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शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों का शास्त्रीय विवेचन

शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था

भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।

द्वापर में जम्बूद्वीप में आगमन
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में आगमन पुराणों के अनुसार द्वापर में हुआ । भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषि दुर्वासा ने ही कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने ऋषि का उपहास किया था । उनके रूप को लेकर मजाक उड़ाया था। साम्ब ने द्वारका आए ऋषि दुर्वासा का उनकी कृशता और कुरूपता पर उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। एक अन्य कथा में नारद जी के बहकावे में आकर

राजकुमार सांब ने श्रीकृष्ण की कनिष्ठ पत्नी नंदिनी के साथ अनुचित व्यवहार किया था, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। बाद में भगवान कृष्ण अपने पुत्र साम्ब के कुष्ठ रोग से अत्यन्त चिंतित भी हुए। उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी।जो अपने सूर्यमंत्र और चिकित्सा के लिए प्रख्यात थी। भगवान नें शाक द्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बू द्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय चिकित्सको ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया।

राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का भी इलाज :-
उन ब्राह्मणों को द्वारका में ज्यादा समय व्यतीत करना अच्छा न लगा और गरुड़ पर सवार हो कर शाकद्वीप की ओर जा रहे थे। जब वे मगध-देश के ऊपर पहुंचे तो वहाँ रोना-पीटना सुनाई पड़ा। ब्राह्मण लोग बड़े व्यग्र थे। उनके पूछने पर गरुड़ ने कहा कि मगध-देश के राजा धृष्टकेतु को कोढ़ हो गया है इसी कारण उसने मरने की ठान ली है और चिता के लिये लकड़ियों का ढेर लगा है। राजा बड़ा धर्मात्मा है और उसके राज में सब सुखी हैं। इसी से उसकी सब प्रजा उसके लिये रो रही है। ब्राह्मणों को दया आई और उन्होंने गरुड़ से कहा कि ‘क्या इस देश में ऐसा तपस्वी नहीं है जो राजा को इस रोग से मुक्त करे? गरुड़ ने उत्तर दिया यहाँ ऐसा कोई होता तो शाम्ब आप लोगों को क्यों बुलाते। ब्राह्मणों ने गरुड़ से कहा कि पृथ्वी पर उतरो। राजा उनके दर्शनों से कृतकृत्य हो गया। मिहरांशु ने उसे अपना चरणोदक पिलाया और राजा का कोढ़ अच्छा हो गया।

राजा धृष्टकेतु ने मगध में शाक द्वीपियों को बसाया
जब ब्राह्मणों ने राजा धृतकेतु को निरोग करने के बाद गरुड़ से कहा कि हमें शाकद्वीप पहुँचा दो। तब गरुड़ ने कहा कि आप से प्रतिज्ञा करा चुका हूँ अब आप यहीं रहिये। कृतज्ञ राजा ने ब्राह्मणों को अपने देश में आदर से रक्खा और गङ्गा-तट पर कई गाँव दिये। ब्राह्मणों से चार अर्थात् श्रुतिकीर्ति, श्रुतायु, सुधर्म्मा, और सुमति ने सन्यास ले लिया और तपस्या करने को बदरिकाश्रम चले गये। शेष 14 मगध में रहे और वसु ने अपनी बेटियाँ उनको विवाह दी। उन्हीं की सन्तान आज-कल मगध देश में बसी है। मगध नरेश की आग्रह पर भगवान ने शाकद्वीपीय चिकित्सको के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया।

त्रेता युग में राजा प्रतर्दन द्वारा शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार :-

काशी के राजा प्रतर्दन त्रेतायुग में हुए थे।  वे काशी के प्रसिद्ध राजा दिवोदास के पुत्र थे।

इनके अन्य नाम ‘द्युमान’, ‘शत्रुजित’, ‘वत्स’, ‘ऋतध्वज’ और ‘कुवलयाश्व’ भी मिलते हैं।

उनके पिता दिवोदास ने काशी में शासन किया था और वे त्रेतायुग के अंतिम चरण या द्वापर युग के शुरुआती दौर से पूर्व का समय मानते हैं, क्योंकि वे राम के पूर्वज के समकालीन संदर्भों में एक शक्तिशाली क्षत्रिय शासक के रूप में वर्णित किया गया है। वे अत्यंत तपस्वी और दूरदर्शी थे। उनके कठिन तप को देखकर सूर्य भगवान् स्वयं प्रसन्न हुए और उन्होंने सात ब्राह्मणों को आशीर्वाद दिया। उन ब्राह्मणों की संतानों ने पृथ्वी पर धर्म और न्याय का प्रचार किया।”

समय के साथ शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार हुआ। मिहरांशु, शुभांशु, सुधर्मा, सुमति और अन्य ब्राह्मणों की संतानों ने विभिन्न क्षेत्रों में शाखाएँ बनाई। प्रत्येक शाखा ने अपने-अपने क्षेत्र में धर्म और ज्ञान का प्रचार किया।

गोत्र और शाखाएं
मिहरांशु, भारद्वाज, कौण्डिन्य, कश्यप, गर्ग की सन्तान बढ़ी और प्रसिद्ध हुई। इसी कारण शाकद्वीपियों के छः घर बन गये और प्रत्येक घर के मूल-पुरुष का नाम गोत्र कहलाया। आज-कल शाकद्वीपियों के 72 घर गिने जाते हैं, अर्थात् उर के 24 आदित्य के 12, मण्डल के 12 और अर्क 7 घर या पुर अस्तित्व में आए। शेष इन्हीं की शाखायें हैं।

मिहरांशु की प्रतिष्ठित शाखा रही:-

मिहरांशु की सन्तान ने बड़े – बड़े काम किये थे इसलिये उनकी शाखा अधिक प्रतिष्ठित मानी जाती है। जो शाखा जिस गाँव में बसी उसी गाँव के नाम से प्रसिद्ध हुई।

मगध चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में बसाया :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की दो मुख्य शाखा ‘मग ब्राह्मण’ तथा ‘भोजक’ ब्राह्मण’ माने जाते हैं । मग ब्राह्मण मूलतः मगध (गया, बिहार) के निवासी बताये जाते हैं। शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। किन्हीं ग्रन्थों में द्वारका शाकद्वीप में स्थित कही गई है। वेद तथा पुराणों में इनका उल्लेख ब्राह्मणों की एक सर्वोत्तम जाति के रूप में है जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था।

चेदि के राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का इलाज
चेदि राज्य का राजा और शिशुपाल का सबसे बड़ा पुत्र धृष्टकेतु है। धृष्ट का अर्थ है “साहसी,” “प्रवंचित,” या “साहसी” और केतु का अर्थ – “झंडा,” “पट्टिका,” या “प्रतीक” होता है । धृष्टकेतु शिशुपाल के पुत्र हैं , जो अपनी मातृ पक्ष से यदु के वंशज दशार्ह वंश से संबंधित हैं। धृष्टकेतु यह नाम धृष्टद्युम्न के पुत्र सहित कई अन्य व्यक्तियों के साथ साझा करते हैं । वह

एक महान धनुर्धर और महारथ थे । धृष्टकेतु को युधिष्ठिर की सेना के सात सेनापतियों में से एक नियुक्त किया गया था। युद्ध के दौरान, धृष्टकेतु ने कई दुर्जेय योद्धाओं से युद्ध किया था। वह पांडवों का वफादार सहयोगी है और कुरुक्षेत्र युद्ध में एक प्रमुख भूमिका निभाता है , जहाँ उसने उनकी सेना के सात सेनापतियों में से एक के रूप में कार्य किया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसने बहुत से योद्धाओं से युद्ध किया और वृहदवाहन का वध किया। उस सहित उसके तीनों भाइयों – पुरूजीत, धृष्टकेतु और वृहद्क्षत्र का वध चौदहवें दिन के युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथों हुआ था। धृष्टकेतु ने अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग में ‘विश्वदेव’ का दर्जा प्राप्त किया था।

मगध चेदि नरेश जरासंघ के इस पूर्वज धृष्टकेतु को कुष्ठ हो गया था। जिनके उपचार के लिए शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में लाया तथा कुष्ठ से त्राण पाकर उपहार स्वरूप उन्हें अठारह पुर (ग्राम) दिये तथा प्रत्येक के चार चार पुत्र उत्पन्न हुआ और वे सब पृथक पृथक 72 पुरों (ग्रामों) में निवास करने लगे । मगध- चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया गया । वहां से ये लोग भारत के विभिन्न भागों में फ़ैल गए । जैसे बिहार और उत्तरी भारत के अन्य भागों में एक प्रसिद्ध समुदाय है। इनकी दो उपशाखाएँ हैं- भोजक और मग। इनके गाँवों में अधिकांश सकलद्वीपी ब्राह्मणों के पास कृषि भूमि होती है, जिस पर भूमिहीन मजदूर खेती करते हैं। प्रत्येक शाक=सकलद्वीपी परिवार का अपना देवता होता है और वे पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक विशेषज्ञ भी उनके समुदाय से ही होते हैं। पुजारी और ज्योतिषी होने के नाते, सकलद्वीपी ब्राह्मणों का अन्य समुदायों के साथ संरक्षक-ग्राहक संबंध होता है।

पुराणों में उल्लेखित विवरण के पहले छठी पांचवी शताब्दी ई. पू. में शाकद्वीप से भारत आये उपयुक्त सभी साक्ष्यों से सवर्धा समर्थित हैं सूर्योपासक पुरोहितों को मग एवं भोजक इन दोनों श्रेणियों में विभाजित किया गया है । पुराणों के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि मग और भोजक एक थे अन्तर मात्र इतना था कि –

(1) सूर्य का जो ध्यान करे उसे मग कहा जाता है । मग म अक्षर की पूजा करते थे म= मंत्र ग = गुरू मंत्रों के गुरू मग मे सूर्य गायन्तीति मगा:
(2) भोजक- धूप, दीप, माला से पूजन एवं विभिन्न उपहारों से सूर्य को भोग लगाते हैं उन्हे भोजक कहा जाता है ।

धूपमाल्यैर्मतश्चापि उपहारैस्तथैव च ।
भोजयन्ति सहस्रांशुं तेन ते भोजका: स्मृता: ।
यह भी सम्भव है कि भोजक भारतीय परम्परा के पुरोहित रहे हों। दोनों ही सूर्य के सकल एवं निष्कल रूप से उपासक थे ।

कालान्तर में भारत के कई प्रान्तों के रजवाड़ों द्वारा पूजा पाठ , रोग निवारण के लिए अपने अपने राज्यों में ले गये, जिनमें 72 पुरों में से 16 पुर के लोग पश्चिम में गये जो वहां गोत्र (खाप) से जाने गये।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आत्मकथा ‘पालनिवेलु गट्स’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

पुस्तक विमोचन पर उपराष्ट्रपति ने कहा, भारत एक रहा है और हमेशा एक रहेगा

अच्छा समाज बनाने के लिए व्यक्तिगत प्रयासों को पहचानना ज़रूरी है: उपराष्ट्रपति

प्रत्‍येक व्यक्ति का समाज को कुछ लौटाने का कर्तव्य है: उपराष्ट्रपति

प्रविष्टि तिथि: 19 JAN 2026 8:22PM by PIB Delhi

उपराष्ट्रपति, श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने जाने-माने सर्जन डॉ. सी. पलानीवेलु की आत्मकथा ‘पलानीवेलु गट्ज़’ के हिंदी संस्‍करण का विमोचन किया और इस किताब को साहस, लगन और मेडिसिन के क्षेत्र में नैतिक नवोन्‍मेष का एक प्रेरणादायक उदाहरण बताया।

इस मौके पर, उपराष्ट्रपति ने डॉ. पलानीवेलु के लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक सर्जरी में अग्रणी योगदान को उजागर किया, और कहा कि उनके काम ने भारत में सर्जिकल तरीकों को बदल दिया है और उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब देश में मिनिमली इनवेसिव सर्जरी अभी शुरुआती दौर में थी, डॉ. पलानीवेलु ने मरीज़ों की देखभाल में नवोन्‍मेष को गले लगाकर असाधारण दूरदर्शिता और साहस दिखाया।

भारत में लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि 1990 के दशक की शुरुआत में डॉ. पलानीवेलु उन शुरूआती लोगों में से थे जिन्होंने इसकी क्षमता को पहचाना, तब भी जब इस तकनीक पर संदेह किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि डॉ. पलानीवेलु ने 1991 में कोयंबटूर में लेप्रोस्‍कोपिक सर्जरी शुरू की, और दक्षिण भारत में ऐसा पहला केन्‍द्र स्थापित किया।

किताब के शीर्षक, पालनिवेलु गट्स का ज़िक्र करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह आत्मकथा सिर्फ़ एक सफल सर्जन की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे युवा की यात्रा है जिसने साधारण शुरुआत से लेकर अनुशासन, कड़ी मेहनत और नैतिक विश्वास के ज़रिए मुश्किलों और असफलताओं का मुकाबला किया। उन्होंने आगे कहा कि जब तक व्यक्तियों के ईमानदार प्रयासों और अनुकरणीय योगदान को पहचाना और सराहा नहीं जाता, तब तक एक अच्छा समाज नहीं बनाया जा सकता।

भारत की विविधता पर विचार करते हुए, उपराष्ट्रपति ने टिप्पणी की कि इतनी विविधताओं के बावजूद, भारत एक रहा है और साझा मूल्यों और सामूहिक आकांक्षाओं से बंधा हुआ हमेशा एक रहेगा। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदी संस्करण का विमोचन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समाज के एक बड़े वर्ग, विशेष रूप से हिंदी पढ़ने वालों को, इस उल्लेखनीय जीवन यात्रा तक पहुँचने और उससे प्रेरणा लेने में सक्षम बनाएगा।

डॉ. पलानीवेलु के अपने शिक्षकों और गुरुओं के प्रति गहरे सम्मान की सराहना करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनके नाम पर पुरस्कार शुरू करने की उनकी प्रथा भारत की “गुरुओं” के प्रति श्रद्धा की सदियों पुरानी परंपरा को दर्शाती है और उत्कृष्टता की खोज में विनम्रता और कृतज्ञता के महत्व को रेखांकित करती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि समाज हर व्यक्ति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और समाज को वापस देना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। दूरदराज के इलाकों में सर्जनों को प्रशिक्षित करने और लागत प्रभावी सर्जिकल तकनीकों को विकसित करने के डॉ. पलानीवेलु के प्रयासों की सराहना करते हुए, उन्होंने कहा कि इन पहलों ने सामाजिक-आर्थिक समूहों में उन्नत चिकित्सा देखभाल तक पहुंच का काफी विस्तार किया है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पलानीवेलु गट्स पीढ़ियों को बड़े सपने देखने, ईमानदारी से काम करने और निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करने के लिए प्रेरित करेगा।

इस कार्यक्रम में रेल राज्य मंत्री, श्री रवनीत सिंह; नेशनल मेडिकल कमीशन के चेयरमैन, डॉ. अभिजात सेठ; इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर टीचर एजुकेशन के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन, प्रो. डॉ. जे. एस. राजपूत; और जीईएम हॉस्पिटल ग्रुप के सीनियर प्रतिनिधियों सहित कई लोग शामिल हुए।

शिखा अग्रवाल को अंग्रेजी कविता में डिप्लोमा प्रमाणपत्र

कोटा / लेखिका शिखा अग्रवाल को अंग्रेजी कविता में ऑन लाइन पोईट्स नेस्ट इंटरनेशनल प्लैटफॉर्म द्वारा डिप्लोमा प्रमाण पत्र जारी किया गया है। नवंबर 25 से  जनवरी 26 सत्र के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई अंग्रेजी कवयित्रियों ने इसमें भाग लिया था। इसमें भारत से भीलवाड़ा की श्रीमती शिखा के साथ-साथ श्रीमती सीमा दीवान और ग्रीस की अन्ना मावरूफी को डिप्लोमा प्रमाण पत्र दिया गया है।
शिखा ने बताया कि उन्होंने सभी लक्ष्य पूरे करते हुए अंग्रेजी की 10 कविताएं और 3 निबंध भेजे थे। अंग्रेजी निबंध द रोमांटिक एंड विक्टोरियन पोईट्स , पोइट्री एंड मी एवं
सिगनीफिकेन्स आफ फिगर आफ स्पीच इन इंग्लिश पोईट्री विषयों पर भेजे गए थे।
 उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी अन्तर्राष्ट्रीय ऑन लाइन अंग्रेजी कविता प्रतियोगिता में शिखा को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ था।
 शिखा अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में कविताएँ लिखती हैं। इन्होंने अंग्रेजी में शृंगार विषय पर फैशन-एन इनस्टिक्ट , उदयपुर-वर्ल्ड फेमस टूरिस्ट डेस्टिनेशन एवं सह लेखकों के साथ वर्ल्ड हेरिटेज ग्लोबल टू लोकल-लिस्टेड विथ यूनेस्को बुक्स लिखी हैं। दो पुस्तकों ए विदेश प्रवास हिंदी सेवा  संस्मरण / मेमोरीज एवं  वॉयस ऑफ नेचर ( चिल्ड्रन स्टोरीज ) का अंग्रेजी अनुवाद भी किया है।
हिंदी में  राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से ” मन दर्पण के प्रतिबिंब” काव्य संग्रह के साथ – साथ हेल्थ केयर,  टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा , अतुल्य अजमेर, सह लेखक , ये है हमारी रंग बिरंगी बूँदी, सह लेखक  के साथ लिखी है। शृंगार एक स्वाभाविक वृति का संपादन भी किया है। बाल कविताओं की कृति प्रकाशनाधीन है।
इनको लेखन के लिए 30 से अधिक प्रशस्ति पत्रों के साथ प्रमुख रूप से वैश्विक समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत, गांधीनगर, गुजरात द्वारा  समरस श्री साहित्य , साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा द्वारा काव्य कुमुद, श्री भारतेंदु समिति कोटा द्वारा साहित्य श्री , अणुव्रत समिति भीलवाड़ा द्वारा अणुव्रत काव्यधारा और लघु उद्योग भारती भीलवाड़ा द्वारा विदुषी नारी रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया।

बाल साहित्योदय: बच्चों को मोबाइल से दूर रह कर बाल साहित्य पढ़ने और लिखने का संदेश

कोटा । संस्कृति साहित्य  मिडिया फोरम एवं   न्यू किड्स वर्ल्ड स्कूल विज्ञान नगर के तत्वावधान में विद्यालय प्रांगण में शनिवार को आयोजित बाल साहित्योदय कार्यक्रम में साहित्यकारों ने कविताओं के माध्यम से बच्चों को साहित्य से जुड़ने का संदेश दिया। बच्चों ने सूर्य वंदना, स्वरचित कविता पाठ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विभिन्न साहित्यिक प्रतियोगिताओं में विजेता रहे बच्चों को पुरस्कृत किया गया।
मुख्य अतिथि जितेंद्र निर्मोही और अध्यक्ष रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने बच्चों को मोबाइल से दूर रहने बाल कविता, कहानी की पुस्तकें पढ़ने तथा लिखने के प्रयास के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया मिशन बाल मन तक के अंतर्गत 36 हजार बच्चों को साहित्य से जोड़ने की दिशा में हाड़ोती में बड़ा काम हुआ है। विद्यालय निदेशक आर. के. शर्मा ने सभी का स्वागत कर ऐसे कार्यक्रमों को भावी पीढ़ी के लिए सकारात्मक पहल बताया।
मीडिया फोरम की ओर से साहित्यिक सेवाओं एवं  बाल साहित्य कार्यक्रमों में योगदान के लिए साहित्यकार श्यामा शर्मा, महेश पंचोली, पल्लवी दरक न्याति, योगीराज योगी एवं शमा फिरोज़ को प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिन्ह दे कर सम्मानित किया गया। इनके साथ विशिष्ठ अतिथि डॉ. कृष्णा कुमारी ने काव्य पाठ किया। साहित्यकारों ने बच्चों के लिए अपनी बाल पुस्तकें विद्यालय को भेंट की।
 फोरम के संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने बताया कि बच्चों में साहित्य सृजन क्षमता विकसित करने के लिए इस वर्ष बाल रचना प्रशिक्षण शिविर लगाए जाएंगे। फोरम का विस्तार कर बाल साहित्य गतिविधियों से जुड़ने वाले साहित्यकारों को सदस्य बनाया जाएगा।
अतिथियों ने मां शारदे की तस्वीर के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का निर्देश प्राचार्य पलक विजयवर्गीय ने तथा संयोजन एवं संचालन निधि शर्मा ने किया। कार्यकम में इतिहासविद फिरोज़ अहमद और 200 से अधिक बच्चें उपस्थिति रहे।

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में 33 देशों के कलाकारों ने नृत्य व कला की दी प्रस्तुति

चंडीगढ़। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में दो दिवसीय 11वें इंडिया इंटरनेशनल डांस एंड म्यूजिक फेस्टिवल-2026 की धूम-धाम के साथ शुरुआत हो गई है। यह इंडियन काउंसल फॉर कल्चरल रिलेशंस (आईसीसीआर) के सहयोग से चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में करवाए जा रहे फेस्टिवल का थीम ’एक दुनिया अनेक सांस्कृतियां’ पर आधारित है। इसमें 33 देशों के 350 से ज्यादा कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। जोकि अपने देशों के डांस, संगीत व कला की प्रस्तुतियां दे रहे हैं। यह समागम वैश्विक एकता और सांस्कृतिक विविधता का संदेश दे रहा है।

समारोह के पहले दिन चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के चांसलर और सांसद (राज्य सभा) सतनाम सिंह संधू ने मुख्य अतिथि के रुप में शिरकत की। इस अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदाान प्रदान कार्यक्रम में दुनिया भर से प्रतिभा और रचनात्मकता देखने को मिल रही है।

 

इस मौके चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के चांसलर व सांसद (राज्य सभा) सतनाम सिंह संधू ने कहा कि “पीएम मोदी के सराहनीय प्रयास के कारण आज भारत विदेशी सैलानियों के लिए ग्लोबल हब बन कर उभरा है। वर्ष 2014 के बाद हमारे देश में सैलानियों की आमद में भारी इजाफा हुआ है। यह ही नहीं अब विदेशी स्टूडेंट्स भारत को शिक्षा के हब के रुप में देखते हैं। इसकी सबसे बड़ी उदाहरण मौजूदा समय चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में 65 देशों से पढ़ रहे 3000 विदेशी स्टूडेंट्स से मिलती है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी हमेशा इस बात पर यकीन रखती है कि भारत विश्व शक्ति बने और हमारे देश की तरक्की विकास में संस्कृति और कला से ज्यादा कुछ भी नहीं हो सकता है। कला ऐसी क्रिया है, जिसे सभी लोग समझते हैं। कला और संस्कृति भारत को पूरी दुनिया से जुड़ने और बढ़िया रिश्ते बनाने में अहम भूमिका अदा करते हैं। इसके कारण हमारे देश के अलग-अलग देशों के साथ अच्छे रिश्ते बन रहे है।”

 

फेस्टिवल के पहले दिन की पहली परफॉर्मेंस में, डॉ. एल. सुब्रमण्यम और कविता कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम द्वारा पेश किए गए 80 सदस्यों वाले लक्ष्मीनारायण ग्लोबल म्यूजिक फेस्टिवल ग्रुप ने स्टेज पर अस्ताना फिलहारमोनिक सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा, अक्टोबे रीजनल फिलहारमोनिक के चैंबर क्वायर और कजाकिस्तान के डांस ग्रुप श्गक्कूश् के साथ परफॉर्मेंस दी। गक्कू ग्रुप, जो अपनी तेज-तर्रार परफॉर्मेंस और पारंपरिक बैले स्टाइल के लिए जाना जाता है, ने अपने डांस के जरिए कजाकिस्तान का इतिहास, उसके घुड़सवारों की बहादुरी और विशाल खुले नजारों को दिखाया। दूसरी प्रस्तुति में ओश रीजनल फिलहारमोनिक के तहत किर्गिसतान के लोक-कथा दल आलम और नृत्य समूह अदेमी ने अपनी ऊर्जावान और पारंपरिक नृत्य शैलियों से किर्गिज संस्कृति की खूबसूरती को दर्शाया। तीसरी प्रस्तुति में मलेशिया की सूत्र फाउंडेशन के 17 मैंबरी टीम, राधे-राधे द स्वीट सरेंडर पर प्रस्तुति दी। यह प्रस्तुति भारतीय भक्ति परंपराओं से प्रेरित थी, जिसमें भगवान कृष्ण और राधा से जुड़े शाश्वत प्रेम और भक्ति का जश्न मनाया। इसके अलावा, पंजाब के पारंपरिक और लोक नृत्य लूडी से हुई, जिसमे चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स ने प्रस्तुति दी। इसके अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, सूडान, तंजानिया, आइवरी कोस्ट, लाइबेरिया, लेसोथो, म्यांमार, यमन, श्रीलंका, अंगोला, मलावी, कैमरून, सीरिया, जिम्बाब्वे, दक्षिण सूडान, कांगो, थाईलैंड, युगांडा, माली, नामीबिया, केन्या, सोमालिया, घाना और मेडागास्कर के कलाकारों ने भी अपने शानदार परफॉर्मेंस से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

 

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के बारे में

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी एक NAAC A+ ग्रेड और क्यूएस वर्ल्ड (QS World) रैंक धारक यूनिवर्सिटी है। यूजीसी द्वारा मान्य यह स्वायत्त शैक्षणिक संस्थान पंजाब राज्य में चंडीगढ़ के पास स्थित है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी भारत की सबसे यंगेस्ट तथा पंजाब की एकमात्र प्राइवेट यूनिवर्सिटी है, जिसे NAAC (राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद) द्वारा  A+ ग्रेड से सम्मानित किया गया है। यूनिवर्सिटी विभिन्न क्षेत्रों में 109 से अधिक अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम प्रदान करती है, जिनमें इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी, लॉ, आर्किटेक्चर, जर्नालिज्म, एनीमेशन, होटल मैनेजमेंट, और कॉमर्स शामिल हैं। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने सर्वश्रेष्ठ प्लेसमेंट रिकॉर्ड बना कर वर्ल्ड कंसल्टिंग एंड रिसर्च कारपोरेशन (डब्ल्यूसीआरसी) द्वारा पुरस्कारित ”यूनिवर्सिटी विद बेस्ट प्लेसमेंट” अवार्ड को भी अपने नाम किया है।

 

Website: www.cuchd.in

Swati Behal
Specialist – Media Relations +91 8708162229

लघु पत्रिकाओं में भारतीय संस्कृति का पक्ष : प्रो आशुतोष मोहन विश्व पुस्तक मेले में बनास जन का लोकार्पण

दिल्ली। लघु पत्रिका आंदोलन साहित्य की प्रतिबद्धता और जनाकांक्षाओं का प्रतीक है जिसका संकल्प साहित्य और संस्कृति के पक्ष में काम करना है। बनास जन जैसी लघु पत्रिका डेढ़ दशक से भी अधिक समय से लगातार इस संकल्प को पूरा करने में जुटी हुई है। दलित लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो नामदेव ने बनास जन के सद्य प्रकाशित अंक का लोकार्पण करते हुए कहा कि अपने चरित्र में समावेशिता और उदारता से बनास जन ने साहित्य की विभिन्न धाराओं और विमर्शों को भी जगह दी है। उन्होंने कहा कि पुस्तक विरोधी समय में किसी लघु पत्रिका के पचासी अंक पूरे हो जाना एक उपलब्धि ही माना जाएगा। प्रो नामदेव ने लघु पत्रिका आंदोलन में पहल, वसुधा, तद्भव जैसी पत्रिकाओं के साथ बनास जन को भी रेखांकित करने योग्य बताया।

आयोजन के मुख्य अतिथि इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के आचार्य प्रो आशुतोष मोहन ने कहा कि वे बनास जन के पहले अंक से ही लगातार इस यात्रा को देख रहे हैं जिसमें सच्चे मन से सामान्य पाठकों तक साहित्य को पहुँचाने का इरादा है। प्रो मोहन ने कहा कि भूमंडलीकरण के भयानक सांस्कृतिक हमले में भारतीय संस्कृति का पक्ष साहित्य ही रख सकता है और बनास जन जैसी लघु पत्रिकाएँ इस पक्ष को मजबूती से रख रही हैं। सुपरिचित आलोचक और राजकीय महाविद्यालय रानीवाड़ा के प्राचार्य प्रो हिमांशु पंड्या ने बनास जन के विभिन्न विशेषांकों की चर्चा करते हुए कहा कि गंभीर साहित्य को जन सामान्य तक पहुँचाने में प्रेमचंद और परसाई जैसे लेखकों ने अपने ढंग से प्रयास किये थे आज के दौर में जब मीडिया के पास साहित्य के लिए कोई स्थान नहीं बचा है तब लघु पत्रिकाएँ ही इस काम को कर रही हैं। उन्होंने बनास जन के फणीश्वरनाथ रेणु, भीष्म साहनी, त्रिलोचन और अमरकांत विशेषांकों को हिंदी अकादमिकी के लिए भी महत्त्वपूर्ण बताया।

लक्ष्मीबाई कालेज में हिंदी की आचार्य और दलित लेखिका डॉ नीलम ने बनास जन के ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित स्त्री आत्मकथा अंकों को यादगार बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विमर्श मनुष्यधर्मी ही है और इन विमर्शों का मानवीय पक्ष साहित्य से ही प्रकट होता है। उन्होंने इस कार्य में बनास जन के योगदान को प्रशंसनीय बताया।

इससे पहले बनास जन के सम्पादक पल्लव ने बताया कि वर्ष 2008  से शुरू हुई यह यात्रा यदि हिंदी भाषा और साहित्य के पाठकों के लिए उपयोगी हुई है तो उनका प्रयास सार्थक है। अपने कार्य में सहयोग करने वाले लेखकों, पाठकों और सहयोगियों का आभार प्रकट करते हुए पल्लव ने कहा कि हिंदी क्षेत्र बहुत बड़ा है और हमारे प्रयास बेहद मामूली हैं। नयी पीढ़ी को साहित्य का पाठक बनाना आज भी कठिन चुनौती है। युवा शोधार्थी निधि सिंह ने अंक 86 में प्राकशित सामग्री की चर्चा करते हुए बताया कि शताब्दी के अवसर पर कृष्णा सोबती और रंगभूमि पर विशेष सामग्री इस अंक में दी गई है साथ ही भारतीय भक्ति साहित्य पर माधव हाड़ा, विनोद शाही, तृप्ति श्रीवास्तव, उज्ज्वल कुमार और देवीलाल गोदारा के आलेख अंक को उल्लेखनीय बनाते हैं।

आयोजन में प्रकाशक मीरा जौहरी, स्त्रीवादी कार्यकर्ता प्रज्ञा जोशी सहित अनेक लेखक और पाठक उपस्थित थे। अंत में हिन्दी आलोचक राजेंद्र कुमार और वीरेंद्र यादव के आकस्मिक निधन पर दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी गई। लोकार्पण समारोह का संयोजन अभिनन्दन ने किया।

अभिनन्दन

शोधार्थी, हिंदी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली

महाराष्ट्र में भाजपा के विकास एवं विश्वास की निर्णायक जीत

महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का संकेत देने वाला एक बड़ा जनादेश बनकर सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में महायुति गठबंधन की ऐतिहासिक सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह बदलाव केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक सोच, जन अपेक्षाओं और लोकतांत्रिक व्यवहार में गहरे परिवर्तन का द्योतक है। इन चुनावों ने जहां भगवा राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति को नए सिरे से रेखांकित किया है, वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सकारात्मक सोच एवं विकास की राजनीति को आगे बढ़ाया है।
यह सफलता ऐसे समय में मिली है जब विधानसभा चुनावों में विपक्ष को करारी शिकस्त दिए जाने को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था। इसके बावजूद राज्यव्यापी स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा नीत महायुति गठबंधन का दबदबा यह दर्शाता है कि यह जीत क्षणिक नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ राजनीतिक प्रवाह का परिणाम है। इन परिणामों ने राष्ट्र का ध्यान इसलिए अपनी ओर खींचा, क्योंकि इन चुनावों को मिनी विधानसभा चुनावों की संज्ञा दी गई थी। दशकों तक शिवसेना के वर्चस्व का प्रतीक रहे बृहन्मुंबई नगर निगम, यानी बीएमसी में शिवसेना का दशकों पुराना किला ढ़ह गया, बीएमसी एवं राज्यभर के शहरी निकाय चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना एवं उसका दबदबा कायम होना, एक बड़े राजनीतिक बदलाव का सबसे सशक्त प्रमाण है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक सोच और कार्यशैली इस पूरे परिदृश्य में एक निर्णायक कारक के रूप में उभरकर सामने आई है। फडणवीस ने महाराष्ट्र की राजनीति को केवल सत्ता संतुलन की सीमाओं में नहीं बांधा, बल्कि उसे दीर्घकालिक विकास दृष्टि से जोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे व्यापक राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों जैसे बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल गवर्नेंस, पारदर्शिता, निवेश अनुकूल वातावरण और सुशासन को उन्होंने राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जमीन पर उतारने का प्रयास किया है। उनकी राजनीति भावनात्मक उत्तेजना या तात्कालिक लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि योजनाबद्ध विकास, प्रशासनिक दक्षता और भविष्य की तैयारी पर आधारित रही है।
मुंबई से लेकर विदर्भ और मराठवाड़ा तक विकास की समान अवधारणा, शहरी-ग्रामीण संतुलन और रोजगार सृजन पर जोर उनकी सोच को प्रतिबिंबित करता है। इस महाविजय के पीछे फडणवीस की रणनीति के चार प्रमुख स्तंभ रहे हैं- हिंदुत्व और विकास का संतुलन, लोकल मुद्दों पर फोकस, विपक्ष पर प्रभावी जवाब और जनता के साथ जुडाव। यही कारण है कि स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने उन्हें केवल एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टा नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की जो राष्ट्रीय अवधारणा गढ़ी गई, देवेंद्र फडणवीस ने उसे महाराष्ट्र की राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और यही दृष्टि महायुति की सफलता की वैचारिक रीढ़ बनती दिखाई देती है।
बीएमसी का महत्व केवल राजनीतिक प्रतीकात्मकता तक सीमित नहीं है। यह देश का सबसे धनी नगर निगम है, जिसका 2025-26 का बजट 74,427 करोड़ रुपये का है, जो कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। इसीलिये बीएमसी शिवसेना का आर्थिक संबल थी, क्योंकि भ्रष्ट तौर-तरीकों के कारण नगर निकाय का पैसा उसके नेताओं के पास पहुंचता था। बीएमसी के इसी भ्रष्टाचार के कारण मुंबई अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में विकसित नहीं हो पा रही थी। ऐसे में बीएमसी पर नियंत्रण का अर्थ है नीतिगत प्राथमिकताओं, शहरी विकास की दिशा और संसाधनों के उपयोग पर निर्णायक प्रभाव। भाजपा नेतृत्व वाली महायुति की सफलता यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में मुंबई का प्रशासनिक और विकासात्मक स्वरूप नए सिरे से गढ़ा जाएगा। मुंबई को खराब सडकों, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण से त्रस्त शहर की छवि से मुक्त करना भाजपा की पहली प्राथमिकता बननी चाहिए।
इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दो दशक बाद ठाकरे परिवार से जुड़ी पार्टियां एकजुट होकर मैदान में उतरीं, फिर भी वे महायुति की लहर को रोकने में असफल रहीं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की प्रतीकात्मक एकता मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। इसी तरह शरद पवार और अजीत पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गुटों का पूणे में गठबंधन भी बुरी तरह विफल रहा। यह पराजय उन राजनीतिक परिवारों के लिए एक चेतावनी है, जिन्होंने लंबे समय तक राज्य की राजनीति में वर्चस्व बनाए रखा था।
इन परिणामों से यह स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने क्षेत्रीय संकीर्णता और पुराने नारों की बजाय विकास, स्थिरता और विश्वास की राजनीति को प्राथमिकता दी है। ‘मराठी मानुष’ जैसे भावनात्मक मुद्दे इस बार ज्यादा प्रभाव नहीं डाल सके। मतदाताओं ने यह संकेत दिया है कि वे अपनी आकांक्षाओं को केवल पहचान की राजनीति में सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि वे बेहतर बुनियादी ढांचे, पारदर्शी प्रशासन और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि चाहते हैं। इन स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की हाशिये पर मौजूदगी भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर है। महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में उसकी कमजोर होती पकड़ यह सवाल उठाती है कि क्या पार्टी बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझने और उसके अनुरूप रणनीति बनाने में विफल हो रही है। महा विकास अघाड़ी गठबंधन के भविष्य पर भी इन परिणामों ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इसके घटक दल पहले ही प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह पराजय उस संघर्ष को और कठिन बना देती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ठाकरे और पवार जैसे परिवारों को अब अपनी राजनीति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। केवल विरासत और अतीत की उपलब्धियों के सहारे राजनीति नहीं चलाई जा सकती। जनता अब जवाबदेही, परिणाम और स्पष्ट दिशा चाहती है। इसके विपरीत भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह चुनाव जीतने का गणित अच्छी तरह समझ चुकी है। मजबूत बूथ मैनेजमेंट, कैडर आधारित संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक व सांगठनिक संबल उसकी सफलता की आधारशिला बने हैं। यही कारण है कि भाजपा न केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकली, बल्कि कई स्थानों पर अपने सहयोगियों पर भी भारी पड़ी। इन चुनावों का व्यापक अर्थ केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह परिणाम राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक संकेत हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास, विकास और आश्वासन की राजनीति को जनता लगातार समर्थन दे रही है। यह राजनीति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर बदलाव की अनुभूति कराती है। अंधेरों के बीच रोशनी की किरण की तरह यह राजनीति आम नागरिक को यह विश्वास दिलाती है कि उसका भविष्य सुरक्षित हाथों में है। इससे राजनीतिक परिभाषाएं ही नहीं बदलीं, बल्कि इंसान की सोच में भी परिवर्तन आया है। मतदाता अब भावनात्मक उकसावे से अधिक ठोस उपलब्धियों और संभावनाओं को महत्व देने लगा है।
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव इस बदलाव का सशक्त उदाहरण हैं। बड़े-बड़े दावे करने वालों के बोल ध्वस्त हुए हैं और विकास की राजनीति आगे बढ़ी है। जनता देश को एक नई दिशा, एक नए लोकतांत्रिक परिवेश और एक नई राजनीतिक संस्कृति में देखना चाहती है। यह संस्कृति केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि शासन के तौर-तरीकों में बदलाव की मांग करती है। पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणामोन्मुखी प्रशासन अब केवल नारे नहीं, बल्कि जन अपेक्षा बन चुके हैं। बीएमसी जैसे शक्तिशाली संस्थान में भाजपा का वर्चस्व न केवल मुंबई की सत्ता संरचना को बदलेगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा। यह जीत बताती है कि लोकतंत्र में वही राजनीतिक ताकत टिकाऊ होती है, जो समय के साथ खुद को बदलने, जनता की नब्ज पहचानने और विकास को केंद्र में रखने का साहस रखती है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों ने इसी सच्चाई को एक बार फिर उजागर किया है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

चित्रनगरी संवाद मंच में एक सार्थक चर्चा

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई में बड़े ही आत्मीय माहौल में दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की संस्मरण पुस्तक ‘यादों के झरोखे से… : दिल्ली विश्वविद्यालय का स्मृति राग’ पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। रविवार, 18 जनवरी 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव के मृणाल ताई हॉल में आयोजित यह ऐतिहासिक चर्चा जाने-माने कथाकार विभूति नारायण राय और वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश के सानिध्य में संपन्न हुई।
संयोजक व संचालक देवमणि पांडेय ने प्रस्तावना पेश करते हुए कहा कि इस किताब में दिल्ली विश्वविद्यालय के लेखकों के संघर्ष भी हैं और मंज़िल तक पहुंचने की उनकी दास्तान भी। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मशहूर हस्तियों पर ये संस्मरण व्यंग्य की शैली में लिखे गए हैं, इसलिए बेहद पठनीय और रोचक हैं। पांडेय जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी और फ़िराक़ साहब के एक मज़ेदार प्रसंग का ज़िक्र किया तो उस पर ठहाके भी लगे।
व्यंग्यकार सुभाष काबरा ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में प्रेम जनमेजय का परिचय पेश किया, जो लीक से हटकर और दिलचस्प था। कथाकार हरि मृदुल ने प्रेम जी के कथेतर गद्य को विलक्षण गद्य की श्रेणी में रखते हुए कहा कि ये सिर्फ़ आलेख नहीं हैं, इनमें व्यंग्य की छटा छाई हुई है। मृदुल जी ने कई हस्तियों के महत्वपूर्ण प्रसंगों का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह पुस्तक दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित हस्तियों का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
आत्मकथ्य पेश करते हुए प्रेम जनमेजय ने कहा कि परसाई मेरे लिए एक पाठशाला हैं। उन्होंने व्यंग्य विधा के प्रति परसाई के नज़रिए को भी रेखांकित किया। प्रेम जी ने रामदरश मिश्र के साथ आत्मीय मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए उन पर लिखी अपनी नई किताब ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ के बारे में भी अपने अनुभव साझा किए।
दूसरे सत्र के आरंभ में विभूति नारायण राय और सूरज प्रकाश के सान्निध्य में प्रेम जनमेजय की नई पुस्तक ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ का लोकार्पण किया गया। प्रेम जनमेजय को बधाई देते हुए सूरज प्रकाश ने कहा कि एक अच्छे लेखक में नज़र, नज़रिया, स्मृति और अनुभव—ये चार चीज़ें होनी चाहिए और प्रेम जनमेजय में ये चारों मौजूद हैं।
‘शहर में कर्फ्यू’ जैसा चर्चित उपन्यास लिखने वाले कथाकार विभूति नारायण राय का परिचय सूरज प्रकाश ने विस्तार से दिया और साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर उनकी राय पूछी।
विभूति नारायण राय ने चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की तारीफ़ करते हुए कहा कि आज यहां जितने श्रोता मौजूद हैं इतने श्रोता दिल्ली और इलाहाबाद की साहित्यिक गोष्ठियों में नहीं मिलते। साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार रखते हुए राय साहब ने कहा कि कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण साहित्य के पाठक बढ़े हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुस्तक मेले में प्रवेश द्वार पर उन्होंने बहुत लंबी लाइन देखी। ऐसी ही लाइन उन्होंने पटना और कोलकाता के पुस्तक मेले में भी देखी थी। राय साहब के अनुसार कथेतर (Non-fiction) किताबों की मांग ज़्यादा है। दिल्ली पुस्तक मेले में ‘ए आई’ पर हिंदी में अनूदित किताबों की ज़बरदस्त बिक्री हुई।
सुभाष काबरा, हरि मृदुल, सुधाकर पांडेय, मधु चौधरी, नीता वाजपेयी, प्रज्ञा मिश्र, विराट गुप्ता आदि कई रचनाकारों ने विभूति नारायण राय से सवाल पूछे। सवालों का जवाब देते हुए राय साहब ने कहा कि 50 साल पहले भी लोग कहते थे कि साहित्य के पाठक नहीं हैं और आज भी कहते हैं। किताबों के पाठक हर जगह हैं। हर कोई मोबाइल में कुछ न कुछ पढ़ रहा है। जगह-जगह फेस्टिवल हो रहे हैं। फेस्टिवल में गंभीर चर्चाएं भी होती हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह लेखकों के लिए मुश्किल समय है। टिके रहना मुश्किल काम है। जोख़िम उठाना और सत्ता से टकराना भी ज़रूरी है, तभी हमारा लेखन सफल हो पाएगा।
कार्यक्रम की शुरुआत में अभिनेत्री मनीषा कंठालिया का कहानी पाठ हुआ। मनीषा एक बहुआयामी रचनाकार हैं। वे स्टोरीटेलर, थिएटर कलाकार, कवयित्री, लेखक और आरजे हैं। यही कारण है कि ‘डर के आगे’ कहानी उन्होंने बिना काग़ज़ देखे सुनाई। उनकी कहानी श्रोताओं को पसंद आई। उन्होंने अपनी दो ग़ज़लों का भी पाठ किया। कथाकार गंगाराम राजी और प्रो राम बक्ष इस अवसर पर विशेष रूप से मौजूद थे। कुल मिलाकर यह एक ऐसा आयोजन था जिसमें श्रोताओं को अपने कई सवालों के जवाब मिले और उनका अंतस समृद्ध हुआ।

शाकद्वीप ब्राह्मणों ने सूर्योपासना ज्योतिष और चिकित्सा परम्परा को विकसित किया

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों (जिन्हें मग ब्राह्मण या भोजक भी कहते हैं) ने भारत में सूर्योपासना, ज्योतिष और आयुर्वेद चिकित्सा परंपराओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उन्हें सूर्य के अंश से उत्पन्न दिव्य ब्राह्मण माना जाता है और वे सूर्य मंदिरों के पुरोहित, ज्योतिषी व वैद्य के रूप में जाने जाते हैं, जिनका उल्लेख वेद-पुराणों में भी है, खासकर भविष्य पुराण में।

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का मुख्य देव भगवान सूर्य रहे हैं। इनकी उपासना पद्धति में आदित्य हृदय स्तोत्र, सूर्य सहस्रनाम और अश्विनीकुमारों का विशेष महत्व रहा है। अश्विनीकुमार वैदिक काल के दिव्य चिकित्सक थे, और शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने उन्हीं की परंपरा को आयुर्वेद और रसायन शास्त्र में जीवित कर रखा है।

बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सूर्य मंदिरों की पुरोहिताई परंपरागत रूप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के पास रही है – उदाहरणार्थ देव-औरंगाबाद (बिहार) , कोणार्क, मोढेरा, उनाओ- दतिया (मध्यप्रदेश) के सूर्य मंदिर इत्यादि।

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने निम्न लिखित क्षेत्रों में अपना बहुमूल्य योगदान प्रस्तुत किया है-

1.ज्योतिष और गणित में योगदान:-

भविष्य पुराण और ब्रह्मांड पुराण में वर्णित है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण बृहस्पति के वंशज माने जाते हैं, जिन्होंने ज्योतिष के सिद्धांतों को समाज में प्रचारित किया। सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय और पंचांग गणना में इनके योगदान के प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं। भारत के अनेक पंचांगों की गणना पद्धति आज भी शाकद्वीपीय परंपरा से प्रभावित है। भविष्य पुराण में बृहस्पति का वचन आज भी गूँजता रहता है –

“यत्र सूर्यस्तिष्ठति, तत्र ब्राह्मणाः प्रकाशयन्ति लोकम्।”

(जहाँ सूर्य स्थित है, वहाँ ब्राह्मण लोक को प्रकाशित करते हैं।) भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35, श्लोक 20-23) के अनुसार –

शाकद्वीपो नाम द्वीपो यत्र दिवाकरः स्वयं।

देवपूजनमासीनः सर्वं लोकं प्रकाशयेत्॥

तत्र ब्राह्मण जातीनां बृहस्पतेः सुतेन हि।

प्रतिष्ठापितावंशाःस्युःयथाज्योतिषविशारदाः

इसका शाब्दिक अर्थ होता है – शाकद्वीप नामक द्वीप है, जहाँ सूर्यदेव स्वयं देवपूजन में संलग्न होकर सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं। वहाँ ब्राह्मण जातियाँ बृहस्पति के पुत्र द्वारा स्थापित की गईं हैं , जो ज्योतिष में पूर्ण निपुण हैं। यह स्पष्ट प्रमाण है कि शाकद्वीप शक आक्रमण कारियों का प्रदेश नहीं रहा, बल्कि यह सूर्योपासक, ब्राह्मण संस्कृति का केंद्र रहा है, जिसकी स्थापना गुरु बृहस्पति के वंशजों ने की थी।

2. सूर्योपासना का केंद्र की बहुलता:-

ये सूर्य के उपासक हैं, जिन्होंने सूर्यदेव की पूजा पद्धति (जैसे आदित्यहृदय स्तोत्र, गायत्री मंत्र) को लोकप्रिय बनाया और सूर्य मंदिरों की स्थापना की। वायु पुराण (अध्याय 45, श्लोक 12-14)

में आया है –

शाकद्वीपे नृपश्रेष्ठ सूर्यपूजाः प्रकल्पिताः।

अत्राश्विनौ च देवौ च चिकित्सा-विदुषां गुरू॥

भावार्थ यह है – शाकद्वीप में सूर्य की विशेष पूजा की जाती थी और अश्विनी कुमार (वैदिक चिकित्सक देवता) यहाँ के ब्राह्मणों के गुरु माने गए हैं। अर्थात आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र का यहाँ विशेष रूप से विकास हुआ है।

3. महाभारत का भूगोल वर्णन:-

महाभारत, भीष्म पर्व (अध्याय 6, श्लोक 29-33) में शाकद्वीप का वर्णन है कि यह समुद्र से घिरा हुआ एक पवित्र द्वीप है, जहाँ के लोग सूर्योपासक, सत्यवादी और चिकित्सा-कला में प्रवीण हैं।

4. गुरु बृहस्पति और शाकद्वीपीय ब्राह्मण:-

भविष्य पुराण के अनुसार, सूर्यदेव ने अपनी पूजा के लिए बृहस्पति से योग्य ब्राह्मणों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया था। तब बृहस्पति ने अपने पुत्रों और शिष्यों को शाकद्वीप भेजा। यही वंश आगे चलकर शाकद्वीपीय ब्राह्मण कहलाया। इनकी मुख्य विशेषताएँ निम्न लिखित थीं-

1·ज्योतिष में निपुणता (कालगणना, ग्रह-नक्षत्र का ज्ञान)।

2· आयुर्वेद और रसायन विद्या में दक्षता।

3·सूर्योपासना और यज्ञ-विधि में विशेषज्ञता।

5.भौगोलिक प्रमाण और आज का प्रसार :-

पुराणों में वर्णित शाकद्वीप की स्थिति मेघालय और अरब सागर के पार या ईरान-अफगानिस्तान के निकट मानी गई है, लेकिन यह भौगोलिक वर्णन प्रतीक के तौर पर भी हो सकता है। आज के समय में शाकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में पाए जाते हैं, और सूर्य मंदिरों में इनकी परंपरागत पुरोहिताई अब भी जीवित है।

 

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का निम्न लिखित क्षेत्रों में आधिकारिक योगदान रहा है –

1. आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र में योगदान :-

इन्हें आयुर्वेदिक वैद्य माना जाता है, जो समाज में बिना शुल्क के चिकित्सा सेवा प्रदान करते थे और तंत्र-मंत्र के जानकार होते थे। शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की सबसे बड़ी विशेषता रही है – वैद्यक विद्या में पारंगत होना। यह  परंपरा सीधे अश्विनी कुमारों से जुड़ी है जिन्हें वैदिक काल के देव वैद्य कहा जाता है। ऋग्वेद (मंडल 1, सूक्त 116, मंत्र 15) के अनुसार –

अश्विना यद्वामवथः पिप्यनं जनं,

भूयिष्ठं वाजिनावथः पुरंध्यम्॥

भावार्थ:अश्विनीकुमारों ने अपनी चिकित्सा विद्या से अनेक जनों को पुनः स्वस्थ किया और उन्हें दीर्घायु प्रदान की।

भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35) में स्पष्ट है कि अश्विनीकुमारों ने शाक द्वीपीय ब्राह्मणों को चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा दी। यही कारण है कि ऐतिहासिक काल में अनेक सूर्य मंदिरों के पुरोहित वैद्यक कार्य में भी निपुण थे।

2.ज्योतिष – कालगणना में निपुणता:-

प्राचीन काल से ही ये खगोल विज्ञान और ज्योतिष के ज्ञाता रहे हैं, और कई पंचांगों की गणना पद्धति आज भी इनकी परंपरा से प्रभावित है। आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषियों का संबंध इनसे जोड़ा जाता है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्य सिद्धांत, पंचांग गणना और मुहूर्त निर्धारण में विशेष रूप से प्रसिद्ध रहे। सूर्योपासना के कारण इनकी खगोलीय गणना अत्यंत सटीक मानी जाती थी। भविष्य पुराण (प्रथम खंड, 35/22) के अनुसार –

ज्योतिषं च विशेषेण ज्ञातव्यमिति मे मतिः।

तस्मादेषां वंशजाः सदा ज्योतिष विशारदाः

भावार्थ: सूर्यदेव का मत है कि इन ब्राह्मणों को विशेष रूप से ज्योतिष का ज्ञान होना चाहिए, इसलिए इनके वंशज सदैव ज्योतिष में पारंगत रहे। देव-औरंगाबाद(बिहार) सूर्य मंदिर के महंत पंडित आदित्यनारायण शाकद्वीपी द्वारा पंचांग निर्माण हुआ है । मोढेरा (गुजरात) सूर्य मंदिर में शाकद्वीपीय पुरोहितों की खगोलीय गणना, जिससे संक्रांति और विषुव के समय मंदिर में सूर्य की किरणें मूर्ति पर पड़ती थीं।

3. सूर्योपासना और धार्मिक नेतृत्व:-

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जीवन सूर्य आराधना के इर्द-गिर्द रहा है। इनकी पूजा-पद्धति में अर्घ्यदान, आदित्य हृदय स्तोत्र, सप्ताश्वरथ पूजा विशेष स्थान रखते हैं। स्कंद पुराण (वैष्णव खंड, अध्याय 19, श्लोक 8-9) के अनुसार –

सूर्यः सर्वेषु लोकेषु दाता पुष्टिप्रदः प्रभुः।

तस्मात्सूर्यं समर्च्यन्ति ब्राह्मणाः शाकद्वीपजाः।।

भावार्थ: सूर्य समस्त लोकों में पुष्टिकारक और प्रभु हैं, अतः शाकद्वीपीय ब्राह्मण उन्हें विशेष रूप से पूजते हैं।

  सूर्योपासना के प्रमुख केंद्र अधोलिखित हैं। वैसे तो पूरे भारत में सूर्य मंदिर बिखरे हुए हैं परंतु कुछ खास अधोलिखित हैं –

1· देव सूर्य मंदिर (बिहार)।

3· कोणार्क सूर्य मंदिर (ओडिशा)।

3· मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात)।

4· उज्जैन का ऊंकारेश्वर क्षेत्र।

   इन सभी में प्राचीन काल से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की पुरोहिताई के प्रमाण हैं।

4. शिक्षा और वेदाध्ययन में योगदान:-

शाकद्वीपीय ब्राह्मण न केवल ज्योतिषी और वैद्य थे, बल्कि वेदवेत्ता भी थे।गुरुकुल प्रणाली में इन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, और आयुर्वेद संहिताओं का प्रचार-प्रसार किया। भविष्य पुराण ( प्रथम खंड, 35/30) के अनुसार –

वेदविद्या परं ज्नानं यैरालम्ब्य स्वकर्मसु।

ते ब्राह्मणाःसदा लोके पूज्यन्ते देववत्सदा।

भावार्थ: जो ब्राह्मण वेदविद्या के परम ज्ञान को धारण कर अपने कर्म करते हैं, वे सदैव लोक में देववत पूजनीय होते हैं।

5. सामाजिक एकता और नेतृत्व,:-

इतिहास बताता है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ा है।

1·विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश, संतानोत्पत्ति आदि में शुभ मुहूर्त निर्धारण किया जाना।

2·कृषि और वर्षा के पूर्वानुमान हेतु पंचांग और ग्रह-नक्षत्र विश्लेषण किया जाना।

3· रोग-निवारण के लिए औषधि और यज्ञ का संयोजन हो।

4· चिकित्सा, ज्योतिष, सूर्योपासना और शिक्षा में अनुपम योगदान हुआ है।

5· पुराणों के प्रमाण से सिद्ध कि इनकी विशेषज्ञता ईश्वरीय आदेश का परिणाम थी।

6· सामाजिक एकता और लोककल्याण में इनकी भूमिका सर्वमान्य रही।

 

शाकदीपी पर हमले, चुनौतियाँ और भविष्य की दिशाएं:-

 

1.हमलों का कारण ऐतिहासिक विश्लेषण

(क) श्रेष्ठता से उपजी ईर्ष्या –

भविष्य पुराण और वायु पुराण दोनों स्पष्ट करते हैं कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण ज्योतिष, आयुर्वेद और सूर्योपासना में अतुलनीय थे।

जब कोई समाज-वर्ग किसी क्षेत्र में निरंतर श्रेष्ठता बनाए रखता है, तो अन्य प्रतिस्पर्धी वर्गों में हीनता-बोध और ईर्ष्या उत्पन्न होती है। वैदिक काल में हमारी पंचांग गणना और चिकित्सा विद्या को अन्य ब्राह्मण वर्ग भी मानते थे।परंतु कालांतर में, जब इन क्षेत्रों में आर्थिक लाभ और प्रतिष्ठा बढ़ी, तो कुछ ने हमें प्रतिस्पर्धी समझा।

(ख)धार्मिक केंद्रों पर नियंत्रण कीकोशिश-  सूर्य मंदिरों की पुरोहिताई परंपरागत रूप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के पास थी, कई बार दूसरे वर्गों ने इन स्थानों पर अधिकार करने के लिए हमारी प्रतिष्ठा को गिराने के प्रयास किए हैं। उदाहरण स्वरूप मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात) में 18वीं शताब्दी में पुरोहिताई को लेकर विवाद हुआ था।

(ग) राजनीतिक परिस्थितियाँ-

मुगल और औपनिवेशिक काल में हमारी परंपराएँ बाधित हुईं। सूर्य मंदिरों पर कर और प्रतिबंध। आयुर्वेद और ज्योतिष को “अंधविश्वास” कहकर अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली में हाशिये पर डालना।

2. वर्तमान चुनौतियाँ :-

1. पहचान का संकट – युवाओं में अपने गौरवशाली इतिहास की जानकारी का अभाव है।

2. संगठनहीनता – विभिन्न राज्यों में बिखरे होने से एकजुट आवाज़ का अभाव है।

3. आधुनिक प्रतिस्पर्धा – आयुर्वेद और ज्योतिष के क्षेत्र में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, जिससे परंपरागत ब्राह्मण वर्ग पिछड़ रहा है।

4. भ्रामक प्रचार – सोशल मीडिया पर “शाकद्वीपी = शक” जैसी गलत धारणाओं का प्रसार हो रहा है।

3. पुनरुत्थान की रणनीति:-

(क) इतिहास का प्रलेखन और प्रकाशन-

भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, वायु पुराण, महाभारत आदि के संदर्भों को पुस्तक और डिजिटल रूप में प्रकाशित करना।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में शोधपरक व्याख्यान आयोजित करना।

(ख) सांस्कृतिक पुनर्जागरण-

सूर्योपासना पर्व (जैसे छठ महापर्व) में शाकद्वीपीय परंपरा की विशेष प्रस्तुति।

आयुर्वेदिक चिकित्सा शिविर और ज्योतिष परामर्श केंद्र स्थापित करना।

(ग) संगठन और नेटवर्किंग-

अखिल भारतीय शाकद्वीपीय ब्राह्मण महासंघ जैसे मंच को मजबूत करना।

युवाओं को इतिहास, संस्कृति और आधुनिक शिक्षा-दोनों में प्रशिक्षित करना।

(घ) भ्रम-निवारण अभियान चलाना।

सोशल मीडिया और लेखों के माध्यम से “शाकद्वीपी ≠ शक” का तथ्य-आधारित प्रचार किया जाय ।डॉक्यूमेंट्री और यूट्यूब चैनल के जरिए हमारी विरासत को जन-जन तक पहुँचाया जाए।

4. भविष्य की दिशा :-

भविष्य पुराण का यह शाश्वत संदेश है –

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।

प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥

भावार्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, ऐसा सत्य न बोलो जो अप्रिय हो, और प्रिय बात झूठ न हो- यही सनातन धर्म है। हमारा भविष्य इस सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। सत्य का प्रचार (शाकद्वीपीय इतिहास के वास्तविक तथ्य) हो। प्रियता का संवर्धन हो। अन्य वर्गों से संवाद और सहयोग पर आधारित हो। संस्कृति का संरक्षण (आयुर्वेद, ज्योतिष, सूर्योपासना का पुनर्जागरण) किया जाए।

उपसंहार :-

शाकद्वीपीय ब्राह्मण भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और वैज्ञानिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिन्होंने सूर्य, ज्योतिष और आयुर्वेद के क्षेत्र में गहरा योगदान दिया है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण केवल एक जाति नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा का जीवित प्रतीक हैं। हम पर हमले इसीलिए हुए क्योंकि हमने ज्ञान, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलकर समाज में एक ऊँचा स्थान बनाया है । आज आवश्यकता है कि हम फिर से संगठित हों, अपनी जड़ों को पहचानें और आधुनिक साधनों के माध्यम से अपने गौरव को पुनः स्थापित करें। जैसे सूर्य को कोई बादल सदा ढक नहीं सकता, वैसे ही सत्य और संस्कृति की ज्योति को कोई समाप्त नहीं कर सकता। यह काल और समय के हर थपेड़ों को सहते सहते अपनी अस्मिता बनाए रखने में सक्षम रहेगा।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

हिंदी का भविष्य रोमन से नहीं देवनागरी से है

आज रोमन लिपि में हिन्दी की वकालत करने वाले यह नहीं जानते कि वे संविधान विरोधी बात कर रहे हैं। संविधान में जिसे राजभाषा कहा गया वह हिन्दी नहीं है, ‘देवनागरी लिपि में हिन्दी’ है। संविधान निर्माताओं की इस गहरी समझ के कारण मैं उनका संविधान की कई प्रत्यक्ष कमियों के बावजूद गहरा आदर करता हूँ।
देवनागरी लिपि और हिन्दी मानव इतिहास में भाषाई सिम्बायोसिस के सबसे गहरे उदाहरण हैं।
थियरी के हिसाब से भाषा और लिपि स्वतंत्र होते हैं एक दूसरे से। कि भाषा किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है, लेकिन हिन्दी और देवनागरी दोनों का रिश्ता इतना अंतर्भूत है, ऐसे बुनियादी तरह से इन दोनों ने एक दूसरे के विकास, संरचना और सांस्कृतिक सार्थकता को प्रभावित किया है, कि इस थियरी को भी चुनौती मिल सकती है।
एक लिपि के रूप में नागरी का इतिहास हिन्दी से अधिक पुराना है। देवनागरी यदि किसी देव-नगर की है -अलकापुरी की है तो हिन्दी हिन्द की है।
मध्यकाल में पनपकर भी हिन्दी ने फारसी – अरबी जैसे विकल्पों को नहीं अपनाया तो इसलिए कि हिन्दी की बहुत-सी ध्वनियाँ उन लिपियों में थीं ही नहीं। देवनागरी का phonetic precision ही हिन्दी के मन भाया।
देवनागरी एक लिपि के रूप में भारत की देशजता और जड़ों को जैसे हृदयंगम करती थी वैसी क्षमता किसी विदेशी लिपि में नहीं थी।
उर्दू और हिन्दी दोनों पारस्परिक समझ की भाषिक अंतरंगता रखती थीं लेकिन हिन्दी को दरबार की जगह देवता से जुड़ना बेहतर लगा, इसलिए हिन्दी जन्म से ही जनता की भाषा बन गई। उर्दू ने फारसी अरबी लिपि को अपनाकर अपने युग की सत्ता की प्राथमिकताओं के सामने समर्पण किया जबकि हिन्दी ने देवनागरी लिपि को अपनाकर जन्म से ही एक विद्रोही चेतना का प्रतिनिधान किया।
अन्यथा सत्ता की लिपि के चुनाव में हमेशा एक बड़ी भूमिका होती है। जैसे पाकिस्तान में सिंधी का देवनागरी से रिश्ता टूट गया है। वहाँ सिंधी अरबी लिपि में लिखी जा रही है।
कई देशों ने राजनीतिक बदलावों के बीच भाषाओं को लिपि-निष्ठा का त्याग करते देखा है। तुर्की 1928 में अरबी लिपि से लैटिन में लिखी जाने लगी- अतातुर्क कमाल पाशा के दबाव में। जब सोवियत संघ के टुकडे हए तो मध्य एशिया के गणतंत्रों ने सिरिलिक विधि छोड़ दी और अपनी भाषाएँ लैटिन में लिखने लगे। जब वियतनाम में फ्रेंच शासन आया तो चीनी कैरेक्टर्स की जगह लैटिन आधारित स्क्रिप्ट ने ले ली।
हिन्दी ने न मध्यकालीन दरबार की लिपि ली और न औपनिवेशिक युग में रोमन लिपि के लिए कोई झुकाव दर्शाया। हिन्दी देवनागरी के अमृतगर्भ से जुड़ी रही।
यानी यह जुगलबंदी व्यावहारिक से कहीं ज्यादा आदर्शवादी और वैचारिक जुगलबंदी थी।
हिन्दी ने प्राचीन भारतीय सभ्यता से अपनी सांस्कृतिक निरन्तरता लिपि के रूप में देवनागरी को चुनकर सुनिश्चित की। देवनागरी को अपनी लिपि बनाकर हिन्दी ने एक विद्वत परंपरा और आध्यात्मिक वैधता सीधे प्राप्त कर ली।
विदेशी प्रभावों का, सत्ता के दबावों का निरसन कर उसने वह लिपि चुनी जिनके माध्यम से वह भारत के दूसरे भाषिक समुदायों के साथ जुड़कर एक कॉमन भारतीय अस्मिता का सह-निर्माण कर सकती थी।
यों लिपि भाषा से अपृथक्करणीय हो गई; सिर्फ एक लेखन प्रणाली की तरह नहीं बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक निष्ठा की निशानदेही की तरह।
तो सिर्फ यही नहीं कि फारसी-अरबी में retroflex sounds ट ठ ड ढ के लिए कोई dedicated letter नहीं था, या रोमन अंग्रेजी जैसी स्थिति नहीं थी कि जहां स्पेलिंग और उच्चारण बहुत ज्यादा ही फरक हो जाते हैं मसलन Though, through, tough, thought में ough एक ही स्पेलिंग के बावजूद अलग अलग उच्चारणों की तरह पायेंगे और ‘त’ के लिए वहाँ कोई अक्षर नहीं जबकि देवनागरी-हिन्दी में ध्वन्यात्मक संगति भरपूर है।
इसने भारतीय बच्चे की ध्वन्यात्मक चेतना के विकास में बहुत योग भी दिया। मनोभाषिकी psycholinguistics के शोध आज यही बताते हैं कि देवनागरी में हिन्दी पढ़ने वाले बच्चे phonemic awareness के बारे में अन्य लिपियों के बच्चों से बहुत आगे हैं और किसी भी लिखित शब्द को ज्यादा शुद्धता से उचार लेते हैं।
दुनिया भर में खा घा झा जैसे aspirated व्यंजन बहुत दुर्लभ हैं, हिन्दी में देवनागरी के कारण सहज हैं।
हिन्दी ने देवनागरी के बहुत से संस्कृत conjunts को सरलीकृत भी कर दिया। देवनागरी की शिरोरेखा को शिरोधार्य कर हिन्दी ने word boundaries को सहज रूप से मुखरित किया।
संस्कृत की ध्वनिसूचिका में नुक्ता नहीं होता था, फारसी- अरबी में उसका चलन था। हिन्दी देवनागरी ने उसे सहज ही अपना लिया।
हिन्दी ने देवनागरी को कम्युनिकेटिव वाइटेलिटी दी है, कंटेंपरेरी रेलीवेंस दी है और करोड़ों लोगों के दैनंदिन जीवन से जोड़ा है, देवनागरी ने हिन्दी को ध्वन्यात्मक स्पष्टता दी है, विजुअल ईस्थेटिक्स दी है और एक महान परंपरा का ऐतिहासिक नैरंतर्य दिया है।
अब जब व्हाट्सएप इंस्टाग्राम के 13 से 24 वर्ष के 68% हिन्दी यूज़र्स रोमन अल्फ़ाबेट्स का प्रयोग कर रहे हैं तब वे सिर्फ संविधान निर्माताओं की भावनाओं का ही उपहास नहीं कर रहे, हिन्दी-देवनागरी के इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक गठबन्धन का भी उपहास कर रहे हैं।

(लेखक सेवानिवृत्त आएएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

साभार- https://www.facebook.com/share/1bRbaecV3w/ से