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फिल्म आपको बदल देती है; यह आपकी जिंदगी बन जाती है और आपके विश्वास को आकार देती है: फिल्म फ्रैंक’ के निर्माता- इवो फेल्ट

हर युवा एक ही लड़ाई लड़ता है कि दुनिया की उनसे क्या बनने की उम्मीद है और वे वास्तव में क्या बनना चाहते हैं: लिटिल ट्रबल गर्ल्स के निर्माता- मिहेक चेर्नेक

गोआ। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के मंडप में गोवा की समुद्री हवा तन-मन में ताजगी भर रही थी और कैमरे सितारों के कण की तरह चमक रहे थे। इन सब के बीच फिल्म फ्रैंक और लिटिल ट्रबल गर्ल्स ने आज मंच को जगमगाहट से भर दिया और प्रेस वार्ता कक्ष  भावना, चिंतन, हास्य और सिनेमाई जादू की जीवंतता से सराबोर हो गया।

फिल्म फ्रैंक के  निर्माता इवो फेल्ट और लिटिल ट्रबल गर्ल्स के निर्माता मिहेक चेर्नेक  फिल्म प्रेमियों और पत्रकारों को अपनी सृजनात्मक दुनिया की गहराईयों में ले गए जिन्हें उन्होंने बहुत ही सावधानीपूर्वक गढ़ा था। एक अपरिपक्व  और अडिग, दूसरी काव्यात्मक और डरानेवाली, फिर भी दोनों ही दर्द, स्वयं की खोज, साहस और मानवीय संबंध के सार्वभौमिक कथ्य के साथ जीवंत थीं।

फिल्म फ्रैंक: दर्द, उम्मीद और मानवीय संबंधों से बुनी कहानी

‘फ्रैंक’ 13 वर्ष के पॉल की कहानी है, जो घरेलू हिंसा से परेशान होकर एक अनजान शहर में पहुंच जाता है जहां उसकी ज़िंदगी अनिश्चित है। उसका हर निर्णय उसे और भी अधिक उथल-पुथल में डाल देता है। तब उसकी मुलाकात होती है एक अनजान, दिव्यांग व्यक्ति से जो उसका जीवन पथ-प्रदर्शक बन जाता है, जिसकी आवश्यकता थी यह उसे पता ही नहीं था।

इस फिल्म के निर्माता इवो फेल्ट ने बेहद ईमानदारी के साथ फिल्म की भावनात्मक जड़ों की चर्चा करते हुए कहा कि  इस कथा पर फिल्म बनाने का विचार लगभग बीस वर्षों तक मेरे मन में समाया रहा, एक साये की तरह, एक याद की तरह। जब एक दिन इस विचार ने मन के कोने में आगे और पड़ा रहने से  इनकार कर दिया तब फिल्म फ्रैंक का जन्म हुआ।

इवो फेल्ट ने फिल्म को एक शांत खोज बताया कि अदृश्य ज़ख्मों का सामना करते बच्चों का क्या बीतती है। एस्टोनिया जैसे छोटे देश में फिल्म बनाने की चुनौतियों की चर्चा करते हुए फेल्ट ने अपने व्यंग्यात्मक हास्य से दर्शकों को हंसाते हुए कहा कि हम फिल्म निर्माण के लिए धन की चुनौती से ही नहीं ,इसे ओलंपिक खेल मानकर इसे पाने की कोशिश में जुट जाते है। उन्होंने कहा कि करदाताओं की मदद के बिना, फ्रैंक जैसी फिल्म बन ही नहीं सकती।

ऐसी कहानियों से कलाकारों और फिल्म निर्माण दल में होने वाले बदलाव की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक फिल्म आपको बदल कर रख देती है। यह आपकी ज़िंदगी बन जाती है और आपके विश्वास को आकार देती है।

गायक-वृंद के स्वर से साहस तक: लिटिल ट्रबल गर्ल्स अपेक्षा और पहचान के बीच के संघर्ष की पड़ताल करती है

एक कॉन्वेंट में सप्ताहांत के गायन-वादन के दौरान घटित कथा  पर आधारित फिल्म लिटिल ट्रबल गर्ल्स  आज़ादी, इच्छा, विद्रोह और वैश्विक नज़रिए की पहली चिंगारी का अनुभव करने वाली एक शर्मीली सी किशोरी की कहानी है। उसकी जागृति- दोस्ती, परंपराओं और आस-पास की कठोर अपेक्षाओं के लिए चुनौती बन जाती है।

निर्माता मिहेक चेर्नेक ने “लिटिल ट्रबल गर्ल्स” के मूल भाव को बखूबी व्यक्त करते हुए फिल्म की प्रमुख चरित्र की स्वयं की खोज यात्रा के बारे में बताया। फिल्म के भावनात्मक पक्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि  विवेक संबंधी जागृति कभी धीमी आवाज में मन में नहीं आती  बल्कि ऐसे गीत की तरह पहुंचती है जिसे आप अनसुना नहीं कर सकते।

इस फिल्म के निर्माण की गहराई से चर्चा करते हुए,  चेर्नेक ने इसके अनूठे रचनात्मक विस्तार का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि फिल्म निर्माण से जुड़ी  टीम ने गिरिजाघरों के अंदर चार सप्ताह तक फ़िल्मांकन किया, और सेट पर ही लाइव कोरल प्रदर्शनों के साथ गायक मंडली के जीवन के अलौकिक अनुशासन को कैमरे में कैद किया। इस प्रक्रिया में 17 वर्ष की मुख्य अभिनेत्री ने मासूमियत और भावनात्मक गहराई के बीच संतुलन स्थापित करते हुए बेजोड़ अभिव्यक्ति दी और फिल्माकंन प्रक्रिया में अभिनय के कई परत जोड़ दिए। इस फिल्म के निर्माण को दौरान कैमरा एक रहस्यमयी गुफा में पहुंचा, जिसे चेर्नेक ने “अपने आप में पूरा एक ब्रह्मांड” बताया।

मिहेक चेर्नेक ने कहा कि उनके लिए, गिरिजाघर, जंगल, गुफा भौतिकता से परे थीं।  ये कोई खास स्थान नही किरदार थे। इन लोकेशनों ने फिल्म को समृद्ध बना दिया।

चेर्नेक ने स्लोवेनिया के सांस्कृतिक ताने-बाने के परिप्रेक्ष्य में फिल्म की चर्चा करते हुए देश में गहरी जड़ें जमाए गायन परंपराओं और कैथोलिक विरासत का उल्लेख  किया। उन्होंने कहा कि हम सभी गाते हुए और अनुशासन के साथ बड़े हुए हैं।

फिल्म की सार्वभौमिक अपील की चर्चा करते हुए, उन्होंने कहा कि हर युवा एक ही संघर्ष का सामना करता है कि दुनिया उससे क्या बनने की उम्मीद करती है और वह खुद वास्तव में क्या बनना चाहता है। उन्होंने कहा कि यही चुप्पी भरा गहरा संघर्ष ‘लिटिल ट्रबल गर्ल्स’ को वैश्विक तौर पर लोकप्रिय बनाती है।

आईएफएफआई के बारे में

1952 में आरंभ हुआ भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव – इफ्फी दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा सिनेमाई आयोजन है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम – एनएफडीसी, भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय, और गोवा सरकार के एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव वैश्विक सिनेमाई महाशक्ति के रूप में उभरा है। यहां संरक्षित पुरानी क्लासिक फिल्मों को साहसिक प्रयोगों से प्रस्तुत किया जाता हैं और दिग्गज फिल्‍मकार नवोदित फिल्‍मकारों के साथ अपने अनुभव साझा करते हैं। इफ्फी को लोकप्रिय और आकर्षक आयोजन बनाने में इसके प्रमुख कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय फिल्‍म प्रतियोगिता, सांस्कृतिक प्रदर्शन, जानेमाने फिल्‍मकारों द्वारा संचालित मास्टरक्लास, फिल्‍म से जुड़े दिग्‍गजों का श्रद्धांजलि संवर्ग और विस्‍तृत वेव्स फिल्म बाजार शामिल हैं, जहां विचार, फिल्‍म संबंधी खरीद और निर्माण सहयोग सपनों को पंख मिलता है। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की मनोहर तटीय पृष्ठभूमि में आयोजित, 56वां भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह – इफ्फी भाषाओं, शैलियों, नवनिर्माण और सृजनशील आवाजों के जरिए विश्‍व मंच पर भारत की विलक्षण सृजनशील प्रतिभा पेश करता है—

इफ्फी के सदस्यों ने प्रेस वार्ता में ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ पर ध्यान आकृष्ट किया

इफ्फी का सिनेमा का औपचारिक उत्सव ‘थुदारम’ के साथ जारी रहेगा

56वें इफ्फी डायरी में दोनों फिल्मों के कलाकारों और क्रू के बीच वार्तालाप दर्ज किए गए

गोआ। 56वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) के छठे दिन, दर्शकों को ‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ के पीछे की कहानियों को सुनने का मौका मिला, जब निर्देशक जिगर नागदा और निर्माता जितेंद्र मिश्रा गोवा के प्रेस वार्ता हॉल में मीडिया से रूबरू हुए। यह उत्साह तब और बढ़ गया जब मलयालम फिल्म ‘थुदारम’ (आगे जारी रहेगी) के निर्देशक थारुण मूर्ति, निर्माता एम. रंजीत और कार्यकारी निर्माता अवंतिका रंजीत भी इसी कार्यक्रम में शामिल हुए।

अपने उद्घाटन भाषण में निर्देशक जिगर नागदा ने बताया कि कोविड के दौरान राजस्थान में अपने घर पर बिताए समय ने उन्हें इस क्षेत्र में ‘खनन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव’ को समझने का मौका दिया।  किंतु इसके साथ इस बात का भी एहसास हुआ कि लोग इतने भारी खनन के कारण होने वाले पर्यावरणीय क्षरण के दीर्घकालिक प्रभाव से कैसे अनभिज्ञ हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि इसी विषय पर एक वृत्तचित्र बनाने के बाद, उन्हें फीचर शैली के माध्यम से भी लोगों का ध्यान आकर्षित करने की इच्छा हुई।

निर्माता जितेंद्र मिश्रा ने “आई एम कलाम” से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत को याद किया और क्षेत्रीय सिनेमा के प्रति अपने पुराने आकर्षण को साझा किया। उन्होंने बताया कि नागदा की अनूठी कला और कथात्मक संवेदनशीलता ने ही उन्हें अंततः इस फिल्म का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।

निर्देशक थारुण मूर्ति ने ‘थुदारम’ की अपनी शुरुआती पंक्ति के माध्यम से मंच का माहौल तैयार करते  हुए कहा, “एक नागरिक होने के नाते, मैं अपनी कला के माध्यम से अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए बाध्य महसूस करता हूं। मुझे सिनेमाई मनोरंजन के साथ सामाजिक चिंतन का मिश्रण पसंद है।”

कार्यकारी निर्माता सुश्री अवंतिका ने बताया कि थुडारम की कहानी उनके प्रोडक्शन हाउस तक 12 साल पहले पहुंची थी, लेकिन उन्होंने इसे साकार करने के लिए सही निर्देशक का इंतजार किया। थारुण की पहली फिल्म देखने के बाद ही उनके पिता – निर्माता एम. रंजीत उनके विजन से इतने प्रभावित हुए कि आखिरकार इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि उनके पिता और निर्देशक, दोनों ही मोहनलाल के सबसे बड़े प्रशंसकों में से हैं।

एक सवाल का जवाब देते हुए श्री मूर्ति ने कहा, “हमारी ताकत भावनाओं में है। भव्य दृश्यों या बड़े बजट में नहीं, बल्कि उन किरदारों में जिनके साथ हम सचमुच जीते हैं। यही बात फिल्म को वैश्विक स्तर पर जुड़ने में मदद करती है, भले ही इसका बजट बड़े उद्योगों के बजट का एक छोटा सा हिस्सा हो। सिर्फ मलयाली ही नहीं, बल्कि हर जगह के दर्शक अब बड़े-बड़े चित्रणों के बजाय जमीनी, ईमानदार कहानी कहने की ओर आकर्षित हो रहे हैं। और, यही वह क्षेत्र है जिसे हम आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित हैं।”

निर्देशक नागदा ने सत्र का समापन एक टिप्पणी का जवाब देते हुए किया, “मैं सचमुच सम्मानित महसूस कर रहा हूं कि मेरी फिल्म की तुलना माजिद मजीदी के काम से की जा रही है। मैंने उनके माध्यम से विश्व सिनेमा — बरन, द विलो ट्री और कई अन्य फिल्में देखी, जो मेरे स्कूल की पसंदीदा फिल्में बन गईं। ईरानी सिनेमा ने कहानी कहने के मेरे नजरिए को आकार दिया और इसका ताना-बाना स्वाभाविक रूप से मेरी फिल्म में भी समाहित है। लॉन्ग शॉट्स के प्रति मेरा प्रेम भी उसी प्रभाव से उपजा है। भारत में यह कोई व्यापक रूप से प्रचलित शैली नहीं है, लेकिन मेरे लिए, लॉन्ग टेक में सबसे सरल गति भी भावनात्मक अर्थ रखती है। मैं आभारी हूं कि आपने इस पर ध्यान दिया।”

‘व्हिसपर्स ऑफ द माउंटेंस’ का सारांश

अरावली की कठोर सुंदरता में रची-बसी यह फिल्म सिलिकोसिस से जूझ रहे एक पिता और खनन से तबाह हुए पहाड़ों के लिए विलाप करते एक बेटे की कहानी है। जैसे-जैसे लड़के के छोटे-छोटे उपचार परिवार के जीवित रहने के संघर्ष से टकराते हैं, उनकी कहानी प्रेम, क्षति और मनुष्य तथा पृथ्वी के बीच के नाजुक बंधन का एक मार्मिक प्रतिबिंब बन जाती है।

‘थुडारम’ का सारांश

रन्नी की शांत पहाड़ियों में, पूर्व फाइट कोरियोग्राफर षणमुगम, जिन्हें प्यार से बेंज कहा जाता है। वे अपने परिवार और अपनी प्यारी काली एम्बेसडर के साथ एक शांत जीवन जी रहे हैं। लेकिन जब तीन पुलिसवाले उन्हें एक भयावह कवर-अप में घसीट लेते हैं, तो उनकी शांत दुनिया बिखर जाती है। इसके बाद एक ऐसे परिवार की दिलचस्प कहानी सामने आती है जो डर, विश्वासघात और एक-दूसरे को थामे रखने की जद्दोजहद में अपनी हदें पार कर चुका है।

आईएफएफआई के बारे में
1952 में स्थापित, भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया में सिनेमा के सबसे पुराने और सबसे बड़े उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) और गोवा सरकार के तहत एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई महाशक्ति के रूप में विकसित हो गया है। यहां पुनर्स्थापित क्लासिक फिल्में साहसिक प्रयोगों से मिलती हैं और दिग्गज कलाकार निडर पहली बार आने वाले कलाकारों के साथ मंच साझा करते हैं। इफ्फी को वास्तव में शानदार बनाने वाला इसका अद्भुत सम्मिश्रण है, यानी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्स फिल्म बाजार, जहां विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की आश्चर्यजनक तटीय पृष्ठभूमि में आयोजित, 56वां इफ्फी भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाजों की एक चकाचौंध श्रृंखला का वादा करता है।

आईएफएफआई 2025 में अभिनेता धर्मेंद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई

गोआ। भारतीय सिनेमा अपने सबसे महान और सबसे प्रिय तथा प्रतिष्ठित अभिनेताओं में से एक श्री धर्मेंद्र के निधन पर शोकाकुल है। सोमवार, 24 नवंबर, 2025 को उनका निधन हो गया। संपूर्ण राष्ट्र के साथ आज 56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में भी उनके दिवंगत होने पर गहरा दुख व्यक्त किया गया और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

जाने-माने फिल्म निर्माता राहुल रवैल ने अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि में रुपहले पर्दे के सबसे चमकते सितारों में से एक श्री धर्मेंद्र के साथ गुजारे गए समय की अपनी अनमोल यादें ताज़ा कीं। उन्होंने सबसे पहले सभी से स्वर्गीय श्री धर्मेंद्र के परिवार के असहनीय दुःख को साझा करते हुए उनके निराले जीवन को याद करने का आग्रह किया। श्री रवैल ने कहा, “वह एक प्रतिष्ठित अभिनेता और अद्भुत इंसान थे।”

 

राज कपूर की फ़िल्म “मेरा नाम जोकर” में सहायक निर्देशक के रूप में अपने दिनों को याद करते हुए राहुल रवैल ने बताया कि कैसे स्वर्गीय श्री धर्मेंद्र ने ट्रैपीज़ कलाकार महेंद्र कुमार की भूमिका बेजोड़ समर्पण के साथ निभाई थी। उन्होंने बताया कि कैसे वे एक महीने तक हर रोज़ शाम की फ्लाइट से दिल्ली आते थे, सुबह 5 बजे तक शूटिंग करते थे और फिर “आदमी और इंसान” की शूटिंग जारी रखने के लिए मुंबई लौट जाते थे— यह एक बेहद थकाऊ शेड्यूल था, लेकिन उसका उन्होंने हमेशा पालन किया।

राहुल रवैल ने बेताब (1983) की शूटिंग के दिनों को भी याद किया जो स्वर्गीय श्री धर्मेंद्र के बेटे सनी देओल की पहली फिल्म थी। कश्मीर में फिल्मांकन के दौरान स्वर्गीय श्री धर्मेंद्र की एक झलक पाने के लिए भारी संख्या में भीड़ उमड़ पड़ती थी। फिल्म रिलीज़ होने के बाद, उन्होंने बांद्रा पश्चिम स्थित गेयटी सिनेमा में कई दिनों तक हर शाम अपने बेटे की पहली फिल्म देखी और उसके बाद निर्देशक राहुल रवैल के घर जाकर ठीक उसी उत्साह के साथ फिल्म पर चर्चा करते थे जैसे किसी ने उसे पहली बार देखा हो। रवैल ने इस बात पर भी गर्व व्यक्त किया कि महान अभिनेता धर्मेंद्र की संतानें उनकी ‘शानदार विरासत’ को आगे बढ़ा रही हैं।

उन्होंने भावुक होकर कहा, “धरम जी एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके जीवन की सराहना की जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने लोगों को बहुत खुशी दी।” उन्होंने दिल्ली के एक पुलिस अधिकारी का किस्सा सुनाया जो स्वर्गीय श्री धर्मेंद्र से मिलने और उनके पैर छूने के लिए तरस रहा था। जब उसे पता चला कि धर्मेंद्र जी का निधन हो गया है तो वह अधिकारी बहुत दुखी हुआ। उसने श्री रवैल को फोन किया और सनी देओल से मिलकर अपनी संवेदना व्यक्त करने की इच्छा जताई। श्री रवैल ने ज़ोर देकर कहा, “यह धरम जी की ताकत है।”

श्री रवैल ने स्वर्गीय श्री धर्मेंद्र को पितातुल्य बताया जिन्होंने उनके पूरे करियर को आगे बढ़ाने में सहायता की और हर कदम पर समर्थन किया। उन्होंने उन्हें एक अद्भुत निर्माता भी बताया।

अपने समापन भाषण में उन्होंने कहा, “हमने एक महान इंसान खो दिया है। हम भाग्यशाली हैं कि ऐसे दौर में रहे जब धर्मेंद्र जी जैसे दिग्गज कलाकार काम कर रहे थे।” उन्होंने इस सदाबहार सितारे के सम्मान में विशेष श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करने के लिए आईएफएफआई के आयोजकों के प्रति आभार प्रकट किया।

महान व्यक्तित्व, प्रिय कलाकार और बेजोड़ गर्मजोशी वाले व्यक्ति – स्वर्गीय श्री धर्मेन्द्र की विरासत सदैव भारतीय सिनेमा के हृदय में अंकित रहेगी।

भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) में वैश्विक आवाज़ों ने दो दमदार फिल्मों की चर्चा

अकिनोला की ‘माई फ़ादर्स शैडो’ जीवन और राजनीति  की कड़वी सच्चाइयों को बेपर्दा करती है

‘मदर्स बेबी’ गहरे भावों में डूबी कहानी कहती है और मातृत्व के अनेक रंगों को सामने रखती है

भारत के 56वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) में आज दो बिल्कुल अलग, लेकिन भावनात्मक रूप से गूँजने वाली दुनियाएं एक साथ आईं। फ़िल्म ‘मदर्स बेबी’ और ‘माई फ़ादर्स शैडो’ की टीमों ने शिल्प, स्मृतियों और इस बात पर एक जीवंत चर्चा की कि सिनेमा किस तरह हमारे जीए हुए अनुभवों को अंतरंग रूप में दर्शाता है। इस सत्र में ‘मदर्स बेबी’ के सिनेमैटोग्राफर रॉबर्ट ओबेरेनर और प्रोडक्शन डिज़ाइनर जोहान्स सलात के साथ, ‘माई फ़ादर्स शैडो’ के निर्देशक अकिनोला ओगुनमेड डेविस शामिल हुए। अकिनोला की फ़िल्म इस समय वैश्विक स्तर पर सुर्खियाँ बटोर रही है। यह यूके की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री है और कान्स में शामिल होने वाली पहली नाइजीरियन फिल्म भी है।

एक दिन, लेकिन पूरी ज़िंदगी का एहसास: अकिनोला की सहज फिल्ममेकिंग यात्रा

बातचीत की शुरुआत करते हुए अकिनोला ने बताया कि ‘माई फ़ादर्स शैडो’  की जड़ें उनके भाई द्वारा लिखी गई एक शुरुआती लघु फिल्म में हैं। 1993 के नाइजीरियाई चुनावों की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म उनके बचपन की राजनीतिक तनाव से भरी यादों को प्रतिबिंबित करती है।

अकिनोला ने समझाया कि उनकी रचनात्मक प्रक्रिया का अधिकांश भाग सहज प्रवृत्ति से निर्देशित था। उन्होंने कहा, “सूक्ष्म कहानी पिता और उनके लड़कों की है। वृहद कहानी चुनाव की है, और सब कुछ मिश्रित हो जाता है।” फ़िल्म एक ही दिन के भीतर आगे बढ़ती है, एक ऐसा चुनाव जिसे अकिनोला मुक्त करने वाला बताते हैं। उन्होंने कहा, “इसने हमें स्वाभाविक रूप से तनाव बनाने की अनुमति दी। और एक ही दिन में सब कुछ होने से, हम निरंतरता से बंधे नहीं थे। हम भावनाओं पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे।”

फिल्ममेकर ने शूटिंग के दौरान आई भावनात्मक और तकनीकी चुनौतियों पर बेझिझक बात की, खासकर बीच वाले सीक्वेंस पर-जहां 16mm फिल्म गर्मी और आवाज़ के बीच संघर्ष करती रही। एक अंतिम संस्कार वाले दृश्य ने तो उन्हें पूरी तरह थका दिया। उन्होंने स्वीकार किया, “मैं दो दिन बिस्तर पर ही रहा और रोता रहा,” और ऐसे पलों को उन्होंने “शक्तिशाली फिल्ममेकिंग की गवाही” बताया।

इस दौरान अकिनोला ने दर्शकों को नाइजीरिया की आत्मा की एक गहरी झलक भी दी। उन्होंने देश के राजनीतिक परिदृश्य, भाषाई विविधता और इतिहास की शिक्षा में मौजूद खाईयों का ज़िक्र किया। अंग्रेज़ी, क्रियोल और स्ट्रीट वर्नैक्युलर-ये सभी उनकी फिल्म में जगह पाते हैं, और अकिनोला के लिए यह भाषाई सहजता नाइजीरिया की सामाजिक-सांस्कृतिक बनावट को दर्शाती है। उनके विचारों ने एक ऐसे देश की जीवंत तस्वीर पेश की, जिसे आज की वैश्विक सिनेमाई इतिहास में उतनी जगह नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए।

‘मदर्स बेबी’ में मातृत्व की अनकही, बेचैन कर देने वाली परतें

‘मदर्स बेबी’ की टीम के लिए फिल्म की भावनात्मक धुरी एक ऐसी महिला की यात्रा है, जो प्रसव के बाद आने वाले उलझन भरे दौर से गुजर रही है। सिनेमैटोग्राफर रॉबर्ट ओबर्राइनर ने बताया कि उनका पहला उद्देश्य था “उन असली बदलावों को दिखाना, जिनसे एक महिला प्रसव के दौरान गुजरती है।”

फिल्म जूलिया की कहानी का अनुसरण करती है जो एक मशहूर ऑर्केस्ट्रा कंडक्टर है और जिसकी बच्ची एक प्रयोगात्मक प्रजनन तकनीक से पैदा होती हैऔर जो उसके लिए किसी अनजानी-सी महसूस होती है। रॉबर्ट के अनुसार उनकी विजुअल अप्रोच इस तरह बनाई गई कि दर्शक “उसके साथ चल सकें,” और उसके अस्थिर मनोवैज्ञानिक संसार में प्रवेश कर सकें।

प्रोडक्शन डिज़ाइनर जोहान्स सलात ने कहानी के विषय के महत्व पर जोर दिया: उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा विषय है जो महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है,” और फ़िल्म को एक सार्वभौमिक कथा बताया जो “कहीं भी हो सकती है।” उनके लिए, फ़िल्म की दुनिया बनाना चुनौतीपूर्ण और सहज दोनों था, और उन्होंने जिस स्थान को अंततः चुना, वह “कहानी से संबंधित महसूस होता था।”

फिल्म का तनाव धीरे-धीरे बढ़ता है। दूसरे लोग बच्चे को जैसे देखते हैं और मां जैसे महसूस करती है, दोनों के बीच के हल्के लेकिन गहरे फर्क में। रॉबर्ट ने कहा, “यही वह जगह है जहां सस्पेंस शुरू होता है।” उन्होंने फिल्म के ओपन-एंडेड क्लाइमैक्स पर भी बात की, जिसे उन्होंने एक ऐसी पहेली बताया जिसे दर्शकों को खुद सुलझाना होगा।

राह बदलने की कला: फिल्ममेकिंग एक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया

दोनों टीमों ने फिल्म निर्माण को एक लगातार बदलते रहने वाली प्रक्रिया बताया। रॉबर्ट ने कहा कि ‘मदर्स बेबी’ में कई बार ऐसा हुआ कि फिल्म के आगे के हिस्से के लिए सोचे गए शॉट्स शुरुआत में इस्तेमाल हो गए। उन्होंने स्वीकार किया कि बतौर सिनेमैटोग्राफर वह ऐसे बदलावों का पहले विरोध करते थे, लेकिन निर्देशक ने उन्हें याद दिलाया,“भावना पहले आती है, निरंतरता बाद में।”

जोहान्स ने भी सहमति जताई और कहा कि फिल्म बनाना अक्सर आपको वहां पहुंचा देता है, जहां जाने का आपने सोचा भी नहीं होता। उन्होंने कहा, “कई बार आप उस जगह पहुंचते हैं जो आपकी कल्पना से कहीं बेहतर होती है।” अकिनोला ने भी यही विचार दोहराते हुए कहा, “आप फिल्म को तीन बार बनाते हैं- लिखते समय, शूट करते समय और एडिटिंग में।” उनके अनुसार रास्ते में होने वाले बदलाव भटकाव नहीं बल्कि खोज होते हैं।

सत्र के समापन तक एक जीवंत अनुभवों का संगम सामने था-दो फिल्में, दो बिलकुल अलग दुनिया से निकली हुईं, लेकिन जुड़ी हुईं अपने सहज रचनात्मक प्रवाह, कलात्मक सच्चाई और कहानी कहने की उस अनिश्चित, जंगली यात्रा पर अटूट विश्वास से जुड़ी हुई थीं।

इफ्फी के बारे में

1952 में स्थापित, भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया के सिनेमा का सबसे पुराना और सबसे बड़ा सिनेमा महोत्सव रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) और गोवा एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई शक्ति केंद्र बन चुका है-जहां बहाल किए गए क्लासिक्स का संगम साहसिक प्रयोगों से होता है और जहां दिग्गज उस्तादों के साथ नए फिल्मकार भी एक ही मंच साझा करते हैं। जो चीज इफ्फी को खास बनाता है, वह है इसका जीवंत मिश्रण- अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि, और जोश से लबरेज वेव्स फिल्म बाजार, जहाँ विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं।  गोवा के मनमोहक समुद्री तटों की पृष्ठभूमि में 20 से 28 नवंबर तक आयोजित होने वाला 56वां संस्करण भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाज़ों का एक शानदार संगम पेश करने का वादा करता है जो वैश्विक मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक डूबो देने वाला उत्सव है।

‘खोया पाया’: 56वें आईएफएफआई में प्रदर्शित परित्याग और प्रेम की एक हृदय विदारक कहानी

बड़ों के सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जाएगा : मुख्य अभिनेत्री सीमा बिस्वास

चुनौती और रोमांच का अनूठा मिश्रण: खोया-पाया फिल्म की टीम ने कुंभ मेले में फिल्मांकन के बारे में अपनी भावनाएं व्यक्त कीं

गोआ। कुंभ मेले की भारी भीड़ में बेसहारा छोड़ दी गई एक मां पर केन्द्रित निर्देशक आशुतोष सिंह की पहली फिल्म “खोया पाया” आज 56वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में विशेष रूप से प्रदर्शित की गई। यह फिल्म एक ऐसे बुजुर्ग मां की कहानी है, जिसे उसका बेटा छोड़ देता है और अप्रत्याशित रूप से अजनबी लोग उसके साथी बन जाते हैं। अंत में, वह पछतावे से भरे उस बच्चे को पहचानने से इनकार कर देती है जिसने उसे धोखा दिया था।

खचाखच भरे थिएटर में इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद, इसके निर्माता, निर्देशक और मुख्य कलाकारों ने महोत्सव स्थल पर आयोजित पीआईबी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया से बातचीत की।

मां की भूमिका निभाने वाली प्रसिद्ध अभिनेत्री सीमा बिस्वास ने इस फिल्म में वृद्ध माता-पिता के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के विषय पर भावपूर्ण तरीके से बात की। इस मुद्दे को बेहद व्यापक बताते हुए, उन्होंने कहा, “मैंने कई ऐसे परिवार देखे हैं जहां वृद्ध माता-पिता के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है। सिनेमा एक सशक्त माध्यम है जो समाज को प्रभावित कर सकता है। वृद्ध माता-पिता के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता के बारे में बात करना ज़रूरी है।” उनका मानना है कि भारत जैसे समाज में, जहां पारंपरिक रूप से तीन पीढ़ियां एक साथ रहती हैं, बच्चों द्वारा वृद्ध माता-पिता को अकेला छोड़ने की घटनाएं अधिक नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि इस फिल्म की पटकथा ने उन्हें तुरंत प्रभावित किया और कहा, “अगर मैं उस मां की जगह होती जिसे छोड़ दिया गया था, तो मैं वापस नहीं आती। आत्मसम्मान जरूरी है; सम्मान के बिना, पारिवारिक बंधन अर्थहीन हो जाते हैं।” प्रसिद्ध अभिनेत्री ने यह भी कहा कि शूटिंग से पहले आयोजित किए गए विभिन्न कार्यशालाओं ने टीम को किरदारों को बेहतर ढंग से समझने और फिल्मांकन के दौरान “पात्रों को जीने” में मदद की।

बेटे की भूमिका निभाने वाले अभिनेता चंदन रॉय सान्याल ने कहा कि अभिनेताओं को अक्सर ऐसे किरदार निभाने पड़ते हैं, जो सामाजिक रूप से अस्वीकार्य होते हैं। उन्हें लगता है कि यह फिल्म बेहद प्रासंगिक है क्योंकि कुछ लोग वृद्ध माता-पिता को बोझ समझते हैं, जबकि भारत में माताओं की पूजा की जाती है। उन्होंने इस बात को समझते हुए खलनायकी वाले अंदाज के बिना इस भूमिका को निभाया कि दोषपूर्ण व्यक्तियों के भी अपने आंतरिक औचित्य होते हैं। उनके किरदार का अपराधबोध का दर्दनाक एहसास इस फिल्म का एक अहम भावनात्मक पहलू है।

अभिनेत्री अंजलि पाटिल ने कहा कि उन्होंने कहानी की सरलता के कारण इस फिल्म में यह भूमिका स्वीकार की, जोकि समकालीन सिनेमा में दुर्लभ है और उन्हें महान अभिनेत्री सीमा बिस्वास के साथ काम करने एवं उनसे सीखने का मौका मिला।

इस फिल्म के निर्माता हेमांशु राय ने इस बात को याद किया कि एक वर्ष पहले उन्होंने गोवा में इसकी पटकथा सुनी थी और वे तुरंत इसकी ताकत से प्रभावित हो गए थे। उन्होंने कहा कि कहानी का सार उनके दिल को छू गया क्योंकि यह एक मां और बेटे के सबसे मजबूत रिश्ते के बारे में है, हालांकि इसका एक स्याह पक्ष भी है। उनका मानना है कि यह एक बेहद सशक्त कहानी है।

नवोदित निर्देशक आशुतोष सिंह ने महाकुंभ में उमड़ी भीड़ के बीच शूटिंग की। यह इलाका उनका गांव भी है! करोड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच, महाकुंभ में 10-12 दिनों में शूटिंग पूरी की गई। उन्होंने कहा, “इस फिल्म का रंग महाकुंभ में ही देखने को मिला।” उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के मिश्रण को भी रेखांकित किया – डिजिटल उपकरणों से लैस श्रद्धालु, जीवंत लोक परिवेश और दृश्यात्मक अराजकता जिसने फिल्म की बनावट को आकार दिया। इन सबकी झलक इस फिल्म में दिखाई दी।

उन्होंने बताया कि कुंभ में शूटिंग करना सबसे कठिन काम था। हालांकि, अपने गांव में शूटिंग करना मजेदार रहा। उन्होंने यह भी कहा, “इस फिल्म की शूटिंग एक फिल्म स्कूल के प्रशिक्षण  जैसी थी, जहां इतने दमदार कलाकार मौजूद थे। किसी भी फिल्म के लिए अच्छी कास्ट का होना जरूरी है।”

कुंभ जैसे वास्तविक स्थान पर शूटिंग के दौरान भीड़ से निपटने के बारे में और जानकारी देते हुए, आशुतोष ने बताया कि पूरी कास्ट और क्रू ने स्थानीय लोगों की तरह ही कपड़े पहने थे और किसी ने भी कोई भड़कीला “बम्बईया कपड़ा” नहीं पहना था। इस तरह, वे आसानी से भीड़ का हिस्सा बन गए! उन्होंने संगम में डुबकी भी लगाई। निर्देशक ने बताया कि चूंकि कई लोग वीडियो कैमरे साथ रखते हैं, इसलिए शूटिंग उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए वे एकदम अलग नहीं दिख पाए। उन्होंने आगे कहा कि बस यही चिंता थी कि किरदार भीड़ में अलग दिखें।

मुख्य कलाकारों ने यह भी बताया कि कुंभ में शूटिंग करना जितना अनूठा और चुनौतीपूर्ण था, उतना ही रोमांचक और रोचक भी। अंजलि पाटिल को कुंभ में शूटिंग न कर पाने का मलाल  था क्योंकि उनके दृश्यों में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं था। सीमा बिस्वास ने कहा, “भीड़ ने शूटिंग की प्रक्रिया में ज्यादा बाधा नहीं डाली और लोग बेहद मित्रवत और सहयोगी थे। ऐसा  शायद इसलिए क्योंकि चारों ओर आध्यात्मिक भावनाएं व्याप्त थीं।”

जीवन के अनुभव के ज़रिए एक सफ़र: दृश्‍यों के साथ कहानी कहने की कला

रवि वर्मन प्रत्‍येक मूल विचार में भावनाएं ढूंढने पर ज़ोर देते हैं

रवि वर्मन से बातचीत का सत्र हर फ्रेम के भीतर की कल्‍पना की खोज करता है

थ्रू द लेंस: क्राफ्टिंग इमोशन इन एवरी फ्रेम बातचीत के एक अंतरंग सत्र के रूप में कई तहें खोलते हुए, सिनेमैटोग्राफर रवि वर्मन और मॉडरेटर फिल्म निर्माता संजीव सिवन को एक ऐसे माहौल में ले आती है जो उत्सुकता से भरा हुआ था। जो उभरकर सामने आया वह सिर्फ टेक्नीक का सबक नहीं था, बल्कि सहज ज्ञान, स्‍मृतियों और शांत संघर्षों की यात्रा थी जो वर्मन की वास्‍तविक दुनिया को आकार देती हैं। पूरी ईमानदारी से बात करते हुए, उन्होंने अपने शुरुआती संघर्षों से लेकर उस कला तक का रास्ता बताया जो अब उनके सोचने के तरीके को परिभाषित करती है, दर्शकों को याद दिलाते हुए कि हर इमेज के पीछे एक कला और एक जीवन दोनों होते हैं।

रवि वर्मन ने अपनी पहचान से जुड़े एक खुलासे के साथ शुरुआत की। उन्होंने अपने लंबे नाम को छोटा करने और सिर्फ़ “वर्मन” रखने की बात कही, यह एक ऐसा शब्द है जिसे वे एक फाइटर होने से जोड़ते हैं। बड़ा होने पर, लोग अक्सर उन्हें एक महान पेंटर के साथ नाम साझा करने के लिए चिढ़ाते थे, लेकिन कई वर्ष बाद, एक बच्चे ने उन्हें बताया कि उनका एक फ्रेम रवि वर्मा की पेंटिंग जैसा दिखता है, यह एक अनचाही बात थी जो आज तक उनके साथ है। उन्होंने कहा कि बुराई ने उन्हें कभी चोट नहीं पहुँचाई; इसने सिर्फ़ बेहतर बनाने के उनके इरादे को और मज़बूत किया।

उनकी शुरुआत मुश्किलों से भरी थी। सातवीं क्लास में ड्रॉपआउट होने के बाद, वह चेन्नई पहुँचे और अनिश्चितता ही उनका एकमात्र साथी था। उन्होंने अपना पहला कैमरा ₹130 में खरीदा, कला की चाहत से नहीं, बल्कि बस गुज़ारा करने के लिए। सिनेमैटोग्राफी का सपना धीरे-धीरे आगे बढ़ा, हालात ने उसे आकार दिया। अमेरिकन सोसाइटी ऑफ़ सिनेमैटोग्राफर्स में शामिल होने की उनकी इच्छा बाद में उभरी, जो इस कला में आगे बढ़ने के साथ-साथ अपने आप आकार लेती गई। 2022 में, उन्होंने इसे हासिल किया, यह एक ऐसा मुकाम था जो उनके काम के प्रति लगातार कोशिश, अनुशासन और लगन को दिखाता है।

सिनेमा में उनका रास्ता किसी कथानक जैसा नहीं था। जब वे चेन्नई पहुँचे, तो फ़िल्म बनाना उनका सपना नहीं था, बल्कि गुज़ारा करना था। वे अक्सर रेलवे स्टेशनों के पास सो जाते थे और अपने आस-पास की दुनिया के बारे में उनकी राय, प्रशिक्षण से ज्‍यादा विवशता होती थी। स्कूल तक लंबी पैदल यात्रा, सुबह-सुबह गुज़रती ट्रेनों की चमक, लोगों को अपने रोज़ के काम करते देखना, ये सब उनके शुरूआती जीवन की समझ बने। टॉल्स्टॉय की ‘वॉर एंड पीस’ ने उनकी कल्पना को जगाया, जिससे पोन्नियिन सेलवन में एक युद्ध के दृश्‍य की प्रेरणा मिली। मदुरै की होली के रंगों ने रामलीला में होली का दृश्‍य बनाया। सुबह की हल्की रोशनी, जिसे वे पसंद करते थे, उसने बर्फी के दश्‍य को नरम बना दिया।

जैसे-जैसे सत्र आगे बढ़ा, रवि वर्मन ने लाइट को एक उपकरण नहीं बल्कि एक भावनात्‍मक कंपास बताया। उन्होंने कहा, “कोई भी लाइट खराब नहीं होती। सिर्फ़ मन ही तय करता है।” उनके लिए, रोशनी में संगतता नियंत्रण से नहीं बल्कि स्क्रिप्ट को तब तक पढ़ने से आती है जब तक कि वह अपने अंदर का तापमान न दिखा दे। उन्होंने समझाया कि शैडो, एब्सेंस नहीं बल्कि मूड है; उनके आधे फ्रेम इसके अंदर रहते हैं। टेक्निकल चॉइस उनके पास अपने आप आ जाती हैं, जो ज़्यादा सोचने के बजाय, इंस्टिंक्ट से बनती हैं। हाई-प्रेशर शूट में भी, वह बाहरी ताकतों को फ्रेम पर हावी नहीं होने देते।

उन्होंने कोलेबोरेशन को ईमानदारी की जगह बताया, झगड़े की नहीं। उन्होंने बताया कि डायरेक्टर्स और आर्ट डिपार्टमेंट्स के साथ उनकी बातचीत फ्रेम की इंटीग्रिटी को बचाने पर ध्‍यान लगाती है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में जो भी तनाव होता है, उसका इमेज पर कभी कोई निशान नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने सोचा, “मैं एक दिन चला जाऊंगा, लेकिन मेरे फ्रेम रहेंगे।”

उनके लिए, प्रकाश सहज बातचीत है। उन्होंने बताया कि कैसे वह अक्सर पहले नेचुरल लाइट का इस्तेमाल करते हैं, उसकी ईमानदारी और अस्थिरता पर भरोसा करते हैं, और कैसे बड़े प्रोडक्शन्स में भी वह कुछ और जोड़ने से पहले सूरज, सुबह या एक सिंपल खिड़की से मिलने वाली चीज़ों के साथ काम करना पसंद करते हैं। चाहे वह दिन की रोशनी, मोमबत्ती की रोशनी, या ध्यान से बनाई गई सुबह का इस्तेमाल करें, हर चॉइस टेक्निकल डिस्प्ले के बजाय मकसद से गाइड होती है। एआई के विषय पर, उनकी स्‍पष्‍टता पक्की थी: इंसान का दिमाग टूल को गाइड करता है, न कि इसका उल्टा। उन्होंने कहा कि एआई सपोर्ट सिस्टम बना सकता है, लेकिन यह क्रिएटिविटी पर राज नहीं कर सकता। सोच और इंस्टिंक्ट पहले आते हैं और हर विज़ुअल आखिरकार सिनेमैटोग्राफर की अपनी कल्पना और देखने के तरीके से बनता है।

सत्र उस वक्‍त भावुक हो गया जब उन्होंने महिलाओं, खासकर अपनी माँ के बारे में बात की, जिनकी सादगी और ताकत आज भी उनके स्क्रीन पर महिलाओं को दिखाने के तरीके को गाइड करती है। उन्होंने अपनी माँ और पत्नी दोनों को क्रेडिट दिया कि उन्होंने उनके सफ़र को कैसे आगे बढ़ाया, और ऑडियंस को याद दिलाया कि हर इमेज के पीछे प्यार और सब्र से बनी ज़िंदगी होती है। जब सत्र खत्म होने वाला था, तो यह बातचीत होने के बजाय इस बात पर एक सोच बन गई कि कला कैसे हिम्मत, यादों और सबसे मुश्किल हालात में भी सुंदरता देखने की हिम्मत से बढ़ती है।

आईएफएफआई के बारे में

भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्म समारोह (आईएफएफआई) 1952 में शुरू हुआ और यह दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा फिल्‍म समारोह है। नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एफएफडीसी), सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ़ गोवा (ईएसजी), गोवा सरकार मिलकर इसकी मेजबानी करते हैं। यह समारोह एक वैश्विक सिनेमा पावरहाउस बन गया है—जहाँ रिस्टोर की गई क्लासिक फिल्में आत्‍मविश्‍वास से भरे अनुभव से मिलती हैं, और सुप्रसिद्ध कलाकार पहली बार आने वाले कलाकारों के साथ मंच साझा करते हैं। आईएफएफआई को जो चीज़ सचमुच शानदार बनाती है, वह है इसका इलेक्ट्रिक मिक्स—इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन, सांस्‍कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, ट्रिब्यूट और हाई-एनर्जी वेव्‍स फिल्म बाज़ार, जहाँ आइडिया, सौदा और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20-28 नवम्‍बर तक गोवा के शानदार तटीय पृष्‍ठभूमि में होने वाला, 56वां संस्‍करण भाषाओं, शैली, इनोवेशन और आवाज़ों की एक शानदार रेंज का वादा करता है—वर्ल्ड स्टेज पर भारत की सृजनात्‍मक प्रतिभा का एक विशेष उत्‍सव।

आईएफएफआई में इफ्फीएस्टा 2025 का समापन संगीत, संस्कृति और सिनेमा के जश्न के चार शामों के साथ हुआ

गोआ। इफ्फीएस्टा 2025 को दूरदर्शन ने वेव्स ओटीटी के सहयोग से 56वें अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के हिस्से के रूप में गोवा स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इनडोर स्टेडियम में आयोजित किया था, जिसका समापन चार शामों तक जीवंत संगीत प्रस्तुतियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कलाकारों से संवाद के साथ हुआ।

दिन 1: भव्य उद्घाटन ने सांस्कृतिक उत्सव माहौल बनाया
उद्घाटन सत्र में प्रशंसित हस्तियों ने भाग लिया, जिसमें श्री अनुपम खेर, ऑस्कर विजेता संगीतकार श्री एम.एम. कीरवानी, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री आइमी बरुआ, रवी कोत्तरकारा, और दक्षिण कोरियाई सांसद-गायक जावोन किम के साथ-साथ श्री के. सतीश नंबूदिरिपाद, महानिदेशक, दूरदर्शन शामिल थे।

दूरदर्शन के महानिदेशक ने वेव्स ओटीटी के माध्यम से संगठन के डिजिटल बदलाव और सुरक्षित पारिवारिक मनोरंजन के प्रति इसकी प्रतिबद्धता पर प्रकाश डाला। श्री अनुपम खेर ने पीढ़ियों के निर्माण में दूरदर्शन की भूमिका को याद किया। इस सत्र में जावोन किम द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का गायन प्रस्तुत किया गया, इसके बाद ओशो जैन का लाइव प्रस्तुति हुई।

दूसरा दिन: बैंड, सुर और लोक संगीत मिश्रण ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया
दूसरे दिन के कार्यक्रम का संचालन नीतू चंद्रा और निहारिका रायजादा ने किया, जिसमें द बैंडिट्स (भारत) और बीट्स ऑफ लव (अंतरराष्ट्रीय) के बीच एक जोरदार स्पर्धा देखी गयी।

प्रतिभा सिंह बघेल और अतिथि कलाकारों की प्रस्तुति ‘सुरों का एकलव्य’ ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जबकि वुसात इकबाल खान ने ‘वाह उस्ताद’ खंड के तहत लोक गायन व मिश्रण – मिट्टी की आवाज़ पेश किया।

तीसरा दिन: कार्यक्रम की विशेषता थी – सूफी, भक्ति और ऊर्जा से ओत-प्रोत प्रस्तुतिनिहारिका रायजादा द्वारा संचालित तीसरे दिन के कार्यक्रम में एमएच43 (भारत) और द स्वास्तिक (अंतरराष्ट्रीय) के बीच एक संगीतिक मुकाबला शामिल था।

सुरों का एकलव्य कार्यक्रम में प्रतिभा सिंह बघेल के नेतृत्व में एक आत्मा-स्पर्शी लाइनअप पेश किया गया, उसके बाद ‘वाह उस्ताद’ शोकेस ने, जिसे सूफी और भक्ति – इश्क़ और भक्ति की एक सुर कहा गया, दर्शकों को भक्ति और संगीतात्मक निपुणता का मिश्रण प्रदान किया।

चौथा दिन: लोक कला, सिनेमा फ्यूजन और भव्य समापन ने भारत की सांस्कृतिक विविधता का जश्न मनाया
अंतिम शाम के कार्यक्रम को निहारिका रायजादा ने संचालित किया, जिसमें द वैरागीज़ (भारत) और नाइट्स के बीच बैटल ऑफ बैंड्स शामिल था।

दर्शकों ने देवांचल की प्रेम कथा का आनंद लिया, जो एक लाइव हिमाचली लोक प्रस्तुति थी, जिसमें रज़ा मुराद, अथर हबीब, कीर्ति नागपुरे, दिनेश वैद्य, मिलन सिंह और अदिति शास्त्री ने अभिनय कला का प्रदर्शन किया।

वाह उस्ताद फिनाले — रागा एंड सिनेमा फ्यूजन: सुर से सिनेमा तक — शास्त्रीय कौशल और सिनेमाई सुरीले धुन को एक साथ लेकर आया और उच्च स्वर में उत्सव का समापन हुआ।

चार शाम के सभी कार्यक्रमों को डीडी भारती पर लाइव प्रसारित किया गया, वेव्स ओ टी टी पर स्ट्रीम किये गये, जबकि डीडी नैशनल पर झलकियाँ दिखाई गईं। इफ्फीएस्टा 2025 का समापन शक्तिशाली प्रदर्शन और दिल से भरे पलों के साथ हुआ, जो आई एफ एफ आई की कलात्मक विविधता और सांस्कृतिक ऊर्जा को प्रतिबिंबित करती है। महोत्सव के समाप्त होने के साथ इफ्फीएस्टा की खुशी, लय और सिनेमाई भावना दर्शकों के साथ गुंजायमान होती रही।

#आईएफएफआईवुड,25 नवंबर 2025

‘रंगोली: रूप, सुर और लय की – भारतीय सिनेमा के विहंगम शिखर व्यक्तित्व’

गोआ। 56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में आज “रंगोली: रूप, सुर, लय की – भारतीय सिनेमा के विहंगम शिखर व्यक्तित्व” का विमोचन किया गया, जो प्रकाशन विभाग निदेशालय (डीपीडी) और भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे का एक संयुक्त प्रकाशन है।

पुस्तक में भारतीय सिनेमा की आठ प्रमुख हस्तियों- पैडी एस. जयराज, केदार शर्मा, मन्ना डे, हृषिकेश मुखर्जी, नीलू फुले, बसु चटर्जी, बालू महेंद्र और सुमित्रा भावे पर गहन लेख हैं।

विमोचन के अवसर पर, प्रकाशन विभाग निदेशालय (डीपीडी) के प्रधान महानिदेशक, श्री भूपेंद्र कैंथोला ने कहा कि यह पुस्तक भारतीय फिल्म एवं टेलिविज़न संस्थान (एफटीआईआई) की प्रशंसित पत्रिका “लेंस साइट” की विरासत को आगे बढ़ाती है। उन्होंने कहा, “लेंस साइट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुई थी, और हालाँकि एफटीआईआई ने बाद में इसका हिंदी संस्करण भी जारी किया, लेकिन इसकी पहुँच सीमित रही। डीपीडी ने अपने राष्ट्रव्यापी वितरण नेटवर्क के माध्यम से इसे एक बड़ा मंच और व्यापक पहुँच प्रदान करने का निर्णय लिया। हम भारतीय सिनेमा की इस समृद्ध विरासत को देश भर के सिने प्रेमियों के करीब लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।” श्री कैंथोला ने आगे कहा कि पुस्तक का हिंदी में प्रकाशन भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप है, जो भारतीय भाषाओं में सीखने और सांस्कृतिक संसाधनों पर ज़ोर देती है।

भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के निदेशक श्री धीरज सिंह ने इस पुस्तक को भारत की सिनेमाई विरासत का प्रमाण बताया। सिंह ने कहा, “दुनिया में कई सिनेमाई सिद्धांत हैं, लेकिन जब हम उन्हें अपने अनुभवों से जोड़ते हैं, तो लेंस साइट और रंगोली जैसी रचनाएँ उभरती हैं। ये सिनेमा के प्रति हमारी सेवा हैं।” उन्होंने एफटीआईआई जैसे संस्थानों के सांस्कृतिक महत्व पर भी ज़ोर दिया:

श्री धीरज सिंह ने कहा, “एफटीआईआई, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और सत्यजीत रे फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान जैसे संस्थान सभ्यतागत उपलब्धियाँ हैं। ये हमारे देश की गहरी और जीवंत सिनेमा परंपरा के प्रमाण हैं।”

आईएफएफआई में रंगोली का शुभारंभ, सिनेमाई उत्कृष्टता का उत्सव मनाने और भारत की फिल्म विरासत को संरक्षित करने के लिए महोत्सव की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पुस्तक के बारे में: “रंगोली: रूप, सुर, लय की – भारतीय सिनेमा के विहंगम शिखर व्यक्तित्व” भारतीय सिनेमा की रचनात्मक विरासत पर आधारित है। यह पुस्तक प्रकाशन विभाग और भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे का संयुक्त प्रकाशन है।

यह पुस्तक भारतीय सिनेमा की आठ महान हस्तियों – पैडी एस. जयराज, केदार शर्मा, मन्ना डे, हृषिकेश मुखर्जी, नीलू फुले, बासु चटर्जी, बालू महेंद्र और सुमित्रा भावे – के रचनात्मक योगदान, संघर्ष, प्रयोगात्मक दृष्टिकोण और कलात्मक यात्रा का विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करती है।

सिनेमा के प्रारंभिक मूक युग से लेकर तकनीक, अभिनय, संगीत, निर्देशन और संपादन के विकास तक, यह पुस्तक पाठकों को भारतीय सिनेमा की जड़ों और उसकी सौंदर्य दृष्टि से परिचित कराती है। फिल्म निर्माताओं के अनुभवों, कलात्मक दृष्टिकोण और रचनात्मक प्रक्रियाओं को प्रस्तुत करते हुए, यह कृति न केवल सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि कला प्रेमियों के लिए भी अमूल्य शोध सामग्री का काम करती है।

आईएफएफआई के बारे में

1952 में स्थापित, भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) दक्षिण एशिया में सिनेमा के सबसे पुराने और सबसे बड़े उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और गोआ मनोरंजन सोसायटी (ईएसजी), गोवा सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित, यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई शक्ति के रूप में विकसित हुआ है—जहाँ पुनर्स्थापित क्लासिक्स का मिलन साहसिक प्रयोगों से होता है, और दिग्गज कलाकार निडर पहली बार आने वाले कलाकारों के साथ मंच साझा करते हैं। आईएफएफआई को वास्तव में चमकदार बनाने वाला इसका विद्युत मिश्रण है—अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ, सांस्कृतिक प्रदर्शनियाँ, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्स फिल्म बाज़ार, जहाँ विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोआ की आश्चर्यजनक तटीय पृष्ठभूमि में आयोजित, 56वाँ संस्करण भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाज़ों की एक चकाचौंध भरी श्रृंखला —विश्व मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक गहन उत्सव का वादा करता है।

क्रिएटिव माइंड्स ऑफ टुमॉरो 2025 का समापन, जहां छा गए भारत के युवा क्रिएटर्स

युवा कहानीकारों ने 56वें IFFI में भारत के रचनात्मक दृष्टिकोण को मज़बूत किया

गोआ। क्रिएटिव माइंड्स ऑफ़ टुमॉरो (सीएमओटी) का पांचवां संस्करण पणजी में युवा दृढ़ विश्वास, सिनेमाई जिज्ञासा और उभरते रचनाकारों के नए आत्मविश्वास के साथ संपन्न हुआ। पांच समूहों के प्रतिभागियों की ओर से विकसित पांच फ़िल्मों की प्रस्तुति के साथ, इस संस्करण में सहयोगात्मक प्रयासों से गढ़े गए विविध विचारों को प्रदर्शित किया गया। 56वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम ने एक बार फिर अपने उद्देश्य की पुष्टि करते हुए उभरते कहानीकारों की खोज की और उन्हें आगे बढ़ने के लिए मंच, मार्गदर्शन और गति प्रदान की।

मैरियट में आयोजित इस समारोह की शुरुआत ग्रैंड जूरी और ग्रेट ग्रैंड जूरी के लिए स्क्रीनिंग के साथ हुई, जिसके बाद विचार-विमर्श हुआ और पुरस्कार विजेताओं की अंतिम सूची तैयार की गई। प्रतिभागी, मार्गदर्शक, जूरी सदस्य और फिल्म जगत के प्रतिनिधि शिल्प और सहयोग के इस भावपूर्ण उत्सव में शामिल हुए। दोनों जूरी के सदस्यों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिवों – डॉ. अजय नागभूषण और डॉ. के. के. निराला, एनएफडीसी के प्रबंध निदेशक श्री प्रकाश मगदुम और शॉर्ट्सटीवी के सीईओ कार्टर पिल्चर ने सम्मानित किया।

सीएमओटी 2025 के पुरस्कार विजेता इस प्रकार हैं:

सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म: द पेपर स्काई (ब्लू टीम)
उपविजेता फ़िल्म: द स्पिट शो (ग्रीन टीम)
सर्वश्रेष्ठ निर्देशक: रघु आरव – द पेपर स्काई (ब्लू टीम)
सर्वश्रेष्ठ पटकथा: विश्वास के – द स्पिट शो (ग्रीन टीम)
सर्वश्रेष्ठ फ़ोटोग्राफ़ी निर्देशक: रमिज़ नवीथ (ग्रीन टीम)
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता: अर्पित राज (ब्लू टीम)
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री: सजुमी हमलकर – द स्पिट शो (ग्रीन टीम)

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, एनएफडीसी, आईएफएफआई, सीएमओटी नेतृत्व और शॉर्ट्सटीवी के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में सभी प्रतिभागी टीमों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए, ग्रेट ग्रैंड जूरी के अध्यक्ष, श्री धर्मेंद्र ने प्रतिभागियों के अभिनव दृष्टिकोण की प्रशंसा की और उनसे साहस और ईमानदारी के साथ कहानियां गढ़ते रहने का आग्रह किया। शाम का समापन एनएफडीसी के महाप्रबंधक, श्री अजय ढोके की ओर से धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इस वर्ष के सीएमओटी का एक विशिष्ट आकर्षण क्रिएट इन इंडिया चैलेंज (सीआईसी) – सीज़न 1, जो वेव्स कार्यक्रम की एक पहल है, के रचनाकारों का उल्लेखनीय प्रदर्शन था। ग्यारह सीआईसी विजेताओं ने सीएमओटी में वाइल्ड-कार्ड प्रतिभागियों के रूप में प्रवेश किया और देश के कुछ सबसे प्रतिभाशाली युवा फिल्म निर्माताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल की।

सीएमओटी 2025 की विजेता टीम, टीम ब्लू, में छह सीआईसी प्रतिभागी शामिल थे:

अंजलि वर्मा (डब्ल्यूएएम! चैलेंज)
हुसैन अब्बास
अदिति दीक्षित
वरुण सपकाल
एलंगो
अमित सोनवणे
(सभी वेव्स अवार्ड्स ऑफ एक्सीलेंस से)

उनकी टीम ने 48 घंटे की चुनौती में अपने प्रदर्शन के लिए शीर्ष सम्मान प्राप्त किया, राष्ट्रीय प्रशंसा और नकद पुरस्कार प्राप्त किए।

पांच सीआईसी रचनाकार उपविजेता टीम का हिस्सा थे, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ डीओपी, सर्वश्रेष्ठ लेखक, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ एनिमेशन सहित प्रमुख शिल्प श्रेणियों में पुरस्कार प्राप्त हुए:
विदित सिंह
हेरम
मनीष
आयुष सिंह (युवा फिल्म निर्माता चुनौती)
चिन्मय नरोटे (डब्ल्यूएएम! चुनौती)

उनकी उपलब्धियों ने क्रिएट इन इंडिया चैलेंज की बढ़ती ताकत को रेखांकित किया, जो भारत के कहानीकारों, प्रौद्योगिकीविदों और रचनाकारों की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया एक मंच है। विजेता टीमों और पुरस्कार श्रेणियों में उनकी उपस्थिति ने देश की रचनात्मक अर्थव्यवस्था को आकार देने और वैश्विक अवसरों के लिए तैयार प्रतिभाओं को पोषित करने में सीआईसी की भूमिका की पुष्टि की।

क्रिएटिव माइंड्स ऑफ़ टुमॉरो (सीएमओटी) के बारे में
सीएमओटी, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य भारतीय कहानीकारों की अगली पीढ़ी की खोज, मार्गदर्शन और प्रदर्शन करना है। युवा प्रतिभाओं के लिए एक लॉन्चपैड के रूप में डिज़ाइन किया गया यह कार्यक्रम प्रतिभागियों को 48 घंटे की चुनौती के भीतर फिल्में बनाने और उन्हें एशिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में से एक में प्रस्तुत करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है।

सीएमओटी के पांचवें संस्करण में 13 फिल्म शिल्पों के लगभग 125 उभरते रचनाकारों को एक साथ लाया गया। 2021 में अपनी स्थापना के बाद से, सीएमओटी ने लगातार विकास किया है, पूर्व छात्रों ने प्रमुख वैश्विक समारोहों में अपनी फिल्मों की स्क्रीनिंग की है, राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है और भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

क्रिएट इन इंडिया चैलेंज (सीआईसी) के बारे में

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के विश्व श्रव्य-दृश्य एवं मनोरंजन शिखर सम्मेलन (वेव्स) के अंतर्गत एक प्रमुख पहल, क्रिएट इन इंडिया चैलेंज (सीआईसी) तेज़ी से उभरती रचनात्मक प्रतिभाओं के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में विकसित हो रहा है। सीज़न 1 में लगभग एक लाख पंजीकरण प्राप्त हुए, जिनमें 60 से अधिक देशों के 1,100 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभागी शामिल थे।

इस समूह में से, 750 फाइनलिस्टों ने वेव्स 2025 के दौरान क्रिएटोस्फीयर में अपने काम का प्रदर्शन किया, जिसमें एनीमेशन, गेमिंग, एआई, एक्सआर, कॉमिक्स, संगीत और अन्य रचनात्मक विषयों में नवाचार का प्रतिनिधित्व किया गया। इस समूह में 20 से अधिक देशों के 43 अंतर्राष्ट्रीय फाइनलिस्ट भी शामिल थे।

सीआईसी में सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों से भागीदारी दर्ज की गई, जिसमें 12 से 66 वर्ष की आयु के रचनाकारों ने भाग लिया। शिक्षा, संस्कृति और अत्याधुनिक डिजिटल रचनात्मकता से जुड़ी चुनौतियों के साथ, सीआईसी वैश्विक रचनात्मक अर्थव्यवस्था में भारत के बढ़ते नेतृत्व को दर्शाता है।

इफ्फी के बारे में:

1952 में स्थापित, भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े सिनेमा उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और गोवा मनोरंजन सोसायटी (ईएसजी), गोवा सरकार की ओर से संयुक्त रूप से आयोजित, यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई शक्ति के रूप में विकसित हुआ है-जहां पुनर्स्थापित क्लासिक फ़िल्में साहसिक प्रयोगों से मिलती हैं, और दिग्गज कलाकार निडर पहली बार आने वाले कलाकारों के साथ मंच साझा करते हैं। इफ्फी को वास्तव में चमकदार बनाने वाला इसका विद्युतीय मिश्रण है-अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शनियां, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्स फिल्म बाज़ार, जहाँ विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की शानदार तटीय पृष्ठभूमि में आयोजित, 56वां संस्करण भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाज़ों की एक चकाचौंध भरी श्रृंखला का वादा करता है-विश्व मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक गहन उत्सव।

कॉर्बोल्ड ने राजामौली की फिल्मों के दृश्यों की खूबसूरती की प्रशंसा की

कला अकादमी के खचाखच भरे हॉल में, अकादमी पुरस्कार विजेता और स्पेशल इफेक्ट्स के माहिर क्रिस्टोफर चार्ल्स कॉर्बोल्ड ओबीई ने आज सिनेमाई दुनिया का सबसे अनोखा अनुभव पेश किया। एक साक्षात्कार सत्र में, कॉर्बोल्ड ने सिनेमा के दृश्यों की बारीकियों पर गहराई से बात की और दर्शकों को उस श्ख्सियत से रुबरू कराया, जिसने जेम्स बॉन्ड की दुनिया को पलट कर रख दिया, बैटमैन के ट्रक को ही पलट दिया और क्रिस्टोफर नोलन के लिए भौतिकी के नियमों को ही बदल दिया। ‘बॉन्ड से बैटमैन तक: एसएफएक्स, स्टंट और दृश्य’ शीर्षक वाले साक्षात्कार सत्र के दौरान दशकों की फिल्म निर्माण की कला का एक शानदार और रोमांच से भरा सफर देखने को मिला।

सत्र की शुरुआत फिल्म निर्माता रवि कोट्टाराक्कारा द्वारा अपने फ़ोन को मज़ाकिया अंदाज़ में उठाकर अचूक बॉन्ड थीम बजाने से हुई। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ यह धुन ही 15 बॉन्ड फ़िल्मों की पहचान के लिए काफ़ी है। इसके बाद उन्होंने कॉर्बोल्ड, जिन्होंने तीन बैटमैन फ़िल्मों और अकादमी पुरस्कार विजेता ‘इंसेप्शन’ में स्पेशल इफेक्ट्स के पीछे अहम भूमिका निभाई थी, उन्हें सम्मानित किया। प्रसिद्ध आलोचक नमन रामचंद्रन द्वारा संचालित इस सत्र ने जल्द ही एक रोमांचक सा माहौल बना दिया, जो जिज्ञासु, ऊर्जावान और ब्लॉकबस्टर सिनेमा की अनूठी कहानियों भरपूर था।

अपनी कला के दर्शन के बारे में पूछे जाने पर, कॉर्बोल्ड ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया:

“मैं हमेशा जितना हो सके, व्यावहारिक रूप से काम करता हूँ।” उन्होंने व्यावहारिक और डिजिटल प्रभावों के बीच टकराव के शुरुआती दिनों को याद किया, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि कैसे दोनों टीमें अब बेहद खूबसूरती से एक-दूसरे का पूरक बनना सीख गई हैं। उन्होंने कहा, “दोनों विभागों को एहसास हुआ कि वे एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं।” साथ ही ये भी कहा कि आज के सिनेमा के बेहतरीन पल वो हैं, जो दोनों के सहज मिश्रण से बने हैं।

क्रिस्टोफर नोलन के साथ चार फ़िल्मों में काम कर चुके कॉर्बोल्ड ने निर्देशक के तौर पर नोलन के वास्तविक तत्वों के इस्तेमाल में अटूट विश्वास का ज़िक्र किया। जब भी संभव होता, नोलन व्यावहारिक क्रिया प्रणाली पर ही भरोसा जताते थे, जिनमें असली कारें, असली दुर्घटनाएँ, असली संरचनाएँ शामिल होती थीं। उन्होंने बताया, ” पहले हम इसे वास्तविकता में शारीरिक तौर से शूट करते हैं। फिर डिजिटल टीम इसे बेहतर बनाने के लिए काम करती है।”

इस दौरान दर्शकों को ‘कैसीनो रोयाल’ में डूबते पलाज़ो से लेकर, ‘इन्सेप्शन’ में हॉलवे फाइट और ‘द डार्क नाइट’ में कभी ना भूलने वाला ट्रक फ्लिप तक, दृश्यों और परदे के पीछे की तैयारियों की वीडियो क्लिप दिखाई गईं। हर क्लिप ने विशाल रस्सियां डिज़ाइन करने, घूमने वाले गलियारे बनाने, हेलीकॉप्टरों को सटीक रास्तों पर चलने के लिए प्रोग्राम करने और बेहद खतरनाक स्टंट के लिए वाहनों की इंजीनियरिंग के विस्तृत किस्से बयां किए।

इन्सेप्शन हॉलवे फाइट के बारे में, कॉर्बोल्ड ने कहा: “मैंने पहले भी घूमने वाले कमरे बनाए थे, लेकिन इसके लिए लंबे गलियारे चाहिए थे। प्रति मिनट तीन चक्करों से ज़्यादा की कोई भी रफ्तार किसी को गिरा सकती थी। नोलन इसकी रफ्तार को बढ़ाना चाहते थे, और किसी तरह, हमने इसे कर दिखाया”। डार्क नाइट ट्रक फ्लिप के बारे में, उन्होंने हँसते हुए कहा: “मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, कि हम असली ट्रक नहीं पलट सकते। लेकिन नोलन नहीं माने और आखिरकार, हमने असली ट्रक ही पलट दिया।”

कॉर्बोल्ड ने ज़ोर देकर कहा कि पर्दे पर दिखने वाले हर शानदार पल के पीछे अनगिनत घंटों की कड़ी तैयारी होती है। उन्होंने कहा, “हम अपने सिस्टम का कम से कम 25 बार परीक्षण करते हैं। हम हर संभावित खामी, हर आकस्मिकता पर विचार करते हैं।” अभिनेताओं की सुरक्षा के बारे में, वे अडिग थे: “मैं चाहता हूँ कि मेरे अभिनेता सहज और आत्मविश्वास से भरे हों। हम उनकी सुरक्षा और आराम के लिए अंदरूनी हिस्सों की व्यवस्था करते हैं, वाहनों में अग्नि-सुरक्षा प्रणालियाँ लगाते हैं।”

उन्होंने बताया कि उनके सेट पर कई विभागों के बीच समन्वय कितना ज़रूरी है। “सब लोग एक साथ बैठते हैं। किसी को कोई सरप्राइज़ नहीं मिलना चाहिए। सभी को एकदम सटीक तौर पर पता होना चाहिए कि क्या होने वाला है।” नियंत्रित विस्फोटों के बारे में बात करते हुए कॉर्बोल्ड की आँखें खिल उठीं, जो उनके लंबे वक्त की इच्छाओं में से एक है। “हर चीज़ को मिलीसेकंड के स्तर पर तय किया होता है। एक कम्प्यूटरीकृत विस्फोट प्रणाली हर विस्फोट को ठीक उसी समय ट्रिगर करती है, जब उसे ट्रिगर करना चाहिए।”

बेबाकी से बात करते हुए, कॉर्बोल्ड ने याद किया कि कैसे उन्हें भी एक बार डर लगा था, कि डिजिटल इफेक्ट के चलते उनके काम का मूल्य कम हो जाएगा। उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि डिजिटल एक साधन होना चाहिए, न कि पूरी प्रक्रिया”। उन्होंने भारतीय फिल्म निर्माता एस.एस. राजामौली की प्रशंसा की और उनकी फिल्मों को “देखने में अद्भुत” बताया और आगामी फिल्म ‘वाराणसी’ के बारे में भी उत्साह से पूछा।

उन्होंने यह भी बताया कि अब उन्होंने निर्देशन के लिए एसएफएक्स सुपरविज़न से दूरी बना ली है और वे भारत में आधारित कहानियाँ दर्शाना पसंद करेंगे। कॉर्बोल्ड ने महत्वाकांक्षी रचनाकारों के लिए एक संदेश के साथ अपनी बात खत्म की: “व्यावहारिक प्रभाव हमेशा रहेंगे। हर मुश्किल को पार करना और निर्देशक के नज़रिये को पर्दे पर लाना, वो भी तब जब परिस्थितियाँ आपके खिलाफ हों, एक सुखद अनुभव है।”

इस सत्र के ज़रिए जो उभर कर आया, वह न केवल जाने माने स्टंटों का मेला था, बल्कि एक गहरी बात भी थी कि कैसे सहज ज्ञान, यांत्रिकी, सहयोग और रचनात्मकता मिलकर कभी ना भूलने वाले सिनेमाई पलो को बुन देते हैं। इफ्फी के दर्शकों के लिए, यह एक दुर्लभ मौका था ये देखने का, कि किस तरह अपनी सीमाओं से आगे जाकर फिल्म इतिहास के कुछ सबसे यादगार दृश्यों को कैसे बुना गया।

इफ्फी के बारे में

1952 में शुरू हुआ भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े सिनेमा उत्सव के रूप में आज भी प्रतिष्ठित स्थान रखता है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और गोवा मनोरंजन सोसायटी (ईएसजी), गोवा सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित, यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई शक्ति के रूप में विकसित हुआ है, जहाँ पुनर्स्थापित क्लासिक फ़िल्मों का साहसिक प्रयोगों के साथ मिलना होता है, और दिग्गज कलाकार, पहली बार आने वाले हुनरमंद कलाकारों के साथ मंच साझा करते हैं। इफ्फी को वास्तव में शानदार बनाने वाला इसका शानदार सिनेमा की विधाओं का सम्मिश्रण है- अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ, सांस्कृतिक प्रदर्शनियाँ, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्स फिल्म बाज़ार, जहाँ विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा की शानदार झिलमिलाते तटीय इलाके में आयोजित, 56वाँ संस्करण भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाज़ों की एक चकाचौंध भरी श्रृंखला का वादा करता है, जहां विश्व मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक शानदार उत्सव देखने को मिलता है।