इस बार ग्रैमी अवॉर्ड्स में वैदिक ऋचाओं की धारा सम्मानित
अश्लील सामग्री मुक्त भारत बनाने के लिए केंद्र लाए कड़ा कानून : प्रो.द्विवेदी
प्रो. द्विवेदी ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि सूचना कोई भी दे सकता है , किंतु खबर या समाचार के साथ भरोसा जुड़ा हुआ है। संपादन और निश्चित प्रक्रिया से गुजर कर ही कोई सूचना ‘समाचार’ बनती है। एक समाचार में बहुत सी सूचनाएं शामिल हो सकती हैं। किंतु कोई भी समाचार संपादन और प्रोसेस के बाद ही बन सकता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर संपादन मुक्त सूचना का अंबार है, ये लोग सूचना प्रदाता हो सकते हैं, पत्रकार नहीं। पत्रकारिता एक जिम्मेदारी भरा काम है। इसलिए सोशल मीडिया पर मचे धमाल के लिए पत्रकारिता को लांछित नहीं किया जाना चाहिए।
विश्वसनीयता और प्रामाणिकता जरूरी:
प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि यह समय तीन ‘वी’ का है -वीडियो, वायस और वर्नाकुलर। डिजिटल समय ने हमें वैश्विक आकाश दिया है। आज हमारी भारतीय भाषाओं डिजिटल माध्यमों से वैश्विक प्रवास करते हुए प्रसिद्ध प्राप्त कर रही हैं। लिपि का संकट न होने के कारण हमारे गीत, संगीत, विचार, समाचार सब दुनिया भर में सुने और देखे जा रहे हैं।
डिजिटल मीडिया के महत्व को समझाते हुए कहा प्रो.द्विवेदी ने कहा कि अभी फिक्की की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2023 में भारत में प्रिंट मीडिया का रेवेन्यू मात्र 9 प्रतिशत बढ़ा है तो डिजिटल मीडिया का रेवेन्यू 67 प्रतिशत बढ़ा है। देश में प्रिंट मीडिया के पाठकों में 13 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है तो डिजिटल मीडिया में 71 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2025 तक भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग 98 करोड़ होने की संभावना है। अगर देश में 98 करोड़ स्मार्टफोन हैं तो समझिए डिजिटल मीडिया के 98 करोड़ उपभोक्ता पहले दिन से तैयार हैं।
सूर्य मंदिरों का ये रहस्य जानकर आप अपने पूर्वजों पर गर्व करेंगे
सूर्य इस शब्द मे ही गूढता भरी हुई है. इक्कीसवी सदी का एक चौथाई हिस्सा समाप्त हो रहा है, फिर भी सूर्य का आकर्षण और सूर्य संबंधी ज्ञान / अज्ञान, आज भी वैसा ही है, जैसा हजारों वर्षों पहले था..!
मानव के जाती के उन्नती और उत्क्रांती के काल मे विश्व के लगभग सभी समूह प्रकृती को पूजते थे. दक्षिण अमेरिका की इन्का / माया संस्कृति हो, ग्रीक और इजिप्शियन सभ्यता हो, या रोमन, हिंदू और चिनी परंपरा… इन सभी सभ्यताओं में और इन सभी स्थानों पर, प्रकृती पूजन के साथ सूर्य की भी पूजा होती थी. उस प्रारंभिक काल मे तत्कालीन मानव जाती को यह समझ मे आया होगा, कि हमे मिलने वाली ऊर्जा सूर्य से मिलती है. दिन और रात, और ऋतू और मौसम मे बदलाव भी सूर्य के कारण होते है. इसलिये अलग – अलग नामो से, अलग – अलग पद्धती से, सूर्य देवता की उपासना सब जगह होती रही. युरोपियन्स ने इन प्रकृती पूजकों को ‘पेगन’ यह लेबल लगाया था. यह तुच्छता दर्शक और उनको हीन समझनेवाला शब्द था.
भारत मे भी सूर्य की उपासना अनादी काल से हो रही है. यजुर्वेद मे एक सुक्त है- ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ (7/42).
अर्थात, सूर्य को सभी जड, चेतन पदार्थों का आत्मा कहा गया है. शुक्ल यजुर्वेद मे ‘सूर्य सूक्त’ या ‘मित्र सुक्त’ इस शीर्षक से कुल 17 श्लोक दिये है. भारत मे होने वाली सूर्य पूजा यह केवल किसी अनाकलनीय प्रकृती भगवान की पूजा नही है, तो सूर्य के सभी तत्व और गुणधर्म की जानकारी होते हुए की गई उपासना है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल मे 527 से 599 सूक्त, सूर्य के वर्णन करने वाले सूक्त है. इसमे सूर्य के सप्तवर्णी (सात रंग के) किरण होते है,ऐसा स्पष्ट उल्लेख है. इसीलिए भारत में प्राचीन समय से सूर्यदेवता के जो मंदिर है, उनमे यह वैज्ञानिक जानकारी कूट-कुटकर भरी है. उसमे से कुछ ही हम ‘डीकोड’ कर सके हैं. बाकी बची हुई प्रचुर जानकारी, अभी भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है.
भारत की इस सूर्य पूजा परंपरा को प्राचीन समय मे अनेक देशों ने अपनाया. सूर्य का संस्कृत में नाम है ‘मित्र’. हमारे बारा सूर्य नमस्कारों का प्रारंभ ही ‘ओम मित्राय नमः’ से होता है. सूर्य का यह ‘मित्र’ नाम, इजिप्शियन संस्कृती से लेकर युरोप तक, कई स्थानों पर मिलता है. जर्मनी में फ्रॅन्कफर्ट के पास ‘झालबर्ग’ नाम के रोमन कालीन किले मे एक संग्रहालय है. उसमे पहले / दूसरे सदी के सूर्यदेवता की प्रतिमा मे, सूर्य के लिए, ‘मित्रा’ शब्द का प्रयोग किया गया हैं. मित्रा या सूर्य इस शब्द का और उस देवता के पूजा का संबंध भारत के साथ स्पष्ट रूप से दिखाया है.
प्राचीन समय में विशाल, एकसंघ और अखंड भारत में सूर्य के अनेको मंदिर थे. बादमे इस्लामी आक्रमकोंकी ‘बुत शिकन’ मानसिकता के कारण इनमे से अधिकतम मंदिर गिराये गये. ध्वस्त किये गये. उनमे से कुछ ही मंदिरों का पुनर्निर्माण हो सका.
जिस सबसे प्राचीन सूर्य मंदिर का उल्लेख इतिहास मे आता है, वह आदित्य सूर्य मंदिर आज के पाकिस्तान के मुलतान मे है. इस सूर्य मंदिर का उल्लेख ग्रीक सेनानी ‘एडमिरल स्कायलेक्स’ ने किया है. एडमिरल स्कायलेक्स, ईसा पूर्व वर्ष ५१५ मे इस क्षेत्र मे आया था. उन दिनों मुलतान यह ‘काश्यपपूर’ इस मूल नाम से जाना जाता था. यह मंदिर कम से कम, 5000 वर्ष पुराना होगा,ऐसी मान्यता है. उसके बाद आये चिनी प्रवासी ह्युएन त्सांग ने वर्ष 641 मे इस मंदिर को भेट दी. वे लिखते है, ‘यह आदित्य मंदिर अत्यंत भव्य और विपुलता से भरा हुआ है. इसमे सूर्यदेवता की प्रतिमा सोने की बनी हुई है. वह मौल्यवान और दुर्लभ रत्नोंसे अलंकृत है.’
आगे चल कर अल् बिरुनी इस अरब इतिहासकार ने ग्यारहवी सदी मे किये हुए मुलतान यात्रा मे इस मंदिर का उल्लेख किया है. आठवी सदी मे, अर्थात, वर्ष 712 मे उम्मयाद साम्राज्य के तत्कालीन खलिफा ने, मोहम्मद बिन कासीम को सिंध प्रांत पर आक्रमण करने भेजा. इस मोहम्मद बिन कासीम ने राजा दाहीर को इस युद्ध मे परास्त करके, मुलतान समेत लगभग पूरा सिंध प्रांत अपने अधिपत्य मे ले लिया. तब उसके ध्यान मे आया की मुलतान का आदित्य मंदिर और उसके आसपास लगने वाला बाजार, यह उसके कमाई का बडा साधन बन सकता है. इसलिये उसने यह मंदिर तोडा नही, वैसे ही रहने दिया. इस मंदिर से मिलने वाला राजस्व, उसके लिए मोटी तगडी कमाई था. बाद में जब आसपास के क्षेत्र के हिंदू राजा मुलतान पर आक्रमण करके मुस्लिम आक्रांताओंको खदेडने आते थे, तब यह कासिम धौंस देता था, कि ‘मुलतान पर आक्रमण करोगे तो याद रखो, तुम्हारा आदित्य सूर्य मंदिर मै ध्वस्त कर दूंगा.’
उस समय इस सूर्य मंदिर की प्रसिद्धी इतनी जबरदस्त थी, कि यह मंदिर ध्वस्त ना हो इसलिये हिंदू राजा मुलतान पर आक्रमण करने से डरते थे. अर्थात, इस आदित्य मंदिर को बंधक रख कर, मोहम्मद बिन कासीम ने अनेक वर्षों तक बिना युद्ध किये समूचे सिंध प्रांत पर राज किया.
सन 1026 मे मोहम्मद गजनी ने इस मंदिर को पूर्णतः ध्वस्त किया. ऐसा कहते है, इस मंदिर में सूर्य के बारे मे अनेक रहस्यमय जानकारी विविध मूर्ती और ‘विशिष्ट रचना’ द्वारा दर्शायी गयी थी. ‘सांब पुराण’ मे इस मंदिर का उल्लेख है.
आज के हमारे खंडित भारत मे भी अनेक छोटे – बडे सूर्य मंदिर है. यह सूर्य मंदिर, हमारे पुरखों को सूर्य सृष्टी के संबंध में जो जानकारी थी, वो हमारे सामने रख रहे है. इन मंदिरो में, पूर्व दिशा मे ओडीशा मे कोणार्क का सूर्य मंदिर, उत्तर मे जम्मू-काश्मीर स्थित मार्तंड सूर्य मंदिर, और पश्चिम में गुजरात में मोढेरा का सूर्य मंदिर, यह तीन सूर्य मंदिर एक त्रिकोण बनाते है.
इनमे से जम्मू-काश्मीर राज्य मे अनंतनाग के पास स्थित ‘मार्तंड सूर्य मंदिर’ यह आठवी सदी मे, वर्ष 764 मे बनाया गया था. कार्कोट वंश के चंड प्रतापी राजा ‘ललितादित्य मुक्तापीड’ ने इस मंदिर का निर्माण किया. इसके लिये ललितादित्यने काश्मीर की उंचाई पर स्थित ऐसी समतल भूमि का चयन किया, जहांसे पुरा प्रदेश अच्छे से दिख सके. अत्यंत भव्य ऐसे इस सूर्य मंदिर मे, अनेक खगोलशास्त्रीय घटनाये और सूत्र उकेरे गये थे.
लेकिन पंद्रहवी सदी के प्रारंभ मे, सिकंदर शाह मिरी इस क्रूरकर्मा अफगान शासक ने यह मंदिर ध्वस्त किया. ढहा दिया. इस कारण, बडे पैमाने पर खगोलशास्त्रीय इतिहास भी मंदिर के मलबे मे दब गया.
गुजरात मे मोढेरा का सूर्य मंदिर यह उसके बाद बनाया गया मंदिर है. वर्ष 1026 – 27 में, आज के गुजरात के मेहसाणा जिले में, चालुक्य राजवंशके भीम राजा (प्रथम) ने इस मंदिर का निर्माण किया. हो सकता है, कि इस जगह पर कोई छोटा सूर्य मंदिर होगा और राजा भीम (प्रथम) ने भव्य रूप से उसका पुनर्निर्माण किया हो. उन दिनों, पुष्पावती नदी के किनारे का यह स्थान, खगोलशास्त्रीय दृष्टी से सटीक था, इसलिये इस जगह का चयन किया गया. रहस्य से भरा मंडप, सभा मंडप और बीचोंबीच पानी का कुंड, ऐसी इस मंदिर की रचना है. यह मंदिर पूर्वाभिमुख है.
इस मंदिर की विशेषता यह हैं, कि यह मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है. इस मंदिर के अक्षांश – रेखांश है- 23″ 58′ – 72″ 13′.
आजसे एक हजार वर्ष पूर्व, उस जमाने के मंदिर निर्माताओंने, ठीक कर्क रेखापर मंदिर कैसे बनाया होगा, यह एक आश्चर्य हैं..!
इस मंदिर के गर्भगृह की रचना ऐसी है कि, दिन और रात जब समान होते हैं, उस दिन, अर्थात 21 मार्च और 23 सितंबर को, जब सूर्य विषुववृत्त को पार करता हैं, तब सूर्य की पहली किरण, गर्भगृह की सूर्य प्रतिमा को प्रकाशित करती है. वैसे ही, वर्ष का सबसे बडा दिन और सबसे बडी रात जब होती है, तब इस मंदिर की छाया नही होती. (अभी इस मंदिर मे सूर्य देवता की मूर्ती नही है). मंदिर पर अनेक प्रकार की मूर्तियां और आकृतियां उकेरी गयी है. इसमे सूर्य मालिका और पंच महाभूतोंका (वायू, पृथ्वी, आकाश, अग्नी, जल) संबंध (relation) बताया है. यह मंदिर 52 स्तंभोंपर खडा है. यह स्तंभ, वर्ष के 52 सप्ताहोंका प्रतिनिधित्व करते है.
भारत के प्रसिध्द सूर्य मंदिरोंके त्रिकोण का तिसरा मंदिर है, ओडिशा में, कोणार्क का सूर्य मंदिर. तुलना से सबसे नया मंदिर यही है. यह मंदिर बहुत प्राचीन होगा. नौवी सदी के इस मंदिर के अनेक संदर्भ मिलते है. बादमे यह मंदिर भव्य रूप मे फिर से बनाया गया होगा.
तेरहवी सदी के भारत में इस्लामी आक्रांताओंका प्रवेश हुआ था. बख्तियार खिलजीने नालंदा और अन्य विश्वविद्यालय ध्वस्त किए थे. परंतु भारत के पूर्व किनारे पर इन आक्रांताओंका आतंक अभी प्रारंभ नही हुआ था. उत्कल प्रांत में अभी भी हिंदू राजाओ का राज था. पूर्ब गांग (रुधी गांग या प्राच्य गांग) राजवंशका राज चल रहा था. इस राज वंश के नरसिंह देव (प्रथम) ने वर्ष 1250 में, समुद्र किनारे, कोणार्क का सूर्य मंदिर स्थापित किया.
कोणार्क का पूर्व में नाम ‘कैनपरा’ था. सातवी – आठवी सदी तक यह पूर्वी दिशा के देशों के साथ व्यापार करने वाला एक बंदरगाह था. लेकिन सूर्य मंदिर के कारण इसका नाम कोणार्क हुआ. कोणार्क का अर्थ होता हैं, कोण + अर्क. संस्कृत में सूर्य को ‘अर्क’ कहा जाता है. इसलिये ‘सूर्य मंदिर के कारण तयार हुआ कोण’, ऐसा इसका मोटे तौर पर अर्थ होता है.
यह मंदिर अति भव्य स्वरूप मे बनाया गया था. आज इस मंदिर के जो भग्नावशेष दिखते है, उससे इसके भव्य रूप की कल्पना हम कर सकते है. सात घोडों के रथमे भगवान सूर्य देवता बैठे है, ऐसा इस मंदिर का स्वरूप है. और रथ भी कितना बडा? तो कुल 24 बडे पहियों का रथ, 12 – 12 पहिये दोनो तरफ…!
इस रथ को जो सात घोडे जोडे है, वे सूर्यकिरण के सात रंगों का प्रतीक है. ऋग्वेद मे इसका स्पष्ट उल्लेख है. इन्हे सप्ताह के सात दिनों का प्रतीक भी मान सकते है. इस मंदिर की वास्तुकला यह स्वतंत्र अध्ययन का विषय है. संपूर्ण मंदिर केवल और केवल पत्थरोंसे बनाया हुआ है. कहीं पर भी चुना, मिट्टी का उपयोग नही है. ये पत्थर भी कम से कम 35 किलोमीटर दूर से लाये गये है. मंदिर में अनेक भूमितीय आकार और आकृतीयां बनी हुई है. भूमिती, खगोलशास्त्र और अध्यात्म का अद्भुत संगम, सुंदर मिलाफ इस मंदिर मे दिखाई देता है.
ये सूर्य मंदिर होने के कारण इसमे खगोलशास्त्र की जानकारी और कुछ बारीकियां दिखती होगी यह स्वाभाविकही है. मंदिर के रथ को जो 24 पहिये लगे है, वह विशेष है, और उनमे कुछ रहस्यमय अर्थ छुपा है. रथ का पहिया यह सूर्य घडी (Sun Dial) है. दुनिया की यह एक मात्र सूर्य घडी है जो वर्टिकल है. दुनिया मे अनेक स्थानो पर सूर्य घडी है, जो दिन का समय दिखाती है. लेकिन वे सब हॉरिजॉन्टल है. कुछ वर्षों के बाद जयपुर के सवाई जयसिंह ने निर्माण किये हुए जंतर-मंतर मे जो सूर्य घडी है, वह भी हॉरिजॉन्टल ही है. दिन में, विशिष्ट समय पर सूर्य की जो छाया आती हैं, उसके अनुसार समय बताने की सुविधा सूर्य घडी मे होती है.
कोणार्क मंदिर के रथ के पहिये भी ऐसे ही अचूक, सटीक और सही समय दिखाते है. इसके हर पहिये मे आठ बड़े आरे (spoke) रहते है. यह आठ आरे, दिन के आठ प्रहरोंको दिखाते है. कुछ दशक पहले तक, अपने यहां कालमापन के लिये ‘प्रहर’ को इकाई माना जाता था. एक प्रहर तीन घंटों का होता है. लेकिन इन आठ आरीयोंके बीचोंबीच एक छोटी सी (पतली सी) आरी होती है. अर्थात एक प्रहर के दो भाग किये है. हर भाग देढ घंटे का हैं, अर्थात नब्बे मिनिट का.
इसमे एक और मजेदार बात है. जो आठ छोटे आरे है, उन पर तीस मणी, समान अंतर पर लगाए गए है. अर्थात, नब्बे मिनिट भागीत 30 करने पर, एक मणी की किमत तीन मिनिट होती है. मणी भी पूर्णतः गोल आकार के नही है. इलिप्टीकल है. उनकी रचना ऐसी हैं, की उन पर पड़ने वाली छाया के अनुसार उनके भी तीन भाग होते है. इसका अर्थ, अब इस सूर्य घडी के कालमापन की सबसे छोटी इकाई हैं, एक मिनिट.
अब उस पहिये के अक्ष (केंद्र बिन्दु) पर एखाद छोटी छडी रखने के बाद, उस बारीक छडी से, पहिये पर पडने वाली सूर्यप्रकाश की छाया से हमे दिन का बिलकुल सही समय मिलता है.
अब यह प्रश्न मन मे आता है की, सूर्य का प्रवास तो छह महिने उत्तरायण और छह महिने दक्षिणायन मे होता है. ऐसी स्थिती मे, कालमापन कैसे होगा? इसलिये रथ के दोनो तरफ पहिये है. रथ की दिशा इस प्रकार रखी गई है की उत्तरायण मे एक तरफ के पहिये से समय देखना है, तो दक्षिणायन मे दुसरी तरफ के पहियेसे.
कितना अद्भुत है यह…..!
775 वर्ष पूर्व, हमारे पूर्वजोंने इतनी कुशलता से इस सूर्य घडी की रचना की है, की जैसे लगता है आज के जमाने के दिवार के घडी मे हम समय देख रहे है. हमारे पूर्वज कितने परिपूर्णवादी (perfectionist) थे इसका और क्या प्रमाण चाहिये?
कोणार्क के रथों के पहिये से, दिन का समय हम जान सकते है, यह भी हमे बहुत बाद में पता चला. कुछ वर्ष पूर्व, एक साधू, एक पतली लकडी लेकर रथों के पहियों पर आई हुई छाया से कुछ देख रहा था. उससे लोगों को पता चला की इससे हम समय देख सकते है.
लेकिन यह समय केवल सूर्य के प्रकाश मे ही देखना संभव हैं. रात का क्या? तो कहा जाता है की रथ के इन्ही पहियों मे चंद्रमा घडी भी छुपी हुई है. इस चंद्र घडी का उपयोग करके, रात का समय भी निकाल सकते है. सूर्य घडी के लिए केवल दो पहिले आवश्यक होते है. बाकी 22 पहियों का क्या काम? क्योंकि प्रत्येक पहिये पर की गई नक्काशी अलग – अलग है. दिन और रात के हर प्रहर मे लोगों की दिनचर्या क्या होती है, ये उन पर रेखांकित किया गया है. दुर्भाग्य से इस चंद्र घडी को ‘डीकोड’ करना, हमे आज भी साध्य नही हुआ है. वह अभी तक एक रहस्य ही है.
ये सभी सूर्य मंदिर भारत के विशाल पट पर जिस पद्धती से निर्माण किये गये है, वो पध्दती, वो पैटर्न, हमे कुछ बताना चाहते है. हमारे दुर्भाग्य से पूर्वजों की यह रहस्यमय भाषा हम आज भी ठीक से समझ नही पाए है.
एक उदाहरण देता हूं….
मध्य प्रदेश के सागर जिले में, रहली नाम का एक छोटा गाव है. मराठी भाषिक लोगों के लिए इसका खास महत्व है. सागर के गोविंदपंत (खेर) बुंदेला के मृत्यु के पश्चात, खेर परिवार की एक व्यक्ती, लक्ष्मीबाई खेर ने, वर्ष 1790 में, रहली मे विठ्ठल भगवान के एक सुंदर मंदिर का निर्माण किया. इसलिये रहली को, मराठी भाषिक ‘प्रति पंढरपूर’ कहते है.
किंतु रहली का महत्व इससे अलग है. इस रहली में, सुनार और देहार नदियों के संगम पर एक छोटासा और उपेक्षित ऐसा प्राचीन सूर्य मंदिर है. इस मंदिर की विशेषता यह है, कि कर्क वृत्त पर निर्मित यह मंदिर, मोढेरा और कोणार्क, इन दो मंदिरों के बिल्कुल बीच मे बना है. जी हां… एकदम बीचोंबीच. बिल्कुल मध्य मे. अक्षांश – रेखांश देखकर हम समझ सकते है.
कोणार्क मोढेरा रहेली
19″53′ 23″58′ 23″37′
86″05 72″13′ 79″06′
रेखांश का गणित देखिये.
कोणार्क 86″05′ – मोढेरा 72″13′ = 13″92′
इसको अगर दो से भागित किया, तो उत्तर हैं, – 6″96′
अब मोढेरा के रेखांश मे ये जोडे तो,
72″13 + 6″96′ = 79″09′
रहेली के सूर्य मंदिर के ये रेखांश है.
अक्षांश – रेखांश को कुछ देर के लिए छोड भी दे, तो भी मोढेरा और कोणार्क का वायू अंतर (air distance), या सेना की भाषा मे ‘क्रो फ्लाय डिस्टन्स’, निकाला तो हम देखते हैं, की बिलकुल मध्य मे यह रहेली का, उपेक्षित ऐसा छोटासा सूर्य मंदिर आता है.
हजारों वर्ष पूर्व, हमारे पूर्वजों के पास पृथ्वी की दूरी नापने की क्या पद्धती रही होगी, जिससे इन सूर्य मंदिर की रचना की होगी?
ये सब अनाकलनीय और रहस्य से भरा है. हमारे पुरखो का खगोलशास्त्र का ज्ञान जबरदस्त था. मंदिरों की रचाना और मूर्तियों के माध्यम से यह ज्ञान, हमारे सामने रखने का प्रयास भी किया है.
और हम आधुनिकता का डंका बजाने के बाद भी, हमारे प्राचीन ज्ञान को, हमारे संचित को, हमारी विरासत को ठीक से समझ ही नही पाए है..!
प्राकृत और पालि भाषा हमेशा से क्लासकल थीं : घोषित आज हुईं हैं


रेपो दर में कमी के साथ ही भारत में ब्याज दरों के नीचे जाने का चक्र प्रारम्भ
भारतीय रिजर्व बैंक के नवनियुक्त अध्यक्ष श्री संजय मल्होत्रा ने अपने कार्यकाल की प्रथम मुद्रानीति दिनांक 7 फरवरी 2025 को घोषित की। अभी तक प्रत्येक दो माह के अंतराल पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा घोषित की गई मुद्रा नीति के माध्यम से लिए गए निर्णयों का देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने में विशेष योगदान रहा है। हालांकि पिछले लगभग 5 वर्षों में रेपो दर में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है। मई 2020 में अंतिम बार रेपो दर में वृद्धि की घोषणा की गई थी। इसके बाद घोषित की गई 29 मुद्रा नीतियों में रेपो दर को स्थिर रखा गया है और यह अभी भी 6.5 प्रतिशत के स्तर पर कायम है। परंतु,अब फरवरी 2025 माह में घोषित की गई मुद्रा नीति में रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं की कमी करते हुए इसे 6.50 प्रतिशत से 6.25 प्रतिशत पर लाया गया है। केंद्र सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक को देश में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रण में रखने हेतु मेंडेट दिया गया है और इस मेंडेट पर ध्यान रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में रखने में सफलता भी पाई है। परंतु, वित्तीय वर्ष 2024-25 के प्रथम एवं द्वितीय तिमाही में देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर घटकर 5.2 प्रतिशत एवं 5.4 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई थी, जबकि वित्तीय वर्ष 2023-24 में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही थी। अतः देश में आर्थिक विकास की दर पर भी अब विशेष ध्यान देने की आवश्यकता प्रतिपादित हो रही थी, इसीलिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 25 आधार बिंदुओं में कमी की घोषणा की है। रेपो दर में कमी करने का उक्त निर्णय मुद्रानीति समिति के समस्त सदस्यों ने एकमत से लिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकलन के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-45 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 6.4% की रहेगी और वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 6.7 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच जाएगी। इस वर्ष खरीफ की फसल बहुत अच्छे स्तर पर आई है एवं आगे आने वाली रबी की फसल भी ठीक रहेगी क्योंकि मानसून की बारिश अच्छी रही थी और देश के जलाशयों में, क्षमता के अनुसार, पर्याप्त पानी इन जलाशयों में उपलब्ध है, जिसे कृषि सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जा रहा है और जो अंततः कृषि की पैदावार को बढ़ाने में सहायक होगा। इससे ग्रामीण इलाकों में उत्पादों की मांग में वृद्धि देखी गई है। हालांकि शहरी इलाकों में उत्पादों की मांग में अभी भी सुधार दिखाई नहीं दिया है। परंतु हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा मध्यमवर्गीय करदाताओं को आय कर में दी गई जबरदस्त छूट के चलते आगे आने वाले समय में शहरी क्षेत्रों में भी उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज होगी और विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत औद्योगिक इकाईयों की उत्पादन वृद्धि दर तेज होगी। सेवा क्षेत्र तो लगातार अच्छा प्रदर्शन कर ही रहा है। प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ मेले में धार्मिक पर्यटन के चलते देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त योगदान होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस प्रकार, भारत की आर्थिक विकास दर के वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग 7 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 8 प्रतिशत रहने के प्रबल सम्भावना बनती है। भारतीय रिजर्व बैंक का आंकलन उक्त संदर्भ में कम ही कहा जाना चाहिए।
इसी प्रकार मुद्रा स्फीति के संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.8 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2025-26 में घटकर 4.2 प्रतिशत रह सकती है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों के महंगे होने के चलते ही बढ़ती है, जिसे ब्याज दरों को बढ़ाकर नियंत्रण में नहीं लाया जा सकता है। हेडलाइन मुद्रा स्फीति की दर अक्टूबर 2024 में अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गई थी परंतु उसके बाद से लगातार नीचे ही आती रही है। इसी प्रकार, कोर मुद्रा स्फीति की दर भी लगातार नियंत्रण में बनी रही है। केवल खाद्य पदार्थों में के महंगे होने के चलते उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई पर दबाव जरूर बना रहा है। इस प्रकार महंगाई दर के नियंत्रण में आने से अब भारत में ब्याज दरों में कमी का दौर प्रारम्भ हो गया है। आगे आने वाले समय में भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में कमी की घोषणा की जाती रहेगी ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है और दिसम्बर 2025 तक रेपो दर में लगभग 100 आधार बिंदुओं की कमी की जा सकती है और रेपो दर घटकर 5.25 प्रतिशत तक नीचे आ सकती है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि देश में आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर रेपो दर में परिवर्तन के बारे में समय समय पर विचार किया जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने नीति उद्देश्य को भी निष्पक्ष रखा है परंतु चूंकि ब्याज दरों में अब कमी करने का चक्र प्रारम्भ हो चुका है अतः इसे उदार रखा जा सकता था। इसका आश्य यह है कि आगे आने वाले समय में भी रेपो दर में कमी की सम्भावना बनी रहेगी।
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में की गई कमी की घोषणा के बाद अब विभिन्न बैकों को ऋणराशि पर ब्याज दरों को कम करते हुए ऋणदाताओं को लाभ पहुंचाने के बारे में शीघ्रता से विचार करना चाहिए जिससे आम नागरिकों द्वारा बैकों को अदा की जाने वाली किश्तों एवं ब्याज राशि में कुछ राहत महसूस हो सके। इससे अर्थव्यवस्था में भी कुछ गति आने की सम्भावना बढ़ेगी।
दिसम्बर 2024 माह में देश में तरलता में कुछ कमी महसूस की जा रही थी और बैकों के पास ऋण प्रदान करने योग्य फंड्ज की कमी महसूस की जा रही थी। भारतीय रिजर्व बैंक ने तुरंत निर्णय लेते हुए आरक्षित नकदी अनुपात (CRR) को 4.5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया था, जिससे बैकों की तरलता की स्थिति में कुछ सुधार दृष्टिगोचर हुआ था। बैकों के लिए इसे अधिक सरल बनाने की दृष्टि से जनवरी 2025 में भी भारतीय रिजर्व बैंक ने लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपए बांड्ज विभिन्न बैकों से खरीदे थे ताकि इन बैकों की तरलता की स्थिति में और अधिक सुधार किया जा सके और बैकिंग सिस्टम में तरलता की वृद्धि की जा सके। उक्त वर्णित उपायों का परिणाम यह है कि आज भारतीय बैकों का ऋण:जमा अनुपात 80.8 प्रतिशत के स्तर पर बना हुआ है और बैकों की लाभप्रदता में भी लगातार सुधार होता दिखाई दे रहा है। विभिन्न बैकों द्वारा अभी तक घोषित किए गए परिणामों के अनुसार, बैकों ने लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपए का लाभ घोषित किया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जरूर परिस्थितियां अभी भी अस्थिर बनी हुई हैं और वैश्विक स्तर पर रुपए पर दबाव बना हुआ है। अभी हाल ही में डॉलर इंडेक्स 109 के स्तर तक पहुंच गया था और 10 वर्षीय यू एस बांड यील्ड भी 4.75 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, इससे अन्य देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है और आज अमेरिकी डॉलर के मुकाबले में रुपए की कीमत अपने निचले स्तर 87.66 पर पहुंच गई थी। परंतु, आगे आने वाले समय में अमेरिका में भी यदि ब्याज दरों में कमी की घोषणा होती है तो भारत में भी ब्याज दरों में कमी का चक्र और भी तेज हो सकता है। ब्रिटेन एवं कुछ अन्य यूरोपीयन देशों ने भी हाल ही के समय में ब्याज दरों में कमी की घोषणा की है। चूंकि अब कई देशों में मुद्रा स्फीति नियंत्रण में आ चुकी है अतः अब लगभग समस्त देश ब्याज दरों में कमी की घोषणा करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इससे अब आने वाले समय में इन देशों में आर्थिक विकास दर में कुछ तेजी आते हुए भी दिखाई देगी। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने के चलते अमेरिका के शेयर बाजार में केवल जनवरी 2025 माह में ही 15,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि निवेशकों द्वारा डाली गई है, जबकि भारत के शेयर बाजार से 2.50 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा निकाली गई है, इससे भी भारतीय रुपए पर दबाव बना हुआ है। परंतु भारतीय रिजर्व बैंक को शायद आभास है कि यह समस्या अस्थायी है एवं भारतीय कम्पनियों की लाभप्रदता में सुधार होते ही विदेशी संस्थागत निवेशक पुनः भारतीय शेयर बाजार में अपने निवेश को बढ़ाएंगे। अमेरिका एवं चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध का प्रभाव भी भारत पर सकारात्मक रहने की सम्भावना है क्योंकि इससे यदि चीन से अमेरिका को निर्यात कम होते हैं तो सम्भव हैं कि भारत से अमेरिका को निर्यात बढ़ें। भारत से निर्यात बढ़ने पर भारतीय रुपए पर दबाव कम होने लगेगा, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक को भारत में रेपो दर को कम करने में और अधिक आसानी होगी।
बुद्धायन : एक बानगी…
रेपो दर में कमी के साथ ही भारत में ब्याज दरों के नीचे जाने का चक्र प्रारम्भ
भारतीय रिजर्व बैंक के नवनियुक्
इसके बाद घोषित की गई 29 मुद्रा
केंद्र सरकार द्वारा भारतीय रि
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकलन के
हालांकि शहरी इलाकों में उत्पा
प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ
इसी प्रकार मुद्रा स्फीति के सं
इसी प्रकार, कोर मुद्रा स्फीति
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो
दिसम्बर 2024 माह में देश में त
भाषाएं और माताएं अपनी संतानों से सम्मानित होती हैं: प्रो.द्विवेदी
भोपाल । भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी का कहना है कि भाषाएं और माताएं अपनी संतानों से ही सम्मानित होती हैं। इसलिए भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाने हमें ही आगे आना होगा।
वे नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में व्याख्यान दे रहे थे। भारत मंडपम के थीम पवेलियन के हाल नंबर -5 में आयोजित कार्यक्रम में प्रो.द्विवेदी ‘राजभाषा हिंदी: अनुप्रयोग के विविध आयाम ‘ विषय पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में प्रख्यात व्यंग्यकार सुभाष चंदर, लेखक और तकनीकविद् बालेंदु शर्मा दाधीच, उपन्यासकार अलका सिन्हा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन ललित लालित्य ने किया। इस मौके पर एनबीटी के मुख्य संपादक कुमार विक्रम ने अतिथियों का स्वागत किया।
प्रो.द्विवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर हिंदी को पहचान दिलाई है तो राजभाषा के क्रियान्वयन में गृहमंत्री अमित शाह पूरी संकल्प शक्ति से जुटे हैं। यह समय सभी भारतीय भाषाओं के लिए भी अमृतकाल है। इस अवसर का लाभ उठाकर हम अपनी भाषाओं को न्याय दिला सकते हैं। उन्होंने कहा औपनिवेशिक सोच ने भारतीय भाषाओं और भारतीय मानस की स्वतंत्र चेतना पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। इससे मुक्ति के लिए सामाजिक आंदोलन की जरूरत है। जिसमें सरकार और समाज मिलकर काम करें। उन्होंने कहा कि भारत स्वभाव से बहुभाषी है इसलिए हमें बहुभाषी और सब भाषाओं को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण बनाने की जरूरत है। सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलने से ही हम चुनौतियों का मुकाबला कर सकेंगे।
कार्यक्रम में साहित्यकार रिंकल शर्मा, पत्रकार मुकेश तिवारी (इंदौर), अर्पण जैन उपस्थित रहे।
बैंगलुरु में अब एआई से जाने रहे हैं हवा का हाल!
बेंगलुरू में पर्सनल एयर क्वालिटी सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड (पीएक्यूएस) के संस्थापक और प्रबंध निदेशक ए. वैद्यनाथन के अनुसार, ‘‘वायु प्रदूषण एक खामोश हत्यारा है। वायु प्रदूषण के कारण भारत में स्वास्थ्य लागत प्रतिवर्ष लगभग 80 अरब डॉलर होने का अनुमान है और इससे निचले स्तर के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।’’
देश भर में कमजोर तबके के लोगों की सेहत खतरे में होने के कारण पीएक्यूएस ने लोगों को वायु प्रदूषण से बचाने के महत्वपूर्ण काम के लिए खुद को समर्पित किया है। कंपनी के प्रयासों को हाल ही में तब पंख लगे जब अक्टूबर 2024 में इसे ‘‘क्वांटम टेक्नोलॉजीज़ एंड आर्टिफिशियस इंटेलिजेंस (एआई) फॉर ट्रांसफॉर्मिंग लाइव्स’’ अनुदान प्राप्त के करने के लिए चयनित किया गया। यह प्रतिष्ठित अनुदान भारत और अमेरिका की सरकारों की संयुक्त पहल है। वैद्यनाथन कहते हैं कि इस अनुदान से पीएक्यूएस के इस जीवन बचाने वाले काम के बारे में लोग जानेंगे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एआई अनुसंधान के नए स्तरों को बल मिलेगा।
यूएस-इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी एंडाउमेंट फंड (यूएसआईएसटीईएफ) के क्वांटम टेक्नोलॉजी एंड एआई फॉर ट्रांसफॉर्मिग लाइव्स अनुदान के हिस्से के रूप में 11 एआई परियोजनाओं में से हरेक को लगभग 120,000 डॉलर का अनुदान मिलेगा। यानी करीब 20 लाख डॉलर खर्च होंगे। यह अनुदान यूएस-इंडिया इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी (आईसीईटी) के तहत क्वाटंम प्रौद्योगिकी और एआई में संयुक्त अनुसंधान और विकास की दिशा में एक मील का पत्थर है।
‘‘मेरी हवा ही मेरा स्वास्थ्य है,’’ इसी विश्वास से प्रेरित होकर वैद्यनाथन और उनकी टीम ने लोगों को वायु प्रदूषण के खतरों से निपटने में मदद करने के लिए अत्याधुनिक उत्पादों की एक विस्तृत शृंखला तैयार की। ये उत्पाद इसका इस्तेमाल करने वालों को उनके आसपास की वायु की गुणवत्ता को समझने और उसके अनुरूप अपने निजी स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने में मदद करते हैं। कंपनी के नवाचारों में एक स्वच्छ वायु हेलमेट शामिल है जो हवा से प्रदूषक तत्वों को हटाने के लिए स्मार्ट तकनीक का इस्तेमाल करता है। इसके अलावा एक स्मार्ट इनहेलर है जो अस्थमा से पीडि़त लोगों की मदद करने के लिए सेंसर और डेटा एनेलेटिक्स का उपयोग करता है। डिजिटल बेबीसिटर सिस्टम खासतौर से केयरगिवर्स को सशक्त बनाने और हानिकारक वायुजनित प्रदूषकों से शिशुओं को बचाने के लिए तैयार किया गया है।
मैरीलैंड यूनिवर्सिटी, बाल्टीमोर काउंटी (यूएमबीसी) में प्रोफेसर राम पी. रुस्तगी एआई पर पीएक्यूएस को सलाह देने का काम करते हैं और वह इन दिनों एक ऐसी ही रोमांचक परियोजना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यह कुछ उसी तरह का विश्वसनीय नवाचार है जिसके चलते कंपनी को ‘‘क्वांटम टेक्नोलॉजी एंड एआई फॉर ट्रांसफॉर्मिग लाइव्स’’ अनुदान हासिल करने में मदद मिली।
रुस्तगी ने इस परियोजना को ‘‘हाईपरलोकल एयर क्वालिटी मॉनीटर विद एआई ड्रिवेन मॉॉडलिंग’’ के तौर पर बताया है। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब स्थानीय वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए कम लागत वाले सेंसर का उपयोग करना और उपयोग करने वाले के लिए किसी भी जगह की वायु गुणवत्ता (एक्यूआई) को मापना आसान बनाना है। लेकिन सबसे खास बात यह है कि इसके जरिए उपयोगकर्ता को वायु गुणवत्ता डेटा की एआई संचालित व्याख्याएं मिल जाती है और वह अपने स्वास्थ्य के लिए बेहतरीन विकल्पों का चुनाव कर सकने में सक्षम बन सकता है।
पीएक्यूएस को विश्वास है कि एयर क्वालिटी सेंसर से मिलने वाली सूचनाओं एवं एआई एल्गोरिदम से प्राप्त विश्लेषण से लोगों के जीवन में काफी बड़ा फर्क आएगा।
रुस्तगी के अनुसार, ‘‘अलग-अलग लोगों में वायु प्रदूषण को लेकर भिन्न-भिन्न संवेदनशीलता हो सकती है, कुछ लोगों को हवा में धुएं के कुछ निश्चित स्तर के साथ ठीक महसूस हो सकता है, लेकिन दूसरों को नहीं।’’ वह कहते हैं, ‘‘हमारी तकनीक लोगों को उनके घर के आसपास के इलाकों को समझन,े या जहां भी वे हों, वहां के प्रदूषकों के बारे में जानकारी देकर यह जानने में मददगार हो सकती है कि हवा की गुणवत्ता कैसी है और उनकी सेहत पर किस तरह से असर डाल सकती है।’’
रुस्तगी बताते हैं कि कंपनी ने अब तक एक आशाजनक प्रोटोटाइप विकसित किया है। पीएक्यूएस को मिली अनुदान राशि से वैद्यनाथन द्वारा वर्णित ‘‘भविष्य को भांपने की बुद्धिमता’’ के बारे में गहराई से जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी। इसमें वायु गुणवत्ता डेटा का विश्लेषण करने में सक्षम कंप्यूटर एल्गोरिदम का उपयोग, यह अनुमान लगा पाना कि वायु प्रदूषण की समस्याएं कहां होने वाली हैं और लोगों की सेहत को फायदा हो सके, इसलिए उस जानकारी को पूरे भारत में साझा करना, जैसी बातें शामिल हैं। वह कहते हैं कि एक-दो साल के भीतर पीएक्यूएस परियोजना के और भी नए पहलू सामने लेकर आएगा।
वैद्यनाथन के अनुसार, ‘‘एक प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप के रूप में हम अपने प्रयासों और यात्रा का फायदा उठाने के लिए पुरस्कार और अवसरों की तलाश कर रहे थे।’’ फंडिंग और साझेदारी की तलाश में वैद्यनाथन को रुस्तगी का साथ मिला और फिर ‘‘क्वांटम टेक्नोलॉजीज़ एंड एआई फॉर ट्रांसफ़ॉर्मिंग लाइव्स’’ से अनुदान मिला।
वैद्यनाथन के अनुसार, ऐसा रोमांचक अवसर पैदा करने के लिए वह भारत औरअमेरिका की सरकारों के आभारी हैं। वह कहते हैं, ‘‘अमेरिका के पास प्रौद्योगिकी और नेतृत्व है, जबकि भारत के पास महत्वाकांक्षी युवाओं के साथ एक विशाल प्रतिभा पूल है- साथ मिल कर काम करने के लिए इससे आदर्श संयोजन की स्थिति और क्या हो सकती है।’’
माइकल गलांट लेखक, संगीतकार और उद्यमी हैं और न्यू यॉर्क सिटी में रहते हैं।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की कड़क चाय का जायका, रायगढ़ में अदरक वाली चाय ने जीता दिल!
रायगढ़/ चुनावी गर्मी के बीच रायगढ़ में एक चाय की दुकान पर माहौल चाय की भाप से और भी गर्म हो गया, जब खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने चाय बनाई। यह कोई आम चाय नहीं थी, बल्कि अदरक वाली कड़क चाय, जिसे पीकर लोग बोले- वाह! सीएम साहब, आपकी चाय में भी दम है!
दरअसल, मुख्यमंत्री साय भाजपा महापौर प्रत्याशी जीवर्धन चौहान के समर्थन में रायगढ़ पहुंचे थे। पूरे जोश के साथ पांच किलोमीटर लंबा रोड शो करने के बाद वे सीधे जीवर्धन चौहान की मिनीमाता चौक स्थित चाय दुकान पहुंचे। वहां न केवल चाय बनाई, बल्कि खुद लोगों को प्याली थमाते हुए बोले-
चाय से ज्यादा मीठी जीवर्धन भाई की जुबान और उनका व्यवहार है!
बनाई खुद चाय, लोगों से कहा – मेहनत का सम्मान ही भाजपा की पहचान
चाय की दुकान पर जब मुख्यमंत्री खुद स्टोव जलाकर अदरक, इलायची और चाय पत्ती डालने लगे, तो वहां मौजूद लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई। किसी ने कैमरा ऑन किया, तो कोई वीडियो बनाने में जुट गया। चाय बनने के बाद मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों को खुद चाय सर्व की।
उन्होंने कहा, एक साधारण कार्यकर्ता की मेहनत का सम्मान भाजपा में ही संभव है। जिस तरह चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी आज दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता बने, उसी तरह जीवर्धन भाई भी जनता के आशीर्वाद से रायगढ़ के महापौर बनेंगे।
चाय से बनी चुनावी चर्चा, लोगों ने कहा – यह चाय तो कमाल की है!
चाय पीने के बाद लोगों ने कहा कि सीएम की बनाई अदरक वाली चाय वाकई कड़क थी। चुनाव प्रचार के बीच यह चाय सिर्फ एक प्याला नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए जोश और ऊर्जा का नया स्वाद थी