Home Blog Page 4

संस्कृत वह माध्यम है जिसके द्वारा भारत ने अपनी आत्मा को अभिव्यक्त किया है: डॉ. संपदानंद मिश्रा

संस्कृत विद्वान डॉ. संपदानंद मिश्रा श्री अरबिंदो फाउंडेशन फॉर इंडियन कल्चर के निदेशक रहे हैं। वंदे मातरम लाइब्रेरी ट्रस्ट के माध्यम से, जो एक ओपन-सोर्स और स्वयंसेवी परियोजना है, वे संस्कृत में उपलब्ध लगभग सभी महत्वपूर्ण ग्रंथों के सत्यापित और प्रामाणिक अंग्रेजी अनुवाद तैयार करने की योजना बना रहे हैं। यह अग्रणी परियोजना मूल संस्कृत कृतियों की नींव भी रखेगी, जिससे वैदिक ज्ञान की सराहना और संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा। वर्तमान में वे   ऋषिहुड विश्वविद्यालय में संस्कृति डीन और मानव विज्ञान केंद्र के निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

इस साक्षात्कार में वे श्री अरबिंदो के साथ अपने संबंधों और संस्कृत में उनके कार्यों के बारे में बात करते हैं।

श्री अरबिंदो की समग्र योग की परिकल्पना आज पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण क्यों है?

श्री अरबिंदो का पूर्णयोग अनेक योगों का समामेलन नहीं, बल्कि योग का संश्लेषण है। श्री अरबिंदो के पूर्णयोग में योग की प्रत्येक प्रमुख प्रणाली के मूलभूत सत्य और उसके आवश्यक तत्व के साथ-साथ उनके द्वारा जोड़ा गया विकास का नया आयाम भी निहित है। यहाँ व्यक्तिगत मुक्ति की अपेक्षा मनुष्य और प्रकृति के सर्वांगीण रूपांतरण पर बल दिया गया है। यहाँ पृथ्वी पर संपूर्ण मानव जीवन पर बल दिया गया है। जीवन के किसी भी पहलू को यहाँ नकारा या उपेक्षित नहीं किया गया है। व्यक्ति को अपनी सीमित चेतना के प्रति सजग रहकर विकास करना होता है और चेतना के विस्तार के लिए स्वयं को निरंतर परिपूर्ण बनाना होता है। उच्चतर उत्थान की आकांक्षा, प्रगति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करने वाली हर चीज का त्याग और दिव्य कृपा में अटूट विश्वास एवं समर्पण, इस योग के तीन आवश्यक तत्व हैं जो इसे सदा के लिए अधिक व्यावहारिक बनाते हैं।

उनके दृष्टिकोण ने आपको किस प्रकार प्रेरित किया है?

मैं बचपन से ही संस्कृत और शास्त्रों का विद्यार्थी रहा हूँ। लेकिन श्री अरबिंदो और मदर की शिक्षाओं के संपर्क में आने के बाद ही मुझे आत्म-पहचान मिली और मेरी समझ गहरी और व्यापक हुई। श्री अरबिंदो के रूपांतरण के भव्य दृष्टिकोण और पवित्र ग्रंथों के मूल भावों की व्याख्या तथा उनके द्वारा दिए गए भाषा के नए विज्ञान ने मुझे अत्यंत प्रेरित किया। इससे वेदों और उपनिषदों में वर्णित ऋषियों और संतों के दृष्टिकोण को समझना अधिक स्पष्ट हो गया और इन पवित्र ग्रंथों में प्रकट सत्य का अभ्यास करना संभव हो गया। संक्षेप में, श्री अरबिंदो के दृष्टिकोण की तीव्रता और उनके द्वारा प्रस्तुत रूपांतरण के विचार ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया।

हमारी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को समझने में संस्कृत की क्या भूमिका है?

संस्कृत वह माध्यम रही है जिसके द्वारा भारत ने अपनी आत्मा को अभिव्यक्त किया है। हमारी भूमि की संस्कृति का हर अंश इस भाषा के माध्यम से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचा है। इस भूमि की कला और संस्कृति के गहरे सार और सत्यों को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है। गहरे अर्थों में, संस्कृत अन्य भाषाओं की तरह एक भाषा नहीं है, बल्कि यह स्वयं में संपूर्ण भारत की संस्कृति है। इस भाषा का सचेत उपयोग और इसके साथ गहरा जुड़ाव यह प्रकट करता है कि इसमें भारतीय संस्कृति के मूलभूत सत्य समाहित हैं।

आसनों के अभ्यास से चेतना की उन्नति तक कैसे पहुंचा जा सकता है? योग अभ्यास करने वाले बहुत से लोग किस अतिरिक्त चरण को समझने में चूक जाते हैं?

ऋषियों, संतों और आध्यात्मिक गुरुओं के ज्ञान के अनुसार, सृष्टि स्थिर नहीं है, बल्कि उस परम सत्य का निरंतर प्रकटीकरण है जो सर्वथा का स्रोत है। अतः जीवन का उद्देश्य चेतना के उच्चतर स्तरों तक पहुंचना और नए अनुभवों को प्राप्त करना है। सभी प्रकार के अभ्यास, जब जागरूकता के साथ और सीमित चेतना से मुक्ति पाने के उद्देश्य से किए जाते हैं, तो अच्छे होते हैं। लेकिन किसी एक अभ्यास से बंधे रहना और उसे एकमात्र मार्ग बताना उचित नहीं है। जो अभ्यास अतीत में बढ़ती चेतना के लिए पर्याप्त था, वह आज अपर्याप्त हो सकता है। इसलिए, जैसा कि वेद कहता है, “यत् सनोः सनुम् अरुहत्”, हमें निरंतर उच्चतर स्तर तक पहुंचने के लिए आवश्यक प्रयास करने होंगे।

संस्कृत भाषा के कौन से पहलू आध्यात्मिक उत्थान में सहायक होते हैं?

इसकी ध्वनियों की शुद्धता और भाषा में निहित मंत्रिक शक्ति अत्यंत उत्थानकारी है। यह तुरंत किसी उच्चतर सत्ता से जुड़ती है और शुद्धता, शांति और स्थिरता का भाव उत्पन्न करती है, तथा व्यक्ति को एकता और सन्त्व की अवस्था तक ले जाती है। यह भाषा के दृष्टिकोण से है। इसके अतिरिक्त, इस भाषा के माध्यम से व्यक्त किए गए विचार, इसका सचेतन उपयोग करने वाले की चेतना को और अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने और विस्तृत करने में सक्षम हैं। वेदों, उपनिषदों और संस्कृत के अन्य पवित्र ग्रंथों में दर्ज ऋषियों और संतों की अनुभूतियों में, सही ढंग से समझने पर, सत्य से जुड़ने की अपार शक्ति होती है।

संस्कृत का मूल स्वरूप ही दर्शाता है कि इसे आरंभ से ही मंत्र-प्रधान भाषा के रूप में रचा गया है। यह एक ऐसी भाषा है जो लगभग त्रुटिहीन है। जो भी इसके संपर्क में आता है, वह इसकी ध्वनियों में एक अलौकिक शक्ति का अनुभव करता है। इस भाषा की संगीतमयता और लयबद्ध सुंदरता, इसकी अभिव्यक्ति की शक्ति, इसकी ध्वनियों की शुद्धता और कंपन, इसकी ध्वनियों और इंद्रियों के बीच शाश्वत संबंध, इन सभी गुणों ने संस्कृत को एक अद्भुत भाषा बना दिया है, जो मंत्र के समान उत्थान, प्रकाश, ज्ञान और रूपांतरण की शक्ति रखती है। प्राचीन काल में भारत के ऋषि-मुनियों ने इसका उपयोग स्वयं के और अपने आस-पास के सभी पहलुओं के वास्तविक स्वरूप को जानने के साधन के रूप में किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत हमें जीवन के उद्देश्य की याद दिलाती है और उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रदान करती है।

जीवन में किसी पारंपरिक गुरु से योग सीखने का क्या महत्व है?

गुरु वह होता है जो अपने पास आने वाले सभी लोगों का बोझ उठाने की शक्ति रखता है। वह जानता है कि एक साधक को क्या चाहिए। वह जानता है कि साधक को उच्चतम अवस्था तक कैसे पहुँचाया जा सकता है। इसलिए यदि किसी को ऐसा गुरु मिल जाए जिससे वह अपने विकास के लिए मार्गदर्शन प्राप्त कर सके, तो इससे बहुत लाभ होता है। परम गुरु तो अपने भीतर का दिव्य स्वरूप है।

आज गैर-भारतीयों के बीच संस्कृत की मुख्य मांग क्या है?

गैर-भारतीयों की संस्कृत में विभिन्न उद्देश्यों से गहरी रुचि है। इनमें से कुछ ही वास्तव में सनातन धर्म से प्रेरित होकर और भारत के प्रति प्रेम के कारण रुचि रखते हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिनकी रुचि संस्कृत या भारत के प्रति प्रेम के कारण नहीं है। उनका इस भाषा को सीखने का एकमात्र उद्देश्य इसे तोड़-मरोड़ कर पेश करना और पूरी दुनिया को यह दिखाना है कि यह एक विभाजनकारी, दमनकारी और बेकार भाषा है। हमें केवल इस तथ्य से प्रभावित नहीं होना चाहिए कि गैर-भारतीयों में संस्कृत की मांग है।

क्या संस्कृत सीखने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर कोई अध्ययन किया जा रहा है?

संस्कृत सीखने और मंत्रों का जाप करने के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर कुछ अध्ययन हुए हैं। लेकिन संस्कृत का वास्तविक प्रभाव इन अध्ययनों से प्राप्त परिणामों से कहीं अधिक व्यापक है। ऐसे किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन का दायरा अक्सर सीमित ही होता है। इसलिए, प्रेरणा के लिए किसी वैज्ञानिक अध्ययन की तलाश करने के बजाय, संस्कृत की सुंदरता, आकर्षण, पवित्रता और शक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिए।

योग का अध्ययन करने के लिए आप योग अभ्यासकर्ताओं को संस्कृत में कौन से ग्रंथ पढ़ने की सलाह देते हैं?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप योग की किस प्रणाली का अनुसरण करते हैं। योग की प्रत्येक प्रणाली के अपने ग्रंथ हैं और उस प्रणाली को गहराई से समझने के लिए उन ग्रंथों का गहन अध्ययन आवश्यक है। मैं व्यक्तिगत रूप से वेदों और उपनिषदों के ऋषियों और संतों के दृष्टिकोण से गहन परिचय का सुझाव दूंगा ताकि योग को समग्र रूप से व्यापक रूप से समझा जा सके। योग क्या है और आंतरिक विकास के लिए क्या अभ्यास करना चाहिए, इसे समझने के लिए गीता के उचित अध्ययन से शुरुआत की जा सकती है। यह वास्तव में स्वयं योगेश्वर द्वारा दिया गया ग्रंथ है और बाद की योग प्रणालियों की नींव है। यह एक ऐसा ग्रंथ है जो अपनी प्रस्तुति में सरल और अत्यंत व्यावहारिक है।

क्या आप श्री अरबिंदो के जीवन से संबंधित योग से जुड़े ऐसे किस्से साझा कर सकते हैं जिनसे आपको प्रेरणा मिली हो?

मुझे शुरुआत में जिस बात से प्रेरणा मिली, वह यह थी कि एक बार किसी ने श्री अरबिंदो से पूछा, “क्या आप भगवान हैं?” उनका जवाब था, “हां, मैं भगवान हूं, आप भी भगवान हैं। आपको यह जानना चाहिए और उसी के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।”

सनातन धर्म का यही मूल सत्य है। इसका संदेश यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक वस्तु दिव्य है। और योग का गहरा अर्थ है एकत्व और समरूपता की अवस्था में स्थिर रहना, जहाँ यह या वह, मेरा या तुम्हारा कुछ नहीं होता, बल्कि सब कुछ दिव्य है, वह एक, अविभाज्य। अतः, पूर्ण निष्ठा और गहनता से इस बात को अपने मन में धारण करना कि सब कुछ दिव्य है, एकत्व और समत्व की इस अवस्था को प्राप्त करने की कुंजी है।

मेरे मन और हृदय पर अमिट छाप छोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कहानी उनकी कैद की कहानी है। कैद में ही उन्हें सर्वं वासुदेवमयं जगत का दर्शन हुआ था । यहीं श्री कृष्ण ने उनके हाथ में गीता रखी थी। श्री अरबिंदो के उत्तरापारा भाषण में उनके स्वयं के शब्दों में:

फिर उन्होंने गीता मेरे हाथों में रख दी। उनकी शक्ति मुझमें समा गई और मैं गीता की साधना करने में सक्षम हो गया। मुझे न केवल बौद्धिक रूप से समझना था, बल्कि यह भी जानना था कि श्री कृष्ण अर्जुन से क्या अपेक्षा रखते हैं और जो उनके कार्य को करने की इच्छा रखते हैं, उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं – घृणा और इच्छा से मुक्त होना, फल की अपेक्षा किए बिना उनके लिए कार्य करना, स्वार्थ का त्याग करना और उनके हाथों में एक निष्क्रिय और वफादार साधन बनना, ऊँच-नीच, मित्र-शत्रु, सफलता-असफलता के प्रति समान भाव रखना, फिर भी उनके कार्य में लापरवाही न करना।

यहीं पर वे फिर कहते हैं: “अन्य धर्म मुख्यतः आस्था और प्रतिज्ञा के धर्म हैं, परन्तु सनातन धर्म स्वयं जीवन है; यह ऐसी चीज है जिस पर विश्वास करने से कहीं अधिक उसे जीने की आवश्यकता है।”

मैं श्री अरबिंदो के निम्नलिखित उद्धरण के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा, जो मुझे और भी प्रेरित करता है:

“मैं विज्ञान, धर्म, थियोसोफी नहीं, बल्कि वेद की खोज करता हूँ—ब्रह्म के सत्य की, न केवल उनके सार तत्व की, बल्कि उनकी अभिव्यक्ति की, जंगल के रास्ते में रोशनी देने वाले दीपक की नहीं, बल्कि संसार में आनंद और कर्म के लिए प्रकाश और मार्गदर्शक की, उस सत्य की जो मत से परे है, उस ज्ञान की जिसकी खोज समस्त चिंतन करता है— yasmin vijéate sarvam vijéatam । मेरा मानना है कि वेद सनातन धर्म की नींव है; मेरा मानना है कि यह हिंदू धर्म के भीतर छिपी हुई दिव्यता है—पर एक पर्दा हटाना होगा, एक परदा उठाना होगा। मेरा मानना है कि यह जानने योग्य और खोजने योग्य है। मेरा मानना है कि भारत और विश्व का भविष्य इसकी खोज और इसके अनुप्रयोग पर निर्भर करता है, जीवन के त्याग पर नहीं, बल्कि संसार में और मनुष्यों के बीच जीवन जीने पर।”—श्री अरबिंदो।

अपर्णा श्रीधर
अपर्णा एम श्रीधर एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, सेंटर फॉर सॉफ्ट पावर (www.centerforsoftpower.org) की संपादक हैं और इंडिक टुडे में कला मामलों की सलाहकार संपादक हैं।साभार- https://www.indicayoga.com/ से 

हिंदू घृणा में चूर मृणाल पांडे ने की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश

कॉन्ग्रेसी पत्रकार मृणाल पांडे ने महाभारत की ‘द्रौपदी’ पर गलत तथ्य प्रस्तुत कर उनकी छवि को बिगाड़ा। इसके बाद जब संस्कृत विद्वान ने उनके तथ्यों को सही किया, तो माफी माँगने की बजाए विद्वान को ही ब्लॉक कर दिया। यह वामपंथी इकोसिस्टम का तय पैटर्न है।

कॉन्ग्रेसी नेशनल हेराल्ड की पत्रकार मृणाल पांडे की हिंदू घृणा छिपाए नहीं छिपती, वह बार-बार सामने आ ही जाती है। ताजा मामले में उन्होंने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करते हुए महाभारत की ‘द्रौपदी’ की छवि बिगाड़ने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर जैसे ही उनकी टिप्पणी वायरल हुई, लोगों ने उनके दावे पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और पुराणों व महाभारत के संदर्भों के साथ तथ्य सामने रखे।

लेकिन जैसे ही मृणाल पांडे एक्सपोज होने लगी, तो उन्होंने सवाल पूछने वालों को ही ब्लॉक करना शुरू कर दिया। यह वही वामपंथी सोच है जिसमें पहले एकतरफा नैरेटिव गढ़ा जाता है, फिर जब सच सामने आता है तो असहमति की आवाज दबाने की कोशिश की जाती है।

पहले मृणाल पांडे ने रश्मिका के संदर्भ में ‘द्रौपदी’ पर कसा तंज

दरअसल, साउथ एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना और एक्टर विजय देवरकोंडा की शादी की फोटो पर एक यूजर ने लिखा था कि यह जोड़ी ‘महाभारत के द्रौपदी और अर्जुन’ जैसी वाइब्स दे रहा है। इसी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए मृणाल पांडे ने एक तरफ से महाभारत की सभी स्त्रियों को निशाना बनाते हुए कहा, “उम्मीद है कि दुल्हन की किस्मत द्रौपदी, कुंती, गांधारी, तारा, मंदोदरी, अहिल्या से बहुत अलग होगी।”

मृणाल की बात का जवाब देते हुए ‘एक्स’ यूजर नमिता बाल्यान ने महाभारत की इन सभी स्त्रियों के प्रभावशाली व्यक्तित्व की जानकारी दी। नमिता ने कहा, “द्रौपदी, कुंती, गाँधारी, तारा, मंदोदरी और अहिल्या सभी बेहद शक्तिशाली, साहसी, धैर्यवान और अपने समय की बहुत महत्वपूर्ण महिलाएँ थीं। उनका योगदान सिर्फ उनके विवाह या वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी मजबूती और समझदारी का परिचय दिया।”

मृणाल को जवाब देते हुए नमिता कहती हैं, “ऐसी महान महिलाओं को केवल उनकी ‘शादी’ के आधार पर आँकना न सिर्फ अधूरी जानकारी दिखाता है, बल्कि उनकी भूमिका को छोटा करने जैसा है। यह सोच खुद में पिछड़ी हुई है, जबकि पोस्ट करने वाला व्यक्ति खुद को प्रगतिशील बताने की कोशिश कर रहा था।”

अहंकारी मृणाल ने द्रौपदी को गलत रूप में किया पेश

मृणाल पांडे का अहंकार ‘द्रौपदी’ का नाम गलत संदर्भ में पेश करने तक भी शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने गलत धारणाएँ बनाकर महाभारत और द्रौपदी की छवि को तोड़-मरोड़कर पेश करना शुरू कर दिया है। मृणाल ने द्रौपदी को ‘चिदग्निकुंड सम भूता’ कहा, यानी उनके अनुसार ‘द्रौपदी’ भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं।

नमिता के कमेंट पर जवाब देते हुए मृणाल लिखती हैं, “इसने उनके कीमती और युवा वर्षों को जरूर प्रभावित किया होगा। इतना बड़ा आघात मन पर गहरी छाप छोड़ गया होगा। उदाहरण के तौर पर द्रौपदी को चिदग्निकुंड सम भूता कहा गया है, यानी वह भीतर की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न हुई थीं। इसका मतलब है कि उनके व्यक्तित्व में अंदर की आग, आक्रोश और आत्मसम्मान की तीव्र शक्ति दिखाई देती है।”

मृणाल की गलत धारणाओं का सामने आया सच

मृणाल पांडे की महाभारत और द्रौपदी को लेकर तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों पर जब हिंदू संस्कृत स्कॉलर नित्यानंद मिश्रा ने सच्चाई सामने रखी तो यह उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने विस्तार से बताया कि द्रौपदी के बारे में जो दावा किा गया, वह न तो महाभारत के मूल पाठ में मिलता है और न ही उसके प्रामाणिक संस्करणों में।

मिश्रा ने साफ कहा कि महाभारत के क्रिटिकल एडिशन में कहीं भी द्रौपदी को ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ नहीं कहा गया है। यह शब्द महाभारत का नहीं है। उन्होंने समझाया कि ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ शब्द दरअसल ‘देवी ललिता’ के लिए आता है, जिसका उल्लेख ललिता सहस्ननाम में मिलता है और जिसे ब्राह्माण्ड पुराण से जोड़ा जाता है। यानी जिस शब्द को द्रौपदी से जोड़कर पेश किया गया, उसका महाभारत से कोई संबंध ही नहीं है।

नित्यानमंद मिश्रा ने यह भी बताया कि इस शब्द का अर्थ भी गलत बताया गया। चित या चिद का अर्थ ‘चेतना’ होता है, न कि भीतर का क्रोध। ‘चिदग्निकुण्डसम्भूता’ का सही अर्थ है चेतना की अग्नि की वेदी से उत्पन्न। इसे भीतर की प्रचंड आक्रोश की आग से जन्मी बताया संस्कृत के मूल अर्थ को बदल देना है।

उन्होंने विद्वानों के अनुवाद और पारंपरिक व्याख्याओं को हवाला देते हुए कहा कि संस्कृत ग्रंथों के शब्दों का अर्थ संदर्भ और परंपरा के आदार पर समझना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।

यह सच सामने आने के बाद मृणाल पांडे का हिंदुओं और उनके इतिहास को गलत तरीके से पेश करने वाला नैरेटिव नही ढहता नजर आया। इसके बाद अपनी टिप्पणी को सुधारने, माफी माँगने या पोस्ट डिलीट करने के बजाए उन्होंने नित्यानंद मिश्रा को ही ब्लॉक कर दिया।

कंगना से कफील खान तक: मृणाल पांडे की हिंदू-घृणा की लिस्ट

ये वही मृणाल पांडे हैं, जो एक महिला के चुनावी मैदान में उतरने पर गाली देती हैं। जब कंगना रनौत को बीजेपी ने मंडी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया, तो यही पांडे ने ‘मंडी में सही रेट मिलता है?’ जैसा आपत्तिजनक इशारा कर दिया। खुद को नारीवादी बताने वाली पांडे का नारीवाद बीजेपी को निशाना बनाने के सामने गिर गया और उन्होंने महिला को निशाना बनाना चुना, जो बीजेपी का चेहरा है।

दूसरी तरफ जब गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज कांड के आरोपित रहे कफील खान जेल से बाहर आए, तो मृणाल पांडे की खुशी छिपाए नहीं छिपी। उन्होंने खान की तुलना भगवान श्रीकृष्ण से कर डाली। जिस मामले में मासूम बच्चों की मौत हुई, उसमें आरोपी रहे व्यक्ति को भगवान से जोड़ना लोगों को बेहद आपत्तिजनक लगा। तब भी पांडे नहीं हिचकिचाई।

उनकी हिंदू-घृणा यहीं खत्म नहीं होती। कोलकाता पोर्ट का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखे जाने के बाद भी पांडे ने जहर उगला था। पांडे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम ‘बंदर‘ से जोड़ा। इतना ही नहीं एक बार महाकाल के दर्शन करने वाले सिख नेता का मजाक उड़ाते हुए पांडे ने कहा कि स्वर्ण मंदिर कब जाओगे?

झूठ फैलाओ, सवाल उठे तो ब्लॉक करो: वामपंथियों का तय पैटर्न

मृणाल पांडे का ताजा मामला केवल एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि उस सोच की झलक है जो लंबे समय से वामपंथी इकोसिस्टम में देखने को मिलती रही है। पहले आधी अधूरी जानकारी के आधार पर नैरेटिव बनाया जाता है, हिंदू धर्म और परंपराओं पर सवाल खड़े किए जाते हैं और उसे प्रगतिशील बहस का नाम दिया जाता है। लेकिन जैसे ही कोई तथ्य और ग्रंथों के संदर्भ के साथ जवाब देता है, वही लोग असहज हो जाते हैं। बहस करने का दावा करने वाले अचानक संवाद से पीछे हटते नजर आते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में भी यही देखने को मिला। जब तक उनकी बात पर सवाल नहीं उठे, तब तक सोशल मीडिया पर बयान जारी रहे। लेकिन जैसे ही संस्कृत विद्वानों और आम लोगों ने प्रमाणों के साथ गलतियाँ बताई, जवाब देने के बजाए ब्लॉक करने का रास्ता चुना गया। यह वामपंथी विमर्श का पुराना तरीका है। पहले आरोप लगाओ, फिर विरोध होने पर खुद को पीड़ित दिखाओ और आखिर में असहमति की आवाज ही बंद कर दो।

यही वजह है कि इसे प्रतिशोध की राजनीति कहा जाता है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं तो बहस भी खत्म कर दी जाती है और सामने को ही गायब कर दिया जाता है। गलत सूचना फैलाने के लिए कोई माफी नहीं, कोई पछतावा नहीं। मृणाल पांडे का मामला भी उसी पैटर्न की एक और मिसाल बन गया, जहाँ सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल पूछने वालों को ब्लॉक कर दिया गया। यह दिखाता है कि झूठ फैलाने वाले वामपंथी, असलियत सामने आते ही कितनी आसानी से पीछे हट जाते हैं।

साभार- https://hindi.opindia.com/ से

आधुनिक संदर्भों पिता-पुत्र संस्कृति को नया आयाम दे

राष्ट्रीय पुत्र दिवस: 4 मार्च, 2026

राष्ट्रीय पुत्र दिवस, जो प्रतिवर्ष 4 मार्च को मनाया जाता है, केवल एक पिता-पुत्र संस्कृति को जीवंतता देने का ही उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा को स्पर्श करने वाला अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि पुत्र केवल परिवार की वंश परंपरा का वाहक नहीं, बल्कि संस्कारों, उत्तरदायित्वों और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतिनिधि है। आधुनिक समय में जब संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं, पीढ़ियों के बीच संवाद कम हो रहा है और विशेष रूप से पिता और पुत्र के बीच मानसिक दूरी बढ़ती जा रही है, तब यह दिवस एक गहन आत्ममंथन का अवसर बन जाता है। भारतीय चिंतन में पुत्र का अर्थ केवल जन्म से जुड़ा नहीं है। शास्त्रों में कहा गया है-“पुंनाम्नो नरकाद् यः त्रायते सः पुत्रः” अर्थात जो कुल और संस्कृति को पतन से बचाए वही सच्चा पुत्र है। इस परिभाषा में पुत्र को एक उत्तरदायी व्यक्तित्व के रूप में देखा गया है, जो अपने आचरण से परिवार की मर्यादा और मूल्यों की रक्षा करता है।

हमारे इतिहास और पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने पुत्र धर्म को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित किया। भगवान श्रीराम का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। जब राजा दशरथ ने परिस्थितिवश उन्हें चौदह वर्ष का वनवास दिया, तब श्रीराम ने बिना किसी विरोध, बिना किसी आक्रोश के पिता की आज्ञा को धर्म मानकर स्वीकार किया। यह केवल आज्ञापालन नहीं था, बल्कि परिवार और वचन की मर्यादा को सर्वोपरि रखने का संदेश था। श्रीराम ने यह सिद्ध किया कि अधिकारों से पहले कर्तव्य आते हैं और व्यक्तिगत सुख से ऊपर परिवार की प्रतिष्ठा होती है। आज का युग अधिकारों की चर्चा करता है, परंतु कर्तव्यों का स्मरण कम होता है। यही कारण है कि पिता-पुत्र संबंधों में संवाद का अभाव दिखाई देता है। पिता अक्सर अपने उत्तरदायित्वों की दौड़ में व्यस्त है और पुत्र प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के दबाव में उलझा हुआ है। दोनों के बीच भावनाओं का पुल कमजोर होता जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय पुत्र दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम इस दूरी को कम करें। पुत्र को केवल आर्थिक साधन या भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए, उसे चाहिए समय, स्नेह और समझ। जब पिता अपने पुत्र के साथ बैठकर उसके सपनों, उसके डर, उसकी असफलताओं और उसकी आकांक्षाओं पर खुलकर बात करता है, तब संबंधों में विश्वास का संचार होता है। यही विश्वास भविष्य की मजबूत नींव बनता है।

आधुनिक संदर्भ में पुत्र के सामने चुनौतियाँ भी नई हैं। करियर की अनिश्चितता, सोशल मीडिया का प्रभाव, मानसिक तनाव और मूल्य भ्रम उसे अक्सर द्वंद्व में डाल देते हैं। समाज ने लड़कों से अपेक्षा की है कि वे कठोर बनें, अपनी भावनाएँ न प्रकट करें, हर परिस्थिति में मजबूत दिखें। परिणामस्वरूप कई बार वे भीतर से अकेले और दबावग्रस्त हो जाते हैं। राष्ट्रीय पुत्र दिवस इस मानसिक स्वास्थ्य के विषय को भी छूता है। यह माता-पिता को प्रेरित करता है कि वे अपने पुत्र से पूछें-“तुम सच में कैसा महसूस कर रहे हो?” यह एक साधारण प्रश्न नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की शुरुआत है। जब पुत्र को यह अनुभव होता है कि वह सुना जा रहा है, समझा जा रहा है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। भारतीय संस्कृति में पिता केवल अनुशासन का प्रतीक नहीं, बल्कि आदर्श का आधार रहा है। पुत्र वही सीखता है जो वह अपने पिता के आचरण में देखता है। यदि पिता सत्यनिष्ठ है, तो पुत्र में भी सत्य के प्रति सम्मान विकसित होगा। यदि पिता संयमी और धैर्यवान है, तो पुत्र भी वही गुण आत्मसात करेगा। इसलिए पिता की भूमिका केवल निर्देश देने की नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने की है। श्रीराम ने केवल दशरथ की आज्ञा का पालन नहीं किया, बल्कि रघुकुल की उस परंपरा को जीवित रखा जिसमें वचन और मर्यादा सर्वोपरि मानी जाती थी। यह परंपरा केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता है।

भारतीय लोक-स्मृति में श्रवण कुमार पुत्र धर्म के सर्वाेच्च प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने अपने नेत्रहीन माता-पिता को कंधों पर बिठाकर तीर्थयात्रा कराते हुए यह सिद्ध किया कि सेवा केवल कर्तव्य नहीं, प्रेम का उत्कर्ष है। आधुनिक युग में यद्यपि परिस्थितियाँ बदल गई हैं, जीवन की गति तेज हो गई है और करियर की चुनौतियाँ अधिक जटिल हो गई हैं, फिर भी श्रवण का आदर्श अप्रासंगिक नहीं हुआ; बल्कि वह और अधिक आवश्यक हो गया है। आज के पुत्र का दायित्व है कि वह माता-पिता के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे, उनसे संवाद बनाए रखे और उनकी आवश्यकताओं को समझे। सेवा का अर्थ अब केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि समय देना, उनकी बात सुनना, उनके एकाकीपन को समझना और उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना है। भौतिक आकांक्षाओं की अंधी दौड़ में यदि माता-पिता उपेक्षित हो जाएँ, तो सफलता खोखली हो जाती है। त्याग का अर्थ यह नहीं कि करियर छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि प्राथमिकताओं में परिवार को स्थान दिया जाए-व्यस्त दिनचर्या में भी नियमित संवाद, स्वास्थ्य का ध्यान, आवश्यक सहयोग और निर्णयों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। आधुनिक पुत्र अपने पेशेवर जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भी पारिवारिक जिम्मेदारियों का संतुलित निर्वाह कर सकता है, यदि वह अपने भीतर यह भाव जागृत रखे कि माता-पिता उसके अस्तित्व की जड़ हैं। जब करियर और कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित होता है, तब श्रवण की सेवा-भावना आधुनिक जीवन में जीवंत हो उठती है और पुत्र धर्म केवल कथा नहीं, व्यवहार बन जाता है।

पुत्र की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आधुनिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि वह परिवार से विमुख हो जाए। सच्ची स्वतंत्रता वही है जिसमें व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और अपने मूल्यों का सम्मान करे। पुत्र यदि अपने करियर में सफल होता है परंतु परिवार से दूर हो जाता है, तो वह सफलता अधूरी रह जाती है। परिवार की शक्ति केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि भावनात्मक एकता में है। जब पुत्र अपने माता-पिता के त्याग और संघर्ष को समझता है, उनका सम्मान करता है और वृद्धावस्था में उनका सहारा बनता है, तब वह पुत्र धर्म का वास्तविक निर्वाह करता है। पुत्र केवल परिवार की आशा नहीं, राष्ट्र की संभावना भी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने अपने कर्तव्यों को पहचाना, तब-तब समाज में परिवर्तन आया। आज आवश्यकता है कि पुत्र संस्कृति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा जाए। एक संस्कारवान पुत्र ही आदर्श नागरिक बन सकता है। यदि परिवार में सत्य, सेवा और संयम के मूल्य विकसित होंगे, तो वही मूल्य समाज में भी प्रसारित होंगे। इस प्रकार पुत्र का निर्माण केवल निजी विषय नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।

आज जब वैश्वीकरण और भौतिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन आवश्यक है। पुत्र को आधुनिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता और वैश्विक दृष्टि मिलनी चाहिए, परंतु उसके भीतर भारतीयता की जड़ें भी गहरी हों। यदि वह विज्ञान में आगे बढ़े परंतु संस्कृति से कट जाए, तो विकास अधूरा रहेगा। यदि वह परंपरा में बंधा रहे और नवीनता को अस्वीकार करे, तो प्रगति रुक जाएगी। इसलिए संतुलन ही समाधान है। यही संतुलन पुत्र संस्कृति को नया आयाम दे सकता है। राष्ट्रीय पुत्र दिवस को संवाद और संकल्प का दिवस बनाएं। जब पिता का अनुभव और पुत्र का उत्साह मिलते हैं, तब परिवार सशक्त होता है। सशक्त परिवार ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है। हम अपने पुत्रों को केवल सफल नहीं, सार्थक बनाएं। उन्हें केवल ऊँचाई न दें, गहराई भी दें, केवल स्वतंत्रता न दें, उत्तरदायित्व भी दें, केवल संसाधन न दें, संस्कार भी दें। यदि हम श्रीराम की मर्यादा, श्रवण की सेवा भावना और आधुनिक युग की वैज्ञानिक दृष्टि को एक सूत्र में पिरो दें, तो ऐसा पुत्र तैयार होगा जो परंपरा का रक्षक और भविष्य का निर्माता दोनों होगा। यही पुत्र संस्कृति का नवोदय है, यही भारतीय परिवार व्यवस्था की शक्ति है और यही राष्ट्रीय पुत्र दिवस का सच्चा संदेश है।

(ललित गर्ग)


लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

ब्रिटिश महिला यात्री औॅर लेखिका फेनी पार्क्स की यात्रा-डायरी, 19 वीं सदी के भारत का एक जीवंत दस्तावेज है

फेनी पार्क्स की यात्रा-डायरी 19वीं सदी के भारत को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें भारतीय समाज की विविधता, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपराएँ, शाही जीवन और प्राकृतिक सौंदर्य का जीवंत चित्रण मिलता है। साथ ही उनकी टिप्पणियाँ यह भी दर्शाती हैं कि उस समय के यूरोपीय यात्रियों की दृष्टि से भारत को कैसे देखा और समझा गया। इस प्रकार फेनी पार्क्स का लेखन केवल यात्रा-वृत्तांत ही नहीं बल्कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

Fanny Parkes (1794–1875) एक ब्रिटिश महिला यात्री और लेखिका थीं, जिन्होंने लगभग 1822 से 1846 तक भारत में रहकर यहाँ के समाज, संस्कृति, धर्म और प्रकृति को बहुत करीब से देखा। उन्होंने अपने अनुभवों को विस्तृत रूप से अपनी यात्रा-डायरी में लिखा, जो बाद में पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुईं। उनके लेखन का एक चर्चित संदर्भ Begums, Thugs and White Mughals जैसे संकलनों में भी मिलता है।

फेनी पार्क्स का लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें 19वीं सदी के भारत का प्रत्यक्ष चित्रण मिलता है। उन्होंने भारत की कई परंपराओं और सांस्कृतिक पहलुओं की प्रशंसा की, लेकिन कुछ सामाजिक परिस्थितियों की आलोचना भी की।

भारत पहुँचने के बाद फेनी पार्क्स को यहाँ की सांस्कृतिक विविधता ने सबसे अधिक प्रभावित किया। उन्होंने देखा कि हर प्रदेश की भाषा, पहनावा और परंपराएँ अलग हैं। उनके अनुसार भारत वास्तव में “आश्चर्यों की भूमि” है जहाँ हर क्षेत्र में नई संस्कृति देखने को मिलती है।

उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में कई प्रमुख शहरों का वर्णन किया—जैसे Kolkata, Kanpur, Lucknow, Varanasi और Agra। इन स्थानों पर उन्होंने भारतीय समाज के अलग-अलग रूपों को देखा और उनका विस्तार से वर्णन किया।

फेनी पार्क्स भारतीय त्योहारों की रंगीनता और उत्साह से बहुत प्रभावित थीं। उन्होंने विशेष रूप से Holi और Diwali का वर्णन किया। उनके अनुसार इन त्योहारों में पूरा समाज मिलकर आनंद मनाता है। रंगों, संगीत और दीपों से सजी हुई गलियों का दृश्य उन्हें अत्यंत आकर्षक लगा।

भारत की धार्मिक आस्था का सबसे प्रभावशाली उदाहरण उन्हें गंगा के किनारे देखने को मिला। उन्होंने लिखा कि हजारों लोग प्रतिदिन गंगा में स्नान करते हैं और इसे पवित्र मानते हैं। घाटों पर होने वाली पूजा और आरती ने उन्हें भारत की गहरी आध्यात्मिक परंपरा का अनुभव कराया।

भारत में रहते हुए फेनी पार्क्स को कई शाही दरबार देखने का अवसर मिला। विशेष रूप से लखनऊ के नवाबी दरबारों का वर्णन उन्होंने बड़े उत्साह से किया। उन्होंने लिखा कि महलों की सजावट, दरबार की शान और वहाँ होने वाले संगीत तथा नृत्य कार्यक्रम अत्यंत भव्य थे। इन दरबारों में कला और साहित्य को विशेष महत्व दिया जाता था।
महलों के अंदर रहने वाली बेगमों के जीवन और पर्दा प्रथा के बारे में भी उन्होंने अपने अनुभव लिखे।

भारत की यात्राओं में फेनी पार्क्स ने कई अनोखे अनुभव किए। उन्होंने हाथी और ऊँट की सवारी की, जंगलों की यात्रा की और भारतीय प्रकृति की विविधता को करीब से देखा। उन्होंने लिखा कि भारत के जंगल, नदियाँ और वन्य जीव अत्यंत सुंदर और अद्भुत हैं। हाथी, बाघ और अन्य पशुओं का वर्णन उन्होंने अपनी डायरी में उत्साह के साथ किया।

फेनी पार्क्स ने भारतीय विवाह समारोहों को भी बहुत रोचक बताया। उन्होंने लिखा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज का उत्सव होता है। दूल्हे की बारात, रंगीन वस्त्र, संगीत और अग्नि के सामने होने वाले वैदिक मंत्र उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था।

हालाँकि फेनी पार्क्स भारत की संस्कृति से प्रभावित थीं, लेकिन उन्होंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी कीं।उन्होंने कुछ शहरों की स्वच्छता व्यवस्था को यूरोप की तुलना में कम व्यवस्थित बताया। इसके अलावा उन्होंने जाति व्यवस्था, महिलाओं की सीमित सामाजिक स्वतंत्रता और कुछ धार्मिक प्रथाओं को लेकर भी प्रश्न उठाए। उन्होंने यात्राओं के दौरान सुनी घटनाओं के आधार पर उस समय के कुख्यात गिरोह Thuggee का भी उल्लेख किया और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की।

फेनी पार्क्स का लेखन इतिहासकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके यात्रा-वृत्तांत से 19वीं सदी के भारत का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन समझने में मदद मिलती है।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि उनके विचार एक विदेशी यात्री के व्यक्तिगत अनुभव और ब्रिटिश औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। इसलिए उनके लेखन को उस ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए।

फेनी पार्क्स की डायरी भारत के इतिहास का एक रोचक दस्तावेज है। इसमें भारतीय संस्कृति, त्योहार, धार्मिक आस्था, शाही जीवन, प्रकृति और सामाजिक परंपराओं का जीवंत चित्रण मिलता है। साथ ही उनकी टिप्पणियाँ उस समय के ब्रिटिश दृष्टिकोण और भारतीय समाज की परिस्थितियों को समझने में भी सहायक हैं।

19वीं सदी का भारत राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। इस समय अनेक यूरोपीय यात्रियों, अधिकारियों और लेखकों ने भारत के बारे में अपने अनुभव लिखे। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण नाम है Fanny Parkes का। फेनी पार्क्स एक ब्रिटिश महिला यात्री और लेखिका थीं जिन्होंने लगभग 1822 से 1846 तक भारत में रहकर यहाँ के समाज, संस्कृति और जीवन को बहुत करीब से देखा।

उन्होंने अपने अनुभवों को विस्तार से अपनी यात्रा-डायरी में लिखा। उनकी डायरी के आधार पर बाद में कई पुस्तकें और लेख प्रकाशित हुए, जिनमें भारतीय समाज, परंपराओं और जीवन के अनेक पहलुओं का वर्णन मिलता है। उनके अनुभवों को समझने में Begums, Thugs and White Mughals जैसे ग्रंथों में भी संदर्भ मिलता है।

फेनी पार्क्स की यात्रा-वृत्तांत इसलिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि वे 19वीं सदी के भारत का प्रत्यक्ष विवरण प्रस्तुत करते हैं। उनके लेखन में एक ओर भारत की संस्कृति और परंपराओं की प्रशंसा है, तो दूसरी ओर कुछ सामाजिक परिस्थितियों की आलोचना भी दिखाई देती है।

फेनी पार्क्स अपने पति के साथ भारत आई थीं, जो ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में थे। भारत आने के बाद उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएँ कीं और अपने अनुभवों को विस्तार से दर्ज किया।

उनकी यात्राओं में प्रमुख रूप से Kolkata, Kanpur, Lucknow, Varanasi और Agra जैसे शहर शामिल थे।

इन यात्राओं के दौरान उन्होंने भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं—जैसे धार्मिक जीवन, शाही दरबार, ग्रामीण जीवन, व्यापारिक गतिविधियाँ और प्राकृतिक सौंदर्य—का विस्तृत वर्णन किया। उनके लेखन में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का जीवंत चित्रण मिलता है।

फेनी पार्क्स भारत की सांस्कृतिक विविधता से अत्यंत प्रभावित थीं। उन्होंने लिखा कि भारत में प्रत्येक प्रदेश की अपनी भाषा, पहनावा और सामाजिक परंपराएँ हैं। उनके अनुसार भारत वास्तव में “आश्चर्यों की भूमि” है, जहाँ हर क्षेत्र में नई संस्कृति देखने को मिलती है।

भारत के बाजार, हस्तशिल्प, वस्त्र और आभूषणों की विविधता ने भी उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने भारतीय बाजारों को अत्यंत जीवंत और रंगीन बताया। मसालों की सुगंध, रंग-बिरंगे वस्त्र और हस्तनिर्मित वस्तुएँ उनके लिए आकर्षण का केंद्र थीं।

भारतीय धार्मिक जीवन का सबसे प्रभावशाली अनुभव उन्हें गंगा के किनारे देखने को मिला। उन्होंने वाराणसी के घाटों पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और तीर्थयात्रियों की भीड़ का विस्तृत वर्णन किया।

उनके अनुसार गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि भारतीयों की आस्था और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। हजारों लोग प्रतिदिन गंगा में स्नान करते हैं और इसे पवित्र मानते हैं।

इसके अलावा उन्होंने भारतीय त्योहारों का भी उल्लेख किया। विशेष रूप से Holi और Diwali के उत्सव ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। इन त्योहारों में रंग, संगीत और सामूहिक आनंद का वातावरण उन्हें अत्यंत आकर्षक लगा।

भारत में रहते हुए फेनी पार्क्स को कई शाही दरबारों को देखने का अवसर मिला। विशेष रूप से Lucknow के नवाबी दरबारों का वर्णन उन्होंने बड़े उत्साह से किया।
उन्होंने लिखा कि महलों की भव्यता, दरबार की शान और वहाँ होने वाले संगीत तथा नृत्य कार्यक्रम अत्यंत आकर्षक थे। दरबारों में कला, साहित्य और संगीत को विशेष महत्व दिया जाता था। महलों में रहने वाली बेगमों के जीवन, पर्दा प्रथा और शाही परंपराओं का भी उन्होंने अपने लेखन में उल्लेख किया।

भारत की प्राकृतिक सुंदरता ने फेनी पार्क्स को अत्यंत प्रभावित किया। उन्होंने जंगलों, नदियों और पहाड़ियों का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने कई बार हाथी और ऊँट की सवारी की और ग्रामीण क्षेत्रों की यात्राएँ कीं। उनके अनुसार भारत का प्राकृतिक वातावरण अत्यंत विविध और आकर्षक है। उन्होंने वन्य जीवों—जैसे हाथी और बाघ—का भी उल्लेख किया, जो उनके लिए रोमांचक अनुभव था।

हालाँकि फेनी पार्क्स भारत की संस्कृति और परंपराओं से प्रभावित थीं, लेकिन उन्होंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी कीं। उन्होंने कुछ शहरों की स्वच्छता व्यवस्था को यूरोप की तुलना में कम व्यवस्थित बताया। इसके अलावा उन्होंने जाति व्यवस्था, महिलाओं की सीमित सामाजिक स्वतंत्रता और कुछ धार्मिक प्रथाओं पर भी टिप्पणी की।

उन्होंने यात्राओं के दौरान सुनी घटनाओं के आधार पर उस समय के कुख्यात गिरोह ठगी का भी उल्लेख किया और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की।

फेनी पार्क्स के लेखन का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है क्योंकि यह 19वीं सदी के भारत का एक प्रत्यक्ष और विस्तृत चित्र प्रस्तुत करता है। उनके यात्रा-वृत्तांत से उस समय के भारतीय समाज, संस्कृति, धार्मिक जीवन और शाही परंपराओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

हालाँकि इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उनके विचार एक विदेशी यात्री के व्यक्तिगत अनुभवों और उस समय के ब्रिटिश औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। इसलिए उनके लेखन को पढ़ते समय उस ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है।

मारवाड़ी सोसायटी भुवनेश्वर के होली बंधुमिलन की मुख्य आकर्षण रही मरु कोकिला सीमा मिश्रा

भुवनेश्वर। मारवाड़ी सोसायटी भुवनेश्वर ने क्रमशः होलिका दहन तथा होली बंधुमिलन समारोह का सफलतापूर्वक और विराट आयोजन स्थानीय जनता मैदान,जयदेवविहार में किया। सुबह में रंग-गुलाल का कार्यक्रम था जबकि सायंकाल प्रीतिभोज संग रंगारंग कार्यक्रम का।सच कहा जाय तो आयोजन का मुख्य उद्देश्य मारवाड़ी सोसायटी के सभी घटक संगठनों के लोगों के बीच और अधिक मेल-मिलाप को बढ़ावा एकसाथ नाश्ता-पानी और खान-पान के द्वारा किया जाय तथा सभी का भरपूर मनोरंजन हो।होली बंधुमिलन की मुख्य आकर्षण रही मरु कोकिला सीमा मिश्रा। राजस्थानी गीत-संगीत गायिका सीमा मिश्रा ने अपने एकल गायन तथा अपने साथी गायक कलाकार के साथ मिलकर अनेक राजस्थानी होली के गीत गाकर सभी का भरपूर मनोरंजन कर दिया।

उल्लेखनीय है कि चार मार्च से ही हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र महीना शुरु हुआ और मरु कोकिला सीमा मिश्रा ने चैत्र माह की महत्ता को प्रेमी-प्रेमिका,पति-पत्नी के साथ जोड़कर प्रकृति के सानिध्य में आनंदमय जीवन व्यतीत करने का संदेश अपनी गायकी के माध्यम से प्रस्तुत किया। वहीं सीमा मिश्रा टोली की नृत्यांगनाओं ने अपने पांवों की थिरकन तथा अपनी भाव-भंगिमाओं से लोगों को देर रात तक बांधे रखा।सोसायटी के अध्यक्ष संजय लाठ के अनुसार उन्हें इस विराट आयोजन को सफल बनाने में समाज के सभी पदाधिकारियों,सदस्यों तथा सोसायटी के घटक संगठनों का पूर्ण सहयोग मिला।वहीं होली आयोजन कमेटी के चेयरमैन चेतन टेकरीवाल के अनुसार इस आयोजन से समाज के सभी लोगों में आपसी सौहार्द देखने को मिला।सबसे बड़ी बात तो यह रही कि इतने विराट आयोजन में कोई औपचारिकता नहीं रखी गई थी।

कार्यक्रम के अंत में सोसायटी के सभी पदाधिकारियों की उपस्थिति में मरु गायिका सीमा मिश्रा को स्मृतिचिह्न भेंटकर उन्हें सम्मानित किया गया।सबसे बड़ी बात यह देखने को मिली की सभी मेहमानों का विधिवत स्वागत सोसायटी के संरक्षक सुरेश कुमार अग्रवाल ने राजस्थानी पगड़ी,अंगवस्त्र और बैज पहनाकर किया।अवसर पर सुभाष अग्रवाल,महेन्द्र कुमार गुप्ता,सुरेन्द्र डालमिया,अजय अग्रवाल,मनसुख लाल सेठिया,शिवकुमार अग्रवाल,जितेन्द्र मोहन गुप्ता,सीए सुरेन्द्र अग्रवाल,पवन गुप्ता,सज्जन सुरेखा,राजेश अग्रवाल,सुनिल अग्रवाल,रवि गोयल,रामावतार खेमका,सुशील अग्रवाल,सुभाष भुरा,उमेश खण्डेलवाल,गजानंद शर्मा,शिवकुमार शर्मा,सीए विपिन बंका,सीए विमल भूत,राजेश केजरीवाल,विजय टिबरीवाल तथा रमेश अग्रवाल आदि उपस्थित थे।सभी ने आयोजित स्वरुचि प्रीतिभोज में हिस्सा लिया।

गुजरात के माननीय मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल ने ‘कवांट गेर मेला’ पर जारी किया डाक टिकट एवं विशेष आवरण

अहमदाबाद। गुजरात के मुख्यमंत्री माननीय श्री भूपेन्द्रभाई पटेल ने “कवांट गेर मेला” की सांस्कृतिक महत्ता को सम्मानित करते हुए इस पर आधारित कस्टमाइज़्ड डाक टिकट एवं विशेष आवरण 05 मार्च, 2026 को मुख्यमंत्री आवास पर जारी किया। उत्तर गुजरात सह दक्षिण गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस डाक टिकट एवं विशेष आवरण की प्रथम प्रति मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल जी को भेंट की। यह पहल राज्य की समृद्ध जनजातीय परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अवसर पर छोटाउदेपुर, लोकसभा सांसद श्री जशुभाई राठवा, विधायक श्री अभेसिंह तडवी, सुश्री गार्गी जैन, कलेक्टर, प्रवर डाकघर अधीक्षक श्री आर बी ठाकोर सहित राठवा आदिवासी समुदाय के तमाम प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल ने भारतीय डाक विभाग द्वारा ‘कवांट गेर मेला’, छोटाउदेपुर, गुजरात पर आधारित डाक टिकट और विशेष आवरण जारी किये जाने की पहल की सराहना करते हुए कहा कि, यह राज्य की जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को संरक्षण देने और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण प्रयास है। ‘कवांट गेर मेला’ मात्र एक उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य, सामाजिक समरसता और पीढ़ियों से चले आ रहे रीति-रिवाजों की अक्षुण्ण परंपरा का प्रतीक है। यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भारतीय जनजातीय जन-जीवन की उदात्त अभिव्यक्ति है। मुख्यमंत्री ने कहा कि, डाक टिकटों के माध्यम से न केवल संस्कृति का संवर्धन होता है, बल्कि यह युवाओं में सांस्कृतिक जागरूकता भी पैदा करता है। इसके जरिए आदिवासी कला, संगीत और नृत्य की परंपराएँ स्थायित्व पाती हैं और आने वाली पीढ़ियाँ इस समृद्ध विरासत से जुड़ी रहती हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के प्रयास राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने, समाज में सामाजिक समरसता और एकता बढ़ाने, और आदिवासी जीवन शैली एवं कलाओं की प्राचीन परंपराओं को संरक्षित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उत्तर गुजरात सह दक्षिण गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि डाक टिकटों के माध्यम से देश की संस्कृति, कला, विरासत, इतिहास, महान विभूतियों और प्रमुख घटनाओं, ज्ञान-विज्ञान व उपलब्धियों को दर्शाया जाता है, जो संचार के साथ-साथ राष्ट्रीय गौरव और विरासत को बढ़ावा देते हैं। पोस्टमास्टर जनरल ने कहा कि, ‘कवांट गेर मेला’ पर डाक विभाग के सौजन्य से माननीय मुख्यमंत्री द्वारा जारी डाक टिकट और विशेष आवरण इस जनजातीय पर्व की समृद्ध सांस्कृतिक महत्ता को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का माध्यम बनेगा और गुजरात की समृद्ध आदिवासी विरासत को भी समृद्ध करेगा।

छोटा उदेपुर के सांसद श्री जशुभाई राठवा ने कहा कि ‘कवांट गेर मेला’ गुजरात के छोटाउदेपुर जिले के कवांट में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला एक प्रसिद्ध जनजातीय सांस्कृतिक उत्सव है। इस मेले में जनजातीय महिलाएं व पुरुष बड़ी संख्या में एकत्र होकर हर्षोल्लास, श्रद्धा भक्ति और आपसी सद्भाव का अविस्मरणीय दृश्य उपस्थित करते हैं। ऐसे में माननीय मुख्यमंत्री द्वारा डाक टिकट जारी कर इसे एक नई पहचान दी गई है। उन्होंने डाक विभाग का भी इस पहल के लिए आभार व्यक्त किया।

सुश्री गार्गी जैन, कलेक्टर, छोटाउदेपुर ने बताया कि होली पर्व के तुरंत बाद आयोजित किया जाने वाला ‘कवांट गेर मेला’ राठवा आदिवासी समुदाय के रीति-रिवाजों, मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिबिंब है। ढोल-नगाड़ों की लयबद्ध ध्वनि, गेर नृत्य की उर्जावान जनजातीय प्रस्तुतियाँ, पारंपरिक वाद्ययंत्र, रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान और शरीर पर उकेरी गई सुंदर कलाकृतियाँ इस उत्सव की प्रमुख विशेषताएँ हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में जिला प्रशासन द्वारा की गई पहल पर भारतीय डाक विभाग द्वारा इस पर जारी डाक टिकट और विशेष आवरण इसे और भी प्रतिष्ठित बनाते हैं।

श्री अमित शाह ने जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” (महिला) और “विकास” (पुरुष) का औपचारिक अनावरण किया

दो चरणों में होने वाली जनगणना-2027 दुनिया का सबसे बड़ा जनगणना कार्य

पहली बार डिजिटल माध्यम से होगी जनगणना, साथ ही पहली बार स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प

स्व-गणना एक सुरक्षित वेब-आधारित सुविधा के माध्यम से होगी, उत्तरदाता घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व 16 भाषाओं में अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकेंगे

जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” और “विकास” 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की भागीदारी के प्रतीक

देशभर में 30 लाख से अधिक प्रगणक, पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी जनगणना-2027 में शामिल होंगे

नई दिल्ली। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नई दिल्ली में जनगणना-2027 के लिए चार digital tools का सॉफ्ट लॉन्च और शुभंकर- “प्रगति” (महिला) और “विकास” (पुरुष) – का औपचारिक अनावरण किया। देशभर में गणना कार्यों को सुगम बनाने के लिए सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) ने एडवांस डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं। इस अवसर पर केन्द्रीय गृह सचिव और भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

केन्द्र सरकार द्वारा 16 जून, 2025 को राजपत्र में जनगणना-2027 की अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद जनगणना-2027 की प्रक्रिया औपचारिक रूप से प्रारंभ हुई। दो चरणों में होने वाली जनगणना-2027 दुनिया का सबसे बड़ा जनगणना कार्य है। पहली बार जनगणना डिजिटल माध्यम से की जाएगी और साथ ही पहली बार स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प भी दिया जा रहा है।

शुभंकर “प्रगति” और “विकास”
जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” (महिला प्रगणक) और “विकास” (पुरुष प्रगणक) को मैत्रीपूर्ण और सहज प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही “प्रगति” और “विकास” 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की भागीदारी के भी प्रतीक हैं। इन शुभंकरों के माध्यम से जनगणना 2027 से संबंधित जानकारी, उद्देश्य एवं प्रमुख संदेश समाज के विभिन्न वर्गों तक प्रभावी और जन-सुलभ रूप में पहुँचाए जाएंगे।

जनगणना-2027 के डिजिटल टूल्स
जनगणना-2027 भारत की पहली तकनीकी (digital) उपकरणों द्वारा संचालित जनगणना होगी। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह द्वारा सॉफ्ट लॉन्च किए गए चार digital प्लेटफॉर्म हैं:

हाउस लिस्टिंग ब्लॉक क्रिएटर (HLBC) वेब एप्लिकेशन: यह वेब-मैप एप्लिकेशन चार्ज अधिकारियों को उपग्रह चित्रों की सहायता से तकनीकी रूप से मकान सूचीकरण ब्लॉक बनाने में सक्षम बनाता है, जिससे देशभर में भौगोलिक कवरेज का मानकीकरण सुनिश्चित होता है।
HLO मोबाइल एप्लिकेशन: यह एक सुरक्षित ऑफलाइन मोबाइल एप्लिकेशन है, जिसके माध्यम से प्रगणक मकान -सूचीकरण डेटा एकत्र एवं अपलोड कर सकते हैं। केवल CMMS पोर्टल पर पंजीकृत प्रगणक ही इसका उपयोग कर सकते हैं। यह एप्लिकेशन सीधे क्षेत्र से सर्वर तक डेटा प्रेषण की सुविधा प्रदान करता है, जिससे पारंपरिक कागजी कार्य समाप्त हो जाता है। यह एंड्रॉयड एवं iOS प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है तथा 16 भाषाओं में संचालित किया जा सकता है।
स्व-गणना (SE) पोर्टल: पहली बार स्व-गणना का विकल्प प्रदान किया जा रहा है। यह एक सुरक्षित वेब-आधारित सुविधा है, जिसके माध्यम से पात्र उत्तरदाता घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। सफल पंजीकरण के बाद एक विशिष्ट स्व-गणना आईडी (SE ID) जारी की जाएगी। इस स्व-गणना आईडी (SE ID) को प्रगणक के साथ साझा किया जायेगा जिसके आधार पर दर्ज की गयी सूचना की प्रगणक द्वारा पुष्टि की जा सकेगी।
जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली (CMMS) पोर्टल: यह एक केंद्रीकृत वेब-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसके माध्यम से जनगणना से संबंधित गतिविधियों की योजना, प्रबंधन, क्रियान्वयन और निगरानी की जाएगी। राज्य , जिला एवं तहसील स्तर के अधिकारी एकीकृत डैशबोर्ड के माध्यम से वास्तविक समय में प्रगति और कार्य-स्थिति का अवलोकन कर सकेंगे।

जनगणना-2027 में घर – घर जाकर सुरक्षित मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर डेटा एकत्रित किया जाएगा और पूरी कवरेज को सुनिश्चित किया जाएगा। इसके लिए देशभर में 30 लाख से ज़्यादा प्रगणक, पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी जनगणना-2027 में कार्य करेंगे ।

तकनीक को ध्यान में रखकर अपनाते हुए इनोवेशन और सबको साथ लेकर चलने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जनगणना-2027 सही, सुरक्षित और कम्प्रेहेन्सिव हो।

जनगणना-2027 दो चरणों में संपन्न होगी:
प्रथम चरण : गृह-सूचीकरण एवं आवास जनगणना (HLO)

प्रथम चरण के दौरान आवास की स्थिति एवं घरेलू सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी, जबकि द्वितीय चरण में देश के प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित जनसांख्यिकीय, सामाजिक एवं आर्थिक विवरण दर्ज किए जाएंगे।

प्रथम चरण के लिए अधिसूचना 7 जनवरी 2026 को जारी की गई। मकान-सूचीकरण एवं मकान गणना 1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 के बीच, प्रत्येक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की सतत अवधि में संचालित की जाएगी। घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व 15 दिनों की वैकल्पिक स्व-गणना अवधि भी होगी।

द्वितीय चरण: जनसंख्या गणना (PE)
जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में पूरे भारत में की जाएगी। लद्दाख संघ राज्यक्षेत्र तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हिमाच्छादित गैर-समकालिक क्षेत्रों में गणना सितंबर 2026 में संपन्न होगी। जनगणना के द्वितीय चरण में जाति संबंधित प्रश्न भी शामिल किया जाएगा।

जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि सभी राज्यों एवं संघ राज्यक्षेत्रों के लिए 1 मार्च 2027 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) होगी। लद्दाख तथा हिमाच्छादित गैर-समकालिक क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) के लिए संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) होगी।

उपराष्ट्रपति द्वारा तमिल विद्वानों, विरासत और संस्कृति को समर्पित 16 प्रकाशनों का विमोचन

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज उपराष्ट्रपति भवन में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग की ओर से प्रकाशित 16 महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया। ये पुस्तकें तमिल के विख्यात विद्वानों, विरासत, वास्तुकला, साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित हैं। विमोचित पुस्तकों में से 13 तमिल भाषा पर आधारित हैं।

तमिल शीर्षकों में रामेश्वरम्, रामानुजार, नादुकल, अरिकाइमेडु, बक्थी इलक्कियाम, इयारकई वेलनमई, पजंथामिजान इसई करुविगल, तमिझागा नत्तार देवंगल, पुधिया अरिवियाल थोझिलनुतपंगल, बंकिम चंद्र चटर्जी, मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर, तंजावुर पेरुवुदयार कोइल, मणिमेगलाई और महाविद्वान मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई शामिल हैं।

कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि विमोचित पुस्तकें मंदिर परंपराओं, दर्शन, साहित्य, संगीत और विज्ञान के साथ तमिल धरोहर की गहराई, विविधता और सभ्यतागत निरंतरता को दर्शाती हैं। तमिल को विश्व की सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं में से एक बताते हुए उन्होंने इस विषय पर जोर दिया कि भारत अनेक भाषाओं की भूमि है, लेकिन साथ ही साथ उसकी आत्मा एक है। उन्होंने वैश्विक मंच पर तमिल को हमेशा सम्मान देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की और युवाओं से प्रतिदिन कम से कम एक घंटा पढ़ने का आग्रह करते हुए आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक शक्ति पर भी बल दिया।

पुस्तकों के विमोचन के मौके पर अश्विनी वैष्णव ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताया और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त समृद्ध और प्राचीन संस्कृति वाली शास्त्रीय भाषा के तौर पर तमिल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि प्रकाशन विभाग की पुस्तकें इस गौरवशाली विरासत का उत्सव मनाती हैं।

इस कार्यक्रम में डॉ. एल. मुरुगन भी उपस्थित रहे। उन्होंने तमिल संगम साहित्य के महत्त्व के बारे में बात की और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को उजागर किया।

इस कार्यक्रम का एक मुख्य आकर्षण श्री एस. के. बोस की ओर से लिखित बंकिम चंद्र चटर्जी की पुस्तक का अंग्रेजी, हिंदी और तमिल में विमोचन था। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित इस समृद्ध संस्करण में इस प्रख्यात साहित्यकार के जीवन और काल तथा भारतीय साहित्यिक आंदोलन में उनके योगदान का गहन विश्लेषण किया गया है। अंग्रेजी संस्करण में एक नया आवरण, अतिरिक्त अभिलेखीय तस्वीरें और चित्र शामिल हैं। इस आवरण को विशेष रूप से आईआईटी दिल्ली के सहयोग से एक स्टार्टअप की मदद से डिजाइन किया गया है, जिसमें समकालीन सौंदर्यशास्त्र और शास्त्रीय भावना का अद्भुत मिश्रण है। हिंदी और तमिल अनुवादों के एक साथ विमोचन से वंदे मातरम के पूजनीय रचयिता की विरासत व्यापक पाठकों तक पहुंच गई है।

रामेश्वरम्‌ पर आधारित यह पुस्तक पुराणों और साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त दस्तावेजी संदर्भों को प्रस्तुत करती है, जिसमें रामेश्वरम मंदिर परिसर के पवित्र स्थलों, स्थापत्य कला की भव्यता, मूर्तियों और देवी-देवताओं का विशेष वर्णन किया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को मंदिर के इतिहास और आध्यात्मिक महत्व की व्यापक समझ प्रदान करना है।

भारत के वो रोमांचक खेल जो लगभग लुप्त हो चुके हैं

अनादि काल से खेल हर संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं । एक स्थिर सभ्यता के निर्माण में रुचि न रखते हुए, भारत के लोगों ने खेल खेलने के लिए अवकाश का समय निकालना आवश्यक समझा। प्राचीन भारतीय खेलों के प्रमाण दर्शाते हैं कि वे नवीन, मनोरंजक और पूर्ण भागीदारी की मांग करने वाले खेल थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में, लोग तोरण (भाला), धनुष-बाण और चक्र जैसे हथियारों से प्रतिस्पर्धा करते थे। इन बाहरी खेलों के अलावा, हमें हमेशा से ही आंतरिक खेलों का भी शौक रहा है, और हमें यह कैसे पता चला? इतिहासकारों ने गुफाओं और मंदिरों की दीवारों पर खुदे हुए आदिम बोर्ड गेम के निशान पाए हैं और हड़प्पा जैसे स्थलों पर पासे और काउंटर खोजे हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी विभिन्न खेलों के संदर्भ मिलते हैं।

बीते वर्षों में हम अपनी गौरवशाली खेल संस्कृति से दूर होते चले गए हैं, और भले ही हम खेलों के उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, फिर भी कुछ खेल समय के साथ लुप्त हो गए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख खेलों का उल्लेख है जिन्होंने हमारे इतिहास पर अपनी छाप छोड़ी है:

कलारिपयाट्टू

कलारीपयट्टू, जिसे कलारी के नाम से भी जाना जाता है, मार्शल आर्ट का एक प्राचीन रूप है जिसकी जड़ें केरल में हैं। कलारी शब्द विभिन्न हिंदू ग्रंथों में युद्धक्षेत्र और युद्ध क्षेत्र का वर्णन करने के लिए आता है। अपने लंबे इतिहास के कारण, यह मार्शल कलाकारों के लिए एक विशिष्ट स्थान रखता है। परंपरागत रूप से, इस खेल में दो रूप शामिल हैं: उत्तरी शैली या वडक्कन कलारी, और दक्षिणी शैली या थेक्कन कलारी। समय के साथ, एक नए पैटर्न को भी मान्यता मिली है, जिसे प्राथमिक विधि या मध्य कलारी कहा जाता है, जिसका उद्देश्य दोनों शैलियों के तत्वों को जोड़ना है।

कुश्ती

कुश्ती, जिसे पहलवानी भी कहा जाता है, प्राचीन भारत में लड़ी जाने वाली कुश्ती है। इसका विकास मुगल काल में फारसी कुश्ती पहलवानी और भारतीय मल्ल-युद्ध की तकनीकों के संयोजन से हुआ। इस खेल की उत्पत्ति ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी में हुई थी, जहाँ इसे मल्ल-युद्ध के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है युद्ध कुश्ती।

अतिया पात्या

अतिया पाट्या, जिसे अक्सर “चालबाज़ी का खेल” कहा जाता है, दो टीमों के बीच खेला जाता है, जिसमें प्रत्येक टीम में नौ सदस्य होते हैं। यह भारत में, विशेष रूप से महाराष्ट्र में, एक लोकप्रिय खेल है। 1982 में ‘अत्या पाट्या फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के गठन के बाद इसे राष्ट्रीय महत्व प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने 2013 में इस फेडरेशन को मान्यता प्राप्त संगठनों की सूची में शामिल किया।

युबी लकपी

युबी लापकी, जिसका अर्थ है नारियल छीनना, एक व्यक्तिगत संपर्क खेल है जिसमें नारियल की आवश्यकता होती है। यह एक प्राचीन भारतीय खेल है जिसकी उत्पत्ति मणिपुर में हुई थी। यह एक पारंपरिक फुटबॉल खेल है जो रग्बी टूर्नामेंट से काफी मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है।

प्रत्येक खेल से पहले, खिलाड़ी अपने शरीर पर तेल मलते हैं ताकि वह फिसलनदार हो जाए और राजा के सामने तेल में भीगी हुई गेंद रखी जाती है। गोल करने के लिए, खिलाड़ी को गोलपोस्ट के पास जाकर तेल लगे गोल से उसके सामने से रेखा पार करनी होती है।

कंबला

कंबाला कर्नाटक में आयोजित होने वाली एक वार्षिक भैंस दौड़ है, जो नवंबर से मार्च तक चलने वाले कंबाला ऋतु के दौरान होती है। इसकी शुरुआत ग्रामीण जनता के मनोरंजन के लिए एक पारंपरिक खेल के रूप में हुई थी, जिसमें कीचड़ भरे धान के खेतों में भैंसों को चाबुक से दौड़ाया जाता था। भैंसों को रंग-बिरंगे गहनों और पीतल और चांदी के सुंदर मुकुटों से सजाया जाता है।

जल्लीकट्टू

जल्लीकट्टू तमिलनाडु में प्रचलित एक लोककथात्मक बैल-पीछा खेल है, जिसका आयोजन पोंगल के फसल उत्सव के दौरान किया जाता है। यह लगभग दो सहस्राब्दी पुराना खेल है। प्राचीन काल में इसे येरु थझुवुथल के नाम से जाना जाता था। प्रतिभागी एक निश्चित समय तक बैल की पीठ पर कूबड़ को पकड़े रहते हैं और फिर उस पर नियंत्रण पाने के लिए उसके सींगों को पकड़ लेते हैं।

इंसुक्नॉर

इंसुकनाव्र मिजोरम का एक पारंपरिक खेल है जिसमें छड़ी से धक्का देकर खेलाया जाता है। मिजो समुदाय ने खेती के थका देने वाले नियमित जीवन से राहत पाने के लिए कई खेल विकसित किए; यह उनमें से एक था। इस खेल में दो खिलाड़ी होते हैं, जो छड़ी को अपनी बाहों के नीचे पकड़कर अपने प्रतिद्वंद्वी को रिंग से बाहर धकेलने की कोशिश करते हैं।

धोपखेल

धोपखेल का आयोजन असम राज्य के वार्षिक उत्सव रंगोली बिहू के दौरान किया जाता है। इस खेल में दो टीमें होती हैं, जिसमें खिलाड़ी धोप नामक गेंद को इस तरह उछालते हैं कि वह विरोधी टीम के पाले में गिरे। यह आधुनिक थ्रो बॉल से मिलता-जुलता है और कभी-कभी इसकी तुलना कबड्डी से भी की जाती है।

पचीसी

पचीसी, जिसका अर्थ पच्चीस होता है, मध्यकालीन भारत में उत्पन्न हुआ एक क्रॉस और सर्कल का खेल है। इसके लिए एक सममित क्रॉस के आकार का बोर्ड आवश्यक होता है। खिलाड़ी के मोहरे छह या सात कौड़ियों के फेंके जाने के अनुसार बोर्ड पर चलते हैं, और ऊपर की ओर गैप वाली कौड़ियों की संख्या ही आगे बढ़ने वाले खानों की संख्या निर्धारित करती है।

चौपाद

चौपड़ या चौसर भारत में पिछले दो सहस्राब्दियों से मौजूद है। इस खेल में एक क्रॉस के आकार का बोर्ड होता है, जहाँ चार खिलाड़ी दो टीमों में खेलते हैं और प्रत्येक खिलाड़ी के पास चार मोहरे होते हैं। यह पचीसी और आधुनिक लूडो से काफी मिलता-जुलता है।

चतुरंगा

चतुरंग, जिसे आधुनिक शतरंज का पूर्ववर्ती माना जाता है, एक रणनीति का खेल है जिसकी उत्पत्ति भारत में ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में हुई थी। खेल के सटीक नियम अज्ञात हैं, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि यह अपने पूर्ववर्ती शतरंज के समान था। यह 8×8 खानों वाले बिना चेक वाले बॉक्स पर खेला जाता था, जिसमें मोहरे शतरंज के समान होते थे।

अचुग्वी फान सोहलाइमुंग

त्रिपुरा राज्य में दो पुरुषों के बीच उनकी ताकत का परीक्षण करने के लिए आयोजित होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता है। इसे त्रिपुरी भाषा (कोकबोरोक) में थ्वंगमुंग के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन, हाल के वर्षों में, आधुनिक खेल संस्कृति के प्रभाव के कारण लोग ऐसे खेलों को छोड़ रहे हैं।

इनबुआन

इनबुआन कुश्ती का एक अन्य रूप है जिसकी उत्पत्ति 1700 के दशक की शुरुआत में मिजोरम में हुई थी। इसमें सख्त नियम होते हैं जो लात मारने, घेरे से बाहर निकलने या घुटने मोड़ने पर भी रोक लगाते हैं।

बीते वर्षों में, आधुनिक संस्कृति ने हमारी सदियों पुरानी परंपराओं पर अपना प्रभाव जमा लिया है, न केवल खेलों के संदर्भ में, बल्कि हमारी जीवनशैली में भी। आइए एक कदम पीछे हटें और उन खेलों को पुनर्जीवित करें जिन्होंने सदियों से हमारे पूर्वजों का मनोरंजन किया है।

साभार – https://thesportsschool.com/ से 

 

“ईरान–इजरायल युद्ध (२८ फरवरी २०२६) की समाप्ति-तिथि का ज्योतिषिय आकलन

कालचक्र, लग्नगति, ग्रहदृष्टि तथा सर्वतोभद्र सिद्धान्तों पर आधारित शोध”
✓•१. प्रस्तावना:
राजकीय या अन्तर्राष्ट्रीय युद्धों की समाप्ति-तिथि का निर्धारण भारतीय ज्योतिष में अत्यन्त विशिष्ट विषय है। यह केवल सामान्य फलादेश नहीं है, बल्कि इसमें कालगणित, ग्रहगति, लग्नचक्र, नक्षत्र-चक्र तथा सर्वतोभद्र वेध का संयुक्त उपयोग किया जाता है।
वराहमिहिर ने युद्धफल के विषय में स्पष्ट कहा है —
“ग्रहैः सूचितकालस्य युद्धस्य परिणामकः।
लग्नदृष्टिवशादेव कालो निश्चीयते ध्रुवम्॥”
अर्थात् ग्रहस्थिति से युद्ध का प्रारम्भ सूचित होता है, और उसकी अवधि तथा समाप्ति लग्नगति तथा ग्रहदृष्टि से निर्धारित होती है।
∆ निर्दिष्ट युद्धारम्भ-काल —
२८ फरवरी २०२६
भारतीय मान समय — ११:४०
इसी क्षण को युद्धारम्भ कुण्डली मानकर गणितीय निर्धारण किया जा रहा है।
✓•२. युद्धकाल निर्धारण का शास्त्रीय सूत्र:
पाराशरी परम्परा में युद्धकाल निर्धारण के लिए तीन प्रमुख सूत्र दिए गए हैं —
✓•(१) लग्नस्वभाव सिद्धान्त:
लग्न प्रकार युद्ध अवधि
चर अल्पकाल
स्थिर दीर्घकाल
द्विस्वभाव मध्यम
•यदि लग्न चर हो तो युद्ध शीघ्र समाप्त होता है।
✓•(२) ग्रहबल सिद्धान्त:
•युद्ध तब तक चलता है जब तक
•मंगल या शनि का प्रभाव प्रमुख रहता है।
जब
•मंगल का बल घटता है
•चन्द्रमा शुभ ग्रह से युक्त होता है
तब युद्ध समाप्ति की दिशा में जाता है।
✓•(३) नक्षत्र चक्र सिद्धान्त:
युद्ध का परिणाम प्रायः
•९ नक्षत्र चक्र में बदलता है।
•यह सिद्धान्त इस सूत्र से प्राप्त होता है —
९ / १ नक्षत्र = ९ दिन
•अर्थात् युद्ध की दिशा लगभग ९, १८ या २७ दिन में बदलती है।
✓•३. युद्धारम्भ ग्रहस्थितियाँ
∆संलग्न कुण्डली के अनुसार
ग्रह राशि
सूर्य कुम्भ
मंगल कुम्भ
बुध कुम्भ
शुक्र कुम्भ
राहु कुम्भ
गुरु मिथुन
चन्द्र कर्क
शनि मीन
यहाँ अत्यन्त महत्वपूर्ण है —
•कुम्भ में पंचग्रह संयोग
यह अत्यन्त तीव्र युद्धयोग है।
✓•४. युद्ध अवधि का गणितीय सूत्र:
प्राचीन मुहूर्तशास्त्र में युद्ध अवधि निकालने का एक सूत्र दिया गया है —
T = L/V
∆जहाँ
•T = युद्ध अवधि
•L = लग्न का चक्र (३०°)
•V = लग्नगति
∆पृथ्वी पर औसतन लग्न परिवर्तन का समय: —
१ राशि = २ घण्टे
अतः
३०° = १२० मिनट
∆युद्धकाल गणना:
यदि युद्ध चर लग्न में प्रारम्भ हुआ है तो
T = १२०÷ १/३
T ≈ ४० दिन
यह अधिकतम सीमा है।
किन्तु ग्रहबल के कारण यह अवधि और घट सकती है।
✓•५. मंगल अस्त सिद्धान्त:
कुण्डली अनुसार उल्लेख किया है कि
•मंगल सूर्य से अस्त है।
∆ज्योतिष में नियम है —
“अस्ते भौमे युद्धशान्तिः शीघ्रं भवति।”
अर्थात् जब मंगल अस्त हो तो युद्ध अधिक समय नहीं चलता।
∆मंगल का अस्त काल लगभग
१५–२० दिन
तक प्रभावी रहता है।
✓•६. चन्द्र-गुरु योग का प्रभाव:
चन्द्र और गुरु का योग शान्ति का संकेत देता है।
∆ग्रह गति के अनुसार
चन्द्र लगभग २.२५ दिन में एक राशि पार करता है। जब चन्द्र गुरु से पुनः शुभ दृष्टि बनाता है, तब कूटनीतिक वार्ता प्रारम्भ होती है।यह स्थिति लगभग १२–१४ दिन बाद बनती है।
✓•७. नक्षत्र चक्र गणना: यदि युद्ध स्वाती या उसके समीप नक्षत्र क्षेत्र में प्रारम्भ हुआ है तो नक्षत्र चक्र —९ × १ = ९ दिन ∆१८ नक्षत्र चक्र —९ + ९ = १८ दिन ∆२७ नक्षत्र चक्र —२७ दिन- इस सिद्धान्त के अनुसार युद्ध का निर्णायक मोड़ •१८ से २७ दिन के बीच आता है।
✓•८. सर्वतोभद्र वेध गणना: कुण्डली अनुसार •मंगल का वेध- •ईरान, •इजरायल, •भारत पर है।
∆जब मंगल •कुम्भ से मीन की ओर गति करता है •तो वेध समाप्त होने लगता है।
∆मंगल की औसत गति — •०.५° / दिन- •यदि मंगल •लगभग १२° दूरी तय करे तो वेध प्रभाव समाप्त होने लगता है।
∆अतः १२° ÷ ०.५° = २४ दिन ✓•९. गणितीय समन्वय: अब तीनों गणनाएँ देखें — विधि अवधि •लग्नगति ४० दिन (अधिकतम) •नक्षत्र चक्र १८–२७ दिन •मंगल वेध २४ दिन ∆इन तीनों का औसत —४० + २७ + २४÷३ = ३०.३३ दिन, किन्तु चन्द्र-गुरु योग के कारण यह अवधि घट जाती है।
∆अतः वास्तविक अवधि —२२ – २६ दिन ✓•१०. समाप्ति-तिथि का निर्धारण: ∆यदि युद्ध प्रारम्भ —२८ फरवरी २०२६ तो ∆२२ दिन बाद —२२ मार्च २०२६ ∆२६ दिन बाद —
२६ मार्च २०२६ृ ✓•११. निर्णायक काल: ज्योतिषीय दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण काल होगा —२० मार्च – २४ मार्च २०२६
इस समय चन्द्र शुभ स्थिति में मंगल का प्रभाव घटता हुआ कूटनीतिक वार्ता सक्रिय ✓
•१२. संभावित परिणाम: इस युद्ध का अन्त —•१. पूर्ण विजय से नहीं •२. बल्कि राजनयिक समझौते से होने की सम्भावना अधिक है।
∆कारण —
चन्द्र-गुरु योग।
✓•१३. वैश्विक प्रभाव: •युद्ध समाप्ति के समय- •तेल बाजार अस्थिर- •चीन आर्थिक दबाव में- •रूस को अप्रत्यक्ष हानि
•यूरोप को रणनीतिक लाभ
✓•१४. निष्कर्ष:
समस्त ज्योतिषीय एवं गणितीय विश्लेषण से निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं —
•१. युद्ध चर लग्न में आरम्भ हुआ।
•२. मंगल अस्त होने से युद्ध दीर्घकालिक नहीं।
•३. नक्षत्र चक्र के अनुसार निर्णायक मोड़ १८–२७ दिन में।
•४. मंगल वेध समाप्ति लगभग २४ दिन में।
∆अतः युद्ध की सम्भावित समाप्ति —
•२२ मार्च २०२६ से २६ मार्च २०२६ के मध्य।