Home Blog Page 25

चित्रनगरी संवाद मंच में एक सार्थक चर्चा

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई में बड़े ही आत्मीय माहौल में दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की संस्मरण पुस्तक ‘यादों के झरोखे से… : दिल्ली विश्वविद्यालय का स्मृति राग’ पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। रविवार, 18 जनवरी 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव के मृणाल ताई हॉल में आयोजित यह ऐतिहासिक चर्चा जाने-माने कथाकार विभूति नारायण राय और वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश के सानिध्य में संपन्न हुई।
संयोजक व संचालक देवमणि पांडेय ने प्रस्तावना पेश करते हुए कहा कि इस किताब में दिल्ली विश्वविद्यालय के लेखकों के संघर्ष भी हैं और मंज़िल तक पहुंचने की उनकी दास्तान भी। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मशहूर हस्तियों पर ये संस्मरण व्यंग्य की शैली में लिखे गए हैं, इसलिए बेहद पठनीय और रोचक हैं। पांडेय जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी और फ़िराक़ साहब के एक मज़ेदार प्रसंग का ज़िक्र किया तो उस पर ठहाके भी लगे।
व्यंग्यकार सुभाष काबरा ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में प्रेम जनमेजय का परिचय पेश किया, जो लीक से हटकर और दिलचस्प था। कथाकार हरि मृदुल ने प्रेम जी के कथेतर गद्य को विलक्षण गद्य की श्रेणी में रखते हुए कहा कि ये सिर्फ़ आलेख नहीं हैं, इनमें व्यंग्य की छटा छाई हुई है। मृदुल जी ने कई हस्तियों के महत्वपूर्ण प्रसंगों का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह पुस्तक दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित हस्तियों का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
आत्मकथ्य पेश करते हुए प्रेम जनमेजय ने कहा कि परसाई मेरे लिए एक पाठशाला हैं। उन्होंने व्यंग्य विधा के प्रति परसाई के नज़रिए को भी रेखांकित किया। प्रेम जी ने रामदरश मिश्र के साथ आत्मीय मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए उन पर लिखी अपनी नई किताब ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ के बारे में भी अपने अनुभव साझा किए।
दूसरे सत्र के आरंभ में विभूति नारायण राय और सूरज प्रकाश के सान्निध्य में प्रेम जनमेजय की नई पुस्तक ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ का लोकार्पण किया गया। प्रेम जनमेजय को बधाई देते हुए सूरज प्रकाश ने कहा कि एक अच्छे लेखक में नज़र, नज़रिया, स्मृति और अनुभव—ये चार चीज़ें होनी चाहिए और प्रेम जनमेजय में ये चारों मौजूद हैं।
‘शहर में कर्फ्यू’ जैसा चर्चित उपन्यास लिखने वाले कथाकार विभूति नारायण राय का परिचय सूरज प्रकाश ने विस्तार से दिया और साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर उनकी राय पूछी।
विभूति नारायण राय ने चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की तारीफ़ करते हुए कहा कि आज यहां जितने श्रोता मौजूद हैं इतने श्रोता दिल्ली और इलाहाबाद की साहित्यिक गोष्ठियों में नहीं मिलते। साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार रखते हुए राय साहब ने कहा कि कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण साहित्य के पाठक बढ़े हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुस्तक मेले में प्रवेश द्वार पर उन्होंने बहुत लंबी लाइन देखी। ऐसी ही लाइन उन्होंने पटना और कोलकाता के पुस्तक मेले में भी देखी थी। राय साहब के अनुसार कथेतर (Non-fiction) किताबों की मांग ज़्यादा है। दिल्ली पुस्तक मेले में ‘ए आई’ पर हिंदी में अनूदित किताबों की ज़बरदस्त बिक्री हुई।
सुभाष काबरा, हरि मृदुल, सुधाकर पांडेय, मधु चौधरी, नीता वाजपेयी, प्रज्ञा मिश्र, विराट गुप्ता आदि कई रचनाकारों ने विभूति नारायण राय से सवाल पूछे। सवालों का जवाब देते हुए राय साहब ने कहा कि 50 साल पहले भी लोग कहते थे कि साहित्य के पाठक नहीं हैं और आज भी कहते हैं। किताबों के पाठक हर जगह हैं। हर कोई मोबाइल में कुछ न कुछ पढ़ रहा है। जगह-जगह फेस्टिवल हो रहे हैं। फेस्टिवल में गंभीर चर्चाएं भी होती हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह लेखकों के लिए मुश्किल समय है। टिके रहना मुश्किल काम है। जोख़िम उठाना और सत्ता से टकराना भी ज़रूरी है, तभी हमारा लेखन सफल हो पाएगा।
कार्यक्रम की शुरुआत में अभिनेत्री मनीषा कंठालिया का कहानी पाठ हुआ। मनीषा एक बहुआयामी रचनाकार हैं। वे स्टोरीटेलर, थिएटर कलाकार, कवयित्री, लेखक और आरजे हैं। यही कारण है कि ‘डर के आगे’ कहानी उन्होंने बिना काग़ज़ देखे सुनाई। उनकी कहानी श्रोताओं को पसंद आई। उन्होंने अपनी दो ग़ज़लों का भी पाठ किया। कथाकार गंगाराम राजी और प्रो राम बक्ष इस अवसर पर विशेष रूप से मौजूद थे। कुल मिलाकर यह एक ऐसा आयोजन था जिसमें श्रोताओं को अपने कई सवालों के जवाब मिले और उनका अंतस समृद्ध हुआ।

शाकद्वीप ब्राह्मणों ने सूर्योपासना ज्योतिष और चिकित्सा परम्परा को विकसित किया

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों (जिन्हें मग ब्राह्मण या भोजक भी कहते हैं) ने भारत में सूर्योपासना, ज्योतिष और आयुर्वेद चिकित्सा परंपराओं को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उन्हें सूर्य के अंश से उत्पन्न दिव्य ब्राह्मण माना जाता है और वे सूर्य मंदिरों के पुरोहित, ज्योतिषी व वैद्य के रूप में जाने जाते हैं, जिनका उल्लेख वेद-पुराणों में भी है, खासकर भविष्य पुराण में।

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का मुख्य देव भगवान सूर्य रहे हैं। इनकी उपासना पद्धति में आदित्य हृदय स्तोत्र, सूर्य सहस्रनाम और अश्विनीकुमारों का विशेष महत्व रहा है। अश्विनीकुमार वैदिक काल के दिव्य चिकित्सक थे, और शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने उन्हीं की परंपरा को आयुर्वेद और रसायन शास्त्र में जीवित कर रखा है।

बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के सूर्य मंदिरों की पुरोहिताई परंपरागत रूप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के पास रही है – उदाहरणार्थ देव-औरंगाबाद (बिहार) , कोणार्क, मोढेरा, उनाओ- दतिया (मध्यप्रदेश) के सूर्य मंदिर इत्यादि।

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने निम्न लिखित क्षेत्रों में अपना बहुमूल्य योगदान प्रस्तुत किया है-

1.ज्योतिष और गणित में योगदान:-

भविष्य पुराण और ब्रह्मांड पुराण में वर्णित है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण बृहस्पति के वंशज माने जाते हैं, जिन्होंने ज्योतिष के सिद्धांतों को समाज में प्रचारित किया। सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय और पंचांग गणना में इनके योगदान के प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं। भारत के अनेक पंचांगों की गणना पद्धति आज भी शाकद्वीपीय परंपरा से प्रभावित है। भविष्य पुराण में बृहस्पति का वचन आज भी गूँजता रहता है –

“यत्र सूर्यस्तिष्ठति, तत्र ब्राह्मणाः प्रकाशयन्ति लोकम्।”

(जहाँ सूर्य स्थित है, वहाँ ब्राह्मण लोक को प्रकाशित करते हैं।) भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35, श्लोक 20-23) के अनुसार –

शाकद्वीपो नाम द्वीपो यत्र दिवाकरः स्वयं।

देवपूजनमासीनः सर्वं लोकं प्रकाशयेत्॥

तत्र ब्राह्मण जातीनां बृहस्पतेः सुतेन हि।

प्रतिष्ठापितावंशाःस्युःयथाज्योतिषविशारदाः

इसका शाब्दिक अर्थ होता है – शाकद्वीप नामक द्वीप है, जहाँ सूर्यदेव स्वयं देवपूजन में संलग्न होकर सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं। वहाँ ब्राह्मण जातियाँ बृहस्पति के पुत्र द्वारा स्थापित की गईं हैं , जो ज्योतिष में पूर्ण निपुण हैं। यह स्पष्ट प्रमाण है कि शाकद्वीप शक आक्रमण कारियों का प्रदेश नहीं रहा, बल्कि यह सूर्योपासक, ब्राह्मण संस्कृति का केंद्र रहा है, जिसकी स्थापना गुरु बृहस्पति के वंशजों ने की थी।

2. सूर्योपासना का केंद्र की बहुलता:-

ये सूर्य के उपासक हैं, जिन्होंने सूर्यदेव की पूजा पद्धति (जैसे आदित्यहृदय स्तोत्र, गायत्री मंत्र) को लोकप्रिय बनाया और सूर्य मंदिरों की स्थापना की। वायु पुराण (अध्याय 45, श्लोक 12-14)

में आया है –

शाकद्वीपे नृपश्रेष्ठ सूर्यपूजाः प्रकल्पिताः।

अत्राश्विनौ च देवौ च चिकित्सा-विदुषां गुरू॥

भावार्थ यह है – शाकद्वीप में सूर्य की विशेष पूजा की जाती थी और अश्विनी कुमार (वैदिक चिकित्सक देवता) यहाँ के ब्राह्मणों के गुरु माने गए हैं। अर्थात आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र का यहाँ विशेष रूप से विकास हुआ है।

3. महाभारत का भूगोल वर्णन:-

महाभारत, भीष्म पर्व (अध्याय 6, श्लोक 29-33) में शाकद्वीप का वर्णन है कि यह समुद्र से घिरा हुआ एक पवित्र द्वीप है, जहाँ के लोग सूर्योपासक, सत्यवादी और चिकित्सा-कला में प्रवीण हैं।

4. गुरु बृहस्पति और शाकद्वीपीय ब्राह्मण:-

भविष्य पुराण के अनुसार, सूर्यदेव ने अपनी पूजा के लिए बृहस्पति से योग्य ब्राह्मणों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया था। तब बृहस्पति ने अपने पुत्रों और शिष्यों को शाकद्वीप भेजा। यही वंश आगे चलकर शाकद्वीपीय ब्राह्मण कहलाया। इनकी मुख्य विशेषताएँ निम्न लिखित थीं-

1·ज्योतिष में निपुणता (कालगणना, ग्रह-नक्षत्र का ज्ञान)।

2· आयुर्वेद और रसायन विद्या में दक्षता।

3·सूर्योपासना और यज्ञ-विधि में विशेषज्ञता।

5.भौगोलिक प्रमाण और आज का प्रसार :-

पुराणों में वर्णित शाकद्वीप की स्थिति मेघालय और अरब सागर के पार या ईरान-अफगानिस्तान के निकट मानी गई है, लेकिन यह भौगोलिक वर्णन प्रतीक के तौर पर भी हो सकता है। आज के समय में शाकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में पाए जाते हैं, और सूर्य मंदिरों में इनकी परंपरागत पुरोहिताई अब भी जीवित है।

 

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का निम्न लिखित क्षेत्रों में आधिकारिक योगदान रहा है –

1. आयुर्वेद और चिकित्सा शास्त्र में योगदान :-

इन्हें आयुर्वेदिक वैद्य माना जाता है, जो समाज में बिना शुल्क के चिकित्सा सेवा प्रदान करते थे और तंत्र-मंत्र के जानकार होते थे। शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की सबसे बड़ी विशेषता रही है – वैद्यक विद्या में पारंगत होना। यह  परंपरा सीधे अश्विनी कुमारों से जुड़ी है जिन्हें वैदिक काल के देव वैद्य कहा जाता है। ऋग्वेद (मंडल 1, सूक्त 116, मंत्र 15) के अनुसार –

अश्विना यद्वामवथः पिप्यनं जनं,

भूयिष्ठं वाजिनावथः पुरंध्यम्॥

भावार्थ:अश्विनीकुमारों ने अपनी चिकित्सा विद्या से अनेक जनों को पुनः स्वस्थ किया और उन्हें दीर्घायु प्रदान की।

भविष्य पुराण (प्रथम खंड, अध्याय 35) में स्पष्ट है कि अश्विनीकुमारों ने शाक द्वीपीय ब्राह्मणों को चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा दी। यही कारण है कि ऐतिहासिक काल में अनेक सूर्य मंदिरों के पुरोहित वैद्यक कार्य में भी निपुण थे।

2.ज्योतिष – कालगणना में निपुणता:-

प्राचीन काल से ही ये खगोल विज्ञान और ज्योतिष के ज्ञाता रहे हैं, और कई पंचांगों की गणना पद्धति आज भी इनकी परंपरा से प्रभावित है। आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषियों का संबंध इनसे जोड़ा जाता है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण सूर्य सिद्धांत, पंचांग गणना और मुहूर्त निर्धारण में विशेष रूप से प्रसिद्ध रहे। सूर्योपासना के कारण इनकी खगोलीय गणना अत्यंत सटीक मानी जाती थी। भविष्य पुराण (प्रथम खंड, 35/22) के अनुसार –

ज्योतिषं च विशेषेण ज्ञातव्यमिति मे मतिः।

तस्मादेषां वंशजाः सदा ज्योतिष विशारदाः

भावार्थ: सूर्यदेव का मत है कि इन ब्राह्मणों को विशेष रूप से ज्योतिष का ज्ञान होना चाहिए, इसलिए इनके वंशज सदैव ज्योतिष में पारंगत रहे। देव-औरंगाबाद(बिहार) सूर्य मंदिर के महंत पंडित आदित्यनारायण शाकद्वीपी द्वारा पंचांग निर्माण हुआ है । मोढेरा (गुजरात) सूर्य मंदिर में शाकद्वीपीय पुरोहितों की खगोलीय गणना, जिससे संक्रांति और विषुव के समय मंदिर में सूर्य की किरणें मूर्ति पर पड़ती थीं।

3. सूर्योपासना और धार्मिक नेतृत्व:-

शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जीवन सूर्य आराधना के इर्द-गिर्द रहा है। इनकी पूजा-पद्धति में अर्घ्यदान, आदित्य हृदय स्तोत्र, सप्ताश्वरथ पूजा विशेष स्थान रखते हैं। स्कंद पुराण (वैष्णव खंड, अध्याय 19, श्लोक 8-9) के अनुसार –

सूर्यः सर्वेषु लोकेषु दाता पुष्टिप्रदः प्रभुः।

तस्मात्सूर्यं समर्च्यन्ति ब्राह्मणाः शाकद्वीपजाः।।

भावार्थ: सूर्य समस्त लोकों में पुष्टिकारक और प्रभु हैं, अतः शाकद्वीपीय ब्राह्मण उन्हें विशेष रूप से पूजते हैं।

  सूर्योपासना के प्रमुख केंद्र अधोलिखित हैं। वैसे तो पूरे भारत में सूर्य मंदिर बिखरे हुए हैं परंतु कुछ खास अधोलिखित हैं –

1· देव सूर्य मंदिर (बिहार)।

3· कोणार्क सूर्य मंदिर (ओडिशा)।

3· मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात)।

4· उज्जैन का ऊंकारेश्वर क्षेत्र।

   इन सभी में प्राचीन काल से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की पुरोहिताई के प्रमाण हैं।

4. शिक्षा और वेदाध्ययन में योगदान:-

शाकद्वीपीय ब्राह्मण न केवल ज्योतिषी और वैद्य थे, बल्कि वेदवेत्ता भी थे।गुरुकुल प्रणाली में इन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, और आयुर्वेद संहिताओं का प्रचार-प्रसार किया। भविष्य पुराण ( प्रथम खंड, 35/30) के अनुसार –

वेदविद्या परं ज्नानं यैरालम्ब्य स्वकर्मसु।

ते ब्राह्मणाःसदा लोके पूज्यन्ते देववत्सदा।

भावार्थ: जो ब्राह्मण वेदविद्या के परम ज्ञान को धारण कर अपने कर्म करते हैं, वे सदैव लोक में देववत पूजनीय होते हैं।

5. सामाजिक एकता और नेतृत्व,:-

इतिहास बताता है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मणों ने धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ा है।

1·विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश, संतानोत्पत्ति आदि में शुभ मुहूर्त निर्धारण किया जाना।

2·कृषि और वर्षा के पूर्वानुमान हेतु पंचांग और ग्रह-नक्षत्र विश्लेषण किया जाना।

3· रोग-निवारण के लिए औषधि और यज्ञ का संयोजन हो।

4· चिकित्सा, ज्योतिष, सूर्योपासना और शिक्षा में अनुपम योगदान हुआ है।

5· पुराणों के प्रमाण से सिद्ध कि इनकी विशेषज्ञता ईश्वरीय आदेश का परिणाम थी।

6· सामाजिक एकता और लोककल्याण में इनकी भूमिका सर्वमान्य रही।

 

शाकदीपी पर हमले, चुनौतियाँ और भविष्य की दिशाएं:-

 

1.हमलों का कारण ऐतिहासिक विश्लेषण

(क) श्रेष्ठता से उपजी ईर्ष्या –

भविष्य पुराण और वायु पुराण दोनों स्पष्ट करते हैं कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण ज्योतिष, आयुर्वेद और सूर्योपासना में अतुलनीय थे।

जब कोई समाज-वर्ग किसी क्षेत्र में निरंतर श्रेष्ठता बनाए रखता है, तो अन्य प्रतिस्पर्धी वर्गों में हीनता-बोध और ईर्ष्या उत्पन्न होती है। वैदिक काल में हमारी पंचांग गणना और चिकित्सा विद्या को अन्य ब्राह्मण वर्ग भी मानते थे।परंतु कालांतर में, जब इन क्षेत्रों में आर्थिक लाभ और प्रतिष्ठा बढ़ी, तो कुछ ने हमें प्रतिस्पर्धी समझा।

(ख)धार्मिक केंद्रों पर नियंत्रण कीकोशिश-  सूर्य मंदिरों की पुरोहिताई परंपरागत रूप से शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के पास थी, कई बार दूसरे वर्गों ने इन स्थानों पर अधिकार करने के लिए हमारी प्रतिष्ठा को गिराने के प्रयास किए हैं। उदाहरण स्वरूप मोढेरा सूर्य मंदिर (गुजरात) में 18वीं शताब्दी में पुरोहिताई को लेकर विवाद हुआ था।

(ग) राजनीतिक परिस्थितियाँ-

मुगल और औपनिवेशिक काल में हमारी परंपराएँ बाधित हुईं। सूर्य मंदिरों पर कर और प्रतिबंध। आयुर्वेद और ज्योतिष को “अंधविश्वास” कहकर अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली में हाशिये पर डालना।

2. वर्तमान चुनौतियाँ :-

1. पहचान का संकट – युवाओं में अपने गौरवशाली इतिहास की जानकारी का अभाव है।

2. संगठनहीनता – विभिन्न राज्यों में बिखरे होने से एकजुट आवाज़ का अभाव है।

3. आधुनिक प्रतिस्पर्धा – आयुर्वेद और ज्योतिष के क्षेत्र में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, जिससे परंपरागत ब्राह्मण वर्ग पिछड़ रहा है।

4. भ्रामक प्रचार – सोशल मीडिया पर “शाकद्वीपी = शक” जैसी गलत धारणाओं का प्रसार हो रहा है।

3. पुनरुत्थान की रणनीति:-

(क) इतिहास का प्रलेखन और प्रकाशन-

भविष्य पुराण, स्कंद पुराण, वायु पुराण, महाभारत आदि के संदर्भों को पुस्तक और डिजिटल रूप में प्रकाशित करना।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में शोधपरक व्याख्यान आयोजित करना।

(ख) सांस्कृतिक पुनर्जागरण-

सूर्योपासना पर्व (जैसे छठ महापर्व) में शाकद्वीपीय परंपरा की विशेष प्रस्तुति।

आयुर्वेदिक चिकित्सा शिविर और ज्योतिष परामर्श केंद्र स्थापित करना।

(ग) संगठन और नेटवर्किंग-

अखिल भारतीय शाकद्वीपीय ब्राह्मण महासंघ जैसे मंच को मजबूत करना।

युवाओं को इतिहास, संस्कृति और आधुनिक शिक्षा-दोनों में प्रशिक्षित करना।

(घ) भ्रम-निवारण अभियान चलाना।

सोशल मीडिया और लेखों के माध्यम से “शाकद्वीपी ≠ शक” का तथ्य-आधारित प्रचार किया जाय ।डॉक्यूमेंट्री और यूट्यूब चैनल के जरिए हमारी विरासत को जन-जन तक पहुँचाया जाए।

4. भविष्य की दिशा :-

भविष्य पुराण का यह शाश्वत संदेश है –

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।

प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥

भावार्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, ऐसा सत्य न बोलो जो अप्रिय हो, और प्रिय बात झूठ न हो- यही सनातन धर्म है। हमारा भविष्य इस सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। सत्य का प्रचार (शाकद्वीपीय इतिहास के वास्तविक तथ्य) हो। प्रियता का संवर्धन हो। अन्य वर्गों से संवाद और सहयोग पर आधारित हो। संस्कृति का संरक्षण (आयुर्वेद, ज्योतिष, सूर्योपासना का पुनर्जागरण) किया जाए।

उपसंहार :-

शाकद्वीपीय ब्राह्मण भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और वैज्ञानिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिन्होंने सूर्य, ज्योतिष और आयुर्वेद के क्षेत्र में गहरा योगदान दिया है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण केवल एक जाति नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा का जीवित प्रतीक हैं। हम पर हमले इसीलिए हुए क्योंकि हमने ज्ञान, सेवा और सत्य के मार्ग पर चलकर समाज में एक ऊँचा स्थान बनाया है । आज आवश्यकता है कि हम फिर से संगठित हों, अपनी जड़ों को पहचानें और आधुनिक साधनों के माध्यम से अपने गौरव को पुनः स्थापित करें। जैसे सूर्य को कोई बादल सदा ढक नहीं सकता, वैसे ही सत्य और संस्कृति की ज्योति को कोई समाप्त नहीं कर सकता। यह काल और समय के हर थपेड़ों को सहते सहते अपनी अस्मिता बनाए रखने में सक्षम रहेगा।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

हिंदी का भविष्य रोमन से नहीं देवनागरी से है

आज रोमन लिपि में हिन्दी की वकालत करने वाले यह नहीं जानते कि वे संविधान विरोधी बात कर रहे हैं। संविधान में जिसे राजभाषा कहा गया वह हिन्दी नहीं है, ‘देवनागरी लिपि में हिन्दी’ है। संविधान निर्माताओं की इस गहरी समझ के कारण मैं उनका संविधान की कई प्रत्यक्ष कमियों के बावजूद गहरा आदर करता हूँ।
देवनागरी लिपि और हिन्दी मानव इतिहास में भाषाई सिम्बायोसिस के सबसे गहरे उदाहरण हैं।
थियरी के हिसाब से भाषा और लिपि स्वतंत्र होते हैं एक दूसरे से। कि भाषा किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है, लेकिन हिन्दी और देवनागरी दोनों का रिश्ता इतना अंतर्भूत है, ऐसे बुनियादी तरह से इन दोनों ने एक दूसरे के विकास, संरचना और सांस्कृतिक सार्थकता को प्रभावित किया है, कि इस थियरी को भी चुनौती मिल सकती है।
एक लिपि के रूप में नागरी का इतिहास हिन्दी से अधिक पुराना है। देवनागरी यदि किसी देव-नगर की है -अलकापुरी की है तो हिन्दी हिन्द की है।
मध्यकाल में पनपकर भी हिन्दी ने फारसी – अरबी जैसे विकल्पों को नहीं अपनाया तो इसलिए कि हिन्दी की बहुत-सी ध्वनियाँ उन लिपियों में थीं ही नहीं। देवनागरी का phonetic precision ही हिन्दी के मन भाया।
देवनागरी एक लिपि के रूप में भारत की देशजता और जड़ों को जैसे हृदयंगम करती थी वैसी क्षमता किसी विदेशी लिपि में नहीं थी।
उर्दू और हिन्दी दोनों पारस्परिक समझ की भाषिक अंतरंगता रखती थीं लेकिन हिन्दी को दरबार की जगह देवता से जुड़ना बेहतर लगा, इसलिए हिन्दी जन्म से ही जनता की भाषा बन गई। उर्दू ने फारसी अरबी लिपि को अपनाकर अपने युग की सत्ता की प्राथमिकताओं के सामने समर्पण किया जबकि हिन्दी ने देवनागरी लिपि को अपनाकर जन्म से ही एक विद्रोही चेतना का प्रतिनिधान किया।
अन्यथा सत्ता की लिपि के चुनाव में हमेशा एक बड़ी भूमिका होती है। जैसे पाकिस्तान में सिंधी का देवनागरी से रिश्ता टूट गया है। वहाँ सिंधी अरबी लिपि में लिखी जा रही है।
कई देशों ने राजनीतिक बदलावों के बीच भाषाओं को लिपि-निष्ठा का त्याग करते देखा है। तुर्की 1928 में अरबी लिपि से लैटिन में लिखी जाने लगी- अतातुर्क कमाल पाशा के दबाव में। जब सोवियत संघ के टुकडे हए तो मध्य एशिया के गणतंत्रों ने सिरिलिक विधि छोड़ दी और अपनी भाषाएँ लैटिन में लिखने लगे। जब वियतनाम में फ्रेंच शासन आया तो चीनी कैरेक्टर्स की जगह लैटिन आधारित स्क्रिप्ट ने ले ली।
हिन्दी ने न मध्यकालीन दरबार की लिपि ली और न औपनिवेशिक युग में रोमन लिपि के लिए कोई झुकाव दर्शाया। हिन्दी देवनागरी के अमृतगर्भ से जुड़ी रही।
यानी यह जुगलबंदी व्यावहारिक से कहीं ज्यादा आदर्शवादी और वैचारिक जुगलबंदी थी।
हिन्दी ने प्राचीन भारतीय सभ्यता से अपनी सांस्कृतिक निरन्तरता लिपि के रूप में देवनागरी को चुनकर सुनिश्चित की। देवनागरी को अपनी लिपि बनाकर हिन्दी ने एक विद्वत परंपरा और आध्यात्मिक वैधता सीधे प्राप्त कर ली।
विदेशी प्रभावों का, सत्ता के दबावों का निरसन कर उसने वह लिपि चुनी जिनके माध्यम से वह भारत के दूसरे भाषिक समुदायों के साथ जुड़कर एक कॉमन भारतीय अस्मिता का सह-निर्माण कर सकती थी।
यों लिपि भाषा से अपृथक्करणीय हो गई; सिर्फ एक लेखन प्रणाली की तरह नहीं बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक निष्ठा की निशानदेही की तरह।
तो सिर्फ यही नहीं कि फारसी-अरबी में retroflex sounds ट ठ ड ढ के लिए कोई dedicated letter नहीं था, या रोमन अंग्रेजी जैसी स्थिति नहीं थी कि जहां स्पेलिंग और उच्चारण बहुत ज्यादा ही फरक हो जाते हैं मसलन Though, through, tough, thought में ough एक ही स्पेलिंग के बावजूद अलग अलग उच्चारणों की तरह पायेंगे और ‘त’ के लिए वहाँ कोई अक्षर नहीं जबकि देवनागरी-हिन्दी में ध्वन्यात्मक संगति भरपूर है।
इसने भारतीय बच्चे की ध्वन्यात्मक चेतना के विकास में बहुत योग भी दिया। मनोभाषिकी psycholinguistics के शोध आज यही बताते हैं कि देवनागरी में हिन्दी पढ़ने वाले बच्चे phonemic awareness के बारे में अन्य लिपियों के बच्चों से बहुत आगे हैं और किसी भी लिखित शब्द को ज्यादा शुद्धता से उचार लेते हैं।
दुनिया भर में खा घा झा जैसे aspirated व्यंजन बहुत दुर्लभ हैं, हिन्दी में देवनागरी के कारण सहज हैं।
हिन्दी ने देवनागरी के बहुत से संस्कृत conjunts को सरलीकृत भी कर दिया। देवनागरी की शिरोरेखा को शिरोधार्य कर हिन्दी ने word boundaries को सहज रूप से मुखरित किया।
संस्कृत की ध्वनिसूचिका में नुक्ता नहीं होता था, फारसी- अरबी में उसका चलन था। हिन्दी देवनागरी ने उसे सहज ही अपना लिया।
हिन्दी ने देवनागरी को कम्युनिकेटिव वाइटेलिटी दी है, कंटेंपरेरी रेलीवेंस दी है और करोड़ों लोगों के दैनंदिन जीवन से जोड़ा है, देवनागरी ने हिन्दी को ध्वन्यात्मक स्पष्टता दी है, विजुअल ईस्थेटिक्स दी है और एक महान परंपरा का ऐतिहासिक नैरंतर्य दिया है।
अब जब व्हाट्सएप इंस्टाग्राम के 13 से 24 वर्ष के 68% हिन्दी यूज़र्स रोमन अल्फ़ाबेट्स का प्रयोग कर रहे हैं तब वे सिर्फ संविधान निर्माताओं की भावनाओं का ही उपहास नहीं कर रहे, हिन्दी-देवनागरी के इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक गठबन्धन का भी उपहास कर रहे हैं।

(लेखक सेवानिवृत्त आएएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

साभार- https://www.facebook.com/share/1bRbaecV3w/ से

अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच के विरुद्ध बन रहे नए समीकरण

अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति श्री निकोलस मदुरो को रात्रि के समय में गिरफ्तार कर अमेरिका लाकर उन पर मुकदमा चलाया जाना एवं वेनेजुएला के तेल भंडार पर अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका का कब्जा स्थापित करने का प्रयास करना, अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच को ही दर्शाता है। साथ ही, इसी क्रम में डेनमार्क द्वारा शासित ग्रीनलैंड द्वीप पर भी अमेरिका अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता है। सोचनीय विषय है कि डेनमार्क नाटो का सदस्य देश होने के चलते वह अमेरिका का मित्र राष्ट्र है और मित्र राष्ट्र की सीमाओं में घुसकर उसके आधिपत्य वाले क्षेत्र को अमेरिका द्वारा बलपूर्वक अपने देश की सीमा में शामिल करने का प्रयास करना उचित कदम नहीं कहा जा सकता है। कुछ समय पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कनाडा के राष्ट्रपति को धमकी दी थी कि अमेरिका कनाडा को अपना 51वां राज्य बनाना चाहते हैं। ध्यान रहे कनाडा भी अमेरिका के मित्र राष्ट्र के देशों की सूची में शामिल है। परंतु, जब अमेरिका जैसा देश साम्राज्यवादी सोच के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं, तो मित्र राष्ट्र का ध्यान भी नहीं रह पाता है।

अमेरिका द्वारा हाल ही में ब्रिक्स के सदस्य देशों (भारत, रूस, चीन एवं ब्राजील) पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने की धमकी देना केवल अमेरिका की व्यापार नीति नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की सीधी कोशिश है। 500 प्रतिशत का यह टैरिफ रूस, चीन, ब्राजील और भारत पर नहीं बल्कि ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा डीडोलराईजेशन की ओर अपने कदम बढ़ाने को रोकने का एक प्रयास है। ब्रिक्स के सदस्य देश आपस में किए जाने वाले विदेश व्यापार का एक दूसरे को भुगतान अब स्थानीय मुद्रा में करते दिखाई दे रहे हैं।

इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर पर दबाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा हैं। ब्रिक्स की मुद्रा व्यवस्था, स्थानीय मुद्रा व्यापार सम्बंध एवं डॉलर मुक्त भुगतान व्यवस्था अमेरिका के लिए एक रणनीतिक खतरे के रूप में उभर रही है। इसीलिए अमेरिका छोटे देशों की तरह ही बड़े देशों को भी अनुशासित करना चाहता है। परंतु, यहां अमेरिका यह भूल जाता है कि वेनेजुएला, डेनमार्क, क्यूबा, मेक्सिको आदि छोटे देश हैं जो अपनी जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं परंतु भारत, चीन, रूस एवं ब्राजील जैसे बड़े देशों पर अमेरिका का दबाव काम नहीं कर पाएगा। ट्रम्प प्रशासन की वर्तमान विदेश नीति को 20वीं सदी की “हस्तक्षेपवाद.2” की नीति कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछले 250 वर्षों में अमेरिका ने विश्व के अन्य देशों में 400 बार हस्तक्षेप किया है। अमेरिका के लिए यह एक पैटर्न है आश्चर्य में डालने वाली घटना नहीं है। अमेरिका ने पूर्व में भी आर्थिक दबाव डालकर एवं सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन कराने में भी सफलता हासिल की है। और, यह पैटर्न आज भी जारी है। अमेरिका भारत एवं चीन पर केवल इस कारण से भी 500 प्रतिशत टैरिफ लगाना चाहता है क्योंकि ये देश रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं। आज के इस युग में अब अमेरिका निर्णय लेगा कि किस देश को कच्चा तेल किस देश से खरीदना है। यह साम्राज्यवाद अथवा अधिनायकवाद की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है?

इसी प्रकार, ट्रम्प प्रशासन द्वारा विश्व के 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका की सदस्यता को समाप्त करना भी वैश्विक व्यवस्था का पुनर्निर्माण नहीं बल्कि अमेरिका का विश्व में एक छत्र राज्य स्थापित करने की सोच का नतीजा हो सकता है। अमेरिका किसी भी अन्य ब्लाक अथवा देश के साथ मिलकर विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं करना चाहता है बल्कि अमेरिका केवल अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। इस रणनीति के अंतर्गत वैश्विक संगठनों एवं संस्थाओं को कमजोर करने के एकपक्षीय अमेरिकी शक्ति मॉडल को लागू करना ही मुख्य लक्ष्य हो सकता है।

आज अमरीका में ट्रम्प प्रशासन इससे भी परेशान है कि आर्थिक शक्ति का केंद्र पश्चिमी देशों से पूर्वी देशों की ओर खिसकता जा रहा है। इससे ट्रम्प को पूरे विश्व में अमेरिका का आधिपत्य स्थापित करने की रणनीति को धक्का लगता हुआ दिखाई दे रहा है। संख्या, जनसंख्या, संसाधन एवं बाजार के आधार पर आगे आने वाला भविष्य पूर्व के आस पास दिखाई देता है, अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपने प्रभुत्व को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता है। अमेरिका आज नहीं चाहता कि चीन, रूस एवं भारत मिलकर विश्व में शक्ति की एक धुरी बनें। साथ ही, ट्रम्प यह भी नहीं चाहता कि भारत वैश्विक स्तर पर अपनी रणनीतिक स्वायतत्ता बढ़ाने में सफल हो तथा डीडोलराईजेशन की व्यवस्था गति पकड़े और यूरोपीय यूनियन के देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए। यूरोपीय यूनियन के देशों पर अमेरिका अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। परंतु, अब तो यूरोपीय यूनियन के देश भी अपने सुरक्षा बजट में अतुलनीय वृद्धि करते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि अमेरिका पर इन देशों का विश्वास कम हो गया है। ट्रम्प चूंकि बहुध्रुवीय व्यवस्था में विश्वास नहीं करते है और यह व्यवस्था उनके लिए असहनीय है अतः ट्रम्प समस्त देशों पर टैरिफ युद्ध छेड़कर उन्हें दबाव में लाना चाहते है ताकि अमेरिका पूरे विश्व में अपना एक छत्र राज्य स्थापित कर सके। इसीलिए ट्रम्प आज पूरे विश्व में नियंत्रित अशांति चाहता है। दरअसल, आज अमेरिका की आक्रामक साम्राज्यवादी टैरिफ नीति भी वैश्विक अस्थिरता की सबसे बड़ी जड़ के रूप में उभर रही है।

इसी क्रम में, अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्यवाही कर ग्रीनलैंड पर अपना आधिपत्य स्थापित करने की कार्यवाही नाटो जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान को तोड़ सकती है। नाटो के सदस्य देशों ने स्पष्ट रूप से कहा भी है कि अमेरिका का ग्रीनलैंड पर हमला नाटो के सदस्य देशों पर किया गया हमला माना जाएगा। इससे यूरोपीयन देशों एवं अमेरिका के बीच दुर्लभ एवं खतरनाक तनाव दिखाई दे रहा है।

वैश्विक स्तर पर वर्तमान में उभर रही परिस्थितियों को सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस सर्वांगी कूटनीतिक युद्ध में कच्चे तेल की उपलब्धता पर अपना नियंत्रण बनाए रखना, डॉलर पर अमेरिकी प्रभाव को बनाए रखने के प्रयास ताकि वैश्विक स्तर पर अमेरिका का मुद्रा पर नियंत्रण लगातार आगे भी बना रहे, समुद्री मार्गों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना, तकनीकी सम्पदा को अपने कब्जे में रखना, वैश्विक सप्लाई चैन को प्रभावित करना एवं आरटीफिशीयल इंटेलिजेन्स आदि के माध्यम से ट्रम्प अन्य देशों पर दबाव बनाकर उन्हें अपने प्रभाव में लेने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसलिए आज प्रत्यक्ष युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संरचना को पुनर्गठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस रचना में ट्रम्प अपने आप को वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में अमेरिका चाहता है कि दुनिया फिर से उसी मोड में लौट आए, जहां वित्त, व्यापार, सैन्य गठबंधन और तकनीक सब उसकी चौखट पर खड़े हों। आज अमेरिका का लक्ष्य सम्भवत: तीसरा विश्व युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक व्यवस्था को अमेरिका के प्रभुत्व में पुनर्गठित करना है।

अमेरिका का 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अपने आप को अलग करने के क्रम में अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस से बाहर निकलना पूरे विश्व को स्पष्ट संदेश देता है कि अमेरिका की अब पर्यावरण के क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार कार्यक्रमों में भी कोई दिलचस्पी नहीं है तथा वह इस अलायंस को दी जाने वाली अमेरिकी मदद को रोकना चाहता है और वैश्विक स्तर पर केवल अपने प्रभाव को बढ़ाने में ही अपनी पूरी शक्ति लगाना चाहता है। विश्व के भले की बात भी अब अमेरिका को नागवार गुजर रही है। जबकि आज जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकट को कम करने अथवा दूर करने में समस्त देशों का आपसी सहयोग अति आवश्यक है। भारत एवं फ्रान्स के संयुक्त नेतृत्व में बनाया गया यह मंच विकासशील देशों के लिए उम्मीद की किरण बन रहा है। विश्व के अन्य देशों में यह भावना विकसित हो रही है कि आज वैश्विक स्तर पर एक ऐसी दुनिया विकसित होती दिखाई दे रही है जिसमें अमेरिका अकेला खड़ा हो एवं विश्व के अन्य समस्त देश आपस में तालमेल रखते हुए अपने विकास को गति दें। वैसे भी, विश्व पहिले से ही इस मुहाने पर आकार खड़ा है जहां अकेले चलना बहुत मुश्किल है हर पग पर विभिन्न देशों को अन्य देशों के सहायता की अति आवश्यकता है। एक दूसरे के सहयोग के बिना सम्भवत: कोई भी देश आज आर्थिक विकास के पथ पर अपनी दौड़ को गति प्रदान नहीं कर पाएगा। इसीलिए वैश्विक स्तर पर आज नए नए समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर ये देश आपस में मुक्त व्यापार समझौते तेजी से सम्पन्न कर रहे हैं ताकि ये, अपने देश के आर्थिक विकास की गति को तेज कर सकें।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

साहित्य की विविध विद्याओं में प्रवीण डॉ.कृष्णा कुमारी

प्रेम और प्रकृति से प्रभावित सृजन और वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पक्षधर सृजनकार डॉ. कृष्णा कुमारी का जन्म कोटा जिले के चेचट ग्राम में पिता प्रभुलाल वर्मा के परिवार में हुआ। आप ने एम.ए., एम.एड., (मेरिट अवार्ड) साहित्य रत्न, आयुर्वेद रत्न एवं बी.जे.एम.सी की शिक्षा प्राप्त की। बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा का रचना कर्म : एक समालोचनात्मक अध्ययन विषय पर लिखे शोध-प्रबन्ध के लिए कोटा विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की है। आप काव्य गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों, मुशायरों में भागीदारी करती हैं। उर्दू लिपि की भी कई पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित हैं। अपनी और अन्य रचनाकारों की पुस्तकों, कई पत्रिकाओं पर इन के बनाये आवरण चित्र प्रकाशित हुए हैं। साथ ही रेखा-चित्र, स्केच, डिज़ाइन आदि भी । इन की कुछ रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, राजस्थानी व गुजराती भाषा में अनुवाद हुआ है और इन्होंनें भी अन्य कुछ रचनाओं का राजस्थानी में अनुवाद किया है। कई शोध ग्रन्थों, विश्वविद्यालय के सन्दर्भ ग्रन्थों, अन्य कई महत्त्वपूर्ण किताबों में इन की रचनाओं का उल्लेख हुआ है। इनके साहित्यिक योगदान पर मोनोग्राफ भी लिखा गया है। अब चुप नहीं रहूंगी ” वन्य जीव संरक्षण विषयक एकांकी पर एक छात्र ने पंजाब के विश्व विद्यालय से एम.फिल किया। आप कई साहित्यिक संस्थाओं में सक्रिय हैं। संगीत, वादन एवं चित्रकला में भी आपकी विशेष रुचि है।
हिंदी, राजस्थानी, उर्दू, अंग्रेज़ी में समान अधिकार रखते हुए गद्य और पद्य दोनों विधाओं में कविता, गीत, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तक, बालगीत, निबन्ध, कहानी, यात्रा वृत्तान्त, साक्षात्कार, संस्मरण, डायरी, समीक्षा, पत्र, रिपोर्ट, शोध आलेख, परिचर्चा, पत्र लेखन आदि में योग हैं। इन की शैली सहज और सरल रूप में कथात्मक, वर्णनात्मक, व्याख्यात्मक,  अन्वेषणात्मक है जिसका विषयानुरूप स्वतः प्रयोग हुआ है। कविताओं में आन्तरिक स्पन्दन, सम्वेदनाएँ और स्वानुभूतियाँ  हैं। प्रकृति और प्रेम से प्रभावित सृजन में शृंगार, करुण, शान्त, वात्सल्य, हास्य, अद्भुत आदि रसों की धाराएँ प्रवाहित हैं।
रचनाकार की 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। काव्य संग्रह से..तो हम क्या करें ?, बहुत प्यार करते हैं शब्द, मैं पुजारिन हूँ, कितनी बार कहा है तुम से’, अस्यौ है म्हारौ गाँव और जंगल में फाग(बाल गीत), निबंध विषय प्रेम है केवल ढाई आख’, ज्योतिर्गमय, नागरिक चेतना, भय बिन होवै प्रीत, कहानी आधारित स्वप्निल कहानियाँ,  यात्रा वृत्तांत पर आओ नैनीताल चलें’, हरित पगडंडी पर, साक्षात्कार पर कुछ अपनी कुछ उन की  तथा बात बात खुशबूदार शामिल हैं। आपने लगभग एक सौ से अधिक पुस्तकों की समीक्षा भी की है।
 आपको ‘एयर इण्डिया’ एवं ‘राजस्थान पत्रिका’ द्वारा आयोजित रेन्क एण्ड बोल्ट प्रतियोगिता में जिला स्तरीय एवं राज्य स्तरीय प्रथम पुरस्कार सिंगापुर की यात्रा, शिक्षक दिवस 2008 पर ‘राज्य स्तरीय शिक्षक समान’, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा ज्योतिर्गमय (सांस्कृतिक निबन्ध) की ‘देवराज उपाध्याय पुरस्कार’, साहित्य मण्डल श्रीनाथद्वारा, द्वारा हिन्दी भाषा भूषण सम्मान एवं साहित्य सुधाकर मानद उपाधि-2024 जैसे प्रमुख पुरस्कार और सम्मान सहित तीन दर्जन से अधिक  प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव परिणाम – प्रमुख राजनैतिक संदेश

महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव परिणाम आ चुके हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन महायुति ने संपूर्ण महाराष्ट्र मे महाविजय प्राप्त करके इतिहास रच दिया है। महाराष्ट्र में पहली बार भाजपा के 22 मेयर बनने जा रहे हैं जबकि तीन जिलों में उसके सहयोगी शिवसेना एकनाथ शिंदे गुट, एक जिले अहिल्यानगर  में उसके दूसरे सहयोगी अजित पवार गुट का मेयर बनने जा रहा है। भारत के  सबसे बड़े नगर निगम मुंबई में पक्ष और विपक्ष के बीच केवल चार सीटो का अंतर होने के कारण किसका मेयर बनेगा इस पर कुछ कहना कठिन हो गया है किन्तु यदि भाजपा का मेयर बनता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। महाराष्ट्र निकाय चुनावों में ओवैसी की एआईएमआइएम की बढ़त मुस्लिम तुष्टिकरण में संलिप्त रहने वाली कांग्रेस और समान विचारों वाली  इंडी गठबंधन की पार्टियों के लिए चिंता का नया कारण बन गई है।

चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने हिंदी और उत्तर भारतीयों के प्रति नफरत को पूरी तरह नकारते हुए राजनीतिक स्थिरता और विकास को चुना है। परिवारवाद की राजनीति भी हाशिये पर जाती दिख रही है। मुस्लिम तुष्टिकरण में संलिप्त रहने वाले दल जो मुंबई में न्यूयार्क के ममदानी जैसा मेयर बनाने का सपना देख रहे थे उनको भी झटका लगा है। इन चुनावों में एआईएमआईएम जैसी पार्टियों को जैसी सफलता  प्राप्त हुई है वह स्थानीय स्तर पर बांगलादेशी घुसपैठियों व रोहिंग्याओं के चलते हुए जनसांख्यकीय परिवर्तन से संभव हुई दिखती है।

महाराष्ट्र की राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए 20 वर्षों के बाद ठाकरे बन्धु एक साथ आ गए किंतु उसका कोई प्रभाव चुनाव परिणामों पर नहीं दिखा। महाराष्ट्र में ठाकरे बंधुओं की दुर्गति का कारण यह लोग स्वयं ही हैं । ठाकरे बंधुओं ने मराठी और मराठी मानुस को ही अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और अन्य मुद्दे पीछे छोड़ दिए । मुंबई में मराठी मतदाता केवल 38 प्रतिशत है जबकि 30 से 35 प्रतिशत मतदाता गुजराती और अन्य उत्तर भारतीय और दूसरे समुदायों के हैं। उद्धव ठाकरे अगर राज ठाकरे के साथ गठबंधन नहीं करते तो संभवतः  उन्हें अधिक लाभ  मिल सकता था क्योंकि राज ठाकरे के लोग जिस तरह उत्तर भारतीयों और हिंदी भाषियों की सार्वजनिक रूप से पिटाई कर रहे थे वो भारतीय समाज स्वीकार नहीं करता चाहे वो किसी भी प्रान्त या क्षेत्र का हो। अवसर मिलते ही समावेशी भारतीय समाज ने अपने वोट से ठाकरे की पिटाई कर दी। ठाकरे बंधुओं  ने तमिलनाडु के भाजपा  नेता अन्नामलाई को रसमलाई कहा।लुंगी की पुंगी बजने जैसे निम्न स्तरीय व्यंग्य किए ।  ठाकरे बंधुओं  ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की निंदा तक नहीं की अपितु इसके लिए  मोदी सरकार को ही दोष देते रहे। ठाकरे बंधु “बुर्के वाली मेयर बनेगी” जैसी बातों पर भी चुप रहे जिसको जनता ने  इनके भी मुस्लिम तुष्टिकरण की ओर झुकने का प्रमाण माना।

आज महाराष्ट्र में सभी वर्गों के मतदाताओं का वोट भाजपा को मिल रहा है।महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन युवाओं की सबसे बड़ी पसंद बनकर उभरा है ।महाराष्ट्र में लाडली बहिन योजना का प्रभाव भी  महिला मतदाताओं पर  देखने को मिला। इस योजना के अंतर्गत महिलाओं के खाते में तीन हजार रुपए आते थे किंतु इंडी दलों की आपत्ति के कारण चुनाव आयोग ने इस राशि के वितरण पर रोक लगा दी थी, तब एकनाथ शिंदे ने महिलाओं से विशेष अपील करी की थी कि अब आप सभी लोग इन लोगो को वोट मत करिएगा क्योंकि यह लोग विकास विरोधी और महिला विरोधी हैं। यदि मुंबई की बात करी जाए तो वहां के स्थानीय टेंपो-टैक्सी चालकों का भी अच्छा खासा मत भाजपा गठबंधन को मिला है। मुंबई में टैंपो -टैक्सी चलाने वालों का बड़ा प्रतिशत है।

मुंबई में 118 सीटों पर विजय मिलने के बाद यदि भाजपा ने अपना मेयर बना लिया तो यह पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी क्योंकि मुंबई भारत की आर्थिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। यह नगर निगम 1885 से एशिया का सबसे बड़ा नगर निगम है। बीएमसी का वार्षिक बजट 74 हजार करोड़ रुपए से अधिक है जबकि गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम जैसे 8 राज्यों का बजट इससे कम है। मुंबई नगर निगम के पास 1.15 लाख कर्मचारी हैं। महाराष्ट्र में भाजपा की इस बड़ी जीत का श्रेय  स्वाभाविक रूप से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व प्रांतीय तथा स्थानीय नेतृत्व को जाता है। महाराष्ट्र नगर निकाय  चुनावों से स्पष्ट हो गया है कि भाजपा की हिंदुत्व और विकास की अपील मराठी मानुस को भी  आकर्षित कर रही है। महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री नीतीश राणे ने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा कि जो हिंदू हित की बात करेगा वो महाराष्ट्र पर राज करेगा बसयही बात बाला साहेब ठाकरे के उत्तराधिकारी भूल गए।

महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस विगत 12 वर्षों  से सक्रिय रहते हुए  राजनीति के धुरंधर के रूप में स्थापित हो रहे हैं। वह महाराष्ट्र की समस्याओं  का निराकरण कर रहे हैं।  उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान स्पष्ट किया कि हिंदुत्व केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं अपितु सुशासन और  विकास की वैचारिक नींव  है। उन्होंने नगर निगम चुनावों में स्थानीय मुद्दों पर बल दिया। भाजपा के इस धुरंधर ने महाराष्ट्र में ठाकरे बंधुओं से लेकर शरद  पवार और कांग्रेस के मजबूत किलों  में उस समय सेंध लगाने में सफलता प्राप्त की जब इन्होंने  मिलकर  लोकसभा चुनाव -2024 में भाजपा को रोक दिया था। नागपुर से लेकर सोलापुर तक स्थानीय भाजपा नेतृत्व ने विपक्ष के हर किले हिलाकर रख दिया  है। ऐसा माना जा रहा है कि महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव परिणामों  का प्रभाव सभी आगामी विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा ।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

सीमा सड़क संगठन (बीआरओ): पथ निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक, जो जोड़ता है राष्ट्र और जन-मन

सड़क निर्माण से कहीं आगे बढ़कर, सीमा सड़क संगठन अक्सर प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध भारत की पहली डिफेंस लाइन के रूप में कार्य करता है। हिमालय की दुर्गम चोटियों से लेकर उत्तर-पूर्व के घने जंगलों और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तक, आपदा आने पर इसकी टीमें सबसे पहले पहुँचकर जीवन रेखाओं (सड़कों और पुलों) को बहाल करती हैं।

रोड ओपनिंग पार्टी, हिमस्खलन राहत दल और ब्रिज यूनिट—बादल फटने, अचानक आई बाढ़ या भूकंप के बाद भूस्खलन को साफ करने, बह गए पुलों के पुनर्निर्माण और पर्वतीय दर्रों को फिर से खोलने के लिए चौबीसों घंटे काम करती हैं। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) को अपने परिचालन सिद्धांत में एकीकृत करके, बीआरओ रक्षा और नागरिक सुरक्षा के दोहरे उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है। यह संगठन न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को अभेद्य बनाता है, बल्कि आपदाओं के विरुद्ध नागरिक सुदृढ़ता को भी सुनिश्चित करता है।
मुख्य बिंदु

· सीमा सड़क संगठन सैन्य और नागरिक दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में रणनीतिक सड़कों, पुलों, सुरंगों और हवाई पट्टियों का निर्माण व रखरखाव करता है।

· वर्ष 1960 में अपनी स्थापना के बाद से, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों और मित्र पड़ोसी देशों में 64,100 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों, 1,179 पुलों, 7 सुरंगों और 22 हवाई पट्टियों का निर्माण कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है।

· भूटान, म्यांमार, अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से, बीआरओ क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करता है।

· वित्तीय वर्ष 2024–25 में, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने ₹16,690 करोड़ का अपना अब तक का सर्वाधिक व्यय दर्ज किया। इस गति को बरकरार रखते हुए, वित्तीय वर्ष 2025–26 के लिए ₹17,900 करोड़ का एक महत्वाकांक्षी व्यय लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

· वर्ष 2024 से 2025 की दो साल की अवधि में, बीआरओ ने 250 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को राष्ट्र को समर्पित किया, जो रणनीतिक सीमा विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

हिमालय के उन हिमनदों से जहाँ ऑक्सीजन कम होने लगती है, उन नदी घाटियों तक जहाँ जलधाराएँ गर्जना करती हैं और उन तपते रेगिस्तानों तक जहाँ सन्नाटा भी जलाता है—सीमा सड़क संगठन डामर, फौलाद और पत्थरों पर साहस के अमिट हस्ताक्षर अंकित करता है। सीमा पर तैनात सैनिक के लिए ये सड़कें रक्षा की जीवन रेखा हैं, तो सुदूर घाटियों में बसे ग्रामीणों के लिए ये उम्मीद के सेतु हैं।

7 मई 1960 को स्थापित, सीमा सड़क संगठन एक सरल किंतु प्रेरणादायक आदर्श वाक्य को आत्मसात किए हुए है: ‘श्रमेण सर्वं साध्यम्’ अर्थात “परिश्रम से सब कुछ संभव है” पिछले छह दशकों में, इसी मंत्र ने बीआरओ का मार्ग प्रशस्त किया है और इसे केवल एक कंस्ट्रक्शन एजेंसी से ऊपर उठाकर भारत की सीमाओं के एक मौन प्रहरी के रूप में स्थापित किया है।

भारत की सीमाओं से परे, बीआरओ के पदचिह्न भूटान, म्यांमार, अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान तक फैले हुए हैं, जहाँ सड़कें और हवाई पट्टियाँ क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक सहयोग के माध्यम के रूप में कार्य करती हैं। अफगानिस्तान में डेलाराम-ज़ारंज राजमार्ग जैसी परियोजनाएं केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं हैं, बल्कि साझेदारी और भरोसे के स्थायी प्रतीक के रूप में खड़ी हैं।

जब भी आपदा आई है, चाहे वह 2004 की सुनामी हो, कश्मीर का भूकंप हो या लद्दाख की आकस्मिक बाढ़—बीआरओ सबसे पहले पहुँचने वालों में से एक होता है, जो टूटी हुई जीवन रेखाओं को जोड़कर एक बार फिर उम्मीद’ को बहाल करता है।

वर्ष 2024 और 2025 में, सीमा सड़क संगठन द्वारा कार्यान्वित 356 इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित की गईं, जो रणनीतिक सीमा अवसंरचना के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास में बीआरओ के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए, सरकार ने केंद्रीय बजट 2024-25 में इसके आवंटन को ₹6,500 करोड़ से बढ़ाकर बजट 2025-26 में ₹7,146 करोड़ कर दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में, बीआरओ ने ₹16,690 करोड़ का अपना अब तक का सर्वाधिक व्यय दर्ज किया। इसी निरंतर प्रगति को देखते हुए, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए ₹17,900 करोड़ का व्यय लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

आज, बीआरओ इस विश्वास के एक जीवंत प्रतीक के रूप में खड़ा है कि सबसे कठिन रास्ते भी सबसे मजबूत हौसलों के आगे झुक जाते हैं। यह केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि देश की सीमाओं पर भारत की सुरक्षा और विकास का एक शांत व अडिग शिल्पकार है, जहाँ हर मील का पत्थर संप्रभुता के रक्षक के रूप में भी अपनी पहचान बनाए रखता है।

1960 में स्थापित, सीमा सड़क संगठन भारत सरकार की प्रमुख सीमा इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंसी है। यह सुदूर और रणनीतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी का निर्माण और रखरखाव करता है। वर्ष 2015-16 से, बीआरओ पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य कर रहा है। इससे पहले, यह आंशिक रूप से सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अंतर्गत आता था।

बीआरओ की उपलब्धियों के मूल में इसके लोग हैं जो सैन्य अनुशासन और नागरिक शिल्प कौशल का एक अनूठा संगम है। यह संगठन दो मुख्य स्तंभों पर टिका है—जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (जीआरईएफ) और भारतीय सेना के इंजीनियर अधिकारी, जिन्हें आवश्यक नागरिक कर्मियों और कैजुअल पेड लेबरर्स (सीपीएल) का निरंतर सहयोग प्राप्त है।

मात्र दो परियोजनाओं—पूर्व में वर्तक और उत्तर में बीकन—के साथ अपनी शुरुआत करने वाला बीआरओ, आज 18 डायनामिक प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व कर रहा है।

•उत्तर पश्चिम भारत में 9 (जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान)

•उत्तर पूर्व और पूर्वी भारत में 8 (सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम, मेघालय)

•भूटान में एक

बीआरओ वर्तमान में 18 क्षेत्रीय परियोजनाओं का संचालन कर रहा है, जिनमें से प्रत्येक 11 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में स्ट्रेटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण और निष्पादन के लिए समर्पित है। बड़े पैमाने पर सड़कों, पुलों, सुरंगों और हवाई पट्टियों के साथ-साथ टेली-मेडिसिन केंद्रों के माध्यम से, बीआरओ एक्ट ईस्ट और वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम जैसी पहलों के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक विकास दोनों को सुदृढ़ कर रहा है।

अरुणाचल प्रदेश में, बीआरओ की वर्तक, अरुणांक, उदयक और ब्रह्मांक जैसी परियोजनाएं भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण सीमाओं पर  हैं। ये परियोजनाएं सिसेरी पुल, सियोम पुल, सेला टनल और नेचिपु टनल जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के माध्यम से दूर-दराज के गांवों को लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) से जोड़ती हैं।

लद्दाख के दुर्गम क्षेत्रों में हिमांक, बीकन, दीपक, विजयक और योजक जैसी परियोजनाएं कारगिल, लेह और काराकोरम क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण लाइफलाइन का काम कर रही हैं। ये परियोजनाएं श्रीनगर-लेह राजमार्ग, दारबुक-श्योक-डीबीओ (डीएस-डीबीओ) मार्ग, अटल टनल और निर्माणाधीन शिंकु ला टनल जैसे सामरिक मार्गों का न केवल रखरखाव करती हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र में बारहमासी संपर्क भी सुनिश्चित करती हैं।

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सिक्किम में स्वस्तिक, मिजोरम में पुष्पक, असम और मेघालय में सेतुक और नागालैंड और मणिपुर में सेवक जैसी परियोजनाएं क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को निरंतर सशक्त बना रही हैं। वहीं, देश की पश्चिमी सीमाओं पर जम्मू में संपर्क और राजस्थान में चेतक जैसी परियोजनाएं रणनीतिक आवागमन को नई ऊंचाइयां दे रही हैं।

हिमालय की ऊंचाइयों से परे, शिवालिक परियोजना उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के लिए भरोसेमंद और सुलभ मार्ग सुनिश्चित करती है, जबकि हीरक परियोजना छत्तीसगढ़ के वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में कनेक्टिविटी का विस्तार कर रही है।

अंततः, भूटान में कार्यरत बीआरओ की विदेशी शाखा दंतक, व्यापक सड़क, पुल और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के माध्यम से द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाती है। सामूहिक रूप से, ये सभी पहलें राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक तैयारी और क्षेत्रीय विकास के प्रति बीआरओ की अटूट प्रतिबद्धता का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती हैं।

बीआरओ ने सीमावर्ती राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास की गति को अभूतपूर्व रूप से तेज किया है। संगठन ऐसे रणनीतिक परिसंपत्तियों का निर्माण कर रहा है जो न केवल रक्षा तैयारियों को मजबूत करते हैं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक विकास, आपदा प्रबंधन क्षमता और क्षेत्रीय अखंडता को भी सुदृढ़ करते हैं।

वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 तक की पांच साल की अवधि के दौरान, रक्षा मंत्रालय ने जनरल स्टाफ (जीएस) सड़कों के लिए बीआरओ को लगभग ₹23,625 करोड़ आवंटित किए हैं। इस बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराई गई धनराशि ने अग्रिम क्षेत्रों में लगभग 4,595 किमी लंबी सड़कों के निर्माण को संभव बनाया है। विशेष रूप से उत्तरी सीमाओं पर कनेक्टिविटी में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। केवल वित्त वर्ष 2024-25 में ही, लगभग 769 किमी सड़क निर्माण का कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया है।

सुदूरवर्ती हापोली-सरली-हुरी रोड को पक्का करने और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की ओर जाने वाले संपर्क मार्गों का तीव्र विस्तार हुआ है।

लद्दाख: लद्दाख में प्रोजेक्ट विजयक ने अब तक 1,000 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों का जाल बिछाया है। यह परियोजना जोजिला दर्रे जैसे सामरिक रूप से संवेदनशील मार्गों की त्वरित बहाली सुनिश्चित करती है, जिससे पूरे वर्ष निरंतर संपर्क बना रहता है। यह पहल न केवल दुर्गम क्षेत्रों में नागरिकों की पहुंच को सुगम बनाती है, बल्कि चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य आवाजाही को भी अत्यधिक सशक्त करती है।

सिक्किम: सिक्किम में प्रोजेक्ट स्वास्तिक ने 1,000 किलोमीटर से अधिक सड़कों का जाल विकसित किया है और अब यह एनएच 310A/310AG जैसे नए राजमार्गों की योजना बना रहा है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य सिक्किम के दुर्गम इलाकों में बारहमासी संपर्क सुनिश्चित करना है, जिससे न केवल स्थानीय नागरिकों की पहुंच सुगम होगी, बल्कि चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में सैन्य आवाजाही भी बेहतर होगी।

पुल
अरुणाचल प्रदेश: वर्ष 2008 में स्थापित प्रोजेक्ट अरुणांक ने अब तक सुदूर घाटियों और अग्रिम क्षेत्रों में 1.18 किमी लंबे प्रमुख पुलों का निर्माण और रखरखाव किया है। सियोम पुल और सिसेरी नदी पुल जैसे निर्माण, लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स और सैनिकों की आवाजाही को और अधिक मजबूती प्रदान करते हैं।

लद्दाख: प्रोजेक्ट विजयक ने पूरे लद्दाख क्षेत्र में 80 से अधिक प्रमुख पुलों का निर्माण और रखरखाव किया है, जिससे अत्यधिक ऊंचाई वाले इन दुर्गम इलाकों में बारहमासी आवाजाही में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। विशेष रूप से, बीआरओ ने केवल 32 दिनों के रिकॉर्ड शीतकालीन बंद के बाद, 1 अप्रैल 2025 को जोजिला दर्रे को फिर से खोलकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।

सिक्किम: प्रोजेक्ट स्वास्तिक ने अब तक 80 प्रमुख पुलों का निर्माण किया है, जिनमें से 26 पुल पिछले एक दशक में ही पूरे किए गए हैं। ये निर्माण बाढ़ और ग्लेशियर फटने (जीएलओएफ) जैसी गंभीर प्राकृतिक चुनौतियों के बावजूद पूरे क्षेत्र में बारहमासी पहुंच सुनिश्चित करते हैं।

जम्मू-कश्मीर: बीआरओ के प्रोजेक्ट संपर्क के तहत निर्मित 422.9 मीटर लंबा देवक पुल एक महत्वपूर्ण सड़क संपर्क को सुदृढ़ करता है। यह पुल न केवल सैन्य आवाजाही और भारी वाहनों के आवागमन को सुगम बनाता है, बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को भी नई मजबूती प्रदान करता है। इसका उद्घाटन सितंबर 2023 में बीआरओ की 90 परियोजनाओं के एक बड़े पैकेज के हिस्से के रूप में किया गया था।

उत्तरी सिक्किम: प्रोजेक्ट स्वास्तिक के तहत, बीआरओ ने भारी बारिश और अचानक आई बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुए छह प्रमुख पुलों को अप्रैल 2024 तक बहाल कर दिया। इन पुलों के पुनर्निर्माण से क्षेत्र की महत्वपूर्ण जीवन रेखा फिर से स्थापित हो गई है, जो इस उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्र में नागरिकों की आवाजाही और सामरिक गतिविधियों की निरंतरता सुनिश्चित करती है।

सुरंग
हिमाचल प्रदेश: रोहतांग दर्रे के नीचे निर्मित 9.02 किमी लंबी अटल टनल, 10,000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग टनल है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उद्घाटित यह टनल, लेह-मनाली के बीच हर मौसम में निर्बाध संपर्क सुनिश्चित करती है।

अरुणाचल प्रदेश: 500 मीटर लंबी नेचिफू टनल बालीपारा-चारद्वार-तवांग मार्ग पर स्थित अत्यधिक कोहरे वाले नेचिफू दर्रे को बायपास करती है। यह टनल न केवल सुरक्षित, तीव्र और बारहमासी आवागमन सुनिश्चित करती है, बल्कि स्थानीय संपर्क और रणनीतिक सैन्य लॉजिस्टिक्स को भी बेहतर बनाती है।

अरुणाचल प्रदेश (तवांग क्षेत्र): 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित सेला टनल, अत्यधिक ऊंचाई वाले सेला दर्रे को बायपास करती है। यह सुरंग न केवल नागरिकों के लिए, बल्कि सैन्य आवाजाही के लिए भी तवांग तक निर्बाध और बारहमासी पहुंच सुनिश्चित करती है।

लद्दाख: दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी मार्ग पर स्थित 920 मीटर लंबी श्योक टनल, अत्यधिक चुनौतीपूर्ण और दुर्गम क्षेत्रों में भी पूरे वर्ष विश्वसनीयता के साथ पहुंच सुनिश्चित करती है।

वर्ष 2025 में, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक सड़कों, पुलों और सुरंगों के नेटवर्क का निरंतर विस्तार किया। इस पहल ने रक्षा और नागरिक आवाजाही के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बारहमासी पहुंच को सुदृढ़ किया है।

एयरफील्ड्स (हवाई पट्टियां)
पश्चिम बंगाल: 12 सितंबर 2023 को, रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह द्वारा राष्ट्र को समर्पित 90 बीआरओ इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के तहत, बागडोगरा और बैरकपुर एयरफील्ड्स (हवाई पट्टियों) का पुनर्निर्माण किया गया। ₹500 करोड़ से अधिक की लागत वाले इन कार्यों का मुख्य उद्देश्य भारतीय वायु सेना की ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करना, नागरिक संपर्क को बढ़ावा देना और पूर्वी क्षेत्र में सामरिक क्षमता का विस्तार करना है।

सीमा सड़क संगठन : त्वरित और प्रभावी राहत का आधार

सड़क सफाई और सर्दियों के मौसम में बर्फबारी के दौरान प्रबंधन

हर शीतकाल में पहाड़ अपने द्वार बंद कर लेते हैं, और हर बसंत में सीमा सड़क संगठन उन्हें खुलने पर विवश कर देता है। जोजिला से लेकर रोहतांग और सेला दर्रे तक, बीआरओ की टीमें बर्फ की ऊंची दीवारों को चीरकर सैनिकों, राहत दलों और आम नागरिकों के लिए जीवन रेखा बहाल करती हैं। वर्ष 2023 में बीआरओ ने उस वक्त नया इतिहास रचा, जब जोजिला दर्रे को रिकॉर्ड 16 मार्च को ही खोल दिया गया—मार्ग बंद होने के मात्र 68 दिनों के भीतर, जो अब तक का सबसे कम समय है। फिर से खुला हर दर्रा महज एक सड़क नहीं, बल्कि सुरक्षा, सप्लाई और जीवन रक्षा का सीधा मार्ग है।

बेली/मॉड्यूलर ब्रिज और कॉजवे
जब विनाशकारी बाढ़ संपर्क मार्ग बहा ले जाती है, तब सीमा सड़क संगठन नई उम्मीदों का सेतु बनाता है। मात्र चंद दिनों के भीतर तैयार होने वाले क्लास-70 बेली ब्रिज और मॉड्यूलर स्पैन, कटे हुए गाँवों को फिर से मदद और उम्मीदों से जोड़ देते हैं। वर्ष 2021 में, जब ऋषिगंगा की बाढ़ ने रैणी के पुल को नेस्तनाबूद कर दिया था, तब बीआरओ ने मात्र 26 दिनों में 200 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाकर संपर्क बहाल किया। इस पुल को ब्रिज ऑफ़ कम्पैशन (करुणा का सेतु) नाम दिया गया, जो पूरी तरह सार्थक है। उत्तराखंड से लेकर असम तक, ये तात्कालिक पुल केवल सामान

ढोने के मार्ग ही नहीं खोलते, बल्कि जीवन रक्षा और जीने की आस को एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचाते हैं।

आपातकालीन हवाई लॉजिस्टिक्स
उन्नत लैंडिंग ग्राउंड्स और हेलीपैड्स तक पहुंच बहाल करके, बीआरओ भारतीय वायुसेना को राहत सामग्री पहुँचाने और घायलों को सुरक्षित बाहर निकालने में सक्षम बनाता है। पूर्वोत्तर के पासीघाट, अलोंग और मेचुका से लेकर बाढ़ प्रभावित उत्तराखंड के हर्षिल और गौचर तक—जब-जब जमीन टूटी और रास्ते बंद हुए, बीआरओ ने आसमान के रास्ते खुले रखे ताकि मदद पहुँचती रहे।

सीमा सड़क संगठन भारतीय सेना, वायुसेना, एनडीआरएफ और विभिन्न राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर एक अभेद्य टीम के रूप में कार्य करता है। इसकी रोड ओपनिंग पार्टी एक अग्रिम दस्ते की भूमिका निभाती है, जो मलबे और बाधाओं को हटाकर सैनिकों, राहत दलों और आवश्यक सप्लाई के लिए रास्ता साफ करती है।

सीमा सड़क संगठन ने महत्वपूर्ण विदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के सफल कार्यान्वयन के माध्यम से भारत की क्षेत्रीय पहुँच को मजबूत करने में एक निर्णायक भूमिका निभाई है।

भूटान: बीआरओ का सबसे पुराना और स्थायी मिशन, प्रोजेक्ट दंतक, जिसे 1961 में लॉन्च किया गया था, ने आधुनिक भूटान की कनेक्टिविटी को एक नया आकार दिया है। प्रोजेक्ट दांतक ने न केवल सड़कों और पुलों का निर्माण किया है, बल्कि पारो और योनफुला जैसे प्रमुख हवाई अड्डों का विकास भी किया है। इसके अलावा, इसने दूरसंचार नेटवर्क और हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में सहयोग देकर भूटान के सामाजिक-आर्थिक विकास में सीधा योगदान दिया है, जो भारत-भूटान की गहरी साझेदारी का प्रतीक है।

म्यांमार / दक्षिण-पूर्व एशिया: बीआरओ ने भारत-म्यांमार मैत्री सड़क जैसी परियोजनाओं के माध्यम से क्षेत्रीय एकीकरण को आगे बढ़ाया है। 2001 में उद्घाटित यह 160 किमी लंबी सड़क भारत के मोरेह को म्यांमार के तामू  और कालेवा से जोड़ती है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

अफगानिस्तान: बीआरओ ने 218 किमी लंबे देलाराम-ज़ारंज राजमार्ग (रूट 606) का निर्माण किया, जिसने अफगानिस्तान को ईरान और चाबहार बंदरगाह तक सीधी पहुँच प्रदान की। इस परियोजना ने न केवल क्षेत्रीय व्यापार के विकल्पों को विस्तार दिया, बल्कि विकास-आधारित कूटनीति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को भी विश्व पटल पर प्रदर्शित किया।

ताजिकिस्तान: बीआरओ ने फारखोर व आयनी वायुसेना अड्डे का रणनीतिक पुनर्निर्माण किया, जिसमें रनवे का विस्तार, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम, हैंगर और नेविगेशन संबंधी अपग्रेड शामिल थे। इन परियोजनाओं ने न केवल भारत की रणनीतिक पहुँच को मजबूत किया, बल्कि एक भरोसेमंद क्षेत्रीय भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को भी और सुदृढ़ बनाया।

इन परियोजनाओं ने न केवल भारत की रणनीतिक पहुँच को मजबूती प्रदान की है, बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और सहयोग के क्षेत्र में एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को भी और अधिक सुदृढ़ किया है।

बीआरओ के पर्सपेक्टिव प्लान के तहत, सीमावर्ती क्षेत्रों में लगभग 27,300 किलोमीटर लंबी 470 सड़कों के निर्माण की योजना है। इसी कड़ी में, लगभग 717 किलोमीटर लंबी ट्रांस-कश्मीर कनेक्टिविटी परियोजना को एनएचडीएल (पेव्ड शोल्डर) मानकों के विकास के लिए मंजूरी दे दी गई है। पुंछ से सोनमर्ग तक जाने वाला यह मार्ग प्रमुख पर्वतीय दर्रों के माध्यम से रणनीतिक सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगा। इस मार्ग पर साधना पास, पी-गली, जेड-गली और राजदान पास पर अत्याधुनिक सुरंगों की योजना बनाई गई है, ताकि बारहमासी संपर्क सुनिश्चित किया जा सके। रक्षा मंत्रालय द्वारा वित्तपोषित यह परियोजना बीआरओ द्वारा चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। पूरा होने पर, यह अग्रिम संपर्क को बढ़ावा देने, अंतर-क्षेत्रीय आवाजाही में सुधार और इंटर-वैली लिंकेज को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कुल मिलाकर, यह परियोजना सैन्य तैयारियों और दीर्घकालिक क्षेत्रीय एकीकरण को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाएगा।

निष्कर्ष

छह दशकों से अधिक समय से, सीमा सड़क संगठन मजबूती, नवाचार और राष्ट्र निर्माण का एक बेमिसाल उदाहरण रहा है। लद्दाख के बर्फीले दर्रों से लेकर पूर्वोत्तर के घने जंगलों तक, दुनिया के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में कार्य करते हुए, बीआरओ ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करता है जो भारत की रक्षा तैयारियों को सशक्त बनाने के साथ-साथ दूरस्थ सीमावर्ती क्षेत्रों के जीवन को भी बदल रहा है।

भविष्य की ओर बढ़ते हुए, बीआरओ केवल सड़कों का ही नहीं, बल्कि विश्वास और संपर्क का निर्माण जारी रखेगा। यह राष्ट्र की सीमाओं को उसके हृदय स्थल से जोड़ते हुए सुरक्षा, आवाजाही और समृद्धि को अंतिम छोर तक पहुँचाना सुनिश्चित करेगा। अपने आदर्श वाक्य के अनुरूप, बीआरओ हमेशा या तो रास्ता ढूंढ लेगा या नया रास्ता बना देगा।

अमृत भारत एक्सप्रेस: किफायती लंबी दूरी की रेल यात्रा में क्रांतिकारी बदलाव

अमृत भारत एक्सप्रेस समावेशिता और व्यापकता पर स्पष्ट ध्यान केंद्रित करते हुए भारत के लंबी दूरी के रेल नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। किफायती किराया, व्यापक भौगोलिक पहुंच और यात्री-केंद्रित डिजाइन के संयोजन से यह आर्थिक एकीकरण और सामाजिक सामंजस्य के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आवागमन की जरूरतों को पूरा करती है। जैसे-जैसे नेटवर्क का विस्तार जारी रहेगा, अमृत भारत एक्सप्रेस देश भर में लोगों, क्षेत्रों और अवसरों को जोड़ने में एक स्थायी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

दिसंबर 2023 से 30 अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें चल रही हैं, जिनमें 9 नई सेवाएं जोड़ी गई हैं, जिससे देशभर में इनका विस्तार हुआ है। नॉन-एसी स्लीपर में लगभग 500 प्रति 1,000 किमी की दर से यात्रा की सुविधा उपलब्ध है, जिसमें कोई डायनामिक प्राइसिंग नहीं है, जिससे आम यात्री भी आसानी से यात्रा कर सकते हैं। नए रूट पूर्वोत्तर, पूर्वी, मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत को जोड़ते हैं, जिससे सीमावर्ती क्षेत्र, प्रमुख शहर और तीर्थस्थल आपस में जुड़ जाते हैं। रेल कनेक्टिविटी में सुधार से कई क्षेत्रों में रोजगार, पर्यटन, व्यापार और शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को बढ़ावा मिलता है।

भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना में रेल का लंबा और गहरा योगदान रहा है। इसने पीढ़ियों से यात्रियों को विशाल दूरियों और विविध भूभागों में यात्रा कराई है। किफायती जन परिवहन की जीवनरेखा के रूप में, भारतीय रेलवे ने लोगों, बाजारों और अवसरों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए सच है, जिनके लिए ट्रेन यात्रा कोई विकल्प नहीं बल्कि दैनिक आवश्यकता है। भारत की पहली रेल यात्रा के लगभग दो शताब्दियों बाद, भारतीय रेलवे लाखों लोगों के लिए आवागमन को बेहतर बना रहा है। आराम, सुविधा और विश्वसनीयता का विस्तार करते हुए, जो कभी मुख्य रूप से प्रीमियम सेवाओं से जुड़ी थीं, भारतीय रेलवे ने लगातार एक अधिक समावेशी परिवहन प्रणाली का निर्माण किया है। सुरक्षा और यात्री-केंद्रित दृष्टिकोण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इसी सोच के अनुरूप, अमृत भारत एक्सप्रेस रोज़ाना यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बनकर उभरी है। इसे अमृत काल की एक प्रमुख पहल के रूप में शुरू किया गया था। दिसंबर 2023 में इसके शुभारंभ के बाद से अब तक 30 अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें परिचालन में आ चुकी हैं और 9 अतिरिक्त सशुरू की जाने वाली हैं। ये मार्ग पूर्वी और उप-हिमालयी क्षेत्रों को दक्षिण, पश्चिम और मध्य भारत के प्रमुख गंतव्यों से जोड़कर संपर्क को मजबूत करेंगे। यह सभी के लिए किफायती, आरामदायक और विश्वसनीय यात्रा के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है।

अमृत भारत एक्सप्रेस भारतीय रेलवे द्वारा शुरू की गई एक आधुनिक, नॉन-एसी लंबी दूरी की स्लीपर श्रेणी की ट्रेन सेवा है, जिसका उद्देश्य विश्वसनीय, किफायती और आरामदायक यात्रा प्रदान करना है। इसे विशेष रूप से त्योहारों के मौसम और प्रवास के चरम समय के दौरान भारी यात्री संख्या को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है। लगभग 500 प्रति 1,000 किलोमीटर के किराए और छोटी और मध्यम दूरी की यात्राओं के लिए आनुपातिक रूप से कम किराए के साथ, यह सेवा एक सरल और पारदर्शी किराया संरचना का पालन करती है, जिसमें कोई गतिशील मूल्य निर्धारण नहीं है। दूरी और अवसरों से अक्सर अलग-थलग पड़े क्षेत्रों को जोड़ने के लिए, अमृत भारत एक्सप्रेस रोजगार, शिक्षा और पारिवारिक आवश्यकताओं के लिए यात्रा को बढ़ावा देती है। यह पूरे देश में किफायती लंबी दूरी की कनेक्टिविटी का विस्तार करने के भारत के निरंतर प्रयासों का एक हिस्सा है।

अमृत भारत ट्रेनें पूरी तरह से नॉन-एसी हैं, जिनमें 11 जनरल क्लास कोच, 8 स्लीपर क्लास कोच, 1 पैंट्री कार और 2 सेकंड क्लास-कम-लगेज-कम-गार्ड वैन हैं, जिनमें दिव्यांगजनों के लिए विशेष डिब्बे भी हैं। आम जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए डिज़ाइन और निर्मित इन ट्रेनों का उद्देश्य नॉन-एसी श्रेणी के यात्रियों को आधुनिक, आरामदायक और उच्च गुणवत्ता वाला यात्रा अनुभव प्रदान करना है।

नौ नई अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनों की शुरुआत से नेटवर्क का महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। इन नई सेवाओं का उद्देश्य लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करना और देश के प्रमुख क्षेत्रों में बढ़ती यात्री मांग को पूरा करना है। भारत के उत्तर-पूर्व की अष्टलक्ष्मी: कामाख्या-रोहतक अमृत भारत एक्सप्रेस द्वारा संचालित असम के एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र कामाख्या को हरियाणा के रोहतक से जोड़ने वाली यह अमृत भारत एक्सप्रेस उत्तर-पूर्व और उत्तरी भारत के बीच लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करती है।

यह सेवा असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में साप्ताहिक रूप से संचालित होती है, जो किफायती और आरामदायक यात्रा प्रदान करती है।
ट्रेन का समय:
.यह ट्रेन शुक्रवार को रात 10:00 बजे कामाख्या से प्रस्थान करती है और रविवार को दोपहर 2:45 बजे रोहतक पहुंचती है।
वापसी यात्रा रविवार को रात 10:10 बजे रोहतक से प्रस्थान करती है और मंगलवार को दोपहर 12:15 बजे कामाख्या पहुंचती है।
यह छह राज्यों के कई जिलों को सेवा प्रदान करती है और कामाख्या मंदिर और वाराणसी के गंगा घाटों जैसे स्थलों के पास से गुज़रती है, जिससे पहुंच, पर्यटन और क्षेत्रीय संबंधों को बढ़ावा मिलता है।
डिब्रूगढ़-लखनऊ अमृत भारत एक्सप्रेस: पूर्वोदय से भारत उदय की परिकल्पना को सशक्त बनाना
डिब्रूगढ़-लखनऊ अमृत भारत एक्सप्रेस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र और उत्तरी भारत के बीच एक महत्वपूर्ण रेल संपर्क स्थापित करती है।

यह असम के डिब्रूगढ़ से शुरू होती है और नागालैंड के दीमापुर से होकर गुजरती है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों को उत्तर प्रदेश से जोड़ती है।
यह मार्ग काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल), कामाख्या मंदिर, विक्रमशिला महाविहार, अयोध्या और लखनऊ सहित प्रमुख स्थलों के निकट से होकर गुजरता है।
तीर्थ केंद्रों और प्रमुख शहरों को जोड़ने से पर्यटन, स्थानीय व्यापार, छोटे व्यवसायों और रोजगार की गतिशीलता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
न्यू जलपाईगुड़ी-नागरकोइल अमृत भारत एक्सप्रेस: दुआर्स से नीलगिरी तक
पूर्वी हिमालय की तलहटी को देश के दक्षिणी छोर से जोड़ने वाली यह सेवा राष्ट्रीय एकता और लंबी दूरी की कनेक्टिविटी को मजबूत करती है।
यह भूटान और बांग्लादेश के निकट स्थित एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती केंद्र न्यू जलपाईगुड़ी को कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल से जोड़ती है।
यह सीमा से सटे क्षेत्रों, बंदरगाहों, औद्योगिक क्षेत्रों और भीतरी इलाकों को जोड़ने वाले एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण गलियारे पर साप्ताहिक सेवा के रूप में संचालित होती है।
यह दार्जिलिंग-दुआर्स, विशाखापत्तनम समुद्र तटों, मदुरै (मीनाक्षी मंदिर) और कोयंबटूर जैसे स्थलों के पास से गुजरती है, जिससे पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।
न्यू जलपाईगुड़ी-तिरुचिरापल्ली अमृत भारत एक्सप्रेस: दार्जिलिंग की तलहटी से शिक्षा केंद्र तक
यह सेवा पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार से तमिलनाडु के शिक्षा और मंदिर केंद्रों तक एक लंबी दूरी का रेल गलियारा बनाती है।
यह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी से शुरू होती है और इसे तिरुचिरापल्ली से जोड़ती है।
यह आगरा, प्रयागराज, भुवनेश्वर, कावेरी डेल्टा, तंजावुर और चेन्नई सहित कई स्थानों से होकर गुजरती है।
यह बाजारों, पर्यटन केंद्रों, शैक्षणिक संस्थानों और रोजगार केंद्रों तक पहुंच को मजबूत करती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा मिलता है।
अलीपुरद्वार-बेंगलुरु अमृत भारत एक्सप्रेस: सीमा-से-तकनीकी कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना

एक रणनीतिक सीमावर्ती जिले और भारत की प्रौद्योगिकी राजधानी के बीच सीधा रेल संपर्क प्रदान करने वाली यह सेवा पूर्व-दक्षिण संपर्क को बढ़ाती है।

•      भूटान के पास अलीपुरद्वार को एसएमवीटी बेंगलुरु से जोड़ने वाली साप्ताहिक सेवा।

•      ट्रेन का समय:
सोमवार को रात 10:25 बजे अलीपुरदुआर से प्रस्थान करती है।
शनिवार को सुबह 8:50 बजे बेंगलुरु से वापसी करती है।
पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के जिलों में सेवाएं प्रदान करती है, जिससे पर्यटन और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिलता है।

अलीपुरद्वार-मुंबई (पनवेल) अमृत भारत एक्सप्रेस: पूर्वोत्तर का मुंबई महानगर का प्रवेश द्वार

यह एक महत्वपूर्ण पूर्व-पश्चिम रेल गलियारा है जो उत्तरी बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र को मुंबई के उपनगरीय क्षेत्र से जोड़ता है।

पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को पार करते हुए अलीपुरद्वार को पनवेल से जोड़ने वाली साप्ताहिक सेवा।

• ट्रेन का समय:
ट्रेन गुरुवार की सुबह अलीपुरद्वार से रवाना होती है और शनिवार शाम तक पनवेल पहुंचती है।
वापसी यात्रा सोमवार को पनवेल से शुरू होती है और बुधवार को अलीपुरद्वार पर समाप्त होती है।
• यह दार्जिलिंग, त्रिवेणी संगम, चित्रकूट धाम और त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग सहित प्रमुख स्थलों तक पहुंच प्रदान करती है, जिससे पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
संतरागाछी-तांबरम अमृत भारत एक्सप्रेस: पूर्व-दक्षिण रेल संपर्क को सुदृढ़ बनाना
पूर्व-दक्षिण रेल संपर्क को सुदृढ़ बनाते हुए, यह सेवा पूर्वी भारत को दक्षिणी महानगरों और उपनगरीय क्षेत्रों से जोड़ती है।
यह मार्ग कोलकाता के पास स्थित संतरागाछी को चेन्नई के उपनगरीय केंद्र तांबरम से जोड़ता है।
इससे पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के जिलों को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और बाज़ारों तक बेहतर पहुंच प्राप्त करने में लाभ होता है।

यह मार्ग जगन्नाथ मंदिर, कोणार्क सूर्य मंदिर (यूनेस्को स्थल) और शोर मंदिर (यूनेस्को स्थल) जैसे दर्शनीय स्थलों के पास से गुजरता है, जिससे पर्यटन और क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है।
पूर्वी भारत को राष्ट्रीय राजधानी से जोड़ना: हावड़ा – आनंद विहार अमृत भारत एक्सप्रेस
यह सेवा पूर्वी भारत और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के बीच एक तेज़ और भरोसेमंद रेल संपर्क प्रदान करती है।
·  हावड़ा और दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल के बीच साप्ताहिक सेवा।
·  ट्रेन का समय:
o  ट्रेन गुरुवार को रात 11:10 बजे हावड़ा से प्रस्थान करती है और शनिवार को सुबह 2:50 बजे आनंद विहार पहुंचती है।
वापसी यात्रा के लिए ट्रेन शनिवार को सुबह 5:15 बजे आनंद विहार से प्रस्थान करती है और रविवार को सुबह 10:50 बजे हावड़ा पहुंचती है।
यह पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के प्रमुख जिलों में सेवाएं प्रदान करता है, जिससे रोजगार और प्रशासनिक केंद्रों तक पहुंच में सुधार होता है।

कोलकाता (सियालदह)-बनारस अमृत भारत एक्सप्रेस: आस्था का संगम-ज्योतिर्लिंग से गुरुद्वारा घाट तक
पूर्वी भारत और देश के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्रों में से एक के बीच संपर्क को मजबूत करना
कोलकाता के सियालदह को बनारस से जोड़ने वाली दैनिक सेवा।
ट्रेन का समय:
सियालदह से शाम 7:30 बजे प्रस्थान, अगले दिन सुबह 7:20 बजे बनारस आगमन।
वापसी यात्रा: बनारस से रात 10:10 बजे प्रस्थान, अगले दिन सुबह 9:55 बजे सियालदह आगमन।

यह ट्रेन बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग, तख्त श्री पटना साहिब, काशी विश्वनाथ मंदिर और सारनाथ जैसे तीर्थ स्थलों के पास से गुजरती है, जिससे धार्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा मिलता है।

ललित गर्ग को ‘पत्रकार शिरोमणि’ सम्मान

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं सामाजिक चिंतक ललित गर्ग को उनके चार दशकों से अधिक समय से जारी सृजनात्मक, मूल्यनिष्ठ और जनसरोकारों से जुड़े पत्रकारिता योगदान के लिए ‘पत्रकार शिरोमणि’ सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान जैन दर्शन, साहित्य और सामाजिक चेतना को समर्पित एक प्रतिष्ठित संस्था ‘श्रुतसेवा निधि न्यास’ के द्वारा 8 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में फिरोजाबाद क्लब लिमिटेड के सुसज्जित ऑडिटोरियम में आयोजित अक्षराभिषेक उत्सव समारोह में प्रदान किया जाएगा।
न्यास के महामंत्री श्री अमित कुमार जैन ने बताया कि न्यास का श्रीमती शांतिदेवी गुप्त श्रुतसेवा अलंकरण के अंतर्गत ‘पत्रकार शिरोमणि’ के रूप में श्री गर्ग को 25000/- रुपये की नगद राशि, सम्मान पत्र, शाॅल, माला, प्रशस्ति पत्र एवं साहित्य प्रदत्त किया जाएगा। इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से पत्रकार, साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं समाजसेवी कार्यकर्ता सहभागिता करेंगे। समारोह का उद्देश्य सहात्यि एवं पत्रकारिता के मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका को रेखांकित करना है।
ललित गर्ग पिछले 40 वर्षों से पत्रकारिता, साहित्य एवं लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं और राजधानी दिल्ली के एक विशिष्ट एवं सम्मानित बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। उन्होंने निर्भीक, विचारोत्तेजक और मूल्यपरक लेखन के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर जनचेतना को दिशा दी है। अब तक उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन किया है तथा उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। श्री गर्ग विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में वे सूर्यनगर एजुकेशनल सोसाइटी के कार्यकारी अध्यक्ष तथा सुखी परिवार फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। सुखी परिवार फाउंडेशन के माध्यम से गुजरात सहित विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी कल्याण, सामाजिक सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों से जुड़ी अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी लंबे समय से जुड़े रहे हैं और राष्ट्रवादी विचारधारा, सांस्कृतिक चेतना एवं सामाजिक समरसता को अपने लेखन और जीवन-कार्य के माध्यम से अभिव्यक्त करते आए हैं।
आयोजक संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार, ललित गर्ग को यह सम्मान उनकी सैद्धांतिक पत्रकारिता, साहित्यिक योगदान और सामाजिक प्रतिबद्धता के लिए प्रदान किया जा रहा है। समारोह को लेकर पत्रकारिता जगत एवं साहित्यिक क्षेत्र में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
प्रेषक
(बरुण कुमार सिंह)
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024,
मो. 9811051133, 9968126797

जिसे हम भूल गए उसे जापान ने सम्मान के साथ याद रखा

जिसे जापान अपना ‘भगवान’ मानता है, उसे भारत भूल गया! जापान के टोक्यो में एक भारतीय की मूर्ति लगी है और वहां के स्कूलों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है? लेकिन दुख की बात है कि हमारे देश में 99% लोग उनका नाम तक नहीं जानते।
कहानी एक ऐसे “शेर” की, जिसने पूरी दुनिया के सामने दहाड़ कर न्याय किया था!
वह दिन था 12 नवंबर, 1948। टोक्यो के बाहरी इलाके में एक विशाल बगीचेवाले घर में टोक्यो ट्रायल चल रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में हारने के बाद, जापान के तत्कालीन प्रधान मंत्री तोजो सहित 55 जापानी युद्धबन्दियों के मुकदमे की सुनवाई हो रही थी
इनमें से 28 लोगों की पहचान क्लास-ए (शांतिभंग का अपराध) युद्ध अपराधियों के रूप में की गई है। यदि सिद्ध ह़ो जाता है, तो एकमात्र सजा “मृत्युदण्ड” थी
दुनिया के 11 दिग्गज जज बैठे थे। जिनमें से एक जज भारतीय था। अमेरिका और ब्रिटेन का दबाव था। 10 जजों ने एक सुर में कहा— “जापान के कैदियों को फांसी दो!” दुनिया भर से चुने गए अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधीश …… “दोषी” की घोषणा कर रहे हैं …. “दोषी” …… “दोषी” ………
लेकिन तभी एक गूँज उठी— “NOT GUILTY” (दोषी नहीं!) दालान में सन्नाटा छा गया। यह दहाड़ एक भारतीय की थी— जस्टिस राधा बिनोद पाल! ⚖️
1886 में पूर्वी बंगाल के कुंभ में उनका जन्म हुआ। उनकी माँ ने अपने घर और गाय की देखभाल करके जीवन यापन किया। बालक राधा बिनोद गांव के प्राथमिक विद्यालय के पास ही गाय को चराने ले जाता था।
जब शिक्षक स्कूल में पढ़ाते थे, तो राधा बाहर से सुनता था। एक दिन स्कूल इंस्पेक्टर शहर से स्कूल का दौरा करने आये। उन्होंने कक्षा में प्रवेश करने के बाद छात्रों से कुछ प्रश्न पूछे। सब बच्चे चुप थे। राधा ने कक्षा की खिड़की के बाहर से कहा …. “मुझे आपके सभी सवालों का जवाब पता है।” और उसने एक-एक कर सभी सवालों के जवाब दिए। इंस्पेक्टर ने कहा … “अद्भुत! .. आप किस कक्षा में पढ़ते हो ?”
जवाब आया, “… मैं नहीं पढ़ता … मैं यहां एक गाय को चराता हूं।”
जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। मुख्याध्यापक को बुलाकर, स्कूल निरीक्षक ने लड़के को स्कूल में प्रवेश लेने के साथ-साथ कुछ छात्रवृत्ति प्रदान करने का निर्देश दिया।
इस तरह राधा बिनोद पाल की शिक्षा शुरू हुई। फिर जिले में सबसे अधिक अंकों के साथ स्कूल फाइनल पास करने के बाद, उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज में भर्ती कराया गया। M. Sc.गणित होने के बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से, उन्होंने फिर से कानून का अध्ययन किया और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। दो चीजों के विपरीत चुनने के संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, “कानून और गणिता सब के बाद इतने अलग नहीं हैं।”
फिर से वापस आ रहा है… अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय टोक्यो।
बाकी न्यायाधीशों के प्रति अपने ठोस तर्क में उन्होंने संकेत दिया कि मित्र राष्ट्रों (द्वितीय विश्व युद्ध के विजेता) ने भी संयम और अंतरर्राष्ट्रीय कानून की तटस्थता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों को अनदेखा करने के अलावा, उन्होंने परमाणु बमबारी का उपयोग कर लाखों निर्दोष लोगों को मार डाला।
राधा बिनोद पाल द्वारा बारह सौ बत्तीस पृष्ठों पर लिखे गए तर्क को देखकर न्यायाधीशों को क्लास-ए से बी तक के कई अभियुक्तों को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। इन क्लास-बी युद्ध अपराधियों को एक निश्चित मौत की सजा से बचाया गया था। अंतर्राष्ट्रीय अदालत में उनके फैसले ने उन्हें और भारत को विश्व प्रसिद्ध प्रतिष्ठा दिलाई।
जापान इस महान व्यक्ति का सम्मान करता है। 1966 में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान *’कोक्को कुनासाओ’* से सम्मानित किया। टोक्यो और क्योटो में दो व्यस्त सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। उनके निर्णय को कानूनी पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा लगाई गई है। 2007 में, प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने दिल्ली में उनके परिवार के सदस्यों से मिलने की इच्छा व्यक्त की और वे उनके बेटे से मिले।
डॉ. राधा बिनोद पाल (27 जनवरी 1886 – 10 जनवरी 1967) का नाम जापान के इतिहास में याद किया जाता है। जापान के टोक्यो में, उनके नाम एक संग्रहालय और यासुकुनी मंदिर में एक मूर्ति है।
उनके नाम पर जापान विश्वविद्यालय का एक शोध केंद्र है। जापानी युद्ध अपराधियों पर उनके फैसले के कारण, चीनी लोग उनसे नफरत करते हैं।
वे कानून से संबंधित कई पुस्तकों के लेखक हैं। भारत में लगभग कोई भी उन्हें नहीं जानता है और शायद उनके पड़ोसी भी उन्हें नहीं जानते हैं! इरफान खान अभिनीत टोक्यो ट्रायल्स पर एक हिंदी फिल्म बनाई गई थी, लेकिन उस फिल्म ने कभी सुर्खियां नहीं बटोरीं।
बहुत सारे अंडररेटेड और अज्ञात भारतीयों में से एक। क्या आपको लगता है जस्टिस पाल को भारत रत्न मिलना चाहिए