Sunday, April 6, 2025
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वेदों और उपनिषदों में नए वर्ष की बधाई के श्लोक

वेदों और उपनिषदों में सीधे “नए वर्ष” की बधाई के लिए श्लोक नहीं मिलते, क्योंकि वैदिक और उपनिषदिक काल में ऐसा आधुनिक “नए वर्ष” का संकल्प नहीं था। लेकिन इन ग्रंथों में जीवन, समृद्धि, आरोग्य, और शुभता के लिए कई श्लोक मिलते हैं, जिन्हें नए वर्ष की शुभकामनाओं के संदर्भ में उपयोग किया जा सकता है।

इन श्लोकों में जीवन के हर पहलू के लिए प्रार्थना है—दीर्घायु, समृद्धि, शांति, और मंगलमय जीवन। इन्हें नए वर्ष की शुभकामनाओं के लिए उपयोग करना वैदिक परंपरा के साथ जुड़ने का एक सुंदर और आध्यात्मिक तरीका है।

हालांकि ये कैलेंडर वर्ष है जिसमें अंग्रेजी तारीख के हिसाब से वर्ष बदल रहा है। लेकिन हम अपने विक्रम संवत् के हिसाब से तो वर्ष 2081 में प्रवेश कर चुके है।

इसी भावना को व्यक्त करता ये श्लोक है-

अयं नूतन आंग्लवर्ष: भवत्कृते

भवत्परिवारकृते च मंगलमयः ।

क्षेमस्थैर्यारोग्यैश्वर्याभिर्वृद्धिकारकः

भवतु इति प्रार्थना एवं शुभेच्छाः ।।

न भारतीयो नववत्सरोSयं

तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् ।

यतो धरित्री निखिलैव माता

तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।।

पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।।

यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी हमारी माता ही है और विश्व का हर व्यक्ति हमारा बंधु-बांधव है।

सर्वजन सुख और समृद्धि के लिए (यजुर्वेद)

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।”

(अर्थ: सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी मंगलमय घटनाएँ देखें और कोई भी दुःख का भागी न हो।)

आशा और प्रेरणा के लिए श्लोक

आयु: शुभं यशः शक्ति:
बुद्धिः श्रीर्बलं सुखम्।
देहि मे जगतां नाथ
नववर्षे नवीनताम्।”

यह श्लोक विशेष रूप से नववर्ष की नई शुरुआत के लिए उपयुक्त है, जिसमें जीवन की ऊर्जा और नवीनता की कामना की गई है।

वर्षं नवं हि मंगलमयम्,
आनन्ददं सुखप्रदम्।
नूतनं वर्षमायातु,
सर्वत्र विजयप्रदम्।”

यह श्लोक एक सुंदर तरीके से नववर्ष के स्वागत और शुभता की अभिव्यक्ति करता है।

संपन्नता और उन्नति के लिए (यजुर्वेद)

पयोऽस्मासु धेयम्
श्रीश्च देव्यधिवसो दधातु।”

(अर्थ: हमें जीवन में समृद्धि प्राप्त हो और देवी लक्ष्मी हमें आशीर्वाद दें।)

जीवन की सकारात्मकता और शुभता के लिए (ऋग्वेद)

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।”
(अर्थ: चारों दिशाओं से हमारे जीवन में केवल शुभ विचार और ऊर्जा आएँ।)

 संसार की मंगलकामना के लिए (उपनिषद)

ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।।”

(अर्थ: हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।)

 ऋतु परिवर्तन और नवीन ऊर्जा के लिए (ऋग्वेद)

सम्राज्यं भोज्यं स्वाराज्यं
वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं
महाराज्यमधिपत्यमैष्याम्।”

(अर्थ: यह वर्ष सभी के लिए सर्वोत्तम शासन, समृद्धि और आनंद का प्रतीक बने।)

मंगलकारी वर्ष के लिए प्रार्थना (ऋग्वेद)

इदं वर्षं मधुमयं भवतु।
सर्वे जनाः सुखिनो भवन्तु।”

(अर्थ: यह वर्ष सभी के लिए मधुर और मंगलमय हो, और सभी लोग सुखी हों।)

दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए

शतमानं भवति शतायु: पुरुष: शतम्।
शतं चन्द्रा अंकमाना: शतम्।”

(अर्थ: आप सौ वर्षों तक जीएँ, दीर्घायु और सुखद जीवन प्राप्त करें। आपका जीवन चंद्रमा के समान शीतल और शांत हो।)

सुख-शांति और आरोग्य के लिए

आरोग्यम् भास्करादिच्छेत्
श्रीं इच्छेत् विष्णुमालयात्।
सम्पतिं शंकरादिच्छेत्
मोक्षं इच्छेत् जनार्दनात्।।”

(अर्थ: स्वास्थ्य के लिए सूर्य की पूजा करें, लक्ष्मी और समृद्धि के लिए विष्णु की प्रार्थना करें। धन और सुख के लिए शिव की आराधना करें और मोक्ष के लिए भगवान नारायण का ध्यान करें।)

सर्व मंगल और कल्याण के लिए

मांगल्यं तनुतां तेषां
श्रीरामाय नमोऽस्तु ते।
सर्वेषां मंगलं भूयात्
सर्वेषां शुभमस्तु नित्यम्।”

(अर्थ: भगवान राम सभी को मंगल प्रदान करें। सभी का जीवन हमेशा शुभ और मंगलमय हो।)

नववर्ष की नई ऊर्जा और सफलता के लिए

सुखार्थिन: कुतो धर्म:
धर्मार्थिन: कुतो सुखम्।
जहीहि तृष्णां यो भद्रं
तस्मिन् स्थिरो भवे।”

(अर्थ: जो धर्म चाहता है, उसे सच्चा सुख मिलता है। लालसा को त्यागकर जीवन में स्थिर और शुभ रहो।)

शांति और समृद्धि का आशीर्वाद

शान्तिः शान्तिः शान्तिः,
सर्वत्र शुभमस्तु।
नूतनं वर्षं जयमयम्,
सर्वे भवन्तु सुखिनः।”

(अर्थ: सब ओर शांति हो, सभी के जीवन में शुभता हो। नया वर्ष सभी के लिए विजयी और आनंदमय हो।)

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु।
सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु।।

सब लोग कठिनाइयों को पार करें, सभी का कल्याण हो,  सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण हो, सभी हर परिस्थिति में आनंदित हों।

नववर्ष में उन्नति और विजय के लिए

जयन्ति ते सुकृतिनः
रससिद्धाः कृतश्चिता।
नूतन वर्षे सदा हि
सिद्धिं कुरु कृपानिधे।”

(अर्थ: अच्छे कर्म करने वालों को विजय और सिद्धि प्राप्त होती है। हे कृपा के सागर, इस नए वर्ष में सभी को सिद्धि और सफलता प्रदान करें।)

सकारात्मकता और अच्छे जीवन के लिए

दुर्गाणि दुर्गतोऽत्यन्तं
सर्वेषां मंगलं सदा।
नूतनं वर्षं भद्रं अस्तु,
जीवनं सफलं भवेत्।”

(अर्थ: नए वर्ष में सभी बाधाएँ दूर हों, हर किसी के लिए मंगलमय जीवन हो और सफलता प्राप्त हो।)

आशासे त्वज्जीवने नवं वर्षम् अत्युत्तमं शुभप्रदं स्वप्नसाकारकृत् कामधुग्भवतु।
मुझे उम्मीद है कि नया साल आपके जीवन का सबसे अच्छा साल होगा। आपके सभी सपने सच हों और आपकी सभी आशाएँ पूरी हों।

अवतु प्रीणातु च त्वां भक्तवत्सलः ईश्वरः।
भगवान आपकी सुरक्षा करें और आप पर कृपा बनाएं रखे। नववर्ष की शुभकामना!

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु । सर्वः कामानवाप्नोतु सर्वः सर्वत्र नन्दतु ॥

अर्थ: सब लोग कठिनाइयों को पार करें, कल्याण ही कल्याण देखें, सभी की मनोकामना पूर्ण हो, सभी हर परिस्थिति में आनंदित हो।

  आशासे त्वज्जीवने नवं वर्षम् अत्युत्तमं शुभप्रदं स्वप्नसाकारकृत् कामधुग्भवतु।

मैं आशा करता हूँ कि नया वर्ष आपके जीवन में बहुत अच्छा, शुभ और सपनों को पूरा करने वाला हो।

  ब्रह्मध्वज नमस्तेऽस्तु सर्वाभीष्टफलप्रद । प्राप्तेऽस्मिन् वत्सरे नित्यं मद्गृहे मङ्गलं कुरु ॥

 हे ब्रह्मध्वज, जो सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाले हो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। इस नए वर्ष में हमेशा मेरे घर में मंगलमय वातावरण बनाए रखें।

आपृच्छस्व पुराणम् आमन्त्रयस्व च नवम् आशा-सुस्वप्न-जिगीषाभिः।नववर्षशुभाशयाः

 पुराने वर्ष  को अलविदा कहकर आशा, सपने और महत्वाकांक्षा से भरे नए वर्ष को गले लगाओ। आपको नए वर्ष की हार्दिक बधाई!

अन्य कुछ छोटे और मंगलमय वाक्य:

  नववर्षस्य शुभाशयाः। (नए वर्ष की शुभकामनाएं।)

  नववर्ष नवोत्साहं ददातु। (नया वर्ष नया उत्साह प्रदान करे।)

  नववर्ष नवहर्षम् आनयतु। (नया वर्ष नया हर्ष लाए।)

अत्यद्भुतं ते भवतु अग्रिमं वर्षम्।

आने वाला साल आपके लिए अच्छा हो! नववर्ष की शुभकामनाएं।

इन श्लोकों का उपयोग करके आप अपने प्रियजनों को नए साल की शुभकामनाएं दे सकते हैं।

इस बार महाकुंभ में भक्ति और प्रौद्योगिकी का संगम

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ 2025 आध्यात्मिकता और नवीनता का अनूठा संगम होगा, जहां अत्याधुनिक डिजिटल प्रगति साथ सनातन धर्म की पवित्र परंपराएं नजर आएंगी। दुनिया भर के लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र यह प्रतिष्ठित उत्सव, इसमें शामिल होने वाले सभी लोगों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए आधुनिक तकनीक को अपना रहा है। उच्च तकनीक सुरक्षा उपायों से लेकर डिजिटल भूमि आवंटन और स्थिर वर्चुअल रियलिटी अनुभवों सहित महाकुंभ 2025, भक्तों के विश्वास और आयोजन की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को नए तरीके से परिभाषित कर रहा है। बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं से जुड़ी व्यापक तैयारियों के साथ, महाकुंभ परंपरा और तकनीक के बीच सामंजस्य का मॉडल बनने के लिए तैयार है।

महाकुंभ में साइबर सुरक्षा

दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष साइबर सुरक्षा व्यवस्था शुरू की गई है। मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • साइबर गश्त के लिए 56 समर्पित साइबर योद्धाओं और विशेषज्ञों की तैनाती।
  • धोखाधड़ी वाली वेबसाइटों, सोशल मीडिया घोटालों और फर्जी लिंक जैसे साइबर खतरों से निपटने के लिए महाकुंभ साइबर पुलिस स्टेशन की स्थापना।
  • साइबर खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मेला क्षेत्र और कमिश्नरी दोनों में 40 वैरिएबल मैसेजिंग डिस्प्ले (वीएमडी) स्थापित किए जाएंगे।
  • हेल्पलाइन नंबर 1920 और सत्यापित सरकारी वेबसाइटों को बढ़ावा देना।

महाकुंभ नगरी में करीब 45 करोड़ श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को पूरी जानकारी देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रिंट, डिजिटल और सोशल मीडिया समेत हर प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। साइबर विशेषज्ञ ऑनलाइन खतरों पर सक्रिय रूप से नजर रख रहे हैं और एआई, फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का फायदा उठाने वाले गिरोहों की जांच कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर जन जागरूकता अभियान के लिए मोबाइल साइबर टीम भी तैनात की गई है। फिलहाल, राज्य के विशेषज्ञों की टीम ने करीब 50 संदिग्ध वेबसाइटों की पहचान की है और उनके खिलाफ कार्रवाई जारी है।

स्थिर डिजिटल अनुभव

360 डिग्री वर्चुअल रियलिटी स्टॉल

 

कुंभ 2019 से प्रेरित होकर तीर्थयात्रियों को 360 डिग्री वर्चुअल रियलिटी स्टॉल अनुभव करने  के लिए कुंभ मेला क्षेत्र में प्रमुख स्थानों पर दस स्टॉल लगाए गए हैं। इन स्टॉलों पर प्रमुख आयोजनों जैसे पेशवाई (अखाड़ों का भव्य जुलूस), शाही स्नान, गंगा आरती और आस्था तथा सद्भाव के इस भव्य उत्सव की कई विशेष फुटेज दिखाई जाएंगी।

 

बुनियादी ढांचा और भूमि डिजिटलीकरण

उत्तर प्रदेश का सबसे नया जिला महाकुंभ नगर रिकॉर्ड समय में अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ बनाया जा रहा है। भूमि आवंटन के डिजिटलीकरण में शामिल हैं:

  • “महाकुंभ भूमि एवं सुविधा आवंटन” साइट के माध्यम से भूमि एवं सुविधाओं की ऑनलाइन उपलब्धता।
  • सरकारी, सामाजिक और धार्मिक संगठनों सहित 10,000 से अधिक संस्थाओं के रिकार्डों का डिजिटलीकरण।
  • उच्च सटीकता के साथ भूमि स्थलाकृति का मानचित्रण करने के लिए मॉनसून से पहले और बाद में ड्रोन सर्वेक्षण किए गए।
  • आवेदनों का व्यापक डेटा डिजिटलीकरण और आवेदन की स्थिति तथा आवंटन की लाइव ट्रैकिंग।
  • सुविधा पर्चियों के माध्यम से समय पर सुविधा स्थापना के लिए विक्रेताओं और सरकारी विभागों के बीच स्वचालित डेटा प्रवाह।
  • प्रयागराज मेला प्राधिकरण अनुकूलित एमआईएस रिपोर्ट और संस्थान-व्यापी विश्लेषण की मदद से बिना लंबी कतारों और निजी रूप से मिले बिना समय पर भूमि और सुविधा आवंटन का काम पूरा करने में सक्षम हैं।

गूगल मैप्स पर सहज नेविगेशन के लिए आवश्यक जनता की सुविधा के लिए जीआईएस आधारित मानचित्र उपलब्ध हैं। इनमें आपातकालीन सेवाएं, पुलिस स्टेशन, चौकियां, कमांड और कंट्रोल सेंटर, अस्पताल, पार्किंग क्षेत्र, फूड कोर्ट, वेंडिंग जोन, शौचालय, पंटून पुल, सड़कें आदि शामिल हैं।

इस पारदर्शी व्यवस्था से साधु-संतों और संस्थाओं का काम बिना कतार में लगे आसानी से और तेजी से हो रहा है।

भक्तों की सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई

रिमोट-नियंत्रित जीवन रक्षक उपकरण

सुरक्षा बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर रिमोट-नियंत्रित लाइफ बॉय की तैनाती की गई है। तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले ये उपकरण पानी में किसी भी स्थान पर तेज़ी से पहुंच सकते हैं और आपातकालीन स्थिति में लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा सकते हैं।

 

पानी के नीचे ड्रोन

हाल ही में पेश किए गए अंडरवाटर ड्रोन पानी के नीचे चौबीसों घंटे निगरानी करेंगे और सभी गतिविधियों पर नज़र रखेंगे। विशेष रूप से ये ड्रोन उन्नत तकनीक से लैस हैं इसलिए लक्ष्यों की सटीक ट्रैकिंग सुनिश्चित करते हुए कम रोशनी में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं। यह अत्याधुनिक अंडरवाटर ड्रोन 100 मीटर तक गोता लगा सकता है और इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर को रियल टाइम गतिविधि रिपोर्ट भेज सकता है। इसे दूर से संचालित किया जा सकता है और यह पानी के नीचे किसी भी संदिग्ध गतिविधि या घटना के बारे में सटीक जानकारी देता है, जिससे तत्काल कार्रवाई की जा सकती है।

 

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस संचालित कैमरे

दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम में एआई-संचालित कैमरे लगाए गए हैं, साथ ही निगरानी बढ़ाने के लिए ड्रोन, एंटी-ड्रोन और टेथर्ड ड्रोन को रणनीतिक रूप से तैनात किया गया है।

 

खोया-पाया सेवाएं

पहली बार राज्य पुलिस विभाग के सहयोग से हाई-टेक खोया-पाया पंजीकरण केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों का उद्देश्य खोए हुए तीर्थयात्रियों को उनके परिवारों से फिर से मिलाना है:

  • गुमशुदा व्यक्तियों का डिजिटल पंजीकरण।
  • फेसबुक और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सार्वजनिक घोषणाएं और अपडेट।
  • लावारिस व्यक्तियों को 12 घंटे बाद पुलिस सहायता।

ठहरने की ऑनलाइन बुकिंग

महाकुंभ ग्राम में ठहरने के लिए ऑनलाइन बुकिंग 10 जनवरी से 28 फरवरी तक खुली रहेगी। आईआरसीटीसी की वेबसाइट के माध्यम से आसानी से आरक्षण किया जा सकता है, अतिरिक्त जानकारी आईआरसीटीसी और पर्यटन विभाग की वेबसाइट और महाकुंभ मोबाइल एप्लीकेशन पर उपलब्ध है।

आईआरसीटीसी के व्यापारिक साझेदारों मेक माई ट्रिप और गो आईबीबो से भी बुकिंग की जा सकती है। मेहमानों की सुरक्षा और आराम के लिए, टेंट सिटी में प्राथमिक चिकित्सा सेवाएं प्रदान की जाएंगी और सीसीटीवी कैमरों से लगातार निगरानी की जाएगी।

निष्कर्ष

महाकुंभ 2025 आध्यात्मिकता और प्रौद्योगिकी के सहज सहयोग से दिव्य और डिजिटल समागम का उन्नत आयोजन होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और उत्तर प्रदेश सरकार के निरंतर प्रयासों के फलस्वरूप यह महाकुंभ आस्था, नवाचार और वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बनेगा।

संदर्भ

https://kumbh.gov.in/

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (डीपीआईआर), उत्तर प्रदेश सरकार

महाराणा प्रताप के पूर्वजों की शौर्यगाथा

सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजाओं की सन्तान ही राजपूत लोग हैं। मेवाड़ के शासनकर्त्ता सूर्यवंशी राजपूत हैं। ये लोग सिसोंदिया कहलाते हैं; जो श्रीरामचन्द्र जी के पुत्र लव की सन्तान हैं। वाल्मीकि रामायण में आया है कि श्रीराम जी ने अपने अन्तिम समय लव को दक्षिण कौशल और कुश को उत्तरीय कौशल का राज्य दे दिया था। कर्नलटाडसाहब की राय है कि मेवाड़ के वर्तमान शासनकर्त्ता के वंश के पूर्वज राजा कनकसेन ने ही पहले पहल जननी जन्मभूमि का त्याग किया था और इसी के किसी बेटे पोते ने सौराष्ट्र और बलभीपुर में अपने राज्य की नींव डाली थी। जिस समय शिलादित्य नामक राजा बलभीपुर में राज्य करता था, उस समय इन्होंने बलभीपुर पर आक्रमण करके उसको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। युद्ध में बेचारा राजा भी काम न आया। इसकी रानी पुष्पवती गर्भवती थी। सन्तान की रक्षा के विचार से इसने एक गुफा में शरण ली। वहीं इसके गर्भ से एक पुत्ररत्न पैदा हुआ, जो गुह नाम से प्रसिद्ध हुआ। मेवाड़ के राजपूत लोग गुह के वंशधर होने के कारण गुहलौत कहलाते हैं।
बहुत समय के बाद इसी राजा गुह के वंश में नागादित्य नाम का एक राजा हुआ जिसका पुत्र बप्पारावल अपनी वीरता से सर्वत्र विख्यात हुआ। बप्पारावल की वीरता की जितनी भी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है। क्योंकि बप्पा सिर्फ चित्तौड़ के किले पर अपना झण्डा फहरा कर चुप नहीं हो बैठे थे, बल्कि अपनी अद्वितीय वीरता से इन्होंने कंधार, काश्मीर, ईराक, ईरान, तेहरान और अफगानिस्तान इत्यादि पाश्चात्य मुल्क के बादशाहों को भी जीत कर अपने आधीन कर लिया था। बप्पा रावल का असली नाम भोज था। किन्तु प्रजा इन्हें पिता के तुल्य मानती थी। यही कारण है कि वह बप्पा के नाम से विख्यात थे।
बप्पा जब चित्तौड़गढ़ के गद्दी पर बैठे तो इनकी उम्र चौदह या पन्द्रह वर्ष से अधिक न थी। अतः इन्हीं के वंशधरों के हाथ में अब तक मेवाड़ के शासन की बागडोर चली आती है। डोंगापुर, प्रतापगढ़ और बांसवाड़े पर भी अब तक इन्हीं की सन्तानों का अधिकार है। बप्पारावल की नवीं पीढ़ी में रावल खुमान बहुत ही विख्यात राजा हुए। इन्होंने खुरासान के एक आक्रमणकारी के दांत ऐसे खट्टे किए थे कि जिसे संसार देखकर चकित हो गया था। रावल खुमान के पश्चात् प्रसिद्ध राणा समरसिंह हुए। इस समय राजपूतों में आपसी अनबन और फूट की आग सुलग रही थी। जब भारतवर्ष को गुलामी की बेड़ियों में जकड़न वाले राजपूत कुलकलंक कन्नौज के राजा जयचन्द के संकेत से शहाबुद्दीन गोरी ने दिल्ली के अन्तिम हिन्दू राजा पृथ्वीराज की राजधानी दिल्ली पर आक्रमण किया था उस समय युद्ध के मैदान में राणा जी ऐसी बहादुरी से लड़े कि दुश्मन लोग भी उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सके। इनका पुत्र कल्याणसिंह यवनों से लड़ता हुआ इनकी आंखों के सामने मारा गया था। इसके बाद इन्हें महाराजा पृथ्वीराज के मारे जाने का समाचार मिल। पर यह सुनकर भी इन्होंने अपने कर्त्तव्य से मुंह न मोड़ा और युद्ध में डंटे रहे। जिधर निकल जाते उधर ही दुश्मनों को विध्वंस धराशायी कर देते थे। अन्त को आप भी इसी युद्ध में काम आये, और संसार को यह दिखा गए कि सच्चे वीर लोग किस प्रकार अपने कर्त्तव्य का पालन अन्तिम श्वास तक करते रहते हैं।
राणा समरसिंह, राजा पृथ्वीराज के बहनोई थे। इनके बात एक-एक बहुत से राणा लोग मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे। सन् १२७५ ई० में राणा लक्ष्मणसिंह गद्दी पर बैठे। उस समय वह नाबालिग थे; अतः राज्य के कठिन कार्यभार को संभालने योग्य नहीं थे और इस कारण इनके चाचा महाराणा भीमसिंह राज्य को संभालने और उचित रीति से इसका प्रबन्ध करने लगे। भीमसिंह की रानी पद्मिनी बड़ी ही रूपवती थी, साथ ही धर्मपरायण वीरांगना भी थी। अलाउद्दीन खिलजी इस समय दिल्ली का बादशाह था। इसने भी पद्मिनी की सुन्दरता का हाल सुना और अपने नापाक इरादों के कारण इसे बेगम बनाने का निश्चय किया। बस! फिर एक भारी मुगल सेना के साथ वह चित्तौड़ पर चढ़ आया। किन्तु वीर राजपूत गढ़ अपने राजा और रानी के लिए ऐसी वीरता से लड़े कि वह चित्तौड़ को विजय न कर सका। तब उसने अपनी प्रबल इच्छा जताई और कहा कि मैं एक बार रानी पद्मिनी को देख लूं। यदि मेरी बात मान ली जाएगी तो अपने लव लश्कर सहित मैं दिल्ली लौट जाऊंगा।
 भीमसिंह ने उत्तर दिया कि प्रत्यक्ष तो मैं पद्मिनी को दिखा न सकूंगा। किन्तु हां, एक आइना उसके सम्मुख इस प्रकार रख दिया जाएगा कि जिसमें से पद्मिनी का चेहरा उसे बखूबी दिखलाई दे। किन्तु वह स्वयं सामने न आयेगी, साथ ही यह भी शर्त रहेगी कि चित्तौड़ के भीतर वह केवल दो एक शरीर रक्षक के साथ आ सकता है। अलाउद्दीन ने उसकी यह बात मान ली, क्योंकि वह जानता था कि राजपूत अपनी बात के बड़े धनी होते हैं। अतः वह दो एक आदमियों के साथ किले में चला गया और आईने में से पद्मिनी का चेहरा देख लिया। महाराणा भीमसिंह, बादशाह को किले के बाहर तक पहुंचाने चले आये, किन्तु ज्योंही वह बाहर निकले त्योंही तुर्की फौज का एक बेड़ा जो अलाउद्दीन के हुक्म से जंगल में छिपा हुआ था, घात पकड़ झपट कर निकला और भीमसिंह को छल से पकड़ कर कैद कर लिया। तब अलाउद्दीन ने कहा कि जब तक पद्मिनी अपने आप मेरे पास आकर मुझसे शादी न कर लेगी मैं राजा को नहीं छोडूंगा।
पद्मिनी पहले तो कुछ डरी, किन्तु थी वह बड़ी साहसी। उसने कहा- “मालूम हुआ तुर्कों में भी अपने वचन की आन नहीं है। इन्होंने हमें धोखा दिया है। बस इसका जवाब तुर्की ब तुर्की देना ही ठीक है। इसलिए उसने कहला भेजा कि यदि बादशाह राजा को छोड़ दे तो मैं अलाउद्दीन की बेगम बनने को खुशी से चली आऊंगी। मुझे अपनी समस्त दासियां और वस्त्राभूषण बन्द पालकियों में ले जाने की आज्ञा हो इसलिए कि जिसमें तुर्क सिपाही मुझे देख न सकें।” अलाउद्दीन ने यह बात स्वीकार कर ली। अब इधर पद्मिनी की पालकी किले से बाहर निकली। हर एक का ख्याल था कि इसमें रानी पद्मिनी है, किन्तु उसके स्थान में पालकी के भीतर एक बादल नाम का राजपूत बैठा हुआ था जिसके साथ-साथ सत्तर पालकियां और भी गयीं। तुर्क समझे कि इनमें दासियां, बांदियां और आभूषण आदि हैं, लेकिन हर एक में एक-एक राजपूत सिपाही सशस्त्र तैयार बैठा हुआ था। पालकी उठाने वाले भी कहार नहीं थे, बल्कि वास्तव में हर एक वीर राजपूत सिपाही ही थे। फिर पद्मिनी के चाचा वीर गीरा ने अलाउद्दीन से निवेदन किया कि पद्मिनी अपने पति से अन्तिम मुलाकात और उससे विदा होना चाहती है।
 यह सुनकर खिलजी को प्रसन्नता हुई। उसने कहा- भीमसिंह इस खेमे में बैठा है, रानी उससे मुलाकात कर सकती है। तब पालकी खेमे में ले गए, बादल बाहर निकला और उसके साथ लाए अंगकवच को भीमसिंह ने पहन लिया। भीमसिंह झट एक घोड़े पर सवार हुए और क्षण भर में पद्मिनी के रक्षार्थ उसके पास कुशलपूर्वक पहुंच गए। इधर तुर्कों और राजपूतों में घमासान लड़ाई हुई, जिसमें थोड़े ही राजपूत जीवित वापस पहुंचे। उन जीवित राजपूतों में एक बड़ा ही शूरवीर राजपूत बादल था। फिर अलाउद्दीन ने किले पर आक्रमण किया लेकिन सफल मनोरथ न हो सका इसलिए लाचार दिल्ली चला गया। साल दो साल बाद अलाउद्दीन ने पुन: अफगानियों और तुर्कों की बड़ी भारी फौज जमा कर ली और एकदम चित्तौड़ पर चढ़ आया। भीमसिंह अपने जाति के बहुत से मनुष्यों को नगर रक्षा करने में पहले ही गंवा चुके थे। जो राजपूत बाकी बच रहे थे वह सच्चे वीर और राजभक्त तो अवश्य थे परन्तु तुर्कों की सेना का सामना करने में असमर्थ थे। छ: महीनों तक यह युद्ध चलता रहा। दिन पर दिन राजपूत वीर मातृभूमि के लिए अपना सिर बलिदान करते जाते थे। इस प्रकार इधर राजपूत घट रहे थे और उधर तुर्की सेना दिल्ली से आकर बढ़ती जाती थी।
महाराणा के बारह बेटे थे। दूसरे दिन इनमें से सबसे बड़े बेटे के सिर पर सरपेच बांधा गया। इसने तीन दिन तक राज्य किया। और चौथे दिन मारा गया। इसी प्रकार बाकी में से प्रत्येक बारी-बारी से गद्दी पर बैठे। और हरेक तीन दिन तक राज्य करते हुए तुर्की की अथाह सेना से परास्त होकर मारे गए। होते-होते ग्यारह मुकुटधारियों का प्राण विसर्जन हो चुका और सबसे छोटा भाई बाकी रह गया। तब राजा ने अपने सामन्तों को अपने पास बुला करके कहा- “अब चित्तौड़ के लिए मैं अपनी जान देता हूं। अब इस बार मेरा ही सिर रणभूमि पर गिरेगा…।” अब भीमसिंह ने इस बार छोटा सा व्यूह बड़े शूरवीर सिपाहियों का रचकर तैयार कर लिया।
अपने सबसे कनिष्ठ पुत्र को इस व्यूह का सेनानायक नियत कर लिया और कहा- “पुत्र! बस जाओ, तुर्कों से अभेद्य सेनादल को बेध कर अपना मार्ग निकाल लो। इनसे बचकर यहां से केवलगढ़ में चले जाओ और वहां मेवाड़ के राजा बनकर उस समय तक राज्य करो कि जब तक तुम में चित्तौड़ वापस लौट आने की पूरी शक्ति न आ जाये।” कुमार तो पहले जाने पर राजी नहीं हुए और कहने लगे- “नहीं पिताजी! मैं यहीं रहूंगा और शत्रु को मारकर पिता के साथ-साथ समर भूमि में प्राण गवाऊंगा।” किन्तु भीमसिंह ने न माना और कहा- क्या अपने वंश का एकबारगी नामोनिशान मिटाना चाहते हो? नहीं ऐसा कभी न होगा। पुत्र! तुम इसे कायम रखो। कुंवर ने लाचार होकर राजा की आज्ञा का पालन किया। अतः उसने और उसके साथियों ने दुश्मन की अथाह सेना को चीरते हुए अपना रास्ता साफ कर लिया। इसके बाद इसके खानदान में से एक व्यक्ति बहुत दिन के पश्चात् पुनः चित्तौड़ का राणा बनकर वापस लौट आया।

वेद हमें क्या सिखाते हैं

विश्व-कल्याण:
यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्य त्वं प्राणेना प्यायस्व ।
आ वयं प्यासिषीमहि गोभिरश्वै: प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन ।।
―(अथर्व० ७/८१/५)
भावार्थ―हे परमात्मन् ! जो हमसे वैर-विरोध रखता है और जिससे हम शत्रुता रखते हैं तू उसे भी दीर्घायु प्रदान कर। वह भी फूले-फले और हम भी समृद्धिशाली बनें। हम सब गाय, बैल, घोड़ों, पुत्र, पौत्र, पशु और धन-धान्य से भरपूर हों। सबका कल्याण हो और हमारा भी कल्याण हो।

विश्व-प्रेम:
वेद हमें घृणा करनी नहीं सिखाता। वेद तो कहता है―
उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुन: ।
उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुन: ।।
―(अथर्व० ४/१३/१)
भावार्थ―हे दिव्यगुणयुक्त विद्वान् पुरुषो ! आप नीचे गिरे हुए लोगों को ऊपर उठाओ। हे विद्वानो ! पतित व्यक्तियों को बार-बार उठाओ। हे देवो ! अपराध और पाप करनेवालों को भी ऊपर उठाओ। हे उदार पुरुषो ! जो पापाचरणरत हैं, उन्हें बार-बार उद्बुद्ध करो, उनकी आत्मज्योति को जाग्रत् करो।

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: ।
तत्र को मोह: क: शोक एकत्वमनुपश्यत: ।।
―(यजु० ४०/७)
भावार्थ―ब्रह्मज्ञान की अवस्था में जब प्राणीमात्र अपनी आत्मा के तुल्य दीखने लगते हैं तब सबमें समानता देखने वाले आत्मज्ञानी पुरुष को उस अवस्था में कौन-सा मोह और शोक रह जाता है, अर्थात् प्राणिमात्र से प्रेम करनेवाले, प्राणिमात्र को अपने समान समझनेवाले मनुष्य के सब शोक और मोह समाप्त हो जाते हैं।

अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य ।
―(अथर्व० ८/४/१५)
भावार्थ―यदि मैं प्रजा को पीड़ा देनेवाला होऊँ अथवा किसी मनुष्य के जीवन को सन्तप्त करुँ तो आज ही, अभी, इसी समय मर जाऊँ।

यथा भूमिर्मृतमना मृतान्मृतमनस्तरा ।
यथोत मम्रुषो मन एवेर्ष्योर्मृतं मन: ।।
―(अथर्व० ६/१८/२)
भावार्थ―जिस प्रकार यह भूमि जड़ है और मरे हुए मुर्दे से भी अधिक मुर्दा दिल है तथा जैसे मरे हुए मनुष्य का मन मर चुका होता है उसी प्रकार ईर्ष्या, घृणा करनेवाले व्यक्ति का मन भी मर जाता है, अत: किसी से भी घृणा नहीं करनी चाहिए।

ब्रह्म और क्षात्रशक्ति:
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरत: सह ।
तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवा: सहाग्निना ।।
―(यजु० २०/२५)
भावार्थ―जहाँ, जिस राष्ट्र में, जिस लोक में, जिस देश में, जिस स्थान पर, ज्ञान और बल, ब्रह्मशक्ति और क्षात्रशक्ति, ब्रह्मतेज और क्षात्रतेज संयुक्त होकर साथ-साथ चलते हैं तथा जहाँ देवजन=नागरिक राष्ट्रोन्नति की भावनाओं से भरपूर होते हैं, मैं उस लोक अथवा राष्ट्र को पवित्र और उत्कृष्ट मानता हूँ।

चरित्र-निर्माण:
प्र पदोऽव नेनिग्धि दुश्चरितं यच्चचार शुद्धै: शपैरा क्रमतां प्रजानन् ।
तीर्त्वा तमांसि बहुधा विपश्यन्नजो नाकमा क्रमतां तृतीयम् ।।
―(अथर्व० ९/५/३)
भावार्थ―हे मनुष्य ! तूने जो दुष्ट आचरण किये हैं उन दुष्ट आचरणों को अच्छी प्रकार दो डाल। फिर शुद्ध निर्मल आचरण से ज्ञानवान् होकर आगे बढ़। पुन: अनेक प्रकार के पापों और अन्धकारों को पार करके ध्यान एवं योग-समाधि द्वारा अजन्मा ब्रह्म के दर्शन करता हुआ शोक और मोह आदि से पार होकर परम आनन्दमय मोक्षपद पर आरुढ़ हो।

प्रभु-प्रेम:
महे चन त्वामद्रिव: परा शुल्काय देयाम् ।
न सहस्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामघ ।।
―(ऋ० ८/१/५)
भावार्थ―हे अविनाशी परमात्मन् ! बड़े-से-बड़े मूल्य व आर्थिकलाभ के लिए भी मैं कभी तेरा परित्याग न करुँ। हे शक्तिशालिन् ! हे ऐश्वर्यों के स्वामिन् ! मैं तुझे सहस्र के लिए भी न त्यागूँ, दस सहस्र के लिए भी न बेचूँ और अपरमित धनराशि के लिए भी तेरा त्याग न करुँ।

सुपथ-गमन:

मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिन: ।
मान्य स्थुर्नो अरातय: ।।
―(अथर्व० १३/१/५९)
भावार्थ―हे इन्द्र ! परमेश्वर ! हम अपने पथ से कभी विचलित न हों। शान्तिदायक श्रेष्ठ कर्मों से हम कभी च्युत न हों। काम, क्रोध आदि शत्रु हमपर कभी आक्रमण न करें।

मधुर-भाषण:
वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषम् ।
―(अथर्व० ५/७/४)
हम अतिप्रिय और मीठी वाणी बोलें।

होतरसि भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुष: सूक्तवाकाय सूक्ता ब्रूहि ।
―(यजु० २१/६१) भावार्थ―हे विद्वन् ! उपदेष्ट: ! तू कल्याणकारी उपदेश के लिए भेजा गया है। तू मननशील मनुष्य बनकर भद्रपुरुषों के लिए उत्तम उपदेश कर।

दिव्य-भावना:
यो न: कश्चिद्रिरिक्षति रक्षस्त्वेन मर्त्य: ।
स्वै: ष एवै रिरिषीष्ट युर्जन: ।।
―(ऋ० ८/१८/१३)
भावार्थ―जो मनुष्य अपने हिंसक स्वभाव के वशीभूत होकर हमें मारना चाहता है वह दु:खदायी जन अपने ही आचरणों से―अपनी टेढ़ी चाल और बुरे स्वभाव से स्वयं ही मर जाता है, फिर मैं किसी को क्यों मारूँ।

प्रस्तुतकर्ता: भूपेश आर्य
साभार: ‘वैदिक उद्यात भावनाएँ’ (स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती)

भारत में तेज गति से बढ़ती नवधनाढ्यों की संख्या

भारत में आर्थिक प्रगति की दर लगातार तेज होती दिखाई दे रही है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर भी अन्य देशों की तुलना में द्रुत गति से आगे बढ़ रही है। भारत आज विश्व की सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है एवं भारतीय अर्थव्यवस्था आज विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था है तथा शीघ्र ही विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। भारत का वैश्विक व्यापार भी द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है। कुल मिलाकर, भारत आज अर्थ के क्षेत्र में पूरे विश्व में एक चमकते सितारे के रूप उभर रहा है।लगातार तेज तो रही आर्थिक प्रगति का प्रभाव अब भारत में नागरिकों की औसत आय में हो रही वृद्धि के रूप में भी दिखाई देने लगा है।

हाल ही में अमेरिका में जारी की गई यूबीएस बिल्यनेर ऐम्बिशन रिपोर्ट के अनुसार भारत में बिलिनायर (अतिधनाडयों) की संख्या 185 तक पहुंच गई है और भारत विश्व में बिलिनायर की संख्या की दृष्टि से तृतीय स्थान पर आ गया है। प्रथम स्थान पर अमेरिका है, जहां बिलिनायर की संख्या 835 हैं एवं द्वितीय स्थान पर चीन है जहां बिलिनायर की संख्या 427 है। इस वर्ष भारत और अमेरिका में जहां बिलिनायर की संख्या में वृद्धि हुई है वहीं चीन में बिलिनायर की संख्या में कमी आई है। अमेरिका में इस वर्ष बिलिनायर की सूची में 84 नए बिलिनायर जुड़े हैं एवं भारत में 32 नए बिलिनायर (21 प्रतिशत की वृद्धि के साथ) जुड़े हैं तो वहीं चीन में 93 बिलिनायर कम हुए हैं। पूरे विश्व में आज बिलिनायर की कुल संख्या 2682 तक पहुंच गई है जबकि वर्ष 2015 में पूरे विश्व में 1757 बिलिनायर थे। भारत में वर्ष 2015 की तुलना में बिलिनायर की संख्या में 123 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। बिलिनायर अर्थात वह नागरिक जिसकी सम्पत्ति 100 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गई है अर्थात भारतीय रुपए में लगभग 8,400 करोड़ रुपए की राशि से अधिक की सम्पत्ति।

पिछले एक वर्ष के दौरान भारत में उक्त वर्णित बिलिनायर की सम्पत्ति 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 9,560 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई हैं। जबकि अमेरिका में बिलिनायर की सम्पत्ति वर्ष 2023 में 4 लाख 60 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024 में 5 लाख 80 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। चीन में तो बिलिनायर की सम्पत्ति वर्ष 2023 में एक लाख 80 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर से घटकर वर्ष 2024 में एक लाख 40 हजार करोड़ अमेरिकी डॉलर की हो गई है। पूरे विश्व में बिलिनायर की सम्पत्ति बढ़कर 14 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई है। उक्त प्रतिवेदन में यह सम्भावना भी व्यक्त की गई है कि आगे आने वाले 10 वर्षों में भारत में बिलिनायर की संख्या में और तेज गति से वृद्धि होगी। भारत में 108 से अधिक पारिवारिक व्यवसाय में संलग्न परिवार भी हैं जो अपने व्यवसाय को भारतीय पारिवारिक परम्परा के अनुसार आगे बढ़ा रहे हैं और भारत में बिलिनायर की संख्या में वृद्धि एवं भारतीय अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे रहे हैं।

भारतीय बिलिनायर की संख्या केवल भारत में ही नहीं बढ़ रही है बल्कि अन्य देशों में निवास कर रहे भारतीय भी बिलिनायर की श्रेणी में शामिल हो रहे हैं एवं वे अपनी आय के कुछ हिस्से को भारत में भेजकर यहां निवेश कर रहे हैं और इस प्रकार अन्य देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिक भी भारत के आर्थिक विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। विशेष रूप से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को द्रुत गति से बढ़ाने में भारतीय मूल के इन नागरिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहता आया है। इस समय भारतीय मूल के एक करोड़ 80 लाख से अधिक नागरिक विभिन्न देशों में कार्य कर रहे हैं एवं प्रतिवर्ष वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा भारत में जमा के रूप से भेजते हैं। हाल ही में वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी किए गए एक प्रतिवेदन में यह बताया गया है कि वर्ष 2024 में 12,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर की भारी भरकम राशि अन्य देशों में रह रहे भारतीयों द्वारा भारत में भेजी गई है। भारत पिछले कई वर्षों से इस दृष्टि पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर कायम है। वर्ष 2021 में 10,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर, वर्ष 2022 में 11,100 करोड़ अमेरिकी डॉलर, वर्ष 2023 में 12,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारत में भेजी गई थी। प्रतिवर्ष भारत में भेजी जाने वाली राशि की तुलना यदि अन्य देशों में भेजी जा रही राशि से करें तो ध्यान में आता है कि वर्ष 2024 में मेक्सिको में 6,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भेजी गई थी, जिसे पूरे विश्व में इस दृष्टि से द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। मेक्सिको में भेजी गई राशि भारत में भेजी गई राशि की तुलना में लगभग आधी है। चीन को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ है एवं चीन में 4,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भेजी गई है, फ़िलिपीन में 4,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं पाकिस्तान में 3,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि अन्य देशों में रह रहे इन देशों के नागरिकों द्वारा भेजी गई है।

भारत में भारतीय नागरिकों द्वारा अन्य देशों से भेजी जा रही राशि में उत्तरी अमेरिका, यूरोप, खाड़ी के देशों एवं एशिया के कुछ देशों यथा मलेशिया एवं सिंगापुर का प्रमुख योगदान है। जैसा कि विदित ही है कि प्रतिवर्ष भारत से लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने की दृष्टि से विकसित देशों की ओर जाते हैं। उच्च एवं तकनीकी  शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भारतीय युवा इन देशों में ही रोजगार प्राप्त कर लेते हैं एवं अपनी बचत की राशि का बड़ा भाग भारत में भेज देते हैं। आज तक भारतीय मूल के इन नागरिकों द्वारा एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारत में भेजी गई है। भारत के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के संग्रहण में यह राशि बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है। वर्ष 2024 में पूरे विश्व में 68,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि विभिन्न देशों के नागरिकों द्वारा अपने अपने देशों को भेजी गई है। यह राशि वर्ष 2023 में भेजी गई राशि से 5.8 प्रतिशत अधिक है। पूरे विश्व में विभिन्न देशों में निवास कर रहे नागरिकों द्वारा भेजी गई उक्त राशि में से 20 प्रतिशत से अधिक की राशि अन्य देशों में निवास कर रहे भारतीयों द्वारा ही अकेले भारत में भेजी गई है। इस प्रकार, भारतीय मूल के नागरिकों की सम्पत्ति न केवल भारत में बल्कि अन्य देशों में भी बहुत तेजी के साथ बढ़ रही है।

प्रहलाद सबनानी
सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

दो दिवसीय सम्मान और राष्ट्रीय बाल साहित्यकार समारोह नाथद्वारा में 5 एवं 6 जनवरी को

कोटा / नाथद्वारा/ साहित्य मंडल नाथद्वारा की ओर से दो दिवसीय सम्मान और राष्ट्रीय बाल साहित्यकार समारोह नाथद्वारा में 5 एवं 6 जनवरी को आयोजित किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए साहित्य मंडल के प्रधानमंत्री श्याम प्रकाश देवपुरा ने बताया कि  मंडल के संस्थापक हिंदी भाषा सेनानी और बाल साहित्य रचनाकार स्व. भगवतीप्रसाद देवपुरा की स्मृति में आयोजित समारोह में राजस्थान सहित 9 राज्यों के 81 हिंदी साहित्य सेवियों को मानद उपाधियों से सम्मानित किया जाएगा। उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा कुछ साहित्यकारों को पुरस्कृत भी किया जाएगा।
संस्था के पदाधिकारी अनिरुद्ध देवपुरा ने बताया कि समारोह में उद्घाटन सत्र में स्व. भगवती प्रसाद देवपुरा के कृतित्व और व्यक्तित्व के साथ साहित्यिक योगदान पर व्याख्यान आयोजित किए जाएंगे। बाल साहित्य परिचर्चा में 9 साहित्यिक विद्वान बाल साहित्य आलेख वाचन करेंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी आयोजित किए जाएंगे। उत्तरप्रदेश के लखनऊ निवासी सुश्री सुकलता त्रिपाठी को काव्य मर्मज्ञ की मानद उपाधि के साथ इक्कावन सो रुपए राशि का पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।
 सम्मानित होने वाले बाल साहित्यकार :
बाल साहित्यकारों में बाल साहित्य भूषण की मानद उपाधि से राजस्थान से बसंती पंवार, जेबा रशीद, मधु माहेश्वरी, नीना छिब्बर, विमला नागला, हेमलता दाधीच, सीमा जोशी मुथा, तृप्ति गोस्वामी, विमला महारिया मौज, मीनाक्षी पारीक, पारस जैन, विष्णु शर्मा हरिहर, नरेंद्र निर्मल, कृष्ण बिहारी पाठक, भारत दोषी, विनोद कुमार शर्मा, विजय कुमार शर्मा, पुनीत रंगा, महेश पंचोली एवं यशपाल शर्मा पहुंना सम्मानित किए जाएंगे। उत्तरप्रदेश से देवी प्रसाद गौड़, अरविंद कुमार दुबे, हरीलाल मिलन, उदयनारायण उदय, प्रदीप अवस्थी, राजकुमार सवान, कर्नल प्रवीण कुमार त्रिपाठी, मीनू त्रिपाठी, रजनीकांत शुल्क, महेश कुमार मधुकर, कमलेंद्र कुमार, श्याम मोहन मिश्र, हरियाणा से ज्ञान प्रकाश पीयूष और मध्य प्रदेश से श्याम सुंदर श्रीवास्तव सम्मानित होंगे।
सम्मानित होने वाले साहित्यकार :
साहित्य कुसुमाकर उपाधि से मुंबई के डॉ. शारदा प्रसाद दुबे, कोटा से डॉ. क्षमा चतुर्वेदी और कानपुर से हरी बाणी, साहित्य सौरभ उपाधि से जोधपुर से डॉ. चांद कौर जोशी, उदयपुर से डॉ. रक्षा गोदावत एवं अजमेर से सुरेश कुमार श्रीचंदानी, काव्य कौस्तुभ उपाधि से जयपुर से सरोज गुप्ता, ग्वालियर से अमरसिंह यादव, आगरा से मुकेश कुमार ऋषि, बीकानेर से पूर्णिमा मिश्रा, काव्य कुसुम उपाधि से इंदौर से जय बजाज, भीलवाड़ा से शिखा अग्रवाल, जोधपुर से अंजू शर्मा जांगिड़, पत्रकार श्री उपाधि से बीकानेर के उमाशंकर व्यास, उदयपुर से राजेश वर्मा, लोक कला मर्मज्ञ उपाधि से नागौर के हिदायत ख़ां , साहित्य सुधाकर – काव्य कलाधर उपाधि से रोसड़ा – समस्तीपुर बिहार से डॉ. प्रफुल्ल चन्द ठाकुर, मिर्जापुर से आनंद प्रजापति, जमशेदपुर से डॉ. रागिनी भूषण, कच्छ से डॉ. संगीता पाल, बरेली से सुश्री एंजेल गांधी, मिर्जापुर से सुश्री सृष्टिराज , बाल साहित्य भूषण से बिजनौर के डॉ. अजय जनमेजय, प्रतापगढ़ उत्तरप्रदेश से डॉ. दयाराम मौर्य, रायबरेली से डॉ. अरविंद कुमार साहू, वाराणसी से गौतमचंद अरोड़ा को सम्मानित किया जाएगा।
   इनके साथ – साथ दिल्ली से विमला रस्तोगी एवं अनिल कुमार जायसवाल, दरभंगा बिहार से डॉ. सतीशचंद भगत, बक्सर डॉ. मीरा सिंह,नागपुर से शशि पुरवार, अजमेर से डॉ. शैलजा माहेश्वरी, दुर्ग छत्तीसगढ़ से बलदाऊ राम साहू, भाटापाड़ा छत्तीसगढ़ से कन्हैया साहू, कोटा से डॉ. नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी, अहमदाबाद से श्याम पटल पाण्डेय, अजमेर से गोविंद भारद्वाज, हनुमानगढ़ से दीनदयाल शर्मा, लुधियाना से डॉ. ककीरचंद शुक्ल, बाड़मेर से डॉ. बंशीधर तातेड, गाडरवाड़ा मध्यप्रदेश से विजय बेशर्म, जबलपुर से वंदना सोनी, रुद्र प्रयाग से कालिकप्रसाद सेमवाल तथा विमल इनानी को सम्मानित किया जाएगा।

एचबीओ के संस्थापक चार्ल्स डोलन नहीं रहे

होम बॉक्स ऑफिस (HBO) और केबलविजन सिस्टम्स कॉर्प के संस्थापक चार्ल्स डोलन का 98 वर्ष की आयु में  अमरीका में  निधन हो गया।  डोलन अपने अंतिम समय में अपने परिवार और प्रियजनों के बीच थे।

चार्ल्स डोलन को केबल टीवी की दुनिया में क्रांति लाने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने 1972 में HBO की स्थापना की और 1973 में केबलविजन सिस्टम्स कॉर्प की शुरुआत की, जिसे उन्होंने अमेरिका की पांचवीं सबसे बड़ी केबल कंपनी बनाया। उनकी दूरदर्शी सोच और साहसिक फैसलों ने उन्हें इंडस्ट्री में अद्वितीय स्थान दिलाया। उन्होंने 1984 में अमेरिकन मूवी क्लासिक्स (AMC) और 24 घंटे का स्थानीय न्यूज चैनल न्यूज12 भी शुरू किया।

चार्ल्स डोलन अपने साहसिक फैसलों के लिए जाने जाते थे। उन्होंने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन, नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन की निक्स, और नेशनल हॉकी लीग की रेंजर्स जैसी प्रतिष्ठित संपत्तियों पर नियंत्रण हासिल कर अपने प्रतिस्पर्धियों को मात दी। 1995 में उन्होंने अपने बेटे जेम्स को केबलविजन का सीईओ बनाया, जबकि वह खुद चेयरमैन बने रहे।

चार्ल्स फ्रांसिस डोलन का जन्म 16 अक्टूबर 1926 को क्लीवलैंड, अमेरिका में हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह अमेरिकी एयरफोर्स में शामिल हुए। युद्ध के बाद उन्होंने जॉन कैरोल यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, जहां उनकी मुलाकात हेलेन बर्गेस से हुई और बाद में दोनों ने शादी कर ली। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बजाय अपना व्यवसाय शुरू किया, जिसमें शुरुआती असफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और नए बिजनेस आइडिया के साथ आगे बढ़ते रहे।

चार्ल्स डोलन ने अपने करियर में कई महत्वपूर्ण पहल कीं। 1965 में उन्होंने न्यूयॉर्क में पहली केबल फ्रेंचाइज़ी जीती। बाद में उन्होंने HBO पे-टीवी सर्विस को आगे बढ़ाया और लांग आइलैंड में केबल फ्रेंचाइज़ी खरीदी। 1980 में ब्रावो केबल-टीवी नेटवर्क की शुरुआत की और 1984 में AMC और मचम्यूजिक यूएसए जैसे नेटवर्क्स लाए।

डोलन का एक बड़ा परिवार है। उनकी पत्नी हेलेन और छह बच्चे – कैथलीन, मैरिएन, डेबोरा, थॉमस, पैट्रिक और जेम्स। पैट्रिक न्यूज12 नेटवर्क के चेयरमैन हैं और जेम्स मैडिसन स्क्वायर गार्डन कंपनी के चेयरमैन हैं।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वीडियो प्रोडक्शन और मार्केटिंग के क्षेत्र में की। शुरुआती दिनों में, डोलन ने ‘Sterling Communications’ नामक कंपनी बनाई, जो न्यूयॉर्क में केबल टेलीविजन सेवाएं प्रदान करती थी। 1971 में, डोलन ने “होम बॉक्स ऑफिस (HBO)” की स्थापना की।  एचबीओ पहला ऐसा नेटवर्क बना जो सब्सक्रिप्शन बेस्ड सेवा प्रदान करता था। उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई, जहां प्रीमियम कंटेंट जैसे फिल्में और स्पोर्ट्स इवेंट दर्शकों को सीधे उनके घरों तक पहुंचाए गए।

एचबीओ ने मनोरंजन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छुआ और इसे टेलीविजन की दुनिया में सबसे प्रभावशाली नेटवर्क्स में से एक बना दिया। चार्ल्स डोलन ने यह साबित किया कि लोग विज्ञापनों से मुक्त प्रीमियम कंटेंट के लिए पैसा देने को तैयार हैं।

डोलन ने केवल एचबीओ ही नहीं, बल्कि कई अन्य मीडिया और केबल कंपनियों को भी स्थापित किया। उनकी कंपनी Cablevision अमेरिका की सबसे बड़ी केबल सेवा प्रदाताओं में से एक रही है।  उनके परिवार ने न्यूयॉर्क के खेल और मनोरंजन उद्योग में भी बड़ा योगदान दिया है।

शृंगार रस के कवि पण्डित राम नारायण चतुर्वेदी

पंडित राम नारायण चतुर्वेदी का जन्म बैसाख कृष्ण 12, संवत् 1944 विक्रमी को उत्तर प्रदेश के सन्त कबीर नगर के हैसर बाजार-धनघटा नगर पंचायत के ग्राम सभा मलौली में हुआ था। यह क्षेत्र इस समय वार्ड नंबर 6 में आता है। जो पूरे नगर पंचायत क्षेत्र के बीचोबीच स्थित है। यह एक प्रसिद्ध चौराहा भी है जो राम जानकी रोड पर है । इनके पिता पंडित कृष्ण सेवक चतुर्वेदी जी थे। यह बस्ती मण्डल का एक उच्च कोटि का कवि कुल घराना रहा है। पंडित कृष्ण सेवक चतुर्वेदी के छः पुत्र थे – प्रभाकर प्रसाद, भास्कर प्रसाद, हर नारायण, श्री नारायण, सूर्य नारायण और राम नारायण। इनमें भास्कर प्रसाद , श्री नारायण और राम नारायण उच्च कोटि के छंदकार हो चुके हैं। पंडित राम नारायण जी का रंग परिषद में भी बड़ा आदर और सम्मान हुआ करता था। घनाक्षरी और सवैया छंदों की दीक्षा उन्हें रंगपाल जी से मिली थी। वे भास्कर प्रसाद चतुर्वेदी श्री नारायण चतुर्वेदी और राम नारायण चतुर्वेदी के भाई थे। राम नारायण की शिक्षा घर पर ही हुई थी। इनके चार पुत्र बांके बिहारी, ब्रज बिहारी, वृन्दावन बिहारी और शारदा शरण थे। जिनमें ब्रज बिहारी ब्रजेश और शारदा शरण मौलिक अच्छे कवि रहे।

पंडित राम नारायण जी अंग्रेजी राज्य में असेसर (फौजदारी मामलों में जज / मजिस्ट्रेट को सलाह देने के लिए चुना गया व्यक्ति) के पद पर कार्य कर रहे थे। एक बार असेसर पद पर कार्य करते हुए उन्होंने ये छंद लिखा था जिस पर जज साहब बहुत खुश हुए थे –

दण्ड विना अपराधी बचें कोऊ,

दोष बड़ों न मनु स्मृति मानी।

दण्ड विना अपराध लहे कोऊ,

सो नृप को बड़ा दोष बखानी।

राम नारायण देत हैं राय,

असेसर हवै निर्भीक है बानी।

न्याय निधान सुजान सुने,

वह केस पुलिस की झूठी कहानी।।

ब्रज भाषा और शृंगार रस

कवि राम नारायण जी ब्रज भाषा के शृंगार रस के सिद्धस्थ कवि थे। सुदृढ़ पारिवारिक पृष्ठभूमि और रंगपाल जी का साहश्चर्य से उनमें काव्य कला की प्रतिभा खूब निखरी है। उनका अभीष्ट विषय राधा- कृष्ण के अलौकिक प्रेम को ही अंगीकार किया है। शृंगार की अनुपम छटा उन्मुक्त वातावरण में इस छंद में देखा जा सकता है। एक छंद द्रष्टव्य है –

कौन तू नवेली अलबेली है अकेली बाल,

फिरौ न सहेली संग है मतंग चलिया।

फूले मुख कंज मंजुता में मुख नैन कंज,

मानो सरकंज द्दव विराजे कंज कलिया।

करकंज कुचकंज कंजही चरण अरु

वरन सुकन्ज मंजु भूली कुंज अलियां।

तेरे तनु कंज पुंज मंजुल परागन के,

गंध ते निकुजन की महक उठी गालियां।।

घनाक्षरी का नाद-सौष्ठव

सुकवि राम नारायण की एक घनाक्षरी का नाद सौष्ठव इस छंद में देखा जा सकता है-

मंद मुस्काती मदमाती चली जाती कछु,

नूपुर बजाती पग झननि- झननि- झन ।

कर घट उर घट मुख ससीलट मंजु,

पटु का उडावै वायु सनन- सनन- सन।

आये श्याम बोले वाम बावरी तु बाबरी पै,

खोजत तुम्हें हैं हम बनन- बनन- बन।

पटग है झट गिरे घट-खट सीढ़िन पै,

शब्द भयो मंजु अति टनन-टनन- टन।।

वैद्यक शास्त्रज्ञ

सुकवि राम नारायण जी कविता के साथ साथ वैद्यक शास्त्र के भी ज्ञाता थे। उनके द्वारा रचित आवले की रसायन पर एक छंद इस प्रकार देखा जा सकता है –

एक प्रस्त आमले की गुठली निकल लीजै,

गूदा को सुखाय ताहि चूरन बनाइए।

वार एक बीस लाइ आमला सरस पुनि,

माटी के पात्र ढालि पुट करवाइए।

अन्त में सुखाद फेरि चुरन बनाई तासु,

सम सित घृत मधु असम मिलाइये।

चहत जवानी जो पै बहुरि बुढ़ापा माँहि,

दूध अनुपात सो रसायन को खाइये।।

ज्योतिष के मर्मज्ञ

सुकवि राम नारायण जी को कविता , वैद्यकशास्त्र के साथ साथ ज्योतिष पर भी पूरा कमांड था। उनके द्वारा रचित एक छंद नमूना स्वरूप देखा जा सकता है-

कर्क राशि चन्द्र गुरु लग्न में विराजमान,

रूप है अनूप काम कोटि को लजावती।

तुला के शनि सुख के समय बनवास दीन्हैं

रिपु राहु रावन से रिपुवो नसावाहि।

मकर के भौम नारि विरह कराये भूरि,

बुध शुक्र भाग्य धर्म भाग्य को बढ़ावहीं ।

मेष रवि राज योग रवि के समान तेज,

राम कवि राज जन्म पत्रिका प्रभावहीं।।

ब्रजभाषा की प्रधानता

इस परम्परागत कवि से तत्कालीन रईसी परम्परा में काव्य प्रेमी रीतिकालीन शृंगार रस की कविता को सुन-सुन कर आनंद लिया करते थे। कवि राम नारायण भोजपुरी क्षेत्र में जन्म लेने के बावजूद भी ब्रजभाषा में ही कविता किया करते थे। उनका रूप-सौंदर्य और नख-सिख वर्णन परंपरागत हुआ करता था। उन्होंने पर्याप्त छंद लिख रखें थे पर वे उसे संजो नहीं सके। कविवर ब्रजेश जी के अनुसार पंडित रामनारायण जी चैत कृष्ण नवमी सम्बत 2011 विक्रमी को अपना पंच भौतिक शरीर को छोड़े थे ।

बस्ती के छंदकार शोध ग्रन्थ के भाग 1 के पृष्ठ 122 से 126 पर स्मृतिशेष डॉक्टर मुनि लाल उपाध्याय ‘सरस’ जी ने पंडित राम नारायण जी के जीवन वृत्त और कविता कौशल पर विस्तार से चर्चा किया है।

लेखक परिचय

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम-सामयिक विषयों, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। मोबाइल नंबर +91 8630778321, वर्डसैप्प नम्बर+ 91 9412300183)

प्राचीन भारतीय खेल साँप सीढ़ी

भारत मे ‘सांप सीढी’ और विश्व मे ‘स्नेक अँड लेडर्स’ इस नाम से प्रसिद्ध इस खेल की खोज भारत मे ही हुई है। इसका पहले का नाम ‘मोक्ष पट’ था. तेरहवी सदी मे संत ज्ञानेश्वर जी (वर्ष 1272 – वर्ष 1296) ने इस खेल का निर्माण किया।

ऐसा कहा जाता है की संत ज्ञानेश्वर और उनके बडे भाई संत निवृत्तीनाथ, भिक्षा मांगने के लिये जब जाते थे, तब घर मे उनके छोटे भाई सोपानदेव और बहन मुक्ताई के मनोरंजन के लिए, संत ज्ञानेश्वर जी ने यह खेल तैयार किया।

इस खेल के माध्यम से छोटे बच्चों पर अच्छे संस्कार होने चाहिए, उन्हे ‘क्या अच्छा, क्या बुरा’ यह अच्छी तरह से समझ मे आना चाहिए, यह इस मोक्षपट की कल्पना थी। सामान्य लोगों तक, सरल पध्दति से अध्यात्म की संकल्पना पहुंचे, इस हेतू से इस खेल की रचना की गई है।

साप यह दुर्गुणोंका और सीढी यह सद्गुणोंका प्रतीक माना गया। इन प्रतिकों के माध्यम से बच्चों पर संस्कार करने के लिए इस खेल का उपयोग किया जाता था।

प्रारंभ मे, मोक्षपट यह खेल 250 चौकोन के साथ खेला जाता था। बाद मे मोक्षपट का यह पट, 20×20 इंच के आकार मे आने लगा। इसमे पचास चौकोन थे। इस खेल के लिए 6 कौडीयां आवश्यक थी। यह खेल याने मनुष्य की जीवन यात्रा थी।

डेन्मार्क के प्रोफेसर जेकब ने ‘भारतीय संस्कृती परंपरा’ इस परियोजना के अंतर्गत मोक्षपट पर बहुत रिसर्च किया है। प्रोफेसर जेकब ने कोपनहेगन विश्वविद्यालय से ‘इंडोलॉजी’ इस विषय पर डॉक्टरेट की है। प्राचीन मोक्षपट इकठ्ठा करने के लिए उन्होने ने पूरे भारत का भ्रमण किया। अनेक मोक्षपट का उन्होने संग्रह किया। कुछ जगह पर इसी को ‘ज्ञानचोपड’ कहा जाता था। प्रोफेसर जेकब को प्रख्यात शोधकर्ता और मराठी साहित्यिक रा. चिं. ढेरे के पांडुलिपियों के संग्रह मे दो प्राचीन मोक्षपट मिले। इन मोक्षपट में 100 चौकोन थे। इसमे पहला घर जन्म का और अंतिम घर मोक्ष का होता था। इसमे 12 वा चौकोन यह विश्वास का या आस्था का होता था। 51वां घर विश्वसनीयता का, 57 वा शौर्य का, 76 वा ज्ञान का और 78वा चौकोन तपस्या का होता था। इनमे से किसी भी चौकोन मे पहुंचने वाले खिलाडी को सीढी मिलती थी, और वह खिलाडी उपर चढता था।

इसी प्रकार सांप जिस चौकोन मे रहते थे, वह चौकोन दुर्गुणों का प्रतिनिधित्व करते थे। 44 वा चौकोन अहंकार का, 49 वा चौकोन चंचलता का, 58 वा चौकोन झूठ बोलने का, 84 वा चौकोन क्रोध के लिए और 99 वा चौकोन वासना का रहता था। इन चौकोनो मे जो खिलाडी आते थे, उनका पतन निश्चित था।

भारत में रामदासी मोक्षपट, वारकरी मोक्षपट, (ज्ञानेश्वर जी का मोक्षपट, गुलाबराव महाराज का मोक्षपट) आदी प्रचलित थे. रामदासी मोक्षपट मे  38 सीढीयां और 53 सांप थे। समर्थ रामदासजीने राम कथा को संस्कार रूप से बच्चों तक पहुंचाने के लिए इसका उपयोग किया।

1892 मे यह खेल इंग्लंड मे गया। वहां से युरोप में ‘स्नॅक अँड लेडर्स’ इस नाम से लोकप्रिय हुआ। अमेरिका मे यह खेल, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, वर्ष 1943 मे पहुंचा। वहां इसे ‘शूट अँड लैडर्स’ कहते है।

ताश
सामान्यतः यह माना जाता है की, दुनिया मे बडे पैमाने पर खेले जाने वाले पत्तों के (ताश / कार्ड) खेल का उद्गम, नवमी सदी मे चीन मे हुआ है। गुगल, विकिपीडिया सब जगह यही उत्तर मिलता है। लेकिन यह सच नही है। भारत में प्राचीन काल से पत्तों का खेल खेला जा रहा है। केवल इसका नाम अलग था. इसका नाम था ‘क्रीडापत्रम’..!

भारत मे जो मौखिक / वाचिक इतिहास चलता आ रहा है, उसके अनुसार साधारणतः देढ हजार वर्ष पूर्व, भारत मे राजे रजवाडो मे, उनके राज प्रासादोंमे ‘क्रीडापत्रम’ यह खेल खेला जाता था।

‘A Philomath’s Journal’ के 30 नवंबर 2015 के अंक मे एक लेख आया है – ‘Popular Games and Sports that Originated in Ancient India’। इस लंबे-चौड़े लेख मे ठोस रूप से यह बताया गया है कि, ‘क्रीडापत्रम’ इस नाम से पत्तों का खेल, भारत मे बहुत पहले से था। इस का अर्थ है, ‘भारत ही पत्तों के (ताश के) खेल का उद्गम देश है’।

मुगल कालीन इतिहासकार अबुल फजल ने इस खेल के संबंध में जो जानकारी लिखकर रखी है, उसके अनुसार पत्तों का यह खेल भारतीय ऋषीओंने बनाया है। उन्होने 12 यह आकडा रखा। हर पैक मे बारा पत्ते रहते थे। राजा और उसके 11 सहयोगी, ऐसे 12 सेट. अर्थात 144 पत्ते। लेकिन आगे चलकर मुगलो ने जब इस खेल को ‘गंजीफा’ के रूप मे स्वीकार किया, तब उन्होने 12 आंकडा तो वैसा ही रखा, लेकिन ऐसे 12 पत्तों के आठ सेट तैयार किये। अर्थात गंजीफा खेल के कुल पत्ते हुए 96।

मुगलों के पहले के जो ‘क्रीडापत्रम’ मिले है, वे अष्टदिशाओं के प्रतीक के रूप मे आठ सेटो मे थे। कही – कही 9 सेट थे, जो नवग्रहों का प्रतिनिधित्व करते थे। श्री विष्णू के दस अवतारों के प्रतीक के रूप मे 12 पत्तों के दस सेट भी खेल मे दिखते है। मुगल पूर्व काल के सबसे अधिक पत्तों के सेट, ओरिसा मे मिले है।

पहले के यह पत्ते गोल आकार मे रहते थे। राज दरबार के नामांकित चित्रकार उस पर नक्काशी करते थे। ये सब पत्ते हाथों से तैयार किये हुए, परंपरागत शैली मे होते थे।

शतरंज, लूडो, साप सीढी, पत्ते (ताश) यह सब बैठकर खेलने वाले खेल है. अंग्रेजी में इसे ‘बोर्ड गेम’ या ‘इनडोअर गेम’ कहा जाता है. विश्व में यह खेल सभी आयु के लोगों मे प्रिय है। हमारे लिए गर्व की बात है कि, ये सब खेल भारत ने दुनिया को दिये हैं..!


(क्रमशः)
–   प्रशांत पोळ – जाने माने लेखक हैं और भारत के ऐतिहासिक, राजनीतिक व साँस्कृतिक इतिहास पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं, इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है)
(आगामी ‘भारतीय ज्ञान का खजाना – भाग 2’ इस पुस्तक के अंश)

…और जतिन बन गया राजेश खन्ना

ये कहानी तब की है जब राजेश खन्ना कोई फिल्मस्टार नहीं, कॉलेज स्टूडेंट हुआ करते थे। तब वो राजेश खन्ना भी नहीं, जतिन खन्ना थे। उनका एक कॉलेज फ्रेंड एक ड्रामा कंपनी से जुड़ा था, जिसका नाम था आईएनटी ड्रामा कंपनी। उस ड्रामा कंपनी के डायरेक्टर थे वी.के.शर्मा। मशहूर लेखक व डायरेक्टर सागर सरहदी भी तब उसी ग्रुप का हिस्सा थे। राजेश खन्ना साहब की बायोग्राफी लिखने वाले लेखक यासिर उस्मान को सागर सरहदी जी ने एक इंटरव्यू दिया था, जिसमें उन्होंने वी.के.शर्मा साहब के बारे में कहा था,”उस ड्रामा ग्रुप के सबसे महत्वपूर्ण शख्स हुआ करते थे वी.के.शर्मा। वो उत्तर प्रदेश से थे। कद तो उनका छोटा था। पर प्रतिभा के मामले में वो बहुत बड़े थे। वो नाटक लिखते थे। नाटकों का निर्देशन करते थे। और उनमें अभिनय भी करते थे। जतिन(राजेश खन्ना) उन्हें अपना गुरू मानते थे। हालांकि शुरुआत में ना तो वी.के.शर्मा, और ना ही अन्य लोग जतिन को गंभीरता से लेते थे।”
सागर सरहदी जी के मुताबिक, जतिन हर शाम रिहर्सल में आते थे और एक कोने में खड़े होकर अन्य एक्टर्स को अपने-अपने किरदारों की प्रिपेरेशन करते देखते थे। तब शायद जतिन इसी उम्मीद में रहते होंगे कि किसी दिन वी.के.शर्मा उन्हें नोटिस करेंगे। और वो जतिन को उनका पहला ब्रेक देंगे। मगर कई महीनों तक जतिन को कोई रोल नहीं मिला। मगर एक दिन ड्रामा कंपनी से जुड़ा एक एक्टर बीमार पड़ गया। जबकी दो दिन बाद ही एक शो होना था जिसमें वो एक्टर भी हिस्सा लेने वाला था। उसका रोल तो काफी छोटा था। उसे सिर्फ स्टेज पर खड़ा रहना था और एक लाइन बोलनी थी। अब नाटक के मंचन से महज़ दो दिन पहले उस रोल के लिए किसी नए एक्टर को तैयारी कराना आसान नहीं था। इसलिए वी.के.शर्मा चिंतित हो उठे। तभी उनका ध्यान जतिन पर गया जो हर दिन की तरह उसी कोने में खड़ा होकर रिहर्सल देख रहा था। उन्होंने जतिन को बुलाया और पूछा,” एक छोटा रोल निभाना चाहोगे?
जतिन ने बहुत सामान्य ढंग से हां में सिर हिला दिया। जबकी वी.के.शर्मा का वो ऑफर सुनकर उनका दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था। आखिरकार महीनों के इंतज़ार के बाद जतिन को उनके सब्र का फल मिलने जा रहा था। छोटा ही सही, उन्हें उनका पहला रोल ऑफर हुआ था। उस पल को याद करते हुए खुद राजेश खन्ना ने एक दफ़ा कहा था,”कुछ ही सेकेंड्स में मैं उस सीमा के पार आ खड़ा हुआ, जिससे पार जाने का ख्वाब मैं कई महीनों से देख रहा था।” मगर वो सब उतना भी आसान नहीं था। जिस नाटक में जतिन को जीवन का पहला किरदार निभाना था उसका नाम था “मेरे देश के गांव।” उस नाटक को नागपुर में आयोजित होने वाले एक कॉम्पिटीशन में परफॉर्म किया जाना था। उन दिनों जतिन के एक बहुत खास दोस्त हुआ करते थे जिनका नाम था हरीदत्त। हरीदत्त ने भी उस नाटक में एक्टिंग की थी। उन्होंने उस नाटक में एक अहम किरदार निभाया था।
हरीदत्त ने लेखक यासिर उस्मान को दिए एक इंटरव्यू में बताया था,”वो 3 मई 1961 का दिन था। मुझे ये तारीख इसलिए याद है क्योंकि मुझे उस नाटक के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला था। मैंने उसमें एक पागल आदमी का किरदार निभाया था। जतिन का रोल बहुत छोटा था। वो एक दरबान बना था। मुझे अब भी याद है कि वो घबराहट के मारे कांप रहा था।” उस पूरे नाटक में जतिन को सिर्फ एक ही लाइन बोलनी थी। वो लाइन थी “जी हुज़ूर, साब घर पर हैं।” वो एक लाइन याद करने के लिए जतिन ने घंटों तक रिहर्सल की थी। मगर जब नाटक शुरु हुआ और जतिन की लाइन बोलने का वक्त धीमे-धीमे नज़दीक आने लगा, वो घबराहट का शिकार हो गए। भीड़ से भरे ऑडिटॉरियम में लाइव शो में डायलॉग बोलने का खयाल उन्हें डराने लगा। आखिरकार जतिन के डायलॉग बोलने का वक्त आ ही गया।
सालों बाद उस दिन को याद करते हुए राजेश खन्ना जी ने कहा था,”मैंने बहुत मेहनत की थी उस एक लाइन पर। मगर शो के दिन मैं फिर भी नर्वस हो गया और अपनी वो एक लाइन गलत बोल गया। मुझे कहना था ‘जी हुज़ूर, साब घर पर हैं।’ मगर मैं कह गया ‘जी साब, हुज़ूर घर पर हैं।’ डायरेक्टर मुझ पर बड़ा गुस्सा थे। शो खत्म होने के बाद मैं चुपचाप, बिना किसी को बताए, किसी से मिले अपने घर भाग गया।” उस दिन को याद करते हुए हरीदत्त जी ने कहा था,”जतिन जब जा रहा था तो उसकी आंखों में आंसू थे।” घर पहुंचने के बाद जतिन किसी से नज़रें ना मिला सके। वो सीधा अपने कमरे में गए। उन्होंने खुद को शीशे में देखा और फिर नज़रें फेर ली। वो समझ चुके थे कि वो औरों से तो भाग सकते हैं। मगर खुद से नहीं भाग सकते। एक्टर बनने के अपने ख्वाब को पूरा करने के अपने पहले प्रयास में जतिन को नाकामी का सामना करना पड़ा था। उनका कॉन्फिडेंस भी बुरी तरह डगमगा गया था। अपने कमरे में वो उस दिन ज़ोर-ज़ोर से रोए। उस रात उन्होंने काफ़ी शराब पी। ताकि वो सो सके। मगर नशे की उस हालत में भी वो अपनी उस पहली हार की टीस को भुला नहीं सके।”
अगले दिन जतिन के दोस्तों ने उन्हें चियर करने की कोशिश की। मगर जतिन किसी से मिलने नहीं आए। एक दिन पहले नाटक में हुआ वो पूरा वाकया जतिन को बहुत शर्मनाक लग रहा था। जतिन ने नाटकों की रिहर्सल पर जाना भी बंद कर दिया। हरीदत्त बताते हैं कि जतिन बहुत ज़्यादा सेंसिटिव थे। वो हर बात को दिल पर ले लेते था। मैंने उससे कहा था कि नाटकों में ये सब होता रहता है। मगर उन्हें फ़िक्र थी कि उनके पिता उन पर फैमिली बिजनेस को जल्द से जल्द जॉइन करने का दबाव बना रहे थे। और जतिन में इतना साहस भी नहीं था कि वो अपने पिता की आंखों में देख भी सकें। मना करना तो दूर की बात थी। अपने इस ख्वाब के लिए ही तो उन्होंने अपने पिता के बिजनेस को त्यागने का फैसला किया था। लेकिन वो तो एक लाइन तक सही से डिलीवर ना कर सके।
दोस्तों ने जब काफ़ी कहा तो आखिरकार जतिन फिर से नाटक में लौट आए। और इत्तेफ़ाक से आगे चलकर वो नाटक उस ड्रामा कंपनी का सबसे सफ़ल नाटक साबित हुआ। जतिन का आत्मविश्वास लौटना शुरू हुआ। सागर सरहदी ने लेखक यासिर उस्मान को बताया था कि उस थिएटर कंपनी में जतिन की पहचान तब एक ऐसे लड़के की थी जो अच्छा है और एक्टिंग करना पसंद करता है। बकौल सागर सरहदी, जतिन ने उनके लिखे दो नाटकों “मेरे देश के गांव” व “और शाम गुज़र गई” में काम किया था। हालांकि शुरुआत में किसी ने भी जतिन को बहुत इंपोर्टेंस नहीं दी थी। मगर जतिन ने फैसला कर रखा था कि आज नहीं तो कल, हर किसी को उन्हें गंभीरता से लेना होगा। उन दिनों जतिन का अधिकतर समय थिएटर से जुड़े लोगों के साथ ही गुज़रता था। अक्सर थिएटर के लोग जब मिलते थे तो नई कहानियों, किरदारों के बारे में अधिक बात करते थे। जतिन को वो माहौल बहुत पसंद आता था।
एक्टिंग और थिएटर के प्रति जतिन का वो बेइंतिहा लगाव आखिरकार रंग लाया। धीरे-धीरे जतिन स्टेज पर बढ़िया प्रदर्शन करने लगे। वो इंटर-कॉलिजिएट कॉम्पिटीशन्स में भी हिस्सा लेने लगे। मशहूर नाटककार व फिल्म डायरेक्टर रमेश तलवार ने एक दफ़ा कहा था,”उन दिनों नाटकों में जतिन को बहुत खास रोल नहीं मिलते थे। मगर वो छोटे रोल्स को भी मना नहीं करते थे। मेरे अंकल सागर सरहदी ने एक नाटक लिखा था जिसका नाम था “और दिए बुझ गए।” जतिन ने उस नाटक में बड़े भाई का किरदार निभाया था। उस नाटक को वी.के.शर्मा ने डायरेक्ट किया था। वो पहला किरदार था जिसके लिए जतिन की तारीफें हुई थी। और उन्हें कॉलेज फेस्टिवल में अवॉर्ड भी मिला था। उस दिन जतिन बहुत खुश हुए थे। उसी दौरान जतिन ने सत्यदेव दुबे के नाटक अंधा युग में भी काम किया था।” जतिन खन्ना के उस दौर को याद करते हुए सागर सरहदी ने कहा था,”उस नाटक कंपनी से गौरी नाम की एक लड़की भी जुड़ी थी। वो लड़की बहुत खूबूरत थी। सब उसके साथ फ्लर्ट करने की कोशिश करते थे। लेकिन वो अगर किसी से प्रभावित थी तो सिर्फ जतिन से। जतिन की स्माइल और इनोसेंस बहुत प्रभावी थी। थिएटर के दिनों में तो हमें उसका चार्म नहीं दिखा था। मगर लड़कियां तब भी जतिन को बहुत पसंद करती थी।”
कॉलेज फंक्शन में अवॉर्ड मिलने के बाद जतिन का सैल्फ कॉन्फिडेंस शिखर पर आ चुका था। जतिन के ख्वाबों को भी पंख लग चुके थे। अब जतिन थिएटर से आगे बढ़कर, फिल्मों में एक्टिंग करना चाहते थे। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के तमाम बड़े प्रोड्यूसर्स के ऑफिसों में अपनी तस्वीरें छोड़ना शुरू कर दिया। जतिन को पता था कि फिल्म इंडस्ट्री के लिए वो सिर्फ एक स्ट्रगलर है। जैसे तमाम दूसरे लड़के-लड़कियां हैं। जतिन ने अपने एक्टिंग टैलेंट को और अधिक पॉलिश करने के लिए स्टेज पर अपनी एक्टिंग स्किल्स को शार्प करना शुरू कर दिया। इसी दौरान एक दिन जतिन को थिएटर डायरेक्टर बी.एस.थापा ने फोन किया। बी.एस.थापा जतिन को लीड रोल में लेकर एक नाटक डायरेक्ट करना चाहते थे। जतिन के लिए ये एक बड़ी खुशखबरी थी। थापा ने जतिन को गेलॉर्ड रेस्टोरेंट मिलने के लिए बुलाया। ये एक ऐसा रेस्टोरेंट था जो चर्चगेट इलाके का बहुत ही मशहूर और सॉफिस्टिकेटेड रेस्टोरेंट उन दिनों माना जाता था। अक्सर फिल्म इंडस्ट्री के लोग उस रेस्टोरेंट में मीटिंग्स करने आते थे।
अपने संघर्ष के दिनों में जतिन भी गेलोर्ड रेस्टोरेंट जाते रहते थे। वहां उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के तब के कई बड़े नामों को देखा था। जिनमें सुनील दत्त, जे. ओम प्रकाश व मोहन कुमार जैसे नाम शामिल थे। बी.एस.थापा के बुलाने पर जब अगले दिन जतिन गेलोर्ड रेस्टोरेंट पहुंचे तो उन्होंने रेस्टोरेंट के बाहर एक खूबसूरत सी लड़की को देखा। उस लड़की की पर्सनैलिटी ने जतिन को बहुत प्रभावित किया। जतिन काफी देर तक दूर से उस लड़की को देखते रहे। कुछ पल बाद वो लड़की रेस्टोरेंट के भीतर चली गई। जतिन भी बी.एस.थापा से मिलने रेस्टोरेंट में घुसे तो उन्हें एक सरप्राइज़ मिला। वो खूबसूरत सी लड़की बी.एस.थापा के साथ ही बैठी थी। शुरुआती बातचीत के बाद बी.एस.थापा ने उस लड़की की तरफ इशारा करते हुए जतिन से कहा,”जतिन इनसे मिलिए। ये हैं अंजू महेंद्रू। नाटक में ये ही आपकी हीरोइन होंगी।” जतिन ने मुस्कुराकर अंजू महेंद्रू से हाथ मिलाया। और फिर तीनों नाटक के बारे में बात करने में मशगूल हो गए।
साथियों ये कहानी खत्म होती है यहीं पर। मैं जानता हूं कि आपमें से बहुत से लोगों को ये बात अच्छी नहीं लग रही होगी कि अभी तो कहानी में अंजू महेंद्रू की एंट्री हुई है। जिस किताब से ये कहानी मैंने लिखी है उसमें भी ये कहानी इसी जगह आकर खत्म होती है।
साल 1942 में 29 दिसंबर को राजेश खन्ना साहब का जन्म हुआ था। मैं इनके शुरुआती जीवन पर ही इससे पहले भी इक्का-दुक्का कहानियां किस्सा टीवी पर पोस्ट कर चुका हूं। उनमें से एक कहानी सुरेखा नाम की उस लड़की के बारे में है जो राजेश खन्ना जी के जीवन की वो पहली लड़की थी जिसके साथ उनका रुमानी रिश्ता कायम हुआ था। जबकी वो उम्र में सुरेखा से काफी छोटे थे और बालक ही थे। फिर सुरेखा वाले चैप्टर का एक दुखद अंत भी हो गया था। कोई फिर से पढ़ना चाहे तो बताइएगा। मैं फिर से सुरेखा व राजेश खन्ना वाली कहानी का लिंक शेयर कर दूंगा। राजेश खन्ना वाकई में सुपरस्टार थे। उनकी कहान जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी आपको पता चलेगा कि क्यों उन्हें बॉलीवुड का पहला सुपरस्टार कहा गया था। और कैसे उनका पतन होना शुरू हुआ था। इस कहानी में मौजूद अधिकतर जानकारियां हमने पत्रकार व बायोग्राफर यासिर उस्मान जी द्वारा लिखित राजेश खन्ना जी की बायोग्राफी “राजेश खन्ना: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज़ फर्स्ट सुपरस्टार” से ली हैं। बहुत अच्छी किताब है। आप ऑनलाइन खरीद सकते हैं। अंग्रेजी भाषा में है। पढ़ेंगे तो निराश नहीं होंगे आप।
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