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हल हो सांस की आस का सवाल

शहरी लोगों के लिए गाड़ियों से निकलने वाला प्रदूषण, उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण, सिगरेट का धुंआ इत्यादि तो प्रभावित हो ही रहा है, साथ ही घर व कार्यालयों के अंदर वायु प्रदूषण से बच्चे और वयस्क तेजी से गिरफ्त में आ रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंद्ध डा. वल्लभ भाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट चौंकाने वाली है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की देखरेख में तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार घर एवं कार्यालयों के अंदर होने वाले वायु प्रदूषण से पांच लाख से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो रही है जो कि दुनिया के किसी भी देश के लिए बहुत ज्यादा है। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बाहर से होने वाले प्रदूषण के मुकाबले घर में होने वाले प्रदूषण से 1000 गुना ज्यादा लोगों के फेफड़े खराब हो रहे हैं। पांच महागनरों में नवजात शिशुओं से लेकर 65 साल की आयु वर्ग के 22,234 लोगों पर कराए गए अध्ययन में पाया गया कि घर के वायु प्रदूषण से लोग अस्वस्थ तो होते ही है साथ ही मृत्युदर में भी बहुत ज्यादा इजाफा हो रहा है। 

पांच साल से कम उम्र के बच्चों में श्वसन क्रिया में संक्रमण (एक्यूट लॉअर रिस्परेटरी ट्रेक्ट इंफेक्शन) मृत्युदर का बहुत बड़ा कारण है। श्वसन की सभी बीमारियों में से अस्थमा हेल्थकेयर में बड़ी समस्या है। अमेरिका में वयस्क और बच्चों में ये तकरीबन 8.8 फीसद तक है तो भारत में इसका स्तर वयस्क और बच्चों में 4-5 प्रतिशत है। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर रिपोर्ट के हवाले से पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट में श्वसन तंत्रिका एवं फेफड़ों मामलों के अध्यक्ष डा. राजकुमार ने कहा कि तेजी से बढ़ती आबादी संकरी गलियां, छोटे घरों में अधिक लोगों के रहने, रोशनदान की कमी से अन्य महानगरों की अपेक्षा यहां पर बच्चों में फेफड़े में संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। 

कुल आबादी में से 5 साल से कम की आयु के शिशु 12 फीसद तक फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त हैं, यह आंकड़ा कोलकाता, मुंबई मद्रास में 7 से 9 फीसद तक देखा गया है। एक अन्य सर्वेक्षण दिल्ली, एनसीआर में सांस फाउंडेशन 2002-2012 के दौरान 300 स्कूलों में किया। इसमें 10- 14 साल के उन बच्चों को शामिल किया गया जो अस्थमा से पीड़ित थे। 

करीब 15 फीसद बच्चे घर या स्कूल के भीतर होने वाली एलर्जियों के कारण अस्थमा से पीड़ित हैं। इसकी वजह अस्थमा और पैक फूड जैसे कि स्नैक्स और तरलपदार्थ का सीधा संबंध भी बताया गया है। फेफड़े पर अटैक-अस्थमा : मैक्स हेल्थकेयर के डा. विवेक कुमार के अनुसार अस्थमा में फेफड़ों में हवा के आने जाने वाले मार्ग में सूजन हो जाती है। ये सूजन काफी घातक होती है क्यों कि ये चेस्ट एक्सरे या किसी दूसरे टेस्ट से पता नहीं चलती। हालांकि सूजन से कोई दर्द नहीं होता और ये दिखाई भी नहीं देती है लेकिन रोगी को खांसी या सांस लेने में दिक्कत महसूस होती है।

वायुमण्डल में कार्बनडाईआक्साइड का होना भी प्रदूषण हो जाता है यदि वह धरती के पर्यावरण में अनुचित अन्तर पैदा करता है। 'ग्रीन हाउस' प्रभाव पैदा करने वाली गैसों में वृद्धि के कारण भू-मण्डल का तापमान निरन्तर बढ़ रहा है। जिससे हिमखण्डों के पिघलने की दर में वृद्धि होगी तथा समुद्री जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती क्षेत्र, जलमग्न हो जायेंगे। हालाँकि इन शोधों को पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका स्वीकार नहीं कर रहा है। प्रदूषण् के मायने अलग-अलग सन्दर्भों से निर्धारित होते हैं।

परम्परागत रूप से प्रदूषण में वायु, जल, रेडियोधर्मिता आदि आते हैं। यदि इनका वैश्विक स्तर पर विश्लेषण किया जाये तो इसमें ध्वनि, प्रकाश आदि के प्रदूषण भी सम्मिलित हो जाते हैं। गम्भीर प्रदूषण उत्पन्न करने वाले मुख्य स्रोत हैं, रासायनिक उद्योग, तेल रिफायनरीज़, आणविक अपशिष्ट स्थल, कूड़ा घर, प्लास्टिक उद्योग, कार उद्योग, पशुगृह, दाहगृह आदि। आणविक संस्थान, तेल टैंक, दुर्घटना होने पर बहुत गम्भीर प्रदूषण पैदा करते हैं। कुछ प्रमुख प्रदूषक क्लोरीनेटेड, हाइड्रोकार्बन्स, भारी तत्व लैड, कैडमियम, क्रोमियम, जिंक, आर्सेनिक, बैनजीन आदि भी प्रमुख प्रदूषक तत्व हैं

प्राकृतिक आपदाओं के पश्चात् प्रदूषण उत्पन्न हो जाता है। बड़े-बड़े समुद्री तूफानों के पश्चात् जब लहरें वापिस लौटती हैं तो कचरे कूड़े, टूटी नाव-कारें, समुद्र तट सहित तेल कारखानों के अपशिष्ट म्यूनिसपैल्टी का कचरा आदि बहाकर ले जाती हैं। 'सुनामी' के पश्चात् के अध्ययन ने बताया कि तटवर्ती मछलियों में, भारी तत्वों का प्रतिषत बहुत बढ़ गया था। प्रदूषक विभिन्न प्रकार की बीमारियों को जन्म देते हैं। जैसे कैंसर, इलर्जी, अस्थमा, प्रतिरोधक बीमारियाँ आदि। जहाँ तक कि कुछ बीमारियों को उन्हें पैदा करने वाले प्रदूषक का ही नाम दे दिया गया है। जैसे मरकरी यौगिक से उत्पन्न बीमारी को 'मिनामटा' कहा जाता है।

शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से भारत की वायु गुणता में अत्यधिक कमी आयी है। विश्वभर में 30 लाख मौतें, घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की राजधानी दिल्ली, विश्व के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में, प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से, दिल्ली में 12 प्रतिषत अधिक मृत्यु होती है।

एक अलग अध्ययन के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले दो दषकों में 2.5 प्रतिषत बढ़ा है, वाहनों से होने वाला प्रदूषण 8 प्रतिषत बढ़ा है जबकि उद्योगों से बढ़ने वाला प्रदूषण चौगुना हो गया है। भारत के प्रदूषणों में वायु प्रदूषण सबसे अधिक गम्भीर समस्या है। यह कई रूपों में हो रहा है जैसे- वाहनों से निकलने वाला धुऑं, उद्योगों से अषोधित औद्योगिक धुऑं, औद्योगिकीकरण के अतिरिक्त बढ़ते शहरीकरण से नये-नये औद्योगिक केन्द्र खुल गये हैं पर उनके लिए आवश्यक नागरिक सुविधाओं तथा प्रदूषण नियंत्रण के तरीकों का विस्तार नहीं हुआ है।

वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक प्रावधानों को दिल्ली जैसे शहर में पूर्णरूपेण लागू कर पाना काफी मुश्किल कार्य है। फिर भी इस दिशा में कार्य जारी है। विशेष रूप से सी.एन.जी. गैस के प्रयोग ने, इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है पर भविष्य में वाहनों की संख्या के लगातार बढ़ने की सम्भावना से, जुड़े हुए सरकारी प्रयासों की तथा प्रदूषण नियंत्रण प्रावधानों को कठोरता से लागू करने की आवश्यकता है।
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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी 
स्वशासी महाविद्यालय,राजनांदगांव 

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काटजू बोले, अंग्रेजों के एजेंट थे गाँधीजी

प्रेस काउंसिल के पूर्व के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। इस बार उन्होंने महात्मा गांधी को लेकर एक ब्लॉग लिखा है। जिसमें उन्होंने गांधी को अंग्रेजों का एजेंट करार दिया है।
 
'गांधी- ए ब्रिटिश एजेंट' में काटजू ने लिखा है कि गांधी अंग्रेजों की नीति पर काम करते थे। जिसके चलते भारत को काफी नुकसान पहुंचा है।
 
काटजू ने अपनी बात को साबित करने के लिए ब्लॉग में कई वजहें भी गिनाई हैं। उन्होंने लिखा है कि गांधी अंग्रेजों के ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर काम करते थे।
 
मार्कंडेय काटजू ने अपने तर्क में कहा है कि महात्मा गांधी के वक्तव्यों और समाचार पत्रों में लिखे उनके लेख से ऐसा लगता है जैसे उनका झुकाव हिंदुओं के प्रति ज्यादा था।
 
गांधी के विचार पर गौर करें तो वे राम राज्य, गो रक्षा, ब्रह्मचर्य, वर्णाश्रण धर्म जैसे मुद्दे उठाते थे। गांधी की सभाओं में अक्सर हिंदू भजन रघुपति राघव राजा राम के बोल सुनाई देते थे। इससे मुस्लिमों की भावनाएं जरूर आहत होती थी।
 
काटजू ने गांधी के सत्याग्रह आंदोलन पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने लिखा है कि गांधी ने जानबूझ कर ये आंदोलन छेड़ा जिससे क्रांतिकारी आंदोलन को पीछे छोड़ा जा सके। ऐसा करने के पीछे भी अंग्रेजों का फायदा छिपा हुआ था।

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बलिदानी योद्धाओं की याद

भारतीय सेना, प्रथम विश्‍व युद्ध में भाग लेने वाले 15 लाख भारतीय सिपाहियों और अपने प्राणों की आहूति देने वाले 74 हजार से भी अधिक सिपाहियों की स्‍मृ‍ति में 10 से 14 मार्च 2015 तक नई दिल्‍ली में शताब्‍दी समारोह का आयोजन कर रही है। ज़ाहिर है कि इस आयोजन के साथ शौर्य और साहस की दास्तानों की यादों का कारवाँ सा उमड़ पड़ा है। 

इतिहास गवाह है कि 1914 में भारतीय सेना दुनिया में सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना थी जिसकी कुल क्षमता 240,000 लोगों की थी। नवंबर 1918 तक इसमें 548,311 लोग शामिल हो गए थे जिसे इम्पीरियल स्ट्रेटजिक रिजर्व माना जाता था। इसे नियमित रूप से नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर पर घुसपैठ और छापों से निबटने और मिस्र, सिंगापुर तथा चीन में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सैन्य मोर्चाबंदी के लिए बुलाया जाता था। इस क्षेत्रीय सैन्य बल को दो सेनाओं में बांटा गया था: नॉर्दर्न आर्मी जो अपने कमांड के तहत पांच डिविजनों और तीन ब्रिगेडों के साथ नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर से बंगाल तक फ़ैली हुई थी और सदर्न आर्मी जिसका विस्तार बलूचिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक था और इसमें कमांड के तहत चार डिवीजन तथा उपमहाद्वीप के बाहर दो संरचनाएं शामिल थीं। दोनों सेनाओं में 39 घुड़सवार रेजिमेंटों, 138 पैदल सेना के बटालियनों (20 गोरखा सहित), द कॉर्प्स ऑफ गाइड्स नामक एक संयुक्त घुड़सवार-पैदल सेना की यूनिट, तीन खंदक खोदने वाले सैनिकों (सैपर) के रेजिमेंट और 12 पहाड़ी तोपखाने की बैटरियां शामिल थीं।

इन सुधारों द्वारा गठित नौ डिवीजनों में प्रत्येक के पास एक घुड़सवार सेना और तीन पैदल सेना के ब्रिगेड शामिल थे। घुड़सवार सेना के ब्रिगेड में एक ब्रिटिश और दो भारतीय रेजिमेंट जबकि पैदल सेना के ब्रिगेडों में एक ब्रिटिश और तीन भारतीय बटालियन शामिल थे।  भारतीय सेना की बटालियनें ब्रिटिश बटालियनों से छोटी थीं जिसमें 30 अधिकारी और 723 अन्य रैंक के सैनिक शामिल थे जिसकी तुलना में ब्रिटिश बटालियनों में 29 अधिकारी और 977 अन्य रैंक के सैनिक मौजूद थे। भारतीय बटालियनों को अक्सर टुकड़ों में बाँट दिया जाता था जिनसे विभिन्न जनजातियों, जातियों या धर्मों की कंपनियां बना दी जाती थीं। प्रत्येक डिविजन के मुख्यालयों में संलग्न अतिरिक्त सैनिकों में एक घुड़सवार सेना की रेजिमेंट, एक अग्रणी बटालियन और ब्रिटिश रॉयल फील्ड आर्टिलरी द्वारा उपलब्ध कराये गए तोपखाने शामिल थे। प्रत्येक डिविजन की शक्ति लगभग 13,000 लोगों की थी जो आंशिक रूप से छोटी पैदल सेना की बटालियनों और छोटे तोपची सैनिकों के कारण ब्रिटिश डिविजन की तुलना में कुछ हद तक कमजोर थीं। भारतीय सेना उस समय भी कमजोर हो गयी थी जब देश में मौजूद 500 ब्रिटिश अधिकारी छोड़कर चले गए थे जो उन 38 भारतीय बटालियनों के लिए पर्याप्त थे जिन्हें किचनर की आर्मी के लिए बनाए जा रहे नए ब्रिटिश डिविजनों में तैनात किया गया था।

नियमित भारतीय सेना के अलावा रियासती प्रांतों की सेनाओं और सहायक सैन्य बलों (यूरोपीय स्वयंसेवकों) के रेजीमेंटों को भी आपात स्थिति में मदद के बुलाया जा सकता था। रियासती प्रांतों से इम्पीरियल सर्विस ब्रिगेड का गठन हुआ था और 1914 में इसमें 20 घुड़सवार सेना के रेजिमेंटों और पैदल सेना की 14 बटालियनों में 22,613 जवान शामिल थे।  युद्ध के अंत तक 26,000 जवानों ने इम्पीरियल सर्विस में विदेशों में अपनी सेवाएं दी थीं। सहायक सैन्य बल घुड़सवार सेना के 11 रेजिमेंटों और 42 स्वयंसेवक पैदल सेना के बटालियनों में 40,000 अतिरिक्त जवानों को तैनात करने में सक्षम था।  इसके अलावा फ्रंटियर मिलिशिया और मिलिटरी पुलिस भी उपलब्ध थे जो उनके बीच 34,000 जवानों को तैनात कर सकते थे। 

क्षेत्रीय सैन्य बल के मुख्यालय दिल्ली में स्थित थे और वरिष्ठ अधिकारी (भारत के कमांडर-इन-चीफ) को भारत के जनरल स्टाफ के प्रमुख द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता था। भारतीय सेना के सभी वरिष्ठ कमान और स्टाफ पदों को ब्रिटिश और भारतीय सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच वैकल्पिक रूप से इस्तेमाल किया जाता था। 1914 में जनरल सर ब्यूचैम्प डफ भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ थे और ब्रिटिश सेना के लेफ्टिनेंट जनरल सर पर्सी लेक जनरल स्टाफ के प्रमुख थे। प्रत्येक भारतीय बटालियन में स्टाफ के रूप में भारत की ब्रिटिश सेना के 13 अधिकारियों और भारतीय सेना से 17 अधिकारियों को शामिल किया गया था। प्रवासी ब्रिटिश अधिकारी ब्रिटिश औपनिवेशिक भारतीय प्रशासन के तहत सेवारत थे। युद्ध तेज होने और अधिकारियों के हताहत होने से उनकी जगह ब्रिटिश मूल के अधिकारियों को कार्यभार सौंपने की क्षमता बेहद मुश्किल में पड़ गयी और कई मामलों में बटालियनों में अधिकारियों के आवंटन को तदनुसार कम कर दिया गया। केवल 1919 में जाकर भारतीय मूल के पहले ऑफिसर कैडेटों को रॉयल मिलिटरी कॉलेज में अधिकारी प्रशिक्षण के लिए चुने जाने की अनुमति दी गयी।

भारतीय सेना के लिए सामान्य वार्षिक भर्ती 15,000 जवानों की थी, युद्ध के दौरान 800,000 से अधिक लोगों ने सेना के लिए स्वेच्छा से योगदान दिया और 400,000 से अधिक लोगों ने गैर-युद्धक भूमिकाओं के लिए स्वैच्छिक रूप से कार्य किया। 1918 तक कुल मिलाकर लगभग 1.3 मिलियन लोगों ने स्वेच्छा से सेवा के लिए योगदान दिया था। युद्ध के दौरान एक मिलियन भारतीय जवानों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दी जिनमें से 62,000 से अधिक मारे गए और 67,000 अन्य घायल हो गए थे। कुल मिलाकर 74,187 भारतीय सैनिक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मारे गए थे। इन्हें याग करने और श्रद्धांजलि अर्पित करने का सिलसिला जारी है। 
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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय स्वशासी,पीजी
महाविद्यालय, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ )
मो.09301054300 

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शोकसभा बदली सहायता सभा में, मृतकों के परिवार को दिए 25 लाख

इंदौर। मध्य प्रदेश हादसा केवल किसी व्यक्ति की जान नहीं लेता है बल्कि वह उसके परिवार को भी तोड़ देता है। एक ऐसा ही हादसा इंदौर में भी हुआ जहां जैन समाज के चार सदस्यों की सड़क हादसे में मौत हो गई। यह सभी अपने परिवार की आय का मुख्य जरिया थे। इस मुश्किल की घड़ी में जैन समाज ने एक मिसाल कायम की है। जैन समाज ने इस परिवार के बेटे और बेटियों की मदद के लिए हाथ बढ़ाते हुए 25 लाख रुपये की सहायता राशि जुटाई है। इस राशि के जरिए इन परिवार के बच्चों की शिक्षा, उनके स्वास्थ्य और नौकरी की जिम्मेदारियां पूरी की जाएगी।

 
अंतिम संस्‍कार के बाद होने वाली शोकसभा में परिवार से जुड़े सुदीप्त जैन ने समाज के समक्ष प्रस्ताव रखा की शोकाकुल परिवारों की आर्थिक मदद की जाए, ताकि बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य खर्चो में सहयोग हो सके। उनकी इस पहल के बाद शोकसभा में एक के बाद एक मदद का ऐलान होता गया।
जैन समाज में पंच कल्याणक, निर्वाण लाडू, मुनियों के पाद पूजन और मंदिर के कलश के लिए बोलियां लगती रही है। यह पहली बार है कि इस तरह किसी परिवार की आर्थिक मदद के लिए इस तरह शोकसभा में बोली लगाकर मदद इकठ्ठा की गई।

जैन समाज के यह चारों सदस्य समाज की मदद के लिए हर समय तैयार रहते थे। सामाजिक , धार्मिक आयोजन हो या फिर किसी को मदद की जरूरत हो यह चारों सबसे आगे रहते थे। समाज में यदि इनके जिम्मे कोई काम सौप दिया जाता था तो सब बेफ्रिक हो जाते थे। समाज के लिए आर्थिक मदद जुटाने में इन चारों की जोड़ी पहल और मदद करती रहती थी। ऐसे में जब इस परिवार पर यह आपदा आई तो समाज खुलकर मदद के लिए आगे आया।

यह सभी मक्सी स्थित भगवान पारसनाथ मंदिर के सालाना रंगपंचमी मेले में शामिल होने इंदौर से जा रहे थे। हादसा मक्सी से 3 किमी पहले प्रवेश द्वार पर हुआ। एक बाइक सवार को बचाने में संतुलन बिगड़ा और उनकी कार इंट्री गेट से टकरा गई। इस हादसे में इंदौर के वीरेंद्र कुमार राजेंद्र कुमार जैन (55) निवासी मोती महल इतवारिया बाजार, संजय घासीलाल जैन सुदामा नगर, जंबूकुमार मांगीलाल जैन (45) निवासी खजूरी बाजार और दिनेश कुमार राजकुमार जैन (55) निवासी जनता कॉलोनी है।

फोटो: शोक सभा की फोटो

साभार- http://hindi.news18.com/ से 

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मोदीजी की मेरी सरकार अंग्रेजी वालों के लिए

प्रति,

सचिव महोदया  / संयुक्त सचिव महोदया एवं निदेशक (शिकायत)
राजभाषा विभाग 
नई दिल्ली 

विषय: राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र द्वारा 'मेरी सरकार' पोर्टल पर  हिन्दी की उपेक्षा की शिकायत

महोदय,
 
माननीय प्रधानमंत्री जी ने आम जनता से प्रशासन एवं शासन के लिए सुझाव लेने के लिए मेरी सरकार पोर्टल शुरू किया है पर इस पर हिन्दी का अपमान भी किया जा रहा है एवं नागरिकों पर जबरन अंग्रेजी थोपी जा रही है. ये लोग इस तरह प्रधानमंत्री जी की पहल का भी मखौल उड़ा रहे हैं, अंग्रेजी को प्राथमिकता देने से इस अभियान से आम नागरिक नहीं जुड़ पा रहे हैं. पिछले कई सप्ताह से अनेक लोगों ने राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र को लिखा पर कोई सुधार नहीं किया जा रहा है, मैं भी कई बार लिख चुकी हूँ, आम जनता की परेशानियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है इसलिए हारकर सीधे आपको लिख रही हूँ.

आम जनता के सुझाव चाहिए तो उनकी भाषा को प्राथमिकता देनी ही होगी. हम हिन्दी की उपेक्षा स्वीकार नहीं करेंगे, राजभाषा विभाग संविधान में निर्देशित अनुसार हिन्दी को उसका स्थान दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए, केवल "डाकिये'की तरह चिट्ठी को आगे भेजने का काम अब बंद कीजिए. हम लोग भी चिट्ठी लिख-लिख कर थक चुके हैं, और आप लोग कुछ नहीं कर सकते तो इस विभाग को बंद करवा दीजिए.अपनी भाषा के लिए लड़ने के लिए मुझे कहीं से पगार नहीं मिल रही है.

शिकायत के मुख्य बिंदु:

वेबसाइट पर पंजीयन के लिए व्यक्ति का नाम -उपनाम देवनागरी में लिखने पर पाबंदी लगी है इसलिए देवनागरी अक्षरों को अनुमति दी जाए.
पंजीयन के एक बार पासवर्ड (ओटीपी) सम्बन्धी मोबाइल सन्देश/ईमेल केवल अंग्रेजी में भेजा जाता है जबकि गूगल/ट्विटर जैसी विदेशी सेवाओं ने ऐसी ही सुविधा हिन्दी में दी है तो एन आई सी पर तो कानून भी लागू है. मोबाइल सन्देश/ईमेलअनिवार्य रूप से देवनागरी (हिन्दी) में भी भेजने के लिए निर्देशित करें.
वेबसाइट पर पंजीयन के बाद लॉग इन करने पर स्वागत सन्देश एवं व्यक्ति-परिचय (प्रोफाइल) आदि का प्रारूप केवल अंग्रेजी में बनाया गया है, इसे अविलम्ब द्विभाषी बनाया जाए एवं उस प्रारूप में देशों/राज्यों/शहरों के नाम देवनागरी में प्रदर्शित हों, देवनागरी अक्षरों को स्वीकार किया जाए. स्वागत सन्देश हिन्दी में दिखे.
भाषा चुनने के बाद वेबसाइट में प्रयोक्ता द्वारा लॉग इन करने के बाद पृष्ठ स्वतः हिन्दी/द्विभाषीय रूप में खुले, उसमें सारी जानकारी, टेम्पलेट, प्रारूप अनिवार्य रूप से हिन्दी में खुलें. 
एन आई सी को अपने विभाग का मानक हिन्दी नाम भी नहीं पता है इसलिए लिखते हैं 'इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग' जबकि सही नाम में "इलेक्ट्रॉनिकी" शब्द आता है.
इस वेबसाइट पर हिन्दी पृष्ठों पर अंग्रेजी की भारत सरकार एवं एनआईसी वेबसाइटों को लिंक किया गया है जबकि इन वेबसाइटों के हिन्दी संस्करण लिंक किए जाने चाहिए थे.
वेबसाइट का मुख्यपृष्ठ अनिवार्य रूप से द्विभाषी बने जिसमें हिन्दी को उसका स्थान मिले ना कि 'बाई डिफाल्ट' अंग्रेजी वेबसाइट पहले खुले.
इन सभी के प्रमाण के लिए पृष्ठों के 5 चित्र संलग्न हैं, उन पर ध्यान दें. 
भवदीय 
विधि जैन
जी-12, हावरे फैंटेशिया, वाशी रेलवे स्थानक के पास, सेक्टर 30 ए, वाशी, नवी मुम्बई – 400703
प्रतिलिपि:
 राजभाषा विभाग
  केंद्रीय मंत्री महोदय, गृह मंत्रालय

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राहुल गाँधी पर चलेगा मुकदमा

बंबई उच्च न्यायालय ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज मानहानि की याचिका रद्द करने की अपील खारिज कर दी  है। इस याचिका में उन्होंने आरएसएस की ओर से अपने खिलाफ दायर मानहानि की याचिका को रद्द करने की मांग की थी। महात्मा गांधी की हत्या में आरएसएस पर कथित आरोप लगाए जाने पर राहुल के खिलाफ आरएसएस के एक कार्यकर्ता ने मानहानि का मामला दायर किया था। 

न्यायमूर्ति एमएल तहलियानी ने राहुल की याचिका खारिज कर दी, जिसमें आरएसएस कार्यकर्ता राजेश कुंटे द्वारा ठाणे जिले के भिवंडी में एक मजिस्ट्रेट अदालत में दायर शिकायत को खारिज करने का आग्रह किया गया था। 

पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान एक रैली में राहुल ने कहा था कि आरएसएस के एक कार्यकर्ता ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी। आरएसएस की भिवंडी इकाई के सचिव कुंटे ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि राहुल ने छह मार्च को सोनाले में एक चुनाव रैली में कहा था, 'आरएसएस के लोगों ने गांधी जी को मार दिया।' कुंटे ने कहा कि कांग्रेस उपाध्यक्ष ने अपने भाषण से संघ की प्रतिष्ठा खराब करने की कोशिश की है।

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इस देश के मतदाता हो तो पहले अंग्रेजी सीखो, चुनाव आयोग की पेशकश

सेवा में,

मुख्य निर्वाचन आयुक्त  
भारत निर्वाचन आयोग
निर्वाचन सदन, 
अशोक रोड, नई दिल्ली -110001 

विषय:मतदाता महोत्सव सम्बन्धी ऑनलाइन प्रतियोगिताओं की जानकारी हिन्दी में दिए जाने हेतु अनुरोध

महोदय,

२५ जनवरी २०१५ से राष्ट्रीय मतदाता दिवस महोत्सव शुरू किया गया है और उसके अंतर्गत अनेक ऑनलाइन प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा रही हैं परन्तु इसके लिए बनाया गया ऑनलाइन http://164.100.34.140/nvd/ पृष्ठ केवल अंग्रेजी में हैं जिससे देश के करोड़ों नागरिक इन प्रतियोगिताओं में भाग नहीं ले पा रहे हैं. सारे नियम व् शर्तें, प्रतियोगिता के शीर्षक एवं लॉग इन सुविधा केवल अंग्रेजी में होने से अंग्रेजी ना जानने वाले नागरिक इन ऑनलाइन प्रतियोगिताओं में भाग लेने से वंचित हैं कृपया ये सभी सुविधाएँ हिन्दी में उपलब्ध करवा दें.
 
कृपया मेरे पत्र का शीघ्र उत्तर दें। 

भवदीय, 
श्रीमती विधि जैन 
आदीश्वर सोसाइटी, 
जैन मंदिर के पीछे,
सेक्टर – 9 ए, वाशी, नवी मुंबई – 400 703

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ऊफ… ये मासूम…

रेलवे स्टेशन और बस अड्डाइन दो स्थानों पर जाने की नौबत आने पर मैं समझ जाता हूं कि आज मेरा सामना अनेक अप्रिय परिस्थितयों से होना है। जो मुझे कई दिनों तक बेचैन किए रहेगी। अभी कुछ दिन पहले परिजनों को ट्रेन में बिठाने स्टेशन गया था। प्लेटफार्म पर ट्रेन की प्रतीक्षा के दौरान मैने बमुश्किल तीन साल की एक बेहद कमजोर बच्ची को जल्दी – जल्दी चलने की कोशिश करते पाया। भिखारिन सी नजर आने वाली वह महिला शायद उसकी मां थी, जो आगे – आगे चल रही थी। यह दृश्य मुझे विचलित कर गया। क्योंकि कुपोषण की शिकार वह बच्ची इतनी कमजोर थी कि उसके मुंह से रुलाई भी ठीक से नहीं निकल रही थी। ठंड के बावजूद उसके पैरों में जूते या चप्पल नहीं थे। आगे – आगे चल रही मां की ठिठाई का आलम यह कि कुछ दूर चल कर वह सिर्फ पीछे मुड़ कर देख लेती कि बच्ची चल रही है या नहीं। मैने एेतराज जताना चाहा। लेकिन कुछ नहीं कर सका, क्योंकि महिला के एक हाथ में दूसरा उससे छोटा बच्चा और दूसरे हाथ में थैला जैसा कुछ था। जिस प्लेटफार्म को पार करने में व्यस्क लोगों के ही पसीने छूट जाते हैं उसे यह मासूम कैसे पार कर पाएगी, यह सोच – सोच कर मैं परेशान हो रहा था। लेकिन तब तक वह महिला औऱ बच्ची प्लेटफार्म की भीड़ में गायब हो चुकी थी।

 

इस घटना से मेरे जेहन में अतीत की कुछ एेसी ही दूसरी घटनाएं ताजा हो गई। एक बार कड़ाके की ठंड में रात की पैसेंजर ट्रेन से मैं अपने शहर लौट रहा था। मेरे सामने वाली सीट पर चार मासूम बच्चे बेसुध पड़े थे। साथ में वही महिला थी, जिसे मैं अपने शहर के रेलवे स्टेशन के पास अक्सर भीख मांगते देखता हूं। एक बार मैने उसे 12- 13 साल के एक बच्चे को उसे बेरहमी से पीटते देखा था। मेरे एेतराज करने पर उस महिला ने अपनी सफाई में कहा था कि इसके बाप ने हम लोगों को छोड़ दिया है। मैं भीख मांग कर जैसे – तैसे इन्हें पाल रही हूं। लेकिन बड़ा लड़का होकर भी यह लापरवाही करता है। एक अबोध शिशु को मैने इसकी निगरानी में छोड़ा था। लेकिन यह सड़क के दूसरी तरफ घूमने चला गया। वह दृश्य मुझे गहरे तक विचलित कर गया । �महिला को बच्चे को फिर न मारने की हिदायत देकर मैं आगे बढ़ गया था। इतने दिनों बाद वही महिला मेरे सामने वाली सीट पर बेसुध पड़ी थी। साथ में 2 से 13 साल की उम्र वाले चार मासूम बच्चे भी बेसुध होकर अपनी सीट पर सो रहे थे। उन्हें देख कर मैं मन ही मन सोचने लगा कि कड़ाके की ठंड में भी रात में घर पहुंच कर मुझे खाना मिल जाएगा और चैन की नींद भी। लेकिन ये बच्चे कहां जाएंगे। क्या इन्हें भोजन व ठंड से बचाव का उपाय मिलेगा।�

एक अन्य रेल यात्रा के दौरान मेरा सामना एक और एेसे ही अप्रिय घटना से हुआ। चलती ट्रेन में अचानक सटाक की आवाज से मेरे साथ ही दूसरे यात्री भी चौंक उठे। सामने फटे कपड़ों में भीख मांग रही एक बमुश्किल सात – आठ साल की बच्ची खड़ी थी। अचानक पड़े तमाचे से वह स्तब्ध होकर अपने गाल सहला रही थी। मेरे साथ ही दूसरे यात्रियों की निगाहें भी उस यात्री पर टिक गई, जिसने उस बच्ची को तमाचा मारा था। कुछ ने इसका कारण पूछा भी, लेकिन बदतमीच … कहते हुए वह यात्री लगातार अपने पैकेट से निकाल कर कुछ खाता जा रहा था। कुछ देर सुबकते हुए स्तब्ध खड़ी रहने के बाद वह बच्ची आगे बढ़ गई। कई यात्रियों को यह बात बेहद बुरी लगी। लेकिन रेल यात्रा के दौरान इस तरह की घटनाएं तो आम बात है। बल्कि इससे भी जघन्य घटनाएं रेलवे स्टेशनों , बस अड्डों व ट्रेनों में दिखाई पड़ती है। पाठक सोच सकते हैं कि मैं यह क्या भिखारी पुराण लेकर बैठ गया। ट्रैफिक सिग्नल जैसी फिल्म में तो इस विषय पर गहरे तक रोशनी पहले ही डाली जा चुकी है। फिर नए सिरे से इसे उठाने की क्या जरूरत। लेकिन इस प्रसंग का उल्लेख मुझे हाल की कुछ घटनाओं के चलते जरूरी लगा।

 

दरअसल मैं जिस पश्चिम बंगाल में रहता हूं वहां की राजधानी कोलकाता में हाल ही में एक एनजीओ ने भीख मांगने वाले असंख्य बच्चों को एक बड़े गिरोह के चंगुल से मुक्त कराया। बताया जाता है कि बच्चों से भीख मंगवा कर यह गिरोह हर महीने लाखों की कमाई करता था। यही नहीं राज्य के मालदह जिले में नवजात बच्चों की खरीद – फरोख्त और महिला के गर्भ को बच्चे पैदा करने की मशीन के तौर पर इस्तेमाल करने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। यह हाल यदि एक राज्य का है तो समूचे देश में मासूमों की कैसी दुर्गति होती होगी, समझना मुश्किल नहीं है। क्योंकि हर संवेदनशील नागरिक को भीख मांगते मासूम बच्चों की दुर्दशा कचोटती है। ट्रेन में यात्रा के दौरान अत्यंत कड़वे अनुभव झेलने पड़ते हैं। स्टेशन दर स्टेशन सामने आकर हाथ फैलाने वाले बच्चों को देख कर सहज ही मन में ख्याल आता है कि यह स्वाभाविक नहीं है। इतनी बड़ी संख्या में लोग अनाथ – असहाय नहीं हो सकते कि अपने बच्चों को भीख मांगने भेज दें। निश्चय ही इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह सक्रिय है। जिसका खात्मा जरूरी है। क्योंकि यह समझना मुश्किल नहीं है कि अपनी मेहनत से दूसरों के एेश का इंतजाम करने वाले ये बच्चे किन – किन जिल्लतों से गुजरते होंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

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tarkeshkumarojha.blogspot.com से साभार

तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर ( पश्चिम बंगाल) पिन ः721301 जिला पश्चिम मेदिनीपुर संपर्कः 09434453934 

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फिक्की की महिलाओं ने मनाया महिला दिवस

नई दिल्ली।  यंग फिक्की लेडीज़ आॅर्गनाईजेशन की चेयरपर्सन श्रीमति अवर्णा जैन ने स्लीपवैल फाउण्डेशन के सहयोग से अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में पहली बार ‘वूमेन वेलनेस काॅनक्लेव’ का आयोजन किया। दिल्ली के पंचतारा होटल में आयोजित किये गये इस समारोह में लगभग केन्द्रीय मंत्री श्री राजीव प्रताप रूडी बतौर मुख्यातिथि उपस्थित थे। उनके अतिरिक्त लगभग 100 महिला उद्यमी, किरण बेदी आदि सहित विभिन्न गणमान्य भी इस कानक्लेव में उपस्थित रहे।

वूमेन वेलनेस काॅनक्लेव के अन्तर्गत में अपने क्षेत्रों में राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक एवम् आध्यात्मिक वेलनेस अवधारणा पर गंभीर जानकारी व विचार-विमर्श साझा किये गये।

मौके पर वाई.एफ.एल.ओ. की चेयरपर्सन श्रीमति अवर्णा जैन ने कहा यह काॅनक्लेव योगा, काउंस्लिंग, न्यूट्रीशन आदि की बुनियादी जानकारी उपलब्ध कराते हुए स्किलिंग इंडिया के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में योगदान देगा। वेलनस उद्योग में शहरी व ग्रामीण क्षेत्र की युवा महिलाओं हेतु लगभग 45 फीसदी उद्यमशीलता व नौकरियों के माध्यम से रोजगार के लाखों अवसर हैं। हमें उम्मीद है कि यह मेक इन इंडिया अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

अवर्णा जैन ने कहा, विश्व स्वास्थय संगठन द्वारा वेलनेस को ‘स्वस्थ व खुशहाल जीवन की जागरूकता प्राप्त करने व इसके लिए सूझबूझ पूर्ण चयन की एक सक्रिय प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया है। हमें उम्मीद है कि इस काॅनक्लेव के माध्यम से अपनी वेलनेस की तरफ एक कदम बढ़ाया है।

उन्होंने बताया कि वाई.एफ.एल.ओ. स्किलिंग क्षेत्र में अच्छा काम कर रहा है। वाई.एफ.एल.ओ. आई.टी.आई. के साथ काम करते हुए स्किलिंग विकास के लक्ष्य को प्राप्त करते हुए महिलाओं को रोजगार कौशल भी प्रदान करना चाहता है। रोजगार प्राप्त करने के लिए तीन पहलू; एक्पोज़र, इन्टर्नशिप और कौशल विकास, जिसके बाद रोजगार के अवसर अधिक सशक्त रहते हैं परन्तु इण्डस्ट्री में ऐसे रूझान कम देखने को मिलते हैं। ऐसे में 300 सदस्य की इकाई के साथ वाई.एफ.एल.ओ. हर कदम पर अच्छा एक्सपोजर प्रदान करने में मदद करेगा जिससे कि तीन पहलुओं के पर्याप्त अनुभव के बाद महिलाओं को अच्छा रोजगार कौशल के चलते अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और हमें उम्मीद है कि वाई.एफ.एल.ओ. व स्लीपवेल फाउंडेशन के इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में मंत्रालय का भरपूर सहयोग मिलेगा।

मौके पर उपस्थित सभी ने सूफी संगीत, कीर्तन व योगा तकनीक सत्रों में भी भाग लिया और अपनी तरह की इस गतिविधि का भरपूर लुत्फ उठाया। 

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‘पधारो रोशन भारत मे’ – पर्यटको को न्योता

अंतराष्ट्रीय जगत में भारत की नई रोशन होती छवि की पृष्ठभूमि में सरकार  ने चर्चित "मेक इन इंडिया" के अपने कार्यक्रम की तरह देश विदेश के पर्यटकों को "वेलकम टु इन्क्रेडिबल इंडिया" यानि "पधारो इस रोशन भारत में" का न्यौता दिया है। "स्वच्छ भारत, स्वच्छ स्मारक और स्वच्छ पर्यटन" की इस मुहिम के तहत  ताजमहल, कुतुब मीनार, खजुराहो, सारनाथ, कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे देश के जाने माने 25स्मारकों व पर्यटन स्थलों को "स्वच्छ भारत अभियान" से जोड़ कर उन्हें "आदर्श स्मारक" बनाने के साथ ,वहाँ सैलानियो के लिये विशेष सुविधायें उपलब्ध कराई जा रही है ताकि भारत के पर्यटन स्थलों से सैलानी सुखद अनुभव व  अमिट यादों के साथ साथ,   ऐसे ही  और पर्यटन स्थलो को देखने की चाहत के साथ  दोबारा वापस लौटे.
 
पर्यटन मंत्रालय- पर्यटन के क्षेत्र में विकास की संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा है। केंद्र सरकार विदेशी मुद्रा के अर्जन के लिए पर्यटन को एक बेहद अहम सेक्टर मान रही है। चाहे घरेलू पर्यटक हों या सात समंदर पार कर भारत की धरती पर कदम रखने वाले विदेशी पर्यटक, उन्हें यहां घूमने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं हो, इस पर केंद्र सरकार का विशेष ध्यान है। यही नहीं, इस मुहिम में राज्य सरकारों को भी शामिल करने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि उनके सार्थक सहयोग के बिना पर्यटकों को लुभाने की योजना परवान नहीं चढ़ सकती। गत 25 दिसंम्बर को "सुशासन दिवस" के अवसर पर यह मुहिम शुरू की गयी। इस मुहिम से न केवल पर्यटक भारत में बेहतर रखरखाव वाले पर्यटन स्थलों को  देख कर सुखद अनुभूति कर सकेंगे और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सराह सकंगे , बल्कि इससे देश विदेश के पर्यटकों की संख्या  भी बढ़ेगी, जिससे पर्यटन से अर्जित होने वाली विदेशी मुद्रा तो बढ़ेगी ही, भारत की छवि भी और निखरेगी। केन्द्रीय पर्यटन मंत्री डाॅ महेश शर्मा ने उम्मीद जताई है कि इन नये कदमों से देश में आने वाले विदेशी पर्यटकों की वर्तमान संख्या 72 लाख से बढ़ कर तीन वर्ष में लगभग दुगुनी हो सकेगी। उन्होंने कहा "इस अभियान का मंत्र है- स्वच्छता, सुरक्षा और आतिथ्य"। उन्होंने बताया भारत की अत्यंत समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, यहां पर्यटन को बढाने की अपार संभावनाये हैं। उन्हें उम्मीद है कि इन तमाम प्रयासों से सैलानी इस 'नये रोशन भारत' से बहुत प्रभावित होंगे और "स्वच्छ भारत, स्वच्छ स्मारक और स्वच्छ पर्यटन" की मुहिम अत्यंत सफल रहेगी तथा सैलानी अपने इस "भारत को जानेंगे और उसे मानेंगे"।
 
इसी मुहिम के तहत उठाये जा रहे कदमों के नतीजे दिखने लगे हैं। इस अंतर्गत भारतीय पुरातत्व विभाग ए.एस.आई ने अपने अधीनस्थ राष्ट्रीय महत्व के 3680 स्मारकों एवं पर्यटन स्थलों में से 25 स्मारकों की पहचान'आदर्श स्मारक' के रूप में की है और इनके रख रखाव को बेहतर बनाने के साथ यहाँ विशेष सुविधायें दिये जाने के लिये कदम उठाने शुरू कर दिये हैं। इनमें से कुछ स्थल हैं-लेह स्थित लेह पैलेस, नई दिल्ली स्थित हुमायुं का मकबरा, आगरा स्थित ताजमहल, नई दिल्ली स्थित कुतुब परिसर, दिल्ली स्थित लाल किला, मध्य प्रदेश स्थित खजुराहो और मांडू महल, उत्तर प्रदेश स्थित फतेहपुर सिकरी और सारनाथ, बिहार स्थित वैशाली,राजस्थान स्थित कुंभलगढ़ किला तथा गुजरात स्थित रानी की वाव सहित कुछ अन्य स्मारक। इन स्मारकों पर वाई-फाई सुविधा, सुरक्षा , अतिक्रमण मुक्त क्षेत्र  आदि सुनिश्चित किये जाने   जैसे कदम उठाये जा रहे है . पर्यटन मंत्रालय के इस कार्यक्रम के तहत इन स्थानों पर विकलांगों के लिए  भी विशेष सुविधाएं होंगी। साफ-सफाई को बढ़ावा देने के लिए इन स्मारकों पर "स्वच्छ भारत अभियान" के अंतर्गत सफाई की विशेष व्यवस्था की जा रही है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 2 अक्टूबर को 'स्वच्छ भारत अभियान' की पहल की थी। इस अभियान का उद्देश्य स्वच्छ भारत के सपने को साकार करना है। इसके तहत राष्ट्रीय धरोहर माने जाने वाले स्मारकों पर भी स्वच्छता को लेकर एक व्यापक पहल की गई है। इसके अलावा वहाँ के शौचालयों की देख-रेख के लिए स्वैच्छिक संगठन सुलभ इंटरनेशनल के करार किया जा रहा है ताकि "स्वच्छ भारत, स्वच्छ स्मारक और स्वच्छ पर्यटन" सुनिश्चित किया जा सकें.
 
पर्यटन मंत्रालय के अनुसार इस नयी मुहिम में अनेक प्रभावी कदमों को समाविष्ट किया गया है। इसके अंतर्गत पर्यटकों की सुरक्षा के लिये, पर्यटन पुलिस का गठन, इंडिया हेल्प लाइन की स्थापना, विशेष तौर पर महिला सैलानियों के लिये प्रयाप्त सुरक्षा बंदोबस्त, पर्यटकों को सड़कों पर बने 'खोको 'को भारत के मशहूर लजीज व्यंजन यानि "स्ट्रीट फूड" स्वच्छता के साथ उपलब्ध कराने, वेब आधारित ई-टिकटिंग की शुरूआत, ब्रेल लिपि में पर्यटन पुस्तिकायें उपलब्ध करना इत्यादि ऐसी ही कुछ पहल है। पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा बंदोबस्त बेहतर किये जाने पर बल देते हुए सूत्रों का कहना है कि पर्यटकों, खासकर महिला पर्यटकों से जुड़ी आपराधिक घटनाओं के बारे में मीडिया में आने वाली खबरों को ध्यान में रखते हुए विदेशी टूर आॅपरेटर और भारत की संभावित यात्रा के इच्छुक लोग इस पर चिंता जताते रहे हैं। इस क्षेत्र के दलाल भी उनके लिए चिंता का विषय है। इसे ध्यान में रखते हुए पर्यटन मंत्रालय ने प्रायोगिक आधार पर ‘इन्क्रेडिबल इंडिया हेल्पलाइन’ की स्थापना की है, ताकि किसी भी तरह की आपातकालीन स्थिति में पर्यटको को  आवश्यक मदद मिल सके। इसमें चिकित्सा सहायता भी शामिल हैं। इसके लिए टोल फ्री नंबर 1800111363 है या संक्षिप्त कोड 1363 है। इसके अलावा पर्यटन मंत्रालय की वेबसाइट पर एक एडवाइजरी पोस्ट की गइ है जिसमें उन्हे भरोसा दिलाया गया है कि  महिलाओ एवं विदेशी पर्यटकों के लिए भारत की एक सुरक्षित गंतव्य स्थल है।
 
इसके साथ ही "स्वच्छ भारत अभियान पकवान" मुहिम  भी शुरू की गयी है। इस के तहत "स्ट्रीट फूड" की क्वालिटी बेहतर बनाने के लिये स्वच्छ पकवान (हुनर जायका) का कार्यक्रम भी शुरू किया गया है। इसके जरिये खान पान वेंडर्स अपना कौशल बढ़ायेंगे और साफ-सफाई का भी ध्यान में रखेंगे। मंत्रालय इन स्ट्रीट वेंडर्स को प्रशिक्षण देने उनके उत्पादों की पड़ताल करने और प्रमाणीकरण के लिए नेशनल एसोसिएशन आॅफ स्ट्रीट वेंडर्स आॅफ इंडिया (एनएएसीआई) के साथ सहभागिता कर रहा है। चूंकि इस तरह के वेंडर्स का कोई अता-पता नहीं होता है, इसलिए एनएएसवीआई के साथ सहभागिता करने का निर्णय लिया गया है। कार्यक्रम के तहत प्रक्षिशण के बाद उनके कौशल को परखा जाएगा। प्रशिक्षण पर उन्हें कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ैगा और हर प्रशिक्षु को अधिकतम छह दिनों के लिए हर रोज 200 रुपये दिए जाएंगे ताकि उनकी दैनिक कमाई की भरपाई हो सके।। इस कवायद का लाभ स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने में भी होगा।
 
इस कार्यक्रम की एक  अन्य अनूठी पहल ‘हुनर से रोजगार तक’ का कार्यक्रम है। समावेशी विकास को बढ़ाने के लिए 12वीं योजना मं हुनर से रोजगार तक को एक महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य है कि 18 से 28 साल तक के आयु वर्ग के युवाओं में रोजगारपरक कौशल विकसित करना। इस योजना के अंतर्गत खाद्य एवं पेय सेवा, खाद्य उत्पादन, हाउसकीपिंग, बेकरी-उत्पाद, पैटीज आदि बनाना और वाहन चालान का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण की अवधि 6 से 8 सप्ताह की है। इस कार्यक्रम को कौशल विकास के लिए महत्वपूर्ण प्रमुख पहल के रूप में स्वीकार किया गया है। मंत्रालय इसके सुलभ कार्यान्वयन के लिए लगातार प्रयास कर रहा है ताकि पूरे देश में अधिक से अधिक युवाओं तक पहुंचा जा सके। इसके लिए पारंपरिक और अभिनव उपायों को काम में लाया जा रहा है। इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पर्यटन मंत्रालय द्वारा प्रायोजित अनेक संस्थानों को भी दी गई है। इसमें निजी क्षेत्र का सहयोग लेने का भी निर्णय लिया गया है,जिनमें औद्योगिक इकाइयां शामिल हैं। इसके तहत भारतीय सेना के साथ भी एक करार किया गया है। इसे'हुनर से रोजगार सेना के सहयोग' से कहा जाता है।
 
 हाल ही में पर्यटन मंत्री ने आगरा स्थित ताजमहल ओर नई दिल्ली स्थित हुमायुं के मकबरे पर वेब आधारित ई-टिकटिंग की सुविधा  भी पर्यटको के सुविधा के लिये शुरू की है। इसके तहत स्मारक देखने के इच्छुक पर्यटकों की सहूलियत के लिए ऐसे स्मारकों पर ई-टिकटिंग की सुविधा देने का निर्णय लिया गया है जहां बड़ी संख्या मंे सैलानी आते हैं। इसके लिए सुशासन दिवस यानी गत 25 दिसंबर को एक वेबसाइट लांच कर दी गई इसके साथ ही दिल्ली के स्मारकों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने दिल्ली के स्मारकों पर एक ब्रेल बुक तैयार की है, ताकि नेत्रहीन व्यक्ति इन तमाम स्मारकों से वाकिफ हो सकें, और इस लिपि के माध्यम से इन विरासतो की खूबसुरती को सराह सके।
 
'इलेक्ट्रानिक ट्रेवल आॅथराइजेशन' के जरिये 'आगमन पर पर्यटक वीजा' पर्यटन उद्योग के लिए 2014 का साल इस लिहाज से ऐतिहासिक रहा कि सरकार ने इलेक्ट्रानिक ट्रेवल आॅथराइजेशन के जरिये आगमन पर पर्यटक वीजा के पहले चरण को क्रियान्वित किया। यह योजना 43 देशों के नागरिकों के लिए 27 नवम्बर 2014 को शुरू की गई। इस वीजा के तहत आने वाले यात्रियों का मकसद भारत भ्रमण दर्शनीय स्थलों के बारे में जानकारी एकत्र करना, अल्प कालिक चिकित्सा उपचार, आकस्मिक व्यवसायिक दौरे अथवा दोस्त एवं परिजनों से मिलने संबंधी आकस्मिक यात्रा है, साथ ही भारत में पर्यटन क्षेत्र के सतत विकास के लिए ढांचागत विकास बहुत महत्वपूर्ण है। इसके मददेनजर मंत्रालय पर्यटन स्थलों और सर्किटों में बेहतर पर्यटन संरचना के विकास के लिए प्रयास कर रहा है। 
 
इसके अलावा भी कुछ अहम कदम उठाए गए हैं। मसलन, मोदी सरकार ने होटलों के वर्गीकरण एवं पुनः वर्गीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाने का निर्णय लिया है। 'अतुल्य भारत' अभियान को व्यापक रूप से बढ़ाने के लिए बार्सिलोना, बीजिंग, दुबई, जोहानिसबर्ग, कुवैत, न्यूयाॅर्क, पेरिस, सिंगापुर, स्टाॅकहोम, टोक्यो और टोरंटो सहित विश्व के महत्वपूर्ण शहरों में प्रमुख स्थानों पर अभियान शुरू किया गया है। पर्यटन के सुखद अनुभव देने के साथ ही पर्यटन क्षेत्र युवाओं एवं प्रवासी कर्मियों को नए रोजगार अवसर भी प्रदान करता है। यही नहीं,महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ-साथ गरीबी कम करने में भी इस सेक्टर की अहम भूमिका मानी जाती है। पर्यटन को समावेशी विकास और रोजगार को प्रोत्साहन देने वाला प्रमुख सेक्टर माना जाता रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए की रोशनी से नहाते भारत को सैलानी एक नयी नजर से ‘‘जानेंगे और मानेंगे भी’’।
 

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*सुश्री शोभना जैन विज़न न्‍यूज़ ऑफ इंडिया की मुख्‍य संपादक है।

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