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आकांक्षा यादव को ब्लॉगिंग के लिए श्रीलंका में मिलेगा ”परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान”

मई माह में आयोजित सम्मेलन में 21000/- रूपये  की धनराशि के साथ मिलेगा शीर्ष सम्मान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी ब्लॉगिंग हेतु कर चुके हैं आकांक्षा यादव को सम्मानित 

 इलाहाबाद की चर्चित ब्लॉगर-लेखिका आकांक्षा यादव को वर्ष 2015 के लिए सार्क देशों में दिए जाने वाले शीर्ष सम्मान "परिकल्पना सार्क शिखर सम्मान'' के लिए चयनित किया गया है। उन्हें  आगामी 23 से 27 मई 2015 को श्री लंका में आयोजित पंचम अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में इसके तहत सम्मान पत्र के साथ  इक्कीस हजार (21000/-) रूपये  की धनराशि प्रदान की जाएगी। उक्त जानकारी अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर्स कांफ्रेंस के संयोजक  रवीन्द्र प्रभात ने दी।

संयोजक  रवीन्द्र प्रभात ने बताया कि आकांक्षा यादव  ने वर्ष 2008 में ब्लाॅग जगत में कदम रखा और विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाॅग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लाॅगिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लाॅगिंग को भी नये आयाम दिये। 'शब्द-शिखर'' (http://shabdshikhar.blogspot.in/) इनका प्रमुख ब्लॉग है, जो कि हिंदी के लोकप्रिय ब्लॉगों में गिना जाता है।  नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रुचि रखने वाली आकांक्षा यादव अग्रणी महिला ब्लॉगर हैं और इनकी रचनाओं में नारी-सशक्तीकरण बखूबी झलकता है। इनके ब्लॉग को अब तक लाखों लोगों ने पढा है और करीब सौ ज्यादा देशों में इन्हें देखा-पढा जाता है। आकांक्षा यादव निदेशक डाक सेवाएं  कृष्ण कुमार यादव की पत्नी हैं, जो कि चर्चित हिंदी ब्लॉगर और साहित्यकार हैं।  

गौरतलब है कि आकांक्षा यादव को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इससे पूर्व भी ब्लॉगिंग हेतु तमाम प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा  “अवध सम्मान“, हिंदी ब्लॉगिंग के दशक वर्ष में  “दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति“ का सम्मान, नेपाल में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन में “परिकल्पना  ब्लॉग विभूषण सम्मान“ से सम्मानित किया जा चुका है।  इसके अलावा विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाॅक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि, भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘डाॅ. अम्बेडकर फेलोशिप राष्ट्रीय सम्मान‘ व ‘‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा, राजस्थान द्वारा ”हिंदी भाषा भूषण”, निराला स्मृति संस्थान, रायबरेली द्वारा मनोहरा देवी स्मृति सम्मान सहित विभिन्न प्रतिष्ठित सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु दर्जनाधिक सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त हैं ।

-रत्नेश कुमार मौर्य 
संयोजक -'शब्द-साहित्य''
इलाहाबाद 

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प्रथम विश्‍व युद्ध में बलिदान होने वाले 74 हजार सिपाहियों का स्मरण

भारतीय सेना प्रथम विश्‍व युद्ध में भाग लेने वाले 15 लाख भारतीय सिपाहियों और अपनी जान न्‍यौछावर करने वाले 74 हजार से भी अधिक सिपाहियों की स्‍मृ‍ति में 10 से 14 मार्च 2015 तक नई दिल्‍ली में शताब्‍दी समारोह का आयोजन कर रही है। 10 मार्च को न्‍यूवे चैवल के युद्ध के रूप में याद रखा जाता है जिसमें फ्रांस के आटोइस क्षेत्र में ब्रिटिश हमले की शुरूआत हुई थी जिसमें भारतीय सेना की भी गढ़वाल बिग्रेड और मेरठ डिविजन ने भाग लिया था। वर्ष 2014 से वर्ष 2018 तक की अवधि को प्रथम विश्‍व युद्ध के शताब्‍दी समारोह के रूप में मनाया जा रहा है। 

शताब्‍दी समारोहों के रूप में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने आज इंडिया गेट स्थित अमर जवान ज्‍योति पर माल्‍यार्पण किया। रक्षा मंत्री, रक्षा राज्‍यमंत्री, तीनों सेनाओं के प्रमुख, रक्षा सचिव और इस युद्ध में भाग लेने वाली रेजिमेंट के वरिष्‍ठ अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित थे। 

10 से 14 मार्च 2015 तक मानिकशॉ सेंटर में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है जिसमें इस युद्ध में भारत की भूमिका को दर्शाया गया है। यह प्रदर्शनी आम जनता, स्‍कूलों और कालिजों के लिए 11 से 13 मार्च 2015 तक खुली रहेगी। 

बलिदान के बारे में जानकारी देने के लिए आज शाम एक समारोह में थल सेना अध्‍यक्ष प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों की भूमिका और योगदान पर गणमान्‍य अतिथियों को संबोधित करेंगे। इसके बाद राष्‍ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी प्रथम दिवस कवर स्‍मारिका जारी करेंगे। राष्‍ट्रपति इसके साथ ही प्रदर्शनी का अवलोकन भी करेंगे जिसमें गैलन्‍ट्री हॉल भी सम्मिलित है जिसमें यह महान युद्ध कैसे लड़ा गया और जीता गया के साथ-साथ भारतीय सैनिकों के युद्ध क्षेत्र और घर के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को भी दर्शाया गया है। इसमें 13 अभियानों, युद्ध के हथियारों और उपकरणों, स्‍मरणीय वस्‍तुओं और विभिन्‍न शिल्‍पकृतियों को दर्शाया गया है। 

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बराबरी के भाव के अभाव को दूर करने से गुरेज़ आखिर कब तक ?

पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का घट रहा अनुपात पहले से ही चेतावनी दे रहा था लेकिन 2011 की जनगणना के अनुसार यह सूचना, कि 0 से 6 वर्ष समूह के लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 71 लाख कम है, एक बेहद खतरनाक भविष्य की ओर संकेत करने लगी है। 2001 की जनगणना में यह कमी 60 लाख की, तथा 1991 की जनगणना में 42 लाख की थी। जन्म से लेकर मृत्यु तक आचार-संहिताओं की हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़ी हुई स्त्री पर अब जन्म से पूर्व ही अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है। 

विज्ञान और तकनीक, जो मनुष्यता की मुक्ति का साधन बन सकते थे, समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मूल्यों के चलते स्त्रियों के, और इस तरह पूरे समाज के, विनाश का साधन बना दिए जा रहे हैं। लेकिन इस प्रवृत्ति के खिलाफ कोई भी संघर्ष तब तक कामयाब नहीं होगा जब तक कि उन मूल्यों और सोच को निशाना न बनाया जाए जो स्त्री के प्रति किसी भी तरह की बराबरी के भाव को अस्वीकार करते हैं।

जाति व्यवस्था की तरह ही पितृसत्तात्मक मूल्य भी हमारे समाज के जेहन और आदतों तक में काफी गहराई तक धंसे हुए हैं। यहां स्त्री आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक शोषण की भी शिकार है। घर के दायरे में कामों के बंटवारे का स्वरूप सामाजिक स्तर पर जातियों के बीच कामों के बंटवारे से मेल खाता है। यहां पुरुष सवर्ण तथा स्त्री दलित या शूद्र की भूमिका में होती है। जो काम तुच्छ और गंदे माने जाते हैं वे स्त्री के जिम्मे होते हैं। लेकिन इन्हीं कामों में से जो काम समाज में आर्थिक तौर पर लाभकारी हो जाते हैं, जैसे खाना पकाना, तो वहां पुरुष स्त्री को विस्थापित करके स्वयं विराजमान हो जाता है। 

स्त्री के लिए सदियों से ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ से लेकर ‘ताड़न के अधिकारी’ तक सभी उद्धरण जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किए जाते रहे हैं, जो हमारे समाज के अवसरवादी और पाखण्डी स्वरूप को उजागर करता है। और कहना न होगा कि ऐसे मुद्दों की एक लंबी फेहरिस्त है जिसमें समाज का यह पाखण्ड बार-बार उजागर होता है।

शैशव से ही एक धार्मिक-सांस्कृतिक संरचना स्त्री का एक अलग व्यक्तित्व बनाने के, बल्कि उसके स्वाभाविक मानवीय व्यक्तित्व के हरण के, काम में लग जाती है। मूल्यों, आदर्शों और आचरण-व्यवहार के अलग मानदंड उसके व्यक्तित्व को रूपाकार देने लगते हैं और पल-प्रतिपल उसका पीछा करते रहते हैं, ताकि उसमें जीवन और उत्साह-उमंग का नामोनिशान भी मिटा दें। 

विनय, कोमलता, शील, सौंदर्य, क्षमा आदि उसके लिए घोषित आभूषण उसकी हथकड़ियां-बेड़ियां बनकर उसके यत्किंचित प्रतिरोध को भी तोड़ देने की जुगत में लगे रहते हैं, ताकि वह कमजोर, निस्सहाय, निरुपाय लता बनकर हमेशा किसी पुरुष के आश्रय के लिए अभिशप्त हो। वह पुरुष पिता, भाई, पति या पुत्र कोई भी हो सकता है। इसके बावजूद अगर प्रतिरोध की कोई चिनगारी बच जाती है तो सभी शोषित-उत्पीड़ित समूहों की तरह स्त्री पर भी बलप्रयोग निर्णायक हथियार का काम करता है।

स्त्री पुरुषवादी सत्ता के साथ-साथ जातिवाद और पूंजीवादी बाजारवाद की भी शिकार है। ये सभी मिलकर एक जटिल जाल बुनते हैं जिसमें फंसी स्त्री को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता। जातिवाद भारतीय स्त्री की समस्या को एक ऐसा जटिल आयाम देता है जो दुनिया के अन्य हिस्सों से अलग दृष्टिकोण और संघर्ष की रणनीति तय करने की मांग करता है। इस दिशा में हीला हवाला अब ठीक नहीं। सही कदम उठाने में ही महिला दिवस मानाने की सार्थकता होगी।

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प्राध्यापक,दिग्विजय पीजी कालेज,
राजनांदगांव। मो.9301054300 

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इन्दौर में हिन्दी में होगी डॉक्टरी की पढ़ाई

अंग्रेजी में छपने वाली एमबीबीएस की किताबें हिन्दी मीडियम के छात्रों के लिए परेशानी का सबब रही हैं। लेकिन अब मेडिकल की किताबों का हिन्दी में अनुवाद होगा। मेडिकल शब्दावली भी तैयार हो रही है। हिन्दी में एमबीबीएस की पहली किताब निकालने का श्रेय एमजीएम मेडिकल कॉलेज को मिल सकता है।पीएमटी जैसी कठिन परीक्षा आसानी से पास करने वाले कई छात्र अंग्रेजी किताबों की वजह से एमबीबीएस के पहले और दूसरे प्रोफ में असफल हो जाते हैं।

छात्रों की परेशानियों को दूर करने के लिए हिन्दी ग्रंथ अकादमी और हिन्दी भाषी क्षेत्रों के मेडिकल कॉलेजों ने प्रयास शुरू किए हैं। उम्मीद है कि एक साल के भीतर हिन्दी में एमबीबीएस कोर्स की पहली किताब आ जाएगी। हिन्दीभाषी क्षेत्र के कॉलेजों को जिम्मेदारी देश में 200 से ज्यादा मेडिकल कॉलेज हैं। इनमें 75 हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हैं। हिन्दी क्षेत्र के हर एक कॉलेज को मेडिकल के एक सब्जेक्ट की एक किताब के हिन्दी अनुवाद की जिम्मेदारी मिलेगी। एमजीएम मेडिकल कॉलेज में इसे लेकर तैयारी शुरू हो गई है।

भारत सरकार तैयार कर रही है शब्दावली

हिन्दी अनुवाद में सबसे ज्यादा परेशानी शब्दावली को लेकर आ रही है। भारत सरकार मेडिकल शब्दावली तैयार करवा रही है। शब्दावली में मेडिकल टेक्निकल और साइंटिफिक शब्दों को वैसा ही रखा जाएगा, सिर्फ एक्सप्रेशन बदला जाएगा। उदाहरण के लिए आंखों के कार्निया को हिन्दी में भी कार्निया ही लिखा जाएगा। इसी तरह कार्निया की परतों के नाम भी वैसे ही लिखे जाएंगे।12वीं में मेरिट में, एमबीबीएस में फेलएमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन के मुताबिक किताबें सिर्फ अंग्रेजी में होने से हिन्दी माध्यम के मेधावी छात्रों को नुकसान होता है। कई छात्र हैं जो 12वीं में तो 80 प्रतिशत से ज्यादा नंबर लेकर आए, एमबीबीएस में भी सिलेक्ट हो गए, लेकिन फर्स्ट प्रोफ में ही फेल हो गए। ऐसे छात्रों की संख्या 25 प्रतिशत से अधिक है।

टीचर्स की तलाश शुरू

ऐसे टीचर्स तलाशे जा रहे हैं जिनका हिन्दी और मेडिकल क्षेत्र में एक जैसा दखल हो। एमजीएम के कुछ प्रोफेसरों को किताबों के अनुवाद का मौका मिल सकता है।

एमजीएम निकाल सकता है पहली किताब

एमबीबीएस की किताबों को हिन्दी में ट्रांसलेट करने की योजना बनाई जा रही है। जल्दी ही शब्दावली भी तैयार हो जाएगी। भोपाल में हिन्दी ग्रंथ अकादमी के लोगों से इस बारे में चर्चा हुई। हिन्दी में एमबीबीएस की पहली किताब निकालने का श्रेय एमजीएम मेडिकल कॉलेज को मिल सकता है। उम्मीद है एक साल के भीतर प्रयास सफल हो जाएगा।

-डॉ. एमके राठौर, डीन, एमजीएम मेडिकल कॉलेज

 साभार- http://naidunia.jagran.com/से

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माय होम इंडिया की पहल “सपनो से अपनों तक”

भोले बच्चे, दूसरों द्वारा दिखाए हुए भविष्य के झूठे सपनों से गुमराह हो कर अपना घर-परिवार छोड़ देते है लेकिन उसके बाद वही व्यक्ति जिन्होंने उन बच्चों को झूठे सपने दिखाए थे, उन मासूम बच्चो का निर्दयता से शोषण करते हैं। यह बच्चे एक बार जब अपने  घर से निकल कर बाहर की निर्दयी दुनिया देखते हैं तो प्रतिदिन साहस और कोशिश करने के बाद भी अपने घर लौट नहीं पाते। अबोध बच्चे प्रतिदिन अपनी गलती समझते हुए, अपने घर वापस जाने के लिए किसी की मदद की राह देखते हैं| पुलिस एवं NGO के द्वारा इन बच्चो को अमानवीय परिस्थितियों से छुडाने के पश्चात बच्चों से उनके परिवार के बारे में  मिली सूचना के आधार पे उनके परिवार को ढूंढा जाता ताकि यह बच्चे शीघ्र ही अपने घर वापस जा सकें| परिवार का पता लगने तक बच्चे बाल गृह में रखे जाते है और उनके परिवार को ढूँढने का निरंतर प्रयास किया जाता है। माय होम इंडिया बाल गृह के साथ मिल के इन बच्चों को उनके घर तक भेजने के अनुपम कार्य को पूर्ण उत्तरदायित्व के साथ करता है एवं जब तक यह बच्चे बाल गृह में रहते हैं उस समय भी आवश्यक चिकित्सा, दवाइयां, जरूरत का सामान इत्यादि उनको प्रदान करके उनकी मदद करता है| इस कठिन समय में इन बच्चों को परिवार की कमी ना महसूस हो इसलिए माय होम इंडिया इन बच्चों के साथ अनेक पर्व भी मनाता है|

'माय होम इंडिया' द्वारा विगत एक वर्ष से कम समय में किये गए अथक प्रयास से उमेरखेड़ी , डोंगरी, मुंबई स्थित बाल गृह से १६६ बच्चो को एवं दिल्ली के बाल गृह से ४ बच्चों को उनके घर सुरक्षित पहुँचाया गया । 'माय होम इंडिया' यह मानता है कि सही वातावरण मिलने पर यह बच्चे राष्ट्रनिर्माण में अभूतपूर्व योगदान प्रदान कर सकते हैं लेकिन यही बच्चे सहीं ध्यान एवं मार्गदर्शन ना मिलने पर अपराध के रास्ते पे चल सकते हैं| इसलिए उन्हें वापस अपने घर पहंचा के अपने आत्मविकास का मौक़ा दे के 'माय होम इंडिया' उनके जीवन में एक सकारात्मक बदलाव का प्रयास कर रहा है| 'माय होम इंडिया' द्वारा किये गए इस प्रयास की अभूतपूर्व सफलता से प्रेरित हो कर 'माय होम इंडिया' ने आज इसे औपचारिक रूप से राष्ट्रिय स्तर पर एक परियोजना के रूप में प्रारम्भ किया| इस पहल का नाम, 'सपनो से अपनों तक' रखा गया है। इसके अंतर्गत उन् सभी बच्चो को उनके घर तक पुनः पहुचने का प्रयास किया जायेगा जो किसी कारणवश अपने घर से दूर हो गए थे ताकि उन्हें भी स्नेहपूर्ण वातावरण मिल सके और वह आगे जा के एक अच्छा नागरिक बनें न कि  पीड़ाओं से जूझता हुआ मुजरिम। ऐसे बच्चे जो कि अपने परिवार से बहुत समय से बिछड़ चुके हैं और जिनके माता पिता उनके मिलने की आस तक छोड़ चुके हैं ऐसे बच्चों को अपने परिवार से मिला के माय होम इंडिया उनके जीवन में एक नयी आशा के संचार का प्रयास कर रहा है|

माय होम इंडिया ने यह कार्यक्रम स्व. श्री एकनाथ जी ठाकुर, अध्यक्ष, सारस्वत बैंक को समर्पित था।

इस उपलक्ष्य पर मुख्य अतिथि के रूप में माननीया महिला एवं बाल विकास मंत्री, महाराष्ट्र, श्रीमती पंकजा मुंडे पालवे उपस्थित रहीं| आदरणीय राज्य मंत्री, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, महाराष्ट्र, श्रीमती विद्या ठाकुर एवं उपाध्यक्ष, सारस्वत बैंक श्री गौतम ठाकुर ने भी अतिथि के रूप में उपस्थित हो के कार्यक्रम की शोभा बढ़ायी। एवं विख्यात उद्योगपति,  श्री श्रीराम दांडेकर ने मंच की अध्यक्षता की|

सर्वप्रथम श्री सुनील देवधर जी ने सभी गणमान्य व्यक्तियों का परिचय कराया एवं उसके पश्चात “सपनो से अपनों तक” कार्यक्रम से परिचय कराते हुए बताया कि यह कार्यक्रम …राष्ट्र वाद को मजबूत करने का काम है.बाल गृह की अवस्था असहनीय है. इस अवसर पे उन्होंने यह भी कहा कि माय होमे इंडिया का नारा है बाल गृह जहां जहा माय होमे इंडिया वहा वहा, माय होमे इंडिया का लक्ष्य है अगले ५ वर्ष में देश के सारे बाल सुधार गृह खाली करा देंगे|

आदरणीय राज्य मंत्री, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, महाराष्ट्र, श्रीमती विद्या ठाकुर जी ने इस उपलक्ष्य पे कहा कि अपनो से अपनो को मिलाने का श्रेष्ठ काम माय होमे इंडिया कर रहा है| बाल गृह की कार्यशैली में सुधार लाने के ऊपर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार हर प्रयत्न करने के लिए एवं एसे कार्यों को अपना समर्थन के लिए कृतिबद्ध है|

आदरणीय श्री गौतम ठाकुर जी, उपाध्यक्ष, सारस्वत बैंक ने इस अवसर पे कहा कि हर कदम पर वो स्वयं और सारस्वत बँक माय होम इंडिया के साथ है |

इस अवसर पे माय हमे इंडिया ने ऐसे कई व्यक्तियों और टीम का सम्मान किया जिन्होंने इस पावन कार्य में अपना निरंतर सहयोग प्रदान किया है| इन में शामिल हैं L&T construction – health Centre का टीम , श्री दिनेश नंदवाना, डायरेक्टर, Vakrangi Software ltd., बाल गृह उमेर्खाड़ी, डोंगरी, मुंबई की टीम, समतोल फाउंडेशन के श्री विजय जाधव एवं श्री जे. बी. गिलासे, मुख्य अधिकारी, बाल कल्याण समिति, मुंबई | इन सभी महानुभावों के मूल्यवान सहयोग के लिए माय होम इंडिया इन सब का आभार प्रकट करता है| 

माननीया महिला एवं बाल विकास मंत्री, महाराष्ट्र, श्रीमती पंकजा मुंडे पालवे ने इस अवसर पे कहा कि वोह अपनी मिनिस्ट्री के माध्यम से जल बचाओ अन्दोलम से एवं बेटी बचावो आंदोलन से जुडी हुई हैं| और यह दोनों ही अगर आज नहीं बचाए गए तो हमारा देश ही नष्ट हो जाएगा| उन्होंने कहा कि वह स्वयं भी यह मानती हैं कि बच्चा अपने घर से ज्यादा कही और सुरक्षित नही होता | बच्चो को घर पहुंचाना एक पुण्य का काम है और माय होम इंडिया यह पुण्य कर्म कर रहा है और इस पावन उद्देश्य में उनकी मिनिस्ट्री ऐसे सभी कार्यों को प्रोत्साहन प्रदान करेगी |

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अग्रोहा धाम को सौ बड़े शहरों से हर साल मिलेंगे एक करोड़ रु.

अग्रवाल समाज के पितृ पुरुष महाराजा अग्रसेन की जन्म व कर्मभूमि अग्रोहा तीर्थ को समाज के पांचवें धाम के रूप में विकसित करने का निर्णय रविवार को अग्रोहा धाम हिसार में लिया गया। इंदौर अग्रवाल समाज की पहल पर देश के सौ बड़े शहरों द्वारा हर वर्ष एक करोड़ की सहयोग राशि देने का संकल्प पारित किया गया। इसकी शुरुआत कोटा से हुई।

अग्रोहा धाम विकास ट्रस्ट एवं इंदौर अग्रवाल समाज केंद्रीय समिति सहित पांच राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने इस संबंध में सुझाव दिए। इंदौर समिति के प्रमुख परामर्शदाता विनोद अग्रवाल ने कहा कि देश के सौ बड़े शहरों के अग्रवाल संगठन प्रति वर्ष एक-एक लाख अग्रोहा विकास ट्रस्ट को दें तो हर वर्ष एक करोड़ जमा हो सकते हैं।

इंदौर समिति के अध्यक्ष किशोर गोयल ने प्रस्ताव का अनुमोदन किया। कोटा के अग्रवाल संगठन ने हाथोहाथ एक लाख जमा भी करवा दिए। अग्रोहा धाम विकास ट्रस्ट के अध्यक्ष नंदकिशोर गोयनका ने कहा कि इससे अग्रवाल बंधुओं की भावना साकार होने में मदद मिलेगी। ट्रस्ट 250 बिस्तरों का एक अस्पताल व मेडिकल कॉलेज भी संचालित कर रहा है। इस पहल पर अमल शुरू होता है तो यहां अन्न् क्षेत्र, आवासीय संकुल का विस्तार, संगठन गतिविधियां और शक्तिपीठ के विकास सहित कई सेवा कार्य शुरू किए जा सकते हैं। संचालन संजय बाकड़ा ने किया। आभार राजेश बसंल ने माना।

ऐसा है अग्रोहा धाम 

हरियाणा के हिसार से 18 किमी दूर 27 एकड़ में फैला है अग्रोहा धाम। यहां पर अग्रवाल समाज की कुलदेवी महालक्ष्मी, महाराजा अग्रसेन का भव्य और आर्कषक मंदिर है। जमीन से 27 फीट नीचे वैष्णव देवी, तिरुपति बालाजी, बाबा अमरनाथ व भैरवनाथ का मंदिर है। हनुमानजी की 90 फीट ऊंची आकर्षक प्रतिमा है। यह स्थान अग्रवाल समाज का शक्तिपीठ कहा जाता है। यहां 51 सौ वर्ष पहले महाराजा अग्रेसन का शासन था।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

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आयोजन नए मिज़ाज की एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का

हैदराबाद। विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में फरवरी-मार्च के महीने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों के होते हैं. इसलिए अगर विशाखपट्णम में भी हिंदी की कई संगोष्ठियाँ इस दौरान हो रही हैं तो यह सामान्य सी बात है. लेकिन अगर कोई राष्ट्रीय संगोष्ठी ऐसी हो जिसमें भाग लेने वाले विद्वान – अध्यक्ष और मुख्य अतिथि से लेकर प्रतिनिधि और प्रतिभागी तक – देश भर के दूर-पास के क्षेत्रों से अपने खर्चे पर आए, तो ऐसी संगोष्ठी को लीक से हटकर एक नए आरंभ के रूप में देखा ही जाना चाहिए. यही वह मुख्य बात है जिसने 1 और 2 मार्च 2015 को विशाखा हिंदी परिषद और केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को विशिष्ट बना दिया.

’21वीं सदी में हिंदी : उपलब्धियाँ एवं संभावनाएँ’ विषयक इस द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की दूसरी विशेषता यह रही कि इसमें परंपरागत ढंग से आलेख वचन नहीं हुआ. बल्कि विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञ मंडल ने संक्षेप में सत्र के विषय पर केंद्रित अपने विचार व्यक्त किए और बाद में उपस्थित प्रतिनिधियों ने खुली चर्चा में भाग लिया. इस प्रकार प्रत्येक सत्र एक परिसंवाद की तरह संपन्न हुआ जिसकी संपन्नता में उस सत्र के संचालक ने समन्वयक की भूमिका निभाई. निश्चय ही इसका श्रेय विशाखा हिंदी परिषद के अध्यक्ष प्रो. एस. एम. इकबाल और उनके आत्मीय साथी प्रो. एम. वेंकटेश्वर को जाता है. इन दोनों के प्रयास से यह पूरा कार्यक्रम अत्यंत जीवंत संवाद के रूप में संपन्न हुआ.

पहले दिन 10.30 बजे उद्घाटन सत्र आरंभ हुआ. इस अवसर पर प्रो. एस. एम. इकबाल के एक अन्य रोचक प्रयोग की भी खूब सराहना हुई. वह यह कि आयोजक संस्था की ओर से सब विद्वानों को उद्घाटन सत्र के लिए श्वेतवर्णी धोती-कुर्ता का सांस्कृतिक परिधान उपहार स्वरूप प्रदान किया गया – इस ड्रेस कोड को यथासंभव सभी ने प्रमुदित भाव से अंगीकार किया.

उद्घाटन सत्र में प्रो. जी. एस. एन. राजु (कुलपति, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्णम), प्रो. चितरंजन मिश्र (प्रति-कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा), डॉ. उमर अली शाह (पीठाधिपति, विश्वविज्ञान विद्या आध्यात्मिक पीठम, पिठापुरम), डॉ. वी. रामाराव (सचिव एवं संरक्षक, एम. वी. आर. डिग्री एवं पी. जी. कॉलेज, गाजुवाका, विशाखपट्णम) और डॉ. एस. एम. इकबाल (संगोष्ठी संयोजक, अध्यक्ष, विशाखा हिंदी परिषद) मंचासीन हुए. प्रो. जी. एस. एन. राजु ने दीप प्रज्वलित करके संगोष्ठी का उद्घाटन किया. बीज वक्तव्य देते हुए प्रो. चितरंजन मिश्र ने कहा कि 21वीं सदी में हिंदी ने अब तक पिछली शताब्दी की तुलना में बड़ी तेजी से नई उपलब्धियाँ हासिल की है और साहित्य से लेकर तकनीक तक की भाषा के रूप में वह एक संभावनाशील सर्वसमर्थ भाषा सिद्ध हुई है. उन्होंने भाषा को राष्ट्रीयता और संस्कृति का प्रतीक बताते हुए यह भी कहा कि भीतर से सारा भारत देश सांस्कृतिक रूप से एक है तथा हिंदी भारतीय जीवन पद्धति का प्रतीक है. इसलिए भारतीयता को बचाना है तो भाषा को बचाना चाहिए. इस अवसर पर वरिष्ठ हिंदी सेवी, समीक्षक, कवि और अनुवादक प्रो. आदेश्वर राव को 'जीवन साफल्य पुरस्कार' से सम्मानित किया गया.

संगोष्ठी में दोनों दिन दो-दो विचार सत्र या परिसंवाद संपन्न हुए. पहला सत्र ‘साहित्य की पठनीयता : समस्याएँ और समाधान’ पर केंद्रित रहा. इसके समन्वयक प्रो. ऋषभदेव शर्मा (हैदराबाद) रहे. विषय के विविध पक्षों पर प्रो. चितरंजन मिश्र (वर्धा), प्रो. दिनेश चौबे (शिलंग), डॉ. पटनायक (भुवनेश्वर) और प्रो. के. वनजा (कोचीन) ने आधार वक्तव्य प्रस्तुत किए. ‘भारतीय साहित्य और अनुवाद’ शीर्षक दूसरे सत्र के समन्वयक रहे प्रो. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद). इस सत्र में आधार वक्तव्य प्रो. आर. एस. सर्राजू (हैदराबाद), प्रो. शंकरलाल पुरोहित (भुवनेश्वर), प्रो. मोहनन (कोचीन) और डॉ. वेन्ना वल्लभराव (विजयवाडा) ने रखे. तीसरे सत्र का विषय था ‘नए गद्य रूपों की प्रासंगिकता’. इसका समन्वयन डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (हैदराबाद) ने किया और आधार वक्तव्य डॉ. रविकुमार (पटियाला), डॉ. के. वनजा (कोचीन) और डॉ. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद) ने प्रस्तुत किए. चौथे सत्र में ‘देवनागरी लिपि बनाम रोमन लिपि’, ‘सोशल मीडिया’ तथा ‘सिनेमा की भाषा’ जैसे विविध पहलुओं पर खुली चर्चा प्रो. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद) के सूत्रधारत्व में निष्पन्न हुई. विभिन्न चर्चाओं में प्रो. आदेश्वर राव (विशाखपट्णम), डॉ. कृष्ण बाबू (विशाखपट्णम), डॉ. अरविंद गुरु, डॉ. मंजरी गुरु (मंडला), डॉ. पूर्णिमा शर्मा (हैदराबाद), डॉ. बी. सत्यानारण (हैदराबाद), डॉ. राधा (हैदराबाद), डॉ. हेमलता (विशाखपट्णम), डॉ. सुमन (भुवनेश्वर), डॉ. दीपा गुप्ता (विशाखपट्णम) आदि ने सक्रिय भूमिका निभाई.

सभी चर्चाएँ अत्यंत सौहार्दपूर्ण वातावरण में तथा गहन अकादमिक गंभीरता के साथ संपन्न हुईं. कुल मिलाकर यह महसूस किया कि विविध प्रयोजनवती होकर नई सदी में हिंदी नए रूप में उभर रही है. हिंदी का यह नया रूप सब प्रकार की कट्टरताओं से मुक्त और अलग अलग प्रयोजनों के लिए अलग अलग रूप वाला तथा संप्रेषण को सर्वोपरि मानने वाला है.
यह विवरण अधूरा रहेगा अगर यह न बताया जाए कि अकादमिक चर्चाओं के अतिरिक्त एक ओर तो गंगा जमुनी कवि सम्मलेन और संगीत सभा तथा दूसरी ओर सिम्हाचलम, कैलाशगिरि, ऋषिकोंडा समुद्र तट और पोर्ट के पर्यटन के कारण यह संगोष्ठी सभी प्रतिनिधियों के लिए अविस्मरणीय बन गई. पिछले साल आए चक्रवाती तूफान हुदहुद की विनाशलीला के चिह्न मनुष्यों के मन और पर्यावरण के तन पर अभी भी शेष है – लेकिन यह वसंत उन पर हरियाली का परचम फैरता हुआ जिजीविषा का संदेश दे रहा है.  

दूसरे दिन दोपहर बाद ढाई बजे से समापन सत्र आरंभ हुआ. इस सत्र के मुख्य अतिथि आंध्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. वी. उमा महेश्वर राव के साथ डॉ. एस. एल. पुरोहित (भुवनेश्वर), डॉ. दिनेश चौबे (शिलांग), डॉ. चितरंजन मिश्र (वर्धा) और संगोष्ठी-संयोजक डॉ. एस. एम. इकबाल मंचासीन थे. इस सत्र के संचालाक थे डॉ. एम. वेंकटेश्वर. अगले वर्ष फिर किसी और शहर में मिलने के संकल्प के साथ सब ने एक-दूसरे से विदा संदेशों का लेन-देन किया. प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने भरोसा दिलाया कि इस शृंखला का अगला आयोजन हैदराबाद में होगा.
 
चित्र परिचय :
1.    उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्वलित करते हुए प्रो. जी. एस. एन. राजु (कुलपति, आंध्र विश्वविद्यालय, विशाखपट्णम). साथ में प्रो. एस. एम. इकबाल, प्रो. चितरंजन मिश्र, डॉ. उमर अली शाह और डॉ. वी. रामाराव.  

2.    परिसंवाद के दौरान प्रो. रविकुमार (माइक पर), प्रो. एम. वेंकटेश्वर, प्रो. के. वनजा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा.

 

संपर्क

डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा

प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,

खैरताबाद, हैदराबाद – 500 004

ईमेल – neerajagkonda@gmail.com  

 
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सादर 

नीरजा 

saagarika.blogspot.in

srawanti.blogspot.in

http://hyderabadse.blogspot.in

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सशक्तिकरण की अनोखी मिसाल- बस्‍तर की आदिवासी महिलायें

आदिवासी समाज में महिला पुरूष की साथी है। वह उसकी सहकर्मी है। उसकी समाज और परिवार में बराबर की भागीदारी है। जी हां बस्‍तर की आदिवासी महिलाएं हम शहरी महिलाओं की तरह अपने परिवार के पुरूष सदस्‍यों की मोहताज नहीं हैं। उन्‍हें बाजार से सब्‍जी-भाजी और सौदा मंगवाने से लेकर खेतों में हल चलाने तक के लिए अपने बेटे या पति का मुंह नहीं ताकना पड़ता है। वह हम शहरी महिलाओं से कई मायनों में बहुत ज्‍यादा समर्थ हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रतीक अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस उनके जिक्र के बगैर पूरा नहीं हो सकता। ये न सिर्फ घर के कामकाज करती हैं, बाल-बच्‍चे पालती हैं बल्कि पूरे दिन खेतों में काम करती हैं। इनका पूरा साल खेतों में कभी निंदाई-गुड़ाई करते तो कभी, बीज बोते गुजरता है। बस्‍तर की आदिवासी महिलाओं के अधिकार असीमित हैं। वह घर से बाहर तक की पूरी व्‍यवस्‍था संभालती हैं और हर कदम पर पति उसके साथ होता है। बड़ी मेहनती हैं ये महिलाएं।

      इनके कामकाज का दायरा खेत-खलिहाल और हाट बाजार तक का है। और गांवों में दिन कटते देर नहीं लगती। इस तरह खेत का पूरा जिम्‍मा यही उठाती हैं। बीज लाना, उन्‍हें मूसलाधार बारिश में रोपना और कड़ी धूप में चौकीदारी करने के बाद काटना यह सब उन्‍हीं के जिम्‍मे है। यहां तक कि बाजार में इसे बेचने भी वही ले जाती हैं। ऐसी महिलाएं जो खेती नहीं करतीं, घर में बाड़ी में उगी सब्जियां और जंगली उत्‍पादों जैसे महुआ, टोरा, जलाऊ लकड़ी, लाख, आंवला, झाडू वगैरह को परिवार की आमदनी का जरिया बना लेती हैं। और इस पूरी कवायद में पति उसके साथ रहता है। जब महिला खेत में जूझ रही होती है तो पति घर में बच्‍चों की देखभाल में लगा रहता है। वह उनके लिए खाना पकाता है। बारिश से बचाव के लिए छत की मरम्‍मत जैसे छोटे-मोटे काम करता है। आंगन की बाड़ी में सब्जियों, फलों, लताओं की संभाल करता है और घर के बुजुर्गों की देखभाल करता है। हर कदम पर पारस्‍परिक सहयोग और महिला अस्मिता के सम्‍मान की अनूठी मिसाल हे बस्‍तर का आदिवासी समाज। इस समाज में महिला अपनी मर्जी की मालिक है। उसकी स्‍वायत्‍ता बल्कि अधिकारिता की बढि़या मिसाल तो यही है कि वह न केवल अपना जीवनसाथी खुद चुन सकती है बल्कि चाहे तो पहले उसे ठोंक-बजाकर परख सकती है। इस परंपरा को लमसेना कहा जाता है। इसके तहत शादी के योग्‍य युवक को युवती के घर में रहकर काम-काज में मदद करके अपनी योग्‍यता सिद्ध करनी पड़ती है। इस परीक्षा में फेल या पास करने का अधिकार पूरी तरह से युवती पर होता है। लमसेना बैठाने की यह परंपरा सरगुजा और मंडला के गोंड समाज में भी है।
      यही नहीं इससे पहले परिवार और घरेलू कामकाज के प्रशिक्षण के‍ लिए उन्‍हें घोटुल जाने की छूट है। विदेशी सिनेमाकारों ने हालांकि इस संस्‍था की नाइट क्‍लब से तुलना कर खासा बदनाम कर रखा है पर वास्‍तव में ऐसा है नहीं। यह आदिवासी नौजवानों के संस्‍कार गृह हैं। घर के कामकाज से निपटकर युवक-युवती रात में यहां जुटते हैं और किसी सयानी महिला की निगरानी में नाचते-गाते और कामकाज सीखते हैं। मन मिल गया तो शादी के साथ युवा जोड़े की घोटुल से विदाई हो जाती है। वे फिर उधर का रूख नहीं कर सकते। घोटुल अब बस्‍तर के परिवेश से गायब हो चले हैं। शहरी खासतौर पर मीडिया की दखलंदाजी ने इस संस्‍था को लुप्‍त होने पर मजबूर कर दिया है। पर आदिवासी युवती की निरपेक्ष स्थ्‍िाति की इससे बेहतर मिसाल और क्‍या हो सकती है?

आदिवासी युवतियों को अकेलेपन से भी डर नहीं लगता। बस्‍तर के सुदूर नक्‍सल प्रभावित इलाकों में ऐसी कई युवतियां हैं जिनके विख्‍यात परिवारों में अब जायदाद संभालने वाले नहीं रहे। पर वे वहां न केवल विरासत संभाल रही हैं बल्कि उनके परिवार की छत्रछाया की दरकार रखने वाले आदिवासियों को आसरा भी दे रही हैं। बड़े आदिवासी परिवारों की लड़कियां हैं गांव छोड़कर दिल्‍ली से लंदन तक कहीं भी बस सकती थीं। उनका समर्पण देखिए, जज्‍बा देखिए अपने लोगों के लिए स्‍नेह देखिए।

यह स्थिति तब है जब घने जंगलों के बीच बसे गांवों में सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती, जंगली जानवरों का खतरा मंडराता रहता है और अस्‍पताल में दवाइयों का पता नहीं रहता और स्‍कूल बदहाल हैं। यदि इन्‍हें शहरी लोगों से मामूली या बराबर की सुविधाएं मिल जाएं तो इनकी हिम्‍मत, इनका जज्‍बा और ताकत बोजड़ होगी यह तय मानिए।
 
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लेखिका वरिष्‍ठ पत्रकार हैं

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श्रीमती चारु हर्षद शेठ – महिला सशक्तिकरण का उदाहरण

बी ए तक शिक्षा प्राप्त श्रीमती चारु हर्षद शेठ का विवाह 4 मई 1974 को श्री हर्षद शेठ के साथ हुआ था । उनके शादी के बाद की जिंदगी 8’x 8’ के रूम से शुरू हुई । शादी के बाद स्कूल में नौकरी और ट्यूशन , दोनों पति पत्नी ने  कड़ी मेहनत से बच्चो को  इंग्लिश स्कूल में पढ़ाया । दो लड़की और एक लड़का,  खुशी हर हाल में ढूंढ लेते थे , न कोई शिकवा न शिकायते । मेहनत और नसीब से एक –एक बच्चे के जन्म के बाद भाग्य का एक –एक दरवाजा खुलता चला गया । पाँच लोगों का खुशहाल परिवार देख के शायद सबको खुशी मिलती थी ,ऐसा परिवार में खुशहाली  थी ।  

मगर किस्मत को खुशी मंजूर न थी । मुँह में निवाला आते – आते कुदरत ने निवाला छीन लिया। लड़का अतुल शायद उसकी तुलना किसी से नहीं हो सकती थी , 19 साल की भरी जवानी में भगवान को प्यारा हो गया , वो सदमा बर्दाश्त करना परिवार के बस के बाहर था । वसई में बहुत ही फैला हुआ कारोबार था और चारुबेन अपने पति का कारोबार में पहले से ही हाथ बटाती थी । दो लड़की थी , जिनकी समय से शादी हो गई । दोनों लड़कियों कभी लड़के की कमी महसूस नहीं होने दी । हमेशा परिवार की ताकत बन कर खड़ी रही । बाप के कंधे पर बेटे का जनाजा ,यह सदमा श्री हर्षत शेठ  से बर्दाश्त नहीं हो रहा था , ये गम उन्हे अंदर ही अंदर खाये जा रहा था और अगले पाँच साल में तो अचानक हार्ट अटेक आने से 2005 में इस संसार से अलविदा करके चले गए । 

यह दु:ख मानो  श्रीमती चारुबेन पर पहाड़ बन कर टूट पड़ा । उनकी दो बेटियों ने बाप की अर्थी को कंधा दिया और अग्नि संस्कार भी बेटियों ने करके बेटा होने का फर्ज़ अदा किया । हरेक पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है मगर श्रीमती चारुबेन की सफलता के पीछे उनके पति का हाथ है जिन्होने उन्हे पहले से ही अपने कारोबार में शामिल कर रखा था । पति के जाने के बाद श्रीमती चारुबेन की दोनों बेटियों प्रीति और बेला  उनकी ताकत बनी , जिन्होने हमेशा माँ का हौसला बढ़ाया । आज भी पति के जाने के 9 साल बाद भी वह अपना कारोबार अच्छी तरह संभाल रही है और हर हाल में खुश रहती है तथा दूसरों को खुशी बांटती है । वह कभी अपने को अकेला महसूस नहीं करती है । उनका मानना है कि वसई उनकी कर्मभूमि है और वो जो कुछ भी है वो वसई की ही देन है ।मैं  वसई ईस्ट सीनियर सिटिज़न असोशिएशन की सदस्य हूँ और आज मेरा  परिवार वसई ईस्ट सीनियर सिटिज़न असोशिएशन के सदस्य गण भी है । मैं असोशिएशन की आभारी हूँ जो उन्होने मुझे इस महिला दिवस पर मुख्य अतिथि बनाया है ।  

 

संपर्क
अशोक भाटिया
HON.SECRETARY 
VASAI EAST SENIOR CITIZEN'S ASSOCIATION(Regd)
A / 001 , VENTURE APARTMENT ,NEAR REGAL, SEC 6, LINK ROAD , VASANT NAGARI ,
VASAI EAST -401208
DIST – ( PALGHAR  MAHARASHTRA )
 MOB. 09221232130-07757073896

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रेल मंत्रालय द्वारा मेक इन इंडिया की शुरुआत

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'मेक इन इंडिया॑  की पहल को आगे बढ़ाते हुए भारतीय रेलवे में दो बड़े एफडीआई प्रस्तावों को हरी झंडी दे दी है। सुरेश प्रभु ने बिहार में 2,400 करोड़ रुपए की लागत से डीजल और इलेक्ट्रिक इंजन कारखाना लगाने के बारे में दो बड़े प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रस्तावों को हरी झंडी दे दी है। रेलवे ने अच्छे खासे विलंब के बाद मधेपुरा के इलेक्ट्रिक इंजन कारखाने व मरहोड़ा के डीजल इंजन कारखाने को लेकर चला आ रहा असमंजस समाप्त करते हुए ऊंचे मूल्य की संयुक्त उद्यम परियोजनाओं की वित्तीय बोली को अंतिम रूप दे दिया है। इसके लिए रेलवे ने बोली दस्तावेज की कई बार समीक्षा की।

 दोनों संयंत्रों के लिए वित्तीय बोली दस्तावेजों वाले प्रस्ताव के लिए आग्रह (आरएफपी) तैयार हैं और छांटी गई बोली लगाने वाली कंपनियों को इसकी सूचना दे दी गई है। मधेपुरा के प्रस्तावित इलेक्ट्रिक इंजन कारखाने के लिए चार वैश्विक कंपनियां अल्सटाम, सीमंस, जीई व बाम्बार्डियर का नाम छांटा गया है। वहीं मरहोड़ा के डीजल इंजन कारखाने के लिए दो बहुराष्ट्रीय कंपनियों जीई व ईएमडी का नाम छांटा गया है। इन दोनों कारखानों की अनुमानित लागत 1,200-1,200 करोड़ रुपये है। अधिकारी ने बताया कि वित्तीय बोली 31 अगस्त को खोली जाएगी।

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