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विद्या भवन पॉलिटेक्निक खेलकूद प्रतियोगिताओं के परिणाम

उदयपुर। नवम्बर-विद्या भवन पॉलिटेक्निक महाविद्यालय में आयोजित की जा रही खेलकूद प्रतियोगिताओं के दूसरे दिन लम्बीकूद, डिस्क थ्रो, 400 मीटर रिले रेस, रस्साकसी, स्पून रेस, 100 मीटर, 200 मीटर दौड़ का आयोजन किया गया। 100 मीटर दौड़ में चिराग राजपूत, अमृतलाल सुथार व मुकेश माली ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। 200 मीटर दौड़ में चिराग राजपूत, अमृतलाल सुथार, मुकेश माली ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया।

डिस्क थ्रो (लड़कों ) में देवीलाल पंवार, भुवनेश भट्ट व पियूष पंजाबी ने क्रमशः  प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। डिस्क थ्रो (लड़कियों) में वृतिका व्यास, शिल्पी परिहार व दीप्ति सारस्वत ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। लड़कियों की स्पून रेस में मोनिका जोशी, डिंपल पिछोलिया तथा शिल्पी परिहार ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया।

200 मीटर रिले रेस में सिविल विभाग, इलेक्ट्रिकल विभाग तथा इलेक्टोनिक्स विभाग की टीमों ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया। लम्बीकूद (लड़कों) में भुवनेश भट्ट व रिजवान शेख ने प्रथम व द्वितीय तथा अमृतलाल सुथार व अरूण छीपा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।

लम्बीकूद ( लड़कियों ) में वृतिका व्यास व मोनिका जोशी ने प्रथम व द्वितीय तथा शिल्पी परिहार व ज्योति चैहान ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। लड़कियों की थ्री लेग रेस में जयोति चैहान व वैष्णवी प्रथम चारू बाबेल व शिक्षा दशोरा द्वितीय स्थान पर रहे। तृतीय स्थान पर वृतिका व्यास व मोनिका तथा संध्या व रेखा रहे।

रस्साकसी प्रतियोगिता में  इलेक्ट्रोनिक्स विभाग ने प्रथम तथा सिविल विभाग की टीम ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया।लड़कियों की स्लो साईकिल रेस में वृतिका व्यास, ज्योति चैहान तथा मोनिका जोशी ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किया।                                           

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नरेंद्र मोदी ने जहाँ-जहाँ सभा की, वहाँ भाजपा जीती

नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश में साढ़े तीन दिन में 14 सभाएं करके भाजपा की जीत में अहम भूमिका अदा की है। मोदी की सभा वाले सभी स्थलों पर भाजपा ने जीत हासिल कर ली है।  मोदी की कई सभाओं में उपस्थिति कम रही, लेकिन उसके पहले कार्यकर्ता महाकुंभ में मोदी जब भोपाल आए थे, तो करीब साढ़े चार लाख लोगों ने मोदी-मोदी के नारे लगाए थे।

मध्य प्रदेश की विजय का ज्यादा श्रेय शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर की जोड़ी को दिया जा रहा है, लेकिन नरेंद्र मोदी की सभाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। भाजपा नेतृत्व ने अंतिम समय में नरेंद्र मोदी की सभाएं मध्य प्रदेश में रखी थीं।  कई बार स्थानीय नेता मोदी की सभा में पर्याप्त संख्या में श्रोता भी नहीं जुटा सके थे। सागर की एक सभा में मोदी समय से पहले ही पहुंच गए थे।

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मोदी पर ई-बुक का विमोचन

गाँधीनगर। बुधवार, गुजरात सरकार में कैबिनेट मंत्री व जानेमाने राजनेता सौरभ पटेल के हाथों उज्जैन निवासी व जाने-माने हिन्दी ब्लॉगर सुरेश चिपलुनकर की ई-पुस्तक 'नरेन्द्र मोदी' का विमोचन हुआ. यह पुस्तक भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी पर गत वर्ष लिखे गए उनके लेखों का संकलन है.

ई-पुस्तक अब ऑनलाइन पढ़ने व डाउनलोड करने तथा वितरण के लिए निम्न लिंक पर उपलब्ध है.

https://drive.google.com/file/d/0B0tGE4Sgp8sGS3BrcFZrQjdhVEU/edit?usp=sharing

https://dl.dropboxusercontent.com/u/27743032/Articles%20on%20Narendra%20Modi%20E-Book.pdf

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भांजे की शादी में खूब नाचे अमिताभ बच्चन

अपने साढ़ू राजीव वर्मा के बेटे की शादी में गुरुवार को भोपाल आए अमिताभ बच्चन ने जमकर ठुमके लगाए। उनके लिए खास तौर से 'खई के पान बनारस वाला, छोरा गंगा किनारे वाला..' गाना बजाया गया था।। गाने की धुन पर अमिताभ �ने जब चिरपरिचित अंदाज में नाच कर सबका भरपूर मनोरंजन किया।

अमिताभ बच्चन अपने बेटे अभिषेक बच्चन, बहू ऐश्वर्या और पोती आराध्या के साथ रंगकर्मी राजीव वर्मा के बेटे तथागत की शादी में शामिल होने आए थे।जया बच्चन दो दिन पहले ही यहां पहुंच चुकी थीं। उन्होंने महिला संगीत सहित शादी की अन्य रस्मों में हिस्सा लिया। शादी समारोह बहुत ही सादगीपूर्ण तरीके से आयोजित किया गया था, जिसमें केवल कुछ करीबी रिश्तेदार और दोस्त ही आमंत्रित थे।

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शाबास अरविन्द! बदलेगा युग!!

रोम एक दिन में नहीं बना था। हमें स्वतंत्रता एक दिन या एक साल या एक सदी में प्राप्त नहीं हुई थी। यह संघर्ष भी बहुत लम्बा है और कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती। 125 करोड़ देशवासियों की आत्मा को झकझोरना कोई आसान काम नहीं है। बिना समुचित साधनों के एक आश्चर्यजनक चेतना देश में जगा दी अरविन्द ने। वाह! बहुत खूब!! साधन सम्पन्न भ्रष्टाचरियों के हर चक्रव्यूह को तोड़ कर, इतने कम समय में, साधनो के नितान्त अभाव में, बाहर और अन्दर के विरोध के स्वरों में, "आप" को जिस स्थान पर आज खड़ा कर दिया है, क्या वह एक अचम्भा नहीं है? स्वराज हासिल करना एक अभूतपूर्व चमत्कार है वह अवश्य होगा।

अरविन्द की द्र्ढ़ और समझौता न करनेवाली रणनीति बहुत सफ़ल रही जिसका कारण है उनकी अन्तरात्मा द्वारा निरन्तर प्रेरणा और हर कठिन से कठिन चक्रव्यूह का द्रढ़ता से चुनौती समझ कर सामना करना। बहुत से विरोधियों ने यथा सम्भव बिघ्न डालने, एक से एक गन्दे आरोप लगाने, बदनाम करने के असफ़ल प्रयास किये। कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। आज वे वाध्य हैं स्वय अपनी रणनीति को बदलने के लिये। अरविन्द ने सिद्ध कर दिखाया कि पैसे के अभाव में भी एक आम आदमी चुनाव लड़ सकता है और जीत भी सकता है। कितना बड़ा परिवर्तन है यह आज की कुन्ठित व्यवस्था में!!!! देश में यह परीक्षण बहुत सीमा तक सफ़ल रहा। लोग समझ चुके हैं कि देश में भ्रष्टाचाररूपी कस का बध करने के लिये और सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिये कृष्ण ने जन्म ले लिया है। वह अपने राजनीतिक वात्सल्य के कारण यदि आज उनका बध नहीं कर सकता तो कल बिल्कुल निश्चितरूप से करेगा। आज बहुत डरे हुए, सहमे हुए और घबराए हुए है नूरा कुश्ती करने वाले भ्रष्ट सत्तापक्ष और विपक्ष। सत्तापक्ष तो जान गया है कि यह उनका अन्तिम कार्यकाल है और शायद राजकुमार का राज्याभिषेक भी न हो पाए। शायद कोई जनलोकपाल जैसा� चमत्कार ही उनके लिये एक आशा की किरण बन सकता है। शायद इसीलिये सत्तापक्ष ने इसी सत्र में लोकपाल बिल और महिला आरक्षण बिल पास करवाने का नाटक भी शुरू कर दिया है। अगर वह वास्तव में इस मामले में गम्भीर हैं तो हो सकता है कि जनता के क्रोधरूपी गुब्बारे के फ़ूटने से पूर्व उसकी कुछ हवा निकाल कर जनाक्रोश कम करने की कोशिश करें। आशा तो कम ही नज़र आती है।

जहां एक ओर देश के बिके और बिकाऊ� मीडिया ने चन्द पैसों के खातिर इस आन्दोलन को ध्वस्त करने में जयचन्द और मीर ज़ाफ़र की भूमिका निभाई, वहीं प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार सच्चाई का साथ देकर आज जनता के चहेते बन गये: “अरविंद का मूल्याँकन सीटों की संख्या से नहीं होना चाहिए । तब भी नहीं जब अरविंद की पार्टी धूल में मिल जाएगी और तब भी नहीं जब अरविंद की पार्टी आँधी बन जाएगी । इस बंदे ने दो दलों से लोहा लिया और राजनीति में कुछ नए सवाल उठा दिये जो कई सालों से उठने बंद हो गए थे । राजनीति में एक साल कम वक्त होता है मगर जब कोई नेता बन जाए तो उसे दूर से परखना चाहिए । अरविंद को हरा कर न कांग्रेस जीतेगी न बीजेपी । तब आप भी दबी ज़ुबान में कहेंगे कि राजनीति में सिर्फ ईमानदार होना काफी नहीं है । यही आपकी हार होगी । जनता के लिए ईमानदारी के कई पैमाने होते हैं ।

इस दिल्ली में जमकर शराब बंट गई मगर सुपर पावर इंडिया की चाहत रखने वाले मिडिल क्लास ने उफ्फ तक नहीं की । न नमो फ़ैन्स ने और न राहुल फ़ैन्स ने । क्या यह संकेत काफी नहीं है कि अरविंद की जीत का इंतज़ार कौन कर रहा है । हार का इंतज़ार करने वाले कौन लोग हैं ? वो जो जश्न मनाना चाहते हैं कि राजनीति तो ऐसे ही रहेगी । औकात है तो ट्राई कर लो । कम से कम अरविंद ने ट्राई तो किया । शाबाश अरविंद । यह शाबाशी परमानेंट नहीं है । अभी तक किए गए प्रयासों के लिए है । अच्छा किया आज मतदान के बाद अरविंद विपासना के लिए चले गए । मन के साथ रहेंगे तो मन का साथ देंगे ।“ —रवीश कुमार (कस्बा ब्लॉग से)

दिल्ली के चुनाव में “आप” के 12,000 समर्थक जिनमें 4,000 छात्र (400 IIT दिल्ली से) डेड़ लाख प्रभारी जो कि अपने निकट के 20 परिवारों से सम्पर्क बनाए रखे, कूद पड़े थे। हज़ारों उच्च शिक्षा प्राप्त युवा, इंजीनियर, डाक्टर, साफ़्टवेयर इंजीनियर, entrepreneurs तथा अन्य व्यवसायों से जुड़े व्यक्ति आम आदमी पार्टी से बिना अपेक्षा निस्वार्थ जुड़े हैं। उनका केवल एक ही बहुत बड़ा स्वार्थ है “सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन” ताकि देश में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना हो सके। इस आन्दोलन को चलाने वाली आम आदमी पार्टी और इससे जुड़े यह सभी लोग बधाई के पात्र हैं। डटे रहे और डट कर ज़ालिमों का मुकाबला किया। यही सबसे महत्व्पूर्ण है।
We shall have to fight many such battles before winning the war.

साभार –नवभारत टाईम्स से

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जहाँ गए राहुल गाँधी, वहाँ कांग्रेस का का बंटाढार

चाहे इसे महंगाई का असर कहें या फिर मोदी की देश में लहर, जिससे राहुल गांधी भी कांग्रेस प्रत्याशियों को हार से नहीं बचा सके। मोदी-राहुल की समान विधानसभा क्षेत्रों में हुई सभाओं में से 23 पर भाजपा और महज तीन सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को जीत मिली। प्रतिद्वंद्वी पार्टियां देश में मोदी की लहर मानने से इंकार करती रही हैं, लेकिन विधानसभा चुनावों में मोदी फैक्टर, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मुकाबले भाजपा प्रत्याशियों को जीत दिलाने में भारी पड़ा है।

कुछ जगह दिखा मोदी का असर

हर राज्यों में तूफानी प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी ने 11 समान विधानसभा क्षेत्रों में रैलियां कीं। ये सभाएं बीकानेर, बांसवाड़ा, जयपुर, अजमेर, दक्षिणपुरी, इंदौर, मंदसौर, शहडोल, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में हुई थी। इन सभाओं का 27 सीटों पर सीधा प्रभाव था। दोनों पार्टियों के स्टार प्रचारकों की ओर से की गई रैलियों के प्रभाव वाले स्थानों में से जयपुर की नौ सीट, बीकानेर की दो सीट, बांसवाड़ा की एक, अजमेर की दो सीट, रायपुर की तीन सीट, इंदौर की चार सीट, जगदलपुर की एक सीट और मंदसौर की एक सीट पर भाजपा के प्रत्याशियों को जीत मिली।

वहीं, कांग्रेस के प्रत्याशियों को रायपुर, बस्तर और इंदौर की एक-एक सीट पर जीत हासिल हुई है। दोनों की समान स्थानों पर हुई रैलियों में भाजपा 23 पर जीती, तो कांग्रेस को मिलीं महज 3 सीटें। अब बात दिल्ली की, जहां मोदी का जोर ज्यादा नहीं दिखा। नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री के प्रत्याशी डॉ. हर्षवर्धन का जादू भी नहीं चला। जबकि दिल्ली की सत्ता से पंद्रह साल के वनवास को खत्म करने के लिए भाजपा के सभी राष्ट्रीय नेताओं ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था।

आधा दर्जन से अधिक जगहों पर नरेंद्र मोदी की धुआंधार रैली हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने सौ से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया। बड़ी संख्या में स्टार प्रचारक उतारे गए।

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को दिल्ली की कमान सौंपी गई। बावजूद इसके भाजपा ऐसी एक दर्जन सीटों पर हार गई, जो उसका गढ़ मानी जाती हैं। पार्टी ने चुनाव के कुछ ही दिन पहले सीएम का चेहरा पेश कर नया प्रयोग भी किया। फिर भी भाजपा सत्ता की कुर्सी से चार सीढ़ी नीचे ही अटक कर रह गई।

पार्टी पर अब यह भी सवाल उठ रहा है कि आक्रामक चुनावी रणनीति के बाद भी पार्टी अपनी परंपरागत सीट हार गई। आम आदमी पार्टी की परफारमेंस को देखते हुए मोदी फैक्टर पर भी सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के 24 विधायकों में 11 विधायक जिनमें विधायकों के पुत्र प्रत्याशी भी शामिल हैं, को हार का मुंह देखना पड़ा।

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हिन्दी का ये हाल किसने किया और किसने बचाया है अब तक?

हज़ारों निष्ठावान हिंदी प्रेमी आज़ादी के बाद से इस प्रयास में लगे हुए हैं कि देश में इस भाषा को सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा का दरजा मिले ,   अखिल भारतीय सरकारी सेवाओं, शीर्ष  प्रबंधन , मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों में यह अध्ययन  और परीक्षा का माध्यम बने।  खेद की बात है कि आज़ादी के ६६ वर्ष के बाद भी हिंदी भाषा को यह दरजा सही मायनों में नहीं मिल पाया है. यही नहीं हिंदी भाषी क्षेत्रों में अभिभावक बच्चों के भविष्य को मद्देनज़र रखते हुए केवल महानगरों में ही नहीं वरन छोटे छोटे कस्बों में भी अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाते हैं।  जमीनी सचाई यह है कि हिंदी सबसे ज्यादा हिंदी भाषियों के कारण ही उपेक्षित है.

साथ ही आज हम एक और सचाई बताना चाहते हैं कि अंग्रेजी के प्रति जबर्दस्त लगाव के वावजूद मनोरंजन में अंग्रेजी हावी नहीं हो पायी है, जबर्दस्त प्रमोशन करने पर भी अंग्रेजी की फ़िल्में मनोरंजन की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं बन पा रही हैं।  हिंदी फ़िल्में जिन्हे अब देश में ही नहीं विदेशों में लोग बॉलीवुड  के नाम से जानते हैं निर्विवाद मनोरंजन के सिंहासन पर आरूढ़  बैठी हैं.  पिछले कई सालों से हर साल कई हिंदी फ़िल्में १०० करोड़ रूपये से भी जायदा का व्यवसाय कर लेती हैं.

यह भी सच है कि हिंदी फिल्मों से जुड़े ज्यादातर लोगों जिसमें निर्माता से लेकर सितारे तक शामिल हैं उनका दूर दूर तलाक हिंदी से कोई लेना देना नहीं है न ही वे हिंदी प्रेम की वजह से इस उद्द्योग का हिस्सा हैं. हिमांशु राय , देविका रानी, सोहराब मोदी, वैजयन्ती माला, रागनी, पद्मनी, हेमा मालिनी, जयप्रदा, रेखा, राखी, श्रीदेवी से लेकर दीपिका पादुकोण, जान अब्राहम सूची बहुत लम्बी है ये वो लोग हैं न तो इनके घरों में हिंदी बोली जाती थी न ही उनकी शिक्षा  दीक्षा हिंदी में हुई  थी. हिंदी फिल्मों में काम करना उनके लिए विशुद्ध व्यवसाय है. हिंदी फिल्मों का बजट इस लिए बड़ा होता है क्योंकि उनको देखने वालों का क्षेत्र और संख्या बाकी सभी भाषों पर बहुत भारी है , जहाँ गैर हिंदी फिल्मों को सरकारी अनुकम्पा, सब्सीडी, अनुदान , थियेटर प्रायोरिटी और पुरूस्कार सभी कुछ दिए जाते हैं वहाँ हिंदी फ़िल्में बगैर  किसी बैसाखी के फल फूल रही हैं, इनकी इसी ताकत को समझ कर हॉलीवुड के स्टूडियो भी या तो कूद पड़े हैं या फिर कूदने की तैयारी में हैं. कमोबेश यही हाल हिंदी के मनोरंजन चैनलों का भी है ,  इन पर जितने भी रियल्टी शो आते हैं उन पर ज्यादातर सहभागी अहिन्दी भाषी क्षेत्रों से आते हैं. इन चेनलों पर आने वाले प्रोग्रामों को लिखने, बनाने वालों में भी अहिन्दी भाषी लोगों की तादाद कहीं ज्यादा है.

इस लिए यह बात साफ़ साफ़ समझनी होगी कि भाषा वही फल फूल सकती है  जो कि व्यवसाय से जुडी हो यानी जिसके इस्तेमाल से माल मिल सकता हो. आपको भले ही आश्चर्य हो लेकिन मुझे नहीं हुआ जब दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति   की मोहतरमा  मिशेल ओबामा ने हाल ही में बालीवुड डांस सीखने की इच्छा व्यक्त की.

जितनी भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में अपना माल या सेवायें बेच रही हैं उनमें काम करने वाले लोग केवल अंगरेजी में शिक्षित दीक्षित हैं अंगरेजी में ही सोचते हैं पर बड़ी मजबूरी है   माल बेचने के लिए विज्ञापन में 'ठंडा मतलब कोका कोला', 'कुछ मीठा हो जाए' , 'पप्पू पास हो गया', दाग अच्छे हैं' जैसे खांटी जुमले गढ़ते हैं, और जो अंगरेजी में ही विज्ञापन करते हैं उन्हें इतनी सफलता नहीं मिलती है. अंगरेजी को जबर्दस्त पुश मिलने के वावजूद अंगरेजी का समाचारपत्र टाइम्स आफ  इंडिया भारत का सबसे ज्यादा बिकने वाला नहीं है, वस्तुतः यह हिंदी के दैनिक जागरण से कई पायदान नीचे है.

इसलिए मेरा मानना है कि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के पाखण्ड को छोड़ कर बेहतर यही होगा कि इसे स्वाभाविक रूप से व्यावसायिक भाषा के रूप में पनपने दिया जाय, फिर तो जिसकी गरज होगी वो इसे सीखेगा ! अगर आप मुलायम सिंह यादव को जानते हैं तो उन्हें कहें कि लोकसभा में केवल राष्ट्र भाषा में भाषण देने की मांग  करने के नाटक की जगह  अपने गृह प्रदेश में इस भाषा को व्यवसाय से जोड़ने का काम कर के दिखाएँ तो शायद इसका कहीं भला हो सकता है.

लेखक ब्रांड कंसल्टेंट हैं इनका ब्लॉग है-www.desireflection.blogspot.com

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लोकसभा चुनावों के लिए माफिया को टिकट देने का सिलसिला शुरु

समाजवादी पार्टी ने कुख्यात माफिया सरगना अतीक अहमद को सुल्तानपुर से लोकसभा प्रत्याशी बना दिया है।

मूलत: इलाहाबाद के बाहुबली माफिया अतीक अहमद 2004 से 2009 तक इलाहाबाद की फूलपुर ‌लोकसभा सीट से सांसद भी रहे। इस बीच, सपा ने 2008 में ही अतीक को पार्टी से निकाल दिया। 2009 लोकसभा चुनाव में अतीक ने बसपा का दामन थामा, पर मायावती ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया।

इसके बाद, 2009 लोकसभा चुनाव में अतीक ने अपना दल पार्टी के टिकट से प्रतापगढ़ में किस्मत आजमाई। हालांकि, यहां वह चौथे पायदान पर रहे। चुनाव के दौरान दिए एफिडेविट में बताया गया कि अतीक के खिलाफ 44 मामले दर्ज हैं।

इनमें हत्या से लेकर हत्या की कोशिश तक कई संगीन धाराओं में रिपोर्ट दर्ज है। अतीक पर गुंडा एक्ट, गैंगस्टर एक्ट, 7 क्रिमिनल लॉ अमेण्डमेण्ट एक्ट और आयुध अधिनियम के तहत कार्रवाई भी की जा चुकी है।

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क्या है अनुच्छेद 370

आजकल अनुच्छेद 370 सुर्खियों में है | दरअसल, भारतीय संविधान की धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य (कुछ अर्थों में विशेष स्वायत्त राज्य) का दर्जा प्रदान किया गया है | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 एक टेम्पररी प्रोविजन के तौर पर दिया गया था जो कि जम्मू कश्मीर को विशेष स्वायत्त राज्य का दर्जा देता है | भारतीय संविधान के पार्ट XXI के तहत, जो कि "टेम्पररी, ट्रांजिशनल और स्पेशल प्रोविजन" को डील करती है, जम्मू कश्मीर को स्पेशल स्टेटस मिलती है |

इसे लेकर शुरू से अब तक विवाद कायम है, इसके प्रावधानों के तहत, भारत की केन्द्र सरकार को रक्षा, विदेश मामलों, वित्त समेत संचार जैसे विषयों में कानून बनाने का अधिकार है | इसके अलावा अन्य विषयों पर कानून बनाने के लिए भारतीय संसद को जम्मू कश्मीर राज्य की सरकार की सहमति की जरूरत होती है, वहाँ कश्मीर का अपना कानून चलता है | भारत के संविधान के सभी प्रावधान जैसे भारत के अन्य राज्यों पर लागू है उस तरह कश्मीर में ये नहीं है | उदहारण के लिए, सन 1965 तक वहाँ के राज्य प्रमुख यानि गवर्नर को "सदरे रियासत" और मुख्यमंत्री को "वजीरे आज़म" कहा जाता था |

यहां के लोगों के लिए कानून अलग तरह के हैं, देश के अन्य भागों के मुकाबले यहां संपत्ति और मौलिक अधिकारों में भी काफी फर्क है | विशेष दर्जा हासिल होने के चलते इस राज्य में धारा 356 प्रभावी नहीं होती, जिसके चलते राष्ट्रपति के पास राज्य सरकार को बरखास्त करने का अधिकार नहीं है | 1976 का शहरी भूमि कानून भी इस राज्य में लागू नहीं होता, इस कानून के तहत भारतीय नागरिक को जम्मू-कश्मीर में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है | ‘भारतीय जन संघ’ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के खिलाफ आवाज उठायी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस संवैधानिक प्रावधान के पूरी तरह खिलाफ थे, मुखर्जी 1953 में भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गये थे, तो वहां यह कानून लागू था कि भारतीय नागरिक को जम्मू-कश्मीर में अपने साथ पहचान पत्र रखना जरूरी है | इसके खिलाफ उन्होंने भूख हड़ताल की, जिसके चलते बाद में इस प्रावधान को खत्म किया गया |

अनुच्छेद 370 के कारण भारत की केन्द्र सरकार को अनुच्छेद 360 के तहत आर्थिक इमरजेंसी लगाने का अधिकार नहीं है | वहाँ पर केवल बाहरी (विदेशी) आक्रमण के समय ही इमरजेंसी लगाई जा सकती है | किसी अंदरूनी परेशानी या ख़राब हालात की वजह से ये इमरजेंसी नहीं लग सकती है, जब तक वहाँ की राज्य सरकार, भारत की केन्द्र सरकार से इसके लिए निवेदन नहीं करती है | यही वजह है कि वहाँ के लोग अलगाववाद की मानसिकता के साथ जीते हैं, और भारत सरकार कुछ कर नहीं पाती | हुर्रियत कांफ्रेंस के लोग हो या यासीन मालिक जैसे लोग, खुलेआम भारत के खिलाफ बोलते हैं |

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अर्जुन कपूर खुलकर बताएंगे सलमान और चचेरी बहन सोनम कपूर के बारे में ज़ूम पर

फिल्मी सितारों से भरे परिवार में पैदा हुए और पले बढ़े अर्जुन को छोटी उम्र से ही बॉलीवुड की चमक-दमक और ग्लैमर ने अपनी तरफ खींच लिया था। युवा उम्र में ही एक डीवीडी प्लेयर की मांग करने वाले इस अभिनेता का फिल्मी दुनिया के प्रति जुनून काफी स्पष्ट था क्योंकि उसके पास फिल्मों का एक बहुत बड़ा संग्रह था। देखिए इस युवा सनसनी को कैमरे के पीछे से शुरू हुए अपने फिल्मी सफर से लेकर कैमरे के सामने आने तक की कहानी, उन्हीं की जुबानी, सिर्फ जूम पर बेहद लोकप्रिय शो जेनेक्सट, फ्यूचर ऑफ बॉलीवुड में।

एक तरफ वह अर्जुन था जो कि कल हो ना हो के सेट्स पर कई बार सो भी जाता, और फिर उसी अर्जुन ने एक्टिंग में आने के लिए जीतोड़ मेहनत भी की। अर्जुन ने ट्रेनिंग और इंडस्ट्री के के दांव पेच दबंग खान से सीखे। जाहिर है, इस फिल्म निर्माता के बेटे ने ट्रेनिंग 3-4 साल तक सिर्फ इंडस्ट्री के बेहतरीन हीरो सलमान से ली। देखिए अपने गुरू और सरंक्षक सलमान खान के साथ अपने नटखट संबंधों और राखी बहन कैटरीना कैफ के बारे में बात करते हुए सिर्फ जूम पर।

एक तरफ पहली ही फिल्म इश्कजादे में उसकी भूमिका एक बेशर्म, असंवेदशील और लापरवाह युवा की थी, जबकि अर्जुन असल जिंदगी में इसके विपरीत है। अर्जुन हर कदम को उठाने से पहले उस पर 100 बार विचार करता है और वह लड़कियों से बात करने की भी हिम्मत नहीं रखता है। चूकिए मत, अर्जुन को अपने प्यारे चाचा संजय कपूर के बारे बातें करते हुए और अपने चाचा के साथ पहली बार ड्रिंक लेने की यादों को सामने लाते हुए।

उसकी सह-अभिनेत्री परिणीति को फिल्म के लिए नेशनल अवॉर्ड भी मिला, बहरहाल फिल्म की शुरूआत में अर्जुन की उससे कुछ खास बनती भी नहीं थी। बल्कि तथ्य तो ये है कि अर्जुन को कई बार सेट पर उसका व्यवहार काफी चिढ़ा भी देता था। देखिए जेनेक्सट पर कैसे अर्जुन परिणीति के बारे में कई सारे खुलासे करता है।

इतना ही नहीं!! देखिए परिवार और दोस्तों- पिता बोनी कपूर, चाचा संजय कपूर, वरूण धवन और पुनीत मल्होत्रा को इस युवा सनसनी के बारे में अपने विचार देते हुए। एक ही उम्र के अर्जुन और सोनम एक-दूसरे के काफी करीब रहे हैं और बहन-भाई की तरह ही एक-दूसरे को दिल के सभी राज भी बताते रहे हैं। देखिए कैसे सोनम कपूर सारे राज खोलते हुए बताती है कि वह अपनी डेट्स पर अर्जुन को महज कंपनी करने के लिए जोर-जबरदस्ती से ले जाती थी।

देखिए, जेनेक्सट, फ्यूचर ऑफ बॉलीवुड, सोमवार 2 दिसंबर, 2013, रात 8 बजे, सिर्फ जूम पर।

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