Friday, April 4, 2025
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इस बार ग्रैमी अवॉर्ड्स में वैदिक ऋचाओं की धारा सम्मानित

कल लॉस एंजल्स ने फिनिक्स की तरह साबित किया कि  वह राख के ढेर से वापस उठने की ताक़त रखता है. मौक़ा था 67 वें ग्रैमी अवार्ड का , इस बार यह समारोह डाउन टाउन में अवस्थित क्रिप्टो.कॉम एरीना में हुआ।
इस बार ग्रैमी की  न्यू ऐज  संगीत श्रेणी में पुरस्कार त्रिवेणी एल्बम को मिला है जिसे अमेरिका में भारतीय मूल की व्यवसायी, फ़िलन्थ्रॉपिस्ट और संगीतकार चंद्रिका टंडन ने  वाउटर केलरमैन और इरू मतसुमोटो के साथ मिल कर तैयार किया है . इस श्रेणी में चंद्रिका के अलावा अन्य नामिति सितार वादक अनुष्का शंकर की  एल्बम  Chapter II: How Dark It Is Before Dawn और राधिका वेकरिया की  Warriors Of Light भी शामिल थीं जिनका स्रोत भी भारतीय संगीत परंपरा से ही आता है ।
चंद्रिका टंडन की एल्बम की बात करें तो इसमें चार संगीत रचनाएं हैं : pathway to light, chant in A , journey within ,aether’s serenade जो वैदिक रचनाओं  , आध्यात्मिक चिन्तन और विश्व संगीत का फ्यूज़न है , वैदिक ऋचाओं, बांसुरी के माधुर्य और सेलो के गंभीर प्रभाव से सचेतन मनोस्थिति , अपने अस्तित्व की खोज और कॉस्मिक कनेक्शन जैसा प्रभाव लगता है जैसे कि  इन  रचनाओं में विश्व संगीत एकाकार हो गया हो. यूँ चंद्रिका फ्यूज़न संगीत में कोई नया नाम नहीं हैं, उन्होंने अपने पहले फ्यूज़न एल्बम Soul Call  से 2009 में अपनी उपस्थित दर्ज की थी और 2011 में ग्रैमी में समकालीन विश्व संगीत श्रेणी में नामित हुई थीं. अपनी व्यावसायिक व्यस्तताओं के वावजूद हिंदुस्तानी, कर्नाटिक और पश्चिमी संगीत परंपराओं का गहन अध्ययन भी किया.
चंद्रिका मूल रूप से तमिलनाडु की हैं और पेप्सी की पूर्व   इंदिरा नूगी  की सगी बहन हैं . संगीत के साथ ही चंद्रिका की पहचान एक सफल व्यवसायी के रूप में भी है . चंद्रिका मैक-किनसे एंड कंपनी में पार्टनर रहीं बाद में अपने पति के साथ मिल कर टंडन कैपिटल एसोसिएट की स्थापना की. टंडन दंपति ने अमेरिका में एक उदार दान-दाता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई है और अमेरिका में शिक्षा व कलाओं को बढ़ावा देने में अग्रणी रही हैं , न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी को चंद्रिका की फाउंडेशन ने 10 करोड़ डॉलर की विशाल रकम दी है जिसके कारण इस यूनिवर्सिटी के  इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम अब NYU Tandon School of Engineering हो गया है.

अश्लील सामग्री मुक्त भारत बनाने के लिए केंद्र लाए कड़ा कानून : प्रो.द्विवेदी

भोपाल। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी का कहना है कि अश्लील सामग्री मुक्त भारत बनाने के लिए केंद्र सरकार को कड़ा कानून लाने की आवश्यकता है। इसके लिए मीडिया और समाज के हर क्षेत्र के लोग आवश्यक दबाव बनाएं और जागरूकता पैदा करें।
वे आज वेब जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित वर्चुअल संवाद कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष आनंद कौशल, राष्ट्रीय महामंत्री अमित रंजन, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा.लीना सहित बड़ी संख्या में वेब जर्नलिस्ट और मीडिया विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
प्रो.द्विवेदी ने कहा कि यह डिजिटल समय है, डिजिटल माध्यमों से सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्राप्त हो रहा है। किंतु बाजार के खिलाड़ियों ने इस माध्यम को अश्लीलता फैलाने का भी माध्यम बना लिया है। इससे समाज में स्त्री के विरुद्ध अपराध और छोटी बच्चियों के साथ भी अमानवीय घटनाएं हो रही हैं। इसे रोका जाना चाहिए। समाज अश्लीलता के प्रसारकों की जगह सिर्फ जेल में होनी चाहिए।

प्रो. द्विवेदी ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि सूचना कोई भी दे सकता है , किंतु खबर या समाचार के साथ भरोसा जुड़ा हुआ है। संपादन और निश्चित प्रक्रिया से गुजर कर ही कोई सूचना ‘समाचार’ बनती है। एक समाचार में बहुत सी सूचनाएं शामिल हो सकती हैं। किंतु कोई भी समाचार संपादन और प्रोसेस के बाद ही बन सकता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर संपादन मुक्त सूचना का अंबार है, ये लोग सूचना प्रदाता हो सकते हैं, पत्रकार नहीं। पत्रकारिता एक जिम्मेदारी भरा काम है। इसलिए सोशल मीडिया पर मचे धमाल के लिए पत्रकारिता को लांछित नहीं किया जाना चाहिए।
विश्वसनीयता और प्रामाणिकता जरूरी:

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति रहे प्रो.द्विवेदी ने कहा कि प्रामाणिकता और विश्वसनीयता मीडिया का मूलमंत्र है। खबरों की सत्यता परखे बिना उन्हें परोसना सामाजिक अपराध है। फेक न्यूज,हेट न्यूज, पेड न्यूज जैसे शब्दों से पत्रकारिता की उज्ज्वल परंपरा कलंकित होती है। उनका कहना था हम खबरें देने में पिछड़ जाएं पर पाठकों और दर्शकों का भरोसा न तोड़ें।

प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि यह समय तीन ‘वी’ का है -वीडियो, वायस और वर्नाकुलर। डिजिटल समय ने हमें वैश्विक आकाश दिया है। आज हमारी भारतीय भाषाओं डिजिटल माध्यमों से वैश्विक प्रवास करते हुए प्रसिद्ध प्राप्त कर रही हैं। लिपि का संकट न होने के कारण हमारे गीत, संगीत, विचार, समाचार सब दुनिया भर में सुने और देखे जा रहे हैं।

डिजिटल मीडिया के महत्व को समझाते हुए कहा प्रो.द्विवेदी ने कहा  कि अभी फिक्की की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2023 में भारत में प्रिंट मीडिया का रेवेन्यू मात्र 9 प्रतिशत बढ़ा है तो डिजिटल मीडिया का रेवेन्यू 67 प्रतिशत बढ़ा है। देश में प्रिंट मीडिया के पाठकों में 13 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है तो डिजिटल मीडिया में 71 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।  2025 तक भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग 98 करोड़ होने की संभावना है। अगर देश में 98 करोड़ स्मार्टफोन हैं तो समझिए डिजिटल मीडिया के 98 करोड़ उपभोक्ता पहले दिन से तैयार हैं।

सूर्य मंदिरों का ये रहस्य जानकर आप अपने पूर्वजों पर गर्व करेंगे

सूर्य इस शब्द मे ही  गूढता भरी हुई है. इक्कीसवी सदी का एक चौथाई हिस्सा समाप्त हो रहा है, फिर भी सूर्य का आकर्षण और सूर्य संबंधी ज्ञान / अज्ञान, आज भी वैसा ही है, जैसा हजारों वर्षों पहले था..!

मानव के जाती के उन्नती और उत्क्रांती के काल मे विश्व के लगभग सभी समूह प्रकृती को पूजते थे. दक्षिण अमेरिका की इन्का / माया संस्कृति हो, ग्रीक और इजिप्शियन सभ्यता हो, या रोमन, हिंदू और चिनी परंपरा… इन सभी सभ्यताओं में और इन सभी स्थानों पर, प्रकृती पूजन के साथ सूर्य की भी पूजा होती थी. उस प्रारंभिक काल मे तत्कालीन मानव जाती को यह समझ मे आया होगा, कि हमे मिलने वाली ऊर्जा सूर्य से मिलती है. दिन और रात, और ऋतू  और मौसम मे बदलाव भी सूर्य के कारण होते है. इसलिये अलग – अलग नामो से, अलग – अलग पद्धती से, सूर्य देवता की उपासना सब जगह होती रही. युरोपियन्स  ने इन प्रकृती पूजकों को ‘पेगन’ यह लेबल लगाया था. यह तुच्छता दर्शक और उनको हीन समझनेवाला शब्द था.

भारत मे भी सूर्य की उपासना अनादी काल से हो रही है. यजुर्वेद मे एक सुक्त है- ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ (7/42).

अर्थात, सूर्य को सभी जड, चेतन पदार्थों का आत्मा कहा गया है. शुक्ल यजुर्वेद मे ‘सूर्य सूक्त’ या ‘मित्र सुक्त’ इस शीर्षक से कुल 17 श्लोक दिये है. भारत मे होने वाली सूर्य पूजा यह केवल किसी अनाकलनीय प्रकृती भगवान की पूजा नही है, तो सूर्य के सभी तत्व और गुणधर्म की जानकारी होते हुए की गई उपासना है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल मे 527 से 599  सूक्त, सूर्य के वर्णन करने वाले सूक्त है. इसमे सूर्य के सप्तवर्णी (सात रंग के) किरण होते है,ऐसा स्पष्ट उल्लेख है. इसीलिए भारत में प्राचीन समय से सूर्यदेवता के जो मंदिर है, उनमे यह वैज्ञानिक जानकारी कूट-कुटकर भरी है. उसमे से कुछ ही हम ‘डीकोड’ कर सके हैं. बाकी बची हुई प्रचुर जानकारी, अभी भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है.

भारत की इस सूर्य पूजा परंपरा को प्राचीन समय मे अनेक देशों ने अपनाया. सूर्य का संस्कृत में नाम है ‘मित्र’. हमारे बारा सूर्य नमस्कारों का प्रारंभ ही ‘ओम मित्राय नमः’ से होता है. सूर्य का यह ‘मित्र’ नाम, इजिप्शियन संस्कृती से लेकर युरोप तक, कई स्थानों पर मिलता है. जर्मनी में फ्रॅन्कफर्ट के पास ‘झालबर्ग’ नाम के रोमन कालीन किले मे एक संग्रहालय है. उसमे पहले / दूसरे सदी के सूर्यदेवता की प्रतिमा मे, सूर्य के लिए, ‘मित्रा’ शब्द का प्रयोग किया गया हैं. मित्रा या सूर्य इस शब्द का और उस देवता के पूजा का संबंध भारत के साथ स्पष्ट रूप से दिखाया है.

प्राचीन समय में विशाल, एकसंघ और अखंड भारत में सूर्य के अनेको मंदिर थे. बादमे इस्लामी आक्रमकोंकी ‘बुत शिकन’ मानसिकता के कारण इनमे से अधिकतम मंदिर गिराये गये. ध्वस्त किये गये. उनमे से कुछ ही मंदिरों का पुनर्निर्माण हो सका.

जिस सबसे प्राचीन सूर्य मंदिर का उल्लेख इतिहास मे आता है, वह आदित्य सूर्य मंदिर आज के पाकिस्तान के मुलतान मे है. इस सूर्य मंदिर का उल्लेख ग्रीक सेनानी ‘एडमिरल स्कायलेक्स’ ने किया है. एडमिरल स्कायलेक्स, ईसा पूर्व वर्ष ५१५ मे इस क्षेत्र मे आया था. उन दिनों मुलतान यह ‘काश्यपपूर’ इस मूल नाम से जाना जाता था.  यह मंदिर कम से कम, 5000 वर्ष पुराना होगा,ऐसी मान्यता है. उसके बाद आये  चिनी प्रवासी ह्युएन त्सांग ने वर्ष 641 मे इस मंदिर को भेट दी. वे लिखते है, ‘यह आदित्य मंदिर अत्यंत भव्य और विपुलता से भरा हुआ है. इसमे सूर्यदेवता की प्रतिमा सोने की बनी हुई है. वह मौल्यवान और दुर्लभ रत्नोंसे अलंकृत है.’

आगे चल कर अल् बिरुनी इस अरब इतिहासकार ने ग्यारहवी सदी मे किये हुए मुलतान यात्रा मे इस मंदिर का उल्लेख किया है. आठवी सदी मे, अर्थात, वर्ष 712 मे उम्मयाद साम्राज्य के तत्कालीन खलिफा ने, मोहम्मद बिन कासीम को सिंध प्रांत पर आक्रमण करने भेजा. इस मोहम्मद बिन कासीम ने राजा दाहीर को इस युद्ध मे परास्त करके, मुलतान समेत लगभग पूरा सिंध प्रांत अपने अधिपत्य मे ले लिया. तब उसके ध्यान मे आया की मुलतान का आदित्य मंदिर और उसके आसपास लगने वाला बाजार, यह उसके कमाई का बडा साधन बन सकता है. इसलिये उसने यह मंदिर तोडा नही, वैसे ही रहने दिया. इस मंदिर से मिलने वाला राजस्व, उसके लिए मोटी तगडी कमाई था. बाद में जब आसपास के क्षेत्र के हिंदू राजा मुलतान पर आक्रमण करके मुस्लिम आक्रांताओंको  खदेडने आते थे, तब यह कासिम धौंस देता था, कि ‘मुलतान पर आक्रमण करोगे तो याद रखो, तुम्हारा आदित्य सूर्य मंदिर मै ध्वस्त कर दूंगा.’

उस समय इस सूर्य मंदिर की प्रसिद्धी इतनी जबरदस्त थी, कि यह मंदिर ध्वस्त ना हो इसलिये हिंदू राजा मुलतान पर आक्रमण करने से डरते थे. अर्थात,  इस  आदित्य मंदिर को बंधक रख कर, मोहम्मद बिन कासीम ने अनेक वर्षों तक बिना युद्ध किये समूचे सिंध प्रांत पर राज किया.

सन 1026 मे मोहम्मद गजनी ने इस मंदिर को पूर्णतः ध्वस्त किया. ऐसा कहते है, इस मंदिर में सूर्य के बारे मे अनेक रहस्यमय जानकारी विविध मूर्ती और ‘विशिष्ट रचना’ द्वारा दर्शायी गयी थी. ‘सांब पुराण’ मे इस मंदिर का उल्लेख है.

आज के हमारे खंडित भारत मे भी अनेक छोटे – बडे सूर्य मंदिर है. यह सूर्य मंदिर, हमारे पुरखों को सूर्य सृष्टी के संबंध में जो जानकारी थी, वो हमारे सामने रख रहे है. इन मंदिरो में, पूर्व दिशा मे ओडीशा मे कोणार्क का सूर्य मंदिर, उत्तर मे जम्मू-काश्मीर स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर, और पश्चिम में गुजरात में मोढेरा का सूर्य मंदिर, यह तीन सूर्य मंदिर एक त्रिकोण बनाते है.

इनमे से जम्मू-काश्मीर राज्य मे अनंतनाग के पास स्थित ‘मार्तंड सूर्य मंदिर’ यह आठवी सदी मे, वर्ष 764 मे बनाया गया था. कार्कोट वंश के चंड प्रतापी राजा ‘ललितादित्य मुक्तापीड’ ने इस मंदिर का निर्माण किया. इसके लिये ललितादित्यने काश्मीर की उंचाई पर स्थित ऐसी समतल भूमि का चयन किया, जहांसे पुरा प्रदेश अच्छे से दिख सके. अत्यंत भव्य ऐसे इस सूर्य मंदिर मे, अनेक खगोलशास्त्रीय घटनाये और सूत्र उकेरे गये थे.

लेकिन पंद्रहवी सदी के प्रारंभ मे, सिकंदर शाह मिरी इस क्रूरकर्मा अफगान शासक ने यह मंदिर ध्वस्त किया. ढहा दिया. इस कारण, बडे पैमाने पर खगोलशास्त्रीय इतिहास भी मंदिर के मलबे मे दब गया.

गुजरात मे मोढेरा का सूर्य मंदिर यह उसके बाद बनाया गया मंदिर है. वर्ष 1026 – 27 में, आज के गुजरात के मेहसाणा जिले में, चालुक्य राजवंशके भीम राजा (प्रथम) ने इस मंदिर का निर्माण किया. हो सकता है, कि इस जगह पर कोई छोटा सूर्य मंदिर होगा और राजा भीम (प्रथम) ने भव्य रूप से उसका पुनर्निर्माण किया हो. उन दिनों, पुष्पावती नदी के किनारे का यह स्थान, खगोलशास्त्रीय दृष्टी से सटीक था, इसलिये इस जगह का चयन किया गया. रहस्य से भरा मंडप, सभा मंडप और बीचोंबीच पानी का कुंड, ऐसी इस मंदिर की रचना है. यह मंदिर पूर्वाभिमुख है.

इस मंदिर की विशेषता यह हैं, कि यह मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है. इस मंदिर के अक्षांश – रेखांश है- 23″ 58′  – 72″ 13′.

आजसे एक हजार वर्ष  पूर्व, उस जमाने के मंदिर निर्माताओंने,  ठीक कर्क रेखापर मंदिर  कैसे बनाया होगा, यह एक आश्चर्य हैं..!

इस मंदिर के गर्भगृह की रचना ऐसी है कि, दिन और रात जब समान होते हैं, उस दिन, अर्थात 21 मार्च और 23 सितंबर को, जब सूर्य  विषुववृत्त को पार करता हैं, तब सूर्य  की पहली किरण, गर्भगृह की सूर्य प्रतिमा को प्रकाशित  करती है. वैसे ही, वर्ष  का सबसे बडा दिन और सबसे बडी रात जब होती है, तब इस मंदिर  की छाया नही होती. (अभी इस मंदिर मे सूर्य  देवता की मूर्ती नही है). मंदिर  पर अनेक प्रकार की मूर्तियां और आकृतियां उकेरी गयी है. इसमे सूर्य मालिका और पंच महाभूतोंका (वायू, पृथ्वी, आकाश, अग्नी, जल) संबंध (relation) बताया है. यह मंदिर  52 स्तंभोंपर खडा है. यह स्तंभ, वर्ष  के 52 सप्ताहोंका  प्रतिनिधित्व  करते है.

भारत के प्रसिध्द सूर्य मंदिरोंके त्रिकोण का तिसरा मंदिर है, ओडिशा में, कोणार्क का सूर्य मंदिर. तुलना से सबसे नया मंदिर यही है. यह मंदिर बहुत प्राचीन होगा. नौवी सदी के इस मंदिर के अनेक संदर्भ मिलते है. बादमे यह मंदिर भव्य रूप मे फिर से बनाया गया होगा.

तेरहवी सदी के भारत में इस्लामी आक्रांताओंका प्रवेश हुआ था. बख्तियार खिलजीने नालंदा और अन्य विश्वविद्यालय ध्वस्त किए थे. परंतु भारत के पूर्व किनारे पर इन आक्रांताओंका आतंक अभी प्रारंभ नही हुआ था. उत्कल प्रांत में अभी भी हिंदू राजाओ का राज था. पूर्ब गांग (रुधी गांग या प्राच्य गांग) राजवंशका राज चल रहा था. इस राज वंश के नरसिंह देव (प्रथम) ने वर्ष 1250 में, समुद्र किनारे, कोणार्क का सूर्य मंदिर स्थापित किया.

कोणार्क का पूर्व में नाम ‘कैनपरा’ था. सातवी – आठवी सदी तक यह पूर्वी दिशा के देशों के साथ व्यापार करने वाला एक बंदरगाह था. लेकिन सूर्य मंदिर के कारण इसका नाम कोणार्क हुआ. कोणार्क का अर्थ होता हैं, कोण + अर्क. संस्कृत में सूर्य को ‘अर्क’ कहा जाता है. इसलिये ‘सूर्य मंदिर के कारण तयार हुआ कोण’, ऐसा इसका मोटे तौर पर अर्थ होता है.

यह मंदिर अति भव्य स्वरूप मे बनाया गया था. आज इस मंदिर के जो भग्नावशेष दिखते है,  उससे इसके भव्य रूप की कल्पना हम कर सकते है. सात घोडों के रथमे भगवान सूर्य देवता बैठे है, ऐसा इस मंदिर का स्वरूप है. और रथ भी कितना बडा? तो कुल 24 बडे पहियों का रथ, 12 – 12 पहिये दोनो तरफ…!

इस रथ को जो सात घोडे जोडे है, वे सूर्यकिरण के सात रंगों का प्रतीक है. ऋग्वेद मे इसका स्पष्ट उल्लेख है. इन्हे सप्ताह के सात दिनों का प्रतीक भी मान सकते है. इस मंदिर की वास्तुकला यह स्वतंत्र अध्ययन का विषय है. संपूर्ण मंदिर केवल और केवल पत्थरोंसे बनाया हुआ है. कहीं पर भी चुना, मिट्टी का उपयोग नही है. ये पत्थर भी कम से कम 35 किलोमीटर दूर से लाये गये है. मंदिर में अनेक भूमितीय आकार और आकृतीयां बनी हुई है. भूमिती, खगोलशास्त्र और अध्यात्म का अद्भुत संगम, सुंदर मिलाफ इस मंदिर मे दिखाई देता है.

ये सूर्य मंदिर होने के कारण इसमे खगोलशास्त्र की जानकारी और कुछ बारीकियां दिखती होगी यह स्वाभाविकही है. मंदिर के रथ को जो 24 पहिये लगे है, वह विशेष है, और उनमे  कुछ रहस्यमय अर्थ छुपा है. रथ का पहिया यह सूर्य घडी (Sun Dial) है. दुनिया की यह एक मात्र सूर्य घडी है जो वर्टिकल है. दुनिया मे अनेक स्थानो पर सूर्य घडी है, जो दिन का समय दिखाती है. लेकिन वे सब हॉरिजॉन्टल है. कुछ वर्षों के बाद जयपुर के सवाई जयसिंह ने निर्माण किये हुए जंतर-मंतर मे जो सूर्य घडी है, वह भी हॉरिजॉन्टल ही है. दिन में, विशिष्ट समय पर सूर्य की जो छाया आती हैं, उसके अनुसार समय बताने की सुविधा सूर्य घडी मे होती है.

कोणार्क मंदिर के रथ के पहिये भी ऐसे ही अचूक, सटीक और सही समय दिखाते है. इसके हर पहिये मे आठ बड़े आरे (spoke) रहते है. यह आठ आरे, दिन के आठ प्रहरोंको दिखाते है. कुछ दशक पहले तक, अपने यहां कालमापन के लिये ‘प्रहर’ को इकाई माना जाता था. एक प्रहर तीन घंटों का होता है. लेकिन इन आठ आरीयोंके बीचोंबीच एक छोटी सी (पतली सी) आरी होती है. अर्थात एक प्रहर के दो भाग किये है. हर भाग देढ घंटे का हैं, अर्थात नब्बे मिनिट का.

इसमे एक और मजेदार बात है. जो आठ छोटे आरे है, उन पर तीस मणी, समान अंतर पर लगाए गए है. अर्थात, नब्बे मिनिट भागीत 30 करने पर, एक मणी की किमत तीन मिनिट होती है. मणी भी पूर्णतः गोल आकार के नही है. इलिप्टीकल है. उनकी रचना ऐसी हैं, की उन पर पड़ने वाली छाया के अनुसार उनके भी तीन भाग होते है. इसका अर्थ, अब इस सूर्य घडी के कालमापन की सबसे छोटी इकाई हैं, एक मिनिट.

अब उस पहिये के अक्ष (केंद्र बिन्दु) पर एखाद छोटी छडी रखने के बाद, उस बारीक छडी से, पहिये पर पडने वाली सूर्यप्रकाश की छाया से हमे दिन का बिलकुल सही समय मिलता है.

अब यह प्रश्न मन मे आता है की, सूर्य का प्रवास तो छह महिने उत्तरायण और छह महिने दक्षिणायन मे होता है. ऐसी स्थिती मे, कालमापन कैसे होगा? इसलिये रथ के दोनो तरफ पहिये है. रथ की दिशा इस प्रकार रखी गई है की उत्तरायण मे एक तरफ के पहिये से समय देखना है, तो दक्षिणायन मे दुसरी तरफ के पहियेसे.

कितना अद्भुत है यह…..!

775 वर्ष पूर्व, हमारे पूर्वजोंने इतनी कुशलता से इस सूर्य घडी की रचना की है, की जैसे लगता है आज के जमाने के दिवार के घडी मे हम समय देख रहे है. हमारे पूर्वज कितने परिपूर्णवादी (perfectionist) थे इसका और क्या प्रमाण चाहिये?

कोणार्क के रथों के पहिये से, दिन का समय हम जान सकते है, यह भी हमे बहुत बाद में पता चला. कुछ वर्ष पूर्व, एक साधू, एक पतली लकडी लेकर रथों के पहियों पर आई हुई छाया से कुछ देख रहा था. उससे लोगों को पता चला की इससे हम समय देख सकते है.

लेकिन यह समय केवल सूर्य के प्रकाश मे ही देखना संभव हैं.  रात का क्या? तो कहा जाता है की रथ के इन्ही पहियों मे चंद्रमा घडी भी छुपी हुई है. इस चंद्र घडी का उपयोग करके, रात का समय भी निकाल सकते है. सूर्य घडी के लिए केवल दो पहिले आवश्यक होते है. बाकी 22 पहियों का क्या काम? क्योंकि प्रत्येक पहिये पर की गई नक्काशी अलग – अलग है. दिन और रात के हर प्रहर मे लोगों की दिनचर्या क्या होती है, ये उन पर रेखांकित किया गया है. दुर्भाग्य से इस चंद्र घडी को ‘डीकोड’ करना, हमे आज भी साध्य नही हुआ है. वह अभी तक एक रहस्य ही है.

ये सभी सूर्य मंदिर भारत के विशाल पट पर जिस पद्धती से निर्माण किये गये है, वो पध्दती, वो पैटर्न, हमे कुछ बताना चाहते है. हमारे दुर्भाग्य से पूर्वजों की यह रहस्यमय भाषा हम आज भी ठीक से समझ नही पाए है.

एक उदाहरण देता हूं….

मध्य प्रदेश के सागर जिले में, रहली नाम का एक छोटा गाव है. मराठी भाषिक लोगों के लिए इसका खास महत्व है. सागर के गोविंदपंत (खेर) बुंदेला के मृत्यु के पश्चात, खेर परिवार की एक व्यक्ती, लक्ष्मीबाई खेर ने, वर्ष 1790 में, रहली मे विठ्ठल भगवान के एक सुंदर मंदिर का निर्माण किया. इसलिये रहली को, मराठी भाषिक ‘प्रति पंढरपूर’ कहते है.

किंतु रहली का महत्व इससे अलग है. इस रहली में, सुनार और देहार नदियों के संगम पर एक छोटासा और उपेक्षित ऐसा प्राचीन सूर्य मंदिर है. इस मंदिर की विशेषता यह है, कि कर्क वृत्त पर निर्मित यह मंदिर, मोढेरा और कोणार्क, इन दो मंदिरों के बिल्कुल बीच मे बना है. जी हां… एकदम बीचोंबीच. बिल्कुल मध्य मे. अक्षांश  –  रेखांश  देखकर हम समझ सकते है.

कोणार्क       मोढेरा        रहेली
19″53′        23″58′    23″37′
86″05         72″13′    79″06′

रेखांश का गणित देखिये.
कोणार्क  86″05′ – मोढेरा 72″13′ = 13″92′
इसको अगर दो से भागित किया, तो उत्तर हैं, – 6″96′
अब मोढेरा के रेखांश मे ये जोडे तो,
72″13 + 6″96′ = 79″09′
रहेली के सूर्य मंदिर के ये रेखांश है.

अक्षांश – रेखांश को कुछ देर के लिए छोड भी दे, तो भी मोढेरा और कोणार्क का वायू अंतर (air distance), या सेना की भाषा मे ‘क्रो फ्लाय डिस्टन्स’, निकाला तो हम देखते हैं, की बिलकुल मध्य मे यह रहेली का, उपेक्षित ऐसा छोटासा सूर्य मंदिर आता है.

हजारों वर्ष पूर्व, हमारे पूर्वजों के पास पृथ्वी की दूरी नापने की क्या पद्धती रही होगी, जिससे इन सूर्य मंदिर की रचना की होगी?

ये सब अनाकलनीय और रहस्य से भरा है. हमारे पुरखो का खगोलशास्त्र का ज्ञान जबरदस्त था. मंदिरों की रचाना और मूर्तियों के माध्यम से यह ज्ञान, हमारे सामने रखने का प्रयास भी किया है.

और हम आधुनिकता का डंका बजाने के बाद भी, हमारे प्राचीन ज्ञान को,  हमारे संचित को, हमारी विरासत को ठीक से समझ ही नही पाए है..!

प्राकृत और पालि भाषा हमेशा से क्लासकल थीं : घोषित आज हुईं हैं

केंद्र सरकार ने प्राकृत एवं पालि जैसी प्राचीन भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान करके एक ऐतिहासिक कदम उठाया है । इस हेतु प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की नेतृत्त्व वाली केंद्र की भाजपा सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है । संस्कृति मंत्रालय ने एक पोस्टर प्राकृत भाषा में ही जारी करके यह घोषणा की है – *पागद- भासा ‘सत्थीयभासा’-रूवे समणुमण्णिदा इदि।* ज्ञातव्य है कि नई दिल्ली से प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाली प्रथम पत्रिका का नाम भी ‘पागद-भासा’ है,जो 2015 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और इसके संपादक प्रो अनेकांत कुमार जैन हैं ।
केंद्र सरकार के इस निर्णय के अनन्तर आम जनता में इन भाषाओं के प्रति दिलचस्पी भी बढ़ गई है । अतः इन भाषाओं की क्या विशेषता है यह जानना भी बहुत आवश्यक है ।
   प्राचीनकाल से ही समृद्ध रूप में प्रतिष्ठित रही संस्कृत-भाषा और इसके विशाल साहित्य के सार्वभौमिक महत्त्व से तो प्रायः सभी सुपरिचित हैं, किन्तु अतिप्राचीन काल से जनभाषा के रूप में प्रचलित मागधी, अर्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, अपभ्रंश आदि रूपों में जीवन्त प्राकृत भाषाओं और इनके विशाल साहित्य से भारतीय जनमानस उतना परिचित नहीं है, जबकि प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान, तत्त्वज्ञान, संस्कृति और इतिहास तथा लोक-परम्पराओं आदि के सम्यक् ज्ञान हेतु प्राकृत भाषा और इसके विविध एवं विशाल साहित्य का अध्ययन अपरिहार्य है।
    प्राकृत मूलतः लोकजीवन और लोकसंस्कृति की भाषा है। इस भाषा के साहित्य में मानव जीवन की स्वाभाविक वृत्तियों और नैसर्गिक गुणों की सहज-सरल अभिव्यक्ति हुई है। सम्राट् अशोक और कलिंग-नरेश खारवेल आदि के अनेक प्राचीन शिलालेख इसी प्राकृत भाषा और ब्राह्मीलिपि में उपलब्ध होते हैं। भाषाविदों ने भारत-ईरानी भाषा के परिचय के अन्तर्गत भारतीय आर्य शाखा परिवार का विवेचन किया है। प्राकृत इसी भाषा परिवार की एक आर्य भाषा है।
वैदिक काल में कोई ऐसी जनभाषा प्रचलित रही है, जिससे छान्दस साहित्यिक भाषा का विकास हुआ होगा। कालान्तर में इस छान्दस को भी पाणिनी ने अनुशासित कर इसमें से विभाषा के तत्त्वों को निकालकर लौकिक संस्कृत को जन्म दिया । वैदिक तथा परवर्ती संस्कृत के वे शब्द जिनमें ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ का प्रयोग हुआ है, प्राकृत रूप है। इस प्रकार छान्दस में प्राकृत भाषा के तत्त्वों का समावेश स्पष्ट करता है कि यह भाषा लौकिक संस्कृत की अपेक्षा प्राचीनतर है।
*प्राकृत भाषा और उसका महत्त्व* :
    भाषा स्वभावतः गतिशील तत्त्व है। भाषा का यह क्रम ही है कि वह प्राचीन तत्त्वों को छोड़ती जाए एवं नवीन तत्त्वों को ग्रहण करती जाए। प्राकृत भाषा भारोपीय परिवार की एक प्रमुख एवं प्राचीन भाषा है। प्राचीन भारतीय आर्यभाषा काल में वैदिक भाषा का विकास तत्कालीन लोकभाषा से हुआ। प्राकृत भाषा का स्वरूप तो जनभाषा का ही रहा। प्राकृत एवं वैदिक भाषा में विद्वान् कई समानताएँ स्वीकार करते हैं। इससे प्रतीत होता है कि वैदिक भाषा और प्राकृत के विकसित होने से पूर्व जनसामान्य की कोई एक स्वाभाविक समान भाषा रही होगी जिसके कारण इसे ‘प्राकृत’ भाषा का नाम दिया गया।
    मूलतः प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्रकृत्या स्वभावेन सिद्धं प्राकृतम्’ अथवा ‘‘प्रकृतीनां साधारणजनानामिदं प्राकृतम्’’ है। १०वीं शती के विद्वान् कवि राजशेखर ने प्राकृत को ‘योनि’ अर्थात् सुसंस्कृत साहित्यिक भाषा की जन्मस्थली कहा है।
    वस्तुतः संस्कृत प्राचीन होते हुए भी सदा मौलिक रूप धारण करती है, इसके विपरीत प्राकृत चिर युवती है और जिसकी सन्तानें निरन्तर विकसित होती जा रही हैं।
 महाकवि वाक्पतिराज (आठवीं शताब्दी) ने प्राकृत भाषा को जनभाषा माना है और इससे ही समस्त भाषाओं का विकास स्वीकार किया है। गउडवहो में वाक्पतिराज ने कहा भी है-
सयलाओ इमं वाआ विसन्ति एत्तो य णेंति वायाओ।
एन्ति समुद्दं चिय णेंति सायराओ च्चिय जलाइं ।। ९३।।
    अर्थात् ‘सभी भाषाएं इसी प्राकृत से निकलती हैं और इसी को प्राप्त होती हैं। जैसे सभी नदियों का जल समुद्र में ही प्रवेश करता है और समुद्र से ही (वाष्प रूप में) बाहर निकलकर नदियों के रूप में परिणत हो जाता है।’ तात्पर्य यह है कि प्राकृत भाषा की उत्पत्ति अन्य किसी भाषा से नहीं हुई है, अपितु सभी भाषायें इसी प्राकृत से ही उत्पन्न हैं।
    ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में प्राकृत भाषा गाँवों की झोपडि़यों से राजमहलों और राजसभाओं तक समादृत होने लगी और वह अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम चुन ली गयी थी। लोकभाषा जब जन-जन में लोकप्रिय हो जाती है तथा जब उसकी शब्द-सम्पदा बढ़ जाती है, तब वह काव्य की भाषा भी बनने लगती है। प्राकृत भाषा को यह सौभाग्य दो प्रकार से प्राप्त है। एक तो इसमें विशाल आगम और उनका व्याख्या साहित्य उपलब्ध है और दूसरा इसमें विपुल मात्रा में कथा, काव्य एवं चरितग्रन्थ आदि लिखे गये हैं, जिनमें काव्यात्मक सौन्दर्य और मधुर रसात्मकता का समावेश है। साहित्य जगत् में काव्य की प्रायः सभी विधाओं-महाकाव्य, खण्डकाव्य, मुक्तक-काव्य आदि को प्राकृत भाषा ने विविध रूपों में समृद्ध किया है। इस साहित्य ने प्राकृत भाषा को प्राचीनकाल से अब तक प्रतिष्ठित रखा है।
*प्राकृत भाषा का माधुर्य*  :
    एक समय तो प्राकृत भाषा का ऐसा स्वर्ण युग अर्थात् साम्राज्य रहा है कि मधुर, मधुरतर विषयों की अभिव्यक्ति में प्राकृत भाषा का स्थान सर्वोच्च रहा है। यही कारण है कि तत्कालीन श्रेष्ठ महाकवियों ने प्राकृत को अपने महाकाव्यों की रचना का मुख्य माध्यम बनाया है। नौ रसों में शृंगार सर्वाधिक मधुर है और तत्कालीन विद्वानों का यही निर्णय था कि शृंगार के अधिष्ठाता देवता कामदेव की केलिभूमि प्राकृत ही है। उस समय के लोग यह घोषणा करने में बहुत ही गौरव का अनुभव करते थे कि –
अमिअं पाउअकव्वं पढिअं सोउं अ जे ण आणन्ति।
कामस्स तत्ततन्तिं कुणन्ति ते कहं ण लज्जन्ति।।गा.स. १/२।।
    अर्थात्, अमृतभूत ‘प्राकृत-काव्य’ को जो न पढ़ना जानते हैं, न सुनना ही, उन्हें काम की तत्त्वचिन्ता (वार्ता) करते लज्जा क्यों नहीं आती? यह उद्घोषणा केवल प्राकृत के पण्डितों की ही नहीं थी, अपितु संस्कृत के शीर्षस्थ विद्वानों ने की थी और वे स्वयं प्राकृत भाषा के उत्कृष्ट प्रशंसक भी थे।
    संस्कृत के यायावर महाकवि राजशेखर को कौन संस्कृतज्ञ नहीं जानता, जिन्होंने भी उस समय प्राकृत के समक्ष संस्कृत को गौण ठहरा दिया और अपने प्रसिद्ध प्राकृत सट्टक ‘कर्पूरमंजरी’ में प्राणोन्मेषिणी प्राकृत-भाषा का समर्थन करते हुए कहा है –
परुसा सक्कअ बन्धा पाउअ बन्धोवि होउ सुउमारो।
पुरुसमहिलाणं जेत्तिअमिहन्तरं तेत्तिअमिमाणं।। कर्पूरमंजरी।।
अर्थात्, संस्कृतबद्ध काव्य कठोर-कर्कश होते हैं, किन्तु प्राकृतबद्ध काव्य ललित और कोमल। यानी, परुषता संस्कृत की और सुकुमारता प्राकृत की मौलिक विशेषता है। दोनों में उतना ही अन्तर है, जितना पुरुष और स्त्री में अर्थात् संस्कृत भाषा पुरुष के समान कठोर तो प्राकृत भाषा स्त्रियों के समान कोमल/सुकुमार होती है।
मुनि जयवल्लह (जयवल्लभ) ने भी अपने प्रसिद्ध प्राकृत काव्य ग्रन्थ ‘वज्जालग्ग’ में प्राकृत की संस्कृतातिशायी श्लाघा करते हुए कहा है –
ललिए महुरक्खरए जुवईजणवल्लहे ससिंगारे ।संते पाइअकव्वे को सक्कइ सक्कअं पढिउं।। २९।।
अर्थात् ललित, मधुर अक्षरों से युक्त युवतियों के लिए मनोरम एवं प्रीतिकर तथा श्रृंगार रस से ओत-प्रोत प्राकृत-काव्य के रहते हुए कौन संस्कृत-काव्य पढ़ना चाहेगा ?
    प्राकृत भाषाओं की लोकप्रियता और माधुर्य का सहज ज्ञान हमें संस्कृत के लाक्षणिक ग्रन्थों में उदाहरण के रूप में उद्धृत प्राकृत गाथाओं एवं संस्कृत भाषा के समृद्ध नाट्य साहित्य में उपलब्ध विविध प्राकृत भाषाओं के अधिकांश संवादों से हो जाता है। मम्मट (काव्यप्रकाशकार) जैसे अनेक संस्कृत के अलंकारशास्त्रियों ने भी सहजता और मधुरता के कारण प्राकृत की गाथाओं को अपने अलंकार शास्त्रों में उदाहरणों, दृष्टान्तों के रूप में अपनाकर इन्हें सुरक्षित रखा है।
    इस तरह प्राकृत भाषा केवल एक भाषा-विशेष ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय संस्कृति का दर्पण तो है ही, साथ ही अपने देश के क्षेत्र या प्रदेश (देश) विशेष की अधिकांश भाषाओं का मूलस्रोत एवं अनेक क्षेत्रीय जनभाषाओं का एक बृहत् समूह है, जिसमें अनेक भाषायें समाहित हैं। यथा – मागधी, अर्ध-मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री, पैशाची, चूलिका पैशाची, शिलालेखी और अपभ्रंश आदि हैं।
    बुद्ध वचनों की पालि भाषा भी एक प्रकार की प्राकृत भाषा ही है। ये सभी एक ही विकास-धारा की विभिन्न कडि़याँ हैं, जिनमें भारतीय संस्कृति, समाज एवं लोक-परम्पराओं की विविध मान्यताओं के साथ ही भाषा तथा विचारों का समग्र इतिहास लिपिबद्ध है।
    कुछ लोग तथागत भगवान् बुद्ध-वचनों की पालि भाषा की भांति प्राकृत भाषा को मात्र जैन धार्मिक-साहित्य की भाषा कहकर अनदेखा कर देते हैं, किन्तु यह उनका दुराग्रह मात्र है। क्योंकि यदि प्राकृत भाषा मात्रा जैनागम साहित्य तक ही सीमित होती तो उक्त कथन सत्य प्रतीत होता, किन्तु प्रायः सभी परम्पराओं के भारतीय मनीषियों द्वारा व्याकरण, रस, छन्द अलंकार, शब्दकोश, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, राजनीति, धर्म-दर्शन, गणित, भूगोल, खगोल, कथा-काव्य, चरित-काव्य, नाटक-सट्टक, नीति-सुभाषित, सौन्दर्य आदि विषयों में रचा गया विशाल साहित्य प्राकृत भाषाओं में उपलब्ध है।
    प्राकृत भाषा में साहित्य सृजन का यह क्रम केवल भूतकाल तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु वर्तमान काल में आज भी इसका सृजन अबाध गति से चल रहा है। वर्तमान युग में सृजित विविध विधाओं का उपलब्ध प्राकृत साहित्य के अध्ययन से स्पष्ट है कि वर्तमान समय में भी अनेक मुनि, आचार्य एवं विद्वान् प्राकृत भाषा की विविध विधाओं में तथा इससे सम्बद्ध विषयों पर हिन्दी, अंग्रेजी तथा देश की प्रायः सभी प्रादेशिक भाषाओं में रचनायें लिख रहे हैं। अतः यह भाषा एवं इसका विशाल प्राकृत साहित्य सार्वजनीन और सार्वभौमिक होते हुए हमारे राष्ट्र की बहुमूल्य धरोहर है।
*प्राकृत को सम्मान प्रदान करने वाले महापुरुष और कवि* :
वर्तमान में प्राकृत भाषा का सबसे प्राचीन रूप जो इस समय हमें प्राप्त है, वह सम्राट अशोक और कलिंग नरेश खारवेल आदि के शिलालेखों, पालि त्रिपिटक और जैन आगम ग्रन्थों में उपलब्ध है। उसी को हम प्राकृत का उपलब्ध प्रथम रूप कह सकते हैं। अतः जो विद्वान् प्राकृत को संस्कृत का विकृत रूप या संस्कृत से उद्भूत कह देते हैं। अब उन्हें अपनी मिथ्या धारणा छोड़कर अनेक भाषाओं की जननी प्राकृत भाषा के मौलिक एवं प्राचीन स्वरूप और उसकी महत्ता को समझ जाना चाहिए।
प्राकृत भाषा को अपनाकर इसे व्यापकता प्रदान करने वाले अनेक महापुरुष हुए हैं । जैन धर्म एवं इसकी परम्परा के अनुसार तो प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर अन्तिम और चैबीसवें तीर्थंकर महावीर पर्यन्त सभी तीर्थंकरों के प्रवचनों की भाषा प्राकृत ही रही है। तीर्थंकर महावीर की वाणी रूप में उपस्थित पवित्र विशाल आगम साहित्य आज विद्यमान है।
भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को अपनी-अपनी भाषा में ‘धम्म’ ‘सीखने की आज्ञा दी थी’ (चुल्लग्ग ५/६१) जिससे प्राकृत जन भी शास्ता के उपदेशामृत का करुणमति से यथेच्छ पान कर सके, अतः महापुरुष बुद्ध की वाणी लोकभाषा थी ।
तीर्थंकर महावीर और गौतमबुद्ध दोनों ने ही अपने धर्मोपदेशों का माध्यम इसी लोकभाषा प्राकृत को बनाया। तीर्थंकर महावीर के उपदेशों की भाषा को अर्द्धमागधी प्राकृत तथा गौतमबुद्ध के उपदेशों की भाषा को मागधी (पालि) कहा गया है। इन दोनों महापुरुषों ने अपने उपदेश संस्कृत भाषा में न देकर जन (लोक) भाषा प्राकृत में दिये।
अति सरल ध्वन्यात्मक और व्याकरणात्मक प्रवृत्ति के कारण यह प्राकृत भाषा लम्बे समय तक जनसामान्य के बोलचाल की भाषा बनी रही। इसीलिए भगवान् महावीर और बुद्ध ने जनता के सामाजिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए अपने उपदेशों में इसी लोकभाषा प्राकृत का आश्रय लिया, जिसके परिणामस्वरूप सांस्कृतिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक, सामाजिक आदि विविधताओं से परिपूर्ण आगमिक एवं त्रिपिटक जैसे मूल आगमशास्त्रों की रचना सम्भव हुई ।
    दिल को छू लेने वाली अपनी बोलियों में इन महापुरुषों द्वारा प्रदत्त धर्मोपदेश का प्रथम बार सुनना साधारण जनता पर अत्यधिक गहरा प्रभाव डाल गया। इस प्रकार इन दो धर्म-संस्थापकों का आश्रय पाकर प्रान्तीय बोलियाँ भी चमक उठी और संस्कृत से बराबरी का दावा करने लगीं ।
    इन महापुरुषों की इस भाषायी क्रान्ति ने समाज के उस पिछड़े और उपेक्षित निम्न समझे जाने वाले व्यक्तियों के उन विभिन्न सभी वर्गों को भी आत्मकल्याण करके उच्च, श्रेष्ठ एवं संयमी जीवन जीने और समाज में सम्मानित स्थान प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया, जो समाज में हजारों वर्षों से दलित एवं उपेक्षित समझे जाने के कारण सम्मानित जीवन जीने और अमृतत्व प्राप्त करने की सोच भी नहीं सकते थे। राष्ट्रीय समाज कल्याण की अन्त्योदय और सर्वोदय जैसी कल्याणकारी भावनाओं का सूत्रपात भी ऐसे ही चिन्तन से हुआ ।
    पूर्वोक्त दोनों ही महापुरुषों ने अपने क्रान्तिकारी विचारों से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक क्षेत्रों की विकृतियों को दूर करके धर्म के नाम पर बाह्य क्रियाकाण्डों, मिथ्याधारणाओं के स्थान पर प्रत्येक प्राणी के लिए जीवनोत्कर्ष और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। भाषा और सिद्धान्तों की दृष्टि से उनकी इस परम्परा को उनके अनुयायियों ने आगे भी समृद्ध रखा ।
    सम्राट अशोक ने भी प्राकृत को राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया और अपनी सभी आज्ञाओं और धर्मलेख इसी प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखवाए। प्राकृत भाषा को जनभाषा के साथ-साथ राजकाज की भाषा का भी गौरव प्राप्त हुआ और उसकी यह प्रतिष्ठा सैकड़ों वर्षों तक आगे बढ़ती रही। अशोक के शिलालेखों के अतिरिक्त देश के अन्य अनेक नरेशों ने भी प्राकृत में शिलालेख लिखवाये एवं मुद्राएँ अंकित करवाईं ।
    कलिंग नरेश महाराजा खारवेल द्वारा उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर के समीप उदयगिरि-खण्डगिरि की हाथीगुम्फा में प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख भी काफी महत्त्वपूर्ण है, जिसमें अपने देश ‘‘भरध-वस’’ (भारतवर्ष) के नाम का सर्वप्रथम प्राचीनतम उल्लेख प्राप्त होता है ।
    महाकवि हाल ने अपनी गाथासप्तशती में तत्कालीन प्राकृत काव्यों से सात सौ गाथाएँ चुनकर प्राकृत को ग्रामीण जीवन, सौन्दर्य-चेतना एवं रसानुभूति की प्रतिनिधि सहज-सरस और सरल भाषा बना दिया। हिन्दी के महाकवि बिहारी जैसे अनेक प्रसिद्ध महाकवियों ने इन्हीं के अनुकरण पर अपने काव्यों की रचना की ।
    संस्कृत नाटककारों में भास, कालिदास, शूद्रक, भवभूति, हस्तिमल्ल जैसे अनेक संस्कृत नाटककारों ने भी अपने नाटकों में अधिकांश सम्वाद प्राकृत भाषा में लिखकर प्राकृत को बहुमान प्रदान किया है ।
    लोकभाषा से अध्यात्म, सदाचार और नैतिक मूल्यों की भाषा तक का विकास करते हुए यह प्राकृत भाषा कवियों को आकर्षित करने लगी थी। ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में प्राकृत भाषा गाँवों की झोपडि़यों से राजमहलों की सभाओं तक आदर प्राप्त करने लगी थी। वह समाज में अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम चुन ली गयी थी ।
    इस तरह प्राकृत भाषा ने देश की चिन्तनधारा सदाचार, नैतिक मूल्य, लोकजीवन और काव्य जगत् को निरन्तर अनुप्राणित किया है। अतः यह प्राकृत भाषा भारतीय संस्कृति की संवाहक है। इस भाषा ने अपने को किसी घेरे में कैद नहीं किया। अपितु विशाल और पवित्र गंगा नदी के प्रवाह की तरह प्राकृत के पास जो था, उसे वह जन-जन तक बिखेरती हुई और जन-मानस में जो अच्छा लगा, उसे वह ग्रहण करती रही। इस प्रकार प्राकृत भाषा सर्वग्राह्य और सार्वभौमिक तो है ही, साथ ही भारतीय संस्कृति की अनमोल निधि और आत्मा भी है ।
*वर्तमान अनेक भाषाओं और लोक-बोलियों का मूल-उद्गम  है प्राकृत भाषा* :
    भाषावैज्ञानिकों का यह अभिमत है कि महाराष्ट्री अपभ्रंश से मराठी और कोंकणी; मागधी अपभ्रंश की पूर्वी शाखा से बंगला, उडि़या तथा असमिया; मागधी अपभ्रंश से बिहारी, मैथिली, मगही और भोजपुरी; अर्द्धमागधी अपभ्रंश से पूर्वी हिन्दी अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी; शौरसेनी अपभ्रंश से बुन्देली, कन्नौजी, ब्रजभाषा, बांगरू, हिन्दी; नागर अपभ्रंश से राजस्थानी, मालवी, मेवाड़ी, जयपुरी, मारवाड़ी तथा गुजराती; पालि से सिंहली और मालदीवन; टाक्की या ढाक्की से लहँडी या पश्चिमी पंजाबी; शौरसेनी प्रभावित टाक्की से पूर्वी पंजाबी; ब्राचड अपभ्रंश से सिन्धी भाषा (दरद); पैशाची अपभ्रंश से कश्मीरी भाषा का विकास हुआ है।
    भाषाओं के सम्बन्ध में यह भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि भाषा की स्थिति विभिन्न युगों में परिवर्तित होती रही है। भावों के संवहन के रूप में जनता का झुकाव जिस ओर रहा, भाषा का प्रवाह उसी रूप में ढलता गया।
    यद्यपि पूर्वोक्त सभी क्षेत्रीय भाषाओं के रूप आज हमारे सामने नहीं हैं; किन्तु भाषावैज्ञानिकों की भाषा विषयक अवधारणाओं तथा मध्यकालीन एवं आधुनिक भारतीय आर्य-भाषाओं के विकास-क्रम को ध्यान में रखकर इन सम्भावनाओं को झुठलाया भी नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है कि भाषाओं के विकास की जड़ें आज भी लोक-बोलियों में गहराई तक जमी हुई लक्षित होती हैं। कभी-कभी हम यह अनुमान भी नहीं कर सकते हैं कि कतिपय शब्दों को जिन्हें हम केवल वैदिक साहित्य में प्रयुक्त पाते हैं। वे हमारी बोलियों में सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।
    इन प्राकृतों को जब व्याकरण के नियमों में बाँधा गया, तब पुनः जनभाषाओं के प्रवाह को रोका न जा सका, जिससे अपभ्रंश भाषाओं का जन्म हुआ। कालान्तर में अपभ्रंशों को नियमबद्ध करने के प्रयत्न हुए, जिससे आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएं उत्पन्न हुईं, जिनमें हिन्दी, बंगाली, उडि़या, असमियाँ, भोजपुरी, मगही, मैथिली, पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, मराठी आदि सम्मिलित हैं। निश्चित ही इन भाषाओं से और भी अनेकानेक बोलियों/भाषाओं का विकास होता रहा है। यह सब अनुसंधान का आवश्यक विषय है ।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषायें सम्पूर्ण जनमानस में व्याप्त रहीं हैं, तथा इन्हीं से आधुनिक भारतीय भाषायें उद्भूत हुई हैं । भाषावैज्ञानिक भी इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं। ऐसी महत्त्वपूर्ण एवं महनीय प्राकृत को जीवंत, व्यापक और प्रयोजनीय बनाने हेतु हम सभी को मिलजुल कर प्रयास करना अति आवश्यक है ।
इसीलिए हम सबका यह परम कर्तव्य है कि पूरे देश में  जनभाषा के रूप में लोकप्रिय रही इस प्राकृत भाषा के व्यापक प्रचार -प्रसार हेतु बहुविध प्रयास करने चाहिये, ताकि हमारी भावी में पीढियां इसमें निहित नैतिक जीवन मूल्यों, इसके इतिहास, परम्पराओं में पारंगत हो, आत्मविश्वासी और सक्षम बन सके। क्येांकि यदि हम इन प्राचीन बहुमूल्य भाषाओं और विद्याओं को समग्रता के साथ पढ़ने की योग्यता और अभ्यास खो देंगे तो मानव जीवन के लिये अनिवार्य और आधारभूत चीजों को भी खो देंगे।
प्राकृत को मात्र किसी धर्म, सम्प्रदाय, समाज और साहित्य से ही जोड़कर नहीं देखना चाहिये। इनसे अलग होकर एक समग्र भारतीय, नैतिक, सांस्कृतिक और जीवनमूल्यों से जोड़कर देखना चाहिए क्योंकि इसकी उन्नति की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करना आवश्यक है। इसे सभी चिन्तनशील भारतीयों की चिन्ता बनाना चाहिए और गुणवत्ता की ओर ध्यान देना चाहिए। यहाँ जिस प्राकृत भाषा को हम जीवंत बनाने की बात कर रहे हैं, उसके वैशिष्ट्य, महत्त्व और व्यापकता को जानना आवश्यक है । इसीलिए यहाँ यह चिंतन प्रस्तुत किया गया।
-प्रो० फूलचन्द जैन प्रेमी
(प्राकृत भाषा के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित )
पूर्व जैनदर्शन विभागाध्यक्ष, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय,वाराणसी,
एमेरिटस प्रोफेसर, तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (T.M.U.), मुरादाबाद
आवासीय पता :  ‘अनेकान्त विद्या भवन’, B.23/45, P.6, शारदा नगर कॉलोनी, खोजवां, वाराणसी  – 221010, Mob : +91-9450179254, 9670863335;  email   –  anekantjf@gmail.com

रेपो दर में कमी के साथ ही भारत में ब्याज दरों के नीचे जाने का चक्र प्रारम्भ

भारतीय रिजर्व बैंक के नवनियुक्त अध्यक्ष श्री संजय मल्होत्रा ने अपने कार्यकाल की प्रथम मुद्रानीति दिनांक 7 फरवरी 2025 को घोषित की। अभी तक प्रत्येक दो माह के अंतराल पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा घोषित की गई मुद्रा नीति के माध्यम से लिए गए निर्णयों का देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने में विशेष योगदान रहा है। हालांकि पिछले लगभग 5 वर्षों में रेपो दर में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है। मई 2020 में अंतिम बार रेपो दर में वृद्धि की घोषणा की गई थी। इसके बाद घोषित की गई 29 मुद्रा नीतियों में रेपो दर को स्थिर रखा गया है और यह अभी भी 6.5 प्रतिशत के स्तर पर कायम है। परंतु,अब फरवरी 2025 माह में घोषित की गई मुद्रा नीति में रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की कमी करते हुए इसे 6.50 प्रतिशत से 6.25 प्रतिशत पर लाया गया है। केंद्र सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक को देश में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में रखने हेतु मेंडेट दिया गया है और इस मेंडेट पर ध्यान रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने में सफलता भी पाई है। परंतु, वित्तीय वर्ष 2024-25 के प्रथम एवं द्वितीय तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर घटकर 5.2 प्रतिशत एवं 5.4 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही थी। अतः देश में आर्थिक विकास की दर पर भी अब विशेष ध्यान देने की आवश्यकता प्रतिपादित हो रही थी, इसीलिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं में कमी की घोषणा की है। रेपो दर में कमी करने का उक्त निर्णय मुद्रानीति समिति के समस्त सदस्यों ने एकमत से लिया है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकलन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-45 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 6.4% की रहेगी और वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 6.7 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाएगी। इस वर्ष खरीफ की फसल बहुत अच्छे स्तर पर आई है एवं आगे आने वाली रबी की फसल भी ठीक रहेगी क्योंकि मानसून की बारिश अच्छी रही थी और देश के जलाशयों में, क्षमता के अनुसार, पर्याप्त पानी इन जलाशयों में उपलब्ध है, जिसे कृषि सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जा रहा है और जो अंततः कृषि की पैदावार को बढ़ाने में सहायक होगा। इससे ग्रामीण इलाकों में उत्पादों की मांग में वृद्धि देखी गई है। हालांकि शहरी इलाकों में उत्पादों की मांग में अभी भी सुधार दिखाई नहीं दिया है। परंतु हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा मध्यमवर्गीय करदाताओं को आय कर में दी गई जबरदस्त छूट के चलते आगे आने वाले समय में शहरी क्षेत्रों में भी उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होगी और विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत औद्योगिक इकाईयों की उत्पादन वृद्धि दर तेज होगी। सेवा क्षेत्र तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर ही रहा है। प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ मेले में धार्मिक पर्यटन के चलते देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त योगदान होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस प्रकार, भारत की आर्थिक विकास दर के वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग 7 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 8 प्रतिशत रहने के प्रबल सम्भावना बनती है। भारतीय रिजर्व बैंक का आंकलन उक्त संदर्भ में कम ही कहा जाना चाहिए।

इसी प्रकार मुद्रा स्फीति के संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.8 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2025-26 में घटकर 4.2 प्रतिशत रह सकती है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों के महंगे होने के चलते ही बढ़ती है, जिसे ब्याज दरों को बढ़ाकर नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता है। हेडलाइन मुद्रा स्फीति की दर अक्टूबर 2024 में अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गई थी परंतु उसके बाद से लगातार नीचे ही आती रही है। इसी प्रकार, कोर मुद्रा स्फीति की दर भी लगातार नियंत्रण में बनी रही है। केवल खाद्य पदार्थों में के महंगे होने के चलते उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई पर दबाव जरूर बना रहा है। इस प्रकार महंगाई दर के नियंत्रण में आने से अब भारत में ब्याज दरों में कमी का दौर प्रारम्भ हो गया है। आगे आने वाले समय में भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में कमी की घोषणा की जाती रहेगी ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है और दिसम्बर 2025 तक रेपो दर में लगभग 100 आधार बिंदुओं की कमी की जा सकती है और रेपो दर घटकर 5.25 प्रतिशत तक नीचे आ सकती है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि देश में आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर रेपो दर में परिवर्तन के बारे में समय समय पर विचार किया जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने नीति उद्देश्य को भी निष्पक्ष रखा है परंतु चूंकि ब्याज दरों में अब कमी करने का चक्र प्रारम्भ हो चुका है अतः इसे उदार रखा जा सकता था। इसका आश्य यह है कि आगे आने वाले समय में भी रेपो दर में कमी की सम्भावना बनी रहेगी।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में की गई कमी की घोषणा के बाद अब विभिन्न बैकों को ऋणराशि पर ब्याज दरों को कम करते हुए ऋणदाताओं को लाभ पहुंचाने के बारे में शीघ्रता से विचार करना चाहिए जिससे आम नागरिकों द्वारा बैकों को अदा की जाने वाली किश्तों एवं ब्याज राशि में कुछ राहत महसूस हो सके। इससे अर्थव्यवस्था में भी कुछ गति आने की सम्भावना बढ़ेगी।

दिसम्बर 2024 माह में देश में तरलता में कुछ कमी महसूस की जा रही थी और बैकों के पास ऋण प्रदान करने योग्य फंड्ज की कमी महसूस की जा रही थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने तुरंत निर्णय लेते हुए आरक्षित नकदी अनुपात (CRR) को 4.5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया था, जिससे बैकों की तरलता की स्थिति में कुछ सुधार दृष्टिगोचर हुआ था। बैकों के लिए इसे अधिक सरल बनाने की दृष्टि से जनवरी 2025 में भी भारतीय रिजर्व बैंक ने लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपए बांड्ज विभिन्न बैकों से खरीदे थे ताकि इन बैकों की तरलता की स्थिति में और अधिक सुधार किया जा सके और बैकिंग सिस्टम में तरलता की वृद्धि की जा सके। उक्त वर्णित उपायों का परिणाम यह है कि आज भारतीय बैकों का ऋण:जमा अनुपात 80.8 प्रतिशत के स्तर पर बना हुआ है और बैकों की लाभप्रदता में भी लगातार सुधार होता दिखाई दे रहा है। विभिन्न बैकों द्वारा अभी तक घोषित किए गए परिणामों के अनुसार, बैकों ने लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपए का लाभ घोषित किया है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जरूर परिस्थितियां अभी भी अस्थिर बनी हुई हैं और वैश्विक स्तर पर रुपए पर दबाव बना हुआ है। अभी हाल ही में डॉलर इंडेक्स 109 के स्तर तक पहुंच गया था और 10 वर्षीय यू एस बांड यील्ड भी 4.75 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, इससे अन्य देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है और आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले में रुपए की कीमत अपने निचले स्तर 87.66 पर पहुंच गई थी। परंतु, आगे आने वाले समय में अमेरिका में भी यदि ब्याज दरों में कमी की घोषणा होती है तो भारत में भी ब्याज दरों में कमी का चक्र और भी तेज हो सकता है। ब्रिटेन एवं कुछ अन्य यूरोपीयन देशों ने भी हाल ही के समय में ब्याज दरों में कमी की घोषणा की है। चूंकि अब कई देशों में मुद्रा स्फीति नियंत्रण में आ चुकी है अतः अब लगभग समस्त देश ब्याज दरों में कमी की घोषणा करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इससे अब आने वाले समय में इन देशों में आर्थिक विकास दर में कुछ तेजी आते हुए भी दिखाई देगी। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने के चलते अमेरिका के शेयर बाजार में केवल जनवरी 2025 माह में ही 15,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि निवेशकों द्वारा डाली गई है, जबकि भारत के शेयर बाजार से 2.50 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा निकाली गई है, इससे भी भारतीय रुपए पर दबाव बना हुआ है। परंतु भारतीय रिजर्व बैंक को शायद आभास है कि यह समस्या अस्थायी है एवं भारतीय कम्पनियों की लाभप्रदता में सुधार होते ही विदेशी संस्थागत निवेशक पुनः भारतीय शेयर बाजार में अपने निवेश को बढ़ाएंगे। अमेरिका एवं चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध का प्रभाव भी भारत पर सकारात्मक रहने की सम्भावना है क्योंकि इससे यदि चीन से अमेरिका को निर्यात कम होते हैं तो सम्भव हैं कि भारत से अमेरिका को निर्यात बढ़ें। भारत से निर्यात बढ़ने पर भारतीय रुपए पर दबाव कम होने लगेगा, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक को भारत में रेपो दर को कम करने में और अधिक आसानी होगी।

बुद्धायन : एक बानगी…

“म्हारी बात कबीर साहेब का दोहा सूं करबो चाहूं छूं –
कबीरा जब पैदा भये, जग हांसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो, हम हांसे जग रोये ।।
अस्यो लागे जाणै कबीर में बुद्ध समाग्या हो। बुद्ध नै आपणा ढंग सूं सांच को दरसाव करायो। ई सांच कै ताई कबीर नै बना लाग लपेट कै लोगां कै सामै परोसद्यो। “ओसो” बी बुद्ध दरसण का कायल छा। म्हूं बी शाक्य वंश को ओक छोटो सो तुणगल्यो, होबा कै नातै भगवान बुद्ध पै कलम चलाबा की हूंस तो पाळ ई सकूं छू। या कोसीस करबा की मनै मन में ठाण ली।
…हिम्मत कर दिनांक 13.07.2022 गुरू पून्यो विक्रम संवत 2079 कै दन लै बुद्धा को नांव बुद्धायन की रचना चालू कर दी। ओक बरस दस दन यानी 24.07.2023 को 20 सर्ग पूरा होग्या। संजोग देखो आप गुरू पून्यो कै दन ग्रंथ पूरो होयो अर 21.07.2024 आगली गुरू पून्यो कै दन टाइप को काम बी पूरो होग्यो।…
यह किसी डायरी के पन्ने की इबारत नहीं है वरन् महाकाव्यकार किशनलाल वर्मा द्वारा हाड़ौती में लिखित महाकाव्य “बुद्धायन” में उनकी ‘ म्हारी सोच ‘ के अन्तर्गत उभरे विचार हैं।
इस प्रबन्ध काव्य में किशन जी ने बुद्ध के जन्म से लेकर उनके महानिर्वाण तक यथा- सिद्धार्थ से बुद्ध बनना, मध्यम मार्ग को अपनाना, धर्म की दीक्षा, आम्रपाली का उद्धार सहित उनके जीवन चरित का वर्णन हाड़ौती में लिखकर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है।
जब लेखक विषय वस्तु के भीतर अपनी चेतना के साथ यात्रा करता है तो वह रचना की बुनावट को अपने कौशल से पूर्णता की ओर ले जाता है। महाकाव्यकार किशन जी ने इन्हीं सन्दर्भों के साथ अपना यह कार्य किया और बुद्ध के समूचे दर्शन को आत्मसात् करते रहे।
इस माने में भी कि – “भगवान बुद्ध की सिक्स्या अर संदेस पूरा संसार कै तांई सान्ति अर स‌द्भावना, पंचसील अस्टांगिक मार्ग, दस सील, च्यार आर्य सत को पाठ पढ़ावै छै। वांका उपदेस संसार कै तांई युद्ध की भीसण मारममार सूं छुटकारौ द्वाबा को काम करै छै।…वांनै जात पात अर छुआ छूत सूं संसार कै तांई मुक्ति दिलाई, अन्धबस्वास सूं छूटकारो दिलवायो अर समानता और समता को अधिकार दिलवायो…”
इस महाकाव्य को लेखक ने बीस सर्गों में विभाजित किया है-
सर्ग एक में- नमो नमः , तिरी सरण (त्रिशरण), वंसावळी, सिद्धार्थ को जनम, देवतां की अरदास, महामाया की मुक्ती
सर्ग दो में – बचपण, सोहबत, ब्याव को सुझाव, यसोधरा को सणगार, स्वयंवर, रास रंग
सर्ग तीन में – बैराग की सोच के अन्तर्गत अ. बुजुर्ग का दर्सण, ब. रोगी मनख, स. शव दर्सण का यथोचित विवरण है तथा उदायी की सीख, गौतम को ज्वाब, साक्य संघ मं दीक्स्या, बैराग की अनुमति, सर्ग चार में – भारद्वाज मुनि सूं दीक्स्या,
छंदक अर गौतम मं बातचीत, छंदक की वापसी, यसोधरा को बिलाप, सुद्धोदन की वेदना, जीवक, रद्वपाल
सर्ग पाँच में – बैराग की डगर, मनाबा की आखरी कोसीस, राजगृह की ओर, राजा बिम्बिसार सूं भेंट ।
सर्ग छह में – पांच परिव्राजक, आलार कालाम का धरम उपदेस, ध्यान की अवस्था।
सर्ग सात में – घोर तपस्या, सुजाता की खीर, गहरो ध्यान, मार की हार (कामदेव की हार), बुद्धत्व।
सर्ग आठ में – नुया धरम की खोज, दस जीवण चक्र, कपिल मुनि को सांख्य दरसण, पांच परिव्राजकांईं उपदेस, अस्टांगिक मार्ग।
सर्ग नो में – सील डगर, धरम चक्र परवरतन (प्रवर्तन)
सर्ग दस में – धरम दीक्स्या, यस कुल पूत की धरम दीक्स्या, कस्यप मुनि की धरम दीक्स्या, राजा बिम्बिसार सूं दूसरी भेंट,  महाकास्यप की प्रव्रज्या।
सर्ग ग्यारह में -अनाथपिण्डक की धरम दीक्स्या, दान को महत्व, जीवक, रट्ठपाल।
सर्ग बारह में – पिता सूं भेंट, पिता कै तांईं उपदेस, यसोधरा सूं मिलण
सर्ग तेरह में – साक्यों द्वारा अगवाणी, पिता को संदेसो
सर्ग चौदह में – गांव गांव में धरम प्रचार,  देवदत्त की करतूतां, गौतम ईं मारबा को कूटजाळ
सर्ग पन्द्रह में – आम्रपाली, आम्रपाली बुद्ध की सरण मं, आम्रपाली पै किरपा
सर्ग सोलह में – लिच्छवियों पै किरपा, असवर्णों की धरम दीक्स्या (उपाली नाई),  सुप्रबुद्ध कोढ़ी
सर्ग सत्रह में – धरम दीक्स्या “दूसरो चरण” , अंधविस्वासियांईं ग्यान, अंगुळीमाळ को उद्धार, दूसरा अपराध्यां की धरम दीक्स्या
सर्ग अठारह में – औरतां की धरम दीक्स्या,  चाण्डालिका प्रकरती
सर्ग उन्नीस में – निरवाण की डगर, आणंद की कळप, आखरी संदेस, त्रीदण्डी सुभद्र कै तांईं आखरी दीक्स्या, आखरी उपदेस, अनिरुद्ध की अरज, उत्तराधिकारी
सर्ग बीस में – महानिरवाण, आखरी विदाई अर संस्कार
यथा शीर्षक कवि किशन वर्मा ने उन सम्पूर्ण सन्दर्भों को हाड़ौती में लिखा है जिनका विशद्  विवरण उन ग्रन्थों में दिया गया है जिनका कवि ने सहायक ग्रन्थ के रूप में यथा – 1.बुद्ध और उनका धम्म, लेखक बोधि सत्व बाब साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, 2. बुद्ध चरितम प्रथम भाग 3. बुद्ध चरितम द्वितीय भाग लेखक महाकवि अश्वघोष शास्त्री,4.वैशाली की नगर वधु लेखक आचार्य चतुरसेन शास्त्री 5. यशोधरा लेखक मैथिली शरणगुप्त, साथ ही गूगल से पारायण किया और चिंतन – मनन करते हुए इन सभी के मूल स्वरूप को ‘ बुद्धायन ‘ में उकेर कर हाड़ौती साहित्य परम्परा को समृद्ध किया।
सर्ग एक के आरम्भ में ही कवि ने “नमो नमः” के अन्तर्गत प्रार्थना के रूप में तथागत बुद्ध चरित का भाव चित्रण कर उनके उपदेश को उभारा है –
चित्तमल, राग वासना हरता बुद्ध तथागत नमो नमः। ईरस्या, बैर, कळेस संहरता, बुद्ध तथागत नमो नमः ।।
मोह माया सूं फंद छुड़ावै, ग्यान सुग्याता नमो नमः। करूण, दया, मनमीत जुड़ावै, ध्यान सुग्याता नमो नमः ।।
सम्यक रूप धरम का धारक, जगत सास्ता नमो नमः। सम्यक ग्यान करम का कारक, भगत सास्ता नमो नमः ।।
पंचसील, दसमल की वाणी, सुगत *सनातन नमो नमः । आठडगर, मध्यम धज ताणी, *सुमत सनातन नमो नमः ।।
च्यार आर्य सत मरम पछाणै, परग्या दायक नमो नमः । नौ गुण वंदण लोक बखाणै, तरग्या *पायक नमो नमः ।।
सरदा महा परम आदरणीय बुद्ध भगवन्ता नमो नमः । छः गुण धम्म विशेष वंदनीय, सम्बुद्ध सन्ता नमो नमः ।।
सबद सांच भव मोती पाऊं, ग्रंथ रचू म्हूं बुद्धायन । किसन कवि बुद्ध सरणा आऊं, करतो रहूं नत पारायण ।।
कवि जब इस प्रकार नमन करते हुए बुद्ध की शरण में अपने को समर्पित करता तो वह उनके अन्तिम क्षणों को भी उसी भावभूमि पर उकेरता है।
बीसवें सर्ग में कवि महानिर्वाण के बाद जब आखिरी विदाई और संस्कार को वर्णित करता है तो उन सभी सन्दर्भों की वास्तविकता को उजागर करता है जो तत्कालीन परिवेश में उपजी और उनका यथास्थिति समाधान अवध के नरेश अजातशत्रु ने किया-
निरवाणी खसबू उड़ी, दुनिया रह’गी दंग। सातों जनपद भू पति, चाहवै अस्थी अंग।।
सब आपस में बांटल्यो, कर *ऑगां का भाग। हलमल जीओ जीवणी, छोड़ो सब अनुराग ।।
आपस में सब लड़ रह्या, मांगै हड्ड्यां राख। द्रोण बीच मं बोलग्या, क्यूँ भेळो छो साख। क्यों *भेळो छो *साख, तथागत सील सखाया। विनय, दया, सत च्यार, डगर अस्टांग बताया।। किसन कवि कहै बुद्ध, क्रोध इच्छा करौ बस मं। आठ भाग करल्यो बोल्या बांटो आपस मं।।
भाग एक सत्रुअजातईं, लिच्छविं दूजो भाग। कपिलवस्तु साक्यान् को, तीजा पै अनुराग। तीजा पै अनुराग, कै चौथो अलकप्य बूल्ली। भाग पांचवों कोळी लेवै हुवै तसल्ली ।। पावा का मल्ल छठो, सातवों विप्र मांग छै। पांती आया कुसीनारा मल्ल आठ भाग छै।।
भाग नवों, खाली घड़ो, द्रोण भिक्सु कै हाथ। बुद्ध रखौड़ी भाग दस, मोर्य हुया सनाथ ।। मोर्य हुया सनाथ, बणाया दस स्तूपा। करै प्रचार प्रसार, धरम का भिक्सुक, भूपा ।। किसन कवि नै छोड्या ईरस्या, द्वेस, राग छै। रच्यो ग्रंथ “बुद्धायन “मानै बड़ो भाग छै ।।
सर्ग बीस, भगवान् बुद्ध,पावै महानिरवाण।  बंटवारा अवसेस का, करै  “किसन “गुणगाण ।।
महाकाव्य में वर्णित सभी सर्गों के यथा सम्भव प्रत्येक पृष्ठ पर कवि ने प्रयुक्त शब्दों के समुचित अर्थ भी दिए हैं जिससे प्रसंग विशेष की भाव – संवेदना को स्पष्ट रूप से समझा जा सके। जैसे * सनातन – अविनासी, *सुमत – ग्यानवान, *पायक – सेवक पृष्ठ- 15 , *ऑगा = अस्थि फूल, *भेळो = नुकसान, *साख = फसल, इज्जत पृष्ठ – 368
सम्पूर्ण महाकाव्य दोहा, छंद, चौपाई के अतिरिक्त सोरठा – पृष्ठ संख्या 24, 33, 43, 46, 55, 70, 76, 92, 101, 117, 140, 154, 178, 239, 240, 248, 352, सवैया –  पृष्ठ संख्या 18, 19, 92, 97, 108, 109, 142, कुंडली – पृष्ठ संख्या 178, 179, 191, 213, 220, 259, 263, 280, 312, 319, 368, 369 में तथा उन्नीसवें सर्ग का उतराधिकारी वाला पूरा ही भाग पृष्ठ संख्या 354 से 355 तक कुंडली में ही निबद्ध है। यही नहीं पृष्ठ संख्या  205, 296, 359 पर कवित्त भी लिखे हैं।
अन्ततः यही कि कवि द्वारा अपने सघन अध्ययन, मौलिक चिन्तन और पूर्ण समर्पण से रचित तथा ज्ञान गीता प्रकाशन, एफ – 7, गली नं – 1, पंचशील गार्डन, एक्स. नवीन शाहदरा, दिल्ली से वर्ष 2024 में प्रकाशित ‘ बुद्धायन ‘ बुद्ध के जीवन – वृत के साथ उनके दार्शनिक विचारों को सरलता से प्रस्तुत करता है।
– विजय जोशी
कथाकार और समीक्षक, कोटा

रेपो दर में कमी के साथ ही भारत में ब्याज दरों के नीचे जाने का चक्र प्रारम्भ

भारतीय रिजर्व बैंक के नवनियुक्त अध्यक्ष श्री संजय मल्होत्रा ने अपने कार्यकाल की प्रथम मुद्रानीति दिनांक 7 फरवरी 2025 को घोषित की। अभी तक प्रत्येक दो माह के अंतराल पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा घोषित की गई मुद्रा नीति के माध्यम से लिए गए निर्णयों का देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने में विशेष योगदान रहा है। हालांकि पिछले लगभग 5 वर्षों में रेपो दर में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है। मई 2020 में अंतिम बार रेपो दर में वृद्धि की घोषणा की गई थी।

इसके बाद घोषित की गई 29 मुद्रा नीतियों में रेपो दर को स्थिर रखा गया है और यह अभी भी 6.5 प्रतिशत के स्तर पर कायम है। परंतु,अब फरवरी 2025 माह में घोषित की गई मुद्रा नीति में रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की कमी करते हुए इसे 6.50 प्रतिशत से 6.25 प्रतिशत पर लाया गया है।

केंद्र सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक को देश में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में रखने हेतु मेंडेट दिया गया है और इस मेंडेट पर ध्यान रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने में सफलता भी पाई है। परंतु, वित्तीय वर्ष 2024-25 के प्रथम एवं द्वितीय तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर घटकर 5.2 प्रतिशत एवं 5.4 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही थी। अतः देश में आर्थिक विकास की दर पर भी अब विशेष ध्यान देने की आवश्यकता प्रतिपादित हो रही थी, इसीलिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं में कमी की घोषणा की है। रेपो दर में कमी करने का उक्त निर्णयमुद्रानीति समिति के समस्त सदस्यों ने एकमत से लिया है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकलन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-45 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 6.4% की रहेगी और वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 6.7 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाएगी। इस वर्ष खरीफ की फसल बहुत अच्छे स्तर पर आई है एवं आगे आने वाली रबी की फसल भी ठीक रहेगी क्योंकि मानसून की बारिश अच्छी रही थी और देश के जलाशयों में, क्षमता के अनुसार, पर्याप्त पानी इन जलाशयों में उपलब्ध है, जिसे कृषि सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जा रहा है और जो अंततः कृषि की पैदावार को बढ़ाने में सहायक होगा। इससे ग्रामीण इलाकों में उत्पादों की मांग में वृद्धि देखी गई है।

हालांकि शहरी इलाकों में उत्पादों की मांग में अभी भी सुधार दिखाई नहीं दिया है। परंतु हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा मध्यमवर्गीय करदाताओं को आय कर में दी गई जबरदस्त छूट के चलते आगे आने वाले समय में शहरी क्षेत्रों में भी उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होगी और विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत औद्योगिक इकाईयों की उत्पादन वृद्धि दर तेज होगी। सेवा क्षेत्र तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर ही रहा है।

प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ मेले में धार्मिक पर्यटन के चलते देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त योगदान होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस प्रकार, भारत की आर्थिक विकास दर के वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग 7 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 8 प्रतिशत रहने के प्रबल सम्भावना बनती है। भारतीय रिजर्व बैंक का आंकलन उक्त संदर्भ में कम ही कहा जाना चाहिए।

इसी प्रकार मुद्रा स्फीति के संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.8 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2025-26 में घटकर 4.2 प्रतिशत रह सकती है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों के महंगे होने के चलते ही बढ़ती है, जिसे ब्याज दरों को बढ़ाकर नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता है। हेडलाइन मुद्रा स्फीति की दर अक्टूबर 2024 में अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गई थी परंतु उसके बाद से लगातार नीचे ही आती रही है

इसी प्रकार, कोर मुद्रा स्फीति की दर भी लगातार नियंत्रण में बनी रही है। केवल खाद्य पदार्थों में के महंगे होने के चलते उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई पर दबाव जरूर बना रहा है। इस प्रकार महंगाई दर के नियंत्रण में आने से अब भारत में ब्याज दरों में कमी का दौर प्रारम्भ हो गया है। आगे आने वाले समय में भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में कमी की घोषणा की जाती रहेगी ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है और दिसम्बर 2025 तक रेपो दर में लगभग 100 आधार बिंदुओं की कमी की जा सकती है और रेपो दर घटकर 5.25 प्रतिशत तक नीचे आ सकती है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि देश में आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर रेपो दर में परिवर्तन के बारे में समय समय पर विचार किया जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने नीति उद्देश्य को भी निष्पक्ष रखा है परंतु चूंकि ब्याज दरों में अब कमी करने का चक्र प्रारम्भ हो चुका है अतः इसे उदार रखा जा सकता था। इसका आश्य यह है कि आगे आने वाले समय में भी रेपो दर में कमी की सम्भावना बनी रहेगी।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में की गई कमी की घोषणा के बाद अब विभिन्न बैकों को ऋणराशि पर ब्याज दरों को कम करते हुए ऋणदाताओं को लाभ पहुंचाने के बारे में शीघ्रता से विचार करना चाहिए जिससे आम नागरिकों द्वारा बैकों को अदा की जाने वाली किश्तों एवं ब्याज राशि में कुछ राहत महसूस हो सके। इससे अर्थव्यवस्था में भी कुछ गति आने की सम्भावना बढ़ेगी।

दिसम्बर 2024 माह में देश में तरलता में कुछ कमी महसूस की जा रही थी और बैकों के पास ऋण प्रदान करने योग्य फंड्ज की कमी महसूस की जा रही थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने तुरंत निर्णय लेते हुए आरक्षित नकदी अनुपात (CRR) को 4.5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया था, जिससे बैकों की तरलता की स्थिति में कुछ सुधार दृष्टिगोचर हुआ था। बैकों के लिए इसे अधिक सरल बनाने की दृष्टि से जनवरी 2025 में भी भारतीय रिजर्व बैंक ने लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपए बांड्ज विभिन्न बैकों से खरीदे थे ताकि इन बैकों की तरलता की स्थिति में और अधिक सुधार किया जा सके और बैकिंग सिस्टम में तरलता की वृद्धि की जा सके। उक्त वर्णित

भाषाएं और माताएं अपनी संतानों से सम्मानित होती हैं: प्रो.द्विवेदी

भोपाल । भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी का कहना है कि भाषाएं और माताएं अपनी संतानों से ही सम्मानित होती हैं। इसलिए भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने हमें ही आगे आना होगा।

वे नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में व्याख्यान दे रहे थे। भारत मंडपम के थीम पवेलियन के हाल नंबर -5 में आयोजित कार्यक्रम में प्रो.द्विवेदी ‘राजभाषा हिंदी: अनुप्रयोग के विविध आयाम ‘ विषय पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में प्रख्यात व्यंग्यकार सुभाष चंदर, लेखक और तकनीकविद् बालेंदु शर्मा दाधीच, उपन्यासकार अलका सिन्हा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन ललित लालित्य ने किया। इस मौके पर एनबीटी के मुख्य संपादक कुमार विक्रम ने अतिथियों का स्वागत किया।
प्रो.द्विवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर हिंदी को पहचान दिलाई है तो राजभाषा के क्रियान्वयन में गृहमंत्री अमित शाह पूरी संकल्प शक्ति से जुटे हैं। यह समय सभी भारतीय भाषाओं के लिए भी अमृतकाल है। इस अवसर का लाभ उठाकर हम अपनी भाषाओं को न्याय दिला सकते हैं। उन्होंने कहा औपनिवेशिक सोच ने भारतीय भाषाओं और भारतीय मानस की स्वतंत्र चेतना पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। इससे मुक्ति के लिए सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। जिसमें सरकार और समाज मिलकर काम करें। उन्होंने कहा कि भारत स्वभाव से बहुभाषी है इसलिए हमें बहुभाषी और सब भाषाओं को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण बनाने की जरूरत है। सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने से ही हम चुनौतियों का मुकाबला कर सकेंगे।

कार्यक्रम में साहित्यकार रिंकल शर्मा, पत्रकार मुकेश तिवारी (इंदौर), अर्पण जैन उपस्थित रहे।

बैंगलुरु में अब एआई से जाने रहे हैं हवा का हाल!

बेंगलुरू की एक निजी कंपनी अमेरिका-भारत अनुदान के बूते स्थानीय स्तर पर प्रदूषण की निगरानी के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही है।

बेंगलुरू में पर्सनल एयर क्वालिटी सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड (पीएक्यूएस) के संस्थापक और प्रबंध निदेशक ए. वैद्यनाथन के अनुसार, ‘‘वायु प्रदूषण एक खामोश हत्यारा है। वायु प्रदूषण के कारण भारत में स्वास्थ्य लागत प्रतिवर्ष लगभग 80 अरब डॉलर होने का अनुमान है और इससे निचले स्तर के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।’’

देश भर में कमजोर तबके के लोगों की सेहत खतरे में होने के कारण पीएक्यूएस ने लोगों को वायु प्रदूषण से बचाने के महत्वपूर्ण काम के लिए खुद को समर्पित किया है। कंपनी के प्रयासों को हाल ही में तब पंख लगे जब अक्टूबर 2024 में इसे ‘‘क्वांटम टेक्नोलॉजीज़ एंड आर्टिफिशियस इंटेलिजेंस (एआई) फॉर ट्रांसफॉर्मिंग लाइव्स’’ अनुदान प्राप्त के करने के लिए चयनित किया गया। यह प्रतिष्ठित अनुदान भारत और अमेरिका की सरकारों की संयुक्त पहल है। वैद्यनाथन कहते हैं कि इस अनुदान से पीएक्यूएस के इस जीवन बचाने वाले काम के बारे में लोग जानेंगे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एआई अनुसंधान के नए स्तरों को बल मिलेगा।

यूएस-इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी एंडाउमेंट फंड (यूएसआईएसटीईएफ) के क्वांटम टेक्नोलॉजी एंड एआई फॉर ट्रांसफॉर्मिग लाइव्स अनुदान के हिस्से के रूप में 11 एआई परियोजनाओं में से हरेक को लगभग 120,000 डॉलर का अनुदान मिलेगा। यानी करीब 20 लाख डॉलर खर्च होंगे। यह अनुदान यूएस-इंडिया इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी (आईसीईटी) के तहत क्वाटंम प्रौद्योगिकी और एआई में संयुक्त अनुसंधान और विकास की दिशा में एक मील का पत्थर है।

‘‘मेरी हवा ही मेरा स्वास्थ्य है,’’ इसी विश्वास से प्रेरित होकर वैद्यनाथन और उनकी टीम ने लोगों को वायु प्रदूषण के खतरों से निपटने में मदद करने के लिए अत्याधुनिक उत्पादों की एक विस्तृत शृंखला तैयार की। ये उत्पाद इसका इस्तेमाल करने वालों को उनके आसपास की वायु की गुणवत्ता को समझने और उसके अनुरूप अपने निजी स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने में मदद करते हैं। कंपनी के नवाचारों में एक स्वच्छ वायु हेलमेट शामिल है जो हवा से प्रदूषक तत्वों को हटाने के लिए स्मार्ट तकनीक का इस्तेमाल करता है। इसके अलावा एक स्मार्ट इनहेलर है जो अस्थमा से पीडि़त लोगों की मदद करने के लिए सेंसर और डेटा एनेलेटिक्स का उपयोग करता है। डिजिटल बेबीसिटर सिस्टम खासतौर से केयरगिवर्स को सशक्त बनाने और हानिकारक वायुजनित प्रदूषकों से शिशुओं को बचाने के लिए तैयार किया गया है।

मैरीलैंड यूनिवर्सिटी, बाल्टीमोर काउंटी (यूएमबीसी) में प्रोफेसर राम पी. रुस्तगी एआई पर पीएक्यूएस को सलाह देने का काम करते हैं और वह इन दिनों एक ऐसी ही रोमांचक परियोजना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यह कुछ उसी तरह का विश्वसनीय नवाचार है जिसके चलते कंपनी को ‘‘क्वांटम टेक्नोलॉजी एंड एआई फॉर ट्रांसफॉर्मिग लाइव्स’’ अनुदान हासिल करने में मदद मिली।

रुस्तगी ने इस परियोजना को ‘‘हाईपरलोकल एयर क्वालिटी मॉनीटर विद एआई ड्रिवेन मॉॉडलिंग’’ के तौर पर बताया है। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब स्थानीय वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए कम लागत वाले सेंसर का उपयोग करना और उपयोग करने वाले के लिए किसी भी जगह की वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) को मापना आसान बनाना है। लेकिन सबसे खास बात यह है कि इसके जरिए उपयोगकर्ता को वायु गुणवत्ता डेटा की एआई संचालित व्याख्याएं मिल जाती है और वह अपने स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन विकल्पों का चुनाव कर सकने में सक्षम बन सकता है।

पीएक्यूएस को विश्वास है कि एयर क्वालिटी सेंसर से मिलने वाली सूचनाओं एवं एआई एल्गोरिदम से प्राप्त विश्लेषण से लोगों के जीवन में काफी बड़ा फर्क आएगा।

रुस्तगी के अनुसार, ‘‘अलग-अलग लोगों में वायु प्रदूषण को लेकर भिन्न-भिन्न संवेदनशीलता हो सकती है, कुछ लोगों को हवा में धुएं के कुछ निश्चित स्तर के साथ ठीक महसूस हो सकता है, लेकिन दूसरों को नहीं।’’ वह कहते हैं, ‘‘हमारी तकनीक लोगों को उनके घर के आसपास के इलाकों को समझन,े या जहां भी वे हों, वहां के प्रदूषकों के बारे में जानकारी देकर यह जानने में मददगार हो सकती है कि हवा की गुणवत्ता कैसी है और उनकी सेहत पर किस तरह से असर डाल सकती है।’’

रुस्तगी बताते हैं कि कंपनी ने अब तक एक आशाजनक प्रोटोटाइप विकसित किया है। पीएक्यूएस को मिली अनुदान राशि से वैद्यनाथन द्वारा वर्णित ‘‘भविष्य को भांपने की बुद्धिमता’’ के बारे में गहराई से जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी। इसमें वायु गुणवत्ता डेटा का विश्लेषण करने में सक्षम कंप्यूटर एल्गोरिदम का उपयोग, यह अनुमान लगा पाना कि वायु प्रदूषण की समस्याएं कहां होने वाली हैं और लोगों की सेहत को फायदा हो सके, इसलिए उस जानकारी को पूरे भारत में साझा करना, जैसी बातें शामिल हैं। वह कहते हैं कि एक-दो साल के भीतर पीएक्यूएस परियोजना के और भी नए पहलू सामने लेकर आएगा।

वैद्यनाथन के अनुसार, ‘‘एक प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप के रूप में हम अपने प्रयासों और यात्रा का फायदा उठाने के लिए पुरस्कार और अवसरों की तलाश कर रहे थे।’’ फंडिंग और साझेदारी की तलाश में वैद्यनाथन को रुस्तगी का साथ मिला और फिर ‘‘क्वांटम टेक्नोलॉजीज़ एंड एआई फॉर ट्रांसफ़ॉर्मिंग लाइव्स’’ से अनुदान मिला।

वैद्यनाथन के अनुसार, ऐसा रोमांचक अवसर पैदा करने के लिए वह भारत औरअमेरिका की सरकारों के आभारी हैं। वह कहते हैं, ‘‘अमेरिका के पास प्रौद्योगिकी और नेतृत्व है, जबकि भारत के पास महत्वाकांक्षी युवाओं के साथ एक विशाल प्रतिभा पूल है- साथ मिल कर काम करने के लिए इससे आदर्श संयोजन की स्थिति और क्या हो सकती है।’’

माइकल गलांट लेखक, संगीतकार और उद्यमी हैं और न्यू यॉर्क सिटी में रहते हैं।

साभार- https://spanmag.state.gov/hi/ से

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की कड़क चाय का जायका, रायगढ़ में अदरक वाली चाय ने जीता दिल!

रायगढ़/ चुनावी गर्मी के बीच रायगढ़ में एक चाय की दुकान पर माहौल चाय की भाप से और भी गर्म हो गया, जब खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने चाय बनाई। यह कोई आम चाय नहीं थी, बल्कि अदरक वाली कड़क चाय, जिसे पीकर लोग बोले- वाह! सीएम साहब, आपकी चाय में भी दम है!

दरअसल, मुख्यमंत्री साय भाजपा महापौर प्रत्याशी जीवर्धन चौहान के समर्थन में रायगढ़ पहुंचे थे। पूरे जोश के साथ पांच किलोमीटर लंबा रोड शो करने के बाद वे सीधे जीवर्धन चौहान की मिनीमाता चौक स्थित चाय दुकान पहुंचे। वहां न केवल चाय बनाई, बल्कि खुद लोगों को प्याली थमाते हुए बोले-
चाय से ज्यादा मीठी जीवर्धन भाई की जुबान और उनका व्यवहार है!

बनाई खुद चाय, लोगों से कहा – मेहनत का सम्मान ही भाजपा की पहचान

चाय की दुकान पर जब मुख्यमंत्री खुद स्टोव जलाकर अदरक, इलायची और चाय पत्ती डालने लगे, तो वहां मौजूद लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई। किसी ने कैमरा ऑन किया, तो कोई वीडियो बनाने में जुट गया। चाय बनने के बाद मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों को खुद चाय सर्व की।

उन्होंने कहा, एक साधारण कार्यकर्ता की मेहनत का सम्मान भाजपा में ही संभव है। जिस तरह चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी आज दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता बने, उसी तरह जीवर्धन भाई भी जनता के आशीर्वाद से रायगढ़ के महापौर बनेंगे।

चाय से बनी चुनावी चर्चा, लोगों ने कहा – यह चाय तो कमाल की है!

चाय पीने के बाद लोगों ने कहा कि सीएम की बनाई अदरक वाली चाय वाकई कड़क थी। चुनाव प्रचार के बीच यह चाय सिर्फ एक प्याला नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए जोश और ऊर्जा का नया स्वाद थी

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