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पानीपत युध्द में मराठों का शौर्य और सक्रांति पर महिलाओं के काले कपड़े पहनने की परंपरा

पानीपत!
प्राचीन कुरुजांगल क्षेत्र का एक गांव ‘पाणिप्रस्थ'(महाभारत कालीन नाम)और वर्तमान में दिल्ली से नब्बे किलोमीटर दूर एक कस्बा है जिसको पानीपत कहते हैं ।
प्राचीनकाल से ही कुरुक्षेत्र से संबंधित  रणभूमि जो ऐतिहासिक रूप से भारतीयों के लिये अभिशापित रही  है। अगर कुरुक्षेत्र की भूमि ने दाशराज्ञ के उत्तरार्ध के रूप में समंतपंचक में हैहयों के रक्त से भरे कुंड से लेकर  महाभारत में अगणित योद्धाओं के लहू की नदी देखी तो पानीपत  ने भी अगणित योद्धाओं के मृत शरीर का असह्य भार अपनी भूमि पर  वहन किया।
इस भूमि ने तीन बार भारतीय इतिहास की दिशा को पलटा।
प्रथम युद्ध भले ही दो विदेशी लुटेरों इब्राहीम लोदी और बाबर के बीच हुआ हो लेकिन खानवा के मैदान में राजपूतों की पराजय की पूर्वभूमिका यहीं लिखी गयी क्योंकि अपनी खड्गसंचालन विद्या पर भरोसा रखने वाले ये गर्वीले योद्धा तोपों के रूप में तकनीक का महत्व समझ ही नहीं सके।
इसी मैदान में द्वितीय युद्ध एक बार फिर हिंदू स्वप्नसूर्य के लिये ग्रहण सिद्ध हुआ और इस युद्ध ने भारत को मुगलों की गुलामी की भट्टी में धकेल दिया।
भयानक संघर्ष की यह काली रात भी गुजरने लगी और महाराणा प्रताप, छ. शिवाजी और पेशवा बाजीराव के अथक प्रयासों से हिंदू मराठों के रूप में एक बार फिर सिर ऊंचा करके उत्तर की ओर इस रणभूमि की ओर चल पड़े।
जर्जर अर्थव्यवस्था से बेहाल हमारे इन मराठा योद्धाओं ने ‘हिंदू पद पादशाही’ का नारा तो अपना लिया था लेकिन उनमें बाजीराव ‘महान’ की उस समन्वयवादी प्रतिभा का पूर्ण अभाव था जिसने उदयपुर के सिसोदिया राणाओं के नेतृत्व, सतारा के छत्रपतियों उपनेतृत्व व पेशवाओं के कार्यकारी नेतृत्व में ‘महान हिंदू संघ’ का स्वप्न देखा था।
जी हाँ, ‘अटक से कटक’ का नारा देने वाले इस महान पेशवा ने उदयपुर के राणा से भेंट के दौरान  उस सिंहासन के सामने आसन ग्रहण करने से इनकार कर दिया था जिसपर कभी महाराणा प्रताप सिंहासनासीन हुये थे। उस भावनापूर्ण वातावरण में इस महान संघ की योजना बनी जो अगर कार्यरूप में परिणित हो जाती तो आज ‘हिंदू भारत’ की सीमायें कहाँ तक होतीं कल्पना करना मुश्किल है।
पर हिंदुओं का दुर्भाग्य! पुणे के कट्टर ब्राह्मणों व परिवार के सदस्यों की क्षुद्र सोच ने उनकी शक्ति, उनके प्रेम ‘मस्तानी’ को उनसे विलग कर दिया और उसके साथ उनकी साँसें भी उनसे विलग हो गईं।
उत्तराधिकारी बालाजी उपनाम  ‘नाना’ में वह योग्यता व शक्ति नहीं थी जिसका परिणाम था होलकर व सिंधियाओं जैसे सरदारों का उदय जिन्होंने राजपूतों को ही नहीं जाटों को भी अपना शत्रु बना लिया था ।
इसी बीच उत्तर पश्चिम से नादिरशाह के आक्रमण ने उसके साथ आये अफगानों की दाढ़ में खून लगा दिया था। अब वे  घाव से सड़ी और कीड़े बिजबिजाती नाक वाले अपने खूँख्वार नेता अहमदशाह अब्दाली के नेतृत्व में भारत भूमि पर गिद्धों की तरह मंडराने लगे।
सिख अभी पूर्णतः संगठित नहीं थे। ऐसे में मराठों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और राघोबा ने लाहौर को जीतकर अटक तक पहुंचने का अपने पिता का स्वप्न साकार कर दिया। परंतु मराठों ने यहां भी एक भीषण भूल कर दी और लाहौर को किसी सिख नेता को सौंपने के स्थान पर अदीना बेग को सौंप दिया जो सिखों का शत्रु था। इस तरह राजपूतों व जाटों के बाद सिखों का भी विश्वास मराठों ने खो दिया।
मराठों के लौटते ही अब्दाली पुनः पंजाब पर चढ़ आया और इस बार उसके हमले का निशाना थी दिल्ली और उद्देश्य था पंजाब को सदैव के लिये अफगान साम्राज्य में मिलाना।
मराठों ने देश और आन की पुकार सुनी और सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में चल दिये उत्तर की ओर लेकिन उत्तर में दो घटनायें हुईं जिनमें पानीपत की पराजय का रहस्य भी छुपा है और वर्तमान के लिये सीख भी।
एक ओर तो शियासंहारक कट्टर सुन्नी विदेशी अब्दाली और भारत की जमीन का अन्न खाने वाला व गंगा जमनी तहजीब की बात करने वाला लखनऊ का शिया नवाब शुजाउद्दौला इस्लाम के नाम पर आपस में मिल जाना ।  दूसरी ओर पिछला सबकुछ भुला कर हिंदुत्व के नाम पर मराठों का साथ देने आये महान कूटनीतिज्ञ व जाट शिरोमणि महाराज सूरजमल का भाऊ द्वारा जातिगत अपमान व  विश्वासघात की आशंका में उनका मराठा शिविर से पलायन।
इस्लामिक चरित्र के अनुसार प्रथम घटना तो सहज ही थी।  मराठे देशद्रोही नवाब व अब्दाली की संयुक्त सेना को अभी भी हरा सकते थे बशर्ते दूसरी घटना ना हुई होती क्योंकि उन दुर्भाग्यपूर्ण क्षणों में मराठों ने ना केवल तीस हजार प्रचंड जाट योद्धाओं को खो दिया बल्कि सूरजमल जैसे महान कूटनीतिज्ञ की सलाहों को भी गंवा दिया।
पर फिर भी मराठों के रूप में  हिंदू योद्धा इस मैदान में दूसरी बार ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इबारत अपने लहू से लिखने के लिये एकत्रित हुये हैं।
14 जनवरी 1761
यह वह दिन है जिस दिन पूरा भारत सूर्यदेवता के मकर राशि में प्रवेश करने का उत्सव मना रहा था, ठीक उसी समय दक्षिण भारत से आये पैंतालीस हजार भूखे प्यासे योद्धा अपने रक्त से मातृभूमि का अभिषेक कर भारत की ‘राष्ट्रीयता’ को  सिद्ध करने आये थे कि,
 ‘हम एक राष्ट्र हैं।’
‘हम हिंदू एक राष्ट्र हैं और भारत के सुदूरतम उत्तरी खंड पर किया गया आक्रमण पूरे राष्ट्र पर आक्रमण है और उसे रोकने को दक्षिण भी उतना ही प्रतिबद्ध है जितना कि उत्तर।’
लेकिन दुर्भाग्य से अपने पूर्वर्ती व वर्तमान नेतृत्व की कूटनीतिक अकुशलता से ये योद्धा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में फंस गये।
भुखमरी से त्रस्त सैनिकों व सेनापतियों के दवाब में भाऊ ने आक्रमण करने का निश्चय किया और सेना को व्यूहबद्ध किया।
बाँयी ओर तोपखाना ,उनके दाँयी ओर विट्ठलराव विंचूरकर और दामाजी गायकवाड़ व उनके साथ दो हजार अफगान ।
इनके दाँयी ओर विश्वासराव  और फिर केंद्र में सदाशिव राव भाऊ तैनात थे। इनके साथ कुल चौदह हजार घुड़सवार व नामी मराठा योद्धा थे।
एन दाँयी ओर जानकोजी व महादजी सिंधिया व मल्हार राव होलकर व गंगोबातात्या तैनात थे।
इनके वाम भाग में स्वर्गीय पेशवा बाजीराव व मस्तानी का पुत्र कृष्णा अर्थात शमशेर बहादुर तैनात था।
सेना के पिछले भाग में असैनिक व्यक्तियों व महिलाओं को सात हजार सैनिकों के घेरे में रखा गया था।
मराठा सैन्य व्यूह पूरे  दो मील चौड़ाई और तीन मील लंबाई में फैला हुआ था।
खास बात यह थी कि यह व्यूह स्थिर नहीं बल्कि गतिमान था और अब्दाली को निगलने के लिये आगे बढ़ रहा था।
उधर अब्दाली ने भी कमोबेश वाम, दक्षिण व केंद्र वाला व्यूह ही रचा लेकिन दो विशिष्ट जमाव से  उसकी कुटिल रणनीति के दर्शन होते हैं।
एक तो उसने नजीब खान के  रुहेलों को वाम भाग में  इब्राहीम खां गारदी की तोपों के सामने लगा दिया और खुद नजीब खान को वाम पार्श्व में तैनात कर शुजाउद्दौला को उसके साथ चिपका दिया। इस तरह उसने न केवल नजीब के सैनिकों का नियंत्रण उससे छीनकर उनका इच्छित उपयोग किया बल्कि उसे व शुजा दोंनों को एक स्थान पर कीलित कर दिया।
दूसरे उसने 5000 सैनिकों की एक सुरक्षित  रिजर्व सेना भी रखी जिसमें उसके सबसे खूँख्वार योद्धा थे।
युद्ध प्रातः साढ़े नौ बजे शुरू हुआ।
युद्ध के प्रारंभ में ही इब्राहीम गार्दी के तोपखाने ने बढ़त कायम कर ली और उसने दांहिने भाग में तैनात अठारह हजार रुहिल्लो में से नौ दस हजार  जमीन पर बिछा दिये।
इसी बीच भाऊ दुश्मन के दक्षिण भाग की ओर मुड़कर अब्दाली के वजीर शाहवली के उन्नीस हजार घुड़सवारों पर टूट पड़े और मात्र डेढ़ घंटे के युद्ध में  मराठों ने भूखे प्यासे होते हुये भी लगभग सोलह सत्रह हजार घुड़सवारों का सफाया कर दिया।
अब्दाली का केंद्र तबाह होने लगा जो मराठों की विजय का सूचक था, इससे पूर्व ही दक्षिणी खंड इब्राहीम के नेतृत्व में मराठों के बाँये खंड द्वारा लगभग साफ किया जा चुका था।  घबराये अब्दाली ने अपने हरम के दारोगा को औरतों को दो कोस और पीछे ले जाने व पराजय होने पर कंदहार निकल जाने का आदेश दिया और स्वयं सुरक्षित सैन्य में से  डेढ़ हजार सैनिकों के साथ भागकर वापस आने वाले सैनिकों को काटने लगा।*
लेकिन उसी समय दो दुर्घटनायें घटीं।
गुस्से मे अपना नियंत्रण खोकर विंचूरकर व दामाजी घोर अनुशासनहीनता व उद्दंडता का प्रदर्शन करते हुये व्यूह तोड़कर रुहेलों पर लपक पड़े। इब्राहीम द्वारा गिड़गिड़ाकर रोकने के बाद भी वे नहीं रुके। परिणामस्वरूप ये अपने दस्तों का तो सफाया करवा ही बैठे साथ ही इनके कारण इब्राहीम गार्दी की पूरी पलटन निरीह वीरगति को प्राप्त हुई। नतीजा यह रहा कि अफगानों के दक्षिणी भाग पर काल बनकर मंडराते मराठा तोपखाने का दवाब खत्म हो गया।
इधर केंद्र में निरंतर विजयी हो रहे भाऊ के सैनिक स्वतः बेहोश होकर गिरने लगे क्योंकि उन्हें प्रयाण के बाद सुबह से पानी की एक बूंद नहीं मिली थी जबकि हर अफगान सैनिक पहले से ही शस्त्रों के साथ साथ छोटी मशक भर पानी व थोड़े भुने मांस से लैस था।
अब्दाली ने यह कमजोरी भांप ली और तुरंत अपनी सारी सुरक्षित सेना भाऊ पर झोंक दी और केंद्र की दरारें भर दीं। फिर भी भाऊ, विश्वासराव और शमशेर बहादुर पूरी शक्ति से अफगानों पर टूट पड़े। जंग का पलड़ा एक बार फिर मराठों की ओर झुकने लगा।
विश्व इतिहास में किसी भी सेना के योद्धाओं ने ऐसी अकल्पित वीरता नहीं दिखाई होगी जितनी भूख प्यास से जर्जरित हमारे इन मराठा वीरों ने। हर मराठे में जैसे छत्रपति व बाजीराव की आत्मा उतर आयी थी।
तभी युद्ध की तीसरी दुर्घटना घटी और केंद्र को चीरकर अलग थलग पड़े विश्वासराव का माथा एक जंबूरके(उंट पर लगी छोटी तोप) ने चूर कर दिया और उधर मराठों के साथ चल रहे अफगानों ने भगवी पट्टियां उतारकर मराठों पर ही आक्रमण कर दिया, ये वो अफगान सैनिक थे जो कुंजपुरा की जंग जीतकर मराठों ने अपनी सेना मे मिलाये थे, ओर इनकी पहचान के लिये इनके माथे पर भगवा पट्टी बांध दी थी।
फिर भी विजय की कुंजी मराठों में होलकर के हाथों में थी पर उन निर्णायक क्षणों में वृद्ध होलकर में जीवन का मोह उत्पन्न हुआ और वह भाऊ के आक्रमण के आदेश को ठुकराकर गंगोबातात्या के साथ युद्ध से कायरतापूर्वक पलायन कर गया।
निराश और हताश भाऊ मृत्यु को ढूंढते हुए अफगागान सेना से जा भिडे ।
इस तरह  ढाई बजे तक जीतने वाली मराठा सेना तीन बजे युद्ध हार गई और साथ ही हिंदू पद पादशाही का स्वप्न अगले 253 वर्षो के लिये धूमिल हो गया।
आगे की गाथा उन अभागी मराठा स्त्रियों की करुण गाथा है जिन्हें अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये कोई कुंआ भी न मिल सका क्योंकि कुँए पहले ही लाशों से भर चुके थे।
आगे की गाथा उन बचकर निकले हुये मराठा सैनिकों व अनाथ बच्चों भी है जिनके वंशज हरियाणा से बलूचिस्तान तक #रोड़  जाति के रूप में आज भी पानीपत की उस जंग की हार के दर्द को अपने ह्रदय में बसाये हुये हैं।
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दुर्भाग्य से आज भी यही घटनाएं हो रही हैं।
आज भी गंगा जमनी तहजीब के नाम पर हिंदुओं को मूर्ख बनाया जा रहा है और जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार में हम अपने अपने ही भाइयों को स्वयं से दूर करते जा रहे हैं। अगर आप किन्हीं भी क्षणों में स्वयं को किसी से जातिगत रूप से श्रेष्ठ मानते हैं उस पल आप किसी पानीपत की हार की पटकथा लिख रहे होते हैं।

पुस्तक मेले में कुरान और वेद पर एक मजेदार चर्चा

आज पुस्तक मेला लगा हुआ था तो अर्चना दी का कल फ़ोन आया कि आयुषी कल पुस्तक मेले में चल रही है क्या तो हमने भी हां कर दी।
वहां एक विशेष मजहब वालों के स्टाल पे जाना हुआ जो वहां गए होंगे उन्होंने देखा होगा कि एक स्टाल पर लोग कुरान और वेदों की शिक्षा को एक बता रहे हैं और ईश्वर अल्लाह एक है ऐसा भी बता रहे हैं और आवाज दे देकर बुला रहे हैं कि आइये
सुनिए ….
सो हम दोनों भी उधर ही हो लिए की कम से कम देख तो लें हीं….
हुआ यूं कि दो-तीन छोरी मुंह पर कपड़ा ढके समझा रही थी तो उसने हमको बुलाया आइये आप भी तो हम भी खड़े हो गए कई बहनें पहले भी खड़ी थी, तो उसने शुरू किया इस्लाम और वेद तो एक हैं और ये राम,कृष्ण, पैगम्बर साहब सब ईश्वर ने भेजे थे और जेहाद का अर्थ बताया कि किसी भी उद्देश्य के लिए पुरूषार्थ करना औऱ मुस्लिम का अर्थ है जो ईश्वर के कार्य के लिए स्वयं को समर्पित कर दे और ये ईश्वर, अल्लाह सब एक हैं इनमें कोई भेद नहीं है जब वो स्वयं नहीं लड़ते तो हम क्यों लड़े और उसने बताया कि आज तो हिन्दू लोग संस्कृत नहीं पढ़ते…. वेद नहीं पढ़ते .गीता नहीं पढ़ते……और बोली गीता,बाइबिल सब एक हैं. वेद मनु ने बनाये, मनुस्मृति मनु ने बनाई….. जैसे आप लोग हिन्दू हो तो आप लोगों को भी संस्कृत नहीं आती…… आपने भी वेद के ब्रह्म सूत्र नहीं पढ़े होंगे……
फिर जब बहुत देर हो गई और सुना नहीं गया कुछ घणा ही हो गया तो मैंने कहा मान लीजिए आपकी इस बात से मैं सहमत हूँ कि कुरान और वेद एक है लेकिन एक बात बताओ पाकिस्तान में कुरान मानने वाले ज्यादा हैं या हिंदुस्तान में ? तो बोली पाकिस्तान में तो फिर मैंने पूछा आपके 57 देश हैं मतलब इस्लाम वालों के 57 देश हैं…. सब कुरान को मानते हैं या नहीं?  तो बोली कुरान मानते हैं तो मैंने कहा ये बताइये पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक़,ईरान जितने भी मुस्लिम देश हैं एक में भी शांति है?  तो बोली वो कुरान पढ़ ही नहीं पाते….
फिर मैंने कहा कसाब ने क्या पढ़ा?
बुरहान वानी ने क्या पढ़ा?
लादेन ने क्या पढ़ा?
बगदादी ने क्या पढ़ा?
अलकायदा वालों ने क्या पढ़ा?
अफजल गुरु ने क्या पढ़ा?
लादेन ने क्या पढ़ा?
तो कह री उन सबने कुरान को समझा ही नहीं…… आपको उन्हें कुरान के बारे में बताना चाहिए मैंने कहा जब वो हमको मारने आएगा तो क्या हम कहेंगे रूक भाई पहले कुरान पढ़ 😂
कैसी बात करती हो?? वहां खड़े सब लोग हसने लगे……….फिर कहने लगी वो लोग अशिक्षित हैं पढ़ते नहीं हैं कुरान को….. उन्होंने कुरान की शिक्षा को माना ही नहीं है…..
रोजगार के लिए हथियार उठाते हैं फिर मैंने वहां खड़ी बहनों की औऱ इशारा करके कहा कि मैंने मान लिया कि इन बहनों ने संस्कृत नहीं पढ़ी,ये वेद और गीता को नहीं जानती लेकिन ये कसाब की तरह हथियार भी तो नहीं उठाती……..और अभी आप कह रही थी कि जो कुरान को पढ़ने वाला मुस्लिम है वो दूसरे के दर्द से आहत होता है तो ये बहनें जो यहां हैं और हिन्दू हैं ये कुरान नहीं जानती लेकिन जब पेशावर में कुरान के मानने वालों ने बम फोड़े तो पूछो इनकी आंखों में आंसू थे कि नहीं तो
उन सबने कहा हां हम भी दुखी थे….😂😂
तो मैंने उस मुस्लिम लड़की से कहा ये सब उदाहरण चीख चीखकर कहते हैं कि वेद शांति का संदेश देते हैं और कुरान जो देती है उसको तो सारी दुनिया जानती है…….
फिर मुझे कह रही कि आपने संस्कृत और वेद पढ़े होते तो आप
कुरान को अलग ही नहीं मानती फिर आप स्वयं कहती कि वेद
औऱ कुरान एक है मैंने कहा सुन बहना तू पूछ वेदों के बारे में क्या पूछना है?
मैंने वेद पढ़े हैं और मुझे संस्कृत अच्छे से आती है……. इसलिये मुझे समझ में आता है की आपका मूल उद्देश्य क्या है.. और मैंने
कहा थोड़ा ज्ञान दुरुस्त कर बहिना मनु ने वेद नहीं मनुस्मृति लिखी है……. खूब लंबी बहस चली एक दो मुस्लिम भी sry करके बोलने आये फिर वो जितनी हिन्दू बहनें खड़ी थी वो सब समझ गई ये अब फंस गए तो हसते हुए चलने लगी फिर इतना अर्चना दी ने उन मुस्लिम लड़कियों से बात की इतना मैं उन हिन्दू बहनों के पीछे गई तो वो हंसने लगी मैंने कहा बावला बना रही थी बहुत तेज हैं ये अपनी बुराई न बताती……आपको फंसा रही थी…..फिर वो हंसते हुए कहने लगी आप लोगों ने बढिया कर दिया…. बेज्जती कर दी तगड़े से…..फिर एक और उन्हीं में से एक किताब लेके आई आप ये पढ़ो इसमें सब है…. फलाना ढिकाना….. लेकिन एक बात है एक बार को वें घूम तो गए ही थे😂😂😂
बात बहुत करनी थी लेकिन उनकी शक्ल देखकर
हंसी रोक नहीं पाई मैं और निकल ली😂😂😂😂
सब मुस्लिमों ने हाथ मिलाकर इज्जत के साथ विदा किया बात तो बहुत हुई लेकिन याद इतना सा ही रह गया…..
कहने का मतलब ये ही है अपने बच्चों को वेदों के बारे में बताओ हिंदुओं , संस्कृत कम से कम इतनी तो पढ़ाओ ही कि कोई चलता फिरता यूँ ही न फुसला ले वर्ना वो दिन दूर नहीं ki ये हमारे वालों को अपना बना लेंगे….. वो तो हम थोड़ा जानते थे तो अड़ गए वर्ना जितनी वहां हिंदू बहनें खड़ी थी वो तो पूर्ण प्रसन्न हो रही थी।
यही है इनका तरीका मीठा जहर बनकर अंदर घुस जाते हैं और
धर्मांतरण कराते हैं और हम केवल अपने परिवार को भी नहीं संभाल पा रहे कुछ भी हो लेकिन भयावह था। अगर यही रहा तो स्थिति अच्छी नहीं है। लव जेहाद कैसे कर जाते हैं उनके बीच जाओगे तो समझ पाओगे….. स्थिति जितना समझते हैं उससे ज्यादा भयावह है…….
एक पाठिका द्वारा भेजा गया संस्मरण
#ramayenge #aayushirana #draayu #ShriRamMandir #गुरुकुल_प्रणाली_चलती_रहे
#hinduism #भारतीय

भारतीय चिंतन से प्रेरित सृजनकार डॉ.अपर्णा पांडेय

संस्कृत, बांग्ला कृतियों का हिंदी में अनुवाद, ढाका में हिंदी की सेवा और बाल साहित्य के क्षेत्र में बच्चों को साहित्य से जोड़ने में उल्लेखनीय कार्य कर अलग पहचान बनाने वाली रचनाकार डॉ.अपर्णा पांडेय का जन्म साहित्यिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रूप से समृद्ध परिवार संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान आचार्य राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पिता लाल बिहारी द्विवेदी एवं माता कृष्णा देवी द्विवेदी के परिवार में चौथी पुत्री के रूप में 1970 में मैनपुरी, उत्तर प्रदेश में हुआ। विवाह के पश्चात 1988 में यह कोटा आ गई।
आपने हिंदी और संस्कृत से स्नातकोत्तर की डिग्री और ‘पुराणों में शुकदेव-एक समालोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।  आश्रम के वातावरण में पली-बढ़ी और संतों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। इनके पिता उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध श्रीमद्भागवत कथा वाचक और ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान, प्रोफ़ेसर रहे हैं।  आप 2011 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से चयनित होकर शिक्षा विभाग में आई और वर्तमान में सैकंडरी विद्यालय, सुल्तानपुर में सेवारत हैं। आपने भारतीय विदेश सेवा में चयनित होकर 2013 से 2017 तक प्रतिनियुक्ति पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक प्रतिनिधि और हिंदी शिक्षक के रूप में ढाका में हिंदी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य किया। जहाँ इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र और आधुनिक भाषा इंस्टीट्यूट, ढाका विश्वविद्यालय में प्रथम हिंदी पीठ के रूप में भी कार्य किया और ढाका विश्वविद्यालय में (एकवर्षीय पाठ्यक्रम) शुरू किया।
     रचनाकार हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं पर समान अधिकार रहती हैं। इन्होंने हिंदी भाषा में गद्य और पद्य विधाओं में संस्मरण, गीत ग़ज़ल, उपन्यास, निबंध, समीक्षाएं आदि लेखन के साथ-साथ संस्कृत और बांग्ला पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया। युवाओं को भारतीय भाषा, ज्ञान और संस्कृति से अवगत कराना और जिज्ञासा पैदा कर अपनी संस्कृति के प्रति श्रद्धा भाव पैदा करना इनके लेखन का मूल उद्देश्य है। आप कथेत्तर विधा में हिन्दी के प्रति प्रतिबद्ध और समर्पित हैं।
आपका लेखन इनके भ्राता श्री आचार्य इच्छाराम द्विवेदी ‘प्रणब’ जी और पिता श्री आचार्य लाल बिहारी द्विवेदी के साहित्य से प्रेरित है। गोपाल दास नीरज, कुंवर बेचैन, राजेंद्र मिश्र, बच्चू लाल अवस्थी, राधा वल्लभ त्रिपाठी, आचार्य रमाकांत शुक्ल जैसे विख्यात संस्कृत के प्रकांड विद्वानों का घर पर प्रतिवर्ष संस्कृत शोध संगोष्ठियों में, काव्य गोष्ठियों में, हिंदी गोष्ठियों में आना-जाना होता था। अतः आध्यात्मिक और साहित्यिक वातावरण होने के कारण बचपन से ही लेखन में रुचि जागृत हुई। आपने आई. एम. पुणे, हरिहर आश्रम, कनखल, हरिद्वार, सर्वभाषा साहित्यकार कुंभ, अजमेर, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस, विश्व हिंदी परिषद् नई दिल्ली, आनंद, (गुजरात) आदि अनेक मंचों से अपने शोध पत्रों का प्रस्तुतिकरण कर चुकी हैं। आपने 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन मारीशस 2018 में राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर वहाँ प्रसून जोशी अध्यक्ष- केंद्रिय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड, कुंवर बेचैन, अशोक चक्रधर जैसे ख्यातनाम साहित्यकारों से लेखन हेतु प्रेरणा प्राप्त की।
  इन्होंने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रमों में लगी हुई संस्कृत की पुस्तकों मेघदूतम , सांख्यकारिका, श्रीमद्भागवतगीता एवं योग दर्शन का हिंदी में अनुवाद कर छात्रों के लिए सुगम बनाया है। मेघदूतम गीतिकाव्य काव्यानुवाद पर आचार्य अग्निमित्र शास्त्री लिखते हैं कि अनुवाद में हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शास्त्रीय हिंदी के झलक प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती है। निःसंदेह संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों का हिंदी अनुवाद जैसा कठिन कार्य इनकी हिंदी की महत्वपूर्ण सेवा है।  उन्मेश, प्रवासी मन – काव्य संग्रह आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय भाव, पर्यावरण संरक्षण की मावनाओं से ओतप्रोत है।
ढाका प्रवास के दौरान लिखी गई यह ऐसी कृति है जिसमें महिलाओं के मन में रूढ़िवादी सोच के प्रति तीव्र आक्रोश, तो उससे मुक्त होने की छटपटाहट भी दिखाई देती है। साथ ही कविताएँ उदात्त प्रेम की पक्षधर हैं, जो कण-कण में ईश्वरीय रूप को दृष्टिगत करती हैं। कवि, समीक्षक स्व. वीरेंद्र विद्यार्थी लिखते हैं कि आत्मा के चिर संतति’ गीति-संस्कृति का प्रथम प्रस्फुटन जगत और जीवन का खूबसूरत दर्पण बन गया है। जिसके जूम लेंस में आलोकित अतीत रक्तरंजित इतिहास की कौन किरचें वर्तमान का भाष्य भविष्य की भव्यता सृष्टि का व्याकरण अपने को बार-बार निहारते, निखारते और पैनाते रहते हैं। बांग्ला भाषा के लेखक ‘बंदे अली मियां’ की पुस्तक ‘प्रिय गल्प’ कहानियों का हिंदी में अनुवाद किया। इन कहानियों का उद्देश्य बच्चों को प्राकृतिक परिवेश से जोड़ना उनकी बाल सुलभ कल्पनाओं को चित्रित करना है। युवावस्था के प्रेम पर आधारित दो उपन्यास ‘तड़प’ और ‘दो मित्रों की कथा’ लिखे हैं। विदेश प्रवास और हिंदी सेवा कृति में आपने अपने अनुभवों और संस्मरणों को खूबसूरती से लिपिबद्ध किया है। हाल ही में भीलवाड़ा की लेखिका श्रीमती शिखा अग्रवाल द्वारा इसका अंग्रेजी भाषा में अनुवाद प्रकाशित हुआ है। वैचारिक पुष्प गुच्छ एवं समीक्षाएं (शोधपरक और मौलिक निबंध)  भी इनका मुख्य सृजन है।
  आपको साहित्य के क्षेत्र में अनेक सम्मान और साहित्यिक प्रतियोगिताओं में पुरस्कार प्राप्त किए हैं। बांग्लादेश में भारत के राजदूत हर्षवर्धन श्रृंखला एवं डायरेक्टर जनरल (साउथ एशिया) द्वारा उत्कृष्ट कार्य हेतु प्रशस्ति पत्र से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी, जयपुर द्वारा बांग्ला भाषा की बाल कथाओं की कृति ‘प्रिय गल्प’ पर” रांगेय राघव पुरस्कार’ से सम्मानित किया। भारतेंदु समिति, कोटा द्वारा ‘साहित्य श्री’ सम्मान, राजमाता शिवरानी देवी, कोटा, स्व. सुनील दत्त राज्यसभा सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री, सुश्री शबाना आजमी राज्यसभा सांसद, श्री एस. एन. थानवी, शिक्षा सचिव, राजस्थान आदि द्वारा उत्कृष्ट कार्य हेतु सम्मान प्राप्त किया। इन प्रमुख पुरस्कारों के साथ-साथ दो दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा आपको पुरस्कृत और सम्मानित किया गया है।
( संपर्क : सी-44, गायत्री बिहार, पुलिस लाइन,कोटा ,राज. मो. 77348 33428 )
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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

भारतीय डाक विभाग ने अहमदबाद में आयोजित किया ‘पतंग उत्सव

डाक विभाग द्वारा आयोजित ‘पतंग उत्सव’ में स्कूली बच्चों के साथ पोस्टमैन और ग्रामीण डाक सेवकों ने भी रंग-बिरंगी पतंगों को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाकर किया हर्षोल्लास

 अहमदाबाद।  गुजरात के अहमदाबाद में उत्तरायण पर्व पर आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय पतंग उत्सव’ (Ahmedabad International Kite Festival) देश-दुनिया में मशहूर है। इसमें देश-दुनिया से तमाम लोग रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाने और देखने के लिए एकत्र होते हैं। इस बार भारतीय डाक विभाग ने भी पहल करते हुए अहमदाबाद में ‘पतंग उत्सव-2026’ का आयोजन किया, जिसमें तमाम अधिकारियों-कर्मचारियों ने सपरिवार बढ़-चढ़ कर भाग लिया। साइंस सिटी के पास वी. नाइन क्रिकेट ग्राउंड में आयोजित उत्सव में स्कूली बच्चों के साथ विभिन्न क्षेत्रों से आए पोस्टमैन और ग्रामीण डाक सेवकों ने लेटर बॉक्स, डाक टिकट, मेल वैन, स्पीड पोस्ट और पार्सल, डाकघर बचत बैंक, डाक जीवन बीमा, ग्रामीण डाक जीवन बीमा, इण्डिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक इत्यादि के साथ-साथ डाक सेवाओं के विभिन्न आयामों को सहेजती रंग-बिरंगी पतंगों को आसमान की बुलंदियों तक पहुँचाकर हर्षोल्लास व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारंभ उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने अहमदाबाद सिटी मंडल के प्रवर अधीक्षक डाकघर श्री चिराग मेहता संग किया।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि जिस तरह उत्तरायण नई ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक है, उसी तरह भारतीय डाक हर घर तक भरोसे, सेवा और संवाद की रोशनी पहुँचाता है। ये लोकपर्व सूर्य के उत्तरायण होने के साथ जीवन में सकारात्मक परिवर्तन, परिश्रम के सम्मान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देते हैं। उन्होंने सभी को उत्तरायण, मकर संक्रांति, पोंगल एवं माघ बिहु के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कामना व्यक्त की कि ये पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और नवऊर्जा का संचार करें तथा सामाजिक एकता और सांस्कृतिक सद्भाव को और सुदृढ़ करें

साहित्य अकादमी ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2026 में फेस-टू-फेस और कहानी पठन कार्यक्रमों का आयोजन किया

नई दिल्ली। साहित्य अकादमी ने 15 जनवरी 2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 के दौरान हॉल नंबर 2, भारत मंडपम, नई दिल्ली में भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक फेस-टू-फेस कार्यक्रम और एक पैनल चर्चा का आयोजन किया।

फेस-टू-फेस कार्यक्रम में प्रख्यात मलयालम लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता श्री केपी रामानुन्नी ने भाग लिया और अपने साहित्यिक जीवन और कार्यों से जुड़े अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि वे कोझिकोड शहर से हैं, जिसे यूनेस्को द्वारा भारत का पहला और एकमात्र साहित्य नगर घोषित किया गया है। सत्र के दौरान, उन्होंने अपनी मलयालम लघु कहानी ‘एमटीपी’ (गर्भाधान की चिकित्सा पद्धति) के कुछ अंश पढ़े, जिसका अंग्रेजी अनुवाद अबू बकर काबा ने किया है। नाटक के रूप में लिखी गई और सात भागों में विभाजित यह कहानी, लेखक के अपने जीवन के अनुभवों से प्रेरित होकर, गर्भपात की चिकित्सा प्रक्रिया से जुड़े गहन मानवीय नाटक का चित्रण करती है। अपने साहित्यिक सफर पर विचार करते हुए, श्री रामानुन्नी ने अपने प्रारंभिक वर्षों के बारे में बताया कि किशोरावस्था में वे एक साथ आध्यात्मिक और साम्यवादी साहित्य पढ़ रहे थे, जिससे उन्हें आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़ा और उन्होंने मनोचिकित्सक से परामर्श लिया। हालांकि यह उपचार निरथर्क साबित हुआ, लेकिन इस अनुभव ने उन्हें लेखन के माध्यम से सुकून और अभिव्यक्ति पाने के लिए प्रेरित किया।

फेस-टू-फेस कार्यक्रम के बाद भारत की बौद्धिक परंपराओं पर एक पैनल चर्चा हुई, जिसमें प्रो. रवैल सिंह, प्रो. हरेकृष्ण सतपथी और प्रो. बसवराज कालगुडी ने भाग लिया। श्री रवैल सिंह ने पंजाब की बौद्धिक विरासत पर चर्चा करते हुए तक्षशिला के प्राचीन शिक्षा केंद्र से लेकर नाथ योगी, सूफीवाद और सिख धर्म तक के इतिहास का वर्णन किया। प्रो. हरेकृष्ण सतपथी ने प्राचीन और समकालीन शिक्षा प्रणालियों की तुलना करते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश को आदिगुरु बताया और वेदों का एक श्लोक सुनाया। प्रो. बसवराज कालगुडी ने परिधीय ज्ञान प्रणालियों पर बात करते हुए, उन्हें मौखिक और लिखित परंपराओं में वर्गीकृत किया और प्राचीन भारत में जनजातीय और कृषि संबंधी ज्ञान परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डाला।

दोनों कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा खूब सराहा गया, जिनमें विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक और साहित्य प्रेमी शामिल थे, और इनमें सार्थक संवाद और चर्चा देखने को मिली। साहित्य अकादमी की ओर से सहायक संपादक डॉ. संदीप कौर ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय का तीसरा कैंपस राँची में शुरु होगा

राँची। आज अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय ने राँची में अपने तीसरे कैंपस की शुरुआत करने की घोषणा की है। इस कैंपस की शुरुआत के साथ ही अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन ने पूर्वी भारत में समाज से जुड़ी हुई और संदर्भ के मुताबिक शिक्षा देने की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया है। नया कैंपस विश्‍वविद्यालय के शिक्षा, विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रशासन के क्षेत्र में लंबे अनुभवों पर आधारित है। यह अकादमिक शिक्षा को समाज और क्षेत्र की ज़मीनी स्तर की सच्चाइयों को जोड़ने के नज़रिए को दिखाता है।

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय, राँची कैंपस के नामित कुलपति, ज़ुल्फ़िकार हैदर ने कैंपस के उद्देश्यों के बारे में बताते हुए कहा, “हम चाहते हैं कि हमारा राँची कैंपस भी क्षेत्र की सामाजिक और विकास की ज़रूरतों से नज़दीकी से जुड़े। हम चाहते हैं कि हमारा कैंपस क्षेत्र में ज्ञान को बढ़ावा देकर मानवीय विकास की राहें और भी बेहतर बनाए। विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की सीखने की ज़रूरतों और अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले कामकाजी पेशेवरों को ध्यान में रखकर कई तरह के कोर्सेस व कार्यक्रम शुरु किए जाएँगे। झारखंड के विविध आदिवासी और दूसरे सभी समुदायों की परंपराओं, इतिहास, ज्ञान परंपराओं और दुनिया के देखने-समझने के नज़रिए से अच्‍छी तरह से जुड़ना अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का मकसद है।”

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय का 150 एकड़ का कैंपस इटकी में बन रहा है। इस कैंपस में अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त क्लासरूम, प्रयोगशालाएँ, खेल-कूद की सुविधाएँ और विद्यार्थियों के लिए छात्रावास व शिक्षकों के लिए आवास की सुविधाएँ बनाई जाएँगी। इस कैंपस में एक अस्पताल और मेडिकल कॉलेज भी बनाने की योजना है। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इस कैंपस को ऊर्जा-कुशल सिस्टम से युक्त बनाया जाएगा और बारिश के पानी को इकट्ठा कर इस्तेमाल करने लायक बनाने सुविधा भी होगी।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के राँची कैंपस में स्नातक, स्नातकोत्तर, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट और सतत शिक्षा कार्यक्रम होंगे। इसमें एजुकेशन, विकास अध्ययन, अर्थशास्त्र, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन व सस्टेनेब्लिटी जैसे विषयों का अध्ययन होगा। ये कार्यक्रम झारखंड और पूर्वी भारत के विकास की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इन कार्यक्रमों को अकादमिक और जमीनी अनुभव रखने वाले शिक्षक पढ़ाएँगे।

इस अकादमिक वर्ष में दो मास्‍टर्स प्रोग्रैम शुरू किए जाएँगे – एम.ए. अप्लाइड इकोनॉमिक्स और एम.ए.डेवलपमेंट। इसके साथ ही लोकल डेवलपमेंट, प्रारंभिक बाल शिक्षा और शैक्षणिक मूल्यांकन विषयों में प्रोस्ट गैजुएशन डिप्लोमा भी शुरू किए जाएँगे। इस साल सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास से जुड़े कई अल्प-कालिक सर्टिफिकेट प्रोग्रैम भी शुरु होंगे।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के व्यापक उद्देश्यों को बताते हुए ज़ुल्फ़िकार हैदर ने कहा, “अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन के मार्गदर्शक मूल्यों के आधार पर सामाजिक भलाई के लिए अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय की स्थापना की जा रही है। शिक्षा, पढ़ाई-लिखाई, रिसर्च और ज़मीनी स्तर पर काम करते हुए हम न्यायपूर्ण, समानता पर आधारित, मानवीय और बेहतर-से-बेहतर स्वावलंबी समाज बनाने में अपना योगदान देना चाहते हैं। हमारा राँची कैंपस झारखण्ड और देश के पूर्वी हिस्से में नॉलेज क्रिएशन, समाज के हितों से जुड़े विचारों को बढ़ावा देने, यहाँ के लोगों के कौशल व क्षमताओं को बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभाएगा।”

अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय के बारे में

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, बेंगलूरु की स्थापना कर्नाटक सरकार के ‘अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी एक्ट 2010’ द्वारा की गई है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, भोपाल की स्थापना ‘मध्य प्रदेश निजी विश्‍वविद्यालय (स्थापना एवं संचालन) द्वितीय संशोधन अधिनियम, 2022’ तहत की गई है। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, राँची की स्थापना झारखण्ड सरकार द्वारा अधिनियमित अज़ीम प्रेमजी विश्‍वविद्यालय अधिनियम, 2022 के तहत की जा रही है।

अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन इन तीनों विश्वविद्यालयों की प्रायोजक संस्‍था है। फ़ाउण्डेशन सामाजिक हित और न्यायपूर्ण, समानता, मानवता और सस्टेनेबल समाज बनाने के मकसद से विश्वविद्यालयों की स्थापना कर रहा है।

Deepika Guleria
Senior Executive – Media Relations
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भारत भवन में जहीरुद्दीन पर चर्चा का औचित्य

भारत भवन, भोपाल मध्यप्रदेश की एक श्रेष्ठ संस्था है। इसमें साहित्य, कला और रंगकर्म पर विमर्श और प्रस्तुतियां होती है। साहित्य प्रभाग का नाम है वागर्थ। रंगकर्म प्रभाग का नाम है रंगमण्डल। चित्रकला प्रभाग का नाम है, रूपंकर। संगीत प्रभाग का नाम है अनहद। ये चार विभाग प्रारंभ से हैं। बाद में पाँचवा प्रभाग सिनेमा का बना, जिसका नाम रखा गया छवि। परन्तु मूल संकल्पना में प्रारंभिक चार प्रभाग ही थे। इन प्रभागों के ही कार्यक्रम यहाँ होते रहे है। वागर्थ के अंतर्गत साहित्यिक विमर्श किया जाता रहा है, जिनमें समीक्षकों का अखिल भारतीय समागम ‘‘समवाय’’ के नाम से हुआ था, जिसमें अज्ञेय जी, विष्णुकांत शास्त्री, रमेशचन्द्र शाह, नामवरसिंह सहित भारत के सभी दिग्गज समीक्षक आये थे और मैं भी आमंत्रित था। कविता एशिया में एशिया के शीर्ष कवि शामिल हुए थे। इसके रंगमण्डल में बी.व्ही. कारंत ने महत्वपूर्ण कार्य किया और अनहद में देश के सभी महत्वपूर्ण संगीतज्ञ, गायक एवं नर्तक- नर्तकियाँ आते रहे, जिनकी संख्या 150 से अधिक है। रूपंकर में सैयद हैदर रजा सहित अनेक विश्वक विख्यात चित्रकारों का योगदान रहा है और उनके चित्र यहाँ है। वनवासी कला के क्षेत्र में जे. स्वामीनाथन ने इसे वैश्विक प्रतिष्ठा दिलायी थी।
भारत भवन, मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित है और इसे केन्द्रीय अनुदान भी मिलता है तथा इसके न्यासियों में केन्द्र के प्रतिनिधि अवश्य  होते है। समकालीन विमर्श ही यहाँ की विशेषता रही है। क्योंकि यह इतिहास या दर्शन का केन्द्र नहीं है। यह साहित्य, संगीत, नाट्य, नृत्य और चित्रकला सहित सभी रूपंकर कलाओं का केन्द्र है। इन विषयों पर समकालीन राष्ट्र जीवन के प्रमुख विमर्श यहाँ होते रहने की परम्परा है।
इन दिनों भारत का समकालीन विमर्श क्या है? श्रीराम जन्मभूमि में भव्य मंदिर का निर्माण और उससे उभरी विराट जनचेतना भारत का सर्वोपरि विमर्श है। ऑपरेशन सिन्दूर के बाद भारत के शौर्य को जाग्रत करने वाले नाट्य एवं साहित्य सर्वोपरि विमर्श है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व समकालीन विमर्श है। स्वामी विवेकानंद के चिंतन से युवा वर्ग को मिलने वाली प्रेरणा समकालीन विमर्श है।
जहीरुद्दीन बाबर भारत भवन के लिए कोई विमर्श का विषय नहीं है। आप जहीरुद्दीन के भक्त हो या उस पर आसक्त हो या उसके निंदक हो, इस पर किसी इतिहास शोध संस्था में जाकर आप अपना परचा पढ़ सकते है। उस पर बहस कर सकते हैं। भारत भवन उसकी जगह नहीं। क्योंकि जहीरुद्दीन किसी समकालीन विमर्श का विषय ही नहीं है। अपने प्रिय यार बाबरी पर फिदा और नशे में धुत जहीरुद्दीन ने चार साल में भारत में कहां-कहां ठोकरे खाई, और कैसे तकलीफ में जिन्दगी काटी, और किस दुर्दशा में मरा, यह समकालीन विमर्श का अंग नहीं है। भारत के लिए जलालुद्दीन (अकबर) का तो कोई अर्थ है हालांकि वह भी अपने समय के भारत के 16वें हिस्से में राजपूतों के साथ साझेदारी में ही राज्य कर सका था। अतः समकालीन विमर्श में उसका भी कोई महत्व नहीं है। फिर भी भारत के किसी इतिहास के संस्थान में उस पर चर्चा करने वाले कर सकते है। भारत भवन के लिए तो वह भी विषय नहीं है।
किसी पूर्व कम्युनिस्ट ने बाबर के विरुद्ध कौन सी नई खोज कर ली है, यह किसी भी स्थिति में भारत भवन या मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के लिए कोई विषय नहीं हो सकता। कम्युनिस्टों को और पूर्व कम्युनिस्टों सहित सबको अपनी नई-नई ऐतिहासिक खोजों का पूरा अधिकार है  और इतिहास के केन्द्रों में उन पर बहस भी होनी ही चाहिए। परन्तु भारत भवन की स्थापना के उद्देश्ये और यहां के अब तक के विमर्श की गौरवशाली परम्परा में जहीरुद्दीन भाई पर केन्द्रित किसी नई किताब पर चर्चा का कोई भी औचित्य नहीं है। जलालुद्दीन या सलीम पर भी चर्चा की जगह भारत भवन नहीं हो सकता। कोई और ठांव खोजनी चाहिए।
(लेखक ऐतिहासिक व राजनीतिक विषयों के जानकार हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं)  

बाल साहित्य सृजन की प्रेरणा देती बाल साहित्यकारों की एनसाइक्लोपीडिया

बाल साहित्य को लेकर हाड़ोती के बाल साहित्यकारों पर केंद्रित पुस्तक जहां उनके बाल साहित्यिक अवदान को सामने लाती हैं वहीं भावी रचनाकारों को बाल साहित्य लिखने के लिए प्रेरित करती है। बच्चों की उम्र के अनुसार बाल साहित्य, तरुण साहित्य, किशोर साहित्य कैसा लिखा जाएं कि वह बच्चों के लिए रोचक और मनोरंजनपूर्ण हो, इस तथ्य को हाड़ोती के बाल रचनाकारों की कृतियों में काव्य और कथा उद्धरणों से नई पीढ़ी के बाल साहित्य रचनाकारों के सामने लाने में लेखिका डॉ .श्रीमती युगल सिंह सफल रही हैं । पुस्तक के उद्धरण स्पष्ट हैं कि बाल साहित्य ऐसा हो वह सहज सरल शब्दों में लिखा जाए, बच्चें उसे पढ़े तो उनका मनोरंजन हो और कोई न कोई जीवनोपयोगी संदेश भी उन्हें मिले। बाल साहित्य लेखन की सार्थकता तब ही है कि कविताएं ऐसी हो जो बच्चों की जुबान पर चढ़े और वे आसानी से याद रख कर गुनगुना सकें ,गा सकें।
नवोदित और स्थापित बाल साहित्यकार इस पुस्तक में वर्णित साहित्यिक उद्धरणों से बहुत कुछ सीख सकते हैं , यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी भी है और महत्व भी है।  लेखिका ने 45 बाल साहित्यकारों को इस पुस्तक में शामिल किया है। उनके परिचय के साथ-साथ उनके द्वारा रचित गद्य-पद्य बाल साहित्य की विधाओं पर रोशनी डाली गई है।
यह पुस्तक इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि यदि कोई भी शोधार्थी अथवा जिज्ञासु पाठक  हाड़ोती में बाल साहित्य की दशा और दिशा के बारे में जानने का अथवा शोध कार्य करने इच्छुक है तो यह कृति निश्चित ही उनके लिए  एनसाइक्लोपीडिया के रूप में उपयोगी रहेगी। एक ही जगह हाड़ोती अंचल के बाल साहित्यकार एवं बाल साहित्य की दशा और दिशा दोनों इस पुस्तक के केंद्र में हैं।
प्रस्तुत पुस्तक को अध्ययन की सुविधा के लिए 16 अध्यायों में लिखा गया है। प्रथम अध्याय में संदर्भ वश भाषा, भौगोलिक और इतिहास के परिपेक्ष में हाड़ोती का सारगर्भित परिचय दिया गया है। दूसरे अध्याय में बाल साहित्य के विकास क्रम को उल्लेखित किया है। आगे के अध्यायों में बाल साहित्यकारों की बाल साहित्य सृजन विधाओं कविता, कहानी, नाटक, ज्ञान विज्ञान, आत्मकथा, पहेलियां, लोरियां और अनुवाद को सौद्धारण रेखांकित किया गया है। एक अध्याय हाड़ोती अंचल में अकादमी पुरस्कार और नवाचारों पर है। बाल साहित्य की समीक्षा के क्षेत्र में आगे आने वाले साहित्यकारों पर भी एक अलग से अध्याय है।
बाल पत्रिकाएं अध्याय में देश में बाल पत्रिकाओं के क्रमिक विकास को उल्लेखित किया गया है। हाड़ोती अंचल के बाल साहित्यकारों के परिचय और उनकी कृतियों के परिचय पर भी दो अध्यायों में जानकारी समाहित की गई है। उन साहित्यकारों को भी स्थान दिया है जिन्होंने अन्य लेखन के साथ बाल साहित्य पर भी एक या दो कृति लिखी हैं। पुस्तक में स्थान पा कर निश्चित ही वे और अधिक बाल साहित्य सृजन के लिए प्रेरित होंगे।  अंत में संदर्भ ग्रंथों का उल्लेख कर लेखिका ने अपनी शोधवृत्ति का परिचय दिया है। आमुख पृष्ठ आकर्षक बना है।
पुस्तक की भूमिका लिखते हुए नोएडा के बाल साहित्यकार दिविक रमेश लिखते हैं, ” ग्रंथ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष, हाड़ौती अंचल के बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, ज्ञान-विज्ञान, आत्मकथा, जीवनी, पहेलियाँ, लोक कथाएँ, हालरे (लोरियाँ) आदि के साथ हाड़ौती अंचल के बाल साहित्यकारों का संक्षिप्त जीवन परिचय है। अलग-अलग विधाओं के साहित्य का विवेचन करते समय विधा के प्रमुख साहित्यकारों के निजी योगदान पर भी ध्यान केन्द्रित किया गया है। दृष्टि इतिहासपरक और प्रवृत्तिमूलक अधिक रही है। खोजा गया है कि हाड़ौती अंचल में सर्वाधिक बाल काव्य की कृतियों के रचनाकार सुरेशचंद्र सर्वहारा हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बच्चों को ज्ञान, अनुशासन, संस्कार आदि से परिचित कराया है।” पुस्तक पर अपनी बात में साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ने  लेखिका को इस कृति के लिखने के लिए प्रेरित करने, बाल साहित्य के क्षेत्र में अपने प्रयासों एवं योगदान की विस्तार से चर्चा कर इस कृति को बाल साहित्य के क्षेत्र में उपयोगी कृति बताया।
लेखिका डॉ. श्रीमती युगल सिंह अपनी बात में लिखती हैं कि यह कार्य और पुस्तक उनके शोध प्रबंध का विस्तारित रूप है। शोध प्रबंध की सीमा होती है, उसमें केवल 15 बाल साहित्यकारों को लिया गया था। इस कृति को लिखने का विचार  बनाया तो उपलब्ध अन्य बाल साहित्यकारों को भी अपने कार्य का हिस्सा बना कर इस विषय को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया है। वह लिखती हैं, ” हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य हिन्दी के बाल साहित्य की समृद्धि से प्रेरणा पाकर ही पुष्पित पल्लवित हुआ है। अतः कविता, कहानी, नाटक, पहेलियाँ, उपन्यास, अनुवाद, आत्म कथा के प्रारम्भिक स्वरूप का भी किंचित परिचय दिया गया है। हाड़ौती अंचल के बाल साहित्य की मजबूत पृष्ठभूमि की जड़ में हिन्दी का बाल साहित्य ही समाहित है। जहाँ तक मेरी विहंगम दृष्टि पहुँची है मुझे प्रतीत होता हैं कि नन्हें शिशुओं के लिए लोरियों, हालरों पर कोई बाल पुस्तक नहीं है जिसे पढ़कर, गाकर माताऐं बच्चों को संस्कारित करने, उनको लाड़-दुलार करने के साथ ही शिक्षित एवं मनोरंजन भी कर सके।” उनका यह कथन बाल साहित्य सृजन को एक दिशा प्रदान करता है।
कह सकते हैं कि हाड़ौती के बाल साहित्य के संदर्भ में बाल साहित्यकार, सृजन विधाएं, साहित्यिक उद्धरण, पुरस्कार, समीक्षा , कृतियां और परिचय सभी पहलुओं को छूते हुए बाल साहित्य की दशा और दिशा को बहुत ही परिश्रम, गहन अध्ययन और समीक्षात्मक एवं शोध दृष्टि से लेखिका ने पुस्तक में करीने  से संजोया है। इसी प्रकार से अन्य अंचल के बाल साहित्यकारों पर काम किए जाने के लिए लेखिका का यह कार्य प्रेरित करता है।
पुस्तक : हाड़ोती अंचल का  बाल साहित्य का उद्भव एवं विकास
लेखिका : डॉ. श्रीमती युगल सिंह
प्रकाशक : जीएस पब्लिशर डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2025
मूल्य : 595 रुपए
पृष्ठ : 149     हार्ड बाउंड
ISBN : 978 – 81 – 19396 – 03 – 0
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल

राष्ट्रवाद को मुखर करती स्नेहलता शर्मा की रचनाएं

रग – रग में बसे राष्ट्रवाद और देश प्रेम को केंद्र में रख कर आम जन को उद्वेलित करने वाली रचनाकार स्नेहलता शर्मा का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर में 4 अगस्त 1967 को पिता स्व. गोपाल कृष्ण एवं माता स्व. सीता रानी के परिवार में हुआ। ये ढ़ाई वर्ष की रही होंगी तब इनके पिता इन्दौर से कोटा पत्थर का व्यवसाय करने के लिए आ गए और यहीं बस गए। स्वयंपाठी छात्रा के रूप में आपने अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी में स्नातकोत्तर एवं एम.एड. की शिक्षा प्राप्त की है। आपने बाराँ जिले में अध्यापिका के साथ शिक्षा विभाग में राजकीय सेवा शुरू की। वर्ष 1994 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से व्याख्याता अंग्रेजी पद पर चयनित होकर चेचट में लगभग दो वर्ष रहीं। इसी दौरान अगस्त 1995 में पीयूष शर्मा से विवाह हो गया। साहित्यिक अभिरुचि के साथ – साथ  मंच संचालन, एंकरिंग, रंगमंच और टीवी सीरियलों में अभिनय और नाट्य लेखन में भी आपकी विशेष रुचि है।  कोटा आकाशवाणी से लंबे अरसे तक जुड़े रहकर महिला जगत तथा बाल संसार के लिए कार्यक्रमों में एंकरिंग भी की। सीमा कपूर के निर्देशन में दूरदर्शन पर प्रसारित ‘एकलव्य’ सीरियल में आपकी भूमिका रही।
देश प्रेम, देश की माटी से प्यार, देश पर बलिदान होने वाले वीर सपूत, स्वतंत्रता सेनानियों के किरदारों पर लिख कर राष्ट्रवाद से प्रेरित काव्य सृजन के साथ-साथ विभिन्न विषयों और जीवन के मीठे-कड़वे अनुभवों एवं अनुभूतियों को सहेजते समेटते हुए भावनाओं को कागज़ पर उकेर कविता लिखने में सिद्धहस्त रचनाकार स्नेहलता शर्मा ने साहित्य के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। यह कहें कि कविता लेखन इनकी अभिरुचि ही नही इनके दिल की धड़कन है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आपने विद्यार्थी जीवन से ही  कविता लिखना तथा विद्यालय में विशेष अवसरों पर स्वरचित कविता सुनाना इनकी हॉबी बन गया। विद्यालय और महाविद्यालय की पत्र-पत्रिकाओं में निबंध, कहानी, एकांकी, कविता आदि प्रकाशित होने से इनके हौसले को पंख लग गए। शिक्षकों और साथियों का लगातार प्रोत्साहन मिलने से लेखनी में निखार आता गया। इनके लेखन की मुख्य विधा कविता ही रही, यदा-कदा कहानी, निबंध, शोध-पत्र भी लिखती हैं। मुख्यतः हिंदी भाषा ही लेखन और अभिव्यक्ति का माध्यम बनी परंतु कभी-कभी कुछ कविताएँ, एकांकी व शोध-पत्र अंग्रेज़ी भाषा में भी लिखे हैं। इनकी रचनाएँ अधिकांशतः छंद मुक्त हैं। कुछ रचनाएँ गजलें, नज्में, व गीत शैली में लिखे हैं जिनमें उर्दू व हिंदी दोनों भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया गया है। समाज को विविध प्रकार से सावचेत करने वाली लगभग 200 कविताओं का सृजन कर चुकी हैं।
ये अमृता प्रीतम, शिवानी, अजीज आजाद, मुंशी प्रेमचंद, नीरज, हरिशंकर परसाई आदि से प्रभावित हैं, जिनका समकालीन लेखन आज भी प्रासंगिक है। इनका मानना है कि लेखन की कोई भी विधा हो, साहित्यकार को ऐसी रचनाओं का सृजन करना चाहिए जो समाज को एक दिशा दे, मंथन और चिंतन के विषय दे जिन पर सभी अपनी सकारात्मक अभिव्यक्ति दे सकें। इसकी बानगी हाल ही में प्रकाशित इनके काव्य संग्रह, ‘सुनो, पत्थरों के भीतर नदी बहती है’ है। इसके अतिरिक्त कुछ आधा दर्जन साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इनकी कविताएँ हैं। इन्होंने इनके स्वर्गीय ससुर शिवप्रसाद शर्मा के काव्य संकलन ‘आस्था का दीप’ का संपादन भी इन्होंने किया है।
अनुभव के संग कविताओं के रंग, साफ झलकते हैं इनके सृजन में। कहती हैं, ” कोटा को स्टोन सीटी के नाम से पहचान मिलने से, यहीं पढ़ी लिखी होने से मन में पत्थर की छवि समा गई और कविताओं में पत्थर शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है। इसीलिए पुस्तक का नामकरण भी सुनो.पत्थरों के भीतर नदी बहती है रख दिया।”
 इनकी रचनाओं में प्रतीक्षा, परीक्षा, जीवन-दर्शन, मंथन, अध्यात्म की भक्ति धारा, वीर रस , शृंगार, प्रकृति, प्रेम एवं विविध  अनुभूतियों के साथ भावनाओं की बहती अविरल धारा बहती दिखाई देती है। रचनाओं में एहसास है, जज्बात है, बच्चों की कोमल भावनाएं हैं, माँ के वेदना है, कलियां हैं, प्रतीक्षा है, रिश्ते नाते भी हैं और प्रेम का सागर हिलोरे लेता दिखाई देता है। कर्मवाद के सिद्धांत पर आधारित रचनाएं सीख देती हैं भाग्य,  हाथ की रेखाओं से नहीं कर्म करने से बनता है अर्थात पुरुषार्थ ही महत्वपूर्ण है। रचनाओं में सच्च के इकबाल को बुलंद किया गया है। बच्चों के कोमल मन, उनकी हँसी, बाल हट, रुदन, भोलापन आदि को लेकर उनकी बाल रचनाएं हैं। इनका सृजन आशा के दीप जलता है कि समाज की विद्रूपताओं और विषमताओं के बीच भी उनकी लेखनी अपनी धार कभी नहीं खोएगी और शब्दों के वार से इसमें बदलाव की कोशिश जारी रहेगी। रंगीतिका संस्था के माध्यम से साहित्य सेवा कर रही हैं । वर्तमान में आप कोटा शहर की मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी पद पर सेवारत हैं और साहित्य सृजन में लगी हैं।
(संपर्क मकान न. 2, महावीर नगर विस्तार योजना, 6 सेक्टर के सामने, सुभाष सर्किल के पास, कोटा, राज.
मो: 9602943772 )
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

ईरान की उथल-पुथल एवं अमेरिका से टकराव गंभीर चुनौती

ईरान में बार-बार उभरती उथल-पुथल केवल किसी एक घटना, किसी एक फैसले या किसी एक पीढ़ी का आक्रोश नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक, वैचारिक और भू-राजनीतिक संरचना की परिणति है, जिसने 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से इस देश को आकार दिया है। आज जब सड़कों पर विरोध के दृश्य, सोशल मीडिया पर आक्रोश और पश्चिमी विश्लेषकों की ओर से सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज हैं, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि ईरान का संकट साधारण आंतरिक असंतोष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन से गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है। ईरान की आंतरिक उथल-पुथल एवं अस्थिरता के साथ-साथ उसका अमेरिका के साथ टकराव युद्ध की स्थितियांे एवं वैश्विक असंतुलन का बड़ा कारण बन रहा है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव केवल द्विपक्षीय तनाव नहीं है, बल्कि इसके दुष्प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ सकते हैं। इस संघर्ष से पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बढ़ता है, जिसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की अस्थिरता अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धमनियों को बाधित कर सकती है, जिससे महंगाई और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ेगा। इसके साथ ही यह टकराव क्षेत्रीय देशों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध में खींच सकता है, जिससे शरणार्थी संकट, आतंकवाद और साम्प्रदायिक तनाव गहराने की आशंका है। महाशक्तियों के परस्पर टकराव की स्थिति में विश्व राजनीति और अधिक धू्रवीकृत होगी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर पड़ेगा और शांति की जगह अविश्वास व सैन्य प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनेगा, जिसका खामियाजा अंततः पूरी मानवता को भुगतना पड़ सकता है।
1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान में केवल शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाकर एक नई सरकार स्थापित नहीं की थी, बल्कि एक ऐसी वैचारिक-राजनीतिक संरचना रची थी, जिसमें धर्म, राजनीति और सुरक्षा-तंत्र एक-दूसरे में घुलमिल गए। ‘विलायत-ए-फकीह’ की अवधारणा के तहत सर्वाेच्च धार्मिक नेतृत्व को अंतिम राजनीतिक अधिकार सौंपा गया। इसी व्यवस्था के संरक्षण और विस्तार के लिए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी आईआरजीसी को खड़ा किया गया, जो समय के साथ केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक ताकत का भी केंद्र बन गया। यही कारण है कि ईरान की व्यवस्था को केवल सरकार या शासन कहकर नहीं समझा जा सकता; यह एक संपूर्ण तंत्र है, जिसे हटाने के लिए केवल विरोध-प्रदर्शन पर्याप्त नहीं होते।
ईरान ने पिछले चार दशकों में कई बड़े जनांदोलन देखे हैं। 2009 का ग्रीन मूवमेंट, 2017-18 की आर्थिक असंतोष की लहर, 2019 में ईंधन मूल्य वृद्धि के खिलाफ उग्र प्रदर्शन और 2022 में सामाजिक स्वतंत्रताओं को लेकर उठी आवाजेंकृहर बार यह माना गया कि शायद अब व्यवस्था डगमगाएगी। लेकिन हर बार वही सत्ता, वही ढांचा और वही शक्ति-संतुलन कायम रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ईरान में सुरक्षा-तंत्र राज्य से अलग नहीं, बल्कि राज्य का ही विस्तार है। अरब स्प्रिंग के दौरान मिस्र या तुर्किए में सेनाओं ने अंततः राष्ट्र-राज्य को बचाने का रास्ता चुना, लेकिन ईरान में आईआरजीसी खुद को क्रांति और इस्लामिक रिपब्लिक का संरक्षक मानती है, न कि केवल सीमाओं की रक्षा करने वाली संस्था। फिर भी यह कहना गलत होगा कि ईरान की व्यवस्था पर कोई दबाव नहीं है। वास्तव में, आज का दबाव पहले से कहीं अधिक जटिल और गहरा है। इसका सबसे बड़ा कारण है पीढ़ीगत बदलाव।
ईरान की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, जिसने 1979 की क्रांति न देखी है और न ही उससे भावनात्मक रूप से जुड़ा है। उनके लिए क्रांति कोई जीवित स्मृति नहीं, बल्कि इतिहास की किताबों का अध्याय है। उनकी आकांक्षाएं इंटरनेट, वैश्विक संस्कृति, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं से प्रेरित हैं। जब ये आकांक्षाएं एक सख्त सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से टकराती हैं, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है।
इस असंतोष को और तीखा बनाया है दशकों से चले आ रहे अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों ने। इन प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। तेल निर्यात सीमित हुआ, विदेशी निवेश रुका, मुद्रा कमजोर पड़ी और महंगाई ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी। विकास और आधुनिकीकरण की गति धीमी पड़ी, जिससे खासकर शहरी मध्यम वर्ग और युवा वर्ग में भविष्य को लेकर निराशा बढ़ी। आज ईरान के कई नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिका और इजराइल के साथ अंतहीन दुश्मनी का बोझ उन्हीं के कंधों पर डाला जाना जरूरी है। धीरे-धीरे यह वैचारिक टकराव राष्ट्रवादी गौरव से अधिक सामाजिक बोझ के रूप में देखा जाने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस पूरे परिदृश्य को और खतरनाक बना देता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के आदेश और सैन्य हस्तक्षेप के संकेतों ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ईरान आज 1979 के बाद से शायद सबसे गंभीर बाहरी दबाव का सामना कर रहा है। यह टकराव केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा भू-राजनीतिक खेल बन चुका है, जिसमें महाशक्तियां अपने-अपने हित साधना चाहती हैं।
अकसर यह धारणा बनाई जाती है कि बाहरी हस्तक्षेप से ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव है। लेकिन इतिहास बताता है कि ईरान में विदेशी दखलअंदाजी ने हमेशा उल्टा असर डाला है। 1953 में मोसादेग सरकार के तख्तापलट से लेकर आज तक, ‘विदेशी साजिश’ का कथानक ईरानी राष्ट्रवाद को मजबूत करता रहा है। बाहरी समर्थन से होने वाले आंदोलनों को जनता का व्यापक और स्थायी समर्थन नहीं मिल पाता। यही वजह है कि विपक्षी नेतृत्व, जो अक्सर देश से बाहर बैठा होता है, ईरान के भीतर विश्वसनीय विकल्प नहीं बन सका। इसके अलावा, ईरान वेनेजुएला नहीं है। यह एक बड़ा, संगठित और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण देश है, जिसकी पकड़ इराक, सीरिया, लेबनान और यमन तक फैली हुई है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप पूरे पश्चिम एशिया को आग में झोंक सकता है। इजराइल, खाड़ी देश, अमेरिका और यूरोपीय शक्तियां-सब इसके प्रभाव में आएंगे। चीन और रूस भी एक अस्थिर ईरान नहीं चाहते, क्योंकि वह उनके क्षेत्रीय और वैश्विक हितों के खिलाफ होगा। यह बहुध्रूवीय संतुलन ईरान की व्यवस्था को एक अप्रत्यक्ष सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
ईरान के भीतर आम नागरिकों का गुस्सा अब केवल आर्थिक कुप्रबंधन या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रह गया है। एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि शासन की प्राथमिकताएं आम लोगों की जरूरतों से कट चुकी हैं। जब नागरिक भोजन, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की मांग कर रहे हों, तब बाहरी दुश्मनों के खिलाफ वैचारिक युद्ध और यहूदी-विरोधी राजनीति उन्हें खोखली प्रतीत होती है। कई ईरानी मानते हैं कि इसी नीति ने देश को अंतरराष्ट्रीय अलगाव में धकेला और आर्थिक बर्बादी को जन्म दिया। यदि ईरान में बाहरी मदद से सत्ता परिवर्तन की कोशिश होती है, तो इसके परिणाम केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। मध्य पूर्व में शक्ति-संतुलन बुरी तरह बिगड़ सकता है।
शिया-सुन्नी तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजार-सब पर इसका गहरा असर पड़ेगा। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होगी। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। चाबहार बंदरगाह से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक, ईरान भारत की विदेश नीति में अहम स्थान रखता है। ऐसे में भारत को अत्यंत सावधानी के साथ अपने रणनीतिक संतुलन को बनाए रखना होगा, ताकि वह किसी एक ध्रूव का मोहरा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। अंततः, ईरान की वर्तमान उथल-पुथल यह संकेत देती है कि व्यवस्था पर दबाव वास्तविक है, लेकिन तात्कालिक पतन की भविष्यवाणियां अक्सर जल्दबाजी साबित होती हैं। यह संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि पहचान, वैचारिक दिशा और भविष्य की कल्पना का संघर्ष है। ईरान का भविष्य संभवतः न तो अचानक क्रांति से बदलेगा और न ही केवल दमन से स्थिर रहेगा। यह एक लंबी, जटिल और अंतर्द्वंद्वों से भरी प्रक्रिया होगी, जिसके परिणाम न केवल ईरान, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित करेंगे।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)


लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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फोनः 22727486, 9811051133