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राष्ट्रीय जरूरत है अंधश्रद्धा उन्मूलन कानून : उपराष्ट्रपति

नई दिल्ली। 
राजकमल प्रकाशन के उपक्रम ‘सार्थक’ द्वारा प्रकाशित डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर की पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ‘अंधविश्वास उन्मूलन : विचार, आचार व सिंद्धांत’ के तीन खण्डों का लोकार्पण करते हुए उपराष्ट्रपति माननीय मो. हामिद अंसारी ने कहा कि, जिस तरह महाराष्ट्र में अंधविश्वास उन्मूलन कानून है, उसी तरह राष्ट्रीय स्तर पर इस कानून की जरूरत है। इस किताब की महत्ता को रेखांकित करते हुए उप राष्ट्रपति ने कहा कि, इसका अनुवाद सभी भारतीय भाषाओं में होना चाहिए और इसे स्कूल व कॉलेज के स्तर पर पढाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसी तरह के विचार की जरूरत नई पीढी को है। यदि हम आज से ही उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण देंगे तो इसका सुफल हमें भविष्य में मिलेगा।

महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति व राजकमल प्रकाशन समूह के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस लोकार्पण कार्यक्रम में बोलते हुए पुस्तक के संपादक डॉ. सुशील कुमार लवटे ने कहा कि, महाराष्ट्र में समाजसुधारकों की सुदीर्घ परंपरा रही है। यही कारण है महाराष्ट्र में प्रगतिशील विचार और कृति फलती-फूलती रही है।‘अंधविश्वास उन्मूलन: विचार, आचार व सिंद्धांत’ पुस्तक उसी का फल है। डॉ. नरेद्र दाभोलकर की पुत्री मुक्ता दाभोलकर ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि, दूसरे राज्यों के लोग भी हमारे पिताजी के कार्यों के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, इस दिशा में राजकमल प्रकाशन के सार्थक उपक्रम से प्रकाशित तीन खंडों में यह ग्रंथ लोगों को उनकी कार्य-संस्कृति को बताने में मददगार होगी।

इस मौके पर राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने बताया कि, उनका प्रकाशन हमेशा से सामाजिक सरोकारों की पुस्तकों का प्रकाशन करता रहा है। हमें खुशी है कि डॉ. दाभोलकर की पुस्तक हम प्रकाशित कर रहे हैं।

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए महाराष्ट्र अंधश्रद्धा उन्मूलन समिति के कार्याध्यक्ष अविनाश पाटिल ने कहा कि उनका मकसद है कि वे लोग उपराष्ट्रपति के सुझावों को आगे बढ़ाते हुए इस किताब को ज्यादा से ज्यादा भाषाओं में आम लोगों तक पहुंचाएंगे।

लोकार्पण समारोह में प्रख्यात हिन्दी आलोचक नामवर सिंह, ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गए मराठी के वरिष्ठ लेखक भालचंद्र नेमाड़े, गोरख थोराट व गांधी स्मृति दर्शन समिति की अध्यक्ष मणिमालाविशिष्ट उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का संचालन मुक्ता दाभोलकर ने किया।

 

संपर्क
आशुतोष कुमार सिंह
साहित्य प्रचार अधिकारी
राजकमल प्रकाशन समूह
मो. 9891228151
www.rajkamalprakashan.com

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वीर संघवी ने लिखा, क्यों फ्लॉप हैं राहुल गाँधी!

कांग्रेस में राहुल गांधी की भविष्य की भूमिका को लेकर हो रही चर्चा के बीच एक नई किताब में कहा गया है कि इस युवा नेता ने ‘उभरने में बहुत लंबा वक्त’ ले लिया। किताब में कांग्रेस के 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान को ज्ञात स्मृति में ‘सबसे खराब’ बताया गया है। वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी की भारत के हाल के राजनीतिक इतिहास पर आने वाली किताब ‘मेंडेट: विल ऑफ द पीपुल’ में 2004 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री पद ठुकराने और बड़े मुद्दों पर राहुल के ढुलमुल रवैये के कारण भाजपा को सत्ता के केंद्र में आने का रास्ता मिलने के बारे में लिखा गया है।
 
किताब में कहा गया है कि राहुल ने ‘उभरने में लंबा वक्त लगा दिया और जब उन्होंने ऐसा किया, तब यह स्पष्ट नहीं था कि वह मनमोहन सिंह की सरकार के साथ हैं या उसके खिलाफ।’ उन्होंने लिखा है कि ‘राहुल का प्रेस से दूर रहना और पहले इंटरव्यू में महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना रुख बताने से बचना, एक तरह से राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा था।’ इसके बाद पढ़े लिखे भारतीयों ने उनकी ओर देखना ही बंद कर दिया। ‘रही सही कसर, डीएवीपी शैली के खराब विज्ञापन अभियान अथवा दिशाहीन प्रकृति वाले कांग्रेस के अभियान ने पूरी कर दी।’
 
सोनिया का जिक्र करते हुए सांघ्वी ने लिखा है कि उनके लिए तार्किक यह होता कि वह मनमोहन सिंह को यूपीए दो के दौरान बीच में ही हटाने की कांग्रेस की मांग मान लेतीं। शायद वह मनमोहन के खुद इस्तीफा देने का इंतजार कर रही थीं। लेकिन वही मनमोहन, जिन्होंने कभी कहा था कि परमाणु करार पर पार्टी ने बहुमत से उनका साथ नहीं दिया तो वह पद छोड़ देंगे, कुर्सी से चिपके रहे जबकि उनकी लोकप्रियता गिरती जा रही थी। उन्होंने इस्तीफा देने पर विचार तक करने से इनकार कर दिया।
 
पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को हर उस कसौटी पर परखा गया जो उन्होंने अपने लिए 2009 में निर्धारित की थी। वह कांग्रेस के लिए एक ‘मुसीबत’ बन गए थे। शानदार पहले कार्यकाल के बाद मनमोहन भारतीय इतिहास के सबसे खराब पीएम साबित हुए। मनमोहन ने कहा था कि इतिहास उनके प्रति दयालु होगा। लेकिन सच कहूं, मुझे इस पर संदेह है। वह भारत की साख गिराने वाले व्यक्ति के तौर पर याद किए जाएंगे।
 
‘रहस्य’ की तरह हैं सोनिया
‘कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ‘रहस्य’ की तरह हैं। वह कांग्रेस को बचाने के लिए बेहद निजी माहौल से निकलकर राजनीति में आईं। कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की। लेकिन जब कांग्रेस में स्थितियां बिगड़ रही थीं तब वह कहां थीं? उनकी राजनीतिक सूझबूझ को क्या हो गया था? क्या उन्हें यह नहीं दिख रहा था कि कांग्रेस विनाश की ओर बढ़ रही है। कोई भी इन सवालों का उत्तर नहीं जानता है।’

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भक्तों ने 50 साल में इतना घी चढ़ा दिया कि 9 ‘कुएं’ भर गए

 मध्य प्रदेश के दतिया के विख्‍यात उनाव बालाजी सूर्य मंदिर में कुओं में जमा किया जाता है चढ़ावे का शुद्ध घी, रोजाना चढ़ता है करीब 17 किलो घी 

बूंद-बूंद से घड़ा भरना तो सभी ने सुना होगा, यहां तो कुएं भर गए। पानी से नहीं, शुद्ध घी से। एक-दो नहीं, पूरे नौ। मध्‍यप्रदेश के दतिया से 17 किमी दूर उनाव के बालाजी सूर्य मंदिर परिसर में यह देखा जा सकता है। यहां अखंड ज्योति के लिए भक्तों ने 50 साल में इतना घी चढ़ा दिया कि कुएं (हौदी) बनवाने पड़े। एक दिन में 8 किलो घी उपयोग होता है, जबकि एक दिन में 17 किलो से अधिक घी चढ़ावे में आता है। एक सप्ताह में यह घी सवा क्विंटल हो जाता है। हर साल 8 टन का भंडार हो जाता है। पहले एक कुआं बनाया गया, जब भर गया तो दूसरा। इस तरह पूरे नौ हो गए।

चार मौकों पर ही 4 टन का चढ़ावा

यहां शुद्ध घी चढ़ाने की परपंरा लगभग 400 वर्ष पहले मंदिर की स्थापना से शुरू हुई थी। मनोकामनाएं पूरी करने, कुष्ठ-चर्म रोग से मुक्ति, संतान एवं यश प्राप्ति के लिए लोग यहां घी चढ़ाते हैं। मकर संक्रांति, बंसत पंचमी, रंग पंचमी और डोल ग्यारस पर ही पूरे साल के बराबर घी चढ़ावे में आ जाता है। हर मौके पर भक्त 10 क्विंटल से ज्यादा घी चढ़ाकर जाते हैं। रविवार और बुधवार को ही भक्त एक क्विंटल से ज्यादा घी चढ़ा देते हैं।

प्रतिदिन 6 से 8 किलो घी से जलते हैं दीप

सूर्य मंदिर में अखंड ज्योति प्रज्जवलित होती है, जिसमें घी का इस्तेमाल होता है। मंदिर के अंदर भोलेनाथ, हनुमान जी सहित लगभग 15 देवी देवताओं के मंदिर है, जहां शाम के वक्त दीपक रखा जाता है। इस हिसाब से यहां प्रतिदिन 6 से 8 किग्रा शुद्ध घी का उपयोग होता है। ग्रहण व अन्य आयोजनों पर हवन आदि में भी इसी घी का इस्तेमाल किया जाता है।

मान्यता: गड़बड़ी की तो शाप

लोग मानते हैं कि घी के चढ़ावे में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी करने पर उन्हें शाप लगता है और कुष्ठ व चर्म रोग आदि बीमारियां हो जाती हैं। इसलिए मंदिर में आने वाले घी में गड़बड़ी नहीं होती।

जगह कम पड़ी तो कुएं में रखने लगे

पुजारी रामाधार पांडे के मुताबिक पहले जमीन में लोहे के टैंकर की तरह 7 फीट लंबाई-चौड़ाई और 8 फीट गहराई वाले 7 कुएं बनाए गए। इसके बाद मंदिर का प्राचीन कुआं भी घी से भर गया। इसके बाद खोदा गया 20 फीट गहरा व 10 फीट चौड़ा कुआं भी लगभग भर चुका है।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

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गोइन्का साहित्यिक पुरस्कार 2015 के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित

कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्री श्यामसुन्दर गोइन्का ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके वर्ष 2015 के लिए "बाबूलाल गोइन्का हिन्दी साहित्य पुरस्कार" एवं हिन्दीतर भाषी हिन्दी युवा लेखकों के लिए "प्रो. एन. नागप्पा युवा साहित्यकार पुरस्कार" (वय सीमा 35 वर्ष) तथा "रामनाथ गोइन्का पत्रकारिता शिरोमणि पुरस्कार" के साथ-साथ हिन्दी से तमिल व तमिल से हिन्दी एवं मलयालम से हिनदी व हिन्दी से मलयालम अनुवाद के लिए सद्य घोषित "बालकृष्ण गोइऩ्का अनूदित साहित्य पुरस्कार" के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित की हैं।

श्री गोइन्का जी ने जानकारी दी है कि अहिन्दी भाषी साहित्यकार यानी जिनकी मातृभाषा दक्षिण भारतीय भाषाओं में जैसें कन्नड़, मलयालम, तेलुगु, तमिल, तुलु, उड़िया अथवा कोंकणी में जो हिन्दी में मूल रूप से लिख रहे हैं, इन प्रतियोगिताओं में भाग ले सकते हैं। जो हिन्दी भाषी साहित्यकार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में 10 वर्षों या अधिक से हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं, वे भी इन पुरस्कारों के हकदार होंगे। ऐसे हिन्दी किंवा अहिन्दी भाषी दोनों इन पुरस्कारों के लिए अपनी प्रविष्टि भेज सकते हैं। प्रविष्टियां मिलने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल 2015 है।
नियमावली एवं पु्रस्ताव-पत्र के लिए हमारी वेब साइट www.kgfmumbai.com का अवलेकन करें। अधिक जानकारी के लिए बैंगलोर दूरभाष: 080-32005502 (कमलेश) इ-डाक : kgf@gogoindia.com या साधारण पत्र द्वारा संपर्क किया जा सकता है।

 

कमलेश यादव
(कार्यकारी सचिव, कमला गोइन्का फाउण्डेशन)
मो. 9620207976.

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मोदीजी के भाई ने मोर्चा खोला सरकार के खिलाफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी ये नहीं सोचा होगा कि उनकी सरकार के लिए एक फैसले का विरोध उनके अपने भाई ही कर देंगे। लेकिन ऐसा हुआ है। पीएम मोदीजी के छोटे भाई प्रह्लाद मोदी ने मुंबई के आजाद मैदान में प्रदर्शन किया। पीडीएस के मुद्दे पर केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ मोदी के भाई सड़क पर उतरे।
 
प्रह्लाद मोदी, ऑल इंडिया फेयर प्राइस शॉप डीलर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने न केवल केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ आवाज उठाई बल्कि अपने भाषण में सरकार पर जमकर निशाना भी साधा।
 
उन्होंने कहा कि पीडीएस नीति का फायदा गरीबों तक नहीं पहुंच रहा है। साथ ही इस मुद्दे पर संस्था ने दिल्ली के जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में भी आवाज बुलंद करने की योजना बनाई है। डीएस सिस्टम में अनाज और केरोसिन की आपूर्ति ठीक से नहीं होने और गरीबों तक इसका फायदा नहीं पहुंचने के खिलाफ ही संस्था ने आजाद मैदान में प्रदर्शन किया। 
 
इस मुद्दे पर प्रह्लाद मोदी ने कहा कि हां, मैं नरेंद्र मोदी का भाई हूं। लेकिन मैं इस संगठन से तब से जुडा़ हुआ हूं जब मोदी प्रधानमंत्री नहीं बने थे। मेरा प्रदर्शन मेरे भाई या प्रधानमंत्री के खिलाफ नहीं है। मैं केवल नीतियों और जरूरतमंदों की आवाज को बुलंद कर रहा हूं। 
 
दूसरी ओर संस्था के अध्यक्ष पुष्पराज देशमुख (काका) ने बताया कि उनकी संस्था 17 मार्च को दिल्ली के रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर विशाल प्रदर्शन करेगी। जिसमें इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया जाएगा। ऑल इंडिया फेयर प्राइस शॉप डीलर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष पुष्पराज देशमुख ने बताया कि इस प्रदर्शन के पीछे अहम वजह स्टॉक की आपूर्ति का है।
 
फूड सिक्योरिटी एक्ट के लागू होने के बाद से अनाज और केरोसिन की आपूर्ति पर बुरा असर पड़ा है। करीब 30 फीसदी का अंतर देखने को मिला है। साथ ही केरोसिन के दाम में भी अंतर आया है और इसके दाम बढ़ाकर वसूले जा रहे हैं।
 
प्रदर्शन के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से अपील की है कि वो प्रदेश की 1.77 करोड़ की आबादी के लिए जरूरी सब्सिडी की आपूर्ति की जाए। ये ऐसे लोग जो गरीबी रेखा के ऊपर हैं। उन्हें भी इस सब्सिडी का फायदा मिल सके।
 
साथ ही संस्था ने यूपीए सरकार की नीतियों के खिलाफ भी नाराजगी जताई और मोदी सरकार के इस पर सर्वेक्षण के बाद फैसला लेने की अपील की है।

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श्री मोहन भागवत ने गलत क्या कहा?

‘भागवत ने यह तो नहीं कहा कि मदर टेरेसा सेवा नहीं करती थीं या उनकी सेवा ढोंग थी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि उनकी सेवा के पीछे मुख्य भाव अभावग्रस्त लोगों को ईसाई बनाना था। इसमें भागवत ने गलत क्या कहा है?’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत के बयान पर हमारे कुछ सेक्युलरिस्ट बंधु काफी उखड़ गए हैं। मोहन भागवत ने ऐसा क्या कह दिया है? क्या उन्होंने मदर टेरेसा पर कोई आरोप लगाया है? क्या उनके बारे में कोई ओछी बात कही है? क्या उन्होंने कोई गलतबयानी की है? क्या उन्होंने तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा है? क्या उन्होंने मदर टेरेसा का चरित्र-हनन किया है? उन्होंने तो ऐसा कुछ नहीं किया है। उन्होंने सिर्फ एक तथ्यात्मक बयान दिया है, जिसे मैं 100 टंच की चांदी कह सकता हूं या 24 कैरेट का सोना कह सकता हूं। उसमें रत्तीभर भी मिलावट नहीं है। यदि मदर टेरेसा जीवित होती तो वे भी इस बयान से पूर्ण सहमत होतीं।
 
भागवत ने यह तो नहीं कहा कि मदर टेरेसा सेवा नहीं करती थीं या उनकी सेवा ढोंग थी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि उनकी सेवा के पीछे मुख्य भाव अभावग्रस्त लोगों को ईसाई बनाना था। इसमें भागवत ने गलत क्या कहा है? क्या वे लोगों को ईसाई बनने के लिए प्रेरित नहीं करती थीं? वे अपनी सेवाएं देने के लिए भारत ही क्यों आई? अमेरिका क्यों नहीं गईं? वे यूरोप में पैदा हुई थीं। यूरोप के ही किसी देश में क्यों नहीं गईं? स्वयं उनका अपना देश अल्बानिया यूरोप के पिछड़े हुए देशों में था। वे वहीं रहकर गरीबों की सेवा क्यों नहीं कर सकती थीं? उनका लक्ष्य गरीबों की सेवा नहीं था। उनका लक्ष्य गरीबों को ईसाई बनाना था। सेवा तो उस लक्ष्य को प्राप्त करने का एक साधन-भर थी। ये अलग बात है कि वह सेवा वे दिल लगाकर करती थीं।
 
यदि शुद्ध न्याय की दृष्टि से देखा जाए तो इस तरह की सेवा एक प्रकार की आध्यात्मिक रिश्वत है। आपने किसी की सेवा की याने आपने उसे अपनी सेवा दी और बदले में उसका धर्म ले लिया। इससे बड़ा सौदा क्या हो सकता है? मैं कहता हूं कि इससे बड़ी अनैतिकता क्या हो सकती है? जो धर्म आप पर लाद दिया गया है, उससे बड़ा अधर्म क्या है? पैसे या तलवार के जोर पर जो धर्म-परिवर्तन किया जाता है, उससे बढ़कर पाप-कर्म क्या हो सकता है? स्वयं इस धर्म-परिवर्तन को यदि ईसा मसीह देख लेते तो अपना माथा ठोक लेते। यदि कोई ईसा के व्यक्तित्व पर मुग्ध हो जाए, बाइबिल के पर्वतीय उपदेश से प्रेरित हो जाए, बाइबिल के दृष्टांतों से प्रभावित हो जाए और इसी कारण ईसाई बन जाए तो इसमें कोई बुराई नहीं है। ऐसे धर्म-परिवर्तन का मैं विरोध नहीं करुंगा। लेकिन विदेशी पादरी भारत क्यों आते हैं? सिर्फ इसलिए आते हैं कि यह उनकी सुरक्षित शिकार-भूमि है। मदर टेरेसा इसकी अपवाद नहीं थीं।
 
उन्हें आप नोबेल पुरस्कार दे दें या भारत रत्न दे दें या विश्व-रत्न दे दें, उससे क्या फर्क पड़ता है? किसी भी पुरस्कार या पद के कारण कोई झूठ, सच नहीं बन जाता। सच के सामने सभी पुरस्कार फीके पड़ जाते हैं। एक से एक अयोग्य लोगों को नोबेल पुरस्कार और भारत-रत्न पुरस्कार मिले हैं। इन पुरस्कारों को कवच बनाकर आप दिन को रात और रात को दिन नहीं बना सकते।
 
 (लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
 
(साभार: नया इंडिया)

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हर काम के लिए किसानों की जमीन ही क्यों छीनी जाती है

कई साल पहले का एक वाकया मुझे याद आता है। तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक वार्षिक कॉर्पोरेट पुरस्कार समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे। उनके संबोधन के बाद वक्त दर्शकों की ओर से सवाल उठाने का आया। उद्योगपति आनंद महिंद्रा खड़े हुए और उन्होंने एक सवाल पूछा। सवाल कुछ इस तरह था – मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, आईआईएम से स्नातक करने वाले एक युवा को आज के माहौल को किस तरह देखना चाहिए, खासकर यह जानते हुए कि मौजूदा माहौल व्यावसायिक जगत को आकर्षित करने वाला नहीं है? इस सवाल पर मनमोहन सिंह ने जो जवाब दिया, उसका सार यह था कि हम विशिष्ट जोन बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि युवा उद्यमियों को जरूरी लाभ और समर्थन मिल सके। विशेष आर्थिक जोन एक ऐसा विचार है, जिसका समय आ चुका है।

एसईजेड एक्ट 2005 में पारित किया गया था। तब इसको लेकर माहौल में इस कदर उत्साह था कि भूमि अधिग्रहण को लेकर सभी किसान आंदोलनों को बिना कुछ सोचे-विचारे खारिज कर दिया गया था। सात वर्ष बाद एसईजेड एक खराब विचार के रूप में सामने आया। अब एक आर्थिक प्रकाशन के अनुसार एसईजेड वह विचार है, जिसका समय कब का निकल चुका है। अपने देश में एसईजेड के नाम पर जो भूमि अधिग्रहीत की गई, उसका पचास प्रतिशत से अधिक हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका। जो कुछ हुआ भी, उससे रोजगार सृजन अथवा निर्यात बढ़ाने की दिशा में कोई लाभ हासिल नहीं हुआ। जिन एसईजेड को मंजूरी दी गई, उनमें से ज्यादातर रियल एस्टेट के लिए स्वर्ग बन गए हैं। उन्होंने उत्पादन क्रांति की दिशा में कोई योगदान नहीं दिया। इनका इस्तेमाल आईटी कंपनियों ने किया, ताकि उन्हें टैक्स में छूट का लाभ मिल सके। इसके लिए उन्हें बस अपने दफ्तर एसईजेड में स्थापित करने थे।

जून 2007 में संसद की एक स्थायी समिति ने 2005 से 2010 के बीच टैक्स रियायतों के चलते 1.75 लाख करोड़ के राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया था। 2007 से 2013 के बीच एसईजेड के कामकाज का विश्लेषण करने वाली कैग रिपोर्ट को पढ़ते ही पता चल जाता है कि एसईजेड घोटाला कितना बड़ा है। जिन 576 एसईजेड परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, उनमें से 392 ही अधिसूचित हुईं और उनमें भी केवल 170 में काम चल रहा है। मौजूदा एसईजेड में 48 प्रतिशत एसईजेड ही निर्यात गतिविधियों में लगे हुए हैं और 2013-14 में कुल निर्यात का केवल 3.8 प्रतिशत ही इन क्षेत्रों से आया।

एसईजेड के विकास के लिए कुल 45,635 हेक्टेयर जमीन अधिसूचित की गई, पर केवल 28,488 हेक्टेयर में ही वास्तविक कामकाज शुरू हुआ। इसका मतलब है कि 62 प्रतिशत जमीन का ही इस्तेमाल किया जा सका। कैग ने अपनी सख्त प्रतिक्रिया में कहा है कि सरकार द्वारा लोगों से जमीन का अधिग्रहण संपत्ति के ग्रामीण क्षेत्रों से कॉर्पोरेट दुनिया में स्थानांतरण का बड़ा जरिया बन रहा है। एक ओर पचास प्रतिशत अधिग्रहीत जमीन बिना इस्तेमाल के पड़ी हुई है तो दूसरी ओर तमाम डेवलपरों ने अन्य औद्योगिक गतिविधियों में जमीन का इस्तेमाल आरंभ कर दिया है या वे रियल एस्टेट हब बना रहे हैं। कहीं-कहीं तो उन्होंने पैसा जुटाने के लिए जमीन को गिरवी रख दिया है।

कितना विचित्र है कि वाणिज्य मंत्रालय ने इस कुप्रबंधन और एसईजेड एक्ट के दुरुपयोग पर आंखें फेर ली हैं। मंत्रालय अब इस पर विचार कर रहा है कि डेवलपरों को भवन, स्कूल और अस्पताल उन लोगों को बेचने की अनुमति दे दी जाए, जो इन विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों से बाहर रहते हैं। जमीन का इस्तेमाल रिहायशी परिसरों के निर्माण के लिए भी किया जा रहा है अथवा ऐसी अन्य औद्योगिक गतिविधियों में, जिनकी एसईजेड एक्ट में अनुमति नहीं दी गई है।

सभी तरह की कर रियायतों का क्या मतलब है, इसका अंदाजा लगाने के लिए कुछ बातों को जान लेना जरूरी है। एसईजेड को पूरी तरह एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, सेल्स टैक्स, मंडी टैक्स, टर्नओवर टैक्स से छूट दी गई। दस वर्ष के लिए आयकर से भी छूट दी गई। सौ फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए प्रावधान बनाए गए और इंफ्रास्ट्रक्टर कैपिटल फंड तथा व्यक्तिगत निवेश पर आयकर से छूट दी गई। साथ ही कंपनियों को चौबीसों घंटे बिजली-पानी आपूर्ति का आश्वासन भी दिया गया। एसईजेड प्रमोटरों को पर्यावरण प्रभाव आकलन न कराने की सुविधा भी प्रदान कर दी गई। यह समझ पाना मुश्किल है कि टैक्स रियायत में इतनी दरियादिली और भूमि का अंबार होने के बावजूद एसईजेड काम क्यों नहीं कर सके? यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि एक नया भूमि अधिग्रहण कानून केवल इस कारण लाया जा रहा है कि उद्योगों के लिए भूमि हासिल करने में जरूरत से ज्यादा देरी हो रही है।

अगर 45635 हेक्टेयर जमीन उपलब्ध होने और उस पर कर चुकाने की बाध्यता न होने के बावजूद उद्योग नाकाम साबित हुए तो क्या गारंटी है कि उद्योगों के लिए और जमीन जुटा लेने से उत्पादन के मामले में कोई क्रांति हो जाएगी? जिस हड़बड़ी में एसईजेड एक्ट पारित किया गया और जितनी सुगमता से वाणिज्य मंत्रालय ने नियम तैयार कर इसका क्रियान्वयन शुरू कर दिया, उसकी मिसाल मिलना कठिन है।

इससे पता चल जाता है कि आर्थिक नीतियां कैसे बनती हैं और उन पर अमल के लिए किस तरह जल्दबाजी में ढांचा तैयार कर लिया जाता है। इस तरह का घोटाला दोबारा न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए मेरे पास दो सुझाव हैं। सबसे पहले तो उस समय के वाणिज्य मंत्री और संबंधित अधिकारियों को एसईजेड स्कैंडल के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। दूसरे, गड़बड़ी करने वाली कंपनियों को काम सही तरह न कर पाने के लिए दंडित किया जाना चाहिए। उनसे जमीन और दूसरे संसाधनों की वसूली जुर्माने के साथ की जानी चाहिए। उद्योग जगत को अहसास कराया जाना चाहिए कि मुफ्त में उन्हें कुछ नहीं दिया जा सकता। इस तरह के सही संदेश से ही उद्योग जगत को सबक मिलेगा।

-लेखक कृषि व खाद्य मामलों के विशेषज्ञ हैं।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

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सरकारी बाबू अब सरकारी ई मेल का ही प्रयोग करेंगे

सरकारी काम के लिए सरकारी अधिकारी निजी ई-मेल का इस्तेमाल नहीं कर सकते। पिछले हफ्ते जारी अधिसूचना में, 'यूजर्स को सरकारी नेटवर्क से निजी ई-मेल सर्वर्स का इस्तेमाल करने से बचने को कहा गया है। आधिकारिक बातचीत के लिए केवल आई (एनआईसी पॉलिसी के तहत इंप्लिमेंटिंग एजेंसी) की तरफ से बनाए गए ई-मेल सर्विस का ही इस्तेमाल करना होगा।' 

नई नीति में अब अधिकारियों को गैर सकारी ई-मेल सर्विसेज को मेल फॉरवर्ड का भी ऑप्शन नहीं मिलेगा। अधिसूचना में कहा गया है, 'अन्य सर्विस प्रोवाइडर्स की तरफ से मुहैया कराए जाने वाले ई-मेल सर्विसेज का इस्तेमाल आधिकारिक तौर पर होने वाली बातचीत में नहीं किया जाएगा।' नई पॉलिसी केंद्र सरकार के सभी कर्मचारियों के अलावा केंद्र सरकार की तरफ से मुहैया कराए गए ई-मेल सर्विसेज का इस्तेमाल करने वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारियों पर भी लागू होगी। एडवर्ड स्नोडेन के डेटा लीक किए जाने के बाद डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स ऐंड आईटी ने नई पॉलिसी का सुझाव सामने रखा था। नई पॉलिसी के तहत अधिकारियों को दो मेल आईडी मिलेंगे, जिसमें एक उनके पोस्ट और दूसरा उनके नाम से जुड़ा होगा।

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उप राष्‍ट्रपति ने स्‍वर्गीय डॉ. नरेन्‍द्र दाभोलकर की पुस्‍तकों का हिंदी अनुवाद जारी किया

उप राष्‍ट्रपति श्री एम. हामिद अंसारी ने आज यहां एक समारोह में स्‍वर्गीय डॉ. नरेन्‍द्र दाभोलकर की पुस्‍तकों के हिंदी अनुवाद का सैट ''अंधविश्‍वास उन्‍मूलन-आचार, खंड-1', 'विचार, खंड-2, एवं 'सिद्धांत' खंड-3'' जारी किया। इनका हिंदी अनुवाद डॉ. चन्‍दा गिरीश ने किया है तथा पुस्‍तकों के एडिटर सुनील लावाटे है। इस अवसर पर उप राष्‍ट्र‍पति ने कहा कि 20 अगस्‍त 2013 को इतिहास में काला दिवस के रूप में याद किया जाएगा, जब डॉ. नरेन्‍द्र दाभोलकर की हत्‍या की गई क्‍योंकि वे लोगों को विभिन्‍न अंधविश्‍वासों के विरूद्ध जागरूक करने का प्रयास कर रहे थे। डॉ. दाभोलकर ने 'महाराष्‍ट्र अंधविश्‍वास विरोधी कानून' की वकालत की तथा उनकी मृत्‍यु के कुछ समय बाद ऐसा कानून पारित किया गया। उन्‍होंने कहा कि अंधविश्‍वास विरोधी कानून को राष्‍ट्रीय कानून बनाया जाना चाहिए। 

उनकी राय थी कि अब हमारे देश के लोगों को यह समझने की आवश्‍यकता है कि तर्कयुक्‍त सोच अविवेकी सोच से बेहतर होती है। उन्‍होंने सुझाव दिया कि इन तीन पुस्‍तकों के सैट को सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद किए जाने चाहिए तथा इन्‍हें अंधविश्‍वास के विरूद्ध युवा पीढ़ी को जागरूक करने के लिए विद्यालयों तथा महाविद्यालयों को भेजा जाना चाहिए। 

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डिस्कवरी साईंस पर देखिये विमान दुर्घटनाओँ की सच्ची कहानियाँ

डिस्कवरी साइंस अब ऐसी सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानियां ला रहा है, जो हवाई दुर्घटनाओं से जुड़ी हैं। चैनल 9 मार्च से ‘व्हाई प्लेन्स क्रैश’ नामक एक सीरीज शुरू करने जा रहा है, जिसे देखकर आप हैरान रह जाएंगे। पायलट, चालक दल और यात्री मौत से बेहद करीब से जुड़े अनुभवों को महसूस करेंगे कि जब आम उड़ानें किसी बुरे स्वप्न में बदलती हैं तो क्या होता है? 
 
इस सीरीज का प्रसारण 9 मार्च से हर सोमवार से शुक्रवार रात 10 बजे किया जाएगा।
 
यह कार्यक्रम हैरत में डालने वाली दुर्लभ फुटेज और नाटकीय मदद से निर्मित किया गया है। इस कार्यक्रम में दिखाया जाएगा कि विमान बीच हवा में कैसे टकराते हैं, अमेजॉन नदी के ऊपर एक कॉरपोरेट जैट कैसे एक 737 से टकरा जाता है, एक 747 विमान में कारगो डोर में धमाका हो जाता है और इसके अलावा भी दर्शक कई हवाई हादसे देख सकेंगे।
 
सीरीज के बारे में बताते हुए, राहुल जौहरी, एग्जिक्यूटिव वाइस प्रेजिडेंट और जनरल मैनेजर – साउथ एशिया एंड साउथ ईस्ट एशिया, डिस्कवरी नेटवर्क्स एशिया पैसिफिक ने कहा, ‘डिस्कवरी साइंस चैनल प्रतिदिन के विज्ञान पर आधारित अतिउन्नति, दिलकश और विशिष्ट कार्यक्रमों को दिखाता है और कल्पना से परे जाकर सवालों के जवाब ढूंढ़ता है। व्हाई प्लेन्स क्रैश एक खोजी श्रृंखला है जो आसमान में हुए कुछ बहुत ही गंभीर हादसों से जुड़े रहस्यमय कारणों को रोशनी में लाता है।’
 
इस श्रृंखला में अलग-अलग तरह के हवाई हादसों की जांच-पड़ताल हाई क्वॉलिटी एनिमेशन के जरिए की जाएगी, ताकि उनसे जुड़ी कहानियों को बयान करना आसान हो। एक घंटे के हर एपिसोड में किसी एक खास विषय पर ध्यान लगाया जाएगा, जैसे कि खराब मौसम में उड़ान भरना, जानलेवा साबित हो सकने वाली संचार संबंधी समस्याएं, और ऐसे पायलट जो ऑटोमेशन पर कुछ ज्यादा ही निर्भर करते हैं। 
 
इस सीरीज में दिखाए जाने वाले कुछ एपिसोड इस प्रकार हैं:
 
ब्रेस फॉर इम्पैक्ट
 
इस सीरीज की शुरुआत इस बात पर नजर डालने से होती है कि आखिर किस कारण कुछ पायलट अपने विमानों को पानी में उतारने का जोखिम उठाते हैं, और वे तथा उनके मुसाफिर किस तरह इस हादसे के बावजूद जिंदा बच पाते हैं।
 
कोलिजन कोर्स
 
प्रत्यक्षदर्शी और जिंदा बचने वाले लोग हवा में टकराने वाले विमानों से जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हैं, कार्यक्रम में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह एक कॉरपोरेट जैट, अमेजॉन नदी के ऊपर एक 737 विमान से टकराया था।
 
ह्यूमन एरर
 
गलतियों, लापरवाहियों और ध्यान बंटने के गंभीर नतीजे निकल सकते हैं। इस कार्यक्रम में एक ऐसे जैट विमान को दिखाया गया है जिसका ईंधन खत्म हो गया और वह रनवे से कुछ ही किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
 
ब्रेकिंग पॉइंट
 
एक कारगो डोर में विस्फोट हो जाने से प्रशांत के ऊपर से उड़ रहे एक 747 विमान में से 9 यात्री बाहर खिंच आते हैं। इस एपिसोड में, जहाज की बनावट में अचानक पैदा हुई गड़बड़ी की ये सिर्फ एक मिसाल है, ऐसे ही एक और हादसे में टेक-ऑफ के दौरान एक डीसी-10 विमान का इंजिन ही गिर जाता है।
 
फायर इन द स्काई
 
फैडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन को पता चला है कि एक लाख फ्लाइटों में से तीन तक उड़ानों को फ्लाइट के दौरान धुएं या आग के कारण डायवर्ट करना पड़ता है, लेकिन ये स्थिति फिर भी बहुत खतरनाक मानी जाएगी। दर्शक इस एपिसोड में कुछ बहुत ही विध्वंसकारी परिणामों को देखेंगे।

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