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प्रसार भारती शिक्षा के 50 नए चैनल शुरु करेगी

प्रसार भारती और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त प्रयास से  छात्रों के लिए 50  एजुकेशन चैनल शुरू किए जा रहें हैं। इन्हें अगले वर्ष एक मई से शुरू किए जाने की योजना है, जिसके तहत सेटेलाइट के जरिये शिक्षा संबंधी कंटेंट का प्रसारण किया जायेगा।  

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से उच्च शिक्षा सचिव अशोक ठाकुर और प्रसार भारती की ओर से मुख्य कार्यकारी अधिकारी जवाहर सरकार ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं। पहले चरण में 50 डीटीएच चैनल शुरू किये जायेंगे।

आईआईटी, इग्नू, राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय, एनआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थान शिक्षण संबंधी कंटेंट तैयार करेंगे और जिसका प्रसारण इन चैनलों पर किया जायेंगा। प्रत्ये क चैनल 9 घंटे का लाइव कार्यक्रम प्रसारित करेगा,जिसे अगले 15 घंटे दोहराया जाएगा। इसके लिए वर्ष में 1,64,250 घंटे की शैक्षणिक कंटेंट की जरूरत होगी और यह कंटेंट 16 करोड़ भारतीय परिवारों तक पहुंच सकेगी।   इन 50 डीटीएच चैनलों के लिये अगले डेढ साल के लिये250 से 300 करोड रूपये का बजट निर्धरित किया गया है। बाद में 46 अरब रूपये के खर्च से सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के जरिये शिक्षा पर राष्ट्रीय मिशन एनएमईआईसीटी के तहत 1000 डीटीएच चैनल शुरू किये जाने की योजना है।

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सांप्रदायिक हिंसा विरोधी कानून का औचित्य क्या है?

सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक संसद में लाने तथा इसे संसद में पास कराकर कानून की शक्ल दिए जाने की कवायद हालांकि सन् 2005 से चल रही है। परंतु मु य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस बिल का विरोध किए जाने के चलते इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। पिछले दिनों मुज़्ज़फरनगर व आसपास के क्षेत्रों में फैली सांप्रदायिक हिंसा व दंगों के बाद एक बार फिर न केवल इस विधेयक को संसद में मंजूरी हेतु लाए जाने का दबाव सरकार पर बढऩे लगा तथा संयुक्त प्रगतिशील सरकार इस विषय पर गंभीर नज़र आने लगी।

परिणामस्वरूप पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक को संसद में पेश किए जाने की मंज़ूरी दे दी गई। हालांकि भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस बिल के कई बिंदुओं पर आपत्ति उठाए जाने के बाद इसके कई प्रावधानों में फेरबदल व संशोधन भी किए जा चुके हैं। विपक्ष को आपत्तिजनक नज़र आने वाले कई प्रावधान इस विधेयक से हटा भी दिए गए हैं। इसके बावजूद भाजपा का कहना है कि इस विधेयक के कानून की शक्ल अि तयार करने के बाद देश में सांप्रदायिकता नियंत्रित होने के बजाए और बढ़ेगी तथा इससे समाज में ध्रुवीकरण हो सकता है। जबकि कांग्रेस पार्टी देश में अब तक हुए सांप्रदायिक दंगों की जांच-पड़ताल तथा उससे संबंधित रिपोर्ट के अध्ययन के बाद इस विधेयक को संसद में पारित कराया जाना ज़रूरी समझती है। सवाल यह है कि क्या देश के सभी राजनैतिक दलों को सांप्रदायिकता पर नियंत्रण करने तथा इसे रोकने व इसके लिए ज़िम्मेदारलोगों को सज़ा दिलाए जाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं होना चाहिए? क्या भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में कलंक रूपी सांप्रदायिकता को समाप्त किया जाना ज़रूरी नहीं है?               

सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक में जहां अन्य और कई प्रकार के बिंदु तथा प्रावधान हैं वहीं इसमें केंद्र व राज्य स्तर पर सांप्रदायिक सौहाद्र्र,न्याय तथा मुआवज़ा प्राधिकरण बनाने का भी प्रस्ताव है। इस प्राधिकरण अथवा अथॉरिटी को सिविल कोड के अधिकार प्राप्त होंगे। इस प्राधिकरण(अथॉरिटी) के पास दंगों की, दंगा प्रभावित क्षेत्रों व दंगा पीडि़तों अथवा दंगा स्थल की जांच के लिए अपनी टीम होगी। सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार किसी भी एजेंसी की मदद ले सकेंगे। यह अथॉरिटी अथवा प्राधिकरण सांप्रदायिक हिंसा की जांच हेतु उच्च न्यायालय के किसी न्यायधीश की अगुवाई में जांच कराए जाने का आदेश भी दे सकती है। प्रस्तावित विधेयक में हिंसा से प्रभावित व पीडि़त लोगों को जल्द से जल्द मुआवज़ा दिए जाने की भी व्यवस्था है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विपक्ष की आपत्ति के बाद जिन प्रावधानों में परिवर्तन किया है उन बदले हुए प्रावधानों के मुताबिक केंद्र अब राज्य के कानून व्यवस्था संबंधी मामलों में सीधे तौर पर दखल नहीं दे पाएगा। अब संशोधित विधेयक के अनुसार केंद्र सरकार राज्य के कहने के बाद ही अर्धसैनिक बलों को भेज सकेगा। और इन सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान जिसका उल्लेख इस विधेयक में किया गया है वह यह है कि  सांप्रदायिक दंगों व हिंसा के लिए ब्यूरोक्रेसी की जि़ मेदारी को और अधिक सुनिश्चित किया जाना। अर्थात् यदि कोई उच्चाधिकारी अपनी जि़ मेदारियों का सही तरीके से निर्वहन नहीं कर पाता तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जाएगी।               

हमारे देश में सांप्रदायिक व लक्षित दंगों व ऐसी हिंसा का इतिहास काफी पुराना है। देश में पहली संाप्रदायिक हिंसा 1892 में हुई थी। उस समय से लेकर अब तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक होने वाली सांप्रदायिक हिंसा में यही देखा जा रहा है कि प्राय: अल्पसं यक समाज के लोगों को बहुसं य समाज के लोगों की हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह भी देखा जाता है कि ऐसे दंगों में कई आलाधिकारी अपनी पक्षपात पूर्ण तथा पूर्वाग्रही भूमिका अदा करते हैं। और इन सबसे अफसोसनाक बात यह है कि इन दंगों में विभिन्न दलों से संबंध रखने वाले राजनेता तथा सत्तारूढ़ सरकारें अपने राजनैतिक नफे-नुकसान को मद्देनज़र रखते हुए प्रशासन को व आलाधिकारियों को निर्देश जारी करते हैं तथा अपनी सोच व नीति के अनुसार अधिकारियों को दंगों व दंगाईयों से निपटने का निर्देश देते हैं।

परिणामस्वरूप कश्मीर में जब अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों पर ज़ुल्म ढाए जाते हैं तो वहां का राज्य प्रशासन व प्रशासनिक अधिकारी तथा पुलिस बहुसंख्यकों के तुष्टिकरण तथा उनके भयवश दंगाईयों व हिंसा फैलाने वालों के विरुद्ध स त कार्रवाई नहीं कर पाते। और इसी का परिणाम है कि आज लाखों कश्मीरी पंडित अपनी जन्मस्थली को छोड़कर अन्य स्थानों पर अभी तक शरणार्थी बनने को मजबूर हैं और अभी तक उनका पुनर्वास नहीं हो पा रहा है। ऐसी ही स्थिति 1984 में भी उस समय पैदा हुई थी जबकि देश के राज्यों में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे थे। इन दंगों में भी राजनेताओं व प्रशासन की मिलीभगत का खमियाज़ा अल्पसं यक सिख समुदाय का भुगतना पड़ा था। और ऐसी ही स्थिति मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ अक्सर बनती रहती है। गुजरात के 2002 के दंगे हों या 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश में हुई सांप्रदायिक हिंसा अथवा मुरादाबाद,मेरठ,इलाहाबाद तथा भागलपुर जैसी जगहों पर होने वाले दंगे या फिर उड़ीसा के कंधमाल में इसाई समुदाय के विरुद्ध भड़की हिंसा अथवा आसाम में अल्पसं यंकों को निशाना बनाया जाना,इन सभी जगहों पर बहुसं य लोगों के तांडव तथा इसमें प्रशासन की मिलीभगत अथवा चुप्पी को साफतौर पर देखा जा सकता है।               

ऐसे में क्या यह ज़रूरी नहीं कि देश के संविधान में उल्लिखित प्रावधानों के मद्देनज़र हम अपने देश में रहने वाले अल्पसं यक समुदाय के लोगों को संरक्षण देने तथा उनके जान व माल की हिफाज़त सुनिश्चित करने के उपाय करें? एक और ज़रूरी सवाल यहां यह भी है कि जब कभी देश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा तथा उनके अधिकारों या संरक्षण की बात की जाती है तो केवल भारतीय जनता पार्टी तथा उसके सहयोगी संगठनों को ही सबसे अधिक कष्ट क्यों होता है? भारतीय जनता पार्टी की इस विधेयक को लेकर तथाकथित चिंताएं क्या इस ओर इशारा नहीं करतीं कि भाजपा देश में रह रहे अल्पसं यकों को सुरक्षा व संरक्षण प्रदान करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती? और ऐसी ही स्थिति पक्षपातपूर्ण तथा पूर्वाग्रही स्थिति कही जाती है।
 
क्या यह भाजपा के सांप्रदायिक चरित्र का प्रमाण नहीं है? क्या कारण है कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में जिस भाजपा के साथ 24 राजनैतिक दल वाजपेयी के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल थे आज दो दलों के सिवा कोई भी उनके साथ नहीं है? आिखर क्यों? भाजपा के नेता प्रतिदिन कई-कई बार इस बात को दोहराते रहते हैं कि देश में सबसे अधिक दंगे कांग्रेस के शासनकाल में हुए इसलिए कांग्रेस पार्टी को सांप्रदायिक तथा अल्पसं यक विरोधी पार्टी समझा जाना चाहिए। परंतु भाजपाई यह आंकड़ा कभी पेश नहीं करते कि देश में कहीं भी होने वाले सांप्रदायिक दंगों में अथवा सांप्रदायिक हिंसा में सबसे अधिक गिर तारियां किस पार्टी व किस संगठन के लोगों की होती हैं? माया कोडनानी जैसी दंगाई महिला जोकि आज जेल में आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रही है उसे 2002 के गुजरात दंगों में शामिल होने तथा सामूहिक हत्याकांड करवाने हेतु पुरस्कार स्वरूप मंत्री पद कौन सी पार्टी की सरकार देती है? यहां तक कि अभी पिछले दिनों मुज़्ज़फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा फैलाने में आरोपित भाजपा के दो विधायकों को आगरा में किस पार्टी ने स मानित किया? कितना हास्यासपद विषय है कि देश की धर्मनिरपेक्षता तथा भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले लोग तथा दल आज सांप्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक को लेकर यह आपत्ति दर्ज करते सुनाई दे रहे हैं कि इस कानून से देश का संघीय ढांचा बिखर जाएगा। 6 दिसंबर के गुनहगारों तथा गुजरात दंगों को क्रिया की प्रतिक्रया बताए जाने वालों तथा दंगाईयों को पुरस्कृत व स मानित करने वालों पर ऐसी बातें कतई शोभा नहीं देती।

मुझे याद है कि एक बार महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले ने मुझसे वार्तालाप के दौरान स्पष्ट रूप से यह बात कही थी कि सांप्रदायिक हिंसा अथवा दंगों को रोकना अथवा न होने देना पुलिस एवं प्रशासन के बाएं हाथ का खेल है। उन्होंने बताया था कि मु यमंत्री बनते ही सर्वप्रथम उन्होंने पूरे महाराष्ट्र राज्य के जिलाधिकारियों व पुलिस अधीक्षकों को प्रथम निर्देश यही दिया था कि राज्य में कहीं सांप्रदायिक हिंसा अथवा दंगे नहीं होने चाहिएं। और यदि हुए तो स्थानीय अधिकारी इसके दोषी होंगे। परिणामस्वरूप अंतुले के शासनकाल में राज्य में एक भी दंगा नहीं हुआ। वास्तव में कोई भी ज़िम्मेदार अधिकारी मात्र दो-चार घंटों में ही बड़ी से बड़ी हिंसा को नियंत्रित कर सकता है।
 
दरअसल, प्रशासन के लोग अपने राजनैतिक आकाओं की मर्ज़ी व उसके निर्देश एवं उनकी खुशी के लिए काम करना बेहतर समझते हैं। आज आप किसी भी पूर्व अथवा वर्तमान ईमानदार अधिकारी से बात करें तो वह यही कह ता मिलेगा कि दंगे भड़कने तथा फैलने से लेकर इसके अनियंत्रित रहने तक में नेताओं की ही प्रमुख भूमिका होती है। और यदि नेता इनमें दखल न दें तो सांप्रदायिक हिंसा शुरु ही नहीं हो सकती। आज गुजरात में तमाम अधिकारी या तो जेल की सलाखों के पीछे हैं या फिर अपनी साफगोई व कर्तव्यनिष्ठा का परिणाम भुगतते हुए निलंबित हैं अथवा मुकद्दमों का सामना कर रहे हैं। यह सब राजनैतिक दखलअंदाज़ी तथा पक्षपातपूर्ण शासकीय रवैयों का ही परिणाम है। वास्तव में ऐसी स्थितियां संघीय ढांचे के लिए खतरा हैं न कि सांप्रदायिक हिंसा विरोधी कानून। लिहाज़ा देश में अमन-चैन व भाईचारा कायम रखने के लिए इस विधेयक को कानून की शक्ल देना बेहद ज़रूरी है न कि इस विधेयक को लेकर भी लोगों का गुमराह करना व सांप्रदायिकता की राजनीति करना।

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हद की बेशर्मी, मोदी की सभा पर भी आपत्ति जताई अमरीका ने!

देवयानी खोब्रागड़े को अपमानित करने के बाद मरीका भारत से सीधी तू-तू मैं-मैं पर उतर आया है।  अमेरिका भारत को यह बताने की कोशिश कर रहा है कि भारतीय नेता कहां रैली कर सकते हैं और कहां नहीं।  अमरीका ने ताज़ा विवाद रविवार को मुंबई के एमएमआरडीए मैदान में हुई नरेंद्र मोदी की रैली को लेकर पैदा किया है। एमएमआरडीए मैदान मुंबई के बांद्रा इलाके में है, जहां अमेरिकी वाणिज्य दूतावास मौजूद है। अमेरिकी प्रशासन की ओर कहा गया है कि मोदी की रैली में शामिल हुए लोगों की ओर से अमेरिका के वाणिज्य दूतावास पर हमले का खतरा था।

बांद्रा में बीकेसी परिसर में स्थित अमेरिकी वाणिज्य दूतावास को कई स्तरों की सुरक्षा मुहैया कराई गई थी। लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय के अफसर तब हैरान रह गए जब अमेरिका ने मोदी की रैली के मद्देनजर सुरक्षा कड़ी किए जाने की मांग की। बताया जा रहा है कि अमेरिका ने भारत सरकार से कहा था कि रविवार को हुई मोदी की रैली में शामिल हुए लोग वाणिज्य दूतावास और उसके अफसरों पर हमला कर सकते हैं।

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मुंबई में मोदी की महागर्जना

भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेंद्र मोदी के मुंबई आगमन के ठीक 8 घंटे पहले मुंबई विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने सांताक्रुज़ के विश्वविद्यालय स्थित मैदान में हैलीपेड पर मोदी का हेलीकॉप्टर उतारने को लेकर अपनी अनुमति वापस ले ली थी, लेकिन मुंबई के पुलिस आयुक्त श्री सत्यपाल सिंह ने पुलिस आयुक्त के विशेषाधिकारों का प्रयोग करते हुए पूरे परिसर को अपने कब्जे में लेकर वहाँ श्री नरेंद्र मोदी के हेलीकॉप्टर को उतारे जाने की व्यवस्था की।

श्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई के बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लैक्स में महागर्जना रैली के दौरान वोट फॉर इंडिया का नया नारा दिया, वहीं चायवालों के बहाने कहा कि अब समय बदल रहा है, देश का हर गरीब वीआइपी होगा। वह यह भी कहने से नहीं चूके कि मोदी लोगों के दिलों में जगह बना चुका है। आइए जानते हैं मोदी के भाषण की दस प्रमुख बातें :-

 

1. वोट फॉर इंडिया :

नरेंद्र मोदी ने भाषण के समापन में भाजपा के लिए नहीं, बल्कि भारत के लिए वोट मांगा। उन्होंने 'वोट फॉर इंडिया' का नारा दिया। जनता से संकल्प लिया कि भारत की एकता, विकास, महंगाई व भ्रष्टाचार से मुक्ति, नारियों के लिए सम्मान, वंशवाद से मुक्ति और सुराज की राजनीति के लिए इंडिया के लिए वोट करेंगे।

2. कांग्रेस क्विट इंडिया :

मोदी ने कहा कि आजादी के दौरान महाराष्ट्र से अंग्रेजों के खिलाफ क्विट इंडिया मूवमेंट की शुरुआत हुई थी। यहीं से कांग्रेस क्विट इंडिया की आवाज उठे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार करना होगा क्योंकि हर समस्याओं के जड़ में कांग्रेस पार्टी ही है।

 

3. कुशासन डायबिटीज की तरह :

मोदी ने कहा कि किसी देश या राज्य का कुशासन डायबिटीज बीमारी की तरह होता है जो ऊपर से देखने में तो सही लगता है लेकिन अंदर ही अंदर सैकड़ों बीमारियां पैदा कर देता है। उसी तरह सरकार का कुशासन राज्य को खोखला कर देता है।

 

4. शिवराज सरकार की तारीफ :

मोदी ने कहा कि जब हम गुजरात की तारीफ करते हैं तो कुछ नेताओं को पेट में दर्द होने लगता है इसलिए हम मध्यप्रदेश की बात करेंगे, जहां भाजपा का शासन है। मध्यप्रदेश एक समय बीमारू राज्य कहा जाता था, जहां विकास का नामोनिशान नहीं था ऐसे राज्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूरी व्यवस्था बदलते हुए राज्य में खुशहाली ला दी। एक समय था जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश गेहूं और चावल की सबसे ज्यादा पैदावार करते थे लेकिन आज मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने देश का अनाज भंडार भरा है।

 

5. मोदी लोगों के दिलों में :

जबरदस्त भीड़ से उत्साहित मोदी ने कहा कि उन्हें कांग्रेसशासित राज्यों में रैली से पहले केबल प्रसारण बंद किए जाने की जानकारी है, लेकिन जनता के दिलों पर कोई ताला नहीं लगा सकता। 'मोदी दिलों में जगह बना चुका है।' केबल पर ताला लगा सकते हो, देशवासियों के दिलों पर नहीं।

 

6. देश का हर गरीब वीआइपी :

रैली में 10 हजार चायवालों को वीआइपी देकर आमंत्रित किए जाने का उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा, अब चायवाले वीआइपी बन गए हैं। समय बदल रहा है, वह दिन दूर नहीं जब देश में हर गरीब वीआइपी होगा।

7. राहुल पर चुटकी :

राहुल गांधी पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा कि यह सिर्फ कांग्रेस के शासन में होता है कि सरकार भ्रष्टाचार करती है और उनका नेता इसके खिलाफ उपदेश देता है। वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा के सभी सांसदों ने लिखकर दिया है कि उनका विदेश में कोई खाता नहीं है। कांग्रेस सांसदों ने चुप्पी साध रखी है, लेकिन नेता हैं कि गरीबों की बात करते हैं।

 

8. मुस्लिमों को किया आगाह :

मोदी मुस्लिमों को भी आगाह करने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि सरकार ने मुस्लिमबहुल 90 जिलों के लिए बजट घोषित किया था, लेकिन संसद में खुद सरकार ने माना है कि पिछले तीन वर्ष में इस मद से एक पैसा खर्च नहीं किया गया है।

 

9. श्रमेव जयते :

मोदी ने श्रमिकों की महता पर बल देते हुए सत्यमेव जयते की तर्ज पर श्रमेव जयते का नया नारा दिया।

10. कांग्रेस पर निशाना :

मोदी ने भाषण में कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति में डूबकर समाज को तोड़ने और बांटने में जुटी हुई है। अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते कांग्रेस ने डिवाइड एंड रूल की पॉलिसी अपना ली है। नदियों के लिए लड़ाया जा रहा है लोगों को। पानी बंटवारे को लेकर कई सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं लोग और केंद्र में बैठी सरकार को भाई से भाई को लड़ाने में मजा आ रहा है। देश को वोटबैंक की राजनीति से उबारना होगा, तभी देश समस्याओं से मुक्त होगा।

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केंद्रीय मंत्री आज़ाद ने खोली सांसदों की पोल

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने देश के सांसदों के बारे में चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा है कि सांसद सबसे ज्यादा जवान होने, याददाश्त बढ़ाने और कामोत्तेजक आयुर्वेदिक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं।

जम्मू के परेड मैदान में स्वास्थ्य मंत्रालय के आरोग्य मेले में गुलाम नबी आजाद आजाद ने बताया कि इस बार संसद सत्र के दौरान एक सांसद ने उनसे पूछा था कि संसद में कौन सी आयुर्वेदिक दवाइयां ज्यादा बिकती हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया कि जब उन्होंने इस बारे में जानकारी ली तो उन्हें पता चला कि देश के सांसद आयुर्वेद की तीन दवाओं का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। इनमें जवान होने, याद्दाश्त बढ़ाने और शादी के बाद काम आने वाली दवाएं शामिल हैं।

 

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चमनलाल की टोपी ने अरविंद केजड़ीवाल की किस्मत बदल दी!

आम आदमी पार्टी आखिरकार दिल्ली में सरकार बना रही है और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन रहे हैं। इस आम आदमी पार्टी की पहचान हैं वो सफेद रंग की नारे लिखीं टोपियां जो अरविंद केजरीवाल से लेकर हजारों आप समर्थकों के माथे पर सजती हैं। जिस टोपी को पहनकर अरविंद और उनके समर्थकों ने लोकपाल आंदोलन से लेकर इस सियासी सफलता तक सफर तय किया है, उसके पीछे जो शख्स है उनका नाम चमनलाल है चमनलाल दिल्ली के सदर बाजार में सस्ती टोपियां बेचते हैं । दिल्ली में बड़े राजनीतिक बदलाव के प्रतीक आप पार्टी की टोपी को सबसे ज्यादा संख्या में बेचने का श्रेय उन्हीं को जाता है।

इकॉनोमिक टाइम्स के अनुसार, चमनलाल ने दिल्ली में अक्टूबर में आप पार्टी के बनने के बाद छह से सात लाख टोपियां बेची हैं। चमनलाल को उम्मीद है कि केजरीवाल के सीएम बनने के बाद और आप पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ने की तैयारी से टोपियों की मांग और बढ़ेंगी। चमनलाल खुद भी आप समर्थक हैं और वह टोपियां बेचने के बिजनेस पर गर्व करते हैं।

चमनलाल के अनुसार, वह महज 25 पैसे के मुनाफे पर एक टोपी तीन रुपए में बेचते हैं। चमनलाल बताते हैं कि लोकपाल आंदोलन में अन्ना हजारे के अनशन के दौरान 'अन्ना टोपी' के साथ आम आदमी पार्टी की टोपी की मांग में उछाल आया था। उन्होंने कहा, 'पहले यह टोपियां कॉटन की बनाई जाती थीं लेकिन बाद में आप की टोपियों को सस्ते फैब्रिक चाइना नेट से बनाया जाने लगा।' इसके पीछे का कारण बताते हुए चमनलाल कहते हैं कि इससे आप की टोपी की कीमत कम रखी जा सकती है।

 

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आप ने बताया, कितने लोगों ने सरकार बनाने की माँग की

आम आदमी पार्टी की PAC ने तय किया है कि – पार्टी दिल्ली में सरकार बनाने के लिए तैयार है. हालांकि आम आदमी पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में बहुमत के लिए आवश्यक 36 सीटें नहीं मिली थी लेकिन दिल्ली की जनता ने जनमत संग्रह में भारी बहुमत से पार्टी को सरकार बनाने का निर्देश दिया है. सप्ताह भर तक चले जनमत सर्वेक्षण में इंटरनेट, साइबर मीडिया और जनसभाओं के ज़रिये लोगो से सरकार बनाने के सवाल पर राय मांगी थी. यह देश में राजनीति को बदलने की एक ऐतिहासिक शुरुआत थी. जनता ने इसमें भारी संख्या में भाग लिया। विभिन्न माध्यमों से जनता ने निम्नवत राय दी –

Particulars

Total Response

Total Responses – (unique)

Total Valid Responses for Delhi

Outcome – Yes

Outcome- No

Website

1,34,917

99,043

20,969

14,256

6,713

Phone Calls

238, 239

1,83,093

85,716

62,412

23,304

SMS

324,154

2,41,047

1,59,281

1,20,418

38,863

Total

6,97,310

523183

265966

197086

68880

 

Jansabhas/

Public Meetings

280

257

23

कुल मिलाकर SMS और Internet के माध्यम से 697310 प्रतिक्रियाएं मिली, जिसमें से डुप्लीकेट ID और नंबर्स को हटा कर कुल 523183 लोगों ने राय दी. इसमें से 265966 दिल्ली से हैं. इसमें से 197086 यानि 74% ने पार्टी को सरकार बनाने के पक्ष में फैसला दिया है.

इसे देखते हुए आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाने का निर्णय लिया है. विधायक दल के नेता अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी दिल्ली के उप राज्यपाल से सरकार बनाने की पेशकश करने जा रही है. 

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भारतीय न्यायचरित मानसः बड़ा आदमी जेल से बाहर सज़ा भुगते?

अक्सर मीडिया और अग्रणी लोगों द्वारा प्रसारित किया जाता है कि देश के न्यायालय लोकतंत्र की रक्षा में मजबूती से खड़े हैं किन्तु मेरे स्वतंत्र मतानुसार वास्तविक स्थिति इससे भिन्न है| भ्रष्ट और शक्तिशालों लोगों को यदाकदा दण्डित करने मात्र से 125 करोड़ का जनतंत्र मजबूत नहीं होता है| न्यायालयों के तो समस्त निर्णयों में प्रजातंत्र झलकना चाहिये और अपवाद स्वरुप किसी मामले में दोषी को दण्डित करने में मानवीय चूक हो सकती है जिसे जनता सहन-वहन कर सकती है|

आज स्थिति यह है कि कार्यरत और सेवानिवृत न्यायाधीशों पर भी नैतिक अधपतन तक के आरोप लग रहे हैं यद्यपि सेवारत न्यायाधीशों पर बहुत कम आरोप लग रहे हैं| इसका यह कदापि अभिप्राय नहीं है कि भारत में सेवारत समस्त न्यायाधीश भले और ईमानदार हैं अथवा रहे हैं| ऐसा नहीं है कि ये लोग आदित: सदचरित्रवान रहे हों और कालान्तर में इनका नैतिक अधपतन हुआ हो| सेवारत होते हुए किसी न्यायाधीश पर आरोप लगाने पर अवमान कानून का “न्यायिक आतंकवाद” की तरह प्रयोग किये जाने का जोखिम बना रहता है अत: इस कानून के कारण नागरिक न्यायपालिका के सम्बन्ध में अपने विचार भी खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं और पीड़ित लोग न्यायाधीशों की सेवानिवृति तक आरोप लगाने का इन्तजार करते हैं|

भारत में पत्रकारों द्वारा न्यायालयों की कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग भी दबी जुबान से ही होती है जो प्राय: अर्द्धसत्य ही होती है| वास्तव में भारतीय न्यायालय अवमान कानून न केवल ब्रिटेन के कानून से अश्रेष्ठ और आतंकी है बल्कि श्रीलंका का अवमान कानून भी भारतीय कानून से श्रेष्ट है| जहाँ ब्रिटेन के कानून में किसी न्यायाधीश पर आरोप लगाना अवमान नहीं है बल्कि किसी मामले में सीधे अवरोध उत्पन्न करना ही अवमान है वहीं किसी मामले में झूठी गवाही देने, झूठे साक्ष्य पेश करने जैसे मामलों में भारत में मुश्किल से ही किसी दोषी को सजा होती है|

 न्यायालय अपराधियों के प्रति उदारता का परित्याग कर जिस दिन ऐसा करने लगेंगे उस दिन रक्तबीज की तरह बढती अनावश्यक मुकदमेबाजी स्वत: ही घट जायेगी और सरकारी अधिकारी इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे| ठीक इसी प्रकार श्रीलंका में अलग से कोई अवमान कानून ही नहीं है अपितु न्यायिक कार्यवाही में अवरोध करना ही अवमान माना जाता है| प्रथम तो भारत में कोई वकील अपवाद स्वरुप ही राजनीति या किसी राजनैतिक दल से घनिष्ठ संपर्क से दूर है और भारत में उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और उसके पैंतरों को देखने से भी यह एहसास नहीं होता कि ये नियुक्तियां गैर-राजनैतिक ढंग से स्वच्छतापूर्वक  होती हैं|    

अभी हाल ही में चारा घोटाले में लालू यादव व जगन्नाथ मिश्र को सुनाई गयी सजा (सजा भुगतेंगे कितनी यह अभी भविष्य के गर्भ में है) से शायद देश की जनता को ऐसा भ्रम होगा कि देश में कानून का राज है और दोषियों को बख्शा नहीं जाता| किन्तु विचारणीय है कि क्या लालू यादव या जगन्नाथ मिश्र का यह पहला आपराधिक मामला है जहां उन्हें सजा सुनाई गयी है| यदि नहीं तो फिर आज तक ये आजाद क्यों घूमते रहे? क्या आजादी का मतलब इतना उदार है ? एक ओर उच्च वर्ग के अपराधी या पीड़ित के मामले में पुलिस पीछा करने या गिरफ्तार करने के लिए हवाई यात्रा का खर्चा वहन करती है वहीं आम गवाह को बजट नहीं होने का बहाना बनाकर बस यात्रा व भोजन व्यय का भी भुगतान नहीं करती है|

 सैद्धांतिक तौर पर पुलिस पर भी न्यायपालिका का नियंत्रण बताया जाता है अत: पुलिस द्वारा ढंग से छानबीन नहीं की जाए या अपराधियों को बचाया जाए और निर्दोष लोगों को फंसाया जाए तो न्यायालय मूकदर्शी नहीं रह सकते| फिर अपराधी आखिर दंड से क्यों बच निकलते हैं?  किसी भी अपराधी को यदि अपराध करने पर दंड नहीं मिले तो वह दुस्साहसी हो जाता है और देश की कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाता है| एक सामान्य अपराधी जेबकाटने से प्रारम्भ कर कालांतर में चोर और डाकू बनता है| देश की जनता जानती है कि निश्चित रूप से उक्त मामले के आरोपियों-लालू यादव व जगन्नाथ मिश्र के ये पहले अपराध नहीं थे किन्तु आज तक दण्डित नहीं हुए फलत: ये अपराध की दुनिया में आगे तेजी से कदम बढाते गए| बिहार राज्य की जनता तो इनके बारे में काफी कुछ जानती है|

जगन्नाथ मिश्र 1972 से 1974 तक बिहार में मंत्री पद पर रहे हैं और मुख्यमंत्री भी रहे हैं| इस अवधि में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बिहार के सहकारिता विभाग की ऑडिट की गयी और इस रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताएं पायी गयी| रिपोर्ट के अनुसार अवैध ऋण वितरण, भ्रष्टाचार और गबन भी पाया गया| जगन्नाथ मिश्र पर पुरानी तारीख में आदेश करने और रिकार्ड में हेराफेरी करने के भी आरोप थे| मजिस्ट्रेट न्यायालय से मामले की शुरुआत हुई और परीक्षण के दौरान मामला कई बार उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय गया| इस बीच राज्य सरकार ने मामला वापिस लेने की अनुमति दे दी किन्तु शिवनंदन पासवान के विरोध के कारण मामला शीघ्र बंद नहीं हो सका| मामला दुबारा उच्चतम न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका के रूप में सुनवाई हेतु आया और न्यायालय के सामने प्रमुख प्रश्न था कि क्या सरकार द्वारा आपराधिक मुकदमा  वापिस लेने का कोई नागरिक विरोध कर सकता है| न्यायालय ने इस सैद्धांतिक प्रश्न का तो सकारात्मक जवाब दे दिया किन्तु मामले में पुन: परीक्षण के आदेश नहीं दिए और घटना के लगभग 14 वर्ष बाद भी दोषियों के विरुद्ध परीक्षण न्यायालय में कोई प्रभावी कार्यवाही प्रारम्भ तक न हो सकी|

परिणामत: इस निर्णय का कोई वास्तविक और व्यावहारिक लाभ देश की जनता को नहीं मिला और भरसक प्रयास  के बावजूद  भ्रष्टाचार, गबन, अमानत में खयानत, रिकार्ड में हेराफेरी का अभियुक्त न केवल दण्डित होने से बच गया बल्कि उसे एक अभियुक्त की तरह न्यायालयी कार्यवाही का सामना तक नहीं करना पडा| कालान्तर में जगन्नाथ मिश्र ने प्रगति की और चारा घोटाले में लिप्त हो गए और लालू यादव के साथ उन्हें भी दोषी पाया गया है| यदि जगन्नाथ मिश्र के विरुद्ध 1980 के दशक में ही प्रभावी कार्यवाही हो गयी होती तो शायद दुस्साहस इस स्तर तक नहीं बढ़ता|  

बिहार राज्य में ही भागलपुर में न्यायालय में बैठे न्यायाधीश पर पुलिस द्वारा हमला करने के मामले में पटना उच्च न्यायालय ने 3 माह से भी कम अवधि में अवमान कार्यवाही के मामले में अन्वीक्षा पूर्ण कर दोषी पुलिस कर्मियों को दण्डित कर दिया| ठीक इसी प्रकार नडियाद (गुजरात) में मजिस्ट्रेट को जबरदस्ती शराब पिलाकर जुलूस निकालने के मामले में अवमान कार्यवाही में उच्चतम न्यायालय ने समस्त दोषी पुलिस अधिकारियों व झूठा प्रमाण पत्र देने वाले डॉक्टर को भी दण्डित कर दिया|

किन्तु देश की जनता का मानना है कि जब यही प्रश्न किसी दोषी न्यायिक अधिकारी को दण्डित करने के सम्बन्ध में उठता है तो भारत के न्यायाधीशों का रुख भिन्न पाया जाता है| लगभग 10 वर्ष पूर्व अहमदाबाद के एक मजिस्ट्रेट पर आरोप लगाए गए कि उसने कुछ वकीलों के साथ मिलकर 40000/- रूपये के बदले भारत के राष्ट्रपति,  मुख्य न्यायाधीश, एक अन्य न्यायाधीश व एक वकील के विरुद्ध फर्जी मामले में वारंट जारी किये| मामला सी बी आई को जांच हेतु दिया गया और एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट भी आ गयी थी किन्तु मामले में परीक्षण उच्चतम न्यायालय में आज तक लंबित है|    

ऐसे ही एक मामले में कलकता उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने पश्चिम बंगाल की ज्योति बासु सरकार के पक्ष में एक आदेश जारी करके उपकृत किया और बदले में उसी दिन आवेदन कर मुख्य मंत्री के विवेकाधिकार कोटे से साल्ट लेक में सस्ती दर पर एक प्लाट आवंटित करवा लिया| मामले की फ़ाइल को भी न्यायाधीश ने अपने पास रख लिया और कोई भी नागरिक फ़ाइल से कोई नकल तक नहीं ले सका| न्यायाधीश महोदय के सेवानिवृत होने तक 12 वर्ष तक फ़ाइल उनके कब्जे में रही|

यद्यपि यह प्रथम दृष्टया व्यक्तिगत लाभ के लिए पद के स्पष्ट दुरूपयोग का मामला था| इस प्रसंग में कलकता उच्च न्यायाल में भी रिट लगाई गयी किन्तु उसमें याची को कोई राहत नहीं मिली| मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा और उच्चतम न्यायालय ने मात्र प्लाट का आवंटन को रद्द करने का प्रभाव रखने वाला ही आदेश दिया जिससे  मिला अनुचित लाभ सरकार को लौटाना पड़े किन्तु पद के दुरूपयोग के लिए कोई दांडिक कार्यवाही के आदेश नहीं  दिए गये| यद्यपि मामले में स्वयं उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हमें स्मरण रखना चाहिए कि बाहरी तूफ़ान की बजाय अन्दर के कथफोड़ों से अधिक ख़तरा है|

राज्य सभा सदस्य रशीद मसूद को एम बी बी एस सीटों के आवंटन में गड़बड़ी के आरोप में दोषी मानते हुए हाल ही में सजा सुनाई गयी है| लगभग ऐसा ही एक मामला  महाराष्ट्र राज्य में वर्ष 1985 में हुआ था जिसमें एम डी की प्रवेश परीक्षा में उत्तर पुस्तिका से छेड़छाड़ कर महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री के रिश्तेदारों को बम्बई विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाकर उपकृत किया गया था| परिणामत: अन्य पात्र सामान्य डॉक्टर एम डी में प्रवेश से वंचित हो गये थे| कालान्तर में मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा और उच्चतम न्यायालय ने पाया कि इस बात में  काफी सशक्त संदेह है कि श्री पाटिल या उसके चहेतों को प्रसन्न करने के लिए गड़बड़ी की गयी और गड़बड़ी साबित है| गड़बड़ी से लाभ मिलने वालों की रिश्तेदारी भी साबित है| मुख्य मंत्री द्वारा सार्वजनिक जांच समिति के सामने उपस्थिति से इन्कारी भी रिकार्ड पर है| न्यायालय ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री की पुत्री जो पहले 3 बार अनुतीर्ण हो चुकी थी को उत्तीर्ण करवाने के लिए प्रयास किया गया| फिर भी उच्चतम न्यायालय ने मामले में आपराधिक कार्यवाही करने का कोई आदेश नहीं दिया|  

अमेरिका में न्यायपालिका की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सरकारें नीजि संस्थाओं से सर्वेक्षण करवाती हैं और उसके आधार पर सरकारें न्यायिक सुधार की रूपरेखा तैयार करती हैं| यदि यही प्रक्रिया भारत में भी अपनाई जाये तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है| जिम्मेदार पत्रकारिता जगत यह कार्य भारत में भी स्वत: कर सकता है क्योंकि उसके पास आवश्यक नेटवर्क भी है| अब उक्त तथ्यों के आधार पर विद्वान पाठक ही अनुमान लगाएं कि देश की न्यायपालिका उनकी आशाओं और अपेक्षाओं पर कितनी खरी उतर रही है व कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष, तटस्थ और दबावमुक्त है| स्वयं प्रज्ञावान नागरिक यह भी मूल्यांकन करें कि न्याय का तराजू कितना संतुलित है और हमारा गणतन्त्र मात्र सीमा पर ही नहीं अंदर से कितना सुरक्षित है |

जय हिन्द ! ….

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एक और फिल्मी जोड़े में अलगाव

ऋतिक और सुजैन एक और फिल्मी जोड़ी के बीच अनबन की खबर आ रही है। ऋतिक-सुजैन के तलाक को लेकर अर्जुन रामपाल का अपनी पत्नी मेहर में जमकर झगड़ा हो रहा है।

मुंबई की जानी मानी हस्ती अंबिका हिंदुजा की पार्टी में दोनों के बीच जबर्दस्त झगड़े की खबर से फिल्मी दुनिया में चटखारे लेकर कई खबरें सुनाई जा रही है।  

अर्जुन पर यह आरोप लगाया जा रहा था कि उनके कारण ऋतिक और सुजैन के रिश्ते में दरार आई है। हालांकि, सुजैन भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि ऋतिक से तलाक लेने का कारण अर्जुन नहीं है।

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अब कैबल टीवी वाला आपको बिल देगा, अपनी पसंद के चैनल देख सकेंगे

अब आपके पास इसी महीने से केबल का बिल आएगा। बिल कैसा आए,यह आप खुद तय करेंगे। ट्राई के निर्देश पर मल्टी सिस्टम ऑपरेटरों (एमएसओ) के असोसिएशन एमएसओ एलायंस ने इस बारे में गाइडलाइंस जारी की है।

एलायंस ने दावा किया है कि बिलिंग में ट्रांसपैरंसी आएगी। एमएसओ ने कहा कि केबल के डिजिटाइजेशन की प्रोसेस में तीन फेज में काम हुआ। पहले फेज में कंस्यूमर्स को सेट टॉप बॉक्स लेना पड़ा, दूसरे फेज में चैनल पैकेज का चयन करते हुए अपनी जानकारी (केवाईसी) जमा करनी पड़ी। इस महीने से ग्राहकों को मासिक बिल मिलेगा यानी नवंबर महीने का बिल दिसंबर में आएगा।

क्या होगा अब

-अब हर महीने केबल बिल मिलेगा। इसमें आपसे लिए गए पैसे का पूरा हिसाब दिया जाएगा। अब तक हर महीने आम तौर पर सब्सक्रिप्शन फी के नाम पर पैसा लिया जाता था और इसके बदले बिल नहीं दिया जाता था।

-बिल सर्विस टैक्स के साथ और आप जितने चैनल देखेंगे उस हिसाब से तय किया जाएगा।

-अगर आप एक खास तारीख से पहले अपने केबल डिस्ट्रिब्यूटर को सर्विस बंद रखने की पूर्व जानकारी देते हैं तो उस दौरान आपको कोई चार्ज नहीं देना होगा।

-अगर आपको केबल सर्विस से शिकायत होती है तो सेंट्रलाइज्ड ग्रीवांस सेल भी 24 घंटे काम करेगा और किसी भी वक्त आप शिकायत कर सकेंगे।

-आप अपने हिसाब से चैनल के पैक को सेलेक्ट कर सकेंगे और इसकी पूरी जानकारी आपको मुहैया कराई जाएगी।

'यह कदम इस लिहाज से भी अहम है कि इससे यह तय होगा कि ग्राहक केवल उन्हीं चैनलों के लिए पैसा दें जो वे देखते हैं। साथ ही अब तक केबल ग्राहकों की शिकायतों के निपटारे के लिए भी कोई मजबूत मैकेनिजम नहीं था। अब इसकी सुविधा मिलेगी। साथ ही अब हर ग्राहक को पता होगा कि वह अपने केबल टीवी का इस्तेमाल किस तरह कर रहे हैं।'

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