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मन डोलय रे मांघ फगुनवा,रस घोलय रे मांघ फगुनवा

अनुराग की मादक छाई छटा,अलि के मन को नशीला किया।
तितली बन नाच परी-सी चली,अनुशासन धर्म-का ढीला किया।
रंग देख पिकी हो विभोर उठी,विधि ने शिखी आँचल गीला किया
ऋतुराज पिता ने बड़े सुख से,जब मेदिनी का कर पीला किया।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में भले ही विविध प्रकार से रंगों का उत्सव मनाया जाता है परंतु सबका उद्देश्य एवं भावना एक ही है। ब्रज मंडल में इस अवसर पर रास और रंग का मिश्रण देखते ही बनता है। बरसाने' की लठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन नंद गाँव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गाँव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात जम कर बरसती लाठियों के साए में होली खेली जाती है। इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग 'बरसाना' आते हैं।

होलिका फाल्गुन मास की पूर्णिमा को कहते हैं। इस दिन इस पर्व को वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कुछ स्थानों पर फाल्गुन पूर्णिमा के कुछ दिन पूर्व ही वसंत ऋतु की रंगरेलियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। वस्तुत: वसंत पंचमी से ही वसंत के आगमन का संदेश मिल जाता है। होलिकोत्सव को फाल्गुन-उत्सव भी कहते हैं। यह प्रेम, नव-सृजन और सदभावना का पर्व है। सड़क पर, गलियों में,गृह-द्वार पर धनी-निर्धन, जाति-पंक्ति का भेद मिट जाता है। इस प्रकार होली प्रेम,उल्लास और समानता का पर्व है। प्रह्लाद का अर्थ आनंद होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद अक्षुण्ण रहता है।

पहले होली का त्यौहार पाँच दिन तक मनाया जाता था इसके कारण पहले रंग पंचमी भी मनाई जाती थी। लेकिन अब यह दो दिन ही मनाया जाता है। वसंत के साथ ही प्रकट होते हैं- अनेक रंग के फूल, सुगंध, भौंरों के गुंजार और तितलियों के बहुरंगी विहार। सर्दी की विदाई  के साथ सुहानी धूप में जब सरसों के पीले फूलों की आमद होती है तब आती है ऋतुराज बसंत की बारी और महक उठती है फूलों की क्यारी। हर तरफ़ रंग घुलने लगते हैं, मस्ती के, हंसी के, मन मोहक गुलाल, अबीर कोई टोकाटाकी नहीं। बस गुलाल तो लगानी ही है।

समय के साथ अनेक चीज़ें बदली हैं लेकिन इस पर्व की मोहकता और मादकता की मिसाल नहीं। सभी इसका इंतज़ार करते हैं। आज भी भारत के गाँव में इस दिन जितना हो सके पुराने कपड़े पहनते हैं तथा धूल कीचड़ रंग गोबर काला जो भी हाथ लगे रंग देते हैं, कह देते हैं बुरा न मानों होली है। इन रंगों के घुलने के साथ ही तरोताज़ा रहती है साल भर होली की यादें प्यारी-सी हँसी, घूँघट से झाँकती प्रेयसी इसी इंतज़ार में निहारती है कि कब मुझे रंगेगा मेरा यार। भूल जाते हैं गम़ सब हो जाते हैं एकसार। ऐसा है होली का त्यौहार।

प्राचीन काल से अविरल होली मनाने की परंपरा को मुगलों के शासन में भी अवरुद्ध नहीं किया गया बल्कि कुछ मुगल बादशाहों ने तो धूमधाम से होली मनाने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया। मुगल काल में होली के अवसर पर लाल किले के पिछवाड़े यमुना नदी के किनारे और जहाँ आरा के बाग में होली के मेले भरते थे। भारत ही नहीं विश्व के अन्य अनेक देशों में भी होली अथवा होली से मिलते-जुलते त्योहार मनाने की परंपराएँ हैं। कवियों और कलाकारों का सदाबहार विषय ऋतुराज वसंत केवल प्रकृति को ही नवीन नहीं करता भिन्न कलाकारों को भिन्न प्रकार की प्रेरणाओं से भी अभिभूत करता है। लोक साहित्य हो या इतिहास पुराण, चित्रकला या संगीत इस ऋतु ने हर कला को प्रभावित किया है। यहाँ तक कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है। इतिहास पुराण भी इसके उल्लेखों से बचे नहीं हैं। किंवदंतियों और हास्य कथाओं के ख़ज़ानों में भी इस पर्व का ज़ोरदार दख़ल है।

एक किंवदंती यह है कि जब पार्वती के लाख प्रयत्न के बाद भी भगवान भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुए तो नारद के कहने पर कामदेव को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा गया। कामदेव ने शंकर को रिझाने के लिए कई यत्न किए थे लेकिन भगवान शंकर ने रुष्ट होकर कामदेव को ही जला दिया ऐसे में संसार का सृजन चक्र ही रुक गया। रति ने अपने पति को जीवित करने के लिए भगवान को मनाया और कामदेव नि:शरीर जीवित हो गए। इस खुशी में भी होली मनाई जाती है।

हिरण्यकश्यपु की कहानी भी इससे जुड़ी हुई है। लाख मना करने पर भी प्रह्लाद ने भगवान विष्णु का नाम जपना नहीं छोड़ा। उधर हिरण्यकश्यपु भी महान प्रतापी था, उसने भगवान ब्रह्मा एवं शिव से ऐसे वरदान माँग रखे थे कि उसे कोई सामान्य नर, नारी, पशु या पक्षी कोई भी मार नहीं सकता था। ऐसी स्थिति में भगवान नृसिंह को उग्र रूप धारण करके विशेष समय, परिस्थिति और रूप में अवतरित हो कर भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए आना पड़ा।

कृष्ण और राधा की अनेक कथाओं के साथ होली और वसंतोत्सव के वर्णन मिलते हैं। गोकुल की ग्वालिनें अपने आराध्य कान्हा को रिझाने के लिए अनेक लीलाएँ रचा करती थी जिसमें रंग, गुलाल और जल क्रीडाएँ शामिल थीं। एक अन्य किंवदंती के अनुसार पूतना राक्षसी के वध की खुशी में भी होली मनाई जाती है। कृष्ण की जन्म और कर्म भूमि मथुरा वृंदावन ब्रज बरसाने और गोकुल में आज भी होली की धूम देखते ही बनती है।

होली के पर्व का सुंदर विवरण संस्कृत में दशकुमार चरित एवं गरूड पुराण में तथा हर्ष द्वारा रचित नाटक रत्नावली (जो सातवीं सदी में लिखा गया था) में मिलता है। उस समय इसे वसंतोत्सव के रूप में मदनोत्सव के रूप में मनाते थे। भवभूति, कालिदास आदि ने भी अपने महाकाव्यों में रंग रंगीली होली के बारे में दत्त चित्त हो कर वर्णन किया है।

होली पर अलग-अलग स्थान पर अपने किस्म की निराली परम्पराएं देखी  जा सकती हैं। मालवा में होली के दिन लोग एक दूसरे पर अंगारे फैंकते हैं। उनका विश्वास है कि इससे होलिका नामक राक्षसी का अंत हो जाता है। पंजाब और हरियाणा में होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। इसीलिए दशम गुरू गोविंद सिंह जी ने होली के लिए  होला महल्ला शब्द का प्रयोग किया। गुरु जी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे। होला महल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छ: दिन तक चलता है। 

राजस्थान में भी होली के विविध रंग देखने में आते हैं। बाड़मेर में पत्थर मार होली खेली जाती है तो अजमेर में कोड़ा अथवा सांतमार होली कजद जाति के लोग बहुत धूम-धाम से मनाते हैं। राजस्थान के सलंबूर कस्बे में आदिवासी 'गेर' खेल कर होली मनाते हैं। जब युवक गेरनृत्य करते हैं तो युवतियाँ उनके समूह में सम्मिलित होकर फाग गाती हैं। युवतियाँ पुरुषों से गुड़ के लिए पैसे माँगती हैं। इस अवसर पर आदिवासी युवक-युवतियाँ अपना जीवन साथी भी चुनते हैं।

मध्य प्रदेश के भील होली को भगौरिया कहते हैं। शांति निकेतन में होली अत्यंत सादगी और शालीनतापूर्वक मनाई जाती है। प्रात: गुरु को प्रणाम करने के पश्चात अबीर गुलाल का उत्सव, जिसे 'दोलोत्सव' कहा जाता है, मनाते हैं। पानी मिले रंगों का प्रयोग नहीं होता। सायंकाल यहाँ रवींद्र संगीत की स्वर लहरी सारे वातावरण को गरिमा प्रदान करती है। भारत के अन्य भागों से पृथक बंगाल में फाल्गुन पूर्णिमा पर कृष्ण प्रतिमा का झूला प्रचलित है। इस दिन श्री कृष्ण की मूर्ति को एक वेदिका पर रख कर सोलह खंभों से युक्त एक मंडप के नीचे स्नान करवा कर सात बार झुलाने की परंपरा है।

मणिपुर में होली का पर्व 'याओसांग' के नाम से मनाया जाता है। यहाँ दुलेंडी वाले दिन को 'पिचकारी' कहा जाता है। याओसांग से अभिप्राय उस नन्हीं-सी झोंपड़ी से है जो पूर्णिमा के अपरा काल में प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है। इसमें चैतन्य महाप्रभु की प्रतिमा स्थापित की जाती है और पूजन के बाद इस झोंपड़ी को होली के अलाव की भाँति जला दिया जाता है। इस झोंपड़ी में लगने वाली सामग्री ८ से १३ वर्ष तक के बच्चों द्वारा पास पड़ोस से चुरा कर लाने की परंपरा है। याओसांग की राख को लोग अपने मस्तक पर लगाते हैं और घर ले जा कर तावीज़ बनवाते हैं। 'पिचकारी' के दिन रंग-गुलाल-अबीर से वातावरण रंगीन हो उठता है। बच्चे घर-घर जा कर चावल सब्ज़ियाँ इत्यादि एकत्र करते हैं। इस सामग्री से एक बड़े सामूहिक भोज का आयोजन होता है।

प्राचीन काल से अविरल होली मनाने की परंपरा को मुगलों के शासन में भी अवरुद्ध नहीं किया गया बल्कि कुछ मुगल बादशाहों ने तो धूमधाम से होली मनाने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया।  मुगल काल में होली के अवसर पर लाल किले के पिछवाड़े यमुना नदी के किनारे और जहाँ आरा के बाग में होली के मेले भरते थे। इसी तरह होली विश्व के कोने-कोने में उत्साहपूर्वक मनाई जाती है। भारत में यह पर्व अपने धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक पक्षों के कारण हमारे संपूर्ण जीवन में रच बस गया है। यह पर्व स्नेह और प्रेम से प्राणी मात्र को उल्लसित करता है। इस पर्व पर रंग की तरंग में छाने वाली मस्ती जब तक मर्यादित रहती है तब तक आनंद से वातावरण को सराबोर कर देती है। सीमाएँ तोड़ने की भी सीमा होती है और उसी सीमा में बँधे मर्यादित उन्माद का ही नाम है होली।

होली का रंग-बिरंगा त्योहार हमारे देश का सबसे लोकप्रिय और प्रचलित त्योहार है। वस्तुत: यह त्यौहार मनाया जाने वाला उतना नहीं हैं, जितना कि खेला जाने वाला है। घर-घर और गली मोहल्लों में यह रंगीन त्यौहार इस प्रकार मुखरित होता है कि बच्चों से लेकर बुढ्ढ़े, नर-नारियों तक होली के रंग में सराबोर हो जाते हैं – इन रंग-बिरंगे चेहरों में हमारी भारतीय संस्कृति तथा हमारा भारतीय जीवन दर्शन मुखरित होता है। रंगों की अनेकता में हमारी सांस्कृतिक और दार्शनिक एकता का स्वरूप निहित है।

होली पर प्रयोग में आने वाला दूसरा रंग पीला होता है। प्राचीन काल में भारत में टेसू के फूलों से बनाया जाने वाला पीला रंग प्रचलित था। पीला रंग ज्ञान का प्रतीक है।ज्ञान हमारे मानसिक विकास का अग्रदूत है। ज्ञान हमें हमारे वास्तविक अस्तित्व का बोध कराता है और इंगित कराता है कि हमारे लिए क्या भला है और क्या बुरा? ज्ञान का प्रकाश अपार और अपरिमित होता है। खेतों में फूली हुई पीली सरसों हमारी समृद्धि के स्वप्न का केंद्र बिंदु है। पीला रंग पौरुष, शौर्य और निर्भीकता का भी परिचायक है। 

हरा रंग हमारी समृद्धि का परिचायक है। वर्षा काल में धरती पर दिखाई देने वाली हरियाली वृक्षावलियाँ प्रकृति की समृद्धि का आधार हैं। समृद्धि में ही विकास छिपा है और विकास में निहित है जीवन का अग्रगामी प्रगतिशील सोपान। शुभ और मांगलिक पर्वों पर हरे रंगों का प्रयोग हमारी अनादि संस्कृति का आधार है। घर में किसी नवजात शिशु के जन्म पर जच्चा हरी चूडियाँ पहनती हैं तथा अपनी और अपने शिशु की समृद्धि की कामना करती हैं।  हरा रंग मन के लिए लुभावना और आँखों के लिये सुखद लगता है। होली का हरा रंग समृद्धि का प्रतिनिधि माना जाता है।

रंगी गुलाल मे मिली हुई चमकती अबीर अपनी सफ़ेदी के कारण बड़ी भली लगती है। सफ़ेद रंग सतोगुण का प्रतीक है । पवित्रता का आधार है सदाचार जो जीवन को निर्मल बनाता है। निर्मलता हमें सत्कार्यों के लिए प्रेरणा देती है। सत्कार्य जीवन की विशाल उज्ज्वलता की नींव होते हैं। उज्ज्वलता हमारी महानता का सूचक हैं, महानता में ही अपार धैर्य व कर हम अपनी और अपने देश की ओर से शांति की कामना अभिव्यक्त करते हैं। शांति की इसी कामना की भूमि में सहअस्तित्व का बीजारोपण होता है, जिसमें पवित्रता, शांति, स्वच्छता, निर्मलता और सदाचार के सतोगुणी वृक्ष पुष्पपित एवं पल्लवित होते हैं।

अत: हम होली के इस पावन पर्व पर रंग-बिरंगे अबीर और गुलाल उड़ाकर तथा एक – दूसरे पर रंग डालकर आपस में परस्पर प्रसन्नता, शक्ति, ज्ञान, समृद्धि व शांति की कामना करते हैं। यह होली का एक अव्यक्त दार्शनिक पक्ष है,जो हमारे इस सांस्कृतिक पर्व के अवसर पर हमारे समक्ष साकार अवतरित होता है। हाँ,त्यौहार की खुशियों के साथ हमारे कुछ सामाजिक कर्तव्य भी हैं, जिन्हें अवश्य याद रखना चाहिए। हमारी संस्कृति में ही जल को देवता माना गया है. हम जल की पूजा करते हैं. जल के बिना हमारा कोई धार्मिक अनुष्ठान संपन्न नहीं होता. जल के प्रति श्रद्धा हमारे संस्कारों में है, इसलिए जल संरक्षण का ध्यान भी रखा जाना चाहिए।
     
होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते है। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह अश्लील गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। ऐसे प्रयत्नों में सब को साथ देना होगा। 

निराला जी इस ऋतु में झूमकर कहते हैं –

हँसी के तार के होते हैं ये बहार के दिन।
हृदय के हार के होते हैं ये बहार के दिन।

हवा चली, गले खुशबू लगी कि वे बोले,
समीर-सार के होते हैं ये बहार के दिन।

और यह भी कि हमारी छत्तीसगढ़ी 'भाखा' भी तो होली पर झूमती-गाती कह उठती है –  

मन डोलय रे मांघ फगुनवा
रस घोलय रे मांघ फगुनवा
राजा बरोबर लगे मौर आमा
रानी सही परसा फुलवा
मन डोलय रे मांघ फगुनवा
रस घोलय रे मांघ फगुनवा
रस घोलय रे मांघ फगुनवा
हो मन डोलय रे मांघ फगुनवा

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प्राध्यापक,दिग्विजय पीजी कालेज,
राजनांदगांव। मो.9301054300 

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नौंवी कक्षा की छात्रा का आविष्कार नई जिंदगी देगा विकलांगों को

पटना की शालिनी कुमारी के एक इनोवेटिव आइडिया ने उसकी जिंदगी बदल दी है। मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली शालिनी के आइडिया पर आधारित आविष्कार अगले महीने बाजार में उतरने जा रहा है, जिससे उसे लाखों की कमाई होने की उम्मीद है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित इनोवेशन फेस्टेवल के दौरान शालिनी के आइडिया पर नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (एनआईएफ) की तरफ से तैयार किए गए एडजस्टेबल वॉकर को भी प्रदर्शित किया गया है। शालिनी ने 2011 में यह आइडिया सुझाया था तब वह हार्टमैन गर्ल्स स्कूल की नौवीं कक्षा की छात्रा थी। उसके दादा को दुर्घटना में चोट लगने के कारण चलने-फिरने में दिक्कत होती थी और वे वॉकर इस्तेमाल करते थे। लेकिन वे वॉकर से सीढिम्यां नहीं चढ़ पाते।

शालिनी ने इस समस्या का समाधान खोजा। उसने एक ऐसे वॉकर की कल्पना की जिसकी आगे की दो टांगे छोटी-बड़ी की जा सकती हों। उसने इसका डिजाइन तैयार किया और एनआईएफ की आइडिया प्रतियोगिता इग्नाईट में भेजा। उसे दो लाख रुपये का पहला पुरस्कार मिला। इसके बाद शालिनी के आइडिया पर एडजेस्टबल वॉकर तैयार किया गया।

पिछले साल यह तकनीक जब एनआईएफ ने नागपुर की एक कंपनी कबीरा सोल्यूशन को सौंपी गई तो तकनीक के आविष्कार के लिए शालिनी को एकमुश्त दो लाख की राशि प्रदान की गई। शालिनी और कंपनी के बीच हुए समझौते के तहत भविष्य में हर वॉकर की बिक्री पर कंपनी उसे सौ रुपये बतौर रायल्टी देगी। एनआईएफ के अनुसार कंपनी सात अप्रैल को वॉकर को व्यावसायिक रूप से बाजार में उतारने जा रही है। पहले चरण में दस हजार वॉकर उतारे जा रहे हैं। जिनकी बिक्री से शालिनी को दस लाख रुपये और मिलेंगे। बता दें कि सात मार्च को जब राष्ट्रपति ने जमीन से जुड़े आविष्कारकों को सम्मानित किया था तो उन्हें भी 25 हजार रुपये का सांतवना पुरस्कार दिया गया था। यह वॉकर जहां बुजुर्गों, बीमार लोगों के जीवन को बदल देगा वहीं शालिनी के करियर को भी इससे नया आयाम मिला है।

मेरे दिमाग में चल रहे हैं कई अनोखे आइडिया
राष्ट्रपति भवन में शालिनी ने बताया कि उसके मन में ऐसे कई और अनोखे आइडिया घूम रहे हैं। मसलन, वह बसों में सफर के दौरान छूट जाने वाले यात्रियों को खोजने के लिए कोई तकनीक विकसित करना चाहती हैं। लेकिन अभी वह अपना सारा ध्यान प्री-मेडिकल परीक्षा की तैयारी में दे रही है। ताकि अपने डॉंक्टर बनने के सपने को साकार कर सके।

-साभार- http://www.livehindustan.com/ से 

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फिल्मी दुनिया के इन गौभक्षियों को पहचानो

समाचार एजेंसी भाषा ने खबर दी है कि  फरहान अख्तर, आयुष्मान खुराना और रिचा चड्ढा समेत कई बॉलिवुड हस्तियों ने महाराष्ट्र में बीफ पर लगी पाबंदी का विरोध  करते हुए सोमवार को इसे 'मानवाधिकारों का उल्लंघन' बताया। राज्य में गोहत्या पर पाबंदी लगाने से जुड़ा बिल कई साल से अटका हुआ था। इसे सोमवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंजूरी दे दी।

फिल्म डायरेक्टर ओनिर ने ट्विटर पर लिखा कि बीफ पर पाबंदी मानवाधिकारों का उल्लंघन है। मैं क्या खाऊं, यह सरकार तय नहीं कर सकती। लगता है कि भारत का 'लोकतांत्रिक' संविधान विविधता सुनिश्चित नहीं करता। बीफ पर पाबंदी इसका निराशाजनक परिचायक है। रिचा चड्ढा ने कहा कि मैं शाकाहारी हूं लेकिन गोमांस पर पाबंदी सांप्रदायिक राजनीति है।

स्टैंड अप कमीडियन वीर दास ने राजनेताओं पर निशाना साधते हुए कहा, 'प्रिय सरकार आइए, बीफ के साथ दांतों पर बैन लगाते हैं। हम उबली सब्जियों पर जी सकते हैं और इस तरह आपके नेता नफरत फैलाने वाला भाषण नहीं दे सकेंगे।' ऐक्टर रणवीर शौरी ने ट्विटर पर लिखा कि खाने पर पाबंदी लगाना बंद करें। शुक्रिया।

फरहान अख्तर ने ट्वीट किया – तो अब महाराष्ट्र में आपको किसी से शिकायत (बीफ) हो सकती है लेकिन आप किसी के साथ बीफ खा नहीं सकते (यू कैन हैव बीफ (शिकायत) विद समवन, बट यू कांट हैव बीफ विद समवन)।

आयुष्मान खुराना ने विशाल भारद्वाज की फिल्म 'कमीने' के तोतले किरदार से प्रेरणा लेते हुए लिखा, 'बीफ फाल बाद 'कमीने'।' 'कमीने' फिल्म में शाहिद कपूर का किरदार स को फ बोलता था।

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कश्मीरः इतिहास में अटकी सूईयां

 

 
  कश्मीर में भाजपा ने जिस तरह लंबे विमर्श के बाद पीडीपी के साथ गठबंधन की सरकार बनाई, उसकी आलोचना के लिए तमाम तर्क गढ़े जा सकते हैं। किसी भी अन्य राजनीतिक दल ने ऐसा किया होता तो उसकी आलोचना या निंदा का सवाल ही नहीं उठता, किंतु भाजपा ने ऐसा किया तो महापाप हो गया। यहां तक कि कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी लग रहा है कि भाजपा के इस कदम से डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा को ठेस लगी होगी।

   यह समझना बहुत मुश्किल है कि भाजपा जब एक जिम्मेदार राजनीतिक दल की तरह व्यवहार करते हुए विवादित सवालों से किनारा करते हुए काम करती है तब भी वह तथाकथित सेकुलर दलों की निंदा की पात्र बनती है। इसके साथ ही जब वह अपने एजेंडे पर काम कर रही होती है, तब भी उसकी निंदा होती है। यह गजब का द्वंद है, जो हमें देखने को मिलता है। अगर डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सम्मान और 370 की चिंता भाजपा को नहीं है तो उमर या फारूख क्या इस सम्मान की रक्षा के लिए आगे आएंगें? जाहिर तौर पर यह भाजपा को घेरने और उसकी आलोचना करने का कोई मौका न छोड़ने की अवसरवादी राजनीति है। क्यों बार-बार एक ऐसे राज्य में जहां भाजपा को अभी एक बड़े इलाके की स्वीकृति मिलना शेष है कि राजनीति में उससे यह अपेक्षा की जा रही है कि वह इतिहास को पल भर में बदल देगी।

साहसिक और ऐतिहासिक फैसलाः
    भाजपा का कश्मीर में पीडीपी के साथ जाना वास्तव में एक साहसिक और ऐतिहासिक फैसला है। यह संवाद के उस तल पर खड़े होना है, जहां से नई राहें बनाई जा सकती हैं। भाजपा के लिए कश्मीर सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, एक भावनात्मक विषय है। भाजपा के पहले अध्यक्ष(तब जनसंघ) ने वहां अपने संघर्ष और शहादत से जो कुछ किया वह इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। भाजपा के लिए यह साधारण क्षण नहीं था, किंतु उसका फैसला असाधारण है। सरकार न बनाना कोई निर्णय नहीं होता। वह तो इतिहास के एक खास क्षण में अटकी सूइयों से ज्यादा कुछ नहीं है। किंतु साहस के साथ भाजपा ने जो निर्णय किया है, वह एक ऐतिहासिक अवसर में बदल सकता है। आखिर कश्मीर जैसे क्षेत्र के लिए कोई भी दल सिर्फ नारों और हुंकारों के सहारे नहीं रह सकता। इसीलिए संवाद बनाने के लिए एक कोशिश भाजपा ने चुनाव में की और अभूतपूर्व बाढ़ आपदा के समय भी की। यह सच है कि उसे घाटी में वोट नहीं मिले, किंतु जम्मू में उसे अभूतपूर्व समर्थन मिला। यह क्षण जब राज्य की राजनीति दो भागों में बंटी है, अगर भाजपा सत्ता से भागती तो वहां व्याप्त निराशा और बंटवारा और गहरा हो जाता। भाजपा ने अपने पूर्वाग्रहों से परे हटकर संवाद की खिड़कियां खोलीं हैं। अलगाववादी नेता स्व.अब्दुल गनी लोन के बेटे सज्जाद लोन को अपने कोटे से मंत्री बनवाया है। यह बात बताती है कि अलगाववादी नेता भी लोकतंत्र का हमसफर बनकर इस देश की सेवा कर सकते हैं।

यहां पराजित हुआ है पाक का द्विराष्ट्रवादः
  कश्मीर की स्थितियां असाधारण हैं। पाकिस्तान का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत कश्मीर में ही पराजित होता हुआ दिखता है। हमने सावधानी नहीं बरती तो कश्मीर का संकट और गहरा होगा। आज सेना के सहारे देश ने बहुत मुश्किलों से घाटी में शांति पाई है। कश्मीर का इलाज आज भी हमारे पास नहीं है। देश के कई इलाके इस प्रकार की अशांति से जूझ रहे हैं किंतु सीमावर्ती कश्मीर में पाक समर्थकों की उपस्थिति और पाकिस्तान के समर्थन से हालात बिगड़े हुए हैं। कश्मीर के लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़े बिना यहां कोई पहल सफल नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को जानते हैं कि वहां के लोगों की स्वीकृति और समर्थन भारत सरकार के लिए कितनी जरूरी है। हमारे पहले प्रधानमंत्री की कुछ रणनीतिक चूकों की वजह से आज कश्मीर का संकट इस रूप में दिखता है। ऐसे में भाजपा का वहां सत्ता में होना कोई साधारण घटना और सूचना नहीं है। घाटी और जम्मू के बेहद विभाजित जनादेश के बाद दोनों दलों की यह नैतिक जिम्मेदारी थी कि वे अपने-अपने लोगों को न्याय दें। केंद्र की सत्ता में होने के नाते भाजपा की यह ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी थी।

उन्हें क्यों है 370 पर दर्दः
जिन लोगों को 370 दर्द सता रहा है वे दल क्या भाजपा के साथ 370 को हटाने के लिए संसद में साथ आएंगें, जाहिर तौर पर नहीं। फिर इस तरह की बातों को उठाने का फायदा क्या है। इतिहास की इस घड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐतिहासिक अवसर मिला है, जाहिर है वे इस अवसर का लाभ लेकर कश्मीर के संकट के वास्तविक समाधान की ओर बढ़ेंगें। संवाद से स्थितियां बदलें तो ठीक अन्यथा अन्य विकल्पों के लिए मार्ग हमेशा खुलें हैं। देश को एक बार कश्मीर के लोगों को यह अहसास तो कराना होगा कि श्रीनगर और दिल्ली में एक ऐसी सरकार है जो उनके दर्द को कम करना चाहती है। जिसके लिए ‘सबका साथ-सबका विकास’ सिर्फ नारा नहीं एक संकल्प है। यह अहसास अगर गहरा होता है, घाटी में आतंक को समर्थन कम होता है, वहां अमन के हालात लौटते हैं और सामान्य जन का भरोसा हमारी सरकारें जीत पाती हैं तो स्थितियां बदल सकती हैं। आज कश्मीर के लोग भी भारत में होने और पाकिस्तान के साथ होने के अंतर को समझते हैं।
    
कोई भी क्षेत्र अनंतकाल तक हिंसा की आग में जलता रहे तो उसकी चिंताएं अलग हो जाती हैं। भारत सरकार के पास कश्मीर को साथ रखना एकमात्र विकल्प है। इसलिए उसे समर्थ और खुशहाल भी बनाना उसकी ही जिम्मेदारी है। 370 से लेकर अन्य स्थानीय सवालों पर विमर्श खड़ा हो, उसके नाते होने वाले फायदों और नुकसान पर संवाद हो। फिर लोग जो चाहें वही फैसला हो, यही तो लोकतंत्र है। भाजपा अगर इस ओर बढ़ रही है तो यह रास्ता गलत कैसे है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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24 लेखकों को साहित्य अकादेमी पुरस्कार

साहित्य अकादमी की हीरक जयंती के मौके पर  24 भाषाओं के लेखकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। कमानी सभागार में हुए आयोजन में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ त्रिपाठी ने अलग-अलग भाषाओं के लेखकों को सम्मानित किया।

सम्मानित किए जाने वाले साहित्यकारों में उर्दू के लिए लोकप्रिय शायर मुनव्वर राणा, हिन्दी के उपन्यासकार रमेशचंद्र शाह, कश्मीर के कवि शाद रमजान, संस्कृत के लिए प्रभुनाथ द्विवेदी, मैथिली के लिए आशा मिश्रा, पंजाबी के लिए जसविंदर, मराठी के लिए जयंत विष्णु नार्लीकर और अंग्रेजी के आदिल जसावाला प्रमुख थे।

समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार केदारनाथ सिंह थे। साल 2014 के लिए दिए गए इन पुरस्कारों की घोषणा दिसंबर में की गई थी। 
इस पुरस्कार के तहत एक ताम्र पत्र, एक शॉल और एक लाख रुपये का चेक दिया जाता है। इसके साथ ही रविंद्र भवन में 14 मार्च तक चलने वाले साहित्योत्सव का शुभारंभ हो गया। इस दौरान अलग-अलग भाषाओं के जाने में माने लेखक, कवि पाठकों से रूबरू होंगे। कार्यक्रम के कई सत्र में युवा लेखक और कवि अपनी रचनाओं का पाठ भी करेंगे। अंतिम दिन बच्चों के लिए ‘आओ कहानी बुनें’ का भी आयोजन किया जाएगा।

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अरविंद केजड़ीवाल अब संघम शरण गच्छामि

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के अज्ञातवास के बारे में अभी तक किसी को साफ तौर पर जानकारी नहीं मिल पाई है, लेकिन आम आदमी पार्टी में मचे सियासी घमासान के बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अगले कुछ दिनों तक बेंगलुरु में गार्डेन सिटी में अपनी सेहत का ख्याल रखते नजर आएंगे। केजरीवाल इलाज के सिलसिले में 5 मार्च को बेंगलुरु आ रहे हैं। आम आदमी पार्टी के भीतर चल रही उठापटक के बीच 4 मार्च को दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है और इसके बाद केजरीवाल बेंगलुरु के लिए रवाना हो जाएंगे।

केजरीवाल कफ, अस्थमा और डायबिटीज की समस्या से परेशान हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर वह बेंगलुरु के स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधानम संस्था (एसव्यासा) में इलाज के लिए जा रहे हैं। दिल्ली पुलिस के एक समारोह में पिछली बार हुई मुलाकात में मोदी ने उन्हें यहां इलाज कराने की सलाह दी थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता एच वी शेषाद्रि के रिश्तेदार और नासा के पूर्व साइंटिस्ट डॉ एच आर नागेंद्र एसव्यासा के हेड हैं।

यह संस्था इससे पहले गुजरात सरकार के लिए नियमित तौर पर योग शिविर का आयोजन करती रही है। नागेंद्र ने बताया, 'प्रधानमंत्री मोदी की सलाह के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल से मेरी बातचीत हुई थी। उन्होंने संभावित ट्रीटमेंट को लेकर कई सवाल पूछे। इलाज के दौरान उन्हें योग, क्रिया के अभ्यास के अलावा डॉक्टरों की सलाह पर कुछ दवाओं का सेवन करना होगा।'
नागेंद्र ने कहा, 'सामान्य तौर पर हमारा ट्रीटमेंट कुछ हफ्तों तक चलता है। इस दौरान संबंधित व्यक्ति को सुबह जल्दी उठने के साथ सात्विक जीवनशैली को अपनाना होता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास समय की कमी है, इसलिए उन्हें उपचार के बीच काम करने की अनुमति होगी।'

उन्होंने कहा, 'हमने उन्हें इस बात का भरोसा दिया है कि डॉक्टरों की टीम उनका ख्याल रखेगी और इलाज के दौरान उन्हें थोड़ा काम करने की अनुमति होगी।' नागेंद्र ने कहा, 'हम उनका इंतजार कर रहे हैं।' दिल्ली में केजरीवाल को राजनीतिक घमासान से जूझना पड़ रहा है और ऐसे में उन्हें बेंगलुरु में थोड़े दिनों के लिए सही, इससे दूर रहने का मौका मिलेगा और वह अपनी सेहत पर ध्यान दे पाएंगे।

साभार-इकॉनामिक टाईम्स से. 
कौन हैं डॉ. नगेंद्र पढ़िये ये रिपोर्ट 

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दंग रह गई अमृता फडणवीस, जब दादी-नानी का रैंप वॉक देखा

मुंबई। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी श्रीमती अमृता देवेंद्र फडणवीस ने जब अपनी दादी और नानी की उम्र की महिलाओं को रैंप वॉक करते देखा तो वे भी उम्रदराज महिलाओं के उत्साह को हैरत भरी नजरों से देख दंग रह गईं। बीजेपी एवं लोढ़ा फाउंडेशन द्वारा महिलाओं की उद्यमवृत्ति को विकसित करने के प्रयास स्वरूप दो दिवसीय कार्यक्रम का उदघाटन करने आईं श्रीमती अमृता फडणवीस ने कहा कि नारी शक्ति को आगे लाने के लिए अपनी तरह का यह सबसे अलग आयोजन है। इस अवसर पर ‘बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ’ मिशन के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में एक लाख रुपए के सहयोग का चैक उन्हें सौपा गया। ऑपेरा हाउस स्थित डायमंड मार्केट लेन में आयोजित इस आयोजन में करीब दस हजार से भी ज्यादा महिलाओं ने हिस्सा लिया। महिला दिवस पर मुंबई में सबसे ज्यादा महिलाओं की सहभागिता का यह सबसे बड़ा आयोजन रहा।

एक तरफ उम्रदराज महिलाएं जोश और जज्बे के साथ रैंप पर चलते हुए वक्त के साथ कदमताल करने के हौसले का प्रदर्शन कर रही थीं, तो दूसरी ओर आयोजन स्थल पर युवतियों द्वारा राष्ट्रभक्ति के परंपरागत गीतों की ताल पर बज रहे ढोल की गूंज लोगों के पांवों को थिरकने को मजबूर कर रही थी। बीजेपी की ओर से जिलाध्यक्ष सिद्धार्थ गमरे एवं लोढ़ा फाउंडेशन की ओर से श्रीमती शीतल लोढ़ा सहित ताड़देव की नगरसेवक श्रीमती सरिता पाटिल एवं वालकेश्वर की नगरसेवक श्रीमती ज्योत्सनाबेन मेहता ने श्रीमती अमृता फडणवीस का अभिनंदन किया। मलबार हिल के विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा के मुताबिक महिला व्यापार पेठ की सारी आय मुख्यमंत्री सहायता कोष में प्रदान की जाएगी। 

विधायक लोढ़ा ने इस आयोजन की सफलता में सहभागी सभी संस्थाओं एवं महिलाओं का आभार जताया है। महिला सशक्तिकरण के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में महिला व्यापार पेठ के में 50 से भी ज्यादा महिला संस्थाओं द्वारा गृह उद्योग निर्मित व अन्य वस्तुओं की दो दिवसीय सेल व प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। मुंबई में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित इस सबसे विशाल आयोजन में करीब 6500 से भी ज्यादा महिलाओं ने होम मिनिस्टर, बेस्ट ड्रेस एवं कुकिंग कॉम्पीटिशन आदि प्रतियोगिताओं में भीग लेकर एक रिकॉर्ड कायम किया। करीब 1500 से भी ज्यादा दादी – नानी की ऊम्र की महिलाओं का रैंप वॉक इस आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण रहा। इस दो दिवसीय आयोजन में दस हजार से भी ज्यादा महिलाएं शामिल हुईं।

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सतीश कौशिक अब आलसी महाराजा

 फिल्‍म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता सतीश कौशिक के सितारे इन दिनों काफी अच्‍छे चल रहे हैं। सतीश कौशिक का कहना है कि यह साल उनके लिए काफी अच्‍छा जा रहा है। कौशिक ने फिल्‍म निर्माण के व्‍यस्‍त शेड्यूल में से समय निकालकर कई अन्‍य प्रोजेक्‍ट साइन किए हैं। सतीश कौशिक 16 साल बाद छोटे पर्दे पर वापसी कर रहे हैं। इसके तहत उनका शो  Sab TV पर सप्‍ताहांत में दिखाई देगा जिसमें नवाबों की दिनचर्या को हंसी मजाक के रूप में दिखाया जाएगा।

इसमें बताया जाएगा कि नवाब जंग बहादुर काल्‍पनिक दुनिया में खोये रहते हैं। अपने खराब स्‍वास्‍थ्‍य के कारण वह कोई काम नहीं करते हैं और वैभव में जीना जारी रखते हैं। ऐसे में धारावाहिक में छोटे-छोटे ऐसे कई सीन आते हैं जिसमें दर्शक खुद को मुस्‍कराने से नहीं रोक सकते हैं। ऐसे में यह धारावाहिक निश्चित रूप से लोगों को हंसने व गुदगुदाने में कोई कमी नहीं छोड़ेगा। टीवी पर अपनी वापसी को लेकर सतीश कौशिक काफी उत्‍साहित और आशान्वित हैं। सतीश कौशिक ने कहा, ‘मैंने कई कॉमेडी रोल किए हैं लेकिन अब मैं ऐसे रोल चुन रहा हूं जो वास्‍तविकता के करीब हों।

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भारतीय खाने का कोई मुकाबला नहीं

दुनिया में सबसे स्वादिष्ट भारतीय खाना है। आईआईटी जोधपुर की ओर से किए गए इस अध्ययन में दुनिया भर के ढाई हजार से ज्यादा व्यंजनों को परखा गया। अध्ययन में व्यंजनों में डाले जा रहे पदार्थ और उनके स्वाद की जांच की गई।
 
शोधकर्ताओं ने पाया कि पश्चिमी देशों के शेफ हर व्यंजन में व्हिस्की, सेब के रस, संतरे का रस और कच्चा मीट डाल देते हैं। हर व्यंजन का 50 फीसदी स्वाद तो इन्हीं में समाया होता है। इससे पश्चिमी लोगों के ज्यादातर खाने का स्वाद एक जैसा होता है।
 
इसके विपरीत हर भारतीय व्यंजन को बनाने का अलग तरीका और अलग मसाले होते हैं। इससे यहां हर व्यंजन का स्वाद बेमिसाल हो जाता है। भारत में हर व्यंजन बनाने का एक नियम होता है। इसके अलावा यहां इलाइची, लाल मिर्च, इमली और हल्दी जैसे मसालों का सबसे शानदार इस्तेमाल होता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक पश्चिमी व्यंजनों में डाले जाने वाले पदार्थो के स्वाद एक-दूसरे पर हावी हो जाते हैं जबकि भारतीय मसालों के साथ ऐसा कभी नहीं होता।

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इ्न्दौर के अग्रवाल समाज की अनुकरणीय पहल

मध्‍यप्रदेश के इंदौर में अग्रवाल महासभा द्वारा आयोजित तीन दिनी परिचय सम्मेलन में स्वस्थ व स्वच्छ शहर के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। आयोजन में डिस्पोजल ग्लास और प्लेटों का इस्तेमाल नहीं किया गया। आयोजकों के मुताबिक आयोजन में 15 हजार लोग शामिल होते हैं, जो करीब 60 हजार डिस्पोजल ग्लास व प्लेटों का प्रयोग करते हैं। इस बार इनका उपयोग नहीं किया गया। पानी के लिए समाजजनों ने तांबे के लोटे का उपयोग किया।

अभिनव कला समाज प्रांगण गांधी हॉल में स्वास्थ्य के मद्देनजर कोल्ड्रिंक की बजाए देसी शीतल पेय पदार्थों का इंतजाम किया गया था। महासभा के समन्वयक संतोष गोयल के अनुसार आयोजन के 22वें वर्ष में परिचय सम्मेलन स्वच्छ व स्वस्थ शहर की थीम पर आयोजित किया गया है। विवाह समारोह में सुधार की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को भी समाजजनों के बीच प्रचारित किया जा रहा है।

विवाह समारोह में 21 से कम व्यंजनों के प्रयोग के लिए समाजजनों को प्रेरित किया गया। सम्मेलन के दूसरे दिन भी बड़ी संख्या में समाजजनों का तांता लगा। मंच से करीब 400 प्रत्याशियों ने जीवनसाथी की तलाश की। परिचय देने वालों में अहमदाबाद, बड़ौदा, दाहोद, नागपुर, अकोला, जलगांव, जयपुर, उदयपुर, कोटा के प्रत्याशी शामिल थे। कई युवक-युवतियों ने कुंडली मिलान भी कराया।

विचार-विमर्श के लिए भी अभिभावक प्रत्याशियों का तांता लगा हुआ था। मंगलवार को अंतिम दिन सम्मेलन की शुरुआत सुबह 10.30 बजे होगी। अध्यक्ष मुरारीलाल गोयल, महामंत्री अजय बंसल, संयोजक रमेश तायल, एलबी अग्रवाल आदि मौजूद थे।

साभार: http://naidunia.jagran.com/ से 

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