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कार्यकर्ता संगठन के रीढ होते हैंः डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय

नई दिल्ली। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति ,नई दिल्ली का “दो दिवसीय” राष्ट्रीय कार्यकारिणी का बैठक सह संगठनात्मक विचार- विमर्श 6 एवं 7 मार्च, 2026 को ‘ साधना भवन’ के ‘ केंद्रीय सभागार’ में संपन्न हुआ।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बैठक के उद्घाटन सत्र को अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व चेयरमैन, उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग,प्रयागराज आचार्य ( डॉ.) ईश्वर शरण विश्वकर्मा जी,राष्ट्रीय संरक्षक प्रमुख एवं गोपाल नारायण विश्वविद्यालय, जमुहार के कुलाधिपति श्रीमान गोपाल नारायण सिंह जी, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आचार्य (डॉ.) देवी प्रसाद सिंह एवं योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडे के गरिमामई उपस्थिति में ‘ दो दिवसीय’ बैठक के निमित्त 6 सत्रों का आयोजन योजित हुआ, जिसमें संगठनात्मक विषयों पर व्यापक स्तर पर विचार- विमर्श एवं भविष्य के कार्ययोजना (रोडमैप)पर सार्थक एवं मूल्यवान तार्किक चिंतन हुआ।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सभी सदस्यों ने अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, बिहार प्रांत के संरक्षक,नव नालंदा विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति एवं सांची बौद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर ( डॉ.) वैद्यनाथ लाभ को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई एवं उनके अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना में दिए गए “बौद्धिक उपादेयता” को स्मरण किया गया।

प्रथम दिवस के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडे जी ने देश भर से आए कार्यकर्ताओं को आभार दिए एवं कहे की हर कार्यकर्ता को अपने दायित्वों का निर्वहन ” राष्ट्रीय भावना” के अनुरूप करते हुए समाज के सभी वर्गों तक इतिहास के उपादेयता, सत्य एवं साक्ष्य आधारित शोध एवं राष्ट्रवादी प्रत्यय को पहुंचाने का सफल प्रयास करना चाहिए।

बैठक के अन्य सत्रों में योजना के विभिन्न आयामों के प्रमुखों द्वारा अपने आयाम का “समृद्धि प्रतिवेदन” प्रस्तुत किए गए एवं आगामी योजनाओं का कार्ययोजना ( रोड मैप) को रखा गया।

मंच संचालन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय महासचिव श्री हेमंत ढिंग मजूमदार जी ने किया

मध्यप्रदेश में खुलते स्त्रियों के लिए बंद कपाट

 विश्व महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष  

समाज में स्त्रियों के लिए बंद कपाट मध्यप्रदेश में खुल गए हैं. स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में बीते वर्षों में जो कोशिशें हुई हैं, वह पूरे देश के लिए रोल मॉडल साबित हो रहा है. स्त्री समाज की नींव मजबूत करने के लिए जरूरी होता है कि उन्हें शिक्षित किया जाए और आर्थिक रूप से उन्हें सशक्त बनाया जाए. महिला सशक्तीकरण, सुरक्षा, सम्मान और समग्र विकास के अद्वितीय कोशिशों ने महिला समाज को उजास से भर दिया है. शहरी इलाके होंं या गांव-पंचायत, सभी जगहों पर महिलाओं की बुलंद आवाज सुनाई देती है.  राज्य के कोने-कोने में स्व-सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को उनके हुनर के अनुरूप अवसर मिल रहा है. साथ में केन्द सरकार द्वारा महिला कल्याण के लिए चलायी जा रही योजनाओं ने महिलाओं को और भी संबल दिया है. इस बार विश्व महिला दिवस पर मध्यप्रदेश एक नया अध्याय लिखने जा रहा है. केन्द सरकार द्वारा लागू उज्ज्वला योजना, जनधन खाता, मातृत्व वंदना योजना और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रमों ने करोड़ों बेटियों, बहनों के जीवन को नई दिशा दी है वहीं मध्यप्रदेश में महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हो रहे हैं।
महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना सबसे क्रांतिकारी पहलों में से एक रही है। पहली नजर में लगता कहा जाता है कि महिला वोटबैंक को मजबूत करने के लिए रुपये बांटने वाली स्कीम चलायी जा रही है लेकिन जतीनी हकीकत जाँचने जाएं तो पता चलेगा कि इन रुपयो से महिला सशक्तिकरण के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं. करोड़ों रुपये महिलाओं के खातों में पारदर्शी डिजिटल अंतरण के माध्यम से प्रदान किए गए, जिसने मध्यप्रदेश की महिलाओं को आत्मनिर्भरता की नई दिशा दी है। इस राशि से महिलाओं ने स्व-रोजगार की शुरूआत की है. पहले इस राशि से किराये की सिलाई मशीन ली गई और बाद में अपने मुनाफा से स्वयं की सिलाई मशीन खरीद ली गई. पशु पालन से लेकर किराने की दुकान जैसे अनेक कोशिशों में महिलायें सफल हुई हेैं. इस आत्मनिर्भरता के चलते आहिस्ता-आहिस्ता महिलायें स्वयं में सक्षम होकर योजना से स्वयं ही बाहर होकर शेष जरूरतमंद महिलाओं को अवसर दे रही हैं. सरकार द्वारा जारी आंकड़ें इस बात की पुष्टि करते हैं.
इसी तरह सात महिलाओं ने अपना समूह तैयार कर एक नए किस्म की कोशिश को अंजाम दिया है. इसे स्व-सहायता समूह कहा गया. स्व-सहायता का सामान्य रूप से अर्थ समझ सकते हैं स्वयं की सहायता करना. स्व-सहायता समूह ने सशक्तिकरण के नए आयाम छुए हैं. कल तो जिन कामों पर पुरुषों का एकाधिकार था, आज उनमें महिलाएं पारंगत हैं. बिजली ठीक करने से लेकर बैंक खाता खुलवाने और उसका परिचालन करने जैसे अनेक कार्य महिलाएं कर रही हैं. मोहन सरकार ने अनेक कार्य स्व-सहायता समूह को सौंप दिया है जो कभी पहले निजी संस्थाएं करती थीं. मोहन सरकार की इस पहल से जैसे पूरा परिदृश्य बदल रहा है. मध्यान्ह भोजन से लेकर गणवेश बनाने का कार्य बड़े पैमाने पर स्व-सहायता समूह की महिलाएं कर रही हैं. प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के माध्यम से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है।
जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में पीएम-जनमन तथा धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्थान अभियान के माध्यम से सैकड़ों नए आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन प्रारंभ किया गया है। इससे जनजातीय महिलाओं और बच्चों को पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ उनके गांवों तक उपलब्ध कराई गई हैं। हजारों भवनों के निर्माण और उन्नयन से आंगनवाड़ी व्यवस्था अधिक सशक्त और सुरक्षित बनी है। पोषण अभियान के अंतर्गत लाखों बच्चों के विकास की निगरानी के लिए अत्याधुनिक उपकरण प्रदान किए गए हैं। फेस-मैच आधारित सत्यापन ने हितग्राहियों को पारदर्शी और समयबद्ध लाभ दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों ने पोषण और पर्यावरण—दोनों आयामों को जोडक़र जनभागीदारी का नया मॉडल प्रस्तुत किया है।
मध्यप्रदेश, महिला सम्मान और सुरक्षा के विषय में समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। मिशन शक्ति के अंतर्गत वन स्टॉप सेंटरों, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पिंक ड्राइविंग लाइसेंस, जेंडर चैंपियन पहल और सशक्त वाहिनी कार्यक्रमों ने महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तीकरण को और मजबूती प्रदान की है। बीते साल मेंं 20,332 महिलाओं को त्वरित राहत और परामर्श उपलब्ध कराया। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत नवजात बालिकाओं का स्वागत, पूजा-अर्चना और व्यापक पौधारोपण ने समाज में बेटियों के सम्मान की संस्कृति को मजबूत किया है। पिंक ड्राइविंग लाइसेंस और जेंडर चैंपियंस जैसी पहलें बालिकाओं के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को नई उड़ान दे रही हैं। राज्य एवं जिला स्तर के हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ वुमन ने जनजागरूकता की दृष्टि से अभूतपूर्व कार्य किया है। 100 दिवसीय अभियान, घरेलू हिंसा निरोधक कार्यक्रम, बाल विवाह मुक्ति प्रतिज्ञा, क्कष्ट-क्कहृष्ठञ्ज अधिनियम जागरूकता अभियान, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण और आत्मरक्षा कार्यक्रमों ने समाज में व्यापक संवेदनशीलता विकसित की है। वर्ष साल में 1.47 लाख से अधिक गतिविधियाँ आयोजित हुईं और लाखों नागरिकों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि मध्यप्रदेश, महिला सम्मान और सुरक्षा के विषय में समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।
मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि यहां से आरंभ की गई योजनाओं को देश के अन्य प्रदेश वैसा ही अपना लेते हैं. मातृशक्ति को लेकर मध्यप्रदेश हमेशा से संवेदनशील रहा है. महिलाओं के आमूलचूल परिवर्तन की साक्षी बनता मध्यप्रदेश को दिशा देने में लोकमाता अहिल्या देवी जैसी शासक, अवंतिबाई, रानी कमलापति जैसी साहसी और सुभदा कुमारी चौहान जैसी विदुषी महिलाओं का मार्गदर्शन हेै. मध्यप्रदेश हमेशा से स्त्री शक्ति का सम्मान करता रहा है और इस विश्व महिला दिवस पर हम सब स्त्री शक्ति का नमन करते हैं, अभिनंदन करते हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं) 

राजभाषा प्रभाग द्वारा भ्रामक उत्तर की शिकायत

सेवा में, 

सचिव,

कारपोरेट कार्य मंत्रालय,

शास्त्री भवन, नई दिल्ली-110001।

विषय: राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) के अनुपालन की 100 प्रतिशत झूठी रिपोर्टिंग और ‘सामान्य परिपत्र सं. 01/2026’ केवल अंग्रेजी में जारी करने के विरुद्ध सप्रमाण शिकायत।

महोदय,

मैं मंत्रालय के राजभाषा प्रभाग द्वारा दिनांक 05.01.2026 को दिए गए भ्रामक उत्तर के विरुद्ध यह साक्ष्य-आधारित शिकायत दर्ज कर रहा हूँ। मंत्रालय का यह दावा कि वह “सजग” है, स्वयं उसके द्वारा जारी दस्तावेजों से ‘सफेद झूठ’ सिद्ध होता है।

शिकायत के मुख्य बिंदु और साक्ष्य:

  1. ताजा उल्लंघन: मंत्रालय ने वर्ष 2026 का पहला सामान्य परिपत्र 24 फरवरी 2026 को जारी किया है जो अंग्रेजी में है (General Circular No. 01/2026- Companies Compliance Facilitation Scheme, 2026)। यह सिद्ध करता है कि मंत्रालय के अधिकारी राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठकों में व त्रैमासिक राजभाषा रिपोर्टों में असत्य तथ्य प्रस्तुत करते हैं।
  2. विधिक प्रावधानों का उल्लंघन: राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3(3) के अनुसार सामान्य आदेश, परिपत्र, विज्ञापन और निविदाएं अनिवार्य रूप से द्विभाषी होनी चाहिए। ‘द्विभाषी’ का अर्थ है एक ही दस्तावेज में दोनों भाषाओं का एक साथ होना। जब तक यह परिपत्र द्विभाषी रूप में जारी नहीं होता, तब तक यह विधिक रूप से अवैध और शून्य है।
  3. झूठी रिपोर्टिंग: गत् 20 वर्षों में कारपोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा एक भी निविदा, भर्ती विज्ञापन या परिपत्र राजभाषा में जारी नहीं किया गया, फिर भी त्रैमासिक रिपोर्टों में 100 प्रतिशत अनुपालन दिखाया जा रहा है। वर्ष 2025 के सभी 8 परिपत्र (01/2025 से 08/2025) केवल अंग्रेजी में जारी किये गये थे।
  4. मंत्रालय की हिन्दी वेबसाइट का विकल्प छिपाया गया है जबकि लैंडिंग पेज पर भाषा चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए जैसा कि भारतीय रिजर्व बैंक, सेबी व डाक विभाग ने दिया है।
  5. मंत्रालय की हिन्दी वेबसाइट की वर्तनी व व्याकरण की त्रुटियों की कोई भी व्यक्ति जाँच नहीं करता है इसलिए गत 8-9 वर्षों से स्पष्ट दिखाई देती त्रुटियों में भी सुधार नहीं किया जा रहा है, मंत्रालय के राजभाषा अधिकारी कर्तव्यहीन हैं। जैसे-

  6. हिंदी वेबसाइट पर कुछ सूचना और दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, पूरी जानकारी हेतु कृपया अंग्रेजी वेबसाइट देखें।
  7. सेवा शिकायत का फार्म द्विभाषी नहीं बना रहे हैं-
  8. 2014 से कंपनी निगमन प्रमाण-पत्रों व डिन आबंटन पत्रों से राजभाषा को हटा दिया गया है। जबकि नियम 11 के अनुसार सभी प्रमाण-पत्र डिगलॉट जारी करना अनिवार्य है।

अतः इन अवैध अंग्रेजी दस्तावेजों को तत्काल वापस लेकर नियमानुसार हिन्दी और अंग्रेजी (डिगलॉट) में जारी करें। मंत्रालय अपनी वेबसाइट

भवदीय,

अभिषेक कुमार

ग्राम सुल्तानगंज, रायसेन (म.प्र.)

बिहार की राजनीति में सत्ता परिवर्तन से जुड़े सवाल

बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ उस समय सामने आया जब राज्य के लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतिश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का निर्णय स्वीकार किया और इसके लिए नामांकन भी दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के अवसर पर देश के गृह मंत्री अमित शाह का पटना पहुँचना भी इस राजनीतिक घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। लगभग दो दशकों तक बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार का यह निर्णय केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि बिहार की सत्ता और राजनीति के स्वरूप में आने वाले बड़े परिवर्तन का संकेत भी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब बिहार की राजनीति पहले से ही गठबंधनों, समीकरणों और सत्ता-संतुलन के दौर से गुजर रही है। इस निर्णय के साथ यह स्पष्ट हो गया कि बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। यह परिवर्तन जहां एक ओर नई संभावनाओं का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर कई सवाल भी खड़े करता है, क्या यह जनादेश का सम्मान है या उससे विचलन? क्या यह बिहार के लिए नई दिशा का मार्ग है या राजनीतिक रणनीति का एक नया अध्याय?

नीतिश कुमार को लंबे समय से “सुशासन पुरुष” के रूप में जाना जाता रहा है। उन्होंने बिहार को लंबे समय तक स्थिर राजनीतिक नेतृत्व दिया और शासन व्यवस्था को कई स्तरों पर व्यवस्थित करने का प्रयास किया। सड़कों, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, पंचायत सशक्तिकरण और प्रशासनिक सुधार जैसे अनेक क्षेत्रों में उनके कार्यों की चर्चा होती रही है। उनके शासनकाल में बिहार ने अराजकता और अपराध की छवि से बाहर निकलकर विकास और स्थिरता की ओर कदम बढ़ाने का प्रयास किया, इसलिए उनका मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा की ओर जाना केवल एक पद परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक भूमिका के पुनर्निर्धारण के रूप में भी देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को अधिक व्यापक बनाने के लिए यह कदम उठाया गया है, जबकि कुछ इसे बिहार की सत्ता में नई पीढ़ी और नए नेतृत्व को अवसर देने की रणनीति के रूप में भी देखते हैं। बिहार में अपेक्षित संभावनाएं पूरी तरह आकार नहीं ले पायी, इसलिये भी भाजपा खुद का मुख्यमंत्री लाकर बिहार को विकास से जोड़ना चाहती है।

नीतिश कुमार के इस निर्णय के बाद विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्ष का आरोप है कि विधानसभा चुनाव में जनता ने नीतिश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए वोट दिया था और पाँच वर्षों के जनादेश के बीच में मुख्यमंत्री पद छोड़ना जनता के विश्वास के साथ न्याय नहीं है। विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि यह निर्णय राजनीतिक समीकरणों का परिणाम है और इसमें जनता की भावना को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। कुछ विपक्षी नेताओं ने इसे “जनादेश के साथ खिलवाड़” और “राजनीतिक समझौते की राजनीति” करार दिया है। उनका तर्क है कि यदि मुख्यमंत्री बदलना ही था तो जनता के पास फिर से जाने का रास्ता अपनाया जाना चाहिए था। इस प्रकार यह बहस केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता की भी बन गई है।
दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा बिहार में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को और अधिक मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यदि राज्य में भाजपा का मुख्यमंत्री आता है, तो यह बिहार की राजनीति के लिए एक नया अध्याय हो सकता है। भाजपा लंबे समय से यह दावा करती रही है कि वह राज्य में विकास, सुशासन और अपराध-मुक्त प्रशासन को और अधिक प्रभावी रूप में लागू करना चाहती है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि बिहार में विकास की गति को और तेज करने, निवेश को बढ़ाने, रोजगार के अवसर पैदा करने और प्रशासनिक व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए नई नेतृत्व संरचना की आवश्यकता है।

किसी भी लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन एक सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया होती है। यह परिवर्तन यदि लोकतांत्रिक ढंग से और राजनीतिक सहमति के साथ होता है, तो यह व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाता है। बिहार में पिछले दो दशकों में राजनीतिक स्थिरता अपेक्षाकृत बनी रही है और इसका एक बड़ा श्रेय नीतिश कुमार के नेतृत्व को दिया जाता है। अब जब वह सक्रिय प्रशासनिक भूमिका से हटकर संसदीय राजनीति की ओर जा रहे हैं, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नया नेतृत्व उस स्थिरता को किस प्रकार बनाए रखता है। सत्ता परिवर्तन का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इससे शासन व्यवस्था में नए विचार, नई ऊर्जा और नई प्राथमिकताएँ सामने आती हैं।

इस घटनाक्रम के साथ बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के प्रवेश और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा भी तेज हो गई है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक यह मानते हैं कि यह परिवर्तन केवल एक व्यक्ति या दल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति के पूरे स्वरूप को प्रभावित करेगा। यदि नई नेतृत्व संरचना बिहार के विकास, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक समरसता के मुद्दों पर प्रभावी ढंग से काम करती है, तो यह परिवर्तन राज्य के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है। यदि सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार इन अपेक्षाओं पर खरी उतरती है, तो यह निर्णय बिहार के लिए सकारात्मक परिणाम ला सकता है।

बिहार में प्रस्तावित सत्ता परिवर्तन को भाजपा एक व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी का मानना है कि लंबे समय से विकास, सुशासन, भ्रष्टावार-मुक्ति और सुरक्षा के जिन मुद्दों पर बिहार पिछड़ता रहा है, उन्हें एक निर्णायक नेतृत्व और कठोर प्रशासनिक इच्छाशक्ति के माध्यम से बदला जा सकता है। इस संदर्भ में कई लोग उत्तर प्रदेश का उदाहरण भी देते हैं, जहाँ योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद अपराध और माफिया पर कठोर कार्रवाई, प्रशासनिक अनुशासन और विकास योजनाओं के विस्तार ने राज्य की छवि और जनजीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन लाने का प्रयास किया। इसी दृष्टि से बिहार में भी यह उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि यदि भाजपा को स्पष्ट नेतृत्व का अवसर मिलता है, तो वह अपराध नियंत्रण, भ्रष्टाचार-मुक्ति, प्रशासनिक पारदर्शिता और विकास के नए मानक स्थापित करने की दिशा में काम कर सकती है।

आज भी यह व्यापक धारणा व्यक्त की जाती है कि बिहार में शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अपेक्षित गति से विकास नहीं हो पाया है और कई क्षेत्रों में अपराध तथा असुरक्षा की भावना जनजीवन को प्रभावित करती रही है। ऐसे में यदि नई सरकार दृढ़ नीतियों के साथ विकास, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देती है, तो यह सत्ता परिवर्तन राज्य के लिए नई दिशा और नई दशा का वाहक बन सकता है। यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे बिहार के लिए संभावित अवसर के रूप में देखते हैं-एक ऐसा अवसर, जिसमें सुशासन, विकास और सुरक्षित जनजीवन की नई धारा प्रवाहित हो सकती है और राज्य प्रगति के एक नए अध्याय की ओर अग्रसर हो सकता है।

बिहार की राजनीति में नीतिश कुमार का राज्यसभा की ओर जाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत है। इसमें जहाँ विपक्ष जनादेश के सवाल को उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे नए नेतृत्व और नई दिशा के अवसर के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इतिहास गवाह है कि कई बार राजनीतिक परिवर्तन ही विकास की नई संभावनाओं का मार्ग खोलते हैं। यदि यह सत्ता परिवर्तन बिहार में बेहतर प्रशासन, अपराध नियंत्रण, भ्रष्टाचार-मुक्तिए आर्थिक प्रगति और सामाजिक समरसता को मजबूत करता है, तो यह राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। आने वाला समय ही तय करेगा कि यह निर्णय बिहार की राजनीति में किस प्रकार का अध्याय लिखता है लेकिन इतना निश्चित है कि यह बदलाव राज्य की राजनीति को नई बहसों, नई चुनौतियों और नई संभावनाओं की ओर अवश्य ले जाएगा।

 

(ललित गर्ग)


लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

नगर राज्य के राजा उदय प्रताप नारायण सिंह का बलिदान और वंशजों की पुनर्स्थापना

बस्ती जिला मुख्यालय से आठ किमी दूर बस्ती-कलवारी रोड (एनएच 233) से जुड़ा बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित, एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है। बौद्धों के समय से यह एक नगरीय क्षेत्र घोषित रहा । बाद में भरों की सत्ता के समय इसे चंद्रनगर के रूप में जाना जाता रहा। तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक अर्गल राज्य (जिला फतेहपुर) त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त अवध के बस्ती जिले के इस भूभाग पर यहां आकर सुरक्षा की दृष्टि से बस गए थे। यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया था। धीरे धीरे यहां सरयू नदी से कुवानों नदी के बीच मनोरमा नदी के दोनों तटों पर एक लघु राज्य की स्थापना किये ।

 

 

प्रतीत होता है पहले बैरागल (राम जानकी मार्ग पर ) बादमें नगर खास/नगर बाजार के राजकोट में अपनी राजधानी बनाये थे। अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव को बैरागल (अब का नगर) का राजा घोषित किया था। जगदेव को यहां आने पर दहेज में 12 गांव मिले हुए थे। जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव ने एक अफगान गवर्नर की हत्या कर दी थी। अफगानों के आक्रमण में अपना क्षेत्र खो दिया था । बाद में, भगवंत राव के बेटे राजा चंदे राव ने अफगानों के सूबेदार को हराकर उसे मौत के घाट उतार दिया और अपना नगर राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। कई पीढ़ियों बाद राजा गजपति सिंह यहां के राजा हुए उनके उत्तराधिकारी उनके सबसे बड़े पुत्र, राजा हरबंस सिंह नगर के राजा बने। इसके बाद उनके भाई राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह नगर राज्य के उत्तराधिकारी बने। राजा गजपति राव के भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी गनेशपुर पिपरा, पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं।

एक नया उपाध्याय स्टेट अस्तित्व में आया

राजा नगर और उनके दरबारीगण नगर राजमहल के पास स्थित उपाध्याय वंश के वंशपुरुष और शास्त्र और ज्योतिष के आचार्य पण्डित ‘गंगाराम उपाध्याय’ से प्रतिदिन संस्कृत पुराण और अध्यात्म की कथा और प्रवचन सुनते रहते थे । उन्हें अपने राज्य के अंदर खड़ैंवा खुर्द में मकान बनवा दिए थे। गंगाराम उपाध्याय के पुत्र पंडित सीताराम उपाध्याय (मृत्यु लगभग 1795 ई.) भी राजा साहब के सम्मादृत और कृपा पात्र थे। जब 1765 में उतरौला के राजा सुलेमान खां ने 5000 सैनिकों को लेकर नगर राज्य पर आक्रमण कर दिया तो नगर राजा की तरफ से पंडित सीताराम उपाध्याय जी ने सुलेमान खां को समझा – बुझाकर लड़ाई होने से बचा लिया था। इससे खुश होकर उस समय के राजा साहब ने खड़ैवा खुर्द गांव के दक्षिण का भूभाग जो मनवर नदी तक फैला और उस समय जंगल था, का लगभग 200 बीघा जमीन पंडित सीताराम जी को दान कर दिया था । इस पर पण्डित सीताराम उपाध्याय ने सीतारामपुर नामक एक नया गांव बसा लिया था। (डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 4)

 

वीर स्वाभिमानी देशभक्त शासक उदय प्रताप नारायण का समय :-

ब्रिटिश काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ। राजा उदय प्रताप नारायण सिंह बस्ती जनपद के एक वीर, स्वाभिमानी और देशभक्त शासक थे। उनका जन्म सन् 1812 ई. में हुआ था और वे महाराजा गजपत राव (गौतम वंश) की 45 वीं पीढ़ी से थे। उस समय पड़ोस गांव सीताराम पुर के लक्ष्मन दत्त (1820- 90 ई.) ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। जिनके उपाध्याय वंश को राजा नगर ने 200 बीघे जमीन देकर अपने कुल का उपरोहित बनाया था। लक्ष्मण दत्त के कोई संतान नहीं थी। उनके दो भतीजे आज्ञाराम और साहबराम अंग्रेजी राज में लखनऊ में दरोगा पद पर नियुक्त हुए थे और तीसरे भतीजे हरिप्रसाद “उपाध्याय स्टेट” की जमींदारी संभालते थे। (डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ की “इतिवृति” पुस्तक से उद्धृत, पृष्ठ 10)

अंग्रेज़ों के शासनकाल में राजा उदय प्रताप नारायण सिंह अंग्रेज़ी सत्ता को कभी भी स्वीकार नहीं किया और 1857 की स्वतन्त्रता आन्दोलन की क्रांति में राष्ट्र के प्रति वफादारी निभाते हुए सक्रिय भूमिका निभाई थी।

 

अनेक बार अंग्रेजों को मात दिया

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध साहस पूर्वक युद्ध किया। सीमित संसाधनों और स्वदेशी हथियारों के बल पर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना को कड़ी टक्कर दी थी। रणनीति और युद्धकौशल से उन्होंने कई बार अंग्रेज़ों को रोकने में सफलता पाई थी, किंतु भारी हथियारों, तोप और गोला बारूद से लैस अंग्रेज़ी सेना के आगे वे टिक ना सके और अंततः उन्हें पीछे हटना पड़ा था।

 

घाघरा तट पर 6 सैनिकों को मारे

गोरखपुर गजेटियर के मुताबिक 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर ने 1857 में अग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का आह्वान किया था। नगर के राजा उदय प्रताप सिंह अपनी रियासत को अंग्रेजों से अपना राज्य स्वतंत्र घोषित कर इस जंग में कूद पड़े थे। उन्होंने अपने बहनोई अमोढ़ा नरेश “राजा जालिम सिंह” से सलाह-मशविरा किया। उनकी सहमति मिलने पर उन्होंने अंग्रेज सैनिकों के जलमार्ग को बाधित करने का निर्णय लिया, जो सरयू नदी से होकर जाता था। उन्होंने अपने राज्य से होकर गुजर रही सरयू नदी के तट पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया था। अंग्रेजों की सेना को घाघरा नदी के तट पर रोक दिया। जब सेना फैजाबाद की तरफ से गोरखपुर की तरफ बढ़ रही अंग्रेज सैनिकों की नाव पर धावा बोल दिया और 6 सैनिक अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया था।

 

बचा सैनिक छिपकर अपने मुखिया को सूचना दिया

इन्हीं में से किसी तरह एक अंग्रेज सैनिक बच गया था। वह अपनी जान बचाकर पैदल गोरखपुर पहुंचा और अपने मुखिया को पूरी घटना की जानकारी दी। उसके बाद गोरखपुर से अंग्रेजी सेना नगर राज्य पर हमला करने के लिए कूच कर दी थी।

 

घुसेरिया मैदान में हुई थी लड़ाई

29 अप्रैल 1857 को कर्नल राक्राप्ट के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना की कई टुकडि़या नगर बाजार स्थित राजा के किला के पास पहुंच गई । सेना ने राजा नगर के किले से एक किमी दूर घुसुरिया गांव के पास अपनो बेड़ा लगा लिया था। सितम्बर 1857 में हुई लड़ाई के दौरान अंग्रेजों ने गोला- बारूद के साथ तोपों का भरपूर प्रयोग किया था। बाद में अतिरिक्त सेना भी बुलाई गई थी । अंग्रेज सैनिकों के तोप का मुकाबला नगर के राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की फौज ने सामान्य हथियारों से भरपूर किया था।

 

अंग्रेजों ने किला ध्वस्त किया

गुरिल्ला वार में माहिर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह ने जब 1857 में अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं की तो गोरी सेना ने उनके किले की घेराबंदी कर दी थी। राजा उदय प्रताप के किला में छिपे होने की आशंका में उस पर तोप से हमला कर दिया गया। हालांकि राजा उदय प्रताप किला की सुरंग के रास्ते बाहर निकल गए, लेकिन अंग्रेज नहीं मानें और तोप से किले को ढहा दिए। व्रिटिस सरकार ने इस मिट्टी के किले को नष्ट करवाकर समतल करवा दिया था।

 

अंग्रेजी सेना की कई टुकडि़या नगर राज्य के अन्य गौतम जमीदारों के किले और महलों को अपना निशाना बना नष्ट किया था। अंग्रेजों की तोप और उनकी बर्बरता के आगे किसी अन्य की एक न चली और नगर बाजार का ऐतिहासिक किला ध्वस्त हो गया। अब भी किले के अवशेष अंग्रेजों के बर्बरता की दास्तां बयां कर रहे हैं।

 

रियासतों का अधिग्रहण और बिक्री

ब्रिटिश शासन के दौरान विद्रोह में भागीदारी करने और नगर राज्य के लगातार विद्रोह में भाग लेने के कारण, इसे रुधौली के बाबूओं, बांसी के राजा, बस्ती के राजा (कल्हंस राजपूत) और अन्य क्षेत्रीय प्रमुखों (जैसे बांसी और बस्ती के राजाओं) के साथ संघर्ष के बाद नगर राज्य को और कई अन्य प्रमुखों जैसे अन्य मालिकों को बेच दिया गया था।

 

नगर सहित छह किले ध्वस्त हुए थे

नगर बाजार से पश्चिम कप्तानगंज मार्ग पर एक खंडहरनुमा संरचना में शहीद स्थल, दुर्गादेवी मां का मंदिर तथा राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की लघु प्रतिमा स्थापित है। प्रवेश द्वार के पास दीवाल में हिंदी भाषा के देवनागरी लिपि में एक शिलालेख संगमरमर के पत्थर पर खुदा है। अभिलेख में यह उल्लेख आया है कि अंग्रेजों ने केवल नगर का ही किला जमींदोज नहीं किया था, बल्कि नगर के आसपास के गौतमों के गौतम राजपूत के पांच अन्य के लिए भी नष्ट किए थे । ये नाम है मझगवां, भेलवल, पिपरा गौतम, बैरागल और गणेशपुर।

 

अभिलेख की शब्दावली –

१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ‘राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर’

स्मारक

“नगर राज्य के राजा उदय प्रताप नारायण बहादुर सिंह ने १८५७ स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सेना एवं स्थानीय देश भक्तों के साथ अंग्रेजों की सेना से कई स्थानों पर घमासान युद्ध किया। युद्ध के दौरान कतिपय स्थानीय स्वार्थी गदारों ने अंग्रेजों को राजा की सेना के भेद को बता कर राजा को बन्दी बनवा दिया । राजा के बन्दी हो जाने पर नगर, मजगबा, भोलवल, पिपरा गौतम बैरागल तया गनेशपुर किलों को अंग्रेजों ने तोपों से ध्वस्त कर डाले और नगर राज्य बांसी के राजा को बतौर बक्शीस दे दिया। राजा साहब को गोरखपुर जेल में बन्दी बनाकर रखा गया। अंग्रेजों ने उन्हें अपमानित करके फांसी देने की योजना बनाई । इस अपमान जनक फांसी के बदले राजा साहब ने अपनी ही कटार से अपनी मृत्यु श्रेयस्कर समझकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।”

 

पत्नी को सुरक्षित निकाल लिया था

अंग्रेजी सेना से घिरता देख राजा उदय प्रताप सिंह अपनी गर्भवती पत्नी के साथ भूमिगत हो गए। रानी को एक शुभचिंतक के यहां अठदमा में शरण दिला दिया। नगर के राजा की छावनी मजगवा निकट पोखरा बाजार में थी। नगर बाजार से मजगवां तक सुरंग थी, जिसके सहारे राजा सुरक्षित निकल गए।

 

बहराइच में छिपे ,छलपूर्वक गिरफ्तारी

अंग्रेजों के आगे आत्मसमपर्ण करने की बजाए उदय प्रताप सिंह ने बहराइच के जंगलों में शरण लिया। काफी प्रयास के बाद भी अंग्रेज अधिकारी उन्हें पकड़ नहीं पाए। उसके बाद फूट डालो राज करो की नीति अपनाते हुए अंग्रेज अधिकारियों ने राजा नगर के विश्वास पात्रों को फोड़ लिया। लोग बताते हैं कि यहां से भाग कर राजा उदय प्रताप गोंडा के टिकरी जंगल में पहुंच गए थे। अंग्रेजों के दलाल उन्हें भ्रमित कर फिर से नगर बाजार लाए और कैद करवा दिया। उनकी निशानदेही पर अंग्रेजों ने धोखे से गोंडा के टीकरी जंगल/ सिकरी नामक स्थान पर गिरफ्तार कर लिया। उनकी सारी जागीर सरकार ने जप्त कर ली गयी थी।

 

अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई

स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होने अपनी पदवी और जागीर दोनों खो दी थी। नगर के राजा एवं उनके आदमियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध अपने वंश परिवार तथा सारी सम्पत्ति को दांव पर लगा दिया। वे पराजित हुए उन्हें कैद कर गोरखपुर के पुलिस लाइन स्थित जेल में डाल दिया गया। उन पर केस चला और अंग्रेज अधिकारियों की हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुना दी गई। अंग्रेज उन्हें सार्वजनिक स्थान पर फांसी देकर विद्रोहियों को कड़ा संदेश देना चाहते थे। लेकिन राजा को अंग्रेजों के हाथों मौत गवारा नहीं था।

 

हत्या या आत्म बलिदान

उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। परंतु उन्होंने आत्म सम्मान से समझौता नहीं किया। वहां उन पर अत्याचार कर करके उन्हें तोड़ने का प्रयास किया गया। जब अंग्रेज कामयाब नहीं हुए तो जेल में उनकी हत्या कर दी गयी और बाहर यह खबर फैलाई गई कि फांसी के एक दिन 18 दिसंबर 1858 को पहले बैरक के बाहर तैनात संतरी से पानी मांगा। इसी बहाने उसकी राइफल को छीनकर उसमें लगी कटार को अपने गले में भोंक कर आत्म बलिदान देकर अपने प्राण त्याग दिए।उनका यह बलिदान देशभक्ति, वीरता और स्वाभिमान का अनुपम उदाहरण है।

 

पोखरनी में फिर से अस्तित्व में आया ये रियासत :

पोखरनी का शब्दार्थ :- पुष्करिणी ( पोखरनी ) का हिंदी अर्थ हथिनी या छोटा जलाशय होता है । इसके अलावा वास्तुशास्त्र शब्दावली में पुष्करणी पुष्करणि या पोखरनी मंदिर परिसर में निर्मित “तालाब” या “कुंड” को संदर्भित करता है। यह आमतौर पर सीढ़ीदार कुएँ या तालाब को दर्शाता है।साथ ही पुष्करणि शब्द का अनुवाद “कमल का तालाब” भी हो सकता है। इसे कल्याणी नाम से भी जाना जा सकता है ।

 

भारत में सदियों से, हर गाँव के मंदिर में पुष्करणी नामक एक तालाब होता आया है। ” पुष्करणी” शब्द ” पुष्करम” से आया है , जिसका अर्थ है “जो उर्वरता प्रदान करता है”, और पुष्टि का अर्थ है “स्वास्थ्य”।

 

जब प्रत्येक गांव के केंद्र में, आमतौर पर मंदिर के पास, पानी को एकत्रित और संग्रहित किया जाता है, तो पूरे गांव में जल स्तर भरा रहता है और न केवल गांव के दैनिक उपयोग जैसे पीने और नहाने के लिए पानी उपलब्ध कराता है, बल्कि पूरे गांव की उर्वरता भी बढ़ाता है।

 

एक भरा हुआ, साफ मंदिर का तालाब देखने में बहुत सुंदर लगता है। ये तालाब सदियों से स्थानीय लोगों द्वारा समाज के हितैषी के रूप में बनाए गए थे।

 

दैनिक स्नान और स्थानीय मंदिर अनुष्ठानों के अलावा, इन तालाबों का मुख्य उद्देश्य जल संचयन करना था। इस गांव का चयन और यहां राज कुल को पुनर्स्थापना करना पुराने लोगों ने बहुत सोच समझ कर किया होगा।

 

पोखरनी की अवस्थिति:-

पोखरनी,उत्तर प्रदेश राज्य के बस्ती जिले के बहादुरपुर ब्लॉक में नगर बाजार के पड़ोस का एक छोटा सा गांव है। यह जिला मुख्यालय बस्ती से दक्षिण की ओर 13 किमी.और बहादुरपुर से 5 किमी.दूर स्थित है। अंग्रेजो ने जब नगर राजकोट में स्थित राजपरिवार को नेस्सनाबूत कर दिया तो बांसी के राजा द्वारा इन्हें गुजारा के लिए पोखरनी आदि कुछ गांव दिए थे, जहां नगर राजा साहब के परिजनों ने नए सिरे से दूसरा राजमहल खड़ा किये। स्वतंत्रता आंदोलन की क्रांति के बाद के निम्न लिखित वंशजों ने इस वंश परम्परा का उत्तरोत्तर विकसित किया था । यहां पोखरनी में अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय इनके परिजनों द्वारा संचालित किया जा रहा है। यह स्कूल अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की स्मृति में संचालित है। साथ ही एक प्राइमरी विद्यालय भी यहां चल रहा है। ये स्थल स्थानीय क्षेत्र में शिक्षा तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जाने जाते हैं ।

 

 

पोखरनी स्थित पौराणिक महाकाली मंदिर परिसर में चल रहे नौ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा हर तीसरे साल आयोजित होती रहती है। लगभग पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के 80 फीसदी परिवार की जीविका चलाने वाले लोग खाड़ी देशों से लेकर केंद्र और प्रदेश की सरकार के विभिन्न क्षेत्रों में सहभागिता निभा रहे हैं। यही नहीं, नौ दिन पूरे गांव के श्रद्धालु घर के बाहर ईशान कोण पर या फिर महाकाली मंदिर परिसर में भोजन पका कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। साथ ही हवनोत्सव के दिन सांस्कृतिक व तांत्रिक अनुष्ठान कर असाध्य रोगों से निजात पाते हैं।

 

प्रमुख उत्तराधिकारी

1.विश्वनाथ प्रताप सिंह

राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के बलिदान के बाद उनकी रानी साहिबा के पुत्र विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे चलकर राज्य की पुनः स्थापना की। उपाध्याय स्टेट के रिटायर्ड सूबेदार ने लक्ष्मण दत्त ने पोखरनी में राज्य स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने बस्ती जिला और बांसी राज प्रशासन से पोखरनी में रहने का आदेश निकलवाया। नगर राजा का सम्पूर्ण राज भले ही जप्त हो गया हो लेकिन जनता की दृष्टि में ये अभी भी राजा थे। 1865 ई में लक्ष्मण दत्त के नेतृत्व में स्थानीय जनता और जमींदारों ने राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को उपहार देकर पोखरनी में राजकोट नामक राज महल की नींव डलवाई। पांच वर्ष में दस एकड़ क्षेत्र में एक छोटा राज कोट बन कर तैयार हो गया। पंडितों ने विधिवत पूजन कर उन्हें राजा के पद पर राज्याभिषेक किया।

 

2.लाल रूपेंद्र नारायण सिंह

1880 ई. के आसपास राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह लाल रूपेंद्र नारायण (पिता का नाम माता प्रसाद सिंह मूल निवासी पोखरा बाजार बस्ती) को दत्तक पुत्र ग्रहण किया। 15 वर्ष की अवस्था में ही राजकुंवर को रियासत की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जनता भले ही इन्हें राजा माने पर ये अपने को छोटे भूमिया ही समझते थे। इन्हें पहले जमींदार और फिर राजा का पद दिलवाने के लिए राजा बांसी के माध्यम से जिला कलेक्टर को मनाया जाने लगा। पोखरनी राज दरबार में एक मीटिंग रखी गई जिसमें पिपरा गौतम, ऊजी, गणेशपुर, कलवारी, कप्तानगंज आदि जगहों से लगभग 100 जमींदार एकत्र हो गए थे। कचूरे स्टेट के भागवत शुक्ला, मरवटिया बाबू के नागेश्वर सिंह, गणेशपुर के पिंडारी राजकुमार बाबर सलीम तथा महरीपुर से गंगाबक्श सिंह उपस्थित हुए। राजा रुपेंद्र नारायण सिंह को चांदी के सिंहासन पर स्वर्ण मुकुट पहना कर उपस्थित गणमान्य लोगों द्वारा राजतिलक किया गया। एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें जिला कलेक्टर और बांसी राजा से अपील की गई कि राजा रूपेन्द्र नारायण सिंह को जमींदार मानते हुए उन्हें राजा की उपाधि वापस की जाए।(डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 20-21)

 

इसे बस्ती के कलेक्टर साहब ने मंजूर कर रुपया 5000/- जमा करवाया और अपनी संस्तुति लगाकर राजा के पद की बहाली के लिए आवेदन पत्र लखनऊ भिजवा दिया। लोगों के प्रयास और पैरवी से तथा रुपया 5000/- और शुल्क जमा करके राजा का पद भी बहाल हो गया। (संदर्भ उक्त ग्रन्थ, पृष्ठ 22)

 

इस समय नगर राज्य के मालिक बांसी के राजा बहादुर रतनसेन सिंह तृतीय 1913-1918 थे। इन्हीं के कार्यकाल में नगर बाजार के डाक बंगले पर नगर क्षेत्र के लगभग 100 जमीदार बुलाए गए थे वहां अंग्रेज कलेक्टर थॉमसन आने वाले थे और क्षेत्र की शांति व विकास की चर्चा होने वाली थी। उन लोगों का चन्दो ताल के आसपास के क्षेत्र के भ्रमण का भी कार्यक्रम था। उपाध्याय स्टेट सीता राम पुर के दोनों दरोगा आज्ञाराम और साहबराम पुलिस विभाग से रिटायर होने के बाद भी नगर स्टेट की शाही व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाते थे। डाक बंगले में जब मेहमान आए तो दोनों रिटायर दरोगा के साथ उपाध्याय स्टेट के धर्मराज और महराजराम को स्टेट का साफा पहनाकर उपाध्याय वंश को गौरवनित कर उपाध्याय स्टेट की मान्यता दी गई। (डा.मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ की “इतिवृति” पुस्तक पृष्ठ 18)

 

3.भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह

लाल रूपेन्द्र नारायण के उत्तराधिकारी लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह थे। ये कुश्ती के बड़े शौकीन थे। इन्हें शिक्षा और धर्म संस्कृति में भी रुचि थी। फलत: इनके शुभ चिंतकों ने इन्हें सम्मान देने के लिए राजा भूपेंद्र प्रताप नारायण संस्कृत विद्यालय नारायण पुर तिवारी महराज गंज बस्ती में स्थापित कराया था।

 

लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण का विवाह वर्तमान अंबेडकर नगर जिले के ‘हंसवर’ स्टेट के ताल्लुकेदार बाबू नरेन्द्र बहादुर सिंह की बेटी सुश्री सौभाग्य सुंदरी देवी ‘सुंदर अली’ से हुआ था। पोखरनी स्टेट में पहुंचते ही सुन्दरी जी का मन संगीत और साहित्य में बहुत रमा। सुन्दरी जी ने श्रृंगार और भक्ति को माध्यम बना कर के वाद्ययंत्रों पर गाये जाने वाले लोकगीतों की लयात्मक छन्दों और पदों की स्वयं रचना करने लगी थीं। महाराज भूपेन्द्र बहादुर सिंह के निधन के बाद रानी साहिबा के जीवन में बड़ा परिवर्तन हुआ। उन्होनें अपने आध्यात्मिक गुरू कुदरहा बस्ती निवासी महन्थ राम सुन्दर दास की प्रेरणा से अयोध्या में कनक भवन के पास “सुन्दर भवन” का निर्माण करवाया और अपना अधिकाधिक समय कनक बिहारी भगवान श्रीराम की सेवा में लगाना शुरू किया। इन्होनें सैकड़ों पद, कवित्त, सवैया के साथ-साथ उर्दू गजल लिखा । इनके गीतों में भावुकता के साथ तत्लीनता है , आत्म सुख की भाव विभोरता है और आत्मा तथा परमात्मा के मिलन की आकुलता है।

4.लाल वीरेन्द्र प्रताप नारायण सिंह

लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण के पुत्र वीरेंद्र प्रताप सिंह हैं। शहीद स्थल राजकोट नगर बाजार बस्ती पर एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए लाल वीरेन्द्र प्रताप नारायण सिंह ने कहा था – आजादी के इतने दिनों के बाद भी सरकारें राजा उदय प्रताप, उनके वंशजों व किले की हिफाजत के लिए गंभीर नहीं हैं , ना ही उसके संरक्षण व संवर्धन का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। नगर चौराहे पर लगाई गई प्रतिमा को देखते ही लोगों का मन द्रवित हो जाता है साथ ही लोगों में वीरता के भाव अपने आप ही उभर आते हैं।

 

5.लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह

लाल वीरेंद्र प्रताप सिंह के पुत्र लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह ने इस वंश परम्परा को आगे बढ़ाया।

6.लाल आर्नेश प्रताप सिंह

लाल राघवेंद्र प्रताप सिंह के पुत्र लाल आर्नेश प्रताप सिंह जी वर्तमान में परिवार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । इस परिवार वालों का कहना है कि हमें अपने पूर्वज पर गर्व की अनुभूति होती है और अभी भी उनसे जुड़ी सामग्री बतौर निशानी व धरोहर के रूप में इनके राजमहल में रखी गई है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उनके त्याग व बलिदान को याद कर सकें।

 

राजकोट नगर बाज़ार बस्ती में है स्मारक स्थल

नगर बाजार से पश्चिम कप्तान गंज मार्ग पर एक खंडहर नुमा संरचना में शहीद स्थल, देवी दुर्गा मां का मंदिर तथा राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की लघु प्रतिमा स्थापित है। इसके साथ फूल पत्ती पेड़ पौधे लताओं का झुरमुट भी देखा जा सकता है। यहाँ राजा का ध्वस्त किला स्मारक और एक शहीद स्थल मौजूद है । 29 अप्रैल 1858 को कर्नल राक्राप्ट के नेतृत्व में राजा उदय प्रताप नारायण सिंह के नगर किले को ध्वस्त कर दिया गया था। यहाँ नगर बाजार पंचायत द्वारा हर साल 18 दिसंबर को यहाँ मेले का आयोजन किया जाता है, जो स्थानीय स्तर पर देशभक्ति का बड़ा आयोजन बनता है।

 

किले में कुल देवी माता का एक मंदिर

मान्यता है कि राजा उदय प्रताप के किले में माता का एक मंदिर भी था। अंग्रेजों के हमले में किला ध्वस्त होने के साथ वह भी ध्वस्त हो गया। कुछ साल बाद स्थानीय लोगों को मां दुर्गा का स्वप्न आया कि जहां किला ध्वस्त हुआ वहां वह विराजमान हैं। मंदिर के पुजारी गिरीश महाराज ने बताया कि स्वप्न की बात लोगों के बंगाली बाबा से कही, जिसके बाद उन्होंने अपने शोध से पता लगाया। खोजबीन के बाद ध्वस्त किले में माता की पिंडी मिली। बाद में यहां एक मंदिर का निर्माण हुआ।पुजारी जी ने बताया कि राजकोट की माता गौतम क्षत्रिय वंश की कुलदेवी हैं।

 

इस मंदिर को लेकर लोगों मे बड़ी आस्था है। यहां सच्चे मन से जो भी भक्त अपनी मुराद लेकर आता है, राजकोट की माता उसकी मुराद पूरी करती हैं। नवरात्र और दशहरे के मौके पर यहां बहुत भीड़ होती है, दूर-दूर से भक्त माता का दर्शन करने आते हैं। आजादी के सात दशक बाद भी जंग ए आजादी के साक्षी इस किले के संरक्षण व संवर्धन का कोई खास प्रशासनिक इंतजाम नहीं हो सका है। किले को सुरक्षित करने के लिए सरकार गंभीर नहीं शहीद राजा उदय प्रताप के प्रपौत्र लाल वीरेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं कि आजादी के इतने दिनों के बाद भी सरकारें राजा उदय प्रताप, उनके वंशजों व किले की हिफाजत के लिए गंभीर नहीं हैं l ना ही उसके संरक्षण व संवर्धन का कोई सार्थक प्रयास किया जा रहा है। नगर चौराहे पर लगाई गई प्रतिमा को देखते ही लोगों का मन द्रवित हो जाता है साथ ही लोगों में वीरता के भाव अपने आप ही उभर आते हैं।

 

इसे और आकर्षित बनाया जा सकता है। इसे पर्यटक स्थल विकसित करने की पूर्ण संभावना है। इस पर वांछित देखरेख का अभाव देखा जा रहा है। इसकी देखभाल पहले राजकोट दुर्गा मन्दिर समिति करती थी, उस वक्त तक यहां साफ सफाई व अन्य व्यवस्था दुरूस्त थी लेकिन पूर्व के मण्डलायुक्त विनोद शंकर चैबे ने शहीद स्थल की देखरेख और इसके सुन्दरीकरण की जिम्मेदारी वन विभाग को सौंप दिया था । यहीं से शहीद स्थल की उपेक्षा शुरू हो गयी। धीरे धीरे यह जंगल में तब्दील हो गया। शहीद स्थल पर प्रशासनिक अधिकारी पुष्प चक्र भी अर्पित करने नही जाते हैं।

 

कुछ सामाजिक कार्यकर्ता पुष्प अर्पित करने न आयें तो नई पीढ़ी को शहीद स्थल के बारे में नई पीढ़ी को पता ही न चले। पूर्व के जिलाधिकारी हरिभजन सिंह ने शहीद स्थल के सुन्दरीकरण और देखरेख की जिम्मेदारी पर्यटन विभाग को सौपने के प्रस्ताव के साथ शासन को पत्र लिखा था। इसका कोई खास असर नही दिखा। यहां पानी की टंकी, सीमेण्ट की बनीं कुर्सियां, पुल, इंजन, हैण्ड पाइप आदि बेकार पड़े हैं। वर्षों से ये उपयोग में नही है। पहले शहीद स्थल राजकोट दुर्गा मन्दिर के नाम से दर्ज था लेकिन प्रशासनिक हस्तक्षेप से इसे अभिलेखों में वन विभाग के नाम दर्ज करा दिया था। इसका हाई कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। वर्तमान में शहीद स्थल में चारों ओर झाड झंखाड़ है। 18 दिसम्बर 2000 को तत्कालीन उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री धनराज यादव ने यहां राजा उदय प्रताप सिंह की प्रतिमा का लोकार्पण किया था।

 

नगर में लगता है अमर शहीद मेला

आदर्श नगर पंचायत नगर में अमर शहीद मेला आयोजित किया जाता है। इसका आयोजन नवगठित नगर पंचायत द्वारा किया जाता है। जहां अमर शहीद राजा उदय प्रताप नारायण सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर नमन किया जाता है। मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले अमर बलिदानी को स्मरण कर नगर पंचायत के विद्यार्थियों को मंच प्रदान करना शहीद मेले का मुख्य उद्देश्य है। युवाओं को अमर बलिदानी राजा नगर के जीवन से प्रेरणा लेकर देश और समाज की सेवा का संकल्प दिलाया जाता है। दौड़ ,गायन, नृत्य प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और मेडिकल कैम्प लगाकर मरीजों के उपचार किए जाते हैं।

 

REFRENCES:

1. Report of tours in the Central Doab and Gorakhpur in 1875-76

2. Gazetteer of Basti

3. Rag Pankaj (1998). 1857, Need of Alternative Sources

4. Agazetteer being volume XXXII of the district Gazetteer of the united Province of Agra and Oudh( बस्ती ए डिस्टिक गजेटियर आफ दी यूनाइटेड प्राविंसेज आफ आगरा एण्उ अवध लेखक एच. आर. नेविल, 1907, पृ. 94.95)

5. डा. वीरेंद्र श्रीवास्तव की शोध पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान’।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

1600 साल पहले इस छोटे से गाँव में बर्बर हूणों के पतन का आखरी अध्याय लिखा गया था

वाराणसी से गोरखपुर जाइए तो सड़क के रास्ते या रेल के रास्ते वाराणसी से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित औडि़हार जंक्शन पर हर ट्रेन और बस ठहरती है। भारतीय इतिहास के वीर प्रवाह को समझने के लिए यह स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। बिल्कुल गंगा के किनारे बसा यह छोटा सा गांव मध्य एशिया के बर्बर हूणों के समूल विनाश का साक्षी है। गंगा की कलकल धारा के किनारे सदियों पहले यह वीरान गांव आज भी आबादी के लिहाज से बहुत ही छोटा है, किन्तु यहां के क्षत्रियों समेत चारों वर्णों की कीर्ति पताका पूर्वांचल के इलाके में सबसे अधिक चर्चित रहती है।

पता नहीं कि यहां बसी आबादी के लोग ये जानते हैं कि नहीं कि उनके गांव का नाम औडि़हार क्यों पड़ा लेकिन इतिहास साक्षी है और औडि़हार के पास सैदपुर-भितरी नामक गांव में मौजूद स्कन्दगुप्त की लाट गवाही देती है कि यह औडि़हार वही स्थान है जहां बर्बर हूणों की फौज को स्कन्दगुप्त ने अपने बाहुबल से प्रबल टक्कर दी, ऐसी चोट पहुंचाई थी हूणों को कि इस जगह का नाम ही हूणिहार या हुणिआरि पड़ गया। मतलब वह जगह जहां हूणों की हार हुई, जहां हूणों की पराजय का इतिहास लिखा गया, जो भूमि दुर्दांत हूणों के लिए अरि यानी शत्रु समान खड़ी हो गई, वह जगह ही आज अपभ्रंश रूप में औडि़हार के रूप में मौजूद है।

1600 साल पहले की यह महान क्रांति गाथा है। औडि़हार के बिल्कुल बगल से बहने वाली मां गंगा की धारा में ही तब स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य के विक्रम ने नई लहर उठाई थी जिसमें हूणों का कहर सदा के लिए विलीन हुआ था। गंगा की लहरों पर जब पहली बार हूणों की बर्बरता की काली छाया पड़ी थी, तब से लेकर आजतक कितना पानी बह गया किन्तु प्रयाग से पाटलीपुत्र के मध्य काशी और बलिया तक के हजारों गांव और करोड़ों लोगों के मन से उस खौफनाक अध्याय की स्मृतियां आजतक मिट नहीं सकीं। यहां के गांवों के नाम हूणों की पराजय के नाम से बसे, औडि़हार, मुडिय़ार, हौणहीं, तैतारपुर ऐसे दर्जनों गांव हैं, जहां बसे लोगों के पुरखों ने स्कन्दगुप्त की महासेना के सैनिक और कमांडर के रूप में इस महायुद्ध में हिस्सा लिया था। अब ये इलाका गाजीपुर जनपद का हिस्सा है। बनारस की भूमि से सटकर बहने वाली गोमती और गंगा के संगम के तीर्थ कैथी मारकण्डेय महादेव से बिल्कुल ही सटा हुआ।

हूणों से निपटने के लिए इस जगह का चुनाव स्कन्दगुप्त ने सोच-समझकर किया था। मौर्य काल से ही भीतरी का इलाका गंगा के इस पार पश्चिमी दिशा में पाटलीपुत्र की सुरक्षा के लिए अभेद्य रक्षा कवच था, यहां पर जो सैनिक छावनी कौटिल्य और चंद्रगुप्त मौर्य के समय निर्मित हुई वह गुप्त साम्राज्य के समय में भी सुगठित ढंग से संचालित होती रही थी। आज भी इस इलाके के युवाओं का डीएनए सबसे पहले भारत की सेना में ही करियर खोजता है, आंकड़े गवाही देते हैं कि भारत की फौजों में गाजीपुर के हर गांव से युवकों की टोलियां तब से ही भर्ती होती चली आ रही हैं, देश की रक्षा के लिए लहू बहा देने और अपना सब कुछ लुटा देने का यह पाठ उनके दिलो-दिमाग में स्कन्दगुप्त जैसे महानायकों की छाया में और प्रबलित हुआ था। हूणों से जो टक्कर तब हुई थी, आजतक उसकी स्मृति यहां के जन-जीवन के मन से मिटती नहीं। सैकड़ों साल से काली अंधेरी रातों में माताएं अनजाने ही सही इस भूभाग में बसे गांवों में अपने बच्चों को सुलाते समय यह कथा दोहराती आ रही हैं कि ‘बचवा सुत जा नाहीं त हूणार आ जाई।Ó अर्थात, बेटा सो जा नहीं तो हूण आ जाएगा।

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आज भी यह संवाद गांव-गांव प्रचलित है कि बचवा सुत जा, नाहीं त हुणार आ जाई। अब तक लोग इस प्रचलित शब्द हुणार को कोई जंगली जानवर मानते आए हैं जो बच्चों को उठा ले जाता है, जैसे कोई लकड़सुंघवा या कोई लकड़बघ्घा। लेकिन इतिहास की गुफाओं में प्रो. आरसी मजूमदार, जयशंकर प्रसाद और आचार्य वासुदेवशरण अग्रवाल जैसे कुछ यशस्वी लेखक-विद्वान जब पहुंचे तो पता चला पूर्वांचल के लोक-मन में यह जो हूणार शब्द है, यह किसी असल सियार, लकड़सुंघवा, लकड़बग्घे या किसी भेडिय़े का नाम नहीं बल्कि भेडिय़े के रूप में उन्हीं भयानक हूणों का मन के किसी कोने अंतरे में छिपा वह खौफ है जिसे भेडिय़े की तरह पशुवत् हिंसक जीवन को अपनाकर ही हूणों ने विश्व इतिहास का सबसे बर्बर अध्याय लिखा और आज से 2000 साल पहले भारत की धरती पर भी अपनी तलवारों से मानवता के विरूद्ध अत्याचार और अपराध को सबसे भयावह रक्तरंजना दी थी।

किन्तु हूणों को तब शायद यह नहीं पता था कि जिस यूनान, मिस्र और रोम को वह मटियामेट कर अपनी अतृप्त लुटेरी पिपासा लिए भारत की बरबादी, लूट, हत्या, बलात्कार और डकैती का खौफ लिखने गंगा-यमुना की लहरों पर चढ़े चले आ रहे हैं, उसके जर्रे जर्रे में भारत की उठती जवानी उनकी ही मौत का इतिहास लिखेगी। इसीलिए स्कन्दगुप्त की महागाथा आज भी हमारे मन और दिलों में बार बार उठती है। जब-जब धरती पर अत्याचार और बर्बरता का रौरव नरक बरसेगा तब-तब यह देश अमरता की अपनी उस महायात्रा को पुनर्जीवित करेगा जिसमें से स्कन्दगुप्त जैसे वीर नायक जन्म लेते हैं, इस देश के अमर संजीवन प्रवाह से शक्ति प्राप्त करते हैं और फिर अपना सब कुछ मातृभूमि की सेवा और सुरक्षा में लुटाकर चुपचाप धराधाम से विदा हो जाते हैं। जिनके कारण हमारा आपका अस्तित्व यूनान-रोम-मिस्र जैसी सभ्यताओं के मिट जाने के बाद भी संसार की छाती पर अपना ध्वज गाड़कर युग युग से जीवंत है, आज उसी महाप्रतापी वीर योद्धा महा सेनानी हुणारि विक्रमादित्य स्कन्द गुप्त की सत्य इतिहास गाथा आपको सुनाने जा रहा हूं मैं।

स्कन्द गुप्त को महान इतिहासकार प्रो. आरसी मजुमदार ने ‘द सेवियर ऑफ इंडिया’ की उपाधि यूं ही नहीं दी है। सेवियर ऑफ इंडिया अर्थात भारत का रक्षक, भारत का त्राता, भारत को बचानेवाला। इतिहास में हूणों की दुर्दांत सेनाओं को अपने बाहुबल से स्कन्द गुप्त ने ही सबसे बड़ी टक्कर दी, इस हद तक टक्कर दी कि मध्य एशिया में हूणों के ठिकानों में विधवाएं ही विधवाएं बचीं और उन इलाकों में पुरूषों का मानो अकाल ही पड़ गया।

स्रोतों से जो जानकारी मिलती है, उसके आकलन के अनुसार, कम से कम दो लाख हूणों की अश्वबल से सम्पन्न सेना में सबके मारे जाने की सूचना देने के लिए मुठ्रठीभर ही बचे जो सुरक्षित मध्य एशिया के अपने उन वीरान ठिकानों तक पहुंच सके जहां से हूण जत्थे दनादन निकले थे। ये सोचकर कि भारत के सुन्दर बसे समृद्ध ऐश्वर्यशाली स्वावलंबी और प्रचुर धन-संपदा से सम्पन्न गांवों और आबाद लोगों को लूटकर वह सदा के लिए मालामाल हो जाएंगे। किन्तु वीर स्कन्दगुप्त और उसकी महासेना के पराक्रम के सामने हूणों का सारा अभियान ही धरा रह गया। आए तो थे गरजती-लपलपाती तलवारों को झनझनाते हुए, भारत के लोकजीवन को डराते-मारते-लूटते लेकिन स्कन्द गुप्त की कुशल व्यूह रचना के कारण गंगा-यमुना-गोमती आदि नदियों के प्रवाह में ऐसे फंसे कि भागने के लिए भी जगह नहीं बची। जिन कुछ हूण-टुकडिय़ों को स्कन्दगुप्त ने क्षमादान दिया भी तो पश्चिम की ओर जाने वाले उत्तरापथ से जुड़े गणराज्यों यौध्देय, मालव, क्षुद्रक के वीरों ने मार-मारकर यमलोक पहुंचा डाला।

हूणों पर स्कन्दगुप्त की यह ऐतिहासिक विजय इतनी आसान नहीं थी जितनी कि हम आप कुछ पंक्तियों के जरिए इसे समझ पा रहे हैं। गुप्तचरों ने जब पहली बार हूणों की टक्कर से तबाह हुए पुरु और कुरु, गंधार आदि गणराज्यों का हाल तब के केंद्रीय साम्राज्य पाटलिपुत्र (पटना) पहुंचाना प्रारंभ किया तो लगभग 60 वर्ष की उम्र पारकर बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े सम्राट कुमार गुप्त की छाती भी धक्क कर गई। सम्राट कुमार गुप्त महेंद्रादित्य ने चालीस वर्ष तक कुशलतापूर्वक भारत को केंद्रीय नेतृत्व प्रदान किया था जिनके अमर पुरखों के पराक्रम से सजी-धजी राजधानी पाटलीपुत्र के ऐश्वर्य की कहानियां सारे संसार को तब चकित और स्तंभित कर देती थी। परम भागवत महाराजाधिराज चक्रवर्ती सम्राट समुद्रगुप्त विक्रमादित्य और उनके अजेय बलशाली पुत्र चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के द्वारा खड़े किए गए साम्राज्य की सेवा में कुमार गुप्त ने कोई कमी नहीं रख छोड़ी। यूनान और रोमन साम्राज्य या तब के रंक यूरोप के हिस्से तो भारत की समृद्धि के सम्मुख कहीं खड़े तक नहीं होते थे। राम-कृष्ण जैसे महान धुरंधरों को जन्म देने वाली जगत जननी मातृभूमि भारत की पताका तब पश्चिम में गांधार के पार यूनानी-ग्रीक राज्यों तक फहर रही थी तो पूरब में आज का जो मलेशिया, इंडोनेशिया, बाली आदि अनेक द्वीपसमूह हैं, सबके सब भारत के चक्रवर्ती साम्राज्य के अभिन्न अंग थे।

भारत में लोकतंत्र तब शिखर पर था, सैकड़ों जनपद और गणराज्य अपने केंद्रीय चक्रवती साम्राज्य की देख-रेख में प्रत्येक ग्राम और पुर तक, स्वायत्त शासन और ग्रामीण स्वावलंबन की बेमिसाल गाथा लिख चुके थे। हर जीव-जानवर और चौपाए के लिए तब भारत के कुशल शिल्पियों ने म्यूजिक सिस्टम विकसित किया था, बैलों के गले में घंटिया थीं, और घोड़े-गधे और सवारी ढोने वाले पशुओं के पैरों में भी घुंघरू थे। घर-गांव-कृषि और मानवता के प्रति दुधारु गाय की सेवाओं को देखते हुए तब पशुओं की सूची से इसे बाहर निकालकर इस देश ने माता का रूप दे दिया था, अहिंसा-करुणा से भरी इस भूमि का जीवों के प्रति दया-भाव की सचमुच पराकाष्ठा का पुनीत पावन यह इतिहास।

भारत ने मनुष्य-मनोविज्ञान तो छोडि़ए, पशु-विज्ञान के शिखर तक को छू लिया था कि मानव समुदाय को स्वयं सुखी रहने के लिए अपने पालतू पशुओं के साथ किस तरह दयापूर्वक व्यवहार करना चाहिए ताकि उनका पूरा सदुपयोग हो सके। उस दौर में कोई पशु नहीं था जिसके लिए भारत ने संगीत संगत विकसित नहीं किया। आज भी बंदरों को मदारी डमरू सुनाते हैं, सांपों को सपेरे बीन की संगीत पर नचाते हैं, कोयल और पक्षियों के कलरव की नकल कर वैसा ही संगीत सुनाने वाले और उनकी आवाज सुनकर उनकी बातचीत तक का पता लगाने वाले विशेषज्ञ भारत के वन्य प्रदेशों में शिक्षित-प्रशिक्षित थे। हाथी और घोड़े ढोल-नगाड़े की आवाज सुनकर और मुख से लेकर पैरों तक सोने-चांदी के साथ अपने महावत के संकेत मात्र को समझकर सज-धजकर शान दिखाते यूं खड़े हो जाते थे मानो सारे संसार का ऐश्वर्य भारत के चरणों में आ गिरा हो।

वह भारत आज केवल हम कहानियों और किस्सों में ही देख पाते हैं जिसे तब हमारे पुरखों ने अपने परिश्रम और प्रताप से इतना सुन्दर बनाया था कि संसार इसे सोने की चिडिय़ा कहता था तो कोई सोने के अंडे देने वाली मुर्गी बता—बताकर दुनिया को भारत पर कब्जे के लिए उकसाता था। उसी भारत की बुनियाद पर जो गुप्त साम्राज्य खड़ा हुआ था, उसे संसार की सबसे बर्बर हूण सेनाओं से मुकाबले की जब चुनौती मिली तो वीरों की भुजाएं फड़क उठीं, तनी छाती प्रतिकार के लिए धड़क उठी, तलवारें रक्तपान को मचल गईं किन्तु देश के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा था कि रणभूमि में सेना की कमान संभालेगा कौन? देश के लिए मृत्यु बन खड़े इस विकराल संकट को ललकारेगा कौन? सम्राट कुमार गुप्त का स्वास्थ्य इस स्थिति में नहीं था कि वह स्वयं सेनाओं का नेतृत्व कर रणभूमि में हूणों को ललकारने उतर पड़ते। सबके मन में प्रश्न था तो स्वयं सम्राट नेतृत्व नहीं करेंगे तो कौन? राजपुत्रों में उत्तराधिकार तय नहीं था और प्रश्न यह भी कि हूणों के साथ सैन्य संर्घर्ष में जीवित बचकर लौट आने की गारंटी नहीं। तब कांपती भुजाओं वाले उस पिता कुमार गुप्त के सबसे युवा पुत्र स्कन्दगुप्त ने स्वयं ही आगे बढ़कर पिता का धर्म संकट दूर करते हुए भरे दरबार में सिंह गर्जना के साथ हूणों के मुंडों की माला से भारत जननी के श्रृंगार का संकल्प लिया।

हुणैर्यस्य समागतस्य समरे दोभ्र्यां धरा कम्पिता भीमावर्त करस्य…। भितरी के शिलालेख में लिखी उपर्युक्त पंक्ति का अर्थ लिखते हुए कलम भी रोमांचित हो उठती है। उस महाप्रतापी के बल-विक्रम का स्मरण भारत के अपराजेय स्वरूप का ध्यान दिलाने लगता है। इन पंक्तियों में लिखा है कि ‘समरभूमि में हूणों के सामने आने पर दोनों हाथों में तलवार लिए स्कन्दगुप्त और उसके सैन्यबल ने अपने प्रबल बाहुबल से जो पराक्रम प्रकट किया, उसे देख सुनकर बर्बरता का पर्याय बने हूणों का ह्रदय ही नहीं बल्कि समस्त भूमंडल का अत्याचारी वर्ग मानो कंपित हो उठा।’

अश्व पर सवार होकर वह बाहुबली महावीर स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य दोनों भुजाओं से अपनी तलवारें नचाता हुआ जिधर से भी निकलता था कि उधर ही उधर रक्त से सने हूणों के नरमुंडो से पृथ्वी पट गई। भितरी के पास जो मुडिय़ार गांव है, वहां स्कन्दगुप्त और उसकी महासेना ने हूणों के मुंडो का पहाड़ खड़ा किया, हौणहीं गांव में हूणों की लाशों से कितने ही गड्ढे-गड़ही पाट दिए, औंडि़हार में उस महाप्रतापी ने हूणों के खिलाफ संगर प्रारंभ करने का जो शंखनाद किया, इस संगर ने ही उसे इतिहास में सदा के लिए अमर कर दिया।

भितरी शिलालेख स्कन्दगुप्त के संपूर्ण जीवन चरित्र और हूणों के साथ हुए महायुद्ध पर सूत्रों में गंभीर प्रकाश डालता है। इसकी एक पंक्ति में औडि़हार अर्थात हूणिआरि या अवनिहार का संकेत में वर्णन आता है। इसमें लिखा है – स्वैर्दण्डै:..बाहुभ्याम अवनिं विजित्य हि जितेष्वात्र्तेषु कृत्वा दयाम्…। इस पंक्ति में अवनि अर्थात पृथ्वी पर उसके द्वारा शत्रुओं (हूणों) को हराने का सीधा वर्णन है। अवनि पर विजय अर्थात अवनि-हार या हूणिआरि शब्द यहां पर प्रतिध्वनित होता दिखाई देता है। पूरी पंक्ति का जो भाव निकलता है उसके अनुसार, ‘’अपने बाहुबल से उसने (स्कन्दगुप्त ने) पृथ्वी (अवनि) पर अर्थात शत्रुओं पर विजय प्राप्त की, (पराजित हूणों में) जिन आर्तजनों ने उससे दया की भीख मांगी और प्राणों की गुहार लगाई उन्हें स्कन्दगुप्त ने छोड़ दिया लेकिन ऐसा करते समय उसमें रंचमात्र भी अहंकार नहीं आया और ना ही उसके चेहरे पर किसी प्रकार का क्षुब्धभाव ही दिखाई पड़ा।’’

अनेक इतिहासकार भितरी अभिलेख में गंगा नदी के वर्णन के आधार पर भी मानते हैं कि हूणों से स्कन्दगुप्त का आमना-सामना औडि़हार के गंगा तट के समीप ही कहीं हुआ था। भितरी अभिलेख में एक पंक्ति में लिखा है

-शत्रुषु शरा…विरचितं प्रख्यापितो दीप्तिदा न द्योति…नभीषु..लक्ष्यत इव श्रोत्रेषु गाङ्र्गध्वनि:(गंगध्वनि:) ।।
अर्थात शत्रुओं के बाणों..के प्रत्युत्तर में जब स्कन्दगुप्त के धनुर्यंत्रों से बाणों की बौछार निकलती थी तो…आसमान पर बाणों का भंवर छा जाता था…शत्रुओं के कानों में तीखे बाणों की सनसनाती बौछार इस तरह सुनाई पड़ती थी जैसे कानों में गंगा की कलकल ध्वनि सुनाई पड़ रही हो।

गाजीपुर-भितरी से स्कन्दगुप्त का कैसा गहरा रिश्ता था, यह तथ्य इतिहास में सिद्ध है। स्कन्दगुप्त की लाट और उसका शिलालेख और उसके द्वारा वहां स्थापित विशाल विष्णु मंदिर के भग्नावशेष सारी कहानी खुद ही बयां कर देते हैं। किन्तु स्कन्दगुप्त का रिश्ता तो संपूर्ण भारत-भुवन की रक्षा के प्रश्न से कहीं गहरे जुड़ा था, उसने भितरी और औंडि़हार की भूमि से हूणों के विरुद्ध जिस महायुद्ध का प्रारंभ किया उसके बारे में इतिहास के स्रोत और लोकमन की स्मृतियों के जरिए हम अनेक कथाएं सुनते हैं। इतिहासकारों की कलम से, पुरातत्व के द्वारा सामने लाई गई जानकारी से और लोकस्मृतियों से छनकर आने वाली कथात्मक जानकारी, इन सबको मिलाकर ही स्कन्दगुप्त की सही तस्वीर आधुनिक भारत के सम्मुख रखी जा सकती है।

(लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में व्याख्याता हैं)

साभार- https://www.bhartiyadharohar.com/skandagupta/ से 

हमारे वेद-पुराणों और धर्मग्रंथों की सार्थकता सिध्द करने वाले जोसेफ कैंपबेल

मेरा प्रिय लेखक है जोसेफ कैंपबेल। उन्होंने मिथकों पर बहुत काम किया है।पाश्चात्य और पौर्वात्य दोनों पर। मैंने भारतीय पौराणिकी पर काम किया। पर उनमें और मुझमें एक फर्क है। वे मोनोमिथ की अवधारणा पर काम करते हैं। उनके हिसाब से एक ही मूल मिथकीय अवधारणा अलग-अलग रूप में अलग-अलग संस्कृतियों में व्यक्त हुई है।
मैं भी ऐसी समानताएं नोट करता हूँ और जितना यह देखता हूँ उतना मेरी वो यजुर्वेदीय अवधारणा पुष्ट होती जाती है- सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा। यह वह प्रथम संस्कृति थी जिसका विश्व ने वरण किया।
मुझे लगता है कि कैंपबेल को यह स्वीकार करने में थोड़ी सी दिक्कत रही होगी या उन्होंने जानबूझकर इसे न्यूट्रल शब्दावली में वर्णित किया होगा। Monomyth के नाम से।
पर मिथकों में स्वतंत्र परिवहन की कोई आंतरिक शक्ति नहीं होती। उनका वहन तो संस्कृति को ही करना होता है।
कुछ विचारक ऐसे होते हैं जो अजनबी नहीं लगते—वे दर्पण जैसे लगते हैं। जब मैंने पहली बार जोसेफ कैम्पबेल को पढ़ा, तो मुझे नहीं लगा कि मैं किसी विदेशी विद्वान को पढ़ रहा हूँ। लगा जैसे कोई ऐसा व्यक्ति पढ़ रहा हूँ जो उसी अग्नि के चारों ओर घूमा है, जिसके इर्द-गिर्द मैं अपने पूरे बौद्धिक जीवन में चक्कर लगाता रहा हूँ—केवल दूसरी दिशा से। वे पश्चिम से उस ज्वाला तक पहुँचे थे—कोलंबिया और सारा लॉरेंस के शीतल पुस्तकालयों से, तुलनात्मक पुराण-शास्त्र के अनुशासित गलियारों से। मैं भीतर से आया था—उस परंपरा के अंदर से, जिसका वे अध्ययन करते थे। संस्कृत ग्रंथों से, पुराणों से, एक ऐसी सभ्यता की जीवंत स्पंदन से जो अपनी कहानियाँ कहना कभी नहीं भूली। और फिर भी हम दोनों उसी अग्नि तक पहुँचे थे।यह पहचान गहरी है। लेकिन पहचान सहमति नहीं होती। और जितना अधिक मैंने कैम्पबेल को पढ़ा, उतना ही मुझे एक सौम्य किंतु दृढ़ मतभेद अनुभव होता गया—इसमें नहीं कि उन्होंने क्या देखा, बल्कि इसमें कि जो उन्होंने देखा उसके बारे में वे क्या कहने को तैयार थे।
कैम्पबेल की महान कृति The Hero with a Thousand Faces, जो १९४९ में प्रकाशित हुई, एक साहसिक प्रस्ताव लेकर आई: विश्व की पुराण-कथाओं की चकित कर देने वाली विविधता के नीचे—ग्रीक और हिंदू, नॉर्स और एज़्टेक, पॉलिनेशियाई और मूल अमेरिकी—एक ही सार्वभौमिक कथा प्रवाहित होती है। उन्होंने इसे मोनोमिथ कहा—एक शब्द जो उन्होंने जेम्स जॉयस से उधार लिया, लेकिन जिसे उन्होंने अपनी अनूठी दृष्टि से भर दिया। नायक अपनी सामान्य दुनिया से प्रस्थान करता है, एक अलौकिक आश्चर्य के क्षेत्र की दहलीज़ पार करता है, परीक्षाओं का सामना करता है, एक रूपान्तरकारी शक्ति या ज्ञान पाता है, और अपने समुदाय को उपहार देने के लिए वापस लौटता है।
यह ढाँचा—प्रस्थान, दीक्षा, वापसी—सुंदर है। और एक बार जब आप इसे देख लेते हैं, तो इसे अनदेखा करना असंभव हो जाता है। मैंने वर्षों भारतीय पुराण-शास्त्र में डूबकर बिताए हैं—रामायण और महाभारत की कथाएँ पढ़ते हुए, पौराणिक वंशावलियों को खोजते हुए, उन वैदिक स्तोत्रों में जो दर्ज इतिहास से परे पहुँचते हैं। और हाँ, वह पैटर्न वहाँ है। एक वर्णनात्मक उपकरण के रूप में मोनोमिथ भारतीय भूमि पर भी आश्चर्यजनक रूप से काम करता है। लेकिन यहीं से मैं अपने प्रिय गुरु से अलग होने लगता हूँ।
कैम्पबेल असाधारण बौद्धिक उदारता के व्यक्ति थे। वे सच में हर संस्कृति के मिथकों से प्रेम करते थे। बिल मोयर्स के साथ उनकी टेलीविज़न बातचीत में जो उष्मा और विस्मय झलकती थी, वह प्रामाणिक लगती थी, दिखावटी नहीं। वे आधुनिकता के उस दौर में लोगों को उनकी आध्यात्मिक कल्पनाशक्ति वापस देना चाहते थे जब वह सूख रही थी। इसके लिए वे मेरी स्थायी कृतज्ञता के पात्र हैं।
लेकिन एक ऐसी तटस्थता भी होती है जो अपनी अति-सावधानी में ही एक विकृति बन जाती है। कैम्पबेल का मोनोमिथ ऐसे प्रस्तुत किया गया है जैसे वह सभी संस्कृतियों में एक साथ उत्पन्न हुआ हो—जैसे मानव मानस ने इस कथा को उसी तरह स्वतः स्रावित किया जैसे शरीर हार्मोन स्रावित करता है—स्वचालित रूप से, सार्वभौमिक रूप से, बिना किसी ऐतिहासिक कारण के। यह काल से मुक्त है। यह भूगोल से मुक्त है। यह संचरण से मुक्त है।
और यही वह जगह है जहाँ मोनोमिथ न केवल अधूरा, बल्कि चुपचाप भ्रामक हो जाता है।
विचार अपने आप नहीं चलते। कहानियाँ पक्षियों की तरह किसी अंतर्निहित दिशाज्ञान से प्रवास नहीं करतीं। मिथकों को वाहकों की ज़रूरत होती है। उन्हें संस्कृतियों की ज़रूरत होती है—जीवित, साँस लेती, सिखाती संस्कृतियों की—जो उन्हें स्मृति में संजोती हैं, अनुष्ठान में एन्कोड करती हैं, पीढ़ियों और सीमाओं के पार ले जाती हैं। मोनोमिथ की सार्वभौमिकता, यदि हम गंभीर हों, तो केवल एक साझा मानव मनोविज्ञान का प्रमाण नहीं है। यह एक मूल संचरण का भी प्रमाण है—एक महान सांस्कृतिक स्रोत का, जिससे सहायक नदियाँ बहीं।
यजुर्वेद में यह जो वाक्यांश है यह मेरे मन में तब से बसा है जब से मैंने भारतीय पौराणिकी का अध्ययन आरंभ किया: सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा। यह असाधारण आत्मविश्वास की घोषणा है—”यह प्रथमा संस्कृति है, जिसे विश्व ने चुना।” केवल पुरानी नहीं। केवल आदरणीय नहीं। प्रथम। पूर्व। मूल। मैं इस वाक्यांश पर बार-बार लौटता हूँ—राष्ट्रवादी दंभ के रूप में नहीं, बल्कि एक वास्तविक बौद्धिक परिकल्पना के रूप में, जिसे मैं जितना अधिक देखता हूँ, उतनी ही अधिक पुष्टि होती पाता हूँ। भारतीय पुराण-शास्त्र में जितना गहरे उतरा हूँ—ग्रंथ पढ़ते हुए, प्रतीकवाद को खोजते हुए, ब्रह्माण्ड-वैज्ञानिक संरचनाओं का मानचित्र बनाते हुए—उतना ही अधिक मैंने पाया है कि कैम्पबेल ने जिसे मोनोमिथ कहा वह भारतीय स्रोतों में केवल समानांतर नहीं है, बल्कि अधिक पूर्णता से व्यक्त है। अधिक घनत्व से । अधिक दार्शनिक रूप से विस्तृत। जैसे भारतीय परंपरा इन अन्य पुराण-शास्त्रों की चचेरी बहन नहीं, बल्कि किसी मौलिक अर्थ में उनकी माँ या नानी हो।
मैंने कभी-कभी सोचा है, कैम्पबेल को पढ़ते हुए, कि क्या वे इस असमानता से पूरी तरह अवगत थे। वे एक प्रतिभाशाली विद्वान थे, वेदांत दर्शन और हिंदू प्रतिमा-शास्त्र में गहरे पारंगत। वे भारत से प्रेम करते थे। उन्होंने उपनिषदों और महाभारत के बारे में वास्तविक गहराई से लिखा। उनकी मोनोमिथ की संकल्पना पर भारतीय विचार का प्रभाव छुपा नहीं है—वह हर जगह उनके काम में है, यहाँ तक कि जब वे स्पष्टतः किसी सेल्टिक लोककथा या ग्रिम परी-कथा पर चर्चा कर रहे होते हैं।
लेकिन उन्होंने कभी ठीक-ठीक यह नहीं कहा कि इसका क्या अर्थ हो सकता है। उन्होंने कभी उस तर्क को उसके भौगोलिक और ऐतिहासिक मूल तक नहीं खींचा। उन्होंने अपने अवलोकनों को जुंगियन गहन मनोविज्ञान की भाषा में लपेटा—आर्केटाइप, सामूहिक अचेतन, सार्वभौमिक मनोवैज्ञानिक संरचनाएँ—जिसका प्रभाव यह हुआ कि पैटर्न को सार्वभौमिक बनाते हुए इसे विखंडित भी कर दिया गया। यह कहकर कि सभी मनुष्य इन कहानियों को अपने मनोवैज्ञानिक DNA में वहन करते हैं, उन्होंने उस अधिक असुविधाजनक प्रश्न को टाल दिया: यदि कहानियाँ इतनी समान हैं, यदि संरचनाएँ इतनी एकरूप हैं, तो क्या कोई उद्गम-स्थान हो सकता है?
मैं नहीं सोचता कि यह ठीक-ठीक बौद्धिक कायरता थी। कैम्पबेल अपने समय और अपनी अकादमी के व्यक्ति थे। वे बीसवीं सदी के मध्य के अमेरिकी विश्वविद्यालयों में काम करते थे, एक ऐसे बौद्धिक वातावरण में जो एक निश्चित उदार सार्वभौमवाद द्वारा आकारित था और सांस्कृतिक प्राथमिकता के किसी भी दावे से गहरी आशंका रखता था। सांस्कृतिक मौलिकता के दावे, युद्धोत्तर कल्पना में, राष्ट्रवादी पुराण-शास्त्र की सबसे बुरी अतिशयताओं से जुड़े थे। यह कहना कि एक संस्कृति “प्रथम” थी, उस वातावरण में, एक खतरनाक रास्ते पर पहला कदम जैसा लगता था।
इसलिए कैम्पबेल ने मोनोमिथ की सुंदर तटस्थ भाषा चुनी। उन्होंने कहा: सभी संस्कृतियाँ यही कहानी सुनाती हैं। जो उन्होंने नहीं जोड़ा—जो शायद वे जोड़ नहीं सके—वह यह था: और यहाँ, उन सभी जगहों में जहाँ यह कहानी सुनाई जाती है, यह वह जगह है जहाँ यह सबसे पूर्णता से, सबसे प्राचीनता से, और सबसे ब्रह्माण्डीय रूप से सुनाई जाती है।
मिथक स्वयं संचारित नहीं होते।मिथक अपने पैरों पर महाद्वीपों को पार नहीं करते। वे लोगों के मुँह और स्मृति और पांडुलिपियों में यात्रा करते हैं। वे व्यापार और प्रवास और विजय की धाराओं में यात्रा करते हैं। वे तब यात्रा करते हैं जब कोई संस्कृति इतनी जीवंत, इतनी विस्तारशील, इतनी आध्यात्मिक रूप से आकर्षक होती है कि दूसरों को अपनी कक्षा में खींच ले या अपने पुत्रों और पुत्रियों को शिक्षकों, व्यापारियों, पुजारियों या पथिकों के रूप में बाहर भेजे।
महान भारतीय महाकाव्य परंपराएँ भारत में सीमित नहीं रहीं। रामायण दक्षिण-पूर्व एशिया तक गई—जावा और बाली, थाईलैंड और कंबोडिया—सदियों में व्यापारियों, ब्राह्मण पुजारियों और बौद्ध भिक्षुओं द्वारा वहन की गई। उसने इन धरतियों में जड़ें जमाईं और नए रूपों में फूली-फली। वाल्मीकि की रामायण थाईलैंड की रामकियेन बन गई, जावा की काकावीन रामायण, कंबोडिया की रियामकेर। कहानी ने अपने कपड़े बदले लेकिन अपना कंकाल रखा। यह इसलिए हुआ क्योंकि एक जीवित संस्कृति—यदि आप चाहें तो एक प्रथम संस्कृति—में अपनी मौलिक कथाओं को बाहर प्रक्षेपित करने के लिए पर्याप्त शक्ति और सामंजस्य था।
यही वह चीज है कि जिसके चलते मोनोमिथ को जैसा कैम्पबेल ने तैयार किया, उससे नहीं समझा जा सकता। यह संचरण -तंत्र । यदि नायक की यात्रा केवल एक आर्केटाइपल संरचना है जो समस्त मानवता के सामूहिक अचेतन से स्वतःस्फूर्त रूप से उत्पन्न होती है, तो साक्ष्य इतनी निरंतरता से एक दिशा की ओर क्यों इशारा करता है? इस कहानी के सबसे पुराने, सबसे विस्तृत, सबसे दार्शनिक रूप से पूर्ण संस्करण भारतीय उपमहाद्वीप और उसके सांस्कृतिक प्रभाव-क्षेत्र में क्यों पाए जाते हैं? पुराण-शास्त्रीय समानता का रास्ता, जब आप इसे सावधानी से अनुसरण करते हैं, पूर्व और भीतर की ओर क्यों ले जाता है—गंगा के मैदानों तक, हिमालय की तराई तक, उन प्राचीन यज्ञ-भूमियों तक जहाँ वैदिक ऋषियों ने पहली बार एक ऐसे विश्व को अपनी ऋचाएँ मंत्र और श्लोक सुनाए जो अभी युवा था।
मैं भारतीय पुराण-शास्त्र तक एक बाहरी पर्यवेक्षक के रूप में नहीं पहुँचा जो जिज्ञासाओं का वर्गीकरण कर रहा हो। मैं ऐसे व्यक्ति के रूप में आया जो उसकी कहानियों से बना है, उसके देखने के तरीके से आकारित हुआ है। यह भीतरी स्थिति एक ऐसा ज्ञान देती है जिसे तुलनात्मक स्कॉलरशिप, अपनी समस्त कठोरता के बावजूद, कभी-कभी चूक जाती है। यह ज्ञान कि एक जीवंत परंपरा भीतर से कैसी महसूस होती है—वह कैसे टिकी रहती है, कैसे पीढ़ियों में खुद को पुनः-उत्पन्न करती है, कैसे सहस्राब्दियों तक सुसंगत रहने का प्रबंधन करती है जबकि फिर भी गतिशील और खुली बनी रहती है। भारतीय पुराण-शास्त्रीय परंपरा प्राचीन कहानियों का संग्रहालय नहीं है। यह एक जीवित प्राणी है जो बढ़ती, अनुकूलित होती, नई परिस्थितियों से बोलती रहती है, अपनी मूल अंतर्दृष्टि का धागा बनाए रखते हुए।
यह केवल मोनोमिथ नहीं है। यह मेटा-मिथ है: वह कहानी कि क्यों कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए, और उन्हें कैसे वहन किया जाना चाहिए, और उन्हें वहन करने की ज़िम्मेदारी कौन उठाता है।

(लेखक मनोज श्रीवास्तव (1987 बैच) मध्य प्रदेश कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं, जिन्हें 1 जनवरी 2025 से मध्य प्रदेश का राज्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया है। भोपाल में पदस्थ, वे 35 से अधिक वर्षों के प्रशासनिक अनुभव वाले एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो पहले अपर मुख्य सचिव (पंचायत और ग्रामीण विकास) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।)

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जैन धर्म की तप परंपरा में वर्षीतप के संकल्प इस वर्ष चैत्र कृष्ण अष्टमी (बुधवार, 11 मार्च 2026) को लिए जाएंगे।

अष्टमी पर लिए जाएंगे वर्षीतप के संकल्प

इस वर्ष 14 महीने से अधिक चलेगी तप साधना

अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक रहेगा उपवास-आहार का कठोर क्रम

 

जैन धर्म की तप परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले वर्षीतप के संकल्प इस वर्ष चैत्र कृष्ण अष्टमी (बुधवार, 11 मार्च 2026) को लिए जाएंगे। यह पावन दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के जन्म कल्याणक के रूप में भी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

इस अवसर पर जैन समाज के साधु-साध्वियाँ तथा श्रावक-श्राविकाएँ वर्षीतप का संकल्प लेकर कठिन तप साधना का आरंभ करेंगे। संकल्प लेने के बाद साधक अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक उपवास और संयम का कठोर नियम निभाते हैं।

जैन समाज में वर्षीतप को सबसे कठिन और पुण्यदायी तपों में गिना जाता है। श्रद्धालु इसे केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मसंयम, त्याग और आत्मशुद्धि की महान साधना मानते हैं। इस दौरान साधक संयमित जीवन, ध्यान, स्वाध्याय और धार्मिक साधना में समय व्यतीत करते हैं।

दो वर्षों तक चलता है तप का कठिन क्रम -इस तप का नियम अत्यंत कठोर होता है। इसमें साधक पूरे तेरह महीने एक विशेष क्रम का पालन करते हैं—एक दिन पूर्ण उपवास, दूसरे दिन आहार।

यह क्रम लगातार लंबे समय तक चलता रहता है। उपवास और आहार का यह क्रम लगभग एक वर्ष से अधिक अवधि तक चलता है, जिसके कारण इसे अत्यंत कठिन तप साधना माना जाता है।
साधक इस दौरान अपने दैनिक जीवन को पूरी तरह अनुशासन में ढाल लेते हैं। भोजन, व्यवहार, वाणी, विचार और आचरण—सभी में संयम का पालन किया जाता है। तप का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, मन की स्थिरता और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करना है।

23 प्रकार के आहारों का त्याग करेंगे साधक -वर्षीतप का संकल्प लेने वाले साधक कई प्रकार के आहारों का त्याग करते हैं। जैन धर्म की परंपरा के अनुसार इस तप में लगभग 23 प्रकार के खाद्य पदार्थों का त्याग किया जाता है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं— बासी भोजन, जमीकंद, बहुबीज वाले पदार्थ, अधिक मसालेदार भोजन, तामसिक आहार। इसके साथ ही साधक अनेक अन्य धार्मिक नियमों का भी पालन करते हैं— रात्रि में जल ग्रहण नहीं करना, प्रतिदिन सुबह और शाम प्रतिक्रमण करना, दोनों समय गुरुवंदन करना, स्वाध्याय और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन
ध्यान और आत्मचिंतन इस प्रकार वर्षीतप केवल उपवास की साधना नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संयम और आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास है।

दीर्घकालीन तप के प्रेरणास्रोत -जैन समाज में कई संत और साधक वर्षीतप जैसी कठिन साधनाओं के माध्यम से समाज को प्रेरणा देते रहे हैं। स्थानकवासी जैन श्रमण संघ के चतुर्थ आचार्य डॉ. शिव मुनि इस वर्ष 20 अप्रैल को अपना 41वाँ वर्षीतप पूर्ण कर 42वें वर्षीतप में प्रवेश करेंगे। इतने लंबे समय तक निरंतर तप साधना करने वाले आचार्य शिव मुनि जैन समाज के एकमात्र आचार्य हैं जो यह तपस्या कर रहे हैं, इसके अलावा हज़ारों की संख्या में साधु – साध्वी, श्रावक- श्राविकाएं यह तप साधना कर रहे है। उनकी तपस्या, त्याग और अनुशासन जैन समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं और अनेक श्रद्धालु उनसे प्रेरित होकर तप और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।

तेरह महीने तक नहीं मिला पारणा-जैन परंपरा के अनुसार जब भगवान आदिनाथ ने दीक्षा ग्रहण की, तब उन्होंने संकल्प लिया कि वे गन्ने के रस से ही अपना पारणा करेंगे। उस समय किसी को इस विधि की जानकारी नहीं थी, इसलिए कोई भी उन्हें गन्ने का रस अर्पित नहीं कर सका। परिणामस्वरूप उन्हें लगभग तेरह महीने तक पारणा नहीं मिला और वे निरंतर तपस्या करते रहे।

अंततः उनका पहला पारणा हस्तिनापुर में हुआ। जैन परंपरा के अनुसार राजा श्रेयांस कुमार ने उन्हें गन्ने का रस अर्पित कर उनका पारणा कराया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में आज भी जैन समाज अक्षय तृतीया के दिन वर्षीतप का पारणा “इक्षुरस” से अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ करते है।

अधिकमास के कारण इस वर्ष बढ़ेगी तप की अवधि-धार्मिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में अधिकमास पड़ने के कारण इस बार वर्षीतप की अवधि सामान्य वर्षों की तुलना में अधिक रहेगी। इस वर्ष ज्येष्ठ मास दो बार आएगा—एक सामान्य ज्येष्ठ और एक अधिक ज्येष्ठ। अधिकमास 17 मई 2026 से प्रारंभ होकर 15 जून 2026 तक रहेगा। इसके कारण वर्षीतप साधकों को लगभग 14 महीनों से अधिक समय तक तप साधना करनी होगी।

आत्मशुद्धि और संयम का महापर्व -श्रमण डॉ पुष्पेंद्र ने बताया कि वर्षीतप जैन धर्म में केवल तपस्या नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का महापर्व माना जाता है। यह तप मनुष्य को त्याग, धैर्य, अनुशासन और आत्मसंयम का पाठ पढ़ाता है। आज के भौतिकवादी और भागदौड़ भरे जीवन में भी अनेक श्रद्धालु इस कठिन तप साधना को अपनाकर यह संदेश देते हैं कि आध्यात्मिक शक्ति, आत्मसंयम और आस्था के बल पर मनुष्य किसी भी कठिन साधना को पूर्ण कर सकता है।

संस्कृत वह माध्यम है जिसके द्वारा भारत ने अपनी आत्मा को अभिव्यक्त किया है: डॉ. संपदानंद मिश्रा

संस्कृत विद्वान डॉ. संपदानंद मिश्रा श्री अरबिंदो फाउंडेशन फॉर इंडियन कल्चर के निदेशक रहे हैं। वंदे मातरम लाइब्रेरी ट्रस्ट के माध्यम से, जो एक ओपन-सोर्स और स्वयंसेवी परियोजना है, वे संस्कृत में उपलब्ध लगभग सभी महत्वपूर्ण ग्रंथों के सत्यापित और प्रामाणिक अंग्रेजी अनुवाद तैयार करने की योजना बना रहे हैं। यह अग्रणी परियोजना मूल संस्कृत कृतियों की नींव भी रखेगी, जिससे वैदिक ज्ञान की सराहना और संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा। वर्तमान में वे   ऋषिहुड विश्वविद्यालय में संस्कृति डीन और मानव विज्ञान केंद्र के निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

इस साक्षात्कार में वे श्री अरबिंदो के साथ अपने संबंधों और संस्कृत में उनके कार्यों के बारे में बात करते हैं।

श्री अरबिंदो की समग्र योग की परिकल्पना आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?

श्री अरबिंदो का पूर्णयोग अनेक योगों का समामेलन नहीं, बल्कि योग का संश्लेषण है। श्री अरबिंदो के पूर्णयोग में योग की प्रत्येक प्रमुख प्रणाली के मूलभूत सत्य और उसके आवश्यक तत्व के साथ-साथ उनके द्वारा जोड़ा गया विकास का नया आयाम भी निहित है। यहाँ व्यक्तिगत मुक्ति की अपेक्षा मनुष्य और प्रकृति के सर्वांगीण रूपांतरण पर बल दिया गया है। यहाँ पृथ्वी पर संपूर्ण मानव जीवन पर बल दिया गया है। जीवन के किसी भी पहलू को यहाँ नकारा या उपेक्षित नहीं किया गया है। व्यक्ति को अपनी सीमित चेतना के प्रति सजग रहकर विकास करना होता है और चेतना के विस्तार के लिए स्वयं को निरंतर परिपूर्ण बनाना होता है। उच्चतर उत्थान की आकांक्षा, प्रगति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने वाली हर चीज का त्याग और दिव्य कृपा में अटूट विश्वास एवं समर्पण, इस योग के तीन आवश्यक तत्व हैं जो इसे सदा के लिए अधिक व्यावहारिक बनाते हैं।

उनके दृष्टिकोण ने आपको किस प्रकार प्रेरित किया है?

मैं बचपन से ही संस्कृत और शास्त्रों का विद्यार्थी रहा हूँ। लेकिन श्री अरबिंदो और मदर की शिक्षाओं के संपर्क में आने के बाद ही मुझे आत्म-पहचान मिली और मेरी समझ गहरी और व्यापक हुई। श्री अरबिंदो के रूपांतरण के भव्य दृष्टिकोण और पवित्र ग्रंथों के मूल भावों की व्याख्या तथा उनके द्वारा दिए गए भाषा के नए विज्ञान ने मुझे अत्यंत प्रेरित किया। इससे वेदों और उपनिषदों में वर्णित ऋषियों और संतों के दृष्टिकोण को समझना अधिक स्पष्ट हो गया और इन पवित्र ग्रंथों में प्रकट सत्य का अभ्यास करना संभव हो गया। संक्षेप में, श्री अरबिंदो के दृष्टिकोण की तीव्रता और उनके द्वारा प्रस्तुत रूपांतरण के विचार ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया।

हमारी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को समझने में संस्कृत की क्या भूमिका है?

संस्कृत वह माध्यम रही है जिसके द्वारा भारत ने अपनी आत्मा को अभिव्यक्त किया है। हमारी भूमि की संस्कृति का हर अंश इस भाषा के माध्यम से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा है। इस भूमि की कला और संस्कृति के गहरे सार और सत्यों को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। गहरे अर्थों में, संस्कृत अन्य भाषाओं की तरह एक भाषा नहीं है, बल्कि यह स्वयं में संपूर्ण भारत की संस्कृति है। इस भाषा का सचेत उपयोग और इसके साथ गहरा जुड़ाव यह प्रकट करता है कि इसमें भारतीय संस्कृति के मूलभूत सत्य समाहित हैं।

आसनों के अभ्यास से चेतना की उन्नति तक कैसे पहुंचा जा सकता है? योग अभ्यास करने वाले बहुत से लोग किस अतिरिक्त चरण को समझने में चूक जाते हैं?

ऋषियों, संतों और आध्यात्मिक गुरुओं के ज्ञान के अनुसार, सृष्टि स्थिर नहीं है, बल्कि उस परम सत्य का निरंतर प्रकटीकरण है जो सर्वथा का स्रोत है। अतः जीवन का उद्देश्य चेतना के उच्चतर स्तरों तक पहुंचना और नए अनुभवों को प्राप्त करना है। सभी प्रकार के अभ्यास, जब जागरूकता के साथ और सीमित चेतना से मुक्ति पाने के उद्देश्य से किए जाते हैं, तो अच्छे होते हैं। लेकिन किसी एक अभ्यास से बंधे रहना और उसे एकमात्र मार्ग बताना उचित नहीं है। जो अभ्यास अतीत में बढ़ती चेतना के लिए पर्याप्त था, वह आज अपर्याप्त हो सकता है। इसलिए, जैसा कि वेद कहता है, “यत् सनोः सनुम् अरुहत्”, हमें निरंतर उच्चतर स्तर तक पहुंचने के लिए आवश्यक प्रयास करने होंगे।

संस्कृत भाषा के कौन से पहलू आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होते हैं?

इसकी ध्वनियों की शुद्धता और भाषा में निहित मंत्रिक शक्ति अत्यंत उत्थानकारी है। यह तुरंत किसी उच्चतर सत्ता से जुड़ती है और शुद्धता, शांति और स्थिरता का भाव उत्पन्न करती है, तथा व्यक्ति को एकता और सन्त्व की अवस्था तक ले जाती है। यह भाषा के दृष्टिकोण से है। इसके अतिरिक्त, इस भाषा के माध्यम से व्यक्त किए गए विचार, इसका सचेतन उपयोग करने वाले की चेतना को और अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने और विस्तृत करने में सक्षम हैं। वेदों, उपनिषदों और संस्कृत के अन्य पवित्र ग्रंथों में दर्ज ऋषियों और संतों की अनुभूतियों में, सही ढंग से समझने पर, सत्य से जुड़ने की अपार शक्ति होती है।

संस्कृत का मूल स्वरूप ही दर्शाता है कि इसे आरंभ से ही मंत्र-प्रधान भाषा के रूप में रचा गया है। यह एक ऐसी भाषा है जो लगभग त्रुटिहीन है। जो भी इसके संपर्क में आता है, वह इसकी ध्वनियों में एक अलौकिक शक्ति का अनुभव करता है। इस भाषा की संगीतमयता और लयबद्ध सुंदरता, इसकी अभिव्यक्ति की शक्ति, इसकी ध्वनियों की शुद्धता और कंपन, इसकी ध्वनियों और इंद्रियों के बीच शाश्वत संबंध, इन सभी गुणों ने संस्कृत को एक अद्भुत भाषा बना दिया है, जो मंत्र के समान उत्थान, प्रकाश, ज्ञान और रूपांतरण की शक्ति रखती है। प्राचीन काल में भारत के ऋषि-मुनियों ने इसका उपयोग स्वयं के और अपने आस-पास के सभी पहलुओं के वास्तविक स्वरूप को जानने के साधन के रूप में किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत हमें जीवन के उद्देश्य की याद दिलाती है और उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रदान करती है।

जीवन में किसी पारंपरिक गुरु से योग सीखने का क्या महत्व है?

गुरु वह होता है जो अपने पास आने वाले सभी लोगों का बोझ उठाने की शक्ति रखता है। वह जानता है कि एक साधक को क्या चाहिए। वह जानता है कि साधक को उच्चतम अवस्था तक कैसे पहुँचाया जा सकता है। इसलिए यदि किसी को ऐसा गुरु मिल जाए जिससे वह अपने विकास के लिए मार्गदर्शन प्राप्त कर सके, तो इससे बहुत लाभ होता है। परम गुरु तो अपने भीतर का दिव्य स्वरूप है।

आज गैर-भारतीयों के बीच संस्कृत की मुख्य मांग क्या है?

गैर-भारतीयों की संस्कृत में विभिन्न उद्देश्यों से गहरी रुचि है। इनमें से कुछ ही वास्तव में सनातन धर्म से प्रेरित होकर और भारत के प्रति प्रेम के कारण रुचि रखते हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिनकी रुचि संस्कृत या भारत के प्रति प्रेम के कारण नहीं है। उनका इस भाषा को सीखने का एकमात्र उद्देश्य इसे तोड़-मरोड़ कर पेश करना और पूरी दुनिया को यह दिखाना है कि यह एक विभाजनकारी, दमनकारी और बेकार भाषा है। हमें केवल इस तथ्य से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि गैर-भारतीयों में संस्कृत की मांग है।

क्या संस्कृत सीखने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर कोई अध्ययन किया जा रहा है?

संस्कृत सीखने और मंत्रों का जाप करने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर कुछ अध्ययन हुए हैं। लेकिन संस्कृत का वास्तविक प्रभाव इन अध्ययनों से प्राप्त परिणामों से कहीं अधिक व्यापक है। ऐसे किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन का दायरा अक्सर सीमित ही होता है। इसलिए, प्रेरणा के लिए किसी वैज्ञानिक अध्ययन की तलाश करने के बजाय, संस्कृत की सुंदरता, आकर्षण, पवित्रता और शक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिए।

योग का अध्ययन करने के लिए आप योग अभ्यासकर्ताओं को संस्कृत में कौन से ग्रंथ पढ़ने की सलाह देते हैं?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप योग की किस प्रणाली का अनुसरण करते हैं। योग की प्रत्येक प्रणाली के अपने ग्रंथ हैं और उस प्रणाली को गहराई से समझने के लिए उन ग्रंथों का गहन अध्ययन आवश्यक है। मैं व्यक्तिगत रूप से वेदों और उपनिषदों के ऋषियों और संतों के दृष्टिकोण से गहन परिचय का सुझाव दूंगा ताकि योग को समग्र रूप से व्यापक रूप से समझा जा सके। योग क्या है और आंतरिक विकास के लिए क्या अभ्यास करना चाहिए, इसे समझने के लिए गीता के उचित अध्ययन से शुरुआत की जा सकती है। यह वास्तव में स्वयं योगेश्वर द्वारा दिया गया ग्रंथ है और बाद की योग प्रणालियों की नींव है। यह एक ऐसा ग्रंथ है जो अपनी प्रस्तुति में सरल और अत्यंत व्यावहारिक है।

क्या आप श्री अरबिंदो के जीवन से संबंधित योग से जुड़े ऐसे किस्से साझा कर सकते हैं जिनसे आपको प्रेरणा मिली हो?

मुझे शुरुआत में जिस बात से प्रेरणा मिली, वह यह थी कि एक बार किसी ने श्री अरबिंदो से पूछा, “क्या आप भगवान हैं?” उनका जवाब था, “हां, मैं भगवान हूं, आप भी भगवान हैं। आपको यह जानना चाहिए और उसी के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।”

सनातन धर्म का यही मूल सत्य है। इसका संदेश यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक वस्तु दिव्य है। और योग का गहरा अर्थ है एकत्व और समरूपता की अवस्था में स्थिर रहना, जहाँ यह या वह, मेरा या तुम्हारा कुछ नहीं होता, बल्कि सब कुछ दिव्य है, वह एक, अविभाज्य। अतः, पूर्ण निष्ठा और गहनता से इस बात को अपने मन में धारण करना कि सब कुछ दिव्य है, एकत्व और समत्व की इस अवस्था को प्राप्त करने की कुंजी है।

मेरे मन और हृदय पर अमिट छाप छोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कहानी उनकी कैद की कहानी है। कैद में ही उन्हें सर्वं वासुदेवमयं जगत का दर्शन हुआ था । यहीं श्री कृष्ण ने उनके हाथ में गीता रखी थी। श्री अरबिंदो के उत्तरापारा भाषण में उनके स्वयं के शब्दों में:

फिर उन्होंने गीता मेरे हाथों में रख दी। उनकी शक्ति मुझमें समा गई और मैं गीता की साधना करने में सक्षम हो गया। मुझे न केवल बौद्धिक रूप से समझना था, बल्कि यह भी जानना था कि श्री कृष्ण अर्जुन से क्या अपेक्षा रखते हैं और जो उनके कार्य को करने की इच्छा रखते हैं, उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं – घृणा और इच्छा से मुक्त होना, फल की अपेक्षा किए बिना उनके लिए कार्य करना, स्वार्थ का त्याग करना और उनके हाथों में एक निष्क्रिय और वफादार साधन बनना, ऊँच-नीच, मित्र-शत्रु, सफलता-असफलता के प्रति समान भाव रखना, फिर भी उनके कार्य में लापरवाही न करना।

यहीं पर वे फिर कहते हैं: “अन्य धर्म मुख्यतः आस्था और प्रतिज्ञा के धर्म हैं, परन्तु सनातन धर्म स्वयं जीवन है; यह ऐसी चीज है जिस पर विश्वास करने से कहीं अधिक उसे जीने की आवश्यकता है।”

मैं श्री अरबिंदो के निम्नलिखित उद्धरण के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा, जो मुझे और भी प्रेरित करता है:

“मैं विज्ञान, धर्म, थियोसोफी नहीं, बल्कि वेद की खोज करता हूँ—ब्रह्म के सत्य की, न केवल उनके सार तत्व की, बल्कि उनकी अभिव्यक्ति की, जंगल के रास्ते में रोशनी देने वाले दीपक की नहीं, बल्कि संसार में आनंद और कर्म के लिए प्रकाश और मार्गदर्शक की, उस सत्य की जो मत से परे है, उस ज्ञान की जिसकी खोज समस्त चिंतन करता है— yasmin vijéate sarvam vijéatam । मेरा मानना है कि वेद सनातन धर्म की नींव है; मेरा मानना है कि यह हिंदू धर्म के भीतर छिपी हुई दिव्यता है—पर एक पर्दा हटाना होगा, एक परदा उठाना होगा। मेरा मानना है कि यह जानने योग्य और खोजने योग्य है। मेरा मानना है कि भारत और विश्व का भविष्य इसकी खोज और इसके अनुप्रयोग पर निर्भर करता है, जीवन के त्याग पर नहीं, बल्कि संसार में और मनुष्यों के बीच जीवन जीने पर।”—श्री अरबिंदो।

अपर्णा श्रीधर
अपर्णा एम श्रीधर एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, सेंटर फॉर सॉफ्ट पावर (www.centerforsoftpower.org) की संपादक हैं और इंडिक टुडे में कला मामलों की सलाहकार संपादक हैं।साभार- https://www.indicayoga.com/ से 

हिंदू घृणा में चूर मृणाल पांडे ने की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश

कॉन्ग्रेसी पत्रकार मृणाल पांडे ने महाभारत की ‘द्रौपदी’ पर गलत तथ्य प्रस्तुत कर उनकी छवि को बिगाड़ा। इसके बाद जब संस्कृत विद्वान ने उनके तथ्यों को सही किया, तो माफी माँगने की बजाए विद्वान को ही ब्लॉक कर दिया। यह वामपंथी इकोसिस्टम का तय पैटर्न है।

कॉन्ग्रेसी नेशनल हेराल्ड की पत्रकार मृणाल पांडे की हिंदू घृणा छिपाए नहीं छिपती, वह बार-बार सामने आ ही जाती है। ताजा मामले में उन्होंने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए महाभारत की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर जैसे ही उनकी टिप्पणी वायरल हुई, लोगों ने उनके दावे पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और पुराणों व महाभारत के संदर्भों के साथ तथ्य सामने रखे।

लेकिन जैसे ही मृणाल पांडे एक्सपोज होने लगी, तो उन्होंने सवाल पूछने वालों को ही ब्लॉक करना शुरू कर दिया। यह वही वामपंथी सोच है जिसमें पहले एकतरफा नैरेटिव गढ़ा जाता है, फिर जब सच सामने आता है तो असहमति की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है।

पहले मृणाल पांडे ने रश्मिका के संदर्भ में ‘द्रौपदी’ पर कसा तंज

दरअसल, साउथ एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना और एक्टर विजय देवरकोंडा की शादी की फोटो पर एक यूजर ने लिखा था कि यह जोड़ी ‘महाभारत के द्रौपदी और अर्जुन’ जैसी वाइब्स दे रहा है। इसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए मृणाल पांडे ने एक तरफ से महाभारत की सभी स्त्रियों को निशाना बनाते हुए कहा, “उम्मीद है कि दुल्हन की किस्मत द्रौपदी, कुंती, गांधारी, तारा, मंदोदरी, अहिल्या से बहुत अलग होगी।”

मृणाल की बात का जवाब देते हुए ‘एक्स’ यूजर नमिता बाल्यान ने महाभारत की इन सभी स्त्रियों के प्रभावशाली व्यक्तित्व की जानकारी दी। नमिता ने कहा, “द्रौपदी, कुंती, गाँधारी, तारा, मंदोदरी और अहिल्या सभी बेहद शक्तिशाली, साहसी, धैर्यवान और अपने समय की बहुत महत्वपूर्ण महिलाएँ थीं। उनका योगदान सिर्फ उनके विवाह या वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती और समझदारी का परिचय दिया।”

मृणाल को जवाब देते हुए नमिता कहती हैं, “ऐसी महान महिलाओं को केवल उनकी ‘शादी’ के आधार पर आँकना न सिर्फ अधूरी जानकारी दिखाता है, बल्कि उनकी भूमिका को छोटा करने जैसा है। यह सोच खुद में पिछड़ी हुई है, जबकि पोस्ट करने वाला व्यक्ति खुद को प्रगतिशील बताने की कोशिश कर रहा था।”

अहंकारी मृणाल ने द्रौपदी को गलत रूप में किया पेश

मृणाल पांडे का अहंकार ‘द्रौपदी’ का नाम गलत संदर्भ में पेश करने तक भी शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने गलत धारणाएँ बनाकर महाभारत और द्रौपदी की छवि को तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दिया है। मृणाल ने द्रौपदी को ‘चिदग्निकुंड सम भूता’ कहा, यानी उनके अनुसार ‘द्रौपदी’ भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं।

नमिता के कमेंट पर जवाब देते हुए मृणाल लिखती हैं, “इसने उनके कीमती और युवा वर्षों को जरूर प्रभावित किया होगा। इतना बड़ा आघात मन पर गहरी छाप छोड़ गया होगा। उदाहरण के तौर पर द्रौपदी को चिदग्निकुंड सम भूता कहा गया है, यानी वह भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं। इसका मतलब है कि उनके व्यक्तित्व में अंदर की आग, आक्रोश और आत्मसम्मान की तीव्र शक्ति दिखाई देती है।”

मृणाल की गलत धारणाओं का सामने आया सच

मृणाल पांडे की महाभारत और द्रौपदी को लेकर तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों पर जब हिंदू संस्कृत स्कॉलर नित्यानंद मिश्रा ने सच्चाई सामने रखी तो यह उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने विस्तार से बताया कि द्रौपदी के बारे में जो दावा किा गया, वह न तो महाभारत के मूल पाठ में मिलता है और न ही उसके प्रामाणिक संस्करणों में।

मिश्रा ने साफ कहा कि महाभारत के क्रिटिकल एडिशन में कहीं भी द्रौपदी को ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ नहीं कहा गया है। यह शब्द महाभारत का नहीं है। उन्होंने समझाया कि ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ शब्द दरअसल ‘देवी ललिता’ के लिए आता है, जिसका उल्लेख ललिता सहस्ननाम में मिलता है और जिसे ब्राह्माण्ड पुराण से जोड़ा जाता है। यानी जिस शब्द को द्रौपदी से जोड़कर पेश किया गया, उसका महाभारत से कोई संबंध ही नहीं है।

नित्यानमंद मिश्रा ने यह भी बताया कि इस शब्द का अर्थ भी गलत बताया गया। चित या चिद का अर्थ ‘चेतना’ होता है, न कि भीतर का क्रोध। ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ का सही अर्थ है चेतना की अग्नि की वेदी से उत्पन्न। इसे भीतर की प्रचंड आक्रोश की आग से जन्मी बताया संस्कृत के मूल अर्थ को बदल देना है।

उन्होंने विद्वानों के अनुवाद और पारंपरिक व्याख्याओं को हवाला देते हुए कहा कि संस्कृत ग्रंथों के शब्दों का अर्थ संदर्भ और परंपरा के आदार पर समझना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।

यह सच सामने आने के बाद मृणाल पांडे का हिंदुओं और उनके इतिहास को गलत तरीके से पेश करने वाला नैरेटिव नही ढहता नजर आया। इसके बाद अपनी टिप्पणी को सुधारने, माफी माँगने या पोस्ट डिलीट करने के बजाए उन्होंने नित्यानंद मिश्रा को ही ब्लॉक कर दिया।

कंगना से कफील खान तक: मृणाल पांडे की हिंदू-घृणा की लिस्ट

ये वही मृणाल पांडे हैं, जो एक महिला के चुनावी मैदान में उतरने पर गाली देती हैं। जब कंगना रनौत को बीजेपी ने मंडी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, तो यही पांडे ने ‘मंडी में सही रेट मिलता है?’ जैसा आपत्तिजनक इशारा कर दिया। खुद को नारीवादी बताने वाली पांडे का नारीवाद बीजेपी को निशाना बनाने के सामने गिर गया और उन्होंने महिला को निशाना बनाना चुना, जो बीजेपी का चेहरा है।

दूसरी तरफ जब गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज कांड के आरोपित रहे कफील खान जेल से बाहर आए, तो मृणाल पांडे की खुशी छिपाए नहीं छिपी। उन्होंने खान की तुलना भगवान श्रीकृष्ण से कर डाली। जिस मामले में मासूम बच्चों की मौत हुई, उसमें आरोपी रहे व्यक्ति को भगवान से जोड़ना लोगों को बेहद आपत्तिजनक लगा। तब भी पांडे नहीं हिचकिचाई।

उनकी हिंदू-घृणा यहीं खत्म नहीं होती। कोलकाता पोर्ट का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखे जाने के बाद भी पांडे ने जहर उगला था। पांडे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ‘बंदर‘ से जोड़ा। इतना ही नहीं एक बार महाकाल के दर्शन करने वाले सिख नेता का मजाक उड़ाते हुए पांडे ने कहा कि स्वर्ण मंदिर कब जाओगे?

झूठ फैलाओ, सवाल उठे तो ब्लॉक करो: वामपंथियों का तय पैटर्न

मृणाल पांडे का ताजा मामला केवल एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि उस सोच की झलक है जो लंबे समय से वामपंथी इकोसिस्टम में देखने को मिलती रही है। पहले आधी अधूरी जानकारी के आधार पर नैरेटिव बनाया जाता है, हिंदू धर्म और परंपराओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं और उसे प्रगतिशील बहस का नाम दिया जाता है। लेकिन जैसे ही कोई तथ्य और ग्रंथों के संदर्भ के साथ जवाब देता है, वही लोग असहज हो जाते हैं। बहस करने का दावा करने वाले अचानक संवाद से पीछे हटते नजर आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में भी यही देखने को मिला। जब तक उनकी बात पर सवाल नहीं उठे, तब तक सोशल मीडिया पर बयान जारी रहे। लेकिन जैसे ही संस्कृत विद्वानों और आम लोगों ने प्रमाणों के साथ गलतियाँ बताई, जवाब देने के बजाए ब्लॉक करने का रास्ता चुना गया। यह वामपंथी विमर्श का पुराना तरीका है। पहले आरोप लगाओ, फिर विरोध होने पर खुद को पीड़ित दिखाओ और आखिर में असहमति की आवाज ही बंद कर दो।

यही वजह है कि इसे प्रतिशोध की राजनीति कहा जाता है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं तो बहस भी खत्म कर दी जाती है और सामने को ही गायब कर दिया जाता है। गलत सूचना फैलाने के लिए कोई माफी नहीं, कोई पछतावा नहीं। मृणाल पांडे का मामला भी उसी पैटर्न की एक और मिसाल बन गया, जहाँ सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल पूछने वालों को ब्लॉक कर दिया गया। यह दिखाता है कि झूठ फैलाने वाले वामपंथी, असलियत सामने आते ही कितनी आसानी से पीछे हट जाते हैं।

साभार- https://hindi.opindia.com/ से