आपदा के बाद रुद्रप्रयाग से केदारनाथ तक बाढ़ सुरक्षा कार्य शुरू किए हैं। इन कार्यो में घटिया गुणवत्ता की शिकायतें भी आती रही हैं। सिंचाई विभाग की विजयनगर में बनाई गई सुरक्षा दीवार हल्की बारिश के बाद टूट गई। दीवार का निर्माण कार्य पूर्ण होने से पहले इसमें दरार पड़नी शुरू हो गई थी। इससे पूर्व भी तिलवाड़ा में बाढ़ सुरक्षा कार्यो के निर्माण में मानकों की अनदेखी का आरोप भी सामने आया।

आपदा के बाद जिले में बाढ़ सुरक्षा कार्यो के लिए शासन से धनराशि अवमुक्त होने में हो रही देरी का असर बाढ़ सुरक्षा कार्यो पर पड़ रहा है। कार्य 75 फीसदी होने के बावजूद धनराशि मात्र तीस फीसदी ही उपलब्ध हो पाई है। ऐसे में जो काम हुए भी उसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
विगत वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा से जिले को नदी किनारे वाले क्षेत्रों में भारी नुकसान पहुंचा था। नदी तट पर बने सैकड़ों आशियाने भी आपदा की भेंट चढ़ गए थे। केदारनाथ से रुद्रप्रयाग तक नदी से सटे आवासीय भवनों की सुरक्षा को लेकर शासन ने बाढ़ सुरक्षा कार्य विभिन्न विभागों के माध्यम से करवाए जा रहे हैं। सिंचाई विभाग ने रुद्रप्रयाग-केदारनाथ तक अधिकांश स्थानों पर बाढ़ सुरक्षा कार्यो को शुरू तो कराया, लेकिन कई स्थानों पर घटिया गुणवत्ता की शिकायतें भी सामने आई। हल्की बारिश होने के बाद विजयनगर में तो सुरक्षा दीवार ढह गई। बाढ़ सुरक्षा कार्यो के लिए शासन ने सौ करोड़ स्वीकृत किए थे, लेकिन अभी तक पूरी धनराशि उपलब्ध न होने से कई दिक्कतें सामने आ रही है। इससे बाढ़ सुरक्षा कार्यो की गुणवत्ता पर भी इसका असर पड़ रहा है। जिले में 100 करोड़ से अधिक रुपये के बाढ़ सुरक्षा कार्य किए जा रहे, लेकिन कार्यो के लिए अभी तक मात्र तीस फीसदी धनराशि ही उपलब्ध हो पाई है। इससे ठेकेदारों का भुगतान न होने से वह भी परेशान हैं। केदारनाथ में सिंचाई विभाग से किए जाने वाले सुरक्षा कार्य अभी शुरू नहीं हो पाए हैं। वहां अधिक बर्फबारी के चलते मई महीने के बाद ही कार्य शुरू होने की उम्मीद है।

इन स्थानों पर चल रहे कार्य-
रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा, अगस्त्यमुनि, सिल्ली, विजयनगर, गंगानगर, कुंड, बेडूबगड, कालीमठ, भैंसारी, रामपुर, सोनप्रयाग, राऊलैंक, लमगौंडी आदि।
वही दूसरी ओर केदारनाथ में अधिक बर्फबारी का असर दिखने लगा है। मंदिर के सामने बने बद्री-केदार मंदिर समिति के एक भवन की छत अधिक बर्फबारी से टूट गई। इससे काफी सामान भी बर्बाद हुआ है।

केदारनाथ में भारी बर्फबारी के चलते भवनों के ऊपर छतों में कई फीट ऊंची बर्फ की परत जमी हुई है, जो भवनों के लिए खतरा बनी हैं। बुधवार रात्रि बद्रीकेदार मंदिर समिति के भंडार गृह की छत टूट गई, जिससे यहां रखा कुछ सामान खराब हो गया, जबकि अन्य सामग्री को निम ने मंदिर समिति के ही प्रवचन हॉल में शिफ्ट कर दिया।

इस बीच, मौसम साफ होते ही केदारनाथ में पुनर्निर्माण कार्य शुरू हो गए हैं। नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के मजदूरों ने घाट निर्माण की प्रक्रिया तेज कर दी है। केदारनाथ में सभी भवनों की छतों से बर्फ हटाई जा रही है। रास्तों से भी बर्फ हटा दी गई है। वहीं एटीवी वाहन को जोड़ने के लिए इंजीनियरों की टीम भी केदारनाथ पहुंची। यह वाहन केदारपुरी में बर्फ में आसानी से चलते हैं। निम इसका प्रयोग करता है।

11 मार्च 2015 को बर्फबारी जिले के सीमांत गांव तोषी, त्रिजुगीनारायण, गौंडार, रांसी, बक्सीर, चौमासी मार्च महीने में भी बर्फबारी का दंश झेल रहे हैं। बर्फबारी अधिक होने से कई गांवों के सम्पर्क मार्ग बंद हो गए है। ऊखीमठ-चोपता-मंडल मोटरमार्ग लंबे समय से बंद है। बर्फबारी से सोनप्रयाग- त्रियुगीनारायण मोटरमार्ग भी बंद है। इन सीमांत गांवों में से तोषी, रासी में विद्युत आपूर्ति ठप है। इससे ग्रामीणों की समस्या और बढ़ गई है। मौसम ठीक होने का इंतजार यहां के ग्रामीण कर रहे हैं। रांसी के पूर्व प्रधान राम सिंह का कहना है कि गांव से बाहर जाने के रास्ते बर्फ से ढके हुए हैं। ऐसे में गांव में ही ग्रामीण कैद हैं। यदि शीघ्र मौसम ठीक नहीं हुआ तो आवश्यक सामग्री की किल्लत पैदा हो जाएगा। तोषी के ग्रामीण सुन्दर सिंह ने बताया कि गांव में विद्युत व्यवस्था भी बर्फबारी के बाद ठप पड़ी है। इससे समस्या ओर अधिक बढ़ गई है।

रुद्रप्रयाग में धनपुर क्षेत्र को जोड़ने वाला रैंतोली-जसोली मोटरमार्ग विगत ढाई सप्ताह से बंद है। ऐसे में क्षेत्र में बुनियादी व्यवस्थाएं चरमराने के साथ ही बीमार लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

धनपुर क्षेत्र के करीब एक दर्जन से अधिक गांवों को जोड़ने वाले मोटरमार्ग पर इन दिनों चौड़ीकरण का काम चल रहा है जिसके चलते मार्ग इन दिनों रैंतोली से पंचभैया खाल तक अवरुद्ध है। बीरों गांव से लेकर पीड़ा गांव तक मोटरमार्ग बंद चल रहा है। मोटरमार्ग अवरुद्ध होने से वाहनों की आवाजाही बंद हो गई है। बंद पड़े मोटरमार्ग से सबसे ज्यादा परेशानी क्षेत्र के बीमार लोगों पर पड़ रहा है। विगत दो सप्ताह ग्वाड़, चिनग्वाड़, मोलखंडी समेत क्षेत्र में बच्चे, महिला व पुरुष बुखार से पीड़ित हैं। क्षेत्र के ग्वाड़ थापली स्थित चिकित्सालय में मरीजों का उपचार नहीं हो पा रहा है। बीमार लोग पैदल चलने में असमर्थ हैं, ऐसे में मरीजों को उपचार के लिए पालकी के जरिए करीब आठ किमी दूर जिला चिकित्सालय पहुंचाया जा रहा है। क्षेत्र को जोड़ने वाला एकमात्र मोटरमार्ग बंद होने से क्षेत्र में जरूरी बुनियादी सुविधाओं का टोटा बन गया है, जबकि लोली, बीरों, ग्वाड, पीड़ा, च्वीथ, पंचभैयाखाल, चिन्गवाड, खरणपाणी, पटोती, थपलधार आदि गांवों के लोग अपने लिए बुनियादी सामग्री को पीठ पर लादकर ही पैदल आवाजाही कर रहे है।

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