विवाह के बाद नर्मदा यात्रा का संकल्प करने वाला जोड़ा
यूनेस्को ने दीपावली को विश्व धरोहर घोषित किया
चित्रकला, निबंध, विचित्र वेशभूषा, हस्तशिल्प बाल प्रतियोगिताओं में एक हजार बच्चों ने भाग लिया
मोइनुद्दीन चिश्ती की असलियत और हिन्दू समाज
हिन्दू समाज में शौर्य की कमी कभी भी नहीं थी। महमूद गजनवी बार-बार लूटपाट मचाकर गजनी लौट जाता था, सो इसलिए नहीं कि वह भारतवर्ष पर आधिपत्य जमाने के प्रति उदासिन था। इस देश में, पंजाब और सिन्धु देश के कुछ अंचलों को छोडकर, किसी जनपद पर अधिकार करने में वह इसलिए समर्थ नहीं हो सका कि चारों ओर से उठने वाली हिन्दू प्रत्याक्रमणों की आंधी उसे उल्टे पांव लौट जाने पर विवश करती रही। यह स्मरण रहे कि गजनवी अपने समय का अनुपम सेनानी था और उसने भारत के बाहर दूर-दूर तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था, किन्तु बाहुबल के होते हुए भी हिन्दू समाज ने बुद्धिबल से काम नहीं लिया।
हिन्दू मनीषियों द्वारा रचित उस काल के प्रचुर साहित्य में कोई संकेत नहीं मिलता कि इस्लाम के स्वरूप को किसी ने पहचाना हो। न ही कोई ऐसा संकेत मिलता है कि ‘सूफी’ नामधारी बगुलाभगतों को उनकी करतूतों के कारण किसी ने धिक्कारा हो। सूफियों द्वारा बुलाया गया इस्लाम का ‘गाजी’ हार मानकर हट गया, किन्तु सुफी सिलसिले जमे रहे, बढते रहे और उनको धन तथा मान भारत के भीतर से मिलता रहा। इन सूफियों कि खानकाहों में बहुधा वे अबलाएं मिलती थी जिनका अपहरण गजनवी द्वारा हुआ था और जिनको उपहार के रूप में सूफियों को सौपां गया था। गजनवी द्वारा लूटा गया भारत का धन भी सूफियों ने प्रचुर मात्रा में पाया था। सूफी लोग आनन्द-विभोर होकर इस कामिनी-कांचन का उपभोग करते रहे। उन अबलाओं का आर्तनाद हिन्दू समाज ने नहीं सुना. इसके विपरीत, म्लेच्छों के हाथ पड़ जाने के कारण उन अबलाओं को त्याज्य मान लिया गया।
इसीलिए १५० वर्ष बाद मोहम्मद गौरी फिर इस्लाम के नारे लगाता हुआ भारतवर्ष की ओर बढ़ आया। अजमेर में गडा हुआ मुइनुद्दीन चिश्ती नाम का सूफी भी उसके साथ हो लिया। गौरी ११७८ ईसवी में आबू के निकट उस सेना से पिट कर भागा जिसका संचालन चौलुक्य-पति की विधवा साम्राज्ञी कर रही थी। दूसरी बार ११९१ में वही गौरी पृथ्वीराज चौहाण से पिट कर भागा। उस समय भारतवर्ष के चौलुक्य तथा चौहाण साम्राज्यों में इतना सामर्थ्य था कि वे गौरी का पीछा करते हुए इस्लाम द्वारा हस्तगत उत्तरांचल को लौटा लेते और गौरी तथा गजनी को रौंदते हुए उस काबे तक मार करते जहाँ से इस्लाम की महामारी बार-बार बढ़कर भारत के लिए विभीषिका बन जाती थी। इस्लाम का दावा था कि हिन्दूओं के मंदिर ईंट-चूने के बने हुए है, हिन्दूओं की देवमूर्तियां कोरे पाषाण-खण्ड हैं और उन मंदिरों तथा मूर्तियों में आत्मत्राण की कोई सामर्थ्य नहीं। इस तर्क का प्रत्युत्तर एक ही हो सकता था – लाहौर से लेकर काबे तक समस्त मस्जिदों का ध्वंस। तब इस्लाम की समझ में यह बात तुरन्त आ जाती कि उसके काबा में भी आत्मत्राण की कोई सामर्थ्य नहीं, वह भी ईंट-चूने का बना है, और उसके भीतर विद्यमान काले पत्थर का टुकडा केवल पत्थर का टुकडा ही है। बुद्धि द्वारा स्थिति का विश्लेषणन करने के कारण हिन्दू शौर्य निष्फल रहा। चिश्ती ने अजमेर में आकर अड्डा जमाया और गौरी को कहलवाया कि हिन्दू सेना को बल से नहीं, छल से ही जीता जा सकता है।
गौरी ने चिश्ती का हुक्म बजाया। ११९२ में वह जब फिर तरावडी के मैदान में आया तो चौहाण ने उस भगोडे को धिक्कारा। गौरी ने उत्तर दिया कि वह अपने बडे भाई मुइनुद्दीन के आदेश पार आया है और उसका आदेश पाए बिना नहीं लौट सकता। साथ ही उसने कहा कि पृथ्वीराज का संदेश उसने अपने बडे भाई के पास भेज दिया है तथा उस ओर से आदेश आने तक वह युद्ध से विरत रहेगा। राजपूत सेना ने शस्त्र खोल दिए और उसी रात को गौरी की सेना ने राजपूत सेना को छिन्न-भिन्न कर डाला, किन्तु किसी हिन्दू ने यह समझने का कष्ट नहीं किया कि काफिर के साथ छल करना इस्लाम के शास्त्र में विहित है। इस काल का साहित्य राजपूतों के शौर्य की गाथा सुनाता है, किन्तु इस्लाम के शास्त्र के विषय में वहाँ एक शब्द भी नहीं मिलता। फलस्वरूप चिश्ती आनन्द से अजमेर में बैठकर अपने ‘चमत्कार’ दिखलाता रहा। अजमेर के मंदिरों को ध्वस्त होते देखकर उसने अल्लाह का शुक्र बजाया। अल्लाह की फतह हुई थी। कुफ्र का मुँह काला। कोई आश्चर्य नहीं कि अल्लाह ने अजमेर को इस्लाम कि एक प्रमुख जियारत-गाह बना दिया। चिश्ती की मजार पर उबलते चावल, चढ़ने वाले फूल तथा संचित होने वाला धन अशंतः हिन्दूओं की देन है, किन्तु किसी हिन्दू ने आज तक यह जानने का कष्ट नहीं किया कि वहाँ पर गडा हुआ सूफी वस्तुतः क्या चीज़ था और उसने भारतभूमि के प्रति कितना बडा द्रोह किया था। इसका कारण यही है कि हिन्दू समाज ने इस्लाम को एक ‘धर्म’ मान लिया है।
(स्रोत: स्व. सीताराम गोयल की पुस्तक ‘सैक्युलरिज्म: राष्ट्रद्रोह का दूसरा नाम’, पृ. ४५-४७)
टिकारी रानी के मन्दिर पर देवरहा हंस बाबा का “भक्ति धाम” स्थापित
सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में अग्रगण्य रहा टिकारी राज:-
टिकारी दक्षिण बिहार के गया जिले की एक ऐतिहासिक जमींदारी थी, जिसे भूमिहार समुदाय के राजा वीर सिंह ने स्थापित किया जो 2,046 गांवों में फैला हुआ था। यह 18वीं और 19वीं सदी में काफी प्रभावशाली जागीर थी। इसके वास्तविक संस्थापक लाव गाव में जन्मे सुंदर सिंह (शाह) थे। इस राजा ने टिकारी राज का विस्तार नौ परगनों में किया था। बुनियाद सिंह, अमर जीत सिंह, हित नारायण सिंह, मोद नारायन सिंह, महाराजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह आदि टिकारी राज के प्रमुख राजा-महाराजा थे। जबकि इंद्रजीत कुअंर, राजरूप कुअंर, रामेश्वरी कुअंर टिकारी राज की प्रतापी महारानी हुईं।
टिकारी के तीसरे राजा हित नारायण सिंह का जन्म 1801 में हुआ था। अंग्रेजों ने उनको महाराजा की उपाधि और उसके प्रतीकों का उपयोग करने की अनुमति दी थी । उनका झुकाव अध्यात्म की ओर था और वे एक तपस्वी बन गए थे । उन्होंने अपनी विशाल संपत्ति का प्रबंधन अपनी पत्नी को सौंप दिया था। उनकी पत्नी ने 29 अक्टूबर 1877 की वसीयत के तहत इसे अपनी बेटी महारानी राजरूप कुँअर को हस्तांतरित कर दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन की कमान टिकारी राज की महारानी इंद्रजीत कुंवर ने संभाली थी। महाराजा हितनारायण सिंह की पत्नी महारानी इंद्रजीत कुंवर धर्मपरायण के साथ एक देशभक्त महिला थीं। उनमें राष्ट्र भावना का विचार कूट-कूटकर भरा हुआ था। महारानी ने वृंदावन में उससे सटे मंदिर और एक विशाल भवन का निर्माण कराया था। उन्होंने अकाल ग्रस्त लोगों के भोजन और सहायता पर भी बड़ी राशि खर्च की। टिकारी रानी मंदिर को इसके संस्थापक के कारण ‘राधा इंद्र किशोर’ के मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। वृन्दावन के डांगोली में यमुना नदी के पार, परिक्रमा मार्ग पर गोदा विहार के यमुना नदी तट पर यह मन्दिर स्थित है।
यह वास्तव में वृंदावन में सबसे बेहतरीन स्मारकों में से एक है जिसे राजस्थानी वास्तुकला में बनाया गया था।
डाकुओं से सुरक्षा मिली थी इस जगह:-
लगभग 200 साल पहले जब टिकारी की रानी वृंदावन की यात्रा के लिए जा रही थीं, तो उन पर कुछ पिंडारी डकैतों ने उन पर हमला कर दिया था और वे उनका सामान लूटना चाहते थे। रानी इंद्रजीत कुंवर यमुना नदी के किनारे अपने प्राण प्यारे भगवान गोपाल की रक्षा करने के लिए भागी और सुरक्षित रूप से यमुना के दूसरे तट पर पहुँच गयीं।
छःसाल में साढ़े तीन लाख लागत लगी:-
यह वह स्थान है जहाँ पर टिकारी रानी मंदिर का निर्माण हुआ था। मंदिर के निर्माण में लगभग 6 साल का समय लगा और 1871 में यह बन कर पूरा हुआ। मंदिर के शिखर को भारी मात्रा में तांबे के पंखों और सोने के पत्तल से सजाया गया है। मंदिर एक ऊंचे और समृद्ध चबूतरे पर बना हुआ है और मंदिर की पूरी बनावट अपनी असाधारण राजस्थानी वास्तुकला के साथ सरल और सुंदर है। मंदिर में श्री राधा कृष्ण राधा राजेंद्र सरकार के रूप में, राधा गोपाल, और श्री लड्डू गोपाल के एक छोटे श्रीविग्रह विराजमान हैं। मूर्ति को कलकत्ता के प्रसिद्ध मूर्तिकार राजेंद्र सरकार ने बनाया था। वर्तमान में ये मंदिर देवरहा हंस बाबा के भक्तों द्वारा संभाले जा रहे हैं। वृंदावन में टिकारी राज के कई अन्य स्थान भी हैं जो धार्मिक महत्व रखते हैं। इस मंदिर को टिकारी राजा हित नारायण सिंह की विधवा रानी इन्द्रजीत कुंवर ने सन 1865 में बनवाना शुरू किया था और लगातार छ वर्ष तक निर्माण कार्य जारी रहने के बाद, यह मंदिर पूर्ण रूप से सन 1871 में बन कर तैयार हो गया था।
इस मंदिर को दूर से देखने में भव्य दिखाई पड़ता है। इसकी स्थापत्य कला के बारें में आज भी लोगों के लिए आकर्षण बना हुआ है। इस मंदिर के इतिहास और महत्व के बारे में भी कम लोगों को ही जानकारी है। पत्थरों पर किये गए नक्काशी और विशालकाय प्रवेश द्वार लोगों को स्वत: ही आकर्षित करते हैं। यह मन्दिर अपने ज़माने में अतिथि-सेवा के लिए भी प्रसिद्ध था।
उस समय इस मंदिर के निर्माण में 3,50,000 रूपया खर्च हुआ था। इसमें विराजमान देवी देवता के पूजा में वार्षिक तौर पर खर्च इत्यादि के लिए महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने 15,000 रूपया के साथ अपने राज के कुछ ज़मीन भी मंदिर के नाम से दान में दे दी थी।
टिकारी घाट भी है:-
यमुना नदी के किनारे केशीघाट से अगर परिक्रमा शुरू करें तो चंद कदम दूर आगे बढ़ते ही वंशीवट, सुदामा कुटी के आगे भव्य टिकारी घाट भी बना हुआ है।टिकारी घाट के निर्माण में उस समय 30,000 रूपया लागत आया था। महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने उस समय पिंडारा लूटेरा गिरोह से बच कर यमुना नदी को पार करते हुए वृन्दावन में इसी स्थान पर आई थी, बाद में इसी स्थान पर उन्होंने टिकारी घाट का निर्माण करवाया था।
रानी का महल अतिथि गृह बना :-
इस मंदिर से सटे एक भव्य भवन का भी निर्माण किया गया था। जो उस समय महारानी इन्द्रजीत कुंवर का निवास स्थान था और इसी भवन में महारानी की मृत्यु 26 जनवरी 1878 को हुई थी। उनके मृत्यु के बाद यह भवन “अतिथि गृह” के रूप में जाना जाता है।
अब देवरहा हंसबाबा का भक्ति धाम :-
कालान्तर में मंदिर को रानी इंद्रजीत कुंवर द्वारा देवरहा बाबा को दान कर दिया गया। अब मंदिर को देवरहा बाबा भक्ति धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह आश्रम 1990 में देवरहा बाबा के वृंदावन में यमुना तट पर समाधि लेने के बाद उनकी स्मृति में स्थापित किया गया है। यह टिकारी मंदिर परिसर में ही चल रहा है, जिसमें मंदिर, भक्त निवास, गौशाला और टिकारी घाट शामिल है।
विशाल गौशाला :-
यहां गौवंशों की सेवा भी की जाती है। यह शांतिपूर्ण वातावरण और आध्यात्मिक कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है। यह 1850 के दशक से संचालित है, 2002 से ब्रह्मवेता श्री देवरहा हंस बाबा द्वारा ट्रस्ट और श्रद्धालुओं द्वारा इसका प्रबन्ध किया जा रहा है।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)
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भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान द्वारा केवल अंग्रेज़ी में जारी अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य भर्ती सूचनाओं के विरुद्ध शिकायत
सेवा में,
माननीय सचिव महोदय,
कार्पोरेट कार्य मंत्रालय,
भारत सरकार,
शास्त्री भवन,
नई दिल्ली – 110001।
विषय:
राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) एवं संविधान के अनुच्छेद 14 का घोर उल्लंघन – भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान द्वारा केवल अंग्रेज़ी में जारी अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य भर्ती सूचनाओं के विरुद्ध शिकायत।
महोदय,
राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) के अनुसार केंद्र सरकार के अधीन सभी संस्थानों द्वारा जारी किए गए भर्ती सूचनाएँ, आवेदन प्रपत्र, निविदाएँ आदि दस्तावेज़ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एक साथ समकालिक रूप से जारी किए जाएँ।
यह द्विभाषिक समकालिकता वैधता की अपरिहार्य शर्त है। केवल अंग्रेज़ी में जारी कोई भी भर्ती सूचना/आवेदन प्रपत्र प्रारंभ से ही अवैध एवं शून्य (void ab initio) है तथा उसे जारी करने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।
संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान अधिकार हैं। भाषा-आधारित भेदभाव अस्वीकार्य है।
केवल अंग्रेज़ी में भर्ती सूचना जारी करना हिंदी-भाषी आवेदकों के साथ घोर भेदभाव है। वे अपनी मातृभाषा में नौकरी की जानकारी न पाने से रोज़गार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं, जो अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है।
उल्लंघन के तथ्य
दस्तावेज़ का नाम:
भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान मानेसर द्वारा विभिन्न संविदा पदों हेतु भर्ती परिपत्र।
(Vacancy Circular No. IICA-2-44/2012 dated 01.12.2025 regarding vacancies for various contractual positions in Indian Institute of Corporate Affairs)
पत्रांक: IICA-2-44/2012
दिनांक: 01 दिसंबर 2025
वर्तमान उपलब्धता: केवल अंग्रेज़ी में
उल्लंघन के बिंदु
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धारा 3(3) का उल्लंघन:
भर्ती सूचना/वैकेंसी परिपत्र धारा 3(3) के अंतर्गत “नोटिस/भर्ती अधिसूचना” की श्रेणी में आता है, अतः द्विभाषिक होना अनिवार्य है। इसे केवल अंग्रेज़ी में जारी करना प्रत्यक्ष उल्लंघन है। -
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन:
केवल अंग्रेज़ी में सूचना देने से हिंदी-भाषी भारतीय नागरिकों को रोज़गार के समान अवसर नहीं मिलते, जो उनके संवैधानिक अधिकार का हनन है। -
रोज़गार में भेदभाव:
हिंदी-भाषी प्रतिभावान उम्मीदवार अंग्रेज़ी भाषा की बाधा के कारण नौकरी के अवसर से वंचित रह जाते हैं, भले ही वे पद के लिए योग्य हों। -
आवेदन प्रपत्र पूर्णतः अंग्रेज़ी में:
संस्थान द्वारा जारी किया गया आवेदन प्रपत्र (Application Form) भी पूर्णतः अंग्रेज़ी में है, जिससे हिंदी-भाषी आवेदक निर्देशों को सही तरीके से नहीं समझ पाते। -
द्विभाषिक समकालिकता का अभाव:
न तो हिन्दी संस्करण साथ-साथ जारी किया गया, न ही मंत्रालय/संस्थान की हिन्दी वेबसाइट पर उपलब्ध है, जिससे धारा 3(3) की “समकालिकता” की शर्त पूर्ण नहीं होती। -
संविदा पदों की सूची:
IICA द्वारा यह भर्ती परिपत्र संविदा पदों के लिए है, जहाँ भाषाई बाधा के कारण प्रतिभा का बहिष्करण होता है।
उपर्युक्त वैकेंसी परिपत्र एवं आवेदन प्रपत्र निम्नलिखित कारणों से प्रारंभ से ही अवैध एवं शून्य है:
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धारा 3(3) की अनिवार्य द्विभाषिक समकालिकता का उल्लंघन।
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संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत रोज़गार के अवसरों में भाषाई भेदभाव।
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राष्ट्रपति महोदय के 02-07-2008 के आदेशों की खुली अवहेलना।
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भाषाई आधार पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन।
इस अवैध एवं शून्य भर्ती सूचना को जारी करने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।
अपेक्षित तत्काल कार्रवाई
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भर्ती सूचना का तत्काल निरस्त करें:
उपर्युक्त अवैध एवं शून्य वैकेंसी परिपत्र तत्काल निरस्त किया जाए। -
द्विभाषिक पुनः-जारी:
उसी भर्ती सूचना को हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में एकसाथ एक ही समय में पुनः जारी किया जाए। -
आवेदन अवधि का विस्तार:
आवेदन के लिए पर्याप्त नई अवधि दी जाए ताकि हिंदी-भाषी भी आवेदन कर सकें। -
आवेदन प्रपत्र द्विभाषिक बनाएँ:
भविष्य में सभी आवेदन प्रपत्र हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध कराए जाएँ। -
अनुशासनात्मक जाँच:
IICA के निदेशन में राजभाषा अधिकारी एवं संबंधित अधिकारियों पर जाँच कराई जाए, जिन्होंने धारा 3(3) एवं राष्ट्रपति के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की है। -
भविष्य के लिए आदेश:
आदेश जारी किया जाए कि IICA द्वारा भविष्य में कोई भी भर्ती सूचना केवल द्विभाषिक रूप में ही जारी होगी, अन्यथा वह स्वतः अवैध मानी जाएगी। -
राजभाषा कार्यान्वयन:
IICA में राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की जाए तथा त्रैमासिक रिपोर्ट तैयार की जाए। -
सूचना का अधिकार:
इस शिकायत पर की गई समस्त कार्यवाही, जाँच-रिपोर्ट, निर्णय आदि की प्रतियाँ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में मुझे प्रेषित की जाएँ।
संलग्नक
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दिनांकित 01-12-2025 का अवैध भर्ती परिपत्र (अंग्रेज़ी में)
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आवेदन प्रपत्र की पीडीएफ़ (अंग्रेज़ी में)
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राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) की लिंक
प्रतिलिपि:
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माननीय गृहमंत्री, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।
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सचिव व संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।
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सचिव, संसदीय राजभाषा समिति, लोकसभा सचिवालय, नई दिल्ली।
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निदेशक, भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान, गुड़गाँव।
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प्रभारी, कार्पोरेट कार्य मंत्रालय, राजभाषा प्रकोष्ठ, नई दिल्ली।
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सार्वजनिक शिकायत निवारण पोर्टल (पीजी पोर्टल), भारत सरकार।
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निदेशक, भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान, गुड़गाँव।