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श्री अमित शाह ने जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” (महिला) और “विकास” (पुरुष) का औपचारिक अनावरण किया

दो चरणों में होने वाली जनगणना-2027 दुनिया का सबसे बड़ा जनगणना कार्य

पहली बार डिजिटल माध्यम से होगी जनगणना, साथ ही पहली बार स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प

स्व-गणना एक सुरक्षित वेब-आधारित सुविधा के माध्यम से होगी, उत्तरदाता घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व 16 भाषाओं में अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकेंगे

जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” और “विकास” 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की भागीदारी के प्रतीक

देशभर में 30 लाख से अधिक प्रगणक, पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी जनगणना-2027 में शामिल होंगे

नई दिल्ली। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नई दिल्ली में जनगणना-2027 के लिए चार digital tools का सॉफ्ट लॉन्च और शुभंकर- “प्रगति” (महिला) और “विकास” (पुरुष) – का औपचारिक अनावरण किया। देशभर में गणना कार्यों को सुगम बनाने के लिए सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) ने एडवांस डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं। इस अवसर पर केन्द्रीय गृह सचिव और भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

केन्द्र सरकार द्वारा 16 जून, 2025 को राजपत्र में जनगणना-2027 की अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद जनगणना-2027 की प्रक्रिया औपचारिक रूप से प्रारंभ हुई। दो चरणों में होने वाली जनगणना-2027 दुनिया का सबसे बड़ा जनगणना कार्य है। पहली बार जनगणना डिजिटल माध्यम से की जाएगी और साथ ही पहली बार स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प भी दिया जा रहा है।

शुभंकर “प्रगति” और “विकास”
जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” (महिला प्रगणक) और “विकास” (पुरुष प्रगणक) को मैत्रीपूर्ण और सहज प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही “प्रगति” और “विकास” 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की भागीदारी के भी प्रतीक हैं। इन शुभंकरों के माध्यम से जनगणना 2027 से संबंधित जानकारी, उद्देश्य एवं प्रमुख संदेश समाज के विभिन्न वर्गों तक प्रभावी और जन-सुलभ रूप में पहुँचाए जाएंगे।

जनगणना-2027 के डिजिटल टूल्स
जनगणना-2027 भारत की पहली तकनीकी (digital) उपकरणों द्वारा संचालित जनगणना होगी। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह द्वारा सॉफ्ट लॉन्च किए गए चार digital प्लेटफॉर्म हैं:

हाउस लिस्टिंग ब्लॉक क्रिएटर (HLBC) वेब एप्लिकेशन: यह वेब-मैप एप्लिकेशन चार्ज अधिकारियों को उपग्रह चित्रों की सहायता से तकनीकी रूप से मकान सूचीकरण ब्लॉक बनाने में सक्षम बनाता है, जिससे देशभर में भौगोलिक कवरेज का मानकीकरण सुनिश्चित होता है।
HLO मोबाइल एप्लिकेशन: यह एक सुरक्षित ऑफलाइन मोबाइल एप्लिकेशन है, जिसके माध्यम से प्रगणक मकान -सूचीकरण डेटा एकत्र एवं अपलोड कर सकते हैं। केवल CMMS पोर्टल पर पंजीकृत प्रगणक ही इसका उपयोग कर सकते हैं। यह एप्लिकेशन सीधे क्षेत्र से सर्वर तक डेटा प्रेषण की सुविधा प्रदान करता है, जिससे पारंपरिक कागजी कार्य समाप्त हो जाता है। यह एंड्रॉयड एवं iOS प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है तथा 16 भाषाओं में संचालित किया जा सकता है।
स्व-गणना (SE) पोर्टल: पहली बार स्व-गणना का विकल्प प्रदान किया जा रहा है। यह एक सुरक्षित वेब-आधारित सुविधा है, जिसके माध्यम से पात्र उत्तरदाता घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। सफल पंजीकरण के बाद एक विशिष्ट स्व-गणना आईडी (SE ID) जारी की जाएगी। इस स्व-गणना आईडी (SE ID) को प्रगणक के साथ साझा किया जायेगा जिसके आधार पर दर्ज की गयी सूचना की प्रगणक द्वारा पुष्टि की जा सकेगी।
जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली (CMMS) पोर्टल: यह एक केंद्रीकृत वेब-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसके माध्यम से जनगणना से संबंधित गतिविधियों की योजना, प्रबंधन, क्रियान्वयन और निगरानी की जाएगी। राज्य , जिला एवं तहसील स्तर के अधिकारी एकीकृत डैशबोर्ड के माध्यम से वास्तविक समय में प्रगति और कार्य-स्थिति का अवलोकन कर सकेंगे।

जनगणना-2027 में घर – घर जाकर सुरक्षित मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर डेटा एकत्रित किया जाएगा और पूरी कवरेज को सुनिश्चित किया जाएगा। इसके लिए देशभर में 30 लाख से ज़्यादा प्रगणक, पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी जनगणना-2027 में कार्य करेंगे ।

तकनीक को ध्यान में रखकर अपनाते हुए इनोवेशन और सबको साथ लेकर चलने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जनगणना-2027 सही, सुरक्षित और कम्प्रेहेन्सिव हो।

जनगणना-2027 दो चरणों में संपन्न होगी:
प्रथम चरण : गृह-सूचीकरण एवं आवास जनगणना (HLO)

प्रथम चरण के दौरान आवास की स्थिति एवं घरेलू सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी, जबकि द्वितीय चरण में देश के प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित जनसांख्यिकीय, सामाजिक एवं आर्थिक विवरण दर्ज किए जाएंगे।

प्रथम चरण के लिए अधिसूचना 7 जनवरी 2026 को जारी की गई। मकान-सूचीकरण एवं मकान गणना 1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 के बीच, प्रत्येक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की सतत अवधि में संचालित की जाएगी। घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व 15 दिनों की वैकल्पिक स्व-गणना अवधि भी होगी।

द्वितीय चरण: जनसंख्या गणना (PE)
जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में पूरे भारत में की जाएगी। लद्दाख संघ राज्यक्षेत्र तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हिमाच्छादित गैर-समकालिक क्षेत्रों में गणना सितंबर 2026 में संपन्न होगी। जनगणना के द्वितीय चरण में जाति संबंधित प्रश्न भी शामिल किया जाएगा।

जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि सभी राज्यों एवं संघ राज्यक्षेत्रों के लिए 1 मार्च 2027 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) होगी। लद्दाख तथा हिमाच्छादित गैर-समकालिक क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) के लिए संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) होगी।

उपराष्ट्रपति द्वारा तमिल विद्वानों, विरासत और संस्कृति को समर्पित 16 प्रकाशनों का विमोचन

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज उपराष्ट्रपति भवन में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग की ओर से प्रकाशित 16 महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया। ये पुस्तकें तमिल के विख्यात विद्वानों, विरासत, वास्तुकला, साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित हैं। विमोचित पुस्तकों में से 13 तमिल भाषा पर आधारित हैं।

तमिल शीर्षकों में रामेश्वरम्, रामानुजार, नादुकल, अरिकाइमेडु, बक्थी इलक्कियाम, इयारकई वेलनमई, पजंथामिजान इसई करुविगल, तमिझागा नत्तार देवंगल, पुधिया अरिवियाल थोझिलनुतपंगल, बंकिम चंद्र चटर्जी, मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर, तंजावुर पेरुवुदयार कोइल, मणिमेगलाई और महाविद्वान मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई शामिल हैं।

कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि विमोचित पुस्तकें मंदिर परंपराओं, दर्शन, साहित्य, संगीत और विज्ञान के साथ तमिल धरोहर की गहराई, विविधता और सभ्यतागत निरंतरता को दर्शाती हैं। तमिल को विश्व की सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं में से एक बताते हुए उन्होंने इस विषय पर जोर दिया कि भारत अनेक भाषाओं की भूमि है, लेकिन साथ ही साथ उसकी आत्मा एक है। उन्होंने वैश्विक मंच पर तमिल को हमेशा सम्मान देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की और युवाओं से प्रतिदिन कम से कम एक घंटा पढ़ने का आग्रह करते हुए आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक शक्ति पर भी बल दिया।

पुस्तकों के विमोचन के मौके पर अश्विनी वैष्णव ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताया और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त समृद्ध और प्राचीन संस्कृति वाली शास्त्रीय भाषा के तौर पर तमिल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि प्रकाशन विभाग की पुस्तकें इस गौरवशाली विरासत का उत्सव मनाती हैं।

इस कार्यक्रम में डॉ. एल. मुरुगन भी उपस्थित रहे। उन्होंने तमिल संगम साहित्य के महत्त्व के बारे में बात की और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को उजागर किया।

इस कार्यक्रम का एक मुख्य आकर्षण श्री एस. के. बोस की ओर से लिखित बंकिम चंद्र चटर्जी की पुस्तक का अंग्रेजी, हिंदी और तमिल में विमोचन था। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित इस समृद्ध संस्करण में इस प्रख्यात साहित्यकार के जीवन और काल तथा भारतीय साहित्यिक आंदोलन में उनके योगदान का गहन विश्लेषण किया गया है। अंग्रेजी संस्करण में एक नया आवरण, अतिरिक्त अभिलेखीय तस्वीरें और चित्र शामिल हैं। इस आवरण को विशेष रूप से आईआईटी दिल्ली के सहयोग से एक स्टार्टअप की मदद से डिजाइन किया गया है, जिसमें समकालीन सौंदर्यशास्त्र और शास्त्रीय भावना का अद्भुत मिश्रण है। हिंदी और तमिल अनुवादों के एक साथ विमोचन से वंदे मातरम के पूजनीय रचयिता की विरासत व्यापक पाठकों तक पहुंच गई है।

रामेश्वरम्‌ पर आधारित यह पुस्तक पुराणों और साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त दस्तावेजी संदर्भों को प्रस्तुत करती है, जिसमें रामेश्वरम मंदिर परिसर के पवित्र स्थलों, स्थापत्य कला की भव्यता, मूर्तियों और देवी-देवताओं का विशेष वर्णन किया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को मंदिर के इतिहास और आध्यात्मिक महत्व की व्यापक समझ प्रदान करना है।

भारत के वो रोमांचक खेल जो लगभग लुप्त हो चुके हैं

अनादि काल से खेल हर संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं । एक स्थिर सभ्यता के निर्माण में रुचि न रखते हुए, भारत के लोगों ने खेल खेलने के लिए अवकाश का समय निकालना आवश्यक समझा। प्राचीन भारतीय खेलों के प्रमाण दर्शाते हैं कि वे नवीन, मनोरंजक और पूर्ण भागीदारी की मांग करने वाले खेल थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में, लोग तोरण (भाला), धनुष-बाण और चक्र जैसे हथियारों से प्रतिस्पर्धा करते थे। इन बाहरी खेलों के अलावा, हमें हमेशा से ही आंतरिक खेलों का भी शौक रहा है, और हमें यह कैसे पता चला? इतिहासकारों ने गुफाओं और मंदिरों की दीवारों पर खुदे हुए आदिम बोर्ड गेम के निशान पाए हैं और हड़प्पा जैसे स्थलों पर पासे और काउंटर खोजे हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी विभिन्न खेलों के संदर्भ मिलते हैं।

बीते वर्षों में हम अपनी गौरवशाली खेल संस्कृति से दूर होते चले गए हैं, और भले ही हम खेलों के उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, फिर भी कुछ खेल समय के साथ लुप्त हो गए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख खेलों का उल्लेख है जिन्होंने हमारे इतिहास पर अपनी छाप छोड़ी है:

कलारिपयाट्टू

कलारीपयट्टू, जिसे कलारी के नाम से भी जाना जाता है, मार्शल आर्ट का एक प्राचीन रूप है जिसकी जड़ें केरल में हैं। कलारी शब्द विभिन्न हिंदू ग्रंथों में युद्धक्षेत्र और युद्ध क्षेत्र का वर्णन करने के लिए आता है। अपने लंबे इतिहास के कारण, यह मार्शल कलाकारों के लिए एक विशिष्ट स्थान रखता है। परंपरागत रूप से, इस खेल में दो रूप शामिल हैं: उत्तरी शैली या वडक्कन कलारी, और दक्षिणी शैली या थेक्कन कलारी। समय के साथ, एक नए पैटर्न को भी मान्यता मिली है, जिसे प्राथमिक विधि या मध्य कलारी कहा जाता है, जिसका उद्देश्य दोनों शैलियों के तत्वों को जोड़ना है।

कुश्ती

कुश्ती, जिसे पहलवानी भी कहा जाता है, प्राचीन भारत में लड़ी जाने वाली कुश्ती है। इसका विकास मुगल काल में फारसी कुश्ती पहलवानी और भारतीय मल्ल-युद्ध की तकनीकों के संयोजन से हुआ। इस खेल की उत्पत्ति ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी में हुई थी, जहाँ इसे मल्ल-युद्ध के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है युद्ध कुश्ती।

अतिया पात्या

अतिया पाट्या, जिसे अक्सर “चालबाज़ी का खेल” कहा जाता है, दो टीमों के बीच खेला जाता है, जिसमें प्रत्येक टीम में नौ सदस्य होते हैं। यह भारत में, विशेष रूप से महाराष्ट्र में, एक लोकप्रिय खेल है। 1982 में ‘अत्या पाट्या फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के गठन के बाद इसे राष्ट्रीय महत्व प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने 2013 में इस फेडरेशन को मान्यता प्राप्त संगठनों की सूची में शामिल किया।

युबी लकपी

युबी लापकी, जिसका अर्थ है नारियल छीनना, एक व्यक्तिगत संपर्क खेल है जिसमें नारियल की आवश्यकता होती है। यह एक प्राचीन भारतीय खेल है जिसकी उत्पत्ति मणिपुर में हुई थी। यह एक पारंपरिक फुटबॉल खेल है जो रग्बी टूर्नामेंट से काफी मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है।

प्रत्येक खेल से पहले, खिलाड़ी अपने शरीर पर तेल मलते हैं ताकि वह फिसलनदार हो जाए और राजा के सामने तेल में भीगी हुई गेंद रखी जाती है। गोल करने के लिए, खिलाड़ी को गोलपोस्ट के पास जाकर तेल लगे गोल से उसके सामने से रेखा पार करनी होती है।

कंबला

कंबाला कर्नाटक में आयोजित होने वाली एक वार्षिक भैंस दौड़ है, जो नवंबर से मार्च तक चलने वाले कंबाला ऋतु के दौरान होती है। इसकी शुरुआत ग्रामीण जनता के मनोरंजन के लिए एक पारंपरिक खेल के रूप में हुई थी, जिसमें कीचड़ भरे धान के खेतों में भैंसों को चाबुक से दौड़ाया जाता था। भैंसों को रंग-बिरंगे गहनों और पीतल और चांदी के सुंदर मुकुटों से सजाया जाता है।

जल्लीकट्टू

जल्लीकट्टू तमिलनाडु में प्रचलित एक लोककथात्मक बैल-पीछा खेल है, जिसका आयोजन पोंगल के फसल उत्सव के दौरान किया जाता है। यह लगभग दो सहस्राब्दी पुराना खेल है। प्राचीन काल में इसे येरु थझुवुथल के नाम से जाना जाता था। प्रतिभागी एक निश्चित समय तक बैल की पीठ पर कूबड़ को पकड़े रहते हैं और फिर उस पर नियंत्रण पाने के लिए उसके सींगों को पकड़ लेते हैं।

इंसुक्नॉर

इंसुकनाव्र मिजोरम का एक पारंपरिक खेल है जिसमें छड़ी से धक्का देकर खेलाया जाता है। मिजो समुदाय ने खेती के थका देने वाले नियमित जीवन से राहत पाने के लिए कई खेल विकसित किए; यह उनमें से एक था। इस खेल में दो खिलाड़ी होते हैं, जो छड़ी को अपनी बाहों के नीचे पकड़कर अपने प्रतिद्वंद्वी को रिंग से बाहर धकेलने की कोशिश करते हैं।

धोपखेल

धोपखेल का आयोजन असम राज्य के वार्षिक उत्सव रंगोली बिहू के दौरान किया जाता है। इस खेल में दो टीमें होती हैं, जिसमें खिलाड़ी धोप नामक गेंद को इस तरह उछालते हैं कि वह विरोधी टीम के पाले में गिरे। यह आधुनिक थ्रो बॉल से मिलता-जुलता है और कभी-कभी इसकी तुलना कबड्डी से भी की जाती है।

पचीसी

पचीसी, जिसका अर्थ पच्चीस होता है, मध्यकालीन भारत में उत्पन्न हुआ एक क्रॉस और सर्कल का खेल है। इसके लिए एक सममित क्रॉस के आकार का बोर्ड आवश्यक होता है। खिलाड़ी के मोहरे छह या सात कौड़ियों के फेंके जाने के अनुसार बोर्ड पर चलते हैं, और ऊपर की ओर गैप वाली कौड़ियों की संख्या ही आगे बढ़ने वाले खानों की संख्या निर्धारित करती है।

चौपाद

चौपड़ या चौसर भारत में पिछले दो सहस्राब्दियों से मौजूद है। इस खेल में एक क्रॉस के आकार का बोर्ड होता है, जहाँ चार खिलाड़ी दो टीमों में खेलते हैं और प्रत्येक खिलाड़ी के पास चार मोहरे होते हैं। यह पचीसी और आधुनिक लूडो से काफी मिलता-जुलता है।

चतुरंगा

चतुरंग, जिसे आधुनिक शतरंज का पूर्ववर्ती माना जाता है, एक रणनीति का खेल है जिसकी उत्पत्ति भारत में ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में हुई थी। खेल के सटीक नियम अज्ञात हैं, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि यह अपने पूर्ववर्ती शतरंज के समान था। यह 8×8 खानों वाले बिना चेक वाले बॉक्स पर खेला जाता था, जिसमें मोहरे शतरंज के समान होते थे।

अचुग्वी फान सोहलाइमुंग

त्रिपुरा राज्य में दो पुरुषों के बीच उनकी ताकत का परीक्षण करने के लिए आयोजित होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता है। इसे त्रिपुरी भाषा (कोकबोरोक) में थ्वंगमुंग के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन, हाल के वर्षों में, आधुनिक खेल संस्कृति के प्रभाव के कारण लोग ऐसे खेलों को छोड़ रहे हैं।

इनबुआन

इनबुआन कुश्ती का एक अन्य रूप है जिसकी उत्पत्ति 1700 के दशक की शुरुआत में मिजोरम में हुई थी। इसमें सख्त नियम होते हैं जो लात मारने, घेरे से बाहर निकलने या घुटने मोड़ने पर भी रोक लगाते हैं।

बीते वर्षों में, आधुनिक संस्कृति ने हमारी सदियों पुरानी परंपराओं पर अपना प्रभाव जमा लिया है, न केवल खेलों के संदर्भ में, बल्कि हमारी जीवनशैली में भी। आइए एक कदम पीछे हटें और उन खेलों को पुनर्जीवित करें जिन्होंने सदियों से हमारे पूर्वजों का मनोरंजन किया है।

साभार – https://thesportsschool.com/ से 

 

“ईरान–इजरायल युद्ध (२८ फरवरी २०२६) की समाप्ति-तिथि का ज्योतिषिय आकलन

कालचक्र, लग्नगति, ग्रहदृष्टि तथा सर्वतोभद्र सिद्धान्तों पर आधारित शोध”
✓•१. प्रस्तावना:
राजकीय या अन्तर्राष्ट्रीय युद्धों की समाप्ति-तिथि का निर्धारण भारतीय ज्योतिष में अत्यन्त विशिष्ट विषय है। यह केवल सामान्य फलादेश नहीं है, बल्कि इसमें कालगणित, ग्रहगति, लग्नचक्र, नक्षत्र-चक्र तथा सर्वतोभद्र वेध का संयुक्त उपयोग किया जाता है।
वराहमिहिर ने युद्धफल के विषय में स्पष्ट कहा है —
“ग्रहैः सूचितकालस्य युद्धस्य परिणामकः।
लग्नदृष्टिवशादेव कालो निश्चीयते ध्रुवम्॥”
अर्थात् ग्रहस्थिति से युद्ध का प्रारम्भ सूचित होता है, और उसकी अवधि तथा समाप्ति लग्नगति तथा ग्रहदृष्टि से निर्धारित होती है।
∆ निर्दिष्ट युद्धारम्भ-काल —
२८ फरवरी २०२६
भारतीय मान समय — ११:४०
इसी क्षण को युद्धारम्भ कुण्डली मानकर गणितीय निर्धारण किया जा रहा है।
✓•२. युद्धकाल निर्धारण का शास्त्रीय सूत्र:
पाराशरी परम्परा में युद्धकाल निर्धारण के लिए तीन प्रमुख सूत्र दिए गए हैं —
✓•(१) लग्नस्वभाव सिद्धान्त:
लग्न प्रकार युद्ध अवधि
चर अल्पकाल
स्थिर दीर्घकाल
द्विस्वभाव मध्यम
•यदि लग्न चर हो तो युद्ध शीघ्र समाप्त होता है।
✓•(२) ग्रहबल सिद्धान्त:
•युद्ध तब तक चलता है जब तक
•मंगल या शनि का प्रभाव प्रमुख रहता है।
जब
•मंगल का बल घटता है
•चन्द्रमा शुभ ग्रह से युक्त होता है
तब युद्ध समाप्ति की दिशा में जाता है।
✓•(३) नक्षत्र चक्र सिद्धान्त:
युद्ध का परिणाम प्रायः
•९ नक्षत्र चक्र में बदलता है।
•यह सिद्धान्त इस सूत्र से प्राप्त होता है —
९ / १ नक्षत्र = ९ दिन
•अर्थात् युद्ध की दिशा लगभग ९, १८ या २७ दिन में बदलती है।
✓•३. युद्धारम्भ ग्रहस्थितियाँ
∆संलग्न कुण्डली के अनुसार
ग्रह राशि
सूर्य कुम्भ
मंगल कुम्भ
बुध कुम्भ
शुक्र कुम्भ
राहु कुम्भ
गुरु मिथुन
चन्द्र कर्क
शनि मीन
यहाँ अत्यन्त महत्वपूर्ण है —
•कुम्भ में पंचग्रह संयोग
यह अत्यन्त तीव्र युद्धयोग है।
✓•४. युद्ध अवधि का गणितीय सूत्र:
प्राचीन मुहूर्तशास्त्र में युद्ध अवधि निकालने का एक सूत्र दिया गया है —
T = L/V
∆जहाँ
•T = युद्ध अवधि
•L = लग्न का चक्र (३०°)
•V = लग्नगति
∆पृथ्वी पर औसतन लग्न परिवर्तन का समय: —
१ राशि = २ घण्टे
अतः
३०° = १२० मिनट
∆युद्धकाल गणना:
यदि युद्ध चर लग्न में प्रारम्भ हुआ है तो
T = १२०÷ १/३
T ≈ ४० दिन
यह अधिकतम सीमा है।
किन्तु ग्रहबल के कारण यह अवधि और घट सकती है।
✓•५. मंगल अस्त सिद्धान्त:
कुण्डली अनुसार उल्लेख किया है कि
•मंगल सूर्य से अस्त है।
∆ज्योतिष में नियम है —
“अस्ते भौमे युद्धशान्तिः शीघ्रं भवति।”
अर्थात् जब मंगल अस्त हो तो युद्ध अधिक समय नहीं चलता।
∆मंगल का अस्त काल लगभग
१५–२० दिन
तक प्रभावी रहता है।
✓•६. चन्द्र-गुरु योग का प्रभाव:
चन्द्र और गुरु का योग शान्ति का संकेत देता है।
∆ग्रह गति के अनुसार
चन्द्र लगभग २.२५ दिन में एक राशि पार करता है। जब चन्द्र गुरु से पुनः शुभ दृष्टि बनाता है, तब कूटनीतिक वार्ता प्रारम्भ होती है।यह स्थिति लगभग १२–१४ दिन बाद बनती है।
✓•७. नक्षत्र चक्र गणना: यदि युद्ध स्वाती या उसके समीप नक्षत्र क्षेत्र में प्रारम्भ हुआ है तो नक्षत्र चक्र —९ × १ = ९ दिन ∆१८ नक्षत्र चक्र —९ + ९ = १८ दिन ∆२७ नक्षत्र चक्र —२७ दिन- इस सिद्धान्त के अनुसार युद्ध का निर्णायक मोड़ •१८ से २७ दिन के बीच आता है।
✓•८. सर्वतोभद्र वेध गणना: कुण्डली अनुसार •मंगल का वेध- •ईरान, •इजरायल, •भारत पर है।
∆जब मंगल •कुम्भ से मीन की ओर गति करता है •तो वेध समाप्त होने लगता है।
∆मंगल की औसत गति — •०.५° / दिन- •यदि मंगल •लगभग १२° दूरी तय करे तो वेध प्रभाव समाप्त होने लगता है।
∆अतः १२° ÷ ०.५° = २४ दिन ✓•९. गणितीय समन्वय: अब तीनों गणनाएँ देखें — विधि अवधि •लग्नगति ४० दिन (अधिकतम) •नक्षत्र चक्र १८–२७ दिन •मंगल वेध २४ दिन ∆इन तीनों का औसत —४० + २७ + २४÷३ = ३०.३३ दिन, किन्तु चन्द्र-गुरु योग के कारण यह अवधि घट जाती है।
∆अतः वास्तविक अवधि —२२ – २६ दिन ✓•१०. समाप्ति-तिथि का निर्धारण: ∆यदि युद्ध प्रारम्भ —२८ फरवरी २०२६ तो ∆२२ दिन बाद —२२ मार्च २०२६ ∆२६ दिन बाद —
२६ मार्च २०२६ृ ✓•११. निर्णायक काल: ज्योतिषीय दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण काल होगा —२० मार्च – २४ मार्च २०२६
इस समय चन्द्र शुभ स्थिति में मंगल का प्रभाव घटता हुआ कूटनीतिक वार्ता सक्रिय ✓
•१२. संभावित परिणाम: इस युद्ध का अन्त —•१. पूर्ण विजय से नहीं •२. बल्कि राजनयिक समझौते से होने की सम्भावना अधिक है।
∆कारण —
चन्द्र-गुरु योग।
✓•१३. वैश्विक प्रभाव: •युद्ध समाप्ति के समय- •तेल बाजार अस्थिर- •चीन आर्थिक दबाव में- •रूस को अप्रत्यक्ष हानि
•यूरोप को रणनीतिक लाभ
✓•१४. निष्कर्ष:
समस्त ज्योतिषीय एवं गणितीय विश्लेषण से निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं —
•१. युद्ध चर लग्न में आरम्भ हुआ।
•२. मंगल अस्त होने से युद्ध दीर्घकालिक नहीं।
•३. नक्षत्र चक्र के अनुसार निर्णायक मोड़ १८–२७ दिन में।
•४. मंगल वेध समाप्ति लगभग २४ दिन में।
∆अतः युद्ध की सम्भावित समाप्ति —
•२२ मार्च २०२६ से २६ मार्च २०२६ के मध्य।

द केरल स्टोरी-2 फिल्म हर हिंदू माता-पिता को देखनी चाहिए

‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ अब कोई साधारण फिल्म नहीं रह गई है। इस पर उठे सवालों ने ही इसे और अधिक देखने योग्य बना दिया है। फिल्म के निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह हैं और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने देश में फैल रही लव जिहाद की समस्या को सामाजिक और वैचारिक रूप से जिस तरह पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है, वह वास्तव में उल्लेखनीय है।

फिल्म में देश के अलग-अलग कोनों से तीन लड़कियों की कहानियाँ दिखाई गई हैं। ये कहानियाँ बताती हैं कि किस प्रकार हिंदू पहचान के कारण उनके साथ भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर छल किया जाता है, उन्हें उनकी पहचान के आधार पर चिह्नित कर अंधेरे गर्त में धकेल दिया जाता है।

फिल्म के रिलीज से पहले सामने आए प्रोमो वीडियोज में राजस्थान की दिव्या पालीवाल, केरल की सुरेखा नायर और मध्य प्रदेश की नेहा संत को पीड़िताओं के रूप में दिखाया गया था। इन तीनों किरदारों को उल्का गुप्ता, ऐश्वर्या ओझा और अदिति भाटिया ने निभाया है। इनमें से अदिति भाटिया का यह बड़े पर्दे पर पहला डेब्यू है।

सुरेखा की कहानी यह दर्शाती है कि ऐसे विधर्मियों से बचने के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं होती। वहीं नेहा संत की कहानी बताती है कि यदि आपको अपने धर्म से प्रेम है, तब भी आपको झूठ बोलकर फँसाया जा सकता है। इसी प्रकार दिव्या पालीवाल की कहानी यह सिखाती है कि कम उम्र की बच्चियों का किस तरह ब्रेनवॉश कर उन्हें अपने जाल में फँसाया जाता है।

तीनों अभिनेत्रियों ने दिव्या, सुरेखा और नेहा के किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। एक दर्शक के रूप में आप देख पाते हैं कि किस तरह एक लव जिहाद पीड़िता को जाल में फँसाया जाता है और किन-किन चरणों में उसका ब्रेनवॉश किया जाता है।

फिल्म की खासियत और समाचार में आती खबरें

‘द केरल स्टोरी’ के बाद पर्दे पर आ रही ‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ की खास बात ये है कि इसकी कहानी किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आती लव जिहाद की खबरों से जुड़ती है। उन पीड़िताओं की व्यथा भी इसमें दिखाई देती है, जो अब सामने आकर बताने लगी हैं कि कैसे उनकी जिंदगी बर्बाद की गई, उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित किया गया या जबरन बीफ खिलाया गया।

बतौर अभिभावक कुछ दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं, लेकिन यह बेचैनी उस पीड़ा से कम ही होगी, जो अपनी बेटियों को खो देने या उनके साथ हुई अमानवीय घटनाओं को देखकर किसी माता-पिता को होती है।

फिल्म के कई हृदयविदारक दृश्यों के बाद अंतिम दृश्य दर्शकों को संतोष का अनुभव करा सकते हैं। बैकग्राउंड में ‘हर-हर शंभू’ गीत सुनाई देता है, मनोज मुंतशिर की आवाज में चेतावनी के बोल गूँजते हैं, बुलडोजर का दृश्य दिखता है और पुलिस की कार्रवाई नजर आती है।

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड म्यूजिक पीड़िताओं के दर्द और फिल्म के हर सीन के प्रभाव और इमोशन को सशक्त बनाता हैं। संपादन की बात करें तो कुछ स्थानों पर एक दृश्य से दूसरे दृश्य में अचानक परिवर्तन दिखाई देता है, लेकिन यही बदलाव दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखते हैं।

तीन अलग-अलग कहानियों को जोड़ने के लिए क्रॉस-कटिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे पूरी फिल्म एक सहज प्रवाह में आगे बढ़ती है।

इसी प्रकार फिल्म में डॉयलॉग भी विशेष हैं, जो कई मुद्दों पर गहराई से सोचने पर मजबूर करते हैं। उन डॉयलॉग्स को आप अतिनाटकीय नहीं कह सकते, क्योंकि यही संवाद आजकल हो रही घटनाओं को परिभाषित करते हैं। जैसे-

‘ये काफिर हिंदू सेकुलर कहलाने को मरे जात हैं’
‘देश में हमारे लोग हर जगह मोहब्बत फैला रहे हैं’
हमारे में नास्तिक नहीं होते, तुम काफिर नास्तिक होते हो’
’16 साल के लाड-प्यार पे 6 महीने का प्यार’
‘कयामत के दिन शुक्रिया कहोगी’
‘भरोसा नहीं है के म्हारे पे बेबी।’

इस फिल्म का विरोध वह लोग कर रहे हैं जिन्हें लगता है कि समाज में लव जिहाद जैसा कुछ नहीं है। लेकिन, अगर आप उन खबरों में पीड़िताओं के दर्द को पढ़-सुनकर कभी कोई विचार मन में लाते हैं तो फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।

इसे देखिए ताकि आपकी वो समझ विकसित हो कि आप सोच सके कि आपको अपनी बच्चियों की परवरिश किस दिशा में करनी है। आप जान सकें कि विधर्मी तत्वों से लड़कियों को कैसे बचाना है। आप फैसला कर पाएँ कि आपको सेकुलर होने के भ्रम में जीना है या ये स्वीकारना कि आप हिंदू हैं।

गौरतलब है कि इस फिल्म के विरोध में केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद फिल्म की रिलीजिंग पर रोक लग गई थी। हालाँकि शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को केरल हाई कोर्ट ने ये रोक हटा ली और अब ये फिल्म अपने तय समय पर पूरे देश में रिलीज हो रही है।

साभार-  https://hindi.opindia.com/ से

सेमीकंडक्टर: अनुसंधान और रणनीति में साथ-साथ

पर्ड्यू यूनिवर्सिटी और आईआईटी हैदराबाद की एक पहल अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में गहन होते सहयोग के साथ अनुसंधान, प्रतिभा विकास और उद्योग गठबंधन में तालमेल ला रही है।

 

स्मार्टफोन और चिकित्सा उपकरणों से लेकर डेटा सेंटर और रक्षा प्रणालियों तक, सेमीकंडक्टर आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं की आधारशिला हैं। जैसे-जैसे वैश्विक मांग बढ़ रही है और आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां बनी हुई हैं, अमेरिका और भारत दोनों इस बात का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं कि वे उन्नत चिप का डिज़ाइन, निर्माण और सुरक्षा कैसे करते हैं।

इस साझा फोकस के परिणामस्वरूप पर्ड्यू विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद ने संयुक्त रूप से यू.एस.–इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन सेमीकंडक्टर्स की स्थापना की। यह पहल दोनों देशों में व्यापक राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर प्राथमिकताओं के समर्थन में अनुसंधान और उद्योग सहभागिता को जोड़ती है।

पर्ड्यू विश्वविद्यालय में वाइस प्रेसिडेंट और भारत के लिए विश्वविद्यालय दूत प्रोफेसर विजय रघुनाथन कहते हैं, “अमेरिका उन्नत सेमीकंडक्टर अनुसंधान और नवाचार में नेतृत्व लाता है, जबकि भारत विनिर्माण में पैमाना, प्रतिभा और साहसिक महत्वाकांक्षाएं लाता है।”

केंद्र को इन पूरक शक्तियों को जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है। अमेरिकी संस्थानों के लिए, यह एक बड़े और बढ़ते प्रतिभा आधार के साथ अनुसंधान सहयोग और कार्यबल विकास का विस्तार करने का मंच प्रदान करता है। भारत के लिए, यह चिप डिज़ाइन से आगे बढ़कर विनिर्माण और उन्नत पैकेजिंग में गहरी भागीदारी के प्रयासों का समर्थन करता है।

दीर्घकालिक दृष्टि
रघुनाथन बताते हैं कि सेमीकंडक्टर लीडरशिप अब केवल ट्रांजिस्टर स्केलिंग पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि एकीकृत प्रणालियों का डिज़ाइन और निर्माण कैसे किया जाता है। यह बदलाव डिज़ाइन, सामग्री, पैकेजिंग और सिस्टम एकीकरण के बीच समन्वय पर अधिक जोर देता है—ऐसे क्षेत्र जहां संस्थानों और सीमाओं के पार सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है।

आईआईटी हैदराबाद के निदेशक प्रोफेसर बी. एस. मूर्ति केंद्र के प्रतिभा आधार को सुदृढ़ करने में भूमिका पर जोर देते हैं। “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की परिकल्पना प्रतिभा विकास और भारतीय तथा अमेरिकी अकादमिक और उद्योग के बीच सहयोग के लिए एक एकल समाधान के रूप में की गई है,” वह कहते हैं।
वह जोड़ते हैं कि भारत विश्व की सेमीकंडक्टर डिज़ाइन कार्यबल का लगभग 20 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि अमेरिका उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी में अग्रणी बना हुआ है। “केंद्र इन शक्तियों को एक संरचित तरीके से जोड़ता है,” वह कहते हैं। यह दोनों देशों में विश्वविद्यालयों, उद्योग भागीदारों और सरकारी हितधारकों को जोड़ने वाले एक संघ के रूप में कार्य करता है।

पिछले कुछ वर्षों में, आईआईटी हैदराबाद ने चिप डिज़ाइन, विनिर्माण, पैकेजिंग और सामग्री में विशेष कार्यक्रम विकसित किए हैं, जिनका उद्देश्य इंजीनियरों को सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला के विभिन्न भूमिकाओं के लिए तैयार करना है।

प्रभाव के लिए प्रशिक्षण
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना से पहले, आईआईटी हैदराबाद ने भारत के शिक्षा मंत्रालय की एसपीएआरसी (शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा देने की योजना) पहल के अंतर्गत पर्ड्यू विश्वविद्यालय के सहयोग से एक अंतरराष्ट्रीय कार्यबल विकास कार्यक्रम संचालित किया।
तीन-चरणीय कार्यक्रम की शुरुआत एक आधारभूत कार्यशाला से हुई, इसके बाद आईआईटी हैदराबाद में व्यावहारिक प्रशिक्षण हुआ, और इसका समापन पर्ड्यू के बर्क नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर में उन्नत सत्रों के साथ हुआ। दो चरणों में कुल 39 विद्यार्थियों ने कार्यक्रम पूरा किया। कई सेमीकंडक्टर उद्योग में शामिल हुए, जबकि अन्य ने उच्च शिक्षा जारी रखी।

रघुनाथन और मूर्ति दोनों इस पहल की सफलता को केंद्र के व्यापक मिशन की नींव के रूप में देखते हैं: प्रतिभा विकास का विस्तार करना और इसे अनुसंधान तथा उद्योग की आवश्यकताओं से और अधिक निकटता से जोड़ना। पर्ड्यू ने निर्यात नियंत्रण, बौद्धिक संपदा संरक्षण और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी उपयोग जैसे नीति और शासन विषयों में भी अपने सेमीकंडक्टर कार्यबल पहलों का विस्तार किया है, जो केंद्र के मिशन के पूरक हैं।

“ये पाठ्यक्रम, जिन्हें अमेरिकी विदेश विभाग के अनुदान के समर्थन से विकसित किया गया है, सेमीकंडक्टर इंजीनियरों और उद्योग के लीडरों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अनुपालन और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी विकास को समझने में मदद करते हैं,” रघुनाथन कहते हैं।

उद्योग और नीति एकीकरण
उद्योग सहभागिता केंद्र के रणनीतिक लक्ष्य—अमेरिका-भारत सेमीकंडक्टर अनुसंधान और कार्यबल पहलों के तालमेल—का समर्थन करती है। प्रमुख अमेरिकी सेमीकंडक्टर और डिज़ाइन ऑटोमेशन कंपनियां, जिनमें इंटेल, क्वालकॉम, एनवीडिया, एएमडी और सिनॉप्सिस शामिल हैं, भारत में अनुसंधान एवं विकास संचालन करती हैं, जिनमें से कई हैदराबाद में स्थित हैं।

“केंद्र का उद्देश्य इन कंपनियों के साथ निकटता से काम करना है ताकि अनुसंधान, कार्यबल प्रशिक्षण और विचारों को व्यवहार में लाने के मार्गों को संरेखित किया जा सके,” रघुनाथन कहते हैं।

मूर्ति बताते हैं कि फेडरल दृष्टिकोण अनुसंधान से प्रोटोटाइपिंग और उत्पाद साकार तक एक निरंतर पाइपलाइन बनाने में मदद करता है, जिससे वैश्विक सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की भूमिका सुदृढ़ होती है।
“भारत सरकार के सेमीकंडक्टर मिशन के साथ पर्ड्यू की साझेदारी स्वाभाविक रूप से केंद्र के माध्यम से आगे बढ़ती है,” रघुनाथन जोड़ते हैं। “जब इस तरह के सहयोग प्रभावी ढंग से किए जाते हैं, तो वे समय के साथ सहयोग को बनाए रखना आसान बनाते हैं और व्यापक अमेरिका-भारत सेमीकंडक्टर साझेदारी की रीढ़ बनते हैं।”

आलेख साभार: स्पैन

फोटोग्राफ: साभार पर्ड्यू यूनिवर्सिटी

तीन दिवसीय श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सव संपन्न

भुवनेश्वर झारपाड़ा श्रीश्याम मंदिर में श्रीश्याम सेवा ट्रस्ट की ओर से आयोजित तीन दिवसीय श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सव में आयोजित भजन समारोह तथा श्रीश्याम के संग फूलों की होली खेलने के साथ संपन्न हो गया। आमंत्रित भजन गायिका मोहिनी केडिया ने अपने सहयोगी गायक दामोदर पोद्दार के साथ मिलकर अपनी भजन गायकी का बेहतरीन प्रदर्शन किया। अवसर पर श्रीमती सुशीला गुप्ता ने भगवान श्रीकृष्ण की अतिमोहक फोटो बाबा को भेंट की वहीं श्रीमती मंजु अग्रवाल ने बाबा खाटू श्याम के साथ लगभग एक क्विंटल फूलों से होली खेलीं।

गायिका मोहिनी केडिया ने बड़ी आत्मीयता के साथ सबसे पहले तो दिन में श्रीश्याम अखण्ड पाठ किया और उसके उपरांत “आज बिरज में होली खेले रसिया” जैसे अनेक होली के गीत गाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंदिर में उपस्थित अधिकांश महिलाओं ने श्रीश्याम के साथ नाच -नाच कर और गा-गाकर फूलों की होली खेलीं।यह पहला ऐसा धार्मिक आयोजन था जिसमें आयोजन के अंतिम दिन उपस्थित सभी बाबा खाटू श्याम भक्तों ने उनके साथ फूलों की होली खेली।अंत में सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन को सफल बनाने में राम अवतार खेमका, सुशीला अग्रवाल तथा मंदिर के सभी पंडितों और अन्य कार्यकर्ताओं का असाधारण सहयोग रहा। अपने आभार प्रदर्शन में सुरेश कुमार अग्रवाल, महासचिव श्री श्याम सेवा ट्रस्ट झारपाड़ा तथा कार्यक्रम संयोजक ने सभी के पूर्ण सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

युद्ध नहीं, शांति ही बदलती दुनिया की अनिवार्य अपेक्षा

नई बनती दुनिया का चेहरा जितनी तेजी से बदल रहा है, उतनी ही तेजी से वैश्विक असुरक्षा की भावना भी गहराती जा रही है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे वैश्विक असंतुलन का संकेत है जिसमें शक्ति संतुलन की पुरानी व्यवस्थाएं टूट रही हैं और नई विश्व-व्यवस्था अभी स्थिर रूप नहीं ले सकी है। जब महाशक्तियां प्रत्यक्ष या परोक्ष युद्ध में उतरती हैं, तब उसका प्रभाव सीमाओं से परे जाकर समूची मानवता को प्रभावित करता है।

ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखलाएं, मुद्रा विनिमय दरें, शेयर बाजार, खाद्य सुरक्षा, शांतिपूर्ण मानव जीवन और कूटनीतिक समीकरण-सब कुछ अनिश्चितता के घेरे में आ जाता है। मध्यपूर्व में किसी भी बड़े युद्ध का पहला असर तेल आपूर्ति पर पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति यदि बाधित होती है तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आती है-एक ओर आयात बिल बढ़ता है, दूसरी ओर महंगाई और राजकोषीय दबाव में वृद्धि होती है। यदि कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण लागत में वृद्धि अनिवार्य है, जिसका सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। वैश्विक वित्तीय बाजार पहले ही अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, ऐसे में लंबा खिंचता युद्ध निवेश और विकास की गति को भी धीमा कर सकता है।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं, बल्कि बदलती विश्व-व्यवस्था की परीक्षा है। ऐसे समय में युद्ध को तेज़ करने के बजाय उसे रोकने की कोशिशों को और अधिक गति देने की आवश्यकता है। दोनों पक्षों से परिपक्वता और संयम की अपेक्षा है, विशेषकर अमेरिका से, जो स्वयं को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में देखता है और जिसे शक्ति के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी परिचय देना चाहिए। एक तेल उत्पादक देश के रूप में ईरान का अस्तित्व और स्थिरता विश्व अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है; वहां की अस्थिरता ऊर्जा बाजार से लेकर विकासशील देशों की वित्तीय संरचना तक को प्रभावित कर सकती है। हालिया हमलों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने, हजारों के घायल होने और बड़ी संख्या में लोगों के फंसे होने की खबरें मानवता के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। ईरान में शीर्ष नेतृत्व पर हमलों और उसके बाद तेहरान आदि मुस्लिम देशों की तीखी प्रतिक्रियाओं ने पश्चिम एशिया के हालात को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। यह संघर्ष केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा; इसका प्रभाव दक्षिण एशिया की भू-राजनीति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, वैश्विक कूटनीतिक संतुलन और विश्व अर्थव्यवस्था पर दूरगामी होगा।

युद्ध आर्थिक संकट ही नहीं लाता, वह सामाजिक ताने-बाने को तोड़ता है, सांस्कृतिक संवाद को बाधित करता है और राष्ट्रों के बीच अविश्वास की दीवारें ऊंची करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बदलती दुनिया में सह-अस्तित्व, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग की भावना को पुनर्जीवित किया जाए। शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर समझदारी, प्रतिशोध के स्थान पर कूटनीति और वर्चस्व के स्थान पर साझी जिम्मेदारी-इन्हीं मूल्यों से विश्व को स्थिरता मिल सकती है। यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक और भू-राजनीतिक भी है। यूक्रेन संकट के बाद विश्व पहले ही ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ चुका था। अब यदि पश्चिम एशिया में स्थायी अस्थिरता पैदा होती है तो वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए संतुलन साधना कठिन हो जाएगा। भारत एक ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंध भी रहे हैं। इसके साथ ही इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग भी मजबूत हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़े होना भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति के लिए जटिल प्रश्न बन सकता है।

भारत की विशेष चिंता यह भी है कि मध्यपूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं। यदि युद्ध की आग फैलती है तो न केवल उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, बल्कि भारत को मिलने वाली अरबों डॉलर की प्रेषण राशि पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ने से व्यापारिक शिपमेंट महंगे हो सकते हैं। यह परिस्थिति भारत के विकास पथ पर दबाव डाल सकती है, जो अभी विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल एक प्रभावित राष्ट्र की नहीं, बल्कि एक संभावित मध्यस्थ और संतुलनकर्ता की भी हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्षों में बहुध्रुवीय कूटनीति की जो नीति अपनाई है, वह इसी प्रकार की जटिल परिस्थितियों में उपयोगी सिद्ध हो सकती है। भारत ने एक ओर अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी को सुदृढ़ किया है, वहीं रूस से ऊर्जा सहयोग बनाए रखा है और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी संतुलित संबंध कायम रखे हैं। यह ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति भारत को किसी एक खेमे में बंधने से बचाती है। भारत का यह दृष्टिकोण उसे संवाद और शांति प्रयासों के लिए विश्वसनीय मंच प्रदान कर सकता है।

भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, जिसमें ईरान भी सदस्य बन चुका है। यह मंच वैश्विक दक्षिण की आवाज को सशक्त करने का अवसर देता है। यदि भारत इस मंच के माध्यम से युद्धविराम, संवाद और बहुपक्षीय समाधान की पहल करता है, तो वह न केवल अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता बढ़ा सकता है, बल्कि वैश्विक स्थिरता में भी योगदान दे सकता है। संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता या सीमित प्रभाव के बीच मध्यम शक्तियों की भूमिका बढ़ना स्वाभाविक है। भारत, जो स्वयं उपनिवेशवाद और शीत युद्ध की राजनीति से सीख लेकर उभरा है, शांति-आधारित बहुपक्षवाद का पक्षधर बन सकता है। दूसरी ओर, दक्षिण एशिया में भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और आंतरिक अस्थिरता का प्रभाव भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन पर पड़ सकता है। यदि पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है और साथ ही दक्षिण एशिया में भी उथल-पुथल होती है, तो भारत को दो मोर्चों पर रणनीतिक सतर्कता रखनी होगी। आतंकवाद, कट्टरता और अवैध हथियारों का प्रसार ऐसे वातावरण में बढ़ सकता है। अतः भारत के लिए यह समय केवल आर्थिक प्रबंधन का नहीं, बल्कि सुरक्षा और कूटनीतिक संयम का भी है।

समाधान क्या हो सकता है? प्रथम, युद्धविराम और संवाद की बहुपक्षीय पहल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वैश्विक शक्तियों को यह समझना होगा कि स्थायी शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि राजनीतिक समझौते और पारस्परिक सम्मान से आती है। द्वितीय, ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तेज करना होगा, ताकि तेल-निर्भरता कम हो और भू-राजनीतिक संकटों का असर सीमित किया जा सके। तृतीय, वैश्विक संस्थाओं का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि वे केवल महाशक्तियों के प्रभाव का साधन न बनकर न्यायपूर्ण और प्रभावी मंच बन सकें। चतुर्थ, क्षेत्रीय संवाद मंचों-जैसे ब्रिक्स, जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अपनी परंपरा को व्यवहार में उतारे। शांति, सहअस्तित्व और संवाद का संदेश केवल भाषणों तक सीमित न रहकर ठोस कूटनीतिक पहलों में दिखना चाहिए। यदि भारत ऊर्जा विविधीकरण, रक्षा आत्मनिर्भरता, डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है, तो वह वैश्विक संकटों के बीच भी स्थिरता बनाए रख सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सक्रियता-चाहे वह बहुपक्षीय मंचों पर भागीदारी हो या क्षेत्रीय देशों के साथ प्रत्यक्ष संवाद-भारत की अस्मिता और हितों की रक्षा के प्रयास का संकेत देती है।

निश्चित तौर पर युद्ध किसी भी देश के लिए स्थायी लाभ का माध्यम नहीं बन सकता। इतिहास गवाह है कि शक्ति-प्रदर्शन से अस्थायी विजय मिल सकती है, किंतु स्थायी शांति केवल न्याय, संवाद और सहयोग से ही आती है। नई बनती दुनिया को यदि स्थिर और मानवीय बनाना है, तो उसे हथियारों की दौड़ से आगे बढ़कर सहअस्तित्व की संस्कृति अपनानी होगी। भारत, जो स्वयं विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक है, इस परिवर्तन का अग्रदूत बन सकता है। चुनौती बड़ी है, किंतु अवसर भी उतना ही व्यापक है-शर्त यह है कि विश्व नेतृत्व युद्ध की भाषा छोड़कर शांति की भाषा सीखे और भारत अपने संतुलित, स्वायत्त और दूरदर्शी दृष्टिकोण से इस वैश्विक उथल-पुथल में स्थिरता का स्तंभ बने।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

नेहा प्रधान और अंजू शर्मा को सामर्थ्य ग्लोबल एक्सीलेंस राजस्थान गौरव सम्मान

कोटा। समाज सेवा एवं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कोटा की अंजू शर्मा और शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सहायक आचार्य डॉ नेहा प्रधान को सामर्थ्य ग्लोबल एक्सीलेंस अवार्ड के साथ झालरापाटन में सामर्थ्य राजस्थान गौरव अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान झालावाड़ की प्रसिद्ध संस्था सामर्थ्य सेवा संस्थान द्वारा एक होटल में आयोजित राष्ट्रीय सम्मान समारोह में झालावाड़ महाराज राणा चंद्रजीत सिंह, जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़, पुलिस अधीक्षक अमित बुडानिया, हरिशंकर शर्मा, पुखराज जैन डॉ. राम चंद्रावल द्वारा प्रदान किए गए।

अंजू शर्मा को न्यू कोटा इंटरनेशनल सोसायटी कोटा की अध्यक्ष के रूप में विगत 26 वर्षों से लगातार हाड़ौती क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक एवं महिला सशक्तिकरण के लिए सक्रिय भूमिका निभाने, गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों को त्योहारों पर सहयोग, महिला जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन तथा विभिन्न सामाजिक अभियानों में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। नेहा प्रधान को हाड़ौती के क्षेत्र में साहित्यिक लेखन कार्य कर इतिहास पटल पर लाने के प्रयासों के लिए सम्मानित किया गया है।
संस्था के संस्थापक डॉ. राम जी चंद्रवाल ने बताया कि समारोह में देशभर से चयनित 45 प्रतिभाओं को राजस्थान गौरव सम्मान तथा 25 प्रतिभाओं को सामर्थ्य ग्लोबल एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। उन्होंने बताया कि यह संस्था दिव्यांगों के लिए कार्य करती है लेकिन इस वर्ष से राजस्थान के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सम्मानित किए जाने का कार्य आरम्भ किया गया है।

कश्मीरी पंडितों पर मुगल आक्रांताओं की क्रूरता के ख़िलाफ ढाल बने श्री गुरु तेग बहादुर जीः श्री अमित शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नवी मुंबई महाराष्ट्र में गुरु श्री तेगबहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस समागम समारोह में गुरु साहिब की स्मृति को नमन कर उपस्थित संगत से संवाद किया | इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस,उपमुख्यमंत्री श्री एकनाथ शिंदे और श्रीमता सुनेत्रा पनार सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

अपने संबोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा किप्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने राष्ट्रीय स्तर पर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 350वें शहीदी दिवस को मनाने का निर्णय लिया जो पूरे भारत के लिए सौभाग्य का विषय है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस जी ने पूरे महाराष्ट्र में गुरु तेगबहादुर जी की जीवनी को युवाओं तक पहुंचाने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने कहा कि अगर नौवें गुरु तेगबहादुर जी हिंदू धर्म और हिंदुओं को बचाने के लिए शहादत न देते तो पूरे विश्व में एक भी हिंदू नहीं बचता। श्री शाह ने कहा कि पूरे भारत और विश्वभर में सनातन धर्म के अनुयायी गुरु तेगबहादुर जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं कि उन्होंने हिंदू धर्म बचाने के लिए यातनाएं झेलते हुए अपनी शहादत दी।

श्री अमित शाह ने कहा कि सिख परंपरा का मूल एकता, बंधुत्व, समावेश और वीरता रहा है और गुरु ग्रंथ साहिब में इसी तत्व का समावेश किया गया है। उन्होंने कहा कि संत नामदेव जी, नरसी मेहता, कबीर जी, संत रविदास जी जैसे कई नामी संतों के पदों को गुरु ग्रंथ साहिब में जगह देने का काम दशम पिता ने किया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने कई समाज को गुरु तेगबहादुर जी के साथ जोड़ने का काम किया है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि गुरु नानकदेव जी ने मानवता के 3 सरल लेकिन गहरे सिद्धांत हमें दिए हैं – नाम जपो, कीरत करो और वंड छको। इसका अर्थ है- ईश्वर के नाम का जाप करते रहिए, उनका कीर्तन करें और साथ में भोजन कीजिए। उन्होंने कहा कि यह आपसी साझेदारी को बताता है और यही परंपरा आगे जाकर लंगर और साझा चूल्हा में परिवर्तित हुई और मुगलों के सामने लड़ने की बहुत बड़ी ताकत यहां से मिली। श्री शाह ने कहा कि भारत की हज़ारों साल पुरानी परंपरा को गुरु नानकदेव जी महाराज ने एक नया जीवन देने का काम किया और गुरु तेगबहादुर जी भी इसी परंपरा के अनुयायी रहे।

श्री अमित शाह ने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी ने हिंदू धर्म और इसके अनुयायियों की रक्षा के लिए एक पल की भी देरी नहीं की और गुरु तेगबहादुर जी ने जो कहा वो कर कर दिखाया। उन्होंने कहा कि जब कश्मीरी पंडितों पर मुश्किलें आईं तब सारे कश्मीरी पंडितों के प्रतिनिधि एकत्रित होकर गुरु साहब के सामने आए और संरक्षण मांगा। उन्होंने कहा कि तब से पूरी दुनिया में रहने वाले कश्मीरी पंडित गुरु साहब के साथ जुड़े हुए हैं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि श्री गुरु तेगबहादुर जी ने हिंदुओं और पूरे भारत पर जो उपकार किये हैं, उसे कोई नहीं भुला सकता। उन्होंने कहा कि औरंगजेब के शासन के दौरान 1675 में एक ऐसा बलिदान देखा, जिसने पूरे देश की जनता की हिम्मत तो बढ़ाईही, औरंगजेब के अत्याचार करने की ताकत को तोड़ने का काम भी किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और पंजाब में बहुत गहरा रिश्ता है और इसी भूमि को दशम पिता ने अपनी देहत्याग के लिए चुना। उन्होंने कहा कि सिख गुरुओं की वाणी के संत नामदेव जी की भक्ति परंपरा आज भी गुरु ग्रंथ साहिब में उपस्थित है।

श्री अमित शाह ने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी ने देशभर के हिंदुओं और सिखों की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया और गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने एक हाथ में माला औऱ दूसरे हाथ में भाला लेकर औरंजगजेब के अत्याचारों के खिलाफ सिखों को संगठित कर एक बहुत बड़ी लड़ाई की शुरूआत की।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नानकदेव जी महाराज से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी तक सभी गुरूओं ने मुगलों की कई पीढ़ियों से धर्म को बचाने के लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रकार से समाज को ताकत देने का काम किया। उन्होंने कहा कि गुरु नानकदेव जी महाराज ने ज्ञान का प्रचार प्रसार किया और कई कुरीतियों को समाप्त किया। गुरु अंगददेव जी ने शिक्षा का प्रचार प्रसार किया, गुरु अमरदास जी ने सामाजिक समरसता का प्रचार प्रसार किया, गुरु रामदास जीने अनेक संस्थान स्थापित कर एक आधार दिया, गुरु अर्जन देव जी ने सांस्कृतिक समावेशिता के लिए काम किया, गुरु हरगोविंद जी साहिब ने भक्ति और धर्म की रक्षा का दर्शन दिया।

गुरु हरराय जी ने दया का भाव पूरे विश्व में प्रचारित किया, तेगबहादुर जी ने हिंद की चादर का स्वरूप पूरे विश्व के सामने रखा औऱ गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की औऱ गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश फैलाया। श्री शाह ने कहा कि सिंख पंथ के दसों गुरुओं ने एक ऐसी परंपरा बनाई है जो न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय है। उन्होंने कहा कि दसों गुरुओं के जीवन से प्रेरणा लेकर धर्म परिवर्तन के विरुद्ध सभी देशवासियों को एकजुट होना चाहिए।