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‘ वंदे मातरम् ‘ पर विमर्श !

लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले जब भारत औपनिवेशिक दासता के अंधकार में डूबा हुआ था, तब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में “वंदे मातरम्” की रचना की। यह केवल एक गीत नहीं था, बल्कि वह भावनात्मक शक्ति व ऊर्जा थी जिसने गुलाम भारत को अपनी माता, अपनी पहचान और अपने स्वाभिमान से फिर जोड़ा। 1870 के दशक में रचित  यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ चलता हुआ आज 21वीं सदी के भारत की संसद तक आ पहुँचा है। 8 दिसंबर, 2025 को लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर हुई विशेष बहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह रचना आज भी केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय  सामाजिक एवं राजनीतिक की भावना का उद्घोषऔर राष्ट्रचेतना का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।
गुलामी के दौर में “वंदे मातरम्” का  उदघोष केवल भावनात्मक नारा नहीं था, बल्कि वह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का स्वर था। लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, अरविंदो घोष,केशव बलिराम हेडगेवार , लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल जैसे नेताओं ने इसे जन-जन की चेतना से जोड़ा। “सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्” के माध्यम से भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवित माता के रूप में प्रस्तुत हुआ। रवींद्रनाथ ठाकुर ने ठीक ही कहा था कि इस गीत में भारत की आत्मा बोलती है। इसीलिए यह गीत केवल राजनीतिक क्रांति नहीं, बल्कि’ सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ का आधार बना।
आज जब संसद में इस गीत को लेकर तीखी बहस हुई, तो वह केवल अतीत की व्याख्या पर नहीं, बल्कि वर्तमान राष्ट्रबोध और भविष्य की दिशा पर भी केंद्रित थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि 1937 के कालखंड में ‘वंदे मातरम्’ के कुछ अंशों को राजनीतिक दबाव में हटाकर राष्ट्रचेतना को खंडित किया गया। विपक्ष ने इसे इतिहास को अपने अनुकूल मोड़ने का प्रयास बताया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके के नेताओं ने यह तर्क दिया कि इस गीत को विभाजनकारी राजनीति से अलग रखकर राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। यह टकराव दरअसल इस बात का संकेत है कि ‘वंदे मातरम्’ आज भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है और इसकी व्याख्या को लेकर राष्ट्र की वैचारिक दिशा तय करने की कोशिशें जारी हैं।
” ‘ वंदे   मातरम् ‘ को लेकर मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति शुरू होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर, 1937 को’ वंदे मातरम’ के खिलाफ नारा बुलंद किया । कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा,इसलिए   की मुस्लिम लीग के आधारहीन दावों  को करारा जवाब देते, इसके उलट उन्होंने’ वंदे मातरम’  की पड़ताल  शुरू कर दी।”
यह बहस ऐसे समय में हुई है जब भारत ‘विकसित भारत ,2047’ की ओर कदम बढ़ाने का संकल्प दोहरा रहा है। आज का भारत केवल भावनात्मक राष्ट्रवाद से नहीं, बल्कि नीति, तकनीक, सुरक्षा और वैश्विक भूमिका से भी संचालित हो रहा है। संसद में जब डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप, रक्षा, आत्मनिर्भरता, सीमाओं की सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर चर्चा होती है, तो वह आधुनिक भारत के उस स्वरूप को रेखांकित करती है, जिसमें विकास और राष्ट्र- बोध साथ-साथ चल रहे हैं। इस संदर्भ में ‘वंदे मातरम्’ केवल अतीत का गीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा भी बनता दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उभरा राष्ट्रवाद स्वयं को सांस्कृतिक और विकासोन्मुख राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘वंदे भारत’ ट्रेनें, जल जीवन मिशन, हर घर नल योजना, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और अंतरिक्ष अभियानों को इस सोच के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ‘वंदे मातरम्’ का “सुजलाम्–सुफलाम्” आज जल संरक्षण, कृषि सुधार और हरित ऊर्जा के नए संदर्भों में व्याख्यायित किया जा रहा है। चंद्रयान, गगनयान और अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका उस आत्मविश्वास का संकेत है जिसे स्वतंत्रता संग्राम के समय इस गीत ने जन्म दिया था।
हालाँकि ‘वंदे मातरम्’ की समकालीन व्याख्या को लेकर असहमति भी उतनी ही गहरी है। एक पक्ष इसे सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रगौरव का प्रतीक मानता है, तो दूसरा पक्ष इसके राजनीतिक उपयोग पर सवाल उठाता है। यह बहस अपने आप में भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है, जहाँ प्रतीकों की व्याख्या भी खुली बहस के दायरे में होती है। संसद की हालिया बहस ने यह साफ कर दिया कि राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति के तरीकों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र की एकीकरण  से कोई विमुख नहीं है!
आज भारत की वैश्विक भूमिका भी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की सोच से जुड़ती दिखाई देती है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सक्रियता, रूस-यूक्रेन संकट में संतुलित कूटनीति, जी-20 की अध्यक्षता और वैश्विक आर्थिक मंचों पर भारत की भूमिका—ये सभी उस आत्मविश्वासी भारत की छवि निर्मित करते हैं जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा है, लेकिन वैश्विक जिम्मेदारियों से भी पीछे नहीं हटता। इस दृष्टि से ‘वंदे मातरम्’ केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिकता से भी जुड़ता है।
‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य केवल आर्थिक उन्नति तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक समरसता, तकनीकी नवाचार, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना के संतुलन का भी संकल्प है। स्वच्छ भारत अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, हरित ऊर्जा, नेट-जीरो 2070 का लक्ष्य और एक पेड़ माँ के नाम जैसे कार्यक्रम इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं। इन सभी प्रयासों में ‘वंदे मातरम्’ की वह भावना अंतर्निहित है जिसमें मातृभूमि की सेवा सर्वोच्च कर्तव्य मानी जाती है।
सवाल यह है कि क्या ‘वंदे मातरम्’ आज भी उसी तरह एकजुट करने वाली शक्ति बना रह सकता है, जैसे वह स्वतंत्रता संग्राम के दौर में था? संसद की ताज़ा बहस इसका आंशिक उत्तर देती है। आरोप-प्रत्यारोप, वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद यह स्पष्ट है कि राष्ट्र की केंद्रीय अवधारणा सभी राजनीतिक धाराओं के लिए अभी भी अपरिहार्य बनी हुई है। इसी अर्थ में ‘वंदे मातरम्’ एक सांस्कृतिक धरोहर के साथ-साथ एक जीवंत राजनीतिक प्रतीक भी है।
डेढ़ सौ वर्षों की यात्रा के बाद ‘वंदे मातरम्’ जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ वह केवल स्मृति का विषय नहीं, बल्कि सतत पुनर्व्याख्या की मांग भी करता है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि साझा चेतना, साझी जिम्मेदारी और सामूहिक भविष्य का नाम है। संसद में हुई बहस ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रप्रेम की भावना आज भी उतनी ही प्रबल है, भले ही उसके स्वर और रूप बदल गए हों।
भारतीय कांग्रेस के 1896 के अधिवेशन में रविंद्र नाथ टैगोर ने गीत को स्वर दिया। फिर, 7 अगस्त, 1905 को  बंगाल विभाजन के विरुद्ध कोलकाता के टाउन हॉल में बहिष्कार सभा में इसे गाया गया था।  दिसंबर,1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में  ‘ वंदे मातरम ‘ को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला। अरविंदो घोष ने गीत  का अंग्रेजी में अनुवाद किया एवं केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान(वर्तमान बिहार के राज्यपाल) ने ‘ उर्दू ‘ में अनुवाद किए ।1906 में ‘ वंदे मातरम ‘ देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया  कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में रविंद्र नाथ ठाकुर ने इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया। 1906 में लाला लाजपत राय ने ‘ वंदे मातरम’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। 1907 में भीकाजी कामा ने स्टटगार्ड में पहला भारतीय ध्वज फहराया, जिस पर  स्वर्णाक्षरों में लिखा था ‘ वंदे मातरम’ । सितंबर, 1909 में पेरिस में वंदे मातरम का सचित्र  मैडम भीकाजी कामा द्वारा स्थापित “पेरिस इंडियन सोसाइटी” में मदन लाल ढींगरा के फांसी के चित्र के साथ किया था।
14 अगस्त, 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का आरंभ  ‘ वंदे मातरम ‘ एवं समापन  ‘ जन गण मन’ के साथ हुआ था। 15 अगस्त ,1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकार नाथ ठाकुर के  राग( स्वर) में  गान ‘ वंदे मातरम’ के गायन का सीधा प्रसारण किया था। 24 जनवरी, 1950 को’ वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत  एवं ‘ जन गण मन ‘ राष्ट्रीय गान बना था। 15 सितंबर, 1959 में दूरदर्शन प्रारंभ हुआ, तब से सुबह की शुरुआत’ वंदे मातरम’ से  होती रही हैं। सन् 2025 में’ वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर देश भर में विशेष आयोजन और सामूहिक गायन हुआ, जिसमें आकाशवाणी की भूमिका महत्वपूर्ण रही ।वर्तमान में भी दूरदर्शन पर ‘ वंदे मातरम’ का धुन बजता है। राष्ट्रीय उत्सव, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर दूरदर्शन ने ‘ वंदे मातरम ‘ की नई और  सुंदर धुन प्रस्तुत की है, जो राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रबल करती है। वर्ष ,2002 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में वैश्विक स्तर के सबसे लोकप्रिय 10 गीतों को चुनने के लिए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण कराया था, इसमें वैश्विक  स्तर के 150 देशों  के इंटरनेट यूजर्स ने  ‘ वंदे मातरम ‘ को दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत चयनित किया था।
सन् ,2005 में वंदे मातरम के 100 वर्ष पूरे होने पर  वर्षभर समारोह हुआ था। 17 सितंबर, 2006 को समारोह  के समापन पर मानव संसाधन मंत्रालय( अब  केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय) ने गीत को विद्यालयों में गाने पर जोर दिया, लेकिन  विरोध होने पर तत्कालीन  संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ( यूपीए)  सरकार ने कहा कि,” यह अनिवार्य नहीं, स्वेच्छा पर निर्भर करता है।”
आज जब भारत विश्व मंच पर अपनी नई पहचान गढ़ रहा है, तब यह आवश्यक है कि ‘वंदे मातरम्’ को केवल राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा के प्रतीक के रूप में देखा जाए। यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है—तब भी, अब भी और आने वाले समय में भी।
(लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालान, नई दिल्ली
राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं)

बाल साहित्यकार डॉ. विकास दवे का समरस संस्थान द्वारा अभिनंदन

कोटा ।  समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत गांधीनगर, गुजरात के पदाधिकारियों ने रविवार को कोटा में आयोजित एक कार्यक्रम में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे को अभिनंदन किया। संस्थान के संस्थापक एवं संयोजक डॉ. मुकेश कुमार व्यास की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शशि जैन एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने डॉ. दवे को माल्यार्पण कर , संस्था का उपराना और शाल ओढ़ा कर अभिनंदन पत्र भेंट किया। राजस्थान प्रांत प्रभारी डॉ. वैदेही गौतम, संभागीय अध्यक्ष महेश पंचोली, जितेंद्र निर्मोही, रीता गुप्ता, साधना शर्मा ,विजय जोशी मौजूद रहे।
अभिनंदन पत्र का वाचन करते हुए डॉ. प्रभात सिंघल ने कहा विस्तृत आभामंडल वाले देव बाल साहित्य के फलक को अपनी चन्द्र किरणों से आलोकित कर रहे हैं। हंसमुख, सरल , सहज स्वभाव वाले देव ज्ञानवान हैं, कर्मयोगी हैं, क्षीण विचारों से मुक्त हैं। आपको राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से अनुमोदित, डॉ. मृदुला सिन्हा (महामहिम राज्यपाल, गोआ) द्वारा अभियान का ब्रांड एम्बेसेडर मनोनित किया जाना गर्व की बात है।
अहर्निश बाल साहित्य सृजन के साथ-साथ डॉ. दवे कर्त्तव्य परायणता, आस्था, निष्ठा एवं नैतिकता के साथ मध्यप्रदेश सरकार की साहित्य अकादमी में निदेशक के रूप में अपनी रचनात्मक भूमिका का निर्वाह कर हिंदी, साहित्य और संस्कृति की सेवा कर रहे हैं। सृजन और सेवा से आपने साहित्य जगत में अपना विशिष्ठ स्थान बनाया है। आपके मार्गदर्शन, मूल्यवान परामर्श एवं प्ररेणा से साहित्य अकादमी देशभर में अग्रणीय पंक्ति में है।
भारतीय पौराणिक संस्कृति और राष्ट्र भक्ति के साथ-साथ बाल मनोविज्ञान से प्रेरित बाल साहित्यकार डॉ. विकास दवे राजस्थान और मालवा के गौरव हैं और साहित्य जगत में उनका कद व व्यक्तित्व समस्त सीमाओं से परे है । इन्होंने विश्व की सर्वाधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिका ‘देवपुत्र’ का 32 वर्ष तक संपादन किया और वर्तमान में मानद संपादक के रूप बाल-साहित्य के उत्थान के लिए कटिबद्ध हैं। आपने ‘समकालीन बाल साहित्य’ (भारत की प्रथम बाल साहित्य शोध पत्रिका), ‘हरिद्रा’ अंतराष्ट्रीय शोध पत्रिका तथा साहित्य अकादमी म. प्र. की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ का संपादन भी किया है। विविध विषयों पर इनके 50 से अधिक शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।
आपने देशभर की प्रतिष्ठित व्याख्यान मालाओं, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में बाल साहित्य सहित अनेक विषयों पर तीन हजार से अधिक व्याख्यान दिए हैं। पाठ्यक्रमों में आपकी रचनाएं शामिल हैं। आपको 150 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय  सम्मान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है।
चंबल से श्रृंगारित कोटा नगर में स्वागत करते हुए बाल साहित्य में विराट व्यक्तित्व के धनी डॉ. विकास दवे को उनके  सहिष्णु स्वभाव, जन हितैषी, साहित्यिक और राष्ट्रीय  महत्त्व के कार्यों में अनुपम योगदान करने वाले व्यक्तित्व को यह अभिनंदन पत्र समर्पित करते हुए हम हर्ष और गौरव का अनुभव कर रहे हैं। हम आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
 इस अवसर  बाल साहित्यकार दिविक रमेश, , बलदाऊ राम साहू, ओमप्रकाश क्षत्रिय एवं बड़ी संख्या में हाड़ोती अंचल के बाल साहित्यकार उपस्थित रहे। सभी ने उनके उनके बाल साहित्यिक कार्यों को प्रेरक और अनुकरणीय बताया।

भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान द्वारा केवल अंग्रेज़ी में जारी अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य भर्ती सूचनाओं के विरुद्ध शिकायत

सेवा में,
माननीय सचिव महोदय,
कार्पोरेट कार्य मंत्रालय,
भारत सरकार,
शास्त्री भवन,
नई दिल्ली – 110001।

विषय:
राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) एवं संविधान के अनुच्छेद 14 का घोर उल्लंघन – भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान द्वारा केवल अंग्रेज़ी में जारी अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य भर्ती सूचनाओं के विरुद्ध शिकायत।

महोदय,

राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) के अनुसार केंद्र सरकार के अधीन सभी संस्थानों द्वारा जारी किए गए भर्ती सूचनाएँ, आवेदन प्रपत्र, निविदाएँ आदि दस्तावेज़ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एक साथ समकालिक रूप से जारी किए जाएँ।

यह द्विभाषिक समकालिकता वैधता की अपरिहार्य शर्त है। केवल अंग्रेज़ी में जारी कोई भी भर्ती सूचना/आवेदन प्रपत्र प्रारंभ से ही अवैध एवं शून्य (void ab initio) है तथा उसे जारी करने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।


संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के समक्ष सभी नागरिकों को समान अधिकार हैं। भाषा-आधारित भेदभाव अस्वीकार्य है।

केवल अंग्रेज़ी में भर्ती सूचना जारी करना हिंदी-भाषी आवेदकों के साथ घोर भेदभाव है। वे अपनी मातृभाषा में नौकरी की जानकारी न पाने से रोज़गार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं, जो अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है।


उल्लंघन के तथ्य

दस्तावेज़ का नाम:
भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान मानेसर द्वारा विभिन्न संविदा पदों हेतु भर्ती परिपत्र।
(Vacancy Circular No. IICA-2-44/2012 dated 01.12.2025 regarding vacancies for various contractual positions in Indian Institute of Corporate Affairs)

पत्रांक: IICA-2-44/2012
दिनांक: 01 दिसंबर 2025
वर्तमान उपलब्धता: केवल अंग्रेज़ी में


उल्लंघन के बिंदु

  1. धारा 3(3) का उल्लंघन:
    भर्ती सूचना/वैकेंसी परिपत्र धारा 3(3) के अंतर्गत “नोटिस/भर्ती अधिसूचना” की श्रेणी में आता है, अतः द्विभाषिक होना अनिवार्य है। इसे केवल अंग्रेज़ी में जारी करना प्रत्यक्ष उल्लंघन है।

  2. अनुच्छेद 14 का उल्लंघन:
    केवल अंग्रेज़ी में सूचना देने से हिंदी-भाषी भारतीय नागरिकों को रोज़गार के समान अवसर नहीं मिलते, जो उनके संवैधानिक अधिकार का हनन है।

  3. रोज़गार में भेदभाव:
    हिंदी-भाषी प्रतिभावान उम्मीदवार अंग्रेज़ी भाषा की बाधा के कारण नौकरी के अवसर से वंचित रह जाते हैं, भले ही वे पद के लिए योग्य हों।

  4. आवेदन प्रपत्र पूर्णतः अंग्रेज़ी में:
    संस्थान द्वारा जारी किया गया आवेदन प्रपत्र (Application Form) भी पूर्णतः अंग्रेज़ी में है, जिससे हिंदी-भाषी आवेदक निर्देशों को सही तरीके से नहीं समझ पाते।

  5. द्विभाषिक समकालिकता का अभाव:
    न तो हिन्दी संस्करण साथ-साथ जारी किया गया, न ही मंत्रालय/संस्थान की हिन्दी वेबसाइट पर उपलब्ध है, जिससे धारा 3(3) की “समकालिकता” की शर्त पूर्ण नहीं होती।

  6. संविदा पदों की सूची:
    IICA द्वारा यह भर्ती परिपत्र संविदा पदों के लिए है, जहाँ भाषाई बाधा के कारण प्रतिभा का बहिष्करण होता है।


उपर्युक्त वैकेंसी परिपत्र एवं आवेदन प्रपत्र निम्नलिखित कारणों से प्रारंभ से ही अवैध एवं शून्य है:

  • धारा 3(3) की अनिवार्य द्विभाषिक समकालिकता का उल्लंघन।

  • संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत रोज़गार के अवसरों में भाषाई भेदभाव।

  • राष्ट्रपति महोदय के 02-07-2008 के आदेशों की खुली अवहेलना।

  • भाषाई आधार पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन।

इस अवैध एवं शून्य भर्ती सूचना को जारी करने की कोई अनुमति नहीं दी जा सकती।


अपेक्षित तत्काल कार्रवाई

  1. भर्ती सूचना का तत्काल निरस्त करें:
    उपर्युक्त अवैध एवं शून्य वैकेंसी परिपत्र तत्काल निरस्त किया जाए।

  2. द्विभाषिक पुनः-जारी:
    उसी भर्ती सूचना को हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में एकसाथ एक ही समय में पुनः जारी किया जाए।

  3. आवेदन अवधि का विस्तार:
    आवेदन के लिए पर्याप्त नई अवधि दी जाए ताकि हिंदी-भाषी भी आवेदन कर सकें।

  4. आवेदन प्रपत्र द्विभाषिक बनाएँ:
    भविष्य में सभी आवेदन प्रपत्र हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध कराए जाएँ।

  5. अनुशासनात्मक जाँच:
    IICA के निदेशन में राजभाषा अधिकारी एवं संबंधित अधिकारियों पर जाँच कराई जाए, जिन्होंने धारा 3(3) एवं राष्ट्रपति के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की है।

  6. भविष्य के लिए आदेश:
    आदेश जारी किया जाए कि IICA द्वारा भविष्य में कोई भी भर्ती सूचना केवल द्विभाषिक रूप में ही जारी होगी, अन्यथा वह स्वतः अवैध मानी जाएगी।

  7. राजभाषा कार्यान्वयन:
    IICA में राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की जाए तथा त्रैमासिक रिपोर्ट तैयार की जाए।

  8. सूचना का अधिकार:
    इस शिकायत पर की गई समस्त कार्यवाही, जाँच-रिपोर्ट, निर्णय आदि की प्रतियाँ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में मुझे प्रेषित की जाएँ।


संलग्नक

  1. दिनांकित 01-12-2025 का अवैध भर्ती परिपत्र (अंग्रेज़ी में)

  2. आवेदन प्रपत्र की पीडीएफ़ (अंग्रेज़ी में)

  3. राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) की लिंक


प्रतिलिपि:

  1. माननीय गृहमंत्री, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

  2. सचिव व संयुक्त सचिव, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

  3. सचिव, संसदीय राजभाषा समिति, लोकसभा सचिवालय, नई दिल्ली।

  4. निदेशक, भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान, गुड़गाँव।

  5. प्रभारी, कार्पोरेट कार्य मंत्रालय, राजभाषा प्रकोष्ठ, नई दिल्ली।

  6. सार्वजनिक शिकायत निवारण पोर्टल (पीजी पोर्टल), भारत सरकार।

  7. निदेशक, भारतीय कार्पोरेट कार्य संस्थान, गुड़गाँव।

शुभम गोस्वामी की घर वापसी

यह शुभम गोस्वामी है जो अमन खान बन गया था।कल उसे भोपाल में मंत्रोच्चारण के द्वारा फिर से हिंदू धर्म में लाया गया

यह मुस्लिम क्यों बना इसकी कहानी बड़ी जोरदार है

एक मुस्लिम महिला लड़की सुमेरा खान इसे रिवर्स लव जिहाद में फँसाई

इसको गाय का मांस खिलाया गया इसको मुस्लिम बनाकर अमन खान नाम रखा गया और जब इसे कहा गया कि तुम मुस्लिम बन जाओ मैं तुमसे शादी कर लूंगी तो यह मुस्लिम भी बन गया

उसके बाद जब यह मुस्लिम बन गया तब सुमेरा खान इसको छोड़कर एक दूसरे हिंदू लड़के के पीछे पड़ गई ताकि उसको भी मुस्लिम बना सके

शुभम गोस्वामी ने मीडिया में आकर अपनी पूरी कहानी बताई फिर पुलिस ने जांच किया और जब आरोपी लड़की को गिरफ्तार किया गया तब 14 लोगों का एक बड़ा रैकेट पकड़ा गया जिसे एक मौलवी चलता था और उसे मौलवी ने 8 से ज्यादा मुस्लिम लड़कियों को इस बात की ट्रेनिंग दिया था कि तुम्हें कैसे हिंदू लड़कों का ब्रेन वास करके उन्हें मुस्लिम बनाना है उन्हें प्रेम जाल में फसाना है और अगर जरूरत पड़े तो उनके साथ शारीरिक संबंध भी बनाने हैं। लड़के के ऊपर रेप का मामला दर्ज करा के अंदर भिजवा दिया था,फिर इस शर्त पर बाहर निकलवाया कि इस्लाम की दावत स्वीकार करेगा फिर उसे राजीनामा करके बाहर निकलवाया और शादी की कन्वर्ट करवाया ,जमात में इस्लाम की ट्रेनिंग लेने भिजवाया।

इस मौके पर खुद मध्य प्रदेश के मंत्री भी उपस्थित रहे उन्होंने उसे पूरे रैकेट के बारे में जानकारी दिया पूरा रैकेट अब जेल में है

सोचिए उनकी सोच और उनकी तैयारी कहां तक है और हमारे शंकराचार्य कहते हैं की फैलाने मुहूर्त में राम मंदिर का उद्घाटन क्यों कर दिया गया।

(वर्तमान में शुद्धि ही आपकी आने वाली पुश्तों की रक्षा करने में सक्षम हैं। याद रखें आपके धार्मिक अधिकार तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक आप बहुसंख्यक हैं। इसलिए अपने भविष्य की रक्षा के लिए शुद्धि कार्य को तन, मन, धन से सहयोग कीजिए। )
#shuddhi_andolan #bhartiya_hindu_shuddhi_sabha #swami_dayanand #swami_shraddhanand

टाटा क्लासएज ने स्कूलों में उद्यम कौशल कार्यक्रमों को बढ़ाने के लिए एनलर्निंग स्किल डेवलपमेंट लिमिटेड के साथ साझेदारी की

मुंबई

भारत में स्कूलों के लिए अकादमिक और डिजिटल शिक्षण समाधानों में एक विश्वसनीय नाम, टाटा क्लासएज लिमिटेड (टीसीई) ने आज पाठ्यक्रम-एकीकृत (Curriculum-integrated), कौशल-आधारित अनुभवात्मक शिक्षण समाधानों के अग्रणी प्रदाता एनलर्निंग स्किल डेवलपमेंट लिमिटेड (एनपावर) के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की। इस साझेदारी के हिस्से के रूप में टाटा क्लासएज, एनपावर में एक रणनीतिक इक्विटी हिस्सेदारी (strategic equity stake) लेगा जो नवाचार और कौशल-आधारित शिक्षा के माध्यम से शिक्षा में बदलाव लाने के साझा दृष्टिकोण को मजबूत करेगा। यह जुड़ाव देश भर में प्रगतिशील शैक्षिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए टाटा क्लासएज की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

 

(बाएं से दाएं) – श्री सुशील मुंगेकर, श्री अरविंद नारायणन, श्री के.आर.एस. जमवाल और श्री तरुण भोजवानी के साथ टाटा क्लासएज और एनपावर की वरिष्ठ नेतृत्व टीम

 

इस साझेदारी के बारे में बात करते हुए टाटा इंडस्ट्रीज लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक और टाटा क्लासएज के चेयरमैन, श्री के.आर.एस. जमवाल ने कहा, “मैं इस साझेदारी पर टाटा क्लासएज और एनपावर को बधाई देता हूँ क्योंकि यह पारंपरिक पढ़ाई से परे स्कूली शिक्षा को काफी मजबूत करता है। आने वाले कल की दुनिया, एआई (AI) और रोबोटिक्स के लिए स्कूल पाठ्यक्रम में जीवन कौशल, गहन चिंतन (critical thinking) और उद्यमिता (entrepreneurship) का समावेश और अनुभव तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।”

 

स्कूली शिक्षा में बदलाव

यह गठबंधन ‘के-12’ (K–12) शिक्षार्थियों के लिए सार्थक और प्रभावशाली समाधान बनाने के लिए टाटा क्लासएज की स्कूली शिक्षा में मजबूत उपस्थिति के साथ व्यावहारिक, उद्यमिता-नेतृत्व वाले शिक्षण में एनपावर की विशेषज्ञता को एक साथ लाता है। संयुक्त प्रयास कक्षा में जुड़ाव को बढ़ाने, रचनात्मकता को बढ़ावा देने और अकादमिक ज्ञान को वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण कौशल के निर्माण पर केंद्रित होगा।

 

सहयोग पर अपना दृष्टिकोण साझा करते हुए, एनपावर के प्रवर्तक (Promoter) और निदेशक श्री सुशील मुंगेकर ने कहा, “टाटा क्लासएज के साथ साझेदारी करना हमारे लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह भारतीय स्कूलों को एक व्यापक कौशल-शिक्षण ईकोसिस्टम (ecosystem) प्रदान करने और नवाचार करने की हमारी क्षमता को मजबूत करता है, जो हर छात्र के लिए सीखने को आकर्षक, अनुभवात्मक और सशक्त बनाता है और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करता है।”

 

इस पहल के माध्यम से एनपावर अपने कार्यक्रमों को शैक्षिक प्रथाओं और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बनाने के लिए टाटा क्लासएज के साथ मिलकर काम करेगा। दोनों संगठन स्कूलों और शिक्षकों को उन उपकरणों और संसाधनों के साथ सशक्त बनाने का एक समान लक्ष्य साझा करते हैं जो सीखने को अधिक संवादात्मक (interactive), समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बनाते हैं।

 

आगे जोड़ते हुए टाटा क्लासएज के सीईओ, श्री तरुण भोजवानी ने कहा, “आज शिक्षा को पाठ्यपुस्तकों और परीक्षाओं से परे जाने की आवश्यकता है। एनपावर में हमारी रणनीतिक हिस्सेदारी उनके दृष्टिकोण और बड़े पैमाने पर आगे की सोच वाले शिक्षण दृष्टिकोण को प्रदान करने की उनकी क्षमता में हमारे विश्वास को दर्शाती है। साथ मिलकर, हमारा लक्ष्य सार्थक सीखने के अनुभव बनाना है जो छात्रों को तेजी से बदलती दुनिया में आगे बढ़ने के लिए व्यावहारिक कौशल और आत्मविश्वास से लैस करें।”

साझेदारी के मुख्य क्षेत्र

यह साझेदारी सीखने, कौशल विकास और रोजगार क्षमता के कई महत्वपूर्ण आयामों में बदलाव को सक्षम करेगा:

अनुभवात्मक शिक्षण कार्यक्रम (Experiential Learning Programs): ऐसे कौशल-आधारित मॉड्यूल विकसित और लागू करना जो स्कूल के पाठ्यक्रम के साथ सहजता से मिल जाएं।

शिक्षक सशक्तिकरण (Teacher Enablement): शिक्षण मॉड्यूल के प्रभावी वितरण के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण और संसाधन प्रदान करना।

छात्र जुड़ाव (Student Engagement): ऐसे मंच और पहल बनाना जो स्कूली छात्रों के बीच रचनात्मकता, समस्या-समाधान और उद्यमिता को प्रोत्साहित करें।

 

व्यापक प्रभाव पर विचार करते हुए, एनपावर के सह-प्रवर्तक और निदेशक श्री अरविंद नारायणन ने टिप्पणी की, “यह सहयोग शिक्षार्थियों के लिए गहन और रचनात्मक रूप से सोचने के अवसर पैदा करने के बारे में है। हम देश भर के स्कूलों में कौशल कार्यक्रमों को बढ़ाने के लिए टाटा क्लासएज के साथ काम करने के लिए उत्साहित हैं।”

 

स्कूलों में कौशल विकास के लिए ईकोसिस्टम को मजबूत करके यह पहल सुनिश्चित करती है कि शिक्षार्थियों को अकादमिक शिक्षा के साथ-साथव्यावहारिक अनुभव भी मिले। साथ मिलकर काम करते हुए एनपावर और टाटा क्लासएज आत्मविश्वास से भरे सक्षम और भविष्य के लिए तैयार व्यक्तियों को तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

 

संगठनों के बारे में
टाटा क्लासएज लिमिटेड, जो टाटा इंडस्ट्रीज लिमिटेड की एक सहायक कंपनी है, अपने अकादमिक समाधानों के निर्बाध अनुकूलन को सुनिश्चित करती है, जिससे स्कूलों के लिए डिजिटल शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया आसान हो जाती है। शिक्षा के प्रति टाटा समूह की स्थायी प्रतिबद्धता द्वारा समर्थित, शिक्षण शास्त्र (pedagogy), प्रौद्योगिकी और सामग्री में कंपनी के नवाचार देश भर के छात्रों के लिए आकर्षक, सार्थक और प्रभावशाली सीखने के अनुभव बनाते हैं।

 

एनलर्निंग स्किल डेवलपमेंट लिमिटेड (एनपावर), पेशेवरों से उद्यमी बने लोगों द्वारा निर्मित एक एड-टेक (ed-tech) कंपनी है, जिसने एक व्यापक, अनुभवात्मक और खेल-आधारित (gamified) शिक्षण पारिस्थितिकी तंत्र बनाया है। यह स्कूलों, शिक्षकों, कॉर्पोरेट भागीदारों और सरकार को एक सामान्य मंच पर आने में सक्षम बनाता है ताकि स्कूली बच्चों के बीच 21वीं सदी के जीवन कौशल, उद्यमिता कौशल, भविष्य के तकनीकी कौशल और डिज़ाइन थिंकिंग को पोषित किया जा सके। कंपनी आज के बच्चों को भविष्य के ‘बदलाव के वाहक’ (change drivers) बनने के लिए सशक्त बनाने के मिशन पर है जो अपने जीवन और अपने आस-पास की दुनिया को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं।

भारतीय पुरातत्व के जनक अलेक्जेंडर कनिंघम

सर अलेक्जेंडर कनिंघम ब्रिटिश सेना का एक अंग्रेज़ अफ़सर था जिसका मन भारत के खंडहरों में रमा, फ़ौजी होकर भी वह विश्व विख्यात खोजी हुआ। एक अनपका खोजी जिज्ञासाओं के तल में इतना गहरा उतरा कि भारतीय पुरातत्व का जनक बनकर निकला

उसका जन्म इंग्लैंड में 23 जनवरी सन् 1814 ई में हुआ था। अपने सेवाकाल के प्रारंभ से ही भारतीय इतिहास में इनकी काफी रुचि थी और इन्होंने भारतीय विद्या के विख्यात शोधक जेम्स प्रिंसेप की, प्राचीन सिक्कों के लेखों और खरोष्ठी लिपि के पढ़ने में पर्याप्त सहायता की थी। मेजर किट्टो को भी, जो प्राचीन भारतीय स्थानों की खोज का काम सरकार की ओर से कर रहे थे, इन्होंने अपना मूल्यवान् सहयोग दिया। 1872 ई. में कनिंघम को भारतीय पुरातत्व का सर्वेक्षक बनाया गया और कुछ ही वर्ष पश्चात् उनकी नियुक्ति (उत्तर भारत के) पुरातत्व- सर्वेक्षण- विभाग के महानिदेशक के रूप में हो गई। इस पद पर वे 1885 तक रहे।

भारतीय इतिहास पर शोध और खोज:-

पुरातत्व विभाग के उच्च पदों पर रहते हुए कनिंघम ने भारत के प्राचीन विस्मृत इतिहास के विषय में काफी जानकारी संसार के सामने रखी। प्राचीन स्थानों की खोज और अभिलेखों एवं सिक्कों के संग्रहण द्वारा उन्होंने भारतीय अतीत के इतिहास की शोध के लिए मूल्यवान् सामग्री जुटाई और विद्वानों के लए इस दिशा में कार्य करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। कनिंघम के इस महत्वपूर्ण और परिश्रमसाध्य कार्य का विवरण पुरातत्व विषयक रिपोर्टो के रूप में, 23 जिल्दों में, छपा जिसकी उपादेयता आज प्राय: एक शताब्दी पश्चात् भी पूर्ववत् ही है

 

अन्य प्रमुख कार्य:- 1877 में प्रकाशित कोर्पस इंसक्रिप्शनम इंडिकेरम (Corpus Inscriptionum Indicarum) का प्रथम खंड उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने अशोक के शिलालेखों का संकलन किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 1879 में भरहुत स्तूप पर आधारित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ तथा 1883 में भारतीय युगों पर एक पुस्तक प्रकाशित की। इन सभी कृतियों ने भारतीय पुरावशेषों के काल निर्धारण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

यूनानी और चीनी पर्यटकों के वृतांत का

अनुवाद तथा संपादन :-

कनिंघम ने प्राचीन भारत में आनेवाले यूनानी और चीनी पर्यटकों के भारतविषयक वर्णनों का अनुवाद तथा संपादन भी बड़ी विद्वता तथा कुशलता से किया है। चीनी यात्री युवानच्वांग (7वीं सदी ई.) के पर्यटनवृत्त का उनका सपांदन, विशेषकर प्राचीन स्थानों का अभिज्ञान, अभी तक बहुत प्रामाणिक माना जाता है। 1871 ई.में उन्होंने ‘भारत का प्राचीन भूगोल’ (एशियंट जिओगग्राफी  ऑफ इंडिया) नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी जिसका महत्त्व आज तक कम नहीं हुआ है। इस शोधग्रंथ में उन्होंने प्राचीन स्थानों का जो अभिज्ञान किया था वह अधिकांश में ठीक साबित हुआ, यद्यपि उनके समकालीन तथा अनुवर्ती कई विद्वानों ने उसके विषय में अनेक शंकाएँ उठाई थीं। उदाहरणार्थ, कौशांबी के अभिज्ञान के बारे में कनिंघम का मत था कि यह नगरी उसी स्थान पर बसी थी जहाँ वर्तमान कौसम (जिला इलाहाबाद) है, यही मत आज पुरातत्व की खोजों के प्रकाश में सर्वमान्य हो चुका है। किंतु इस विषय में वर्षो तक विद्वानों का कनिंघम के साथ मतभेद चलता रहा था और अंत में वर्तमान काल में जब कनिंघम का मत ही ठीक निकला तब उनकी अनोखी सूझ-बूझ की सभी विद्वानों को प्रशंसा करनी पड़ी है।

भारतीय पुरातत्व का जनक :-

भारतीय पुरातत्व का जनक या पिता अलेक्जेंडर कनिंघम को कहा जाता था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एएसआई ब्रिटिश पुरातत्व शास्त्री विलियम जोंस द्वारा 15 जनवरी 1784 को स्थापित एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (कोलकाता) का उत्तराधिकारी थे। 1788 में इनका पत्र एशियाटिक रिसचर्स प्रकाशित होना आरंभ हुआ था और 1814 में यह प्रथम संग्रहालय बंगाल में बना था। एएसआई (ASI) अपने वर्तमान रूप में 1861 में ब्रिटिश शासन के अधीन सर अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा तत्कालीन वायसराय चार्ल्स जॉन केनिंग की सहायता से स्थापित हुआ था

 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बदलते कार्यालय :-

वर्तमान समय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, संस्कृति मंत्रालय का एक अधीनस्थ कार्यालय है। 1958 के एएमएएसआर अधिनियम के प्रावधानों के तहत , एएसआई राष्ट्रीय महत्व के 3650 से अधिक प्राचीन स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों और अवशेषों का प्रबंधन करता है। इनमें मंदिर, मस्जिद, चर्च, मकबरे और कब्रिस्तान से लेकर महल, किले, बावड़ियाँ और शैलकृत गुफाएँ शामिल हैं। सर्वेक्षण प्राचीन टीलों और अन्य ऐसे स्थलों का भी रखरखाव करता है जो प्राचीन बस्तियों के अवशेष दर्शाते है।

सर अलेक्जेंडर कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक थे। 1893 के नवम्बर में एक बर्फ़ानी तूफ़ान में वह बीमार पड़ गया। लगभग अस्सी बरस की उमर में, दस दिनों की बीमारी के बाद अट्ठाईस नवम्बर को शाम पौने आठ बजे कनिंघम ने देह छोड़ दी।

1944 में जब मॉर्टिमर व्हीलर महानिदेशक बने, तब इस विभाग का मुख्यालय रेलवे बोर्ड भवन शिमला में स्थित था। इसके बाद यह राष्ट्रपति भवन के परिसर में स्थानांतरित हुआ और उसके बाद जनपथ पर आया। राष्ट्रीय संग्रहालय, जनपथ, नई दिल्ली, 15 अगस्त, 1949 को राष्ट्रपति भवन में स्थापित हुआ था और बाद में 12 मई, 1955 को जनपथ भवन की नींव रखी गई और 1960 में बनकर तैयार हुआ । इसी भवन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का अस्थाई कार्यालय भी काम करना शुरू कर दिया था। लगभग 60 वर्षों तक जनपथ स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय परिसर में एक अस्थायी इमारत में रहने के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का निदेशालय 24 तिलक मार्ग स्थित इसके नए भवन में स्थानांतरित हुआ जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा की उपस्थिति में किया। पुनः 5 नवंबर 2017 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का मुख्यालय जनपथ से हटकर 24 तिलक मार्ग,  नई दिल्ली पर काम करना शुरू कर दिया है। सात मंजिला इस इमारत की आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने 20 दिसंबर 2011 को रखी थी। जरूरी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद एएसआइ ने 2012 से इमारत का निर्माण कार्य शुरू कर दिया था। 40 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से तैयार इस इमारत का निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग ने कराया है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रमुख महानिदेशक:-

एएसआई का नेतृत्व एक महानिदेशक करते हैं, जिनकी सहायता के लिए एक अतिरिक्त महानिदेशक, दो संयुक्त महानिदेशक और 17 निदेशक होते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रमुख महानिदेशक के नाम इस प्रकार है –

1. 1871−1885: अलेक्जेंडर कनिंघम

2. 1886−1889: जेम्स बर्गेस

3. 1902−1928: जॉन मार्शल

4. 1928−1931: हेरोल्ड हरग्रीव्स

5. 1931−1935: दया राम साहनी

6. 1935−1937: जेएफ ब्लैकिस्टन

7. 1937−1944: के.एन. दीक्षित

8. 1944−1948: मोर्टिमर व्हीलर

9. 1948−1950: एनपी चक्रवर्ती

10. 1950−1953: माधो सरूप वत्स

11. 1953−1968: अमलानंद घोष

12. 1968−1972: बी.बी. लाल

13. 1972−1978: एमएन देशपांडे

14. 1978−1981: बी.के. थापर

15. 1981−1983: देबाला मित्रा

16. 1984−1987: एमएस नागराज राव

17. 1987−1989: जेपी जोशी

18. 1989−1993: एमसी जोशी

19. 1993−1994: अचला मौलिक

20. 1994−1995: एस.के. महापात्रा

21. 1995−1997: बी.पी. सिंह

22. 1997−1998: अजय शंकर

23. 1998−2001: एसबी माथुर

24. 2001−2004: केजी मेनन

25. 2004−2007: सी. बाबू राजीव

26. 2009−2010: केएन श्रीवास्तव

27. 2010−2013: गौतम सेनगुप्ता

28. 2013−2014: प्रवीण श्रीवास्तव

29. 2014−2017: राकेश तिवारी

30. 2017−2020: उषा शर्मा

31.  2020−2023: वी.विद्यावती

32. 2023−वर्तमान: यदुबीर सिंह रावत

 

एएसआई के कुल 38 मण्डल:-

राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों और अवशेषों के रखरखाव हेतु पूरे देश को 38 मंडलों में विभाजित किया गया है।

इस संगठन के पास अपने मंडलों, संग्रहालयों, उत्खनन शाखाओं, प्रागैतिहासिक शाखा, पुरालेख शाखाओं, विज्ञान शाखा, बागवानी शाखा, भवन सर्वेक्षण परियोजना, मंदिर सर्वेक्षण परियोजनाओं और जलगत पुरातत्व शाखा के माध्यम से पुरातात्विक अनुसंधान परियोजनाओं के संचालन हेतु प्रशिक्षित पुरातत्वविदों, संरक्षकों, पुरालेखविदों, वास्तुकारों और वैज्ञानिकों का एक विशाल कार्यबल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अपने संरक्षित स्मारकों का रखरखाव अपने 37 सर्किल कार्यालयों और 1 मिनी सर्किल कार्यालय के माध्यम से करता है, जो मुख्य रूप से राज्यों की राजधानियों में स्थित हैं।

कुल मिलाकर एएसआई को कुल 38 मंडल कार्यालयों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक मंडल कार्यालय का नेतृत्व एक अधीक्षण पुरातत्वविद् करता है।

 प्रत्येक मंडल को आगे अनेक उप-मंडलों में विभाजित किया गया है। एएसआई के मंडल कार्यालय इस प्रकार हैं-

आगरा , उत्तर प्रदेश

आइजोल , मिजोरम

अमरावती , आंध्र प्रदेश

औरंगाबाद, महाराष्ट्र

बेंगलुरु , कर्नाटक

भोपाल , मध्य प्रदेश

भुवनेश्वर , ओडिशा

चंडीगढ़, संघीय क्षेत्र

चेन्नई , तमिलनाडु

देहरादून , उत्तराखंड

दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी

धारवाड़ , कर्नाटक

गोवा, पणजी गोवा

गुवाहाटी , असम

हम्पी, कर्नाटक

हैदराबाद , तेलंगाना

जयपुर , राजस्थान

जबलपुर , मध्य प्रदेश

झांसी , उत्तर प्रदेश

जोधपुर , राजस्थान

कोलकाता , पश्चिम बंगाल

लखनऊ , उत्तर प्रदेश

लेह, जंबू काश्मीर

मेरठ , उत्तर प्रदेश

मुंबई , महाराष्ट्र

नागपुर , महाराष्ट्र

पटना , बिहार

पुरी, उड़ीसा

रायपुर , छत्तीसगढ़

रायगंज , पश्चिम बंगाल

राजकोट , गुजरात

रांची , झारखंड

सारनाथ , उत्तर प्रदेश

शिमला , हिमाचल प्रदेश

श्रीनगर , जम्मू और कश्मीर

त्रिशूर , केरल

त्रिचि , तमिलनाडु

वडोदरा , गुजरात

 

लेखक परिचय :-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

मानव-जीवन की निरर्थकता को प्रतिपादित करता नाटक ‘‘बंद रास्तों के बीच’

दो-तीन महीने पूर्व नीदरलैंड से ओड़िशा में अपने किसी रिश्तेदार की शादी में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए डॉ. ऋतु शर्मा नंनन पांडे आई थी, तो समय निकालकर एक दिन के लिए वह सपरिवार अंगुल भी आई थी। अंगुल की साहित्यिक संस्था ‘संवाद-घर’ के अध्यक्ष प्रोफेसर शांतनु सर ने उनके सम्मान में वह एक साहित्यिक आयोजन रखा गया था। उस आयोजन में मैं भी शरीक हुआ था, वहाँ उन्होंने मुझे तीन पुस्तकें ‘बन्द रास्तों के बीच’, ‘नीदरलैंड की लोककथाएं और कविता-संकलन ’संदूकची’ उपहारस्वरूप दी थी। दो किताबें नीदरलैंड उनके नीदरलैंड पहुँचने के एक-दो सप्ताह के भीतर पढ़ ली, मगर ‘बंद रास्तों के बीच’ (ज्यॉं पॉल सार्त्र की रचना ‘नो एक्ज़िट’ का प्रसिद्ध नाटककार विवेकानंद और ऋतु द्वारा किया संयुक्त अनुवाद) जान-बूझकर छोड़ दिया, क्योंकि सार्त्र को पढ़ने और समझने के लिए समय और धैर्य की जरूरत होती है। साथ ही, मूड़ और स्थित-प्रज्ञावस्था की भी।

1964 में नोबेल पुरस्कार विजेता नाटककार, दार्शनिक ज्याँ पॉल सार्त्र, (यद्यपि उन्होंने यह पुरस्कार स्वीकार नहीं किया) द्वारा लिखी गई कृति ‘नो एक्ज़िट’ ( फ्रेंच में हुईस कलोस)  को नाटक कहूँ या एकांकी – समझ नहीं पा रहा हूँ, फिर भी आलोचना की दृष्टि से ‘नाटक’ ही मान लेना सही लग रहा है। उचित शांत परिवेश की प्रतीक्षा करते-करते आखिर समय आ गया कि डॉ॰ ऋतु शर्मा जी और विवेकानंद जी के द्वारा अनूदित इस नाटक को पढकर विश्व के अन्यतम बुद्धिजीवी साहित्यकार के मन-मस्तिष्क की टोह ली जाए।

कभी जमाना था, जब वैश्विक साहित्य पटल में ज्याँ पॉल सार्त्र और सिमोन द बोवियर की तूती बोलती थी। उनका लिखा हुआ कोई भी आलेख किसी आंदोलन से कम नहीं होता था। उन दोनों की भेंट पेरिस में दर्शनशास्त्र ‘एग्रीगेशन’ के अध्ययन के दौरान हुई थी। जिन्होंने तत्कालीन दर्शनिक, साहित्यिक और राजनैतिक धारणाओं को काफी प्रभावित किया था। निस्संदेह सार्त्र एक अजीब इंसान थे। उन्हें नोबल प्राइज मिलता है, मगर अस्वीकार कर देते हैं, कारण उनकी अपनी स्वतंत्रता में विश्वास। वे नहीं चाहते थे कि लेखक संस्थागत बने। सिमोन द बिवोयर भी अलग किस्म की महिला थी, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बुद्धिजीवियों की जिंदगी पर उनके द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘मंडारिन्स’ बहुचर्चित रहा।

ओशो रजनीश की तरह वे दोनों पारंपरिक विवाह-प्रथा को असंगत बताते है, और अस्वीकार करते है, क्योंकि विवाह व्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाता है। विवाह ही नहीं सामाजिक व्यवस्था, धर्म, आस्था, विश्वास – सब-कुछ तो इसी श्रेणी में आता है। वे दोनों पेरिस के सेंट-जर्मन-दे-डे कैफे, द फ्लोर ले टू मागो, मिस्त्राल होटल में मिलते थे अथवा किराए के अपार्टमेंट में साथ रहते थे। बिना किसी शर्त, एक-दूसरे के लेखन में मदर करते थे। यद्यपि वे स्थायी रूप से एक-दूसरे के साथ नहीं रहे, मगर पत्रों, बातचीत, साझा परियोजनाओं के माध्यम से आजीवन जुडे रहे। ‘लेटर्स टू सार्त्र और ’लेटर टू बोवियर’ के माध्यम से कह सकते है कि उनका रिश्ता भी दोष मुक्त नहीं था, क्योंकि सिमोन के प्रेमी थे नेल्सन अलग्रेन, क्लॉड लैजमेन, जबकि सार्त्र के संबंध थे ओल्गा, वांडा कोसाकिविक्ज से। खुले रिश्तों पर उनकी अपनी सहमति थी। दूसरे शब्दों में, उनके संबंध जटिल थे, बौद्धिक भी, व्यक्तिगत भी, फिर भी दीर्घावधि 1929-1980 तक चले और उनके साझा जुनून की वजह से साहित्य और सामाजिक नियमों को चुनौती देते हुए स्वतंत्रता, जिम्मेदारी और मानव अस्तित्व की निरर्थकता को प्रतिपादित किया। यही वजह है की सार्त्र लिखते हैं ‘बीइंग एंड नथिंगनेस (1943)’, ‘नो एग्जिट (1944)’ तो सिमोन लिखती है “द सेकेंड सेक्स (1949)’, ‘द अदर’।

ज्याँ पॉल सार्त्र ने यह नाटक 1944 में लिखा और विवेकानंद तथा डॉ. ऋतु शर्मा द्वारा प्रथम पेपरबैक संस्करण 2006 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था और दूसरा पेपर बैक संस्करण 2023 में ‘बंद रास्तों के बीच’ शीर्षक से। परवर्ती काल में इसी नाटक से प्रभावित होकर नोबल प्राइज विजेता सैमुअल ब्रेकट ने ‘वेटिंग फॉर गोडोट’ नाटक की रचना की, जिसके मंचन के समय सार्त्र और सिमोन दोनों उपस्थित थे। ये दोनों विचारोत्तेजक नाटक अस्तित्ववाद के प्रतिनिधि नाटक माने जाते है, जिसमें रिश्तों की जटिलता और मानव स्वभाव का लचीलापन दिखाया गया है।

यह नाटक पढ़ने के बाद मेरे मन में अभिनेता सुरेश औबेरॉय की हिन्दी फिल्म ’ऐतबार’ (1985) की याद आ गई, जिसकी शूटिंग एक ही घर में की गई थी – जो कि अल्फ्रेड हिचकॉक की क्लासिक थ्रिलर “डॉयल एम फोर मरडर” का रीमेक है, जहां फिल्म की पूरी कहानी मुख्य रूप से एक ही स्थान पर केंद्रित है। इसी तरह इस पूरे नाटक में भी एक ही स्थान है – नरक में बंद कमरा, जिसमें तीन मैले-कुचैले सोफे पड़े हुए हैं, निरंतर रोशनी जल रही है, मगर उसे बुझाने के लिए कोई बटन या स्विच नहीं है। न कोई दर्पण है, न कोई खिड़की। बस एक दरवाजा है, वह भी बंद ।

इस हिसाब से  इस नाटक का शीर्षक ‘बंद कमरा’ होनी चाहिए, न कि ‘बंद रास्तों के बीच’, क्योंकि ‘बंद रास्तों के बीच’ का अर्थ किसी सिनेमा हॉल के आठ-दस बंद दरवाजों वाला प्रतिबिंब उभर कर सामने आता हैं। प्रवेश, निकासी के अतिरिक्त कुछ आपातकालीन रास्तों समेत। जबकि नाटक के दृश्य में केवल एक दरवाजा हो दिखाया गया है, वह भी बंद यानि ‘नो एग्जिट’, उससे बाहर नहीं जा सकते। खैर, ’नो एग्जिट’ शब्द पर  उपनिषदों की एक कहानी याद आने लगती है, जिसमें 84 लाख दरवाजों वाला महल है और उसमें केवल एक दरवाजा खुला है, ठीक इस नाटक की तरह। इस महल के भीतर एक अंधे  आदमी को रखा गया है, वह बाहर निकलना चाहता है। इसलिए एक जगह से दीवार पकड़ते-पकड़ते अपनी यात्रा शुरू करता है, कई सालों बाद वह खुले दरवाजे के पास पहुंचता है, और जैसे ही वह खुले दरवाजे के पास पहुंचता है तो उसे अपने शरीर पर खाज-खुजली आने लगती है, उसे खुजलने के कारण उसके हाथ दीवार से हट जाते है।

कुछ ही क्षणों में वह खुला दरवाजा पार हो जाता है। शुरू होता है अंतहीन यात्रा का सिलसिला। फिर से वह 84 लाख दरवाजों के जाल में फंस जाता है। यहां उपनिषद शिक्षा मिलती है, मनुष्य योनि केवल एक ऐसा दरवाजा है, जिसके माध्यम से वह ईश्वर प्राप्ति कर सकता है। बाकी सारी 83,99,999 भोग योनियां है, जिसमें ईश्वर प्राप्ति के सारे रास्ते बंद है। अगर इस नाटक का शीर्षक ‘बंद कमरा’ होता तो उपनिषद की इस कहानी के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि नाटक के अंत में वह बंद दरवाज़ा खुलता है, फिर भी इसके तीनों पात्रों की आत्माएं खुले दरवाजे से बाहर निकलना नहीं चाहती है, भले ही, मानसिक तनाव सहते हुए नरक की घोर यातना फिर से क्यों नहीं झेलनी पड़े। उन्हें भी अपनी दबी भावनाओं के कारण मानो खाज-खुजली आने लगी हो। बुद्ध ने कहा था कि मैंने ईश्वर तक पहुँचने वाले रास्ते को देखा है, मगर इस संसार का कोई भी लोग इस रास्ते से जाना नहीं चाहता है। ज्यॉं पॉल सार्त्र का नाटक ‘नो एक्ज़िट’ भी तो यही कहता है। जाने के लिए ‘एक्ज़िट’ रास्ता है, मगर कोई उस रास्ते से ‘एक्ज़िट’ करना ही नहीं चाहता है।

इस नाटक में तीन पात्र हैः-

1. जोसेफ गार्सिन (एक डरपोक पत्रकार)

२. इनेज सेरोनो (एक क्रूर डाक महिला कर्मचारी)

3. स्टेला रिंगॉल्ट (आत्ममुग्ध सामाजिक महिला)

 

अपने जीवन-काल में अपने कुकर्मों के कारण ये तीनों महापापी थे, इसलिए उन्हें नर्क मिला। भारतीय मिथकों वाला नरक नहीं-जिसमें उबलते तैल की कड़ाही में जीव को डाला जा रहा हो अथवा खून मवाद भरी बदबूदार नदियों से गुजारा जा रहा हो, लोहे के गरम गरम सलाखों पर सुलाया जा रहा हो; इस नाटक में वैसा नरक नहीं है। उनका नरक एक ‘बंद कमरा’ है,  जिसमें मृतात्माएं अपने-अपने सोफे पर बैठकर एक-दूसरे को अपने गुजारे जीवन की गाथा सुनाते हैं, जिससे नाटककार यह सार निकालता है कि ‘नरक और कुछ भी नहीं है, बल्कि हमारे आस-पास के दूसरे लोग है।’

यह नाटक मानव स्वतंत्रता, आत्म-छल (बैड फेथ) और दूसरों की नजरों में अपनी पहचान बनाने के लिए लालायित होने वाली प्रवृति की पड़ताल करते हैं। इसमें कोई उपकथानक नहीं है, सीधे तीखे संवाद हैं, और मनोवैज्ञानिक तनाव की पृष्ठभूमि है। तीनों पात्र एक-दूसरे  की मीन-मेख निकालते हैं। गार्सिन को सम्मान चाहिए, मगर कोई देता नहीं। इनेज को क्रूरता में आनंद आता है और स्टेला अपनी प्रशंसा सुनना चाहती है, मगर कोई करता नहीं। यहाँ यह उल्लेखनीय वक्तव्य है कि 1944 में मनुष्य समाज में अस्तित्व की लड़ाई चल रही थी तो आज 2025 के सोशियल मीडिया वालें युग में अस्तित्ववाद की लड़ाई अति चरम पर होगी। इस युग में हर कोई दूसरों की नजरों में जीता है। फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब – सभी में अपने-‘लाइक्स’ खोजते हैं। उसी को अपनी इमेज मानते हैं। कम ‘लाइक्स’ मिलने पर अपना वजूद मिटते हुए नजर आता है। इस दृष्टिकोण से यह नाटक आधुनिक युग में ज्यादा प्रासंगिक लगता है, जिसे हम इस नाटक के पात्रों द्वारा आसानी से समझ सकते हैं।

रियो-डी-जेनेरियो में रहने वाला गार्सिन पूर्व सैनिक है और पत्रकार भी। उसने युद्ध में भाग लेने से इंकार किया तो उसे कायर समझकर गोली मार दी गई। मगर मरने के बाद भी वह अपने आपको कायर मानना नहीं चाहता है। कायर मानने की जिम्मेदारी से भागता है, वह चाहता है कि दूसरे उसे कायर न माने, बल्कि उसे नायक समझे। ‘बंद रास्तों के बीच’ नाटक का यह सीन देखने लायक है:-

“स्टेला : तुम्हारी दिक़्क़त यह है कि तुम बहुत ज़्यादा सोचते हो!

गार्सिन : यहाँ करने को और है भी क्या? एक समय था जब मैं वहाँ सक्रिय था…ओह, काश! कि मैं उनके साथ दुबारा होता! केवल एक दिन के लिए तो उनके झूठ को वापस उनके मुँह पर दे मारता ! लेकिन मुझे बन्दी बना दिया गया है और वो लोग मेरी ज़िन्दगी के फ़ैसले कर रहे हैं, बिना सोचने का कष्ट किए। यह ठीक भी है, क्योंकि मैं मर चुका हूँ-मृत और अतीत का एक हिस्सा है। (अपने पर हँसता है) (क्षणिक चुप्पी)।

स्टेला : (प्यार से) गार्सिन !

गार्सिन : अच्छा सुनो! क्या तुम मेरा एक काम कर दोगी? नहीं, तुम पीछे मत हटना। यह जानकर तुम्हें अजीब लगा होगा कि मैं जानता हूँ कि मैं तुमसे कोई सहायता चाहता हूँ जो तुम शायद कभी कर नहीं पाओगी। पर अगर तुम कोशिश करो, पूरी निष्ठा, इच्छाशक्ति व परिश्रम के साथ, तो मैं कहूँगा कि हम दोनों सचमुच ही एक-दूसरे से परस्पर प्रेम कर सकते हैं। इसे इस रूप में समझो कि हज़ारों लोगों का कहना है कि मैं कायर हूँ पर हज़ारों के कहने से क्या होता है! अगर एक आदमी, सिर्फ़ एक हो जो डंके की चोट पर यह कह सके कि मैं भगोड़ा नहीं हूँ। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो मैदान छोड़कर भाग खड़े होते हैं। और यह भी कि मैं एक बहादुर और सच्चा देशभक्त हूँ और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं। केवल एक आदमी के विश्वास के कारण ही मैं बच पाऊँगा! क्या तुम्हें मुझमें इतना विश्वास है? अगर हाँ, तो मैं तुम्हें पूर्ण विश्वास और आस्था के साथ हमेशा के लिए अपना लूँगा स्टेला… क्या तुम वह विश्वास दे पाओगी?

स्टेला : (हँसकर) ओह, मेरे प्यारे बुद्धराम! तुम समझते हो कि मैं एक कायर व्यक्ति से प्रेम करूँगी?”

 (बन्द रास्तों के बीच, पृष्ठ-59)

यह भी बात है इस नाटक में वह त्रिकोणीय रिश्ते का केंद्रबिन्दु है। एक तरफ उसे इनेज खींचती है तो दूसरी तरफ स्टेला। दोनों के बीच उसकी कमजोरियां उजागर होती है तो वह हमेशा के लिए दूसरो की नजरों में अधूरा रह जाता है। अनंतकाल के लिए ।

दूसरी पात्र है-इनेज़। एक क्रूर डाक महिला कर्मचारी, डोमिनेटिंग लेस्बियन महिला। अपनी चचेरी बहन के पति के साथ अवैध संबंध में लिप्त होने के कारण वह मारी गई और चचेरी बहन ने आत्महत्या कर ली। वह दूसरों को नियंत्रित करने में अपनी शक्ति अनुभव करती है। अपनी असुरक्षा छुपाने का उसका यह तरीका है। वह हर वक्त दूसरों की मीन-मेख निकालती रहती है। वह उसको गतिशील बनाने में उत्प्रेरक का काम कर रही है। गार्सिन और स्टेला की गलतफहमी को उजागर करने में पीछे नहीं रहती। इस वजह से तनाव बढ़ता है और जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है वैसे-वैसे नरक की यंत्रणा भी। दूसरे शब्दों में, नरक कोई स्थान नहीं, बल्कि हमारे इर्द-गिर्द रहने वाले दूसरे लोग होते हैं। वह अपनी स्वतंत्रता को पहचानती है, मगर अपने सिडक्टिव नेचर के कारण दूसरों को यातना देने लगती है। इस वजह से वह कोई भी क्रिएटिव काम नहीं कर पाती। जिसे पाठक नाटक के पात्रों के वार्तालाप से आसानी से समझ सकते हैं:-

“इनेज़ : इतना गुरूर ठीक नहीं। दरअसल मैं उसकी नस-नस में बसी हुई थी। वह मेरी आँखों से ही दुनिया देखता था। जब फ्लोरेन्स ने उसे छोड़ा, मैंने उसे हथिया लिया। हम शहर के दूसरे छोर पर ‘एक बेडरूमवाले फ्लैट’ में रहते थे।

गार्सिन : और फिर ?

हुनेज़ : और इसके बाद का काम ट्रॉम ने तमाम कर दिया। मैं हर रोज़ उसे याद दिलाती थी कि प्रिय! तुम दोनों ने उसे पीसकर मार डाला। (रुककर) सचमुच मैं कितनी क्रूर हैं।

गार्सिन : और शायद मैं भी उतना ही क्रूर हूँ।

इनेज़ नहीं! तुम क्रूर नहीं बल्कि तुम तो कुछ और ही हो।

गार्सिन : वह क्या ?

इनेज़ : मैं तुम्हें बाद में बताऊँगी। जब मैं कहती हूँ कि मैं क्रूर हूँ तो मेरी मुराद यह है कि मैं लोगों को सताए बिना, रह नहीं सकती। जलते अंगारे की तरह, जैसे किसी के हृदय पर कोई जलता अंगारा रख दे। जब मैं अकेली होती हूँ तो मानो बुझ जाती हूँ। छह महीनों तक मैं उसके दिल को दहकाती रही। अब वहाँ सिवा राख के कुछ नहीं बचा है। एक रात वह अचानक उठी और उसने गैस का चूल्हा जलाया। तब मैं सो रही थी। इसके बाद वह वापस बिस्तर पर आकर सो गई। तो आप लोग आगे की कहानी समझ गए होंगे !

गार्सिन :  हाँ! हाँ! ठीक है।”

 

( बन्द रास्तों के बीच,  पृष्ठ-41 )

तीसरी पात्र स्टेला सुंदर, आत्म-मुग्ध धनी व सामाजिक महिला है। वह अपने प्रेमी को छोड़ती है, अपने नवजात शिशु की हत्या कर देती है। इस वजह से उसकी निमोनिया से मौत होती है और नरक मिलता है। वह तारीफ की भूखी है। उसकी पहचान अधूरी है, अगर कोई प्रशंसा न करे। वह गार्सिन की आंखों से अपनी पहचान चाहती है। बाहरी मान्यताओं पर। इनेज़ स्टेला को बार-बार धिक्कारती है, तो तनाव और बढ़ जाता है। वह गार्सिन को आकर्षित करती है, मगर इनेज़ की उपस्थिति उसे असहज कर देती है, क्योंकि वह अपनी असलियत से भागती है। इस संदर्भ में नाटक का निम्न दृश्य द्रष्टव्य है:-

“ इनेज़ :  झील-सी नीली आँखें! स्टेला, ज़रा इसकी बातें तो सुनो, क्या तुम्हें कायर पसन्द है?

स्टेला : तुम्हें पता होना चाहिए कि मुझे इन बातों की तनिक भी परवाह नहीं। मेरी नज़र में कोई कायर हो या वीर. कोई फर्क नहीं पड़ता ! बस, उसे अच्छा चुम्बन लेना आना चाहिए!!…

गार्सिन :  वहाँ वे लोग अपनी कर्सियों पर अधलेटे हैं… सिगार पीते हुए कितने ऊबे-से दीख रहे हैं। और वे ऊँघ रहे हैं.. एक धुँधले सपने-सी सोच उनके दिमाग में कि… ‘गार्सिन कितना कायर था!… और भाग्यशाली हो तुम दोनों। क्योंकि तुम दोनों के बारे में धरती पर कोई कुछ भी नहीं सोच रहा। किन्तु मैं-मेरी मौत की दास्तान बहुल लम्बी है।

इनेज़ : गार्सिन। अपनी बीवी के बारे में भी तो कुछ बताओ?

गार्सिन : ओह! मैंने तुम्हें बताया नहीं था, वह मर चुकी है।

इनेज़ : मर गई?

गार्सिन : हाँ, वो अभी मरी है, करीब दो महीने पहले।

इनेज़ : क्या सदमे से?

गार्सिन : और किस वजह से वह मरती? जो हुआ, अच्छे के लिए हुआ। देखो, युद्ध समाप्त हो चुका है। मेरी पत्नी मर चुकी है और मैंने इतिहास में अपने लिए जगह बना ली है। (हल्की कराह के साथ अपना चेहरा सहलाता है। स्टेला उसकी बाँह थाम लेती है।)

स्टेला : ओह, मेरे प्यारे-बेचारे! मेरी ओर देखो प्लीज़ ! देखो ना, मुझे छुओ, और मेरा स्पर्श करो! (स्टेला उसका हाथ पकड़कर अपने कन्धे पर रखती है।) यहीं अपना हाथ रखे रखना। (गार्सिन खीझता हुआ-सा अपने को हटाता है।) नहीं-नहीं, ऐसा मत करो। वे लोग क्या सोच रहे होंगे, इस बात से तुम क्यों परेशान होते हो। एक-के बाद-एक सब मर जाएँगे, उन्हें भूल जाओ! अब तो केवल मैं हूँ।”

(बन्द रास्तों के बीच, पृष्ठ-58)

 

इस तरह तीनों पात्र एक-दूसरे के लिए दर्पण है, जिसमें वे अपनी असली शक्लें देख सकते हैं। त्रिकोणीय रिश्ते में एक-दूसरे की इच्छाएं और असुरक्षा दुख का कारण बनती है। इस नाटक में गार्सिन को इनेज़ से मान्यता चाहिए, अपने साहसी होने की। इनेज़ चाहती है स्टेला पर नियंत्रण करना और स्टेला चाहती है गार्सिन की प्रशंसा। जबकि कोई देने या करने को तैयार नहीं है। इसलिए एक-दूसरे के दुखों की कारण बनती है। इस उदाहरण को, हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझ सकते है, राजा भृतर्हरि की कहानी से। गुरु गोरखनाथ भृतर्हरि के लिए अमर फल लाता है, जिसे वह नहीं खाकर अपनी रानी पिंगला को देता। रानी नहीं खाकर अपने प्रेमी प्रहरी को देती है और वह प्रहरी अपनी प्रेमिका वैश्या को, और वह वेश्या फिर से भृर्तहरि को। अतः भृतर्हरि समझ जाता है कि मेरा मन रानी पिंगला पर, पिंगला का मन प्रहरी पर, प्रहरी का मन वैश्या पर और वैश्या की मन राजा पर। इस प्रकार इच्छाए और तृष्णा का यह चक्र अनंत है, जिसे पूरा कारण मनुष्य जीवन में असंभव है। ‘नो एक्ज़िट’ वाला ज्ञान पाते ही भृतर्हरि राजपाट छोडकर वैरागी बना जाता है और ‘वैराग्य शतक’ की रचना करता है। दूसरे शब्दों में, वह नरक के दरवाजे की दहलीज लांघ जाता है। मगर क्या हम लांघ सकते हैं? नहीं। ठीक इसी तरह गार्सिन को मान्यता, इनेज को नियंत्रण तथा स्टेला को प्रशंसा चाहिए – मिलती नहीं है। मिलने की उम्मीद में वे नरक का दरवाजा खुलने पर भी नहीं बाहर निकलते है। जैसे किसी मरणासन्न व्यक्ति के मुंह में शहद की एक बूंद गिरने पर वह दबे पाँव आ रही मौत की आहट को भी भूल जाता है।

इस नाटक के बंद कमरे में दर्पण नहीं होने का अर्थ यही है – वे अपनी पहचान एक दूसरे की नजरों से देख सकते हैं, जो उनके लिए सजा बन जाती है। राजस्थानी भाषा में एक कहावत है – ’खाना खाओ अपनी पसंद का और कपड़े पहनों दूसरों की पसंद का।’ अगर कपडे़ आपकी पहचान है

अयोध्या में अभी भी स्थित है तीन और बाबरी मस्जिद

पूरे अयोध्‍या जिले में अगर ढूंढा जाए तो कई मस्जिदें बाबर काल की मिलेंगी. ये सभी हूबहू एक दूसरे से मेल खाती हैं. बीबीसी में प्रकाशित एक पूर्व रिपोर्ट के मुताबिक,  बाबर काल की इन सभी मस्जिदों की बनावट में दो चीजें खास हैं. उस दौर की सभी मस्जिदों में मीनारें नहीं होती हैं और सभी में तीन गुंबद दिखते हैं.

ये मस्जिदें अवध के नवाबों का दौर शुरू होने से 200 साल पुरानी है. अयोध्‍या जिले में 16वीं सदी के आसपास की मस्जिदें ज्‍यादा दिखती हैं. सभी में गुंबदों की संख्या एक, तीन या पांच मिलेगी. यहां दो गुंबद वाली एक भी मस्जिद नहीं दिखेगी. दो गुंबद वाली मस्जिदें दिल्ली सल्तनत की शैली पर बनाई गई थीं.

 

      बाबर के दौर में बनाई गई ज्‍यादातर मस्जिदों का ढांचा एक जैसा था. राम मंदिर पर बनी हुई बाबरी मस्जिद की बनावट जौनपुर सल्तनत की शैली पर थी. जौनपुर में मौजूद अटाला मस्जिद पश्चिम से देखने पर बाबरी मस्जिद जैसी ही दिखती है. ये तीनों मस्जिदें राम जन्म भूमि वाली बाबरी मस्जिद से काफी छोटी हैं. इनमें काफी समानताएं हैं. तीनों ही मस्जिदों में एक भी मीनार नहीं है. तीनों में बाबरी मस्जिद की ही तरह एक बड़ा और दो छोटे गुंबद हैं. ये तीनों मस्जिदें निम्न लिखित हैं –

1.‘मस्जिद बेगम बालरस’

मकान नम्बर 14/1/78A, बेगम पुरा रोड पर तुलसी नगर अयोध्या महाराजा इण्टर कालेज के पीछे यह मस्जिद बहुत ही सादगी के साथ अवस्थित है .अयोध्‍या में बाबर काल की तीन मस्जिदों में एक ‘मस्जिद बेगम बालरस’ तो राम मंदिर से कुछ ही दूर पर है. यह अशोक आश्रम होम स्टे और श्री सीता बल्लभ पड़पछा के बीच अवस्थित है. अयोध्या पोस्ट ऑफिस से शब्जी मंडी होकर मत गयन्द और अशर्फी भवन वाले रास्ते से यहां पहुंचा जा सकता है.

 

2. ‘मस्जिद बेगम बलरासपुर’

दूसरी ‘मस्जिद बेगम बलरासपुर’ दर्शन नगर अयोध्या में है. यह बाबर काल की एक और मस्जिद है, जो अयोध्या जिले में मौजूद है और बाबरी मस्जिद के अलावा बाबर काल की अन्य मस्जिदों में से एक है।

3.जमा मस्जिद मुमताज़ शाह

कोट सराय फतेहपुर सरैया उपार्ह मुमताज नगर फैजाबाद अयोध्या में यह स्थित है.

बाबर काल की तीसरी मस्जिद ‘मस्जिद मुमताज शाह’ लखनऊ से अयोध्‍या के रास्ते पर मुमताज नगर में होटल त्रिमूर्ति और ट्रिबो हेवेन ग्रांड के बीच हाइवे पर स्थित है. मुमताज नगर वाली मस्जिद अच्‍छी हालत में है.

अयोध्‍या जिले में बनी तीनों बाबरी मस्जिदों में दो की हालत काफी खस्‍ता हो चुकी है. केवल मुमताज नगर की मस्जिद ही अच्‍छी हालत में खड़ी है. स्‍थानीय हिंदू और मुस्लिम परिवारों का मानना है कि मस्जिद मुमताज शाह विवादित बाबरी मस्जिद के दौर की ही है. इतिहासकार सतीश चंद्र ने किताब ‘मिडेवल इंडिया: फ्रॉम सल्तनत टू द मुगल्स’ में जिक्र किया है कि शुरुआती मुगल शासक और उनके सूबेदारों की इस्‍तेमाल की गई वास्तुकला एक जैसी थी. शुरुआत बाबर के समय से हुई और मस्जिदों से लेकर सराय तक सभी आपस में मेल खाते थे. अयोध्या के आसपास बनी तीनों मस्जिदों में कोई अभिलेख नहीं मिलता, जिसमें इसमें बनवाने का समय नहीं मिल पाता है.

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं. वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं. वॉट्सप नं.+919412300183)

आर्यसमाज का शुद्धि आन्दोलन

आधुनिक युग में विधर्मियों को शुद्ध कर हिन्दू ( आर्य ) समाज में सम्मिलित करने का कार्य महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा ही प्रारम्भ कर दिया गया था । महर्षि का अनुसरण कर आर्यसमाज शुरू से ही शुद्धि के लिए प्रयत्नशील रहा , और उस द्वारा अमृतसर तथा राजकोट आदि में बहुत – से ईसाइयों व मुसलमानों को आर्य बनाया भी गया । पर व्यापक रूप से शुद्धि का कार्य उस समय शुरू हुआ , जबकि मुसलिम राजवंशों के शासन में मुसलमान बने मलकाने राजपूतों और मूले जाटों आदि को फिर से हिन्दू बनाना प्रारम्भ किया गया । ये लोग “ नौमुसलिम ” कहाते थे , और आचार – विचार तथा व्यवहार में हिन्दुओं से अधिक भिन्न नहीं थे । परिस्थितियों वश ये मुसलमान तो बन गये थे , पर इनके रीति – रिवाज व खान – पान आदि हिन्दुओं के समान ही रहे । उनके विवाह – संस्कारों में ब्राह्मणों को बुलाया जाता था , और अपने मुर्दो को गाड़ने के बजाय वे जलाया करते थे । गौमांस को वे अभक्ष्य मानते थे ।

 

देश के बदले हुए धार्मिक व राजनैतिक वातावरण में उनके लिए यह सोचना स्वाभाविक ही था , कि उन्हें फिर से अपनी राजपूत , अहीर व जाट आदि बिरादरियों में सम्मिलित कर लिया जाय , और सजातीय हिन्दुओं के साथ उनका रोटी – बेटी का सम्बन्ध फिर से स्थापित हो जाय । बीसवीं सदी के प्रथम चरण में ही राजपूत महासभा , क्षत्रिय महासभा , जाट महासभा आदि अनेक जातीय संगठनों का निर्माण हो चुका था ।

भारत की प्राचीन लोकतान्त्रिक परम्पराएँ बिरादरियों के रूप में इस युग में भी सुरक्षित थीं , और उनके नियमों व निर्णयों का सभी पालन किया करते थे । इस दशा में नौमुसलिमों ने अपनी बिरादरियों की जातीय महासभाओं के समक्ष यह इच्छा प्रकट करनी प्रारम्भ की , कि उन्हें शुद्ध कर अपनी बिरादरी में शामिल कर लिया जाय । यह दशा थी , जब आगरा के पण्डित भोजदत्त ने सन् १९०६ में “ राजपूत शुद्धि सभा ” की स्थापना की , और उस द्वारा राजपूत नौमुसलिमों को शुद्ध कर हिन्दू धर्म में वापस लाना प्रारम्भ किया । पर राजपूत शुद्धि सभा का कार्य सुगम नहीं था ।

हिन्दुओं में जो संकीर्णता चिरकाल से चली आ रही थी , उसे दूर कर मुसलमान माने जानेवाले लोगों को आत्मसात् कर सकना राजपूतों के लिए बहुत कठिन सिद्ध हुआ , और पण्डित भोजदत्त के प्रयत्न से जो एक हजार के लगभग नौमुसलिम शुद्ध होकर हिन्दू ‘ बन गये थे , उन्हें भी हिन्दू धर्म में स्थिर रख सकने में कठिनाइयाँ अनुभव होने लगीं। नौमुसलिम राजपूत तभी स्थायी रूप से हिन्दू रह सकते थे , जबकि हिन्दू राजपूत उन्हें अपनी बिरादरी में शामिल करने तथा उनके साथ रोटी – बेटी का सम्बन्ध करने के लिए सहमत हो जाते । इसी तथ्य को दृष्टि में रखकर ३० अगस्त , १९२२ को क्षत्रिय उपकारिणी सभा के अधिवेशन में निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकृत किया गया — ‘ शाही जमाने में जो राजपूत भाई हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति से अलग हो गये या अलग कर दिये गये थे और अब पुनः अपने धर्म तथा हिन्दू बिरादरी में आना चाहते हैं , उन्हें पुनः शुद्ध करके राजपूत बिरादरी में शामिल कर लिया जाय । ” इस सभा के अध्यक्ष महाराजा सर रामपाल सिंह थे । इसके बाद दिसम्बर , १९२२ को क्षत्रिय महासभा की कान्फरेन्स शाहपुराधीश महाराजा श्री नाहर सिंह के सभापतित्व में हुई , जिसमें नौमुसलिम राजपूतों को हिन्दू बिरादरी में शामिल करने की बात की पुष्टि की गयी । यह प्रस्ताव अत्यन्त महत्त्व का था , क्योंकि पण्डित भोजदत्त ने जिस राजपूत शुद्धि सभा की स्थापना की थी , वह १९१० तक ही कायम रह सकी थी । पर अपने जीवन की स्वल्प अवधि में ही उस द्वारा मैनपुरी , हरदोई तथा शाहजहाँपुर जिलों के हजार से ऊपर नौमुसलिमों को शुद्ध कर लिया गया था । पर इस सभा के टूट जाने से शुद्ध हुए लोगों के हितों की रक्षा करनेवाली तथा बिरादरी में उन्हें सम्मिलित करने के लिए प्रेरणा देनेवाली कोई संस्था नहीं रह गयी थी ।

क्षत्रिय उपकारिणी सभा के प्रस्ताव से उन्हें कुछ सहारा अवश्य प्राप्त हुआ , पर उसका एक उलटा परिणाम भी हुआ । जब ये प्रस्ताव समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए , तो मुसलिम क्षेत्रों में विक्षोभ उत्पन्न हो गया । मुसलिम मौलवी बड़ी संख्या में उन स्थानों पर जाने लगे , जहाँ नौमुसलिमों की बस्तियाँ थीं । उनका प्रयत्न था , कि ये लोग न केवल इस्लाम का परित्याग न करें , अपितु पूर्ण तया मुसलमान बन जायें । मुसलिम समाचारपत्रों में नौमुसलिमों को आर्यसमाज के ‘ आक्रमण ‘ से बचाने के लिए आन्दोलन शुरू हो गया । दिल्ली के ख्वाजा हसन निजामी ने इस अवसर से लाभ उठाया , और मुसलमानों को ‘ धर्म की रक्षा के लिए उकसाना प्रारम्भ कर दिया । उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की , जिसमें इस्लाम के प्रचार के लिए नानाविध उपाय प्रतिपादित किये गये थे । यह पुस्तक स्वामी श्रद्धानन्द के हाथ लग गयी , और उन्होंने ‘ मुहम्मदी साजिश का इन्किशाफ ‘ नाम की एक पुस्तिका उर्दू में प्रकाशित की , जिसमें हिन्दुओं को उन उपायों व हथकण्डों से सावधान किया , जो तबलीग के लिए प्रयुक्त किये जा रहे थे । जब हिन्दुओं को ज्ञात हुआ कि क्षत्रिय उपकारिणी सभा के प्रस्तावों से सचेत होकर मौलवी नौमुसलिमों को पक्के मुसलमान बनाने के लिए जी – जान से मैदान में उतर आये हैं , तो उन्होंने भी इस मामले में कुछ करने का विचार किया ।

 

इसी प्रयोजन से १३ फरवरी , १९२३ को विविध प्रदेशों से ८५ हिन्दू प्रतिनिधि आगरा में एकत्र हुए , और उन्होंने ‘ भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा ‘ नाम से एक संगठन बनाने का निश्चय किया । इस सभा के निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किये गये— ( १ ) हिन्दू – समाज से बिछुड़े हुए तथा अन्य मतावलम्बी भाइयों को पुनः हिन्दू समाज में सम्मिलित करना , ( २ ) शुद्धि क्षेत्र में प्रेम तथा धर्म का प्रचार करना , ( ३ ) पाठशालाओं तथा अन्य शिक्षाप्रद संस्थाओं द्वारा शुद्धि – क्षेत्र में विद्यादि का प्रचार करना , ( ४ ) अनाथ तथा विधवाओं के धर्म की रक्षा करना , ( ५ ) आवश्यकतानुसार शुद्धि – क्षेत्र में चिकित्सालय खोलना , ( ६ ) सभा के उद्देश्यों की पूर्त्यर्थ अन्य आवश्यक साधनों को काम में लाना ।

 

सभा के प्रथम पदाधिकारी इस प्रकार निर्वाचित किये गये : प्रधान — स्वामी श्रद्धानन्द । उपप्रधान — महात्मा हंसराज , बाबू रामप्रसाद आगरा और कुंवर हनुमन्तसिंह आगरा । महामन्त्री — कुंवर माधवसिंह आगरा । मन्त्री बाबू नाथमल आगरा , श्री देव प्रकाश अमृतसर और चौबे विश्वेश्वर दयाल । कोषाध्यक्ष बाबू चाँदमल । अन्तरंग सदस्य – बाबू श्रीराम आगरा , राजा नरेन्द्रनाथ लाहौर , प्रोफेसर गुलशनराय लाहौर , पण्डित रामगोपाल शास्त्री लाहौर , पण्डित ठाकुरदत्त शर्मा लाहौर , महाशय खुशहालचन्द लाहौर , महाशय कृष्ण लाहौर , महात्मा नारायण स्वामी , श्री हरगोविन्द गुप्त कलकत्ता , कुंवर चाँदकरण शारदा अजमेर , बाबू शालिग्राम आगरा और डॉक्टर गोकुलचन्द नारंग लाहौर । ४ दिसम्बर , १९२४ को भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा की विधिवत् रजिस्ट्री करा ली गयी और प्रागरा में उसका मुख्य कार्यालय स्थापित कर दिया गया । नौमुसलिम वर्ग के लोगों का निवास प्रधानतया आगरा तथा उसके समीपवर्ती जिलों में था , अतः शुद्धि सभा के कार्यालय को आगरा में रखना उचित समझा गया । मार्च , १९२५ तक यह कार्यालय आगरा में रहा , फिर उसे लखनऊ में राजा साहब महवा की कोठी में ले जाया गया । एक साल बाद मार्च , १९२६ में उसे दिल्ली में स्थानान्तरित कर दिया गया ।

 

इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने योग्य है , कि भारतीय हिन्दु शुद्धि सभा के प्रायः सभी पदाधिकारी आर्यसमाजी थे । उत्तरप्रदेश और पंजाब के प्रमुख आर्य नेताओं ने सहर्ष उसका पदाधिकारी होना स्वीकृत किया था , और वे पूर्ण उत्साह के साथ शुद्धि के कार्य में तत्पर हो गये थे । सनातन धर्म के अनेक विद्वानों और नेताओं का समर्थन भी शुद्धि सभा को प्राप्त हुआ , और उन द्वारा विधर्मियों को हिन्दू बनाने के पक्ष में सम्मतियाँ या व्यवस्थाएँ प्रदान की गयीं । ऐसी एक व्यवस्था लाहौर के प्राच्य महा विद्यालय के प्रधानाचार्य महामहोपाध्याय पण्डित शिवदत्त शर्मा द्वारा दी गई थी , जिसमें स्मृति – ग्रन्थों तथा पुराणों से अनेक प्रमाण देकर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला था , कि जब किसी अनार्य में आर्य बनने की इच्छा उत्पन्न हो , तो सबसे पूर्व उसके मन में आर्यत्व के त्याग का पश्चात्ताप होना चाहिए , फिर म्लेच्छत्व के प्रति ममत्त्व को उसे छोड़ देना चाहिए । फिर श्रुति , स्मृति तथा पुराणों के कथन में विश्वास रखते हुए प्रायश्चित्त के लिए विद्वानों के पास आना चाहिए और फिर उनके उपदेशों को मानकर उपवास , गंगा स्नान आदि कर्म तथा शास्त्रों द्वारा प्रतिपादित विधि के अनुसार राम , कृष्ण तथा शिव के मन्त्रों की दीक्षा लेनी चाहिए । इस प्रकार अनार्यत्व दूर होकर प्रार्यत्व की प्राप्ति की जाती है । इस ढंग की जो व्यवस्थाएँ पौराणिक पण्डितों द्वारा दी जा रही थीं , उनसे शुद्धि – अान्दोलन को बहुत बल मिला । सर्वसाधारण जनता में इससे शुद्धि के पक्ष में लोक मत उत्पन्न हो गया , और पौराणिक लोग भी आर्यसमाज के कार्यकर्ताओं के साथ शुद्धि के कार्य में सहयोग करने लग गये ।

भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा ने अपनी स्थापना से मार्च , १९३१ तक के आठ वर्षों में जो कार्य किया , उसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

( १ ) एक लाख तिरासी हजार तीन सौ बयालीस ( १,८३,३४२ ) नौमुसलिमों को शुद्ध कर हिन्दू समाज में सम्मिलित किया ।

( २ ) साठ हजार के लगभग अछूतों को विधर्मी होने से बचाया । ( ३ ) १,४५१ महिलाओं और ३,१५५ अनाथों की रक्षा की । ( ४ ) १२७ शुद्धि सम्मेलन किये गये । ( ५ ) राजपूत , अहीर , जाट आदि बिरादरियों की १५३ पंचायतें करायी गयीं , जिनमें नौ मुसलिमों को अपनी बिरादरी में सम्मिलित करने के लिए प्रेरित किया गया । ( ६ ) ८१ बड़े – बड़े सहभोज किये गये । ( ७ ) शुद्धि के क्षेत्र में अनेक पाठशालाओं तथा औषधालयों की स्थापना की गयी , और दर्जनों कुओं तथा मन्दिरों का निर्माण किया गया । ( ८ ) ‘ शुद्धि समाचार ‘ नाम का एक पत्र हिन्दी में प्रकाशित करना शुरू किया गया ( फरवरी , सन् १९२५ ) , जिससे शुद्धि – आन्दोलन को लोकप्रिय बनाने में बहुत सहायता मिली । एक समय इसकी ग्राहक – संख्या १४,००० तक पहुँच गयी थी , जो उस युग में एक असाधारण बात थी । बाद में कलकत्ता से बंगला भाषा में और सूरत से गुजराती भाषा में भी ‘ शुद्धि समाचार ‘ निकाला गया । शुद्धि – सम्बन्धी अन्य साहित्य भी बड़ी मात्रा में प्रकाशित किया गया ।

 

भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का कार्य कितनी तेजी के साथ बढ़ रहा था , यह इस बात से स्पष्ट हो जायेगा , कि सन् १९२७ तक भारत के विभिन्न भागों में उसकी ३५ शाखाएँ स्थापित हो गयी थीं , और उसके तत्त्वावधान में ८० वैतनिक तथा ४५ अवैतनिक प्रचारक कार्य में तत्पर थे । अब इस सभा का कार्यक्षेत्र गुजरात , महाराष्ट्र , मद्रास , राजस्थान , मध्यप्रान्त और काश्मीर आदि में भी विस्तृत हो गया था । गुजरात में शुद्धि के कार्य का प्रधान श्रेय राजरत्न मास्टर आत्माराम अमृतसरी को प्राप्त है । उन्होंने कुंवर चाँदकरण शारदा के सहयोग से बड़ौदा में शुद्धि – सभा की स्थापना की , और उन लोगों को शुद्ध कर हिन्दु बनाना शुरू किया जो आगाखानी प्रचारकों के प्रयत्न से मुसल मान हो गये थे । सेठ जुगलकिशोर बिड़ला और राजा नारायणलाल पित्ती ने इस सभा की धन से सहायता की । महाराष्ट्र में जगद्गुरु शंकराचार्य ( डॉक्टर कुर्तकोटि ) का समर्थन शुद्धि आन्दोलन को प्राप्त हुआ , और वहाँ के पौराणिक पण्डितों ने शुद्धि के पक्ष में व्यवस्था प्रदान की । वहाँ भी हजारों विधर्मियों को हिन्दू बनाया गया ।

मद्रास प्रान्त में हिन्दुओं के क्रिश्चिएनिटी तथा इस्लाम को अपना लेने की समस्या बड़ी विकट थी । मलाबार के क्षेत्र में इड़वा , थिया , चसा आदि अनेक ऐसी हिन्दू जातियों का निवास था , जिनके लिए सार्वजनिक सड़कों का प्रयोग भी निषिद्ध था । ये लोग हिन्दू धर्म का परित्याग कर ईसाई या मुसलमान बन जाने के लिए तैयार थे । आर्य – प्रचारक पण्डित ऋषिराम , महाराय मणिकजी बेचरजी शर्मा , पण्डित वेदबन्धु और पण्डित आनन्दप्रिय आदि ने इस दशा में वहाँ जाकर प्रचार शुरू किया , और न केवल हिन्दुओं को विधर्मी होने से बचाया ही , अपितु बहुत – से लोगों को शुद्ध कर हिन्दू भी बनाया । इसी प्रकार का कार्य राजस्थान , सिन्ध , मध्य प्रान्त आदि अन्य प्रदेशों में भी किया गया , जिसके कारण लोगों में अपने धर्म की रक्षा तथा विधर्मियों को शुद्ध कर अपने समाज में सम्मिलित कर लेने के लिए उत्साह का प्रादुर्भाव हुआ ।

 

स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज के नेतृत्व में शुद्धि – आन्दोलन जिस ढंग से जोर पकड़ रहा था , उससे ईसाइयों और मुसलमानों का विक्षुब्ध होना सर्वथा स्वाभाविक था । मध्य काल में हिन्दू लोग इतने संकीर्ण हो गये थे , कि किसी विधर्मी को अपने धर्म में दीक्षित करने का तो स्वप्न भी नहीं ले सकते थे , और परिस्थितिवश भय , लालच या क्षणिक आवेश के कारण जिस किसी ने इस्लाम को ग्रहण कर लिया हो , उसे भी अपने धर्म में वापस लेना उनकी दृष्टि में सर्वथा अनुचित व अकल्पनीय था । पर भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा हिन्दुओं की इस मनोवृत्ति में जो परिवर्तन ला रही थी , और आर्यसमाज द्वारा जिस ढंग से उसका नेतृत्व किया जा रहा था , मुसलमान उसे नहीं सह सके । वे हर संभव उपाय से आर्य समाज का विरोध करने और साम्प्रदायिक विद्वेष का प्रादुर्भाव करने के लिए प्रयत्नशील हो गये ।

खिलाफत – आन्दोलन के कारण मुसलमानों में जिस उग्र साम्प्रदायिक भावना का विकास हुआ था , और मौलाना मुहम्मद अली सदृश कांग्रेसी नेता जिस ढंग से अछूतों को मुसलमान बनाकर अपनी संख्या तथा शक्ति की वृद्धि करने के स्वप्न लेने लगे थे , उससे स्वामी श्रद्धानन्द ने यह आवश्यक समझा , कि अछूतों के उद्धार के साथ – साथ हिन्दू जाति को संगठित करने का भी प्रयत्न किया जाए । बीसवीं सदी के प्रथम चरण में भारत की राजनीति ने साम्प्रदायिक रूप ग्रहण करना प्रारम्भ कर दिया था । सन् १९०६ में ‘ इण्डियन मुसलिम लीग ‘ की स्थापना हुई थी , जिसका उद्देश्य भारत के मुसलमानों के राजनैतिक व अन्य अधिकारों की रक्षा करना था । उसके अनुकरण में हिन्दू हितों की रक्षा के प्रयोजन से ‘ हिन्दू महासभा ‘ स्थापित हुई , और ये दोनों संगठन अपने समुदायों के राजनैतिक हितों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील हो गये ।

भारत में मुसलमान अल्प संख्या में थे । अतः उनके लिए राजनैतिक हितों की रक्षा का प्रश्न अर्थ रखता था । पर बहुसंख्यक हिन्दू जाति के लिए राजनैतिक हितों की रक्षा का प्रश्न उतने महत्त्व का नहीं था , जितना कि आन्तरिक सुधारों द्वारा अपने में शक्ति का संचार करने का था । हिन्दू लोग बहुत – सी जातियों और उपजातियों में विभक्त थे , और उनमें ऊँच – नीच का भाव प्रबल रूप से विद्यमान था । हिन्दुओं का बहुत बड़ा भाग उन अछूतों का था , जिन्हें मानवता के प्राथमिक अधिकार भी प्राप्त नहीं थे । महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा आर्य समाज का यही प्रयत्न था , कि हिन्दुओं की इन बुराइयों को दूर किया जाए , और उन्हें संगठित कर उन में शक्ति का संचार किया जाए । खिलाफत – आन्दोलन के कारण मुसलिम साम्प्रदायिकता का जो उग्र रूप प्रकट होने लगा था और हिन्दू जिस प्रकार के नृशंस अत्याचारों से पीड़ित होने लग गये थे , स्वामी श्रद्धानन्द को उससे हिन्दू संगठन की आवश्यकता अनुभव हुई । स्वाभाविक रूप से उनका ध्यान हिन्दू – सभा की ओर गया । उन्हें आशा थी , कि हिन्दुओं के इस अखिल भारतीय संगठन का उपयोग इस जाति में नव चेतना उत्पन्न करने के लिए किया जा सकेगा । वह हिन्दू महासभा में सम्मिलित हो गये , और उसे अाधार बनाकर हिन्दू संगठन का कार्य शुरू कर दिया । ११ जुलाई , सन् १९२३ को उन्होंने अपना दौरा शुरू किया और उत्तरप्रदेश , बिहार , बंगाल और पंजाब के ३२ स्थानों पर स्वयं गये , और जहाँ स्वयं नहीं जा सके , वहाँ पण्डित नेकीराम शर्मा और स्वामी रामानन्द को भेजा । अगस्त मास में वाराणसी में हिन्दू महासभा का वार्षिक अधि वेशन था । उसमें सम्मिलित होने के लिए उन्होंने सब स्थानों से प्रतिनिधियों को तैयार किया ।

इस अधिवेशन की सफलता का अधिकांश श्रेय स्वामीजी को ही था । वह चाहते थे , कि महासभा हिन्दुनों में बद्धमूल कुरीतियों के निवारण तथा सुधार के लिए ऐसा क्रान्तिकारी व प्रगतिशील कार्यक्रम निर्धारित करे , जिससे इस जाति में नवजीवन एवं शक्ति का संचार हो जाय । पर उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई । वाराणसी से लौटकर स्वामी जी ने लिखा था – ‘ ‘ मेरी इच्छा थी कि हिन्दू महासभा के गत अधिवेशन में और अधिक पूर्ण सफलता प्राप्त होती । यदि अस्पृश्यता का पाप धुल जाता और विधवाओं के पुनर्विवाह की रुकावट एकदम उठा दी जाती , तो मुझको अधिक संतोष होता । यदि आग्रह किया जाता , तो दोनों प्रस्ताव बहुत अधिक सम्मति से अवश्य स्वीकृत हो जाते , परन्तु आदरणीय सभापति पण्डित मालवीयजी की सम्मति को मानते हुए मैंने काशी के ब्राह्मण पण्डितों को एक और अवसर देना उचित समझा , जिससे वे स्वयं जनता का हित करते हुए हिन्दू जाति का सम्मान प्राप्त कर सकें । मुझको यह जानकर बड़ा दुःख और निराशा हुई कि दलित भाइयों को महासभा के मंच पर से भाषण नहीं करने दिया गया । ” पर हिन्दू महासभा ने न केवल मलकाना राजपूतों को ही अपितु ब्राह्मण , वैश्य , गूजर , जाट आदि सभी को , जो रीति – रिवाज तथा संस्कारों से तो हिन्दू थे , पर नाम को मुसलमान थे , अपनी – अपनी बिरादरियों में सम्मिलित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत कर लिया था ।

स्वामी जी की यह महान् विजय थी । जिस प्रयोजन से वह हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए थे , वह आंशिक रूप से सफल हो गया था । सन् १९२४ में हिन्दू महासभा का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ । लाला लाजपतराय उसके सभापति थे । उसमें दलितोद्धार के पक्ष में एक प्रस्ताव स्वीकृत कराने में स्वामी जी को सफलता प्राप्त हुई थी । पर वह इतने से सन्तुष्ट नहीं थे । वह चाहते थे , कि छुआछूत सदृश बुराई हिन्दुनों से समूल नष्ट हो जाय । इसके लिए वह अत्यन्त प्रगतिशील उपायों के अवलम्बन के पक्ष पाती थे । इसीलिए उन्होंने ‘ अर्जुन ‘ और ‘ तेज ‘ नाम से दो दैनिक पत्रों का हिन्दी और उर्दू में प्रकाशन प्रारम्भ कराया ( सन् १९२३ में ) , और बाद में ( एप्रिल , १९२६ ) ‘ लिबरेटर ‘ नाम से एक अंग्रेजी साप्ताहिक भी निकाला । इन पत्रों द्वारा स्वामीजी हिन्दू संगठन के लिए सशक्त आन्दोलन करने में तत्पर थे । स्वामी श्रद्धानन्द देर तक हिन्दू महासभा में सम्मिलित नहीं रह सके । वह जिस ढंग से दलितोद्धार सदृश क्रान्तिकारी सुधार – कार्यों के लिए आन्दोलन कर रहे थे , पुराने ढंग के कट्टर सनातनी हिन्दुओं को वह पसन्द नहीं था । उसमें उन्हें आर्यसमाज की बू आती थी । स्वामी जी के कार्यकलाप के सम्बन्ध में उनकी मनोवृत्ति जगद्गुरु शंकराचार्य भारतीकृष्ण तीर्थ के निम्नलिखित कथन से स्पष्ट हो जाती है — ” सनातन धर्म के नाम पर आर्यसमाज का काम होता है । लोगों को शुद्ध करके यज्ञोपवीत देकर ब्राह्मण बनाया जाता है । हमें धोखा देकर ऐसा काम किया जाता है । ” सनातन धर्म के अनेक प्रमुख व्यक्ति हिन्दू शुद्धि सभा ‘ के कार्य को भी आशंका की दृष्टि से देखते थे । उसे भी वे आर्य समाज के प्रचार का साधन समझते थे । इसीलिए उन्होंने ‘ हिन्दू पुनःसंस्कार सम्मेलन ‘ के नाम से एक पृथक् संगठन का निर्माण किया । हिन्दू महासभा के प्रधान नेता उस समय पण्डित मदनमोहन मालवीय और दरभंगा के महाराजा श्री रामेश्वर सिंह थे ।

 

अछूतोद्धार और विधवा – विवाह का जिस रूप में स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा समर्थन किया जा रहा था , वे उससे सहमत नहीं थे । यही कारण है , कि हरयाणा प्रान्तीय हिन्दू कान्फरेन्स ( १९२५ ) में जब विधवा – विवाह के सम्बन्ध में प्रस्ताव प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया , तो मालवीय जी ने धमकी दी कि यदि इस प्रस्ताव के लिए आग्रह किया गया तो वह अपने साथियों के साथ कान्फरेन्स से चले जाएंगे । उसी वर्ष जब दिल्ली में हिन्दू महासभा का वार्षिक अधिवेशन हुआ , तो उसमें भी मालवीय जी ने विधवा – विवाह के समर्थन में प्रस्ताव को पेश नहीं होने दिया । शीघ्र ही , स्वामी श्रद्धानन्द ने अनुभव कर लिया , कि महासभा के साथ रहकर व उसके माध्यम से हिन्दू संगठन एवं समाज – सुधार का कार्य नहीं कर सकते । उन्होंने यही उचित समझा कि हिन्दू महासभा से पृथक् होकर कार्य करें । त्याग पत्र देकर वह उससे पृथक् हो गये , और उन्होंने हिन्दुओं के सामाजिक , धार्मिक एवं नैतिक जो अभागा सुधार का कार्य पूर्ण उत्साह से प्रारम्भ कर दिया । हिन्दू जाति जात – पात के भेदभाव और छुआछूत की भावना से ग्रस्त एक बिखरी हुई निर्बल जाति थी । उनमें अपने ‘ एक ‘ होने की अनूभूति का अभाव था । स्वामी श्रद्धानन्द उसे संगठित करना चाहते थे ।

हिन्दू संगठन के जिस आन्दोलन को अब उन्होंने प्रारम्भ किया , उसके प्रयोजन को ‘ अर्जुन ‘ के एक लेख में उन्होंने इस प्रकार प्रकट किया था— “ पाँच हजार वर्षों से दीन अवस्था को प्राप्त होते – होते गत एक हजार वर्षों में तो गिरते – गिरते यह देश दासता की पराकाष्ठा को पहुँच गया था । उस गुलाम की हालत बहुत दर्दनाक है , जो अपनी दासता को अनुभव करता हुआ भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा जा रहा हो । यह हालत आर्य – हिन्दू समाज की मुसलमानों के शासनकाल में थी । परन्तु दास अपनी अवस्था में ऐसा सन्तुष्ट हो जाय कि उसी को जीवन का स्वाभाविक आदर्श समझने लग जाय , उसकी अवस्था को जाहिर करने के लिए कोई शब्द ढूंढने से ही मिलते । अंग्रेजों ने जहाँ भाई – भाई को लड़ाकर सारा देश काबू कर लिया , वहाँ कुछ काल के अनुभव से ही सन् १८५७ ईसवी के विप्लव के पीछे , महारानी विक्टोरिया के घोषणापत्र के रूप में हिन्दियों को सोने की जंजीरें पहना दी । साथ ही अपनी शिक्षा विधि द्वारा ऐसा क्लोरोफार्म संघाया कि गुलाम जंजीरों को आभूषण समझने लगे । फिर अपनी हालत में ऐसे मस्त हुए कि हिलने – जुलने की जरूरत ही नहीं समझी । हिन्दियों में से मुसलमानों ने तो फिर भी अपनी हस्ती कायम रखी , परन्तु हिन्दुओं ने अपने अस्तित्व को ही भुला दिया । पचपन वर्ष हुए कि बाल ब्रह्मचारी ने मूच्छित आर्य जाति को जगाने का यत्न किया । कुछ हलचल भी हुई , परन्तु मुट्ठीभर व्यक्तियों के सिवाय बाकी सब खर्राटे ही भरते रहे । उसी नशे में चूर हिन्दू समाज की आँखें जब महात्मा गांधी ने खोलीं , तो अपनी विवशता को भूलकर उन्होंने पहले स्वयं साधन सम्पन्न बनने के स्थान में अपने मुसलमान भाइयों की रहनुमाई का दावा कर दिया । स्वार्थ इस प्रतिज्ञा की जड़ में था । इसलिए महात्मा गांधी के जेल जाते ही हिन्दुओं ने मुंह की खाई । तब परमात्मा के अटल नियम ने उनकी आँखें खोलीं , जिसका परिणाम गत सवा वर्ष का धर्मयुद्ध है ।

 

वह दिन दूर नहीं है जब आर्य – हिन्दू समाज संघशक्ति से सुसज्जित होकर व्यक्ति और समष्टि दोनों को बलवान् बनाकर सारे संसार के अन्य समाजों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ायेगा । ” स्वामी जी ने यहाँ जिस धर्मयुद्ध का उल्लेख किया है , उससे हिन्दुओं का वह संघर्ष अभिप्रेत था , जो वे मलाबार , मुलतान , गुलबर्गा , अमेठी , सहारनपुर , कोहाट आदि के साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों के अत्याचारों से आत्मरक्षा के लिए कर रहे थे। संगठन द्वारा स्वामी जी हिन्दुओं को शक्तिशाली अवश्य बनाना चाहते थे , पर मुसलमानों या किसी भी अन्य धर्म के अनुयायियों का विरोध करना उनका उद्देश्य नहीं था । मुसल मानों को उनका यह कहना था- ” मुसलमान – समाज को मैं सिर्फ एक सलाह देना चाहता हूँ । याद रखो — संगठित और शक्ति – सम्पन्न समाज का असंगठित और कमजोर समाज पर अत्याचार करना वैसा ही पाप है , जैसा कि कमजोर और कायर होना पाप है । इस लिये हिन्दुओं के संगठन और शक्ति – सम्पन्न होने में विघ्न न डालो । यदि तुम हिन्दू समाज के अस्तित्व को इस भूमि पर से मिटा सकते , तो मैं कुछ भी नहीं कहता , क्योंकि मनुष्य – समाज का यह दुर्भाग्य है कि इस वसुन्धरा का भोग वीर लोग ही कर सकते हैं । साथ ही तुमको यह भी मालूम होना चाहिए कि जो समाज पाँच हजार वर्ष के निरन्तर पतन के बाद भी नष्ट नहीं हुआ उसको भगवान् ने किसी भावी हेतु से ही कायम रखा हुआ है । यदि हिन्दू समाज के अस्तित्व को नष्ट नहीं किया जा सकता , तो उसको संगठित तथा दृढ़ होने दो , जिससे यह भारतीय राष्ट्र के राजनैतिक अभ्युदय में मुसलमानों के गले का भार न होकर शक्ति का पूँज साबित हो सके । ” हिन्दू संगठन और शुद्धि के आन्दोलन का संचालन करते हुए भी स्वामी श्रद्धानन्द मुसलमानों के प्रति भ्रातृभाव रखते थे और साम्प्रदायिक मेल – जोल के प्रबल समर्थक थे । वह नहीं चाहते थे , कि ईद के अवसर पर गाय की कुर्बानी से हिन्दू लोग उद्वेग अनुभव करें और मुसलमानों का विरोध करने को उतारू हो जाएँ ।

इसीलिए सन् १९२५ में ईद के अवसर पर दिल्ली के निवासियों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने लिखा था ” परमात्मा सारे संसार का पिता है । यदि तुम्हें इस बात पर विश्वास है , तो प्राणिमात्र को मित्र की दृष्टि से देखना चाहिये , और मनुष्यमात्र को तो भाई समझना चाहिए । ‘ आज मुसलमान स्त्री – पुरुष , बाल – वृद्ध – युवा नये कपड़े पहनकर अद्वितीय ब्रह्म के आगे अपनी श्रद्धा की भेंट धरने जा रहे हैं ।

क्या यह श्रद्धा उनके अन्दर घर कर गयी है ? यदि ऐसा होगा , तो वे अपने त्यौहार पर हिन्दुओं का दिल दुखाने की कोई बात नहीं करेंगे । मेरे हिन्दु भाइयो ! आज तुम्हें भी अपने भ्रातृभाव का स्पष्ट प्रमाण देना है । परमात्मा की उपासना में अपने मुसलमान भाइयों को निमग्न देखकर प्रसन्नता से उनको आशीर्वाद दो । यदि तुम्हारी आँखों के आगे से कुर्बानी के लिए गौमाता जाती हो , तो क्रोध और द्वेष का लेश भी अपने अन्दर न आने दो , प्रत्युत परमात्मा से हार्दिक प्रार्थना करो कि वह परम पिता उनकी बुद्धियों को प्रेरणा करे , जिससे स्वयं गौरक्षा का भाव उनमें उत्पन्न हो । ” जून , १९२५ में स्वामी श्रद्धानन्द ने हिन्दू महासभा से त्यापत्र दे दिया था , और वह स्वतन्त्र रूप से दलितोद्धार , शुद्धि तथा हिन्दू संगठन के कार्यों में लग गये थे । इससे हिन्दू जनता में असाधारण चेतना उत्पन्न होने लगी , और ऐसे लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती गयी , जो हिन्दू जाति की दुर्दशा और निर्बलता को अनुभव करते थे और साथ ही उसे सशक्त बनाने के लिए स्वामी जी द्वारा प्रतिपादित उपायों को स्वीकार करने के लिए उद्यत थे । कट्टर व संकीर्ण साम्प्रदायिक मनोवृत्ति वाले मुसल मानों का इससे क्षुब्ध होना स्वाभाविक था ।

सन् १९२२-२५ के काल में भारत के विविध प्रदेशों में जो अनेक हिन्दू – मुसलिम दंगे हुए , वे इसी क्षोभ के परिणाम थे । मुसलमानों को यह सहन नहीं हुआ , कि हिन्दू लोग केवल अछूतों को ही नहीं , अपितु नौमुसलिमों को भी अपने समाज में सम्मिलित कर लें , और जात – पाँत के संकीर्ण भेदभावों को भुलाकर एक संगठन में संगठित हो जाएँ । यदि ईसाइयों और मुसलमानों को यह अधिकार था , कि अन्य लोगों को अपने धर्म में दीक्षित कर सकें , तो हिन्दुओं को यह अधिकार क्यों नहीं था ? यदि निर्बलता , प्रमाद या संकीर्णतावश गत समय में हिन्दुओं ने अपने इस अधि कार का प्रयोग नहीं किया , तो भविष्य में इसे प्रयुक्त करने से उन्हें कैसे रोका जा सकता था ? साम्प्रदायिक उपद्रवों के कारण भारत के सार्वजनिक जीवन में जो वातावरण उत्पन्न हो गया था , महात्मा गांधी उससे बहुत चिन्तित थे । १८ मई , १९२४ को उन्होंने ‘ यंग इण्डिया ‘ में एक लेख लिखा , जिसमें साम्प्रदायिक विद्वेषभाव के कारणों का विवेचन करते हुए आर्यसमाज को उसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी ठहराया ।

 

सत्यार्थप्रकाश और महर्षि दयानन्द पर भी इस लेख में अनेक आक्षेप किये गये ” मैंने आर्यसमाजियों की बाइबल सत्यार्थप्रकाश को पढ़ा है । मैंने इतने बड़े सुधारक का ऐसा निराशाजनक ग्रन्थ आज तक नहीं पढ़ा ।

स्वामी दयानन्द ने सत्य और केवल सत्य पर खड़े होने का दावा किया है , परन्तु उन्होंने अनजाने में जैन धर्म , इस्लाम धर्म , ईसाइयत स्वयं हिन्दू धर्म को अशुद्ध रूप से प्रकट किया है । उन्होंने पृथिवीतल पर अत्यन्त सहिष्णु और स्वतन्त्र सम्प्रदायों में से एक ( हिन्दू सम्प्रदाय ) को संकुचित बनाने का प्रयत्न किया है । आप जहाँ कहीं भी आर्यसमाजियों को पाएँगे , वहाँ जीवन और जागृति मिलेगी । परन्तु संकुचित विचार और लड़ाई – झगड़े की पादत से वे अन्य सम्प्रदायवालों से लड़ते रहते हैं , और जहाँ ऐसा नहीं वहाँ स्वयं आपस में लड़ते रहते हैं । स्वामी श्रद्धानन्द जी को भी इसका अधिकांश भाग मिला हुआ है , परन्तु इन सब त्रुटियों के होते हुए भी मैं उन्हें ऐसा नहीं समझता जिसके लिए ( सुधार की ) प्रार्थना न की जा सके । ” महात्मा गांधी के इस लेख से मुसलमानों को बहुत बल मिला । जनता की गांधी जी में अगाध श्रद्धा थी । सब कोई यह समझने लगे , कि देश में जो साम्प्रदायिक समस्या उत्पन्न हो गयी है , उसके लिए आर्य समाज और उसके नेता प्रधानतया उत्तरदायी हैं । आर्यसमाज की ओर से गांधी जी द्वारा किये गये आक्षेपों के उत्तर में अनेक लेख लिखे गये और आर्य विद्वानों के एक डेपुटेशन ने उनसे भेंट भी की।

इसपर महात्मा गांधी ने आंशिक रूप से उस भ्रम के निराकरण का कुछ प्रयत्न भी किया , जो उनके लेख से उत्पन्न हो गया था । पर जो तीर छूट चुका था , उसे वापस ले सकना सम्भव नहीं था । स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज द्वारा जो कार्य शुद्धि और हिन्दू संगठन के लिए किया जा रहा था , मुसल मान उससे उनके प्रति उग्र विरोधभाव पहले ही रख रहे थे , अब गांधी जी का आश्रय पाकर उसमें और अधिक वृद्धि हो गयी ।

चित्रनगरी संवाद मंच में सकारात्मकता सोच पर चर्चा

मुंबई ।
हमारी वाणी में हमारी सोच का प्रतिबिंब होता है। यह एक अकाट्य सत्य है कि मुँह से निकला शब्द और कमान से छूटा तीर कभी वापस नहीं आता। यही कारण है कि संतों ने सदियों पहले यह मंत्र दिया था –

​ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।

​वक्ताओं का कहना था कि सकारात्मकता सिर्फ़ विचारों में नहीं, बल्कि उन्हें प्रस्तुत करने के सुंदर तरीक़ों में भी झलकती है। हमारे व्यवहार और विवेक का नियंत्रण ही हमें सकारात्मक या नकारात्मक बनाता है।

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई में रविवार 7 दिसम्बर 2025 को सकारात्मक और नकारात्मक सोच पर विचारोत्तेजक चर्चा हुई। मृणालताई हाल, केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव में आयोजित इस चर्चा की प्रस्तावना के रूप में व्यंग्यकार सुभाष काबरा ने एक रोचक व्यंग्य लेख “सकार भाई नकार भाई” की प्रस्तुति की, जिसने संवाद के लिए एक जीवंत पृष्ठभूमि तैयार की। इस चर्चा को एक महत्वपूर्ण मुकाम पर पहुंचाने में शायरा दीप्ति मिश्र, डॉ रवीन्द्र कात्यायन, संजय सिंह, प्रतिमा सिन्हा, अरुण शेखर, रेणु शर्मा और नाज़नीन ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। चर्चा का संचालन देवमणि पांडेय ने किया।

#धरोहर में हिंदी के कालजयी कवियों की कविताएं के अंतर्गत मधुबाला शुक्ल ने “उतनी दूर मत ब्याहना बाबा!” (निर्मला पुतुल), प्रज्ञा मिश्रा ने “नदी, पहाड़ और बाज़ार” (जसिंता केरकेट्टा), अंकना जोशी ने “उस स्त्री का प्रेम” (मंगलेश डबराल), मधु चौधरी ने “व्यंग्य मत बोलो” (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना) और अरुण शेखरने “प्रमथ्यु गाथा” (डॉ धर्मवीर भारती) कविता का वाचन किया।

लखनऊ से पधारे प्रतिष्ठित शायर मंज़र लखनवी ने चुनिंदा ग़ज़लें और गीत सुनाया। उनकी रचनाओं को श्रोताओं की भरपूर सराहना मिली। कवयित्री रचना शंकर ने अपनी पुस्तक” अहसास के पन्ने” का परिचय दिया और पुस्तक अंश का पाठ किया। लब्ध प्रतिष्ठित कवियों मनजीत सिंह कोहली और उदय दिवाकर पांडेय ने अपनी सार्थक रचनाओं से कार्यक्रम को समृद्ध किया।

इस अवसर पर प्रो रामबक्ष, फ़िल्म लेखक-निर्देशक दिनेश लखनपाल, बहुभाषी शायर नवीन सी चतुर्वेदी, अभिनेता सोनू पाहूजा और डॉ आर एस रावत ने अपनी मौजूदगी से आयोजन की गरिमा बढ़ाई।