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यातायात जागरुकता’ के लिए किया छात्रों से संवाद, कई छात्र बनें ट्रैफ़िक प्रहरी

इन्दौर। शहर की यातायात समस्याओं से छात्रों को परिचित करवाते हुए यातायात पुलिस व ख़बर हलचल न्यूज़ द्वारा प.म. ब. गुजराती वाणिज्य महाविद्यालय छात्र संवाद का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में यातायात आरक्षक सुमंत सिंह काछवा, सम्पादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’, सामाजिक कार्यकर्ता सौरव गौसर, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. दिनेश माहेश्वरी, विभागाध्यक्ष मिलिंद कोठारी, एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी डॉ. दीपक शर्मा का आतिथ्य रहा।
सुमंत सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि ‘यातायात पुलिस ने ट्रैफ़िक प्रहरी अभियान चलाया है, जिससे सभी छात्रों को जुड़कर इन्दौर के यातायात को दुरुस्त करने में सहभागी होना चाहिए। साथ ही, आप यातायात नियमों का पालन करें।’
ख़बर हलचल न्यूज़ के सम्पादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने कहा कि ‘घर पर आपकी कोई प्रतीक्षा कर रहा है, इस बात को ध्यान में रखकर हेलमेट लगाएँ, यातायात नियमों का पालन करें। यदि आप नियमों का उलंघन करेंगे तो ज़िम्मेदार नागरिक नहीं बन पाएँगे। संकल्प लें कि बिना हेलमेट गाड़ी नहीं चलाएँगे।’
आयोजन में सामाजिक कार्यकर्ता सौरव गौसर ने संबोधित कर छात्रों को ट्रैफ़िक प्रहरी बनने की शपथ दिलवाई, साथ ही कहा कि ‘हम युवा ही शहर के बड़े परिवर्तन का कारक बन सकते हैं, यदि हम जागरुक होंगे तो ही शहर को जागरुक कर पाएँगे।’
कार्यक्रम में महाविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना की इकाई के सौ से अधिक छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की और कई छात्रों ने हाथों-हाथ ट्रैफ़िक प्रहरी अभियान से जुड़ना सुनिश्चित किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. रिंकू गेहानी ने किया व आभार डॉ. कमलेश पाटोदी ने माना।

सुशील कुमार सायरा के सीईओ बनाए गए

दूरदर्शी AI और क्लाउड एग्जीक्यूटिव जिनके पास एंटरप्राइज़ प्लेटफॉर्म बनाने और उसे बड़े पैमाने पर (scale) ले जाने का सिद्ध रिकॉर्ड है, अब CX एश्योरेंस मार्केट लीडर के लिए इनोवेशन और वैश्विक विस्तार के अगले चरण का नेतृत्व करेंगे

ऑस्टिन, टेक्सास, संयुक्त राज्य अमेरिका

AI-संचालित कस्टमर एक्सपीरियंस (CX) एश्योरेंस में वैश्विक लीडर, Cyara, ने आज सुशील कुमार को अपना नया मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त करने की घोषणा की। उनकी नियुक्ति एंटरप्राइज़ AI CX इनोवेशन में तेजी लाने और हर चैनल पर अधिक विश्वसनीय, उत्तरदायी और भरोसेमंद इंटरैक्शन को सक्षम करके ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाने के लिए Cyara की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। सुशील निवर्तमान CEO ऋषि राणा द्वारा रखी गई मजबूत नींव को आगे बढ़ाएंगे।

सुशील Cyara में उद्यमशीलता का दृष्टिकोण (entrepreneurial vision) और एंटरप्राइज़-स्तरीय नेतृत्व क्षमता लेकर आ रहे हैं। उन्होंने अपने करियर को श्रेणी-परिभाषित (category-defining) AI, DevOps व क्लाउड प्लेटफॉर्म बनाने पर केंद्रित किया है, एक संस्थापक के रूप में भी और बड़े वैश्विक संगठनों के नेता के रूप में भी। हाल ही में वे RelicX.ai के सह-संस्थापक और CEO थे जो एक जेनरेटिव AI टेस्ट ऑटोमेशन अग्रणी था जिसका अधिग्रहण Harness द्वारा किया गया। इससे पहले उन्होंने Oracle, CA Technologies और Broadcom में वरिष्ठ उत्पाद और सामान्य प्रबंधन जैसी भूमिकाएं निभाई। जहाँ उन्होंने वैश्विक टीमों और करोड़ों डॉलर के व्यवसायों का नेतृत्व किया जिसने डिजिटल प्रदर्शन और ग्राहक अनुभव को बड़े पैमाने पर बेहतर बनाया।

 

Cyara के सह-संस्थापक और निदेशक मंडल के नॉन-एक्सिकियूटिव आलोक कुलकर्णी ने कहा, “सुशील श्रेणी-परिभाषित प्लेटफॉर्म बनाने और उसे स्केल करने के लिए सिद्ध क्षमता और गहरी ग्राहक व उत्पाद अंतर्दृष्टि का एक दुर्लभ संयोजन लाते हैं। Cyara ने CX एश्योरेंस श्रेणी का निर्माण किया और अब इसका नेतृत्व करता है, जिसके पास मजबूत वैश्विक गति है। सुशील के नेतृत्व में हम उस बढ़त को विस्तार देने का महत्वपूर्ण अवसर देखते हैं क्योंकि उद्यम (enterprises) ग्राहक अनुभव को आधुनिक बनाने, GenAI को सुरक्षित रूप से तैनात करने और यह सुनिश्चित करने की होड़ में हैं कि हर ग्राहक इंटरैक्शन बिना किसी बाधा के काम करे।

 

Cyara का एकीकृत, AI-संचालित प्लेटफॉर्म वॉयस, डिजिटल, मैसेजिंग और कन्वर्सेशनल AI में ग्राहक यात्राओं (customer journeys) का निरंतर परीक्षण, सत्यापन और निगरानी करता है। हर साल 350 मिलियन से अधिक ग्राहक यात्राओं को सुनिश्चित करते हुए और दस लाख से अधिक AI-जनित प्रतिक्रियाओं को मान्य करते हुए, यह प्लेटफॉर्म उद्यमों को गुणवत्ता, विश्वसनीयता और जोखिम में पूर्ण दृश्यता (visibility) देता है। उभरती हुई Agentic AI क्षमताओं के साथ Cyara संगठनों को कार्यप्रवाह (workflows) में सुधार करने, सेवा की लागत कम करने और आत्मविश्वास के साथ नए अनुभव तैनात करने में मदद करने के लिए बुद्धिमान, निरंतर CX अनुकूलन (optimization) में विस्तार कर रहा है।

 

Cyara के CEO, सुशील कुमार ने कहा, “AI ग्राहक अनुभव को उस किसी भी तकनीकी बदलाव की तुलना में तेजी से बदल रहा है जो हमने दशकों में देखा है। जैसे-जैसे उद्यम अपने CX स्टैक पर पुनर्विचार करते हैं और एजेंटिक AI (Agentic AI) का पता लगाते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा जिस चीज की जरूरत है, वह है आत्मविश्वास। यह आत्मविश्वास कि हर इंटरैक्शन सटीक, भरोसेमंद होगा और उस गति व गुणवत्ता पर दिया जाएगा जिसकी ग्राहक अपेक्षा करते हैं। Cyara पहले से ही उस बदलाव को सक्षम करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह वह विश्वसनीयता और आश्वासन प्रदान करता है जिसकी संगठनों को AI को केवल प्रयोग (experimentation) से सार्थक, वास्तविक दुनिया के प्रभाव में बदलने के लिए आवश्यकता है। मैं इस नींव पर निर्माण करने और विश्व स्तर पर ग्राहक अनुभव के लिए मानक (bar) को ऊपर उठाने के लिए टीम के साथ काम करने के लिए उत्साहित हूँ।

 

Cyara ने एक केंद्रित विलय और अधिग्रहण (M&A) रणनीति अपनाई है; जिसमें उद्योग के सबसे व्यापक CX एश्योरेंस स्टैक में से एक को बनाने के लिए Botium और QBox (बोट और कन्वर्सेशनल AI टेस्टिंग), Spearline/testRTC (टेलीकॉम और WebRTC एश्योरेंस) और CentraCX (voice of the customer) का अधिग्रहण शामिल है।

 

सुशील AI-संचालित CX एश्योरेंस में उत्पाद नवाचार (product innovation) में तेजी लाने, CCaaS, CPaaS, UCaaS और AI भागीदारों के Cyara के पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को गहरा करने और कंपनी के वैश्विक पदचिह्न (global footprint) का विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जो 135 से अधिक देशों में ग्राहकों की सेवा करता है।

 

अतिरिक्त जानकारी के लिए, कृपया संपर्क करें: Janet Vito, janet.vito@cyara.com.

 

Cyara के बारे में

Cyara AI-संचालित कस्टमर एक्सपीरियंस एश्योरेंस में वैश्विक लीडर है। वॉयस, डिजिटल, मैसेजिंग और कन्वर्सेशनल AI चैनलों पर निरंतर परीक्षण और निगरानी के लिए एकमात्र एकीकृत प्लेटफॉर्म के रूप में, Cyara दुनिया के सैकड़ों अग्रणी ब्रांडों को हर साल एक चौथाई अरब से अधिक ग्राहक इंटरैक्शन को अनुकूलित (optimize) करने के लिए सशक्त बनाता है। पूर्ण ग्राहक यात्रा दृश्यता से लेकर AI गवर्नेंस और अनुपालन (compliance) तक, Cyara यह सुनिश्चित करता है कि हर टचपॉइंट त्रुटिहीन रूप से काम करे, जिससे व्यवसायों को सुरक्षित, घर्षण-मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाला CX बड़े पैमाने पर देने में मदद मिलती है।

 

अधिक जानने के लिए, www.cyara.com पर जाएँ।

दुनिया के हर रिलीजन में ब्राह्मण होते है, नाम उनके अलग होते हैं

पादरी, बिशप, पोप ईसाईयों के ब्राह्मण है, मौलाना मौलवी मुसलमानों के है, बौद्धभिक्षु बौद्धों के है।
हर रिलीजन के ब्राह्मण सबसे ज्यादा सम्मान प्राप्त करते है जापान कोरिया वाले राजा भी दलाई लामा के सामने झुकते है, उनके धर्म गुरु के सामने
वैसे ही अमेरिका का राष्ट्रपति भी उनके पादरी पोप के सामने झुकते है
हर रिलीजन के ब्राह्मण दान पर निर्भर होते है, कोई मौलाना मौलवी नौकरी नहीं करता, दुकान नहीं चलाता, न कोई पादरी जॉब करता है, न कोई बौद्ध वाला, सब दान दक्षिणा पर ही चलते है
जो बात हिन्दू धर्म के ब्राह्मण को दूसरे से अलग करती है, वो है ज्ञान का स्तर। बाकी का ज्ञान केवल उनकी धार्मिक बातों तक सीमित होता है। बाकी सिर्फ एक किताब वाले है, हिन्दू धर्म वालों के पास पूरा पुस्तकालय है ।
हिन्दू धर्म का ब्राह्मण ज्ञानी इसलिए नहीं होता की वो ब्राह्मण है, वो ज्ञानी इसलिए होता है क्योंकि हिन्दू धर्म ही ज्ञान का महासागर है।
अगर कोई वेदों को पढ़ता है, तो वो ब्राह्मण होने के साथ साथ गणितज्ञ, ज्योतिषी, डॉक्टर, योद्धा, वैज्ञानिक सब हो सकता है जैसे आयुर्वेद ऋग्वेद का एक उपवेद है, तो ऋग्वेद पढ़ने वाला ब्राह्मण एक चिकित्सक भी हो जाता है
ज्योतिष, यजुर्वेद का हिस्सा है  तो यजुर्वेद पढ़ने वाला, गणित भी पढ़ता, Astronomy भी पढ़ लेता है
धनुर्वेद, युद्धशास्त्र, यजुर्वेद का हिस्सा है इसलिए कोई ब्राह्मण युद्ध कौशल में भी निपुण हो सकता है । संगीत की शिक्षा सामवेद में है, तो सामवेद का ज्ञाता अपने आप संगीत का ज्ञानी हो जाता है
अगर कोई महाभारत पढ़ता है वो वो राजनीति में कुशल हो जाता है, महाभारत से बड़ा राजनीति का ग्रंथ दुनिया में कोई नहीं
तो यही कारण है कि हिन्दू धर्म का ब्राह्मण आल राउंडर होता है, हर क्षेत्र मे झंडे गाड़ने वाला होता है। दूसरे वालों को अपनी किताब के बाहर कुछ नहीं आता।
ऐसे ग्रंथों के अध्ययन के कारण ब्राह्मण बौद्धिक रूप से बहुत आगे होता है दूसरे के मुकाबले और ब्राह्मण बुद्धिबल से देश की रक्षा सदियों से करता आ रहा है चाहे वो चाणक्य के रूप में, विश्वनाथ भट्ट के रूप में, बाजीराव पेशवा के रूप में, सावरकर के रूप में, शंकराचार्य के रूप में, बालगंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद के रूप में । इसलिए वो सबके निशाने पर भी होता है, मुगल अपने युद्ध की सफलता इससे नापते थे कि कितने किलो जनेऊ इकट्ठे हुए अंग्रेजों, पूर्तगालियों के निशाने पर होते थे,  इस्लामिक शासकों और फिरंगी फ्रांसिस जेवीयर ने कहा था, ब्राह्मण न होते तो मैं पूरे भारत को ईसाई बना देता।
लॉर्ड मैकाले ने भी बहुत कोशिश की थी भारत देश में ब्राह्मण समाज को खत्म करने की…
एक और बात समझने की है, हर धर्म पंथ रिलीजन से कनेक्ट होने का एक माध्यम भी ब्राह्मण होते है । बच्चे का जन्म हुआ आप चर्च, मस्जिद, मंदिर जाएंगे वहां के पादरी, मौलाना, पंडित से जो भी करवाएंगे विवाह हुआ तो भी उनकी उपस्थिति में करवाएंगे, मृत्यु हुई तो अंतिम क्रिया भी करवाएंगे
सोचिये कि अगर ऐसा दुष्प्रचार कर दिया जाए की, हर पादरी, मौलाना ठग है, ये लोग लूटते है, अंधविश्वास फैलाते है, भ्रष्ट है तो क्या होगा ? धीरे धीरे इनके लोग फिर चर्च मस्जिद जाना बंद कर देंगे, शादिया फिर सिर्फ कोर्ट में हो जाएंगी, मरने पर बॉडी ऐसे ही डिस्पोज़ कर दी जाएगी और इस सबके कारण धीरे धीरे वो रिलीजन ही खत्म हो जाएगी।
तो अब आप ये भी समझ गए होंगे कि क्यों पंडितों, मंदिरों का इतना दुष्प्रचार करवाया जाता है।
और इसलिए JNU में ब्राह्मण भारत छोड़ो के नारे लगते है, किसान आंदोलन में लगते है, CAA के विरोध में लगते है
और जहां मौका मिले वहां ब्राह्मण टारगेट किए जाते है और बहुत बड़ी फंडिंग आती है विदेशों से ये करने के लिए
जहां भी बात हिन्दू धर्म के ब्राह्मण की है, वो सब कर्म से ब्राह्मण लोगों की है सिर्फ नाम वालों की नहीं  ब्राह्मण कोई सिर्फ जाति से नहीं हो जाता, ज्ञान, आध्यात्म और त्याग न हो तो वो ब्राह्मण नहीं होता
दासीपुत्र विदुर एक महापंडित ब्राह्मण थे, अर्थशास्त्र के जनक चाणक्य भी एक ब्राह्मण थे, वेदों के ज्ञाता भक्त चर्मकार रविदास भी ब्राह्मण है, स्वामी विवेकन्द भी है संत कबीर कर्म से जुलाहा होने के बावजूद वर्ण से ब्राह्मण हैं।महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं।
 ऐसे सैकड़ों अनगिनत ब्राह्मणों ने सनातन हिंदू धर्म और संस्कृति की मशाल को विपरीत परिस्थितियों में भी प्रज्वलित रखा।

विवाह के बाद नर्मदा यात्रा का संकल्प करने वाला जोड़ा

विवाह संस्कार भोग नहीं संयम और साधना का पथ है…दुनियां के कई देशों बांग्लादेश,नेपाल  आदि में जेन जी के चर्चे ,उपद्रव स्वतंत्रता की लड़ाई ,अधिकारों के लिए संघर्ष  आदि की चर्चायें सुनते सुनते मन को ऐसा लगता था कि भारत का युवा ऐसा करने लगा तो क्या होगा..?
समाज के अन्यान्य प्रबुद्ध लोगों की चर्चाओं में भी ये बात चल पड़ी थी कि भारत की Gen Z भी विद्रोह के तरफ़ बढ़ रही है.. मन चिंतित भी था कि भारत में ऐसा हुआ.तो…! पर मन ने कभी स्वीकार ही नहीं किया कि भारत का युवा ऐसा कैसे कर सकता है…? भारत तो त्याग , समर्पण और साधना का देश है..यहाँ अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों की मान्यता के स्थान पर कर्तव्य बोध पर जीने वालों की मान्यता अधिक है।
यह भारत भूमि है ही ऐसी ..यहाँ राम ,कृष्ण ध्रुव,प्रह्लाद , गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी,भगत सिंह ,आजाद , बंकिम चंद्र चटर्जी , डॉ हेडगेवार की धरती है..यहाँ तो लोगों ने अपनी मातृभूमि की सेवा में जीवन का सर्वस्व समर्पण किया है..हमारी प्रेरणा कर्तव्य है..अधिकार नहीं..!
 मध्यप्रदेश के देवास जिले के खातेगांव का एक युवा शिवम यादव .. पिताजी शासकीय शिक्षक माँ एक कुशल गृहणी .. बेटा घर और नगर का होनहार जिसने अच्छी पढ़ाई की …  अकेला बेटा… माँ पिताजी की देखभाल के कारण बाहर कहीं नौकरी नहीं की … माँ- बाबूजी की सहमती से विवाह तय हुआ … बड़े ही धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ..सारे मित्र रिश्तेदार सब प्रसन्नचित्त थे और वो दोनों पति पत्नी भी अत्यंत आनंदित थे … संवाद में उन्होंने बताया कि विवाह के दस दिन बाद हम दोनों ने माँ नर्मदा की पैदल परिक्रमा का संकल्प लिया है.. यह सुनकर मन स्तब्ध रह गया।
माँ नर्मदा की परिक्रमा  ..वो भी पैदल.. मौसम की ठंडक और रास्ता भी दुर्गम … कई संत / महात्मा इस परिक्रमा को ३ साल,३ महीने १३ दिन में  पूर्ण करते है… ये सब सोचते सोचते मन ठिठक गया कि इतने कष्ट सहकर ये यात्रा क्यों कर रहे होंगे.. लाखों रुपए खर्च करके किसी देश मे हनीमून पर जा सकते थे। खूब मौज मस्ती करते सुंदर तस्वीरें वायरल होती युवाओं में कौतूहल होता अच्छा लगता घर के अकेले बेटे थे कोई कष्ट नहीं था पर इन्होंने तो कंटकाकीर्ण मार्ग चुना   एक तरफ़ दुनिया के अन्य देशों के युवा अपने अधिकारों के लिए किसी के अधिकार छीनने के लिए तैयार खड़ा है वहीं अपने भारत के युवा नदी की पैदल परिक्रमा ..क्या मिलेगा इससे..?
 धर्म के कार्य से क्या मिलेगा..? क्या नहीं मिलेगा ये चिंतन भारत का नहीं है पर बहुत कुछ मिलेगा … सैकड़ों दिनों तक नर्मदा मैया का सानिध्य … दुनियाँ में केवल एक ही नदी है नर्मदा जिसकी परिक्रमा की जाती है. हमारा विश्वास है नर्मदा मैया के दर्शन मात्र से कल्याण होता है … जीवन में आत्मविश्वास,सात्विकता.. संतुष्टि.. किसी को जीतने की जगह अपने मन पर विजय प्राप्त करना और पता नहीं क्या क्या मिलेगा..? जिसकी कल्पना नहीं केवल अनुभूति ही की जा सकती है..इसी कामना से सुदूर जंगलों में अत्यंत अभाव में रहने वाले से लेकर बड़े बड़े धनाढ्य , ज्ञानी , ध्यानी ,साधु ,संत, महात्मा लाखों की संख्या में नर्मदा परिक्रमा करते है..भारत भोग की नहीं त्याग की परंपरा का देश है .. माता भूमि पुत्रोंअहम पृथिव्य: को जीवन में धारण करने वाला अपना देश है।
वंदेमातरम्  मंत्र को संकल्प मानकर साधना करने वाला देश है..जिसकी साधना से अंग्रेजों के बंगभंग का षड्यंत्र भी विफल हो जाता है..वंदेमातरम् भारत के जन जन की प्रेरणा है… आज भी भारत का युवा अपनी मातृभूमि के सर्वस्व न्योछावर करने को अपना सौभाग्य मानता है … यही है भारत का चिंतन..।
ये कहानी केवल शिवम् की नहीं है उससे कहीं अधिक शिवम् के साथ पाणिग्रहण करने वाली बेटी रोशनी की भी है…जिसने घर की सुख सुविधा का त्याग कर महीनों कष्ट सहकर पदयात्रा का संकल्प स्वीकार किया… कोई तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर महिला स्वतंत्रता और अधिकार के नाम पर मिथ्या भ्रम फैला सकता है पर ये सीता के चरित्र को हृदयंगम कर जीने वाली बेटियों का भारत है.. और यही भारतवर्ष में स्त्री चरित्र भी है ।
जिस भारत की युवा पीढ़ी शिवम् -रोशनी जैसी हो तो फिर कैसी चिंता .. ? और कैसा भय … ? सारे संशय मिट गए दुनियाँ के देशों में कितने भी तख्त पलट हों सकते है पर भारत का संस्कृतिक तख्त बहुत मजबूती से खड़ा है जो अभी तक न डिगा है न कभी डिगेगा..।बस प्रभु से एक ही कामना है की इनकी नर्मदा परिक्रमा सकुशल पूर्ण हो मुझे विश्वास है भारत की भावी पीढ़ी को परिक्रमा में नर्मदा मैया दर्शन अवश्य देंगी.. यात्रा शुभ हो.. सफल हो.. सार्थक हो..  नर्मदा मैया की जय।

यूनेस्को ने दीपावली को विश्व धरोहर घोषित किया

यूनेस्को द्वारा दीपावली को अमूर्त विश्व धरोहर घोषित किया जाना भारत की सांस्कृतिक चेतना का ऐसा महत्त्वपूर्ण क्षण है, जो न केवल भारतीयों को गौरवान्वित करता है बल्कि यह सिद्ध करता है कि भारतीय सभ्यता की आत्मा आज भी मानवता का मार्गदर्शन करने की क्षमता रखती है।
दीपावली मात्र एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन, आत्मा, संबंध, समरसता और विश्वबंधुत्व का प्रकाशग्रंथ है। यह वह विरासत है जो हजारों वर्षों से मानव को अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान, ईष्र्या से प्रेम और भय से विश्वास की यात्रा पर ले जाती रही है।
दीपावली की महिमा को समझना अर्थात भारतीय संस्कृति की गहराई को समझना। यह संस्कृति केवल मंदिरों, शास्त्रों, उत्सवों और अनुष्ठानों में नहीं बसती, बल्कि मनुष्य की स्मृति, संवेदना, आस्था और जीवन व्यवहार में प्रवाहित होती है। इसीलिए इसे ‘अमूर्त’ कहा जाता है, क्योंकि यह मूर्त नहीं, परंतु सबसे अधिक जीवंत है। दीपावली इसी जीवंतता का सर्वोच्च उत्सव है।
जब अयोध्या की रामपैड़ी पर 26.17 लाख दीपकों ने एक साथ जगमग कर दुनिया को चमत्कृत किया, तब वह दृश्य सिर्फ दीयों का समुद्र नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक रोशनी का वैश्विक उद्घोष था, एक ऐसा उद्घोष जिसने दुनिया को यह विश्वास कराया कि भारत की परंपराएं आज भी सार्वभौमिक प्रेरणा शक्ति हैं। यूनेस्को का निर्णय इसी चमत्कार की परिणति है।
दीपावली के केंद्र में केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। यह पर्व मनुष्य को याद दिलाता है कि हर कठिनाई, हर पीड़ा, हर अंधकार के भीतर एक दीप जलने की संभावना छिपी होती है। हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख परंपराओं में दीपावली का अलग-अलग महत्व है, मगर संदेश एक ही है, प्रकाश का मार्ग ही मानवता का मार्ग है। यही अखंड संदेश अब विश्व स्तर पर मान्यता पा रहा है।
भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरें सदैव मानव-कल्याण की प्रेरक रही हैं। कुंभ, वैदिक मंत्रोच्चार, रामलीला, योग, दुर्गा पूजा जैसी परंपराएँ पहले से विश्व धरोहर सूची में शामिल रही हैं। दीपावली के जुड़ने से यह सूची और उज्जवल हुई है। दीपावली यूनेस्को के उस उद्देश्य को पूर्ण रूप देती है जिसमें कहा गया है कि मानवता की सबसे बड़ी शक्तियाँ वे परंपराएँ हैं जो समय के साथ खो न जाएँ।
दीपावली भारतीय समाज की आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संरचना को एक गहरा संदेश देती है। एक छोटा कुम्हार, जो अपने हाथों से दीए बनाता है, उसी दीये की रोशनी से करोड़ों घर रोशन होते हैं। एक छोटे व्यापारी की दुकान भी दीपावली पर उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी एक बड़ी कंपनी की। यह त्योहार बताता है कि समाज प्रकाश तभी बनता है जब हर व्यक्ति के जीवन में रोशनी पहुंचे। इसीलिए यह उत्सव भारतीय सामुदायिक चेतना का उत्सव है, समता और समान अवसरों का उत्सव है।
दुनिया आज विभाजन, युद्ध, तनाव, भौतिक लालच और मानसिक अंधकार से जूझ रही है। ऐसे समय में दीपावली का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है कि एक दीप की लौ किसी भी गहन अंधकार को चुनौती दे सकती है। भारत ने सदियों से दुनिया को यही बताया है कि नैतिक साहस, सद्भाव, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा ही सभ्यताओं को टिकाऊ बनाती है। दीपावली इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रतीक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधुनिक सोच और सांस्कृतिक कूटनीति ने भारत की इन अवधारणाओं को दुनिया के सामने नई ऊर्जा के साथ स्थापित किया है। योग की वैश्विक मान्यता हो, आयुर्वेद का उभार हो, रामायण सम्मेलन हों या भारतीय त्योहारों का अंतरराष्ट्रीयकरण, यह सब भारत की सॉफ्ट पावर की विजय है। दीपावली को यूनेस्को सूची में शामिल किया जाना इसी सॉफ्ट पावर की अगली खूबसूरत सीढ़ी है।
मोदी का “वसुधैव कुटुंबकम” का मंत्र अब भारत की विदेश नीति ही नहीं, बल्कि विश्व-दृष्टि बन चुका है। इसी भावना ने जी20 से लेकर वैश्विक मंचों पर भारत की पहचान को मजबूत किया है। दीपावली का वैश्विक सम्मान इसी मंत्र का विस्तार है, क्योंकि यह त्योहार हर मानव को यह याद दिलाता है कि दुनिया एक है, पीड़ा साझा है, और आनंद भी साझा होना चाहिए।
दीपावली केवल आध्यात्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मनोविज्ञान भी है। यह मन को खाली नहीं करती, उसे भरती है, उसे बुझाती नहीं, उसे जगाती है। दीपावली मन की धूल झाड़ने, जीवन के प्रति नई आशा जगाने और अपने भीतर छिपे प्रकाश को पहचानने का अवसर है। यही कारण है कि इसे विश्व धरोहर घोषित करना पूरी मानवता के आध्यात्मिक भविष्य को मान्यता देना है।
वैश्वीकरण के प्रभाव ने दुनिया को तकनीकी रूप से भले ही जोड़ा हो, पर मानसिक रूप से विभाजन बढ़ा दिया है। ऐसे में भारत की सांस्कृतिक विविधता, विशेषकर दीपावली जैसी परंपराएँ, सभ्यताओं के बीच एक दार्शनिक पुल का काम करती हैं। ये त्योहार दुनिया को यह बताते हैं कि जीवन केवल उपभोग नहीं, संवेदना है, केवल प्रगति नहीं, समरसता है, केवल विकास नहीं, मूल्य भी हैं।
यूनेस्को की घोषणा के बाद अब दुनिया दीपावली को केवल भारतीय या धार्मिक त्योहार के रूप में नहीं देखेगी, बल्कि इसे वैश्विक नैतिक चेतना के रूप में स्वीकार करेगी। यह उस विरासत का सम्मान है जो अतीत से चली आ रही है पर भविष्य को दिशा देती है। यह भारत की उस आध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है जिसे दुनिया युगों से सम्मान देती आई है।
अब यह भी हमारा दायित्व है कि दीपावली की इस उज्ज्वल विरासत को हम और अधिक संवारे, संजोएं और इसे केवल उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में अपनाएं। जब हम अपने भीतर एक दीप जलाते हैं, तो उसके प्रकाश में पूरी दुनिया का मार्गदर्शन संभव होता है, यही भारतीय संस्कृति की शक्ति है, यही दीपावली की महिमा है।
निस्संदेह, दीपावली का वैश्विक होना भारत की सांस्कृतिक आत्मा की विजय है। यह वह क्षण है जो बताता है कि भारत केवल एक भू-राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि मानवता का आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी है। आने वाले समय में यह प्रकाश दुनिया के हर कोने तक पहुंचे, यही दीपावली का संदेश और भारत की सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
दीपों का यह उत्सव अब केवल भारत का नहीं रहाकृअब यह मानवता का उत्सव है, और भारत की यह रोशनी आने वाले समय में वैश्विक चेतना का नया सूरज बनकर उदित होगी।
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

चित्रकला, निबंध, विचित्र वेशभूषा, हस्तशिल्प बाल प्रतियोगिताओं में एक हजार बच्चों ने भाग लिया

कोटा । बच्चों को साहित्य और संस्कृति से जोड़ने के लिए कोटा संभाग में संस्कृति, साहित्य,मीडिया फोरम द्वारा मिशन बाल मन तक के अंतर्गत हाल ही में न्यू पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल समूह के चेयरमैन आर. के. शर्मा द्वारा गहरी रुचि लेकर सम्बद्ध विद्यालयों में बाल साहित्य मेलों का व्यापक रूप से आयोजन किया गया जिनमें एक हजार बच्चों ने  विभिन्न प्रतियोगिताओं भाग लिया।
  शर्मा ने बताया कि बाल साहित्य मेलों के आयोजन में साहित्य और संस्कृति से बच्चों को जोड़ने का प्रयास किया गया। साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सुलेख लेखन, पहाड़ा बोलना, कविता पाठ, निबंध लेखन और चित्रकला प्रतियोगिताएं की गई। बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ावा देने के लिए हस्तशिल्प के अंतर्गत दीपक, गणेश,राखी बनाना, थाली सजना प्रतियोगिताएं की गई।
संस्कृति से जोड़ने के लिए मेहंदी मांडना, रंगोली, नृत्य, विचित्र वेशभूषा और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएं की गई। इस आयोजन की रूपरेखा संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल से विचार विमर्श कर तैयार की गई।
    इन प्रतियोगिताओं में  कविश ,द्दिव्यांश यादव ,  मिशिता , प्रावि,  हद्विता, विवेक, ,गोविंद, प्रिंस, लैकिशा  , युविका , पहेल राठौर , लक्ष्य , खुशी राजावत ,तीसरी कक्षा के ऋषिका , नायरा , सारिका,  सरिश्मा ,जसमीत , निहारिका केवट   प्रियल मेहरा , वंशिका ,अभिजीत, इकरा , ईरम, निखिल तंवर , गर्वित कसेरा , मुस्कान प्रजापति,आयोनिजा गौतम ,
स्मृति  थापा , एकता केवट,  राधिका मीणा,  संध्या पटेल , अनुष्का , यशवनी,  उर्वशी, नैंसी मीणा,  गरिमा नागर  जिक्रा , कृष्णा वर्मा,उमा पटेल , निकिता प्रजापति , किरण हाडा ,बरसाना मीणा , ज्योति तंवर एवं  मैथिली साहू विजेता रहे।

मोइनुद्दीन चिश्ती की असलियत और हिन्दू समाज

हिन्दू समाज में शौर्य की कमी कभी भी नहीं थी। महमूद गजनवी बार-बार लूटपाट मचाकर गजनी लौट जाता था, सो इसलिए नहीं कि वह भारतवर्ष पर आधिपत्य जमाने के प्रति उदासिन था। इस देश में, पंजाब और सिन्धु देश के कुछ अंचलों को छोडकर, किसी जनपद पर अधिकार करने में वह इसलिए समर्थ नहीं हो सका कि चारों ओर से उठने वाली हिन्दू प्रत्याक्रमणों की आंधी उसे उल्टे पांव लौट जाने पर विवश करती रही। यह स्मरण रहे कि गजनवी अपने समय का अनुपम सेनानी था और उसने भारत के बाहर दूर-दूर तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया था, किन्तु बाहुबल के होते हुए भी हिन्दू समाज ने बुद्धिबल से काम नहीं लिया।

हिन्दू मनीषियों द्वारा रचित उस काल के प्रचुर साहित्य में कोई संकेत नहीं मिलता कि इस्लाम के स्वरूप को किसी ने पहचाना हो। न ही कोई ऐसा संकेत मिलता है कि ‘सूफी’ नामधारी बगुलाभगतों को उनकी करतूतों के कारण किसी ने धिक्कारा हो। सूफियों द्वारा बुलाया गया इस्लाम का ‘गाजी’ हार मानकर हट गया, किन्तु सुफी सिलसिले जमे रहे, बढते रहे और उनको धन तथा मान भारत के भीतर से मिलता रहा। इन सूफियों कि खानकाहों में बहुधा वे अबलाएं मिलती थी जिनका अपहरण गजनवी द्वारा हुआ था और जिनको उपहार के रूप में सूफियों को सौपां गया था। गजनवी द्वारा लूटा गया भारत का धन भी सूफियों ने प्रचुर मात्रा में पाया था। सूफी लोग आनन्द-विभोर होकर इस कामिनी-कांचन का उपभोग करते रहे। उन अबलाओं का आर्तनाद हिन्दू समाज ने नहीं सुना. इसके विपरीत, म्लेच्छों के हाथ पड़ जाने के कारण उन अबलाओं को त्याज्य मान लिया गया।

इसीलिए १५० वर्ष बाद मोहम्मद गौरी फिर इस्लाम के नारे लगाता हुआ भारतवर्ष की ओर बढ़ आया। अजमेर में गडा हुआ मुइनुद्दीन चिश्ती नाम का सूफी भी उसके साथ हो लिया। गौरी ११७८ ईसवी में आबू के निकट उस सेना से पिट कर भागा जिसका संचालन चौलुक्य-पति की विधवा साम्राज्ञी कर रही थी। दूसरी बार ११९१ में वही गौरी पृथ्वीराज चौहाण से पिट कर भागा। उस समय भारतवर्ष के चौलुक्य तथा चौहाण साम्राज्यों में इतना सामर्थ्य था कि वे गौरी का पीछा करते हुए इस्लाम द्वारा हस्तगत उत्तरांचल को लौटा लेते और गौरी तथा गजनी को रौंदते हुए उस काबे तक मार करते जहाँ से इस्लाम की महामारी बार-बार बढ़कर भारत के लिए विभीषिका बन जाती थी। इस्लाम का दावा था कि हिन्दूओं के मंदिर ईंट-चूने के बने हुए है, हिन्दूओं की देवमूर्तियां कोरे पाषाण-खण्ड हैं और उन मंदिरों तथा मूर्तियों में आत्मत्राण की कोई सामर्थ्य नहीं। इस तर्क का प्रत्युत्तर एक ही हो सकता था – लाहौर से लेकर काबे तक समस्त मस्जिदों का ध्वंस। तब इस्लाम की समझ में यह बात तुरन्त आ जाती कि उसके काबा में भी आत्मत्राण की कोई सामर्थ्य नहीं, वह भी ईंट-चूने का बना है, और उसके भीतर विद्यमान काले पत्थर का टुकडा केवल पत्थर का टुकडा ही है। बुद्धि द्वारा स्थिति का विश्लेषणन करने के कारण हिन्दू शौर्य निष्फल रहा। चिश्ती ने अजमेर में आकर अड्डा जमाया और गौरी को कहलवाया कि हिन्दू सेना को बल से नहीं, छल से ही जीता जा सकता है।

गौरी ने चिश्ती का हुक्म बजाया। ११९२ में वह जब फिर तरावडी के मैदान में आया तो चौहाण ने उस भगोडे को धिक्कारा। गौरी ने उत्तर दिया कि वह अपने बडे भाई मुइनुद्दीन के आदेश पार आया है और उसका आदेश पाए बिना नहीं लौट सकता। साथ ही उसने कहा कि पृथ्वीराज का संदेश उसने अपने बडे भाई के पास भेज दिया है तथा उस ओर से आदेश आने तक वह युद्ध से विरत रहेगा। राजपूत सेना ने शस्त्र खोल दिए और उसी रात को गौरी की सेना ने राजपूत सेना को छिन्न-भिन्न कर डाला, किन्तु किसी हिन्दू ने यह समझने का कष्ट नहीं किया कि काफिर के साथ छल करना इस्लाम के शास्त्र में विहित है। इस काल का साहित्य राजपूतों के शौर्य की गाथा सुनाता है, किन्तु इस्लाम के शास्त्र के विषय में वहाँ एक शब्द भी नहीं मिलता। फलस्वरूप चिश्ती आनन्द से अजमेर में बैठकर अपने ‘चमत्कार’ दिखलाता रहा। अजमेर के मंदिरों को ध्वस्त होते देखकर उसने अल्लाह का शुक्र बजाया। अल्लाह की फतह हुई थी। कुफ्र का मुँह काला। कोई आश्चर्य नहीं कि अल्लाह ने अजमेर को इस्लाम कि एक प्रमुख जियारत-गाह बना दिया। चिश्ती की मजार पर उबलते चावल, चढ़ने वाले फूल तथा संचित होने वाला धन अशंतः हिन्दूओं की देन है, किन्तु किसी हिन्दू ने आज तक यह जानने का कष्ट नहीं किया कि वहाँ पर गडा हुआ सूफी वस्तुतः क्या चीज़ था और उसने भारतभूमि के प्रति कितना बडा द्रोह किया था। इसका कारण यही है कि हिन्दू समाज ने इस्लाम को एक ‘धर्म’ मान लिया है।

(स्रोत: स्व. सीताराम गोयल की पुस्तक ‘सैक्युलरिज्म: राष्ट्रद्रोह का दूसरा नाम’, पृ. ४५-४७)

टिकारी रानी के मन्दिर पर देवरहा हंस बाबा का “भक्ति धाम” स्थापित

सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में अग्रगण्य रहा टिकारी राज:-

टिकारी  दक्षिण बिहार के गया जिले की एक ऐतिहासिक जमींदारी थी, जिसे भूमिहार समुदाय के राजा वीर सिंह ने स्थापित किया जो 2,046 गांवों में फैला हुआ था। यह  18वीं और 19वीं सदी में काफी प्रभावशाली जागीर थी। इसके वास्तविक संस्थापक लाव गाव में जन्मे सुंदर सिंह (शाह) थे। इस राजा ने टिकारी राज का विस्तार नौ परगनों में किया था। बुनियाद सिंह, अमर जीत सिंह, हित नारायण सिंह, मोद नारायन सिंह, महाराजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह आदि टिकारी राज के प्रमुख राजा-महाराजा थे। जबकि इंद्रजीत कुअंर, राजरूप कुअंर, रामेश्वरी कुअंर टिकारी राज की प्रतापी महारानी हुईं।

     टिकारी के तीसरे राजा हित नारायण सिंह का जन्म 1801 में हुआ था। अंग्रेजों ने  उनको महाराजा की उपाधि और उसके प्रतीकों का उपयोग करने की अनुमति दी थी । उनका झुकाव अध्यात्म की ओर था और वे एक तपस्वी बन गए थे । उन्होंने अपनी विशाल संपत्ति का प्रबंधन अपनी पत्नी  को सौंप दिया था। उनकी पत्नी ने 29 अक्टूबर 1877 की वसीयत के तहत इसे अपनी बेटी महारानी राजरूप कुँअर को हस्तांतरित कर दिया।

     स्वतंत्रता आंदोलन की कमान टिकारी राज की महारानी इंद्रजीत कुंवर ने संभाली थी। महाराजा हितनारायण सिंह की पत्नी महारानी इंद्रजीत कुंवर धर्मपरायण के साथ एक देशभक्त महिला थीं। उनमें राष्ट्र भावना का विचार कूट-कूटकर भरा हुआ था। महारानी  ने वृंदावन में उससे सटे  मंदिर और एक विशाल भवन का निर्माण कराया था। उन्होंने अकाल ग्रस्त लोगों के भोजन और सहायता पर भी बड़ी राशि खर्च की। टिकारी रानी मंदिर को इसके संस्थापक के कारण ‘राधा इंद्र किशोर’ के मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। वृन्दावन के डांगोली में  यमुना नदी के पार, परिक्रमा मार्ग पर गोदा विहार के यमुना नदी तट पर यह मन्दिर स्थित है।

यह वास्तव में वृंदावन में सबसे बेहतरीन स्मारकों में से एक है जिसे राजस्थानी वास्तुकला में बनाया गया था।

डाकुओं से सुरक्षा मिली थी इस जगह:-

लगभग 200 साल पहले जब टिकारी की रानी वृंदावन की यात्रा के लिए जा रही थीं, तो उन पर कुछ पिंडारी डकैतों ने उन पर हमला कर दिया था और वे उनका सामान लूटना चाहते थे। रानी इंद्रजीत कुंवर यमुना नदी के किनारे अपने प्राण प्यारे भगवान गोपाल की रक्षा करने के लिए भागी और सुरक्षित रूप से यमुना के दूसरे तट पर पहुँच गयीं।

छःसाल में साढ़े तीन लाख लागत लगी:-

यह वह स्थान है जहाँ पर टिकारी रानी मंदिर का निर्माण हुआ था। मंदिर के निर्माण में लगभग 6 साल का समय लगा और 1871 में यह बन कर पूरा हुआ। मंदिर के शिखर को भारी मात्रा में तांबे के पंखों और सोने के पत्तल से सजाया गया है। मंदिर एक ऊंचे और समृद्ध चबूतरे पर बना हुआ है और मंदिर की पूरी बनावट अपनी असाधारण राजस्थानी वास्तुकला के साथ सरल और सुंदर है। मंदिर में श्री राधा कृष्ण राधा राजेंद्र सरकार के रूप में, राधा गोपाल, और श्री लड्डू गोपाल के एक छोटे श्रीविग्रह विराजमान हैं। मूर्ति को कलकत्ता के प्रसिद्ध मूर्तिकार राजेंद्र सरकार ने बनाया था। वर्तमान में ये मंदिर देवरहा हंस बाबा के भक्तों द्वारा संभाले जा रहे हैं। वृंदावन में टिकारी राज के कई अन्य स्थान भी हैं जो धार्मिक महत्व रखते हैं। इस मंदिर को टिकारी  राजा हित नारायण सिंह की विधवा रानी इन्द्रजीत कुंवर ने सन 1865 में बनवाना शुरू किया था और लगातार छ वर्ष तक निर्माण कार्य जारी रहने के बाद, यह मंदिर पूर्ण रूप से सन 1871 में बन कर तैयार हो गया था।

 इस मंदिर को दूर से देखने में भव्य दिखाई पड़ता है। इसकी स्थापत्य कला के बारें में आज भी लोगों के लिए आकर्षण बना हुआ है। इस मंदिर के इतिहास और महत्व के बारे में भी कम लोगों को ही जानकारी है। पत्थरों पर किये गए नक्काशी और विशालकाय प्रवेश द्वार लोगों को स्वत: ही आकर्षित करते हैं। यह मन्दिर अपने ज़माने में अतिथि-सेवा के लिए भी प्रसिद्ध था।

     उस समय इस मंदिर के निर्माण में 3,50,000  रूपया खर्च हुआ था। इसमें विराजमान देवी देवता के पूजा में वार्षिक तौर पर खर्च इत्यादि के लिए महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने 15,000 रूपया के साथ अपने राज के कुछ ज़मीन भी मंदिर के नाम से दान में दे दी थी।

टिकारी घाट भी है:-

यमुना नदी के किनारे केशीघाट से अगर परिक्रमा शुरू करें तो चंद कदम दूर आगे बढ़ते ही वंशीवट, सुदामा कुटी के आगे भव्य टिकारी घाट भी बना हुआ है।टिकारी घाट के निर्माण में उस समय 30,000 रूपया लागत आया था। महारानी इन्द्रजीत कुंवर ने उस समय पिंडारा लूटेरा गिरोह से बच कर यमुना नदी को पार करते हुए वृन्दावन में इसी स्थान पर आई थी, बाद में इसी स्थान पर उन्होंने टिकारी घाट का निर्माण करवाया था।

रानी का महल अतिथि गृह बना :-

इस मंदिर से सटे एक भव्य भवन का भी निर्माण किया गया था। जो उस समय महारानी इन्द्रजीत कुंवर का निवास स्थान था और इसी भवन में महारानी की मृत्यु 26 जनवरी 1878 को हुई थी। उनके मृत्यु के बाद यह भवन “अतिथि गृह” के रूप में जाना जाता है।

अब देवरहा हंसबाबा का भक्ति धाम :-

कालान्तर में मंदिर को रानी इंद्रजीत कुंवर द्वारा देवरहा बाबा को दान कर दिया गया। अब मंदिर को देवरहा बाबा भक्ति धाम के नाम से भी जाना जाता है। यह आश्रम 1990 में देवरहा बाबा के वृंदावन में यमुना तट पर समाधि लेने के बाद उनकी स्मृति में स्थापित किया गया है। यह टिकारी मंदिर परिसर में ही चल रहा है, जिसमें मंदिर, भक्त निवास, गौशाला और टिकारी घाट शामिल है।

विशाल गौशाला :-

यहां गौवंशों की सेवा भी की जाती है। यह शांतिपूर्ण वातावरण और आध्यात्मिक कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है। यह 1850 के दशक से संचालित है, 2002 से ब्रह्मवेता श्री देवरहा हंस बाबा द्वारा ट्रस्ट और श्रद्धालुओं द्वारा इसका प्रबन्ध किया जा रहा है।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

किस्सा भारत की पहली बोलती फिल्म का

“थिएटर में बेतहाशा भीड़ लगी थी। कई हफ्तों तक के टिकट्स बुक हो गए थे। लोग टिकट खरीदने के लिए बेताब थे। लेकिन टिकट मिल ही नहीं पा रहे थे। नतीजा, लोगों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। ऐसे में बेकाबू हो चुकी भीड़ को काबू में करने के लिए पुलिस की मदद लेनी पड़ी।” फिल्म हिस्टोरियन बी.डी.गर्ग ने अपनी किताब “आर्ट ऑफ सिनेमा” में आलम आरा की रिलीज़ का ज़िक्र करते हुए लिखा।
भारत की पहली साउंड फिल्म आलम आरा, जो साल 1931 में रिलीज़ हुई थी, उसने भारतीय सिनेमा और भारत, दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया। और एक इंसान जो इस पूरे बदलाव का अगुआ, या कहना चाहिए कि सूत्रधार बना, वो थे अर्देशिर ईरानी। आज अर्देशिर ईरानी जी का जन्मदिन है। 5 दिसंबर 1886 को एक पारसी परिवार में अर्देशिर ईरानी का जन्म हुआ था। वो कभी स्कूल टीचर हुआ करते थे। केरोसीन इंस्पैक्टर के तौर पर भी उन्होंने काम किया था।
लेकिन वो जीवन में कुछ अलग, कुछ बड़ा करना चाहते थे। इसलिए जे.जे.आर्ट्स स्कूल से उन्होंने ग्रेजुएशन किया। इसके बाद वो अपने पिता के फोनोग्राफिर इक्विपमेंट्स और म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट्स के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। इसी दौरान ही उन्हें फिल्म बिजनेस से जुड़ने का आईडिया आया।
इसलिए अपने दोस्त और बिजनेसमैन अब्दुल अली ईसुफअली के साथ मिलकर अर्देशिर ईरानी ने “टैंट सिनेमा” के ज़रिए फिल्में दिखाने का काम शुरू किया। उस ज़माने में हर जगह आज के जैसे सिनेमाहॉल्स नहीं हुआ करते थे। तब बहुत से लोग टैंट में प्रोजेक्टर लगाकर पब्लिक से पैसे लेकर उन्हें फिल्म दिखाते थे।
टैंट सिनेमा के बिजनेस में अर्देशिर ईरानी को कामयाबी मिली। उनकी जान-पहचान का दायरा बढ़ा। और साल 1905 में वो “यूनिवर्सल स्टूडियोज़” के भारत के प्रतिनिधि बन गए। 1914 में अर्देशिर ईरानी ने ईसुफअली के साथ मिलकर मुंबई का एलेक्ज़ेंडर थिएटर खरीद लिया। साल 1920 में उन्होंने भोगीलाल दवे के साथ मिलकर अपनी पहली प्रोडक्शन कंपनी “स्टार फिल्म्स लिमिटेड” की स्थापना की।
भोगीलाल दवे अमेरिका के “न्यूयॉर्क स्कूल ऑफ फोटोग्राफी” से ग्रेजुएशन करके लौटे थे। उनके साथ मिलकर अर्देशिर ईरानी ने अपनी पहली फिल्म “वीर अभिमन्यू” का निर्माण किया। 1922 में रिलीज़ हुई ये साइलेंट फिल्म अर्देशिर ईरानी की डायरेक्टोरियल डेब्यू थी। इस फिल्म में लीड हीरोइन थी एक्ट्रेस फातिमा बेगम। ये वही फातिमा हैं जिनकी बेटी ज़ुबैदा ने आगे चलकर अर्देशिर ईरानी द्वारा निर्मित भारत की पहली टॉकी फिल्म आलम आरा में काम किया था।
लगभग 15 साइलेंट फिल्मों का निर्माण करने के बाद अर्देशिर ईरानी “स्टार फिल्म्स लिमिटेड” से अलग हो गए और उन्होंने “रॉयल आर्ट स्टूडियो” की स्थापना की। इस नई फिल्म कंपनी के बैनर तले भी उन्होंने कुछ फिल्मों का निर्माण किया। आखिरकार 1926 में उन्होंने स्थापित किया “इम्पीरियल फिल्म्स।”
यही वो बैनर था जिसके अंडर में उन्होंने भारत की पहली टॉकी फिल्म “आलम आरा” का निर्माण किया था। आलम आरा बनाने की प्रेरणा अर्देशिर ईरानी को मिली थी “शो बोट” नाम की एक अमेरिकन फिल्म देखकर जो 40 प्रतिशत टॉकी थी। वो फिल्म अर्देशिर ईरानी ने 1930 में मुंबई के “एक्सेलसियर सिनेमा” में देखी थी।
उस ज़माने में भारतीय बाज़ार में साइलेंट फिल्मों का ही दबदबा था। उस वक्त अमेरिका में बनी टॉकी फिल्में ही अवेलेबल होती थी। मगर जब अर्देशिर ईरानी ने “आलम आरा” बनाई तो दौर पूरी तरह से बदल गया। “आलम आरा” में ही पहला फिल्मी गीत था जिसे “वज़ीर मोहम्मद खान” ने गाया था। उन्होंने एक अहम किरदार भी “आलम आरा” में निभाया था।
इम्पीरियल फिल्म कंपनी जिस जगह मौजूद थी वहां पास ही एक रेलवे ट्रैक था। दिन भर वहां से रेलगाड़ियों का आना-जाना लगा रहता था। इसलिए एक साउंड फिल्म को वहां बनाना बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य था। ऐसे में अर्देशिर ईरानी ने फैसला किया कि वो रात में शूटिंग करेंगे। इस तरह रात के एक बजे से लेकर सुबह तीन बजे तक आलम आरा की शूटिंग की जाती थी।
यानि मात्र तीन घंटे की ही शूटिंग हो पाती थी। यही वजह है कि इस फिल्म को कंप्लीट करने में बहुत वक्त लग गया था। उस ज़माने में ये फिल्म बनाने में चालीस हज़ार रुपए खर्च हुए थे। लेकिन जब ये फिल्म मैजेस्टिक सिनेमा हॉल में रिलीज़ हुई तो लोग इसे देखने के लिए लोग टूट पड़े। फिल्म ने बहुत शानदार बिजनेस किया। कुल 29 लाख रुपए का कलैक्शन इस फिल्म ने किया था।
साल 1934 में अर्देशिर ईरानी ने पहली पर्शियन टॉकी फिल्म भी बनाई थी जिसका नाम था “द लोर गर्ल।” ये फिल्म भी खूब चली थी। उस ज़माने में ईरान में भी इस फिल्म को प्रदर्शित किया गया था। और वहां भी “द लोर गर्ल” को बहुत पसंद किया गया था। 14 अक्टूबर को साल 1969 में 82 साल की उम्र में अर्देशिर ईरानी जी का निधन हो गया था। आर्देशिर ईरानी जी को किस्सा टीवी का सैल्यूट। बिग सैल्यूट।
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मौलाना मदनी विवाद: आतंक और काफिरों का माल लूटना इस्लाम का राजनीतिक सिद्धांत

जमाते उलेमा के नेता मौलाना महमूद मदनी ने गत ३० नवंबर को भोपाल में एक सभा में कहा कि *‘इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों ने “जिहाद” जैसी इस्लाम की पवित्र धारणा को दुर्व्यवहार, अव्यवस्था और हिंसा से जुड़े शब्दों में बदल दिया है। … कहीं पर कोई आतंकवादी घटना हो जाती है तो उसको “जिहाद” बता दिया जाता है। मुसलमानों के ऊपर गलत आरोप लगाए जाते हैं।  जब-जब जुल्म होगा तब-तब जिहाद होगा।’
उस पर भाजपा नेता, और बिहार के राज्यपाल, आरिफ मुहम्मद खान ने कहा कि मौलाना मदनी के देवबंदी मदरसे में पढ़ाया जाता है कि “दीन ए हक की तरफ बुलाने और जो उसे कुबूल ना करे उससे जंग करने को ‘जिहाद’ कहते हैं।” यानी *जो मुसलमान बनने के लिए कहे जाने पर मना कर दे, उस से लड़ना जिहाद है।
यह प्रसंग “जिहाद” को ठीक से समझने की माँग करता है। विशेषकर हिन्दुओं को, जो इसे उतना ही जानते हैं जितना वृन्दावन की गाय। भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी यह दिखाती हैं। किसी ने जिहाद पर कुछ न कहा, केवल मदनी को बुरा-भला कहने बैठ गये! यानी, साँप छोड़ बस लकीर पीटते रहना।
पहली बात, मदनी किन्हें ‘इस्लाम और मुसलमान के दुश्मन’ बता रहे हैं?
*मूल इस्लामी किताबें — कुरान, हदीस (मुहम्मद के कथन) और सीरा (मुहम्मद की जीवनी) — ही दूसरे सब को “दुश्मन” बताती है।* कुरान (2:98) के अनुसार ‘जो अल्लाह के कहे से इन्कार करते हैं’ वे काफिर हैं, और ‘अल्लाह काफिरों का दुश्मन है’। सो *इस्लाम ही गैर-मुस्लिमों को दुश्मन कह कर उन्हें मिटाने, अपमानित करने की खुली घोषणा करता है।* इस अपनी ठानी दुश्मनी को स्थाई भी बताता है। (कुरान, 60:4)
तब दुश्मनी का दोषी कौन है, मौलाना?
कुरान की लगभग चार सौ आयतों में काफिरों, यानी गैर-मुस्लिमों, का जिक्र है। सभी में मानो पानी पी-पीकर ‘मूर्तिपूजा’, ‘झूठे ईश्वर’, ‘बहुदेवपूजा’, आदि दूसरे धर्मों और उन्हें मानने वालों को कोसा गया है; उन्हें मिटा देने के निर्देश हैं। यही ‘अल्लाह का काम’ यानी जिहाद है। इस का अर्थ मुहम्मद के शब्दों में: ‘जो इस्लाम का वर्चस्व बनाने के लिए लड़ता है, वही अल्लाह के लिए लड़ता है।’ (सहीह बुखारी, 1:3:125)
*यह जिहाद मुस्लिम समाज के लिए बाध्यकारी भी है, ‘जब तक कि पूरी दुनिया अल्लाह की नहीं हो जाती।’* (कुरान, 8:39) मुहम्मद के अनुसार, *यदि कोई मुसलमान ‘बिना जिहाद में हिस्सा लिए मर जाता है, जिस ने जिहाद में हिस्सा लेने की ख्वाहिश नहीं की, वह एक मुनाफिक (पाखंडी) की मौत मरता है।’* (सहीह मुस्लिम, 20:4696) मुहम्मद ने मुनाफिक को घृणित कहा है। यानी, जिहाद लड़ना न चाहने वाला भी हेय है। सो उन मुसलमानों को भी धमकाया गया है जो जिहाद लड़ने से बचना चाहें।
तब ‘मूर्तिपूजकों और ‘कई देवी-देवताओं को पूजने वाले’ हिन्दुओं, बौद्धों, जैनियों, आदि को इस्लाम के प्रति क्या रुख रखना चाहिए? यह मदनी ही बताएं।‌
असल में, *इस्लाम केवल रिलीजन नहीं है; वह मुख्यत: राजनीति है। उस की तीनों मूल किताबें आधे से अधिक बस दूसरों को मुस्लिम बनाने या मिटाने की फिक्र से भरी हैं। इस प्रकार, राजनीतिक इस्लाम से सभी प्रभावित होते हैं। इसीलिए उस की आलोचना सब का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।* हिन्दुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों व नास्तिकों के लिए भी अपने धर्म, संस्कृति, विचार-विश्वास, समाज और कानूनों की रक्षा का कर्तव्य।
फिर, इस्लामी शब्दावली में *‘जुल्म’* का भी अलग ही अर्थ है! यह संकेत आरिफ मुहम्मद खान की टिप्पणी में भी है। *कुरान में ‘सब से बड़ा जुल्म’ है — मूर्तिपूजा करना!* कुरान की आयतें 31:13, 4:48, 4:116 आदि कहती हैं कि *मूर्तिपूजा सब से बड़ा जुल्म, ‘जुल्मो-अजीम’ है। इस हद तक कि बाकी सब माफ हो सकता है, परन्तु शिर्क या मूर्तिपूजा नहीं। विविध देवी-देवताओं या उनकी मूर्ति की पूजा करना सब से बड़ा ‘जुल्म’ है।* इस प्रकार, मदनी की बात का इस्लामी अर्थ है कि *जब तक मूर्तिपूजा रहेगी तब तक उसे मिटाने को जिहाद चलता रहेगा। महमूद गजनवी से लेकर तालिबान तक सतत इतिहास भी यही है। काशी, मथुरा, अयोध्या में और क्या हुआ था? जिहादियों ने ‘जुल्म’ ही खत्म किया था!!*
इसलिए, देवबंदी मदरसों द्वारा ‘जुल्म’ का अर्थ इस्लाम में आने का निमंत्रण अस्वीकार करना बताना सही है। यानी *जब तक मूर्तिपूजा, बहुदेवपूजा करने वाले लोग मुसलमान नहीं बन जाते तब तक उनके खिलाफ जिहाद रहेगा। यह केवल कोरा सिद्धांत नहीं, वरन पूरी चौदह सदियों का इस्लामी व्यवहार भी है।
 पिछले सात-आठ दशकों में ही पूर्वी बंगाल, कश्मीर और पश्चिमी पंजाब के हजारों मंदिरों व देवमूर्तियों का क्या हुआ? उनका अस्तित्व ही ‘जुल्म’ था — यह बात हिन्दू नेता न समझना चाहें, पर तमाम इस्लामी समझते हैं।‌ इसलिए उन्हें नेस्तनाबूद करना वे अपना फर्ज मानते हैं।‌ *यह किसी मौलाना की निजी राय नहीं, बल्कि इस्लाम का उसूल है। यही है मौलाना मदनी का: ‘जुल्म के खिलाफ जिहाद।’
मदनी यह सब बेहतर जानते हैं। पर तेवर दिखाते हैं मानो मुसलमानों पर ही अत्याचार हो रहा हो! जिहाद की असलियत छिपा कर किसी तरह मुसलमानों को भड़काना चाहते है। क्योंकि बड़ी संख्या में मुसलमान भी दूसरे धर्म वालों का खात्मा करना बेजा समझते हैं, पर जिहाद को ‘पवित्र’ बताकर, ‘वन्दे मातरम्’ का बहाना गढ़कर मदनी अपनी ओर से मुसलमानों को ललकार रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट को धमका रहे हैं। जबकि कोई किसी को ‘वन्दे मातरम्’ कहने के लिए मजबूर नहीं करता। सो, मदनी सिर्फ उत्तेजना और डर पैदा करना चाहते हैं। ताकि हिन्दू असहज और आतंकित हों, और जिहाद को ‘पवित्र’ मान कर उस पर चुप रहें। यह राजनीतिक इस्लाम का‌ क्लासिक तेवर है।
यह कुरान में  लिखा है कि काफिर को आतंकित किया जा सकता है (8:12) —  “याद करो तुम्हारे अल्लाह ने फरिश्तों को कहा, ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ। सो तुम मोमिनो को मजबूती से खड़ा रखो। मैं काफिरों के दिल में आतंक भर दूँगा। फिर तुम उन की गर्दनों पर मारो और उन की हर ऊँगलियों को।’”
अब सोचें, किसी मुस्लिम द्वारा काफिरों की गर्दन और ऊँगलियाँ काट देना आतंकवाद है, या जिहाद?
इसी तरह, कुरान दूसरों को अपमानित करने भी कहता है (9:29) — ‘‘किताब वाले लोग जो अल्लाह पर ईमान नहीं लाते, न अखीरत को मानते हैं, न वे चीजें छोड़ते हैं जिसे अल्लाह ने अपने रसूल के माध्यम से हराम ठहराया, उन से तब तक लड़ो जब तक वे अपमानित हो कर जजिया (टैक्स) देने के लिए तैयार नहीं हो जाते।’’
विचार करें — ऐसे निर्देश रिलीजन है या पॉलिटिक्स? कुरान ऐसे निर्देशों से ओत-प्रोत है।
तब मदनी जिसे ‘आतंकवादी घटना’ कहकर अपने ‘पवित्र जिहाद’ से अलग दिखाना चाहते हैं, उस का मतलब क्या है? क्योंकि जिन भी कामों — किसी की गर्दन काट देना, किसी काफिले या गाँव पर हमलाकर लोगों से इस्लाम कबूल करवाने, गुलाम बनकर बेचने, जिम्मी बना कर अपमानित, नीच दरजे का जीवन जीने को मजबूर करना, उन की स्त्रियों-बच्चों को ‘लूट का माल’ मान कर मुस्लिम लड़ाकों में बाँटना, आदि — को आतंकवाद कहा जाता है, वह मुहम्मद ने स्वयं किए थे। यह सब सीरा में बारं-बार दर्ज है। इन सब कामों को मुहम्मद ने जिहाद कहा था। अतः इसे ‘आतंकवादी घटना’ नहीं कहा जा सकता। यह राजनीतिक इस्लाम की सामान्य गतिविधि है।
मुहम्मद ने खुद कहा था कि, ‘’मुझे पाँच चीजें मिली हैं जो पहले किसी और को नहीं मिली थी।’ जिस में पहली ही चीज यह थी:  ‘अल्लाह ने आतंक द्वारा मुझे जीत दिलाई… मेरे दुश्मनों को आतंकित करके।’ तीसरी चीज थी: ‘लड़ाई में लूटा गया माल मेरे लिए जायज बनाया, जो कि मुझसे पहले किसी और के लिए जायज नहीं था।’ (सहीह बुखारी, 1:7:301)।
सो, आतंक का उपयोग करना, और काफिरों का माल लूटना इस्लाम के राजनीतिक सिद्धांत का अंग है। क्योंकि इस्लाम पूरी तरह मुहम्मद के वचन और कर्म से बना है, जिन्होंने काफिरों पर अक्सर आकस्मिक, छिप कर अनेक हमले किए थे। अपने जीवन के अंतिम नौ वर्षों में मुहम्मद ने औसतन हर छः सप्ताह एक हिंसक घटना को अंजाम दिया। इसलिए मुसलमान द्वारा आतंक का उपयोग करना एक मजहबी कार्य है। वे इस का गर्व भी करते हैं कि काफिर उन से डरते हैं।
कोई भी वैज्ञानिक सर्वेक्षण पुष्टि करेगा कि लोकतांत्रिक देशों में इस्लामी माँगों के सामने झुकना, और मुस्लिम नेताओं की उग्र बयानबाजी और जबरदस्ती (जैसे सड़कों को घेर कर नमाज पढ़ना) को बर्दाश्त करना, मुख्यतः डर से होता है। यह डर राजनीति का है, रिलीजन का नहीं। वह राजनीति ही इस्लाम का प्रमुख रूप है।
मौलाना मदनी जैसे अधिकांश मुस्लिम नेताओं का अंदाज भी इस की पुष्टि करता है। वे मीडिया, सरकार, और सुप्रीम कोर्ट पर धौंस-धमकी की भाषा का प्रयोग मजे से करते हैं। देश का राष्ट्रगान ‘वन्दे मातरम्’ नहीं गाने के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं। जबकि कहीं जबरिया ‘वन्दे मातरम्’ गवाने का, या ‘मुसलमानों पर गलत आरोप लगाने’ का उदाहरण नहीं देते। किसी ‘आतंकवादी घटना’ का ठोस उल्लेख नहीं करते, ‘जिसे जिहाद कह दिया’ जाता है।
यह सब साफ-साफ हुज्जत, धमकी और धौंस की भाषा है। जिहाद के स्थाई निशाने पर काफिरों को ही अपराध-बोध से भरना कि वही मुसलमानों पर ‘जुल्म’ कर रहे हैं। जैसे, विगत दशकों में कश्मीरी हिन्दुओं ने मुसलमानों पर ‘जुल्म’ किया था — जिस कारण मुसलमानों को जिहाद करके उन का खात्मा करना पड़ा।
इस स्थाई शिकायती, हुज्जती भंगिमा और उग्र बयानबाजी में कोई ईश्वरीय बात नहीं है। कोई रिलीजियस तत्व नहीं है। यह सब शुद्ध राजनीति है। आक्रामक राजनीति। मौलाना मदनी अभी मौखिक हिंसा का ही उपयोग कर रहे हैं जो जिहाद का ही रूप है। (साभार- जारी)
  साभार नया इंडिया से