Home Blog Page 5

तीन दिवसीय श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सव संपन्न

भुवनेश्वर झारपाड़ा श्रीश्याम मंदिर में श्रीश्याम सेवा ट्रस्ट की ओर से आयोजित तीन दिवसीय श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सव में आयोजित भजन समारोह तथा श्रीश्याम के संग फूलों की होली खेलने के साथ संपन्न हो गया। आमंत्रित भजन गायिका मोहिनी केडिया ने अपने सहयोगी गायक दामोदर पोद्दार के साथ मिलकर अपनी भजन गायकी का बेहतरीन प्रदर्शन किया। अवसर पर श्रीमती सुशीला गुप्ता ने भगवान श्रीकृष्ण की अतिमोहक फोटो बाबा को भेंट की वहीं श्रीमती मंजु अग्रवाल ने बाबा खाटू श्याम के साथ लगभग एक क्विंटल फूलों से होली खेलीं।

गायिका मोहिनी केडिया ने बड़ी आत्मीयता के साथ सबसे पहले तो दिन में श्रीश्याम अखण्ड पाठ किया और उसके उपरांत “आज बिरज में होली खेले रसिया” जैसे अनेक होली के गीत गाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। मंदिर में उपस्थित अधिकांश महिलाओं ने श्रीश्याम के साथ नाच -नाच कर और गा-गाकर फूलों की होली खेलीं।यह पहला ऐसा धार्मिक आयोजन था जिसमें आयोजन के अंतिम दिन उपस्थित सभी बाबा खाटू श्याम भक्तों ने उनके साथ फूलों की होली खेली।अंत में सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन को सफल बनाने में राम अवतार खेमका, सुशीला अग्रवाल तथा मंदिर के सभी पंडितों और अन्य कार्यकर्ताओं का असाधारण सहयोग रहा। अपने आभार प्रदर्शन में सुरेश कुमार अग्रवाल, महासचिव श्री श्याम सेवा ट्रस्ट झारपाड़ा तथा कार्यक्रम संयोजक ने सभी के पूर्ण सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

युद्ध नहीं, शांति ही बदलती दुनिया की अनिवार्य अपेक्षा

नई बनती दुनिया का चेहरा जितनी तेजी से बदल रहा है, उतनी ही तेजी से वैश्विक असुरक्षा की भावना भी गहराती जा रही है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे वैश्विक असंतुलन का संकेत है जिसमें शक्ति संतुलन की पुरानी व्यवस्थाएं टूट रही हैं और नई विश्व-व्यवस्था अभी स्थिर रूप नहीं ले सकी है। जब महाशक्तियां प्रत्यक्ष या परोक्ष युद्ध में उतरती हैं, तब उसका प्रभाव सीमाओं से परे जाकर समूची मानवता को प्रभावित करता है।

ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखलाएं, मुद्रा विनिमय दरें, शेयर बाजार, खाद्य सुरक्षा, शांतिपूर्ण मानव जीवन और कूटनीतिक समीकरण-सब कुछ अनिश्चितता के घेरे में आ जाता है। मध्यपूर्व में किसी भी बड़े युद्ध का पहला असर तेल आपूर्ति पर पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति यदि बाधित होती है तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आती है-एक ओर आयात बिल बढ़ता है, दूसरी ओर महंगाई और राजकोषीय दबाव में वृद्धि होती है। यदि कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण लागत में वृद्धि अनिवार्य है, जिसका सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। वैश्विक वित्तीय बाजार पहले ही अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, ऐसे में लंबा खिंचता युद्ध निवेश और विकास की गति को भी धीमा कर सकता है।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं, बल्कि बदलती विश्व-व्यवस्था की परीक्षा है। ऐसे समय में युद्ध को तेज़ करने के बजाय उसे रोकने की कोशिशों को और अधिक गति देने की आवश्यकता है। दोनों पक्षों से परिपक्वता और संयम की अपेक्षा है, विशेषकर अमेरिका से, जो स्वयं को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में देखता है और जिसे शक्ति के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी परिचय देना चाहिए। एक तेल उत्पादक देश के रूप में ईरान का अस्तित्व और स्थिरता विश्व अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है; वहां की अस्थिरता ऊर्जा बाजार से लेकर विकासशील देशों की वित्तीय संरचना तक को प्रभावित कर सकती है। हालिया हमलों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने, हजारों के घायल होने और बड़ी संख्या में लोगों के फंसे होने की खबरें मानवता के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। ईरान में शीर्ष नेतृत्व पर हमलों और उसके बाद तेहरान आदि मुस्लिम देशों की तीखी प्रतिक्रियाओं ने पश्चिम एशिया के हालात को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। यह संघर्ष केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा; इसका प्रभाव दक्षिण एशिया की भू-राजनीति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, वैश्विक कूटनीतिक संतुलन और विश्व अर्थव्यवस्था पर दूरगामी होगा।

युद्ध आर्थिक संकट ही नहीं लाता, वह सामाजिक ताने-बाने को तोड़ता है, सांस्कृतिक संवाद को बाधित करता है और राष्ट्रों के बीच अविश्वास की दीवारें ऊंची करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बदलती दुनिया में सह-अस्तित्व, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग की भावना को पुनर्जीवित किया जाए। शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर समझदारी, प्रतिशोध के स्थान पर कूटनीति और वर्चस्व के स्थान पर साझी जिम्मेदारी-इन्हीं मूल्यों से विश्व को स्थिरता मिल सकती है। यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक और भू-राजनीतिक भी है। यूक्रेन संकट के बाद विश्व पहले ही ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ चुका था। अब यदि पश्चिम एशिया में स्थायी अस्थिरता पैदा होती है तो वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए संतुलन साधना कठिन हो जाएगा। भारत एक ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंध भी रहे हैं। इसके साथ ही इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग भी मजबूत हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़े होना भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति के लिए जटिल प्रश्न बन सकता है।

भारत की विशेष चिंता यह भी है कि मध्यपूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं। यदि युद्ध की आग फैलती है तो न केवल उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, बल्कि भारत को मिलने वाली अरबों डॉलर की प्रेषण राशि पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ने से व्यापारिक शिपमेंट महंगे हो सकते हैं। यह परिस्थिति भारत के विकास पथ पर दबाव डाल सकती है, जो अभी विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल एक प्रभावित राष्ट्र की नहीं, बल्कि एक संभावित मध्यस्थ और संतुलनकर्ता की भी हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्षों में बहुध्रुवीय कूटनीति की जो नीति अपनाई है, वह इसी प्रकार की जटिल परिस्थितियों में उपयोगी सिद्ध हो सकती है। भारत ने एक ओर अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी को सुदृढ़ किया है, वहीं रूस से ऊर्जा सहयोग बनाए रखा है और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी संतुलित संबंध कायम रखे हैं। यह ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति भारत को किसी एक खेमे में बंधने से बचाती है। भारत का यह दृष्टिकोण उसे संवाद और शांति प्रयासों के लिए विश्वसनीय मंच प्रदान कर सकता है।

भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, जिसमें ईरान भी सदस्य बन चुका है। यह मंच वैश्विक दक्षिण की आवाज को सशक्त करने का अवसर देता है। यदि भारत इस मंच के माध्यम से युद्धविराम, संवाद और बहुपक्षीय समाधान की पहल करता है, तो वह न केवल अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता बढ़ा सकता है, बल्कि वैश्विक स्थिरता में भी योगदान दे सकता है। संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता या सीमित प्रभाव के बीच मध्यम शक्तियों की भूमिका बढ़ना स्वाभाविक है। भारत, जो स्वयं उपनिवेशवाद और शीत युद्ध की राजनीति से सीख लेकर उभरा है, शांति-आधारित बहुपक्षवाद का पक्षधर बन सकता है। दूसरी ओर, दक्षिण एशिया में भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और आंतरिक अस्थिरता का प्रभाव भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन पर पड़ सकता है। यदि पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है और साथ ही दक्षिण एशिया में भी उथल-पुथल होती है, तो भारत को दो मोर्चों पर रणनीतिक सतर्कता रखनी होगी। आतंकवाद, कट्टरता और अवैध हथियारों का प्रसार ऐसे वातावरण में बढ़ सकता है। अतः भारत के लिए यह समय केवल आर्थिक प्रबंधन का नहीं, बल्कि सुरक्षा और कूटनीतिक संयम का भी है।

समाधान क्या हो सकता है? प्रथम, युद्धविराम और संवाद की बहुपक्षीय पहल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वैश्विक शक्तियों को यह समझना होगा कि स्थायी शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि राजनीतिक समझौते और पारस्परिक सम्मान से आती है। द्वितीय, ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तेज करना होगा, ताकि तेल-निर्भरता कम हो और भू-राजनीतिक संकटों का असर सीमित किया जा सके। तृतीय, वैश्विक संस्थाओं का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि वे केवल महाशक्तियों के प्रभाव का साधन न बनकर न्यायपूर्ण और प्रभावी मंच बन सकें। चतुर्थ, क्षेत्रीय संवाद मंचों-जैसे ब्रिक्स, जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अपनी परंपरा को व्यवहार में उतारे। शांति, सहअस्तित्व और संवाद का संदेश केवल भाषणों तक सीमित न रहकर ठोस कूटनीतिक पहलों में दिखना चाहिए। यदि भारत ऊर्जा विविधीकरण, रक्षा आत्मनिर्भरता, डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है, तो वह वैश्विक संकटों के बीच भी स्थिरता बनाए रख सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सक्रियता-चाहे वह बहुपक्षीय मंचों पर भागीदारी हो या क्षेत्रीय देशों के साथ प्रत्यक्ष संवाद-भारत की अस्मिता और हितों की रक्षा के प्रयास का संकेत देती है।

निश्चित तौर पर युद्ध किसी भी देश के लिए स्थायी लाभ का माध्यम नहीं बन सकता। इतिहास गवाह है कि शक्ति-प्रदर्शन से अस्थायी विजय मिल सकती है, किंतु स्थायी शांति केवल न्याय, संवाद और सहयोग से ही आती है। नई बनती दुनिया को यदि स्थिर और मानवीय बनाना है, तो उसे हथियारों की दौड़ से आगे बढ़कर सहअस्तित्व की संस्कृति अपनानी होगी। भारत, जो स्वयं विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक है, इस परिवर्तन का अग्रदूत बन सकता है। चुनौती बड़ी है, किंतु अवसर भी उतना ही व्यापक है-शर्त यह है कि विश्व नेतृत्व युद्ध की भाषा छोड़कर शांति की भाषा सीखे और भारत अपने संतुलित, स्वायत्त और दूरदर्शी दृष्टिकोण से इस वैश्विक उथल-पुथल में स्थिरता का स्तंभ बने।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

नेहा प्रधान और अंजू शर्मा को सामर्थ्य ग्लोबल एक्सीलेंस राजस्थान गौरव सम्मान

कोटा। समाज सेवा एवं महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए कोटा की अंजू शर्मा और शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सहायक आचार्य डॉ नेहा प्रधान को सामर्थ्य ग्लोबल एक्सीलेंस अवार्ड के साथ झालरापाटन में सामर्थ्य राजस्थान गौरव अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान झालावाड़ की प्रसिद्ध संस्था सामर्थ्य सेवा संस्थान द्वारा एक होटल में आयोजित राष्ट्रीय सम्मान समारोह में झालावाड़ महाराज राणा चंद्रजीत सिंह, जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़, पुलिस अधीक्षक अमित बुडानिया, हरिशंकर शर्मा, पुखराज जैन डॉ. राम चंद्रावल द्वारा प्रदान किए गए।

अंजू शर्मा को न्यू कोटा इंटरनेशनल सोसायटी कोटा की अध्यक्ष के रूप में विगत 26 वर्षों से लगातार हाड़ौती क्षेत्र में सामाजिक, आर्थिक एवं महिला सशक्तिकरण के लिए सक्रिय भूमिका निभाने, गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों को त्योहारों पर सहयोग, महिला जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन तथा विभिन्न सामाजिक अभियानों में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। नेहा प्रधान को हाड़ौती के क्षेत्र में साहित्यिक लेखन कार्य कर इतिहास पटल पर लाने के प्रयासों के लिए सम्मानित किया गया है।
संस्था के संस्थापक डॉ. राम जी चंद्रवाल ने बताया कि समारोह में देशभर से चयनित 45 प्रतिभाओं को राजस्थान गौरव सम्मान तथा 25 प्रतिभाओं को सामर्थ्य ग्लोबल एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। उन्होंने बताया कि यह संस्था दिव्यांगों के लिए कार्य करती है लेकिन इस वर्ष से राजस्थान के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सम्मानित किए जाने का कार्य आरम्भ किया गया है।

कश्मीरी पंडितों पर मुगल आक्रांताओं की क्रूरता के ख़िलाफ ढाल बने श्री गुरु तेग बहादुर जीः श्री अमित शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नवी मुंबई महाराष्ट्र में गुरु श्री तेगबहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस समागम समारोह में गुरु साहिब की स्मृति को नमन कर उपस्थित संगत से संवाद किया | इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस,उपमुख्यमंत्री श्री एकनाथ शिंदे और श्रीमता सुनेत्रा पनार सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

अपने संबोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा किप्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने राष्ट्रीय स्तर पर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 350वें शहीदी दिवस को मनाने का निर्णय लिया जो पूरे भारत के लिए सौभाग्य का विषय है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस जी ने पूरे महाराष्ट्र में गुरु तेगबहादुर जी की जीवनी को युवाओं तक पहुंचाने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने कहा कि अगर नौवें गुरु तेगबहादुर जी हिंदू धर्म और हिंदुओं को बचाने के लिए शहादत न देते तो पूरे विश्व में एक भी हिंदू नहीं बचता। श्री शाह ने कहा कि पूरे भारत और विश्वभर में सनातन धर्म के अनुयायी गुरु तेगबहादुर जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं कि उन्होंने हिंदू धर्म बचाने के लिए यातनाएं झेलते हुए अपनी शहादत दी।

श्री अमित शाह ने कहा कि सिख परंपरा का मूल एकता, बंधुत्व, समावेश और वीरता रहा है और गुरु ग्रंथ साहिब में इसी तत्व का समावेश किया गया है। उन्होंने कहा कि संत नामदेव जी, नरसी मेहता, कबीर जी, संत रविदास जी जैसे कई नामी संतों के पदों को गुरु ग्रंथ साहिब में जगह देने का काम दशम पिता ने किया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने कई समाज को गुरु तेगबहादुर जी के साथ जोड़ने का काम किया है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि गुरु नानकदेव जी ने मानवता के 3 सरल लेकिन गहरे सिद्धांत हमें दिए हैं – नाम जपो, कीरत करो और वंड छको। इसका अर्थ है- ईश्वर के नाम का जाप करते रहिए, उनका कीर्तन करें और साथ में भोजन कीजिए। उन्होंने कहा कि यह आपसी साझेदारी को बताता है और यही परंपरा आगे जाकर लंगर और साझा चूल्हा में परिवर्तित हुई और मुगलों के सामने लड़ने की बहुत बड़ी ताकत यहां से मिली। श्री शाह ने कहा कि भारत की हज़ारों साल पुरानी परंपरा को गुरु नानकदेव जी महाराज ने एक नया जीवन देने का काम किया और गुरु तेगबहादुर जी भी इसी परंपरा के अनुयायी रहे।

श्री अमित शाह ने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी ने हिंदू धर्म और इसके अनुयायियों की रक्षा के लिए एक पल की भी देरी नहीं की और गुरु तेगबहादुर जी ने जो कहा वो कर कर दिखाया। उन्होंने कहा कि जब कश्मीरी पंडितों पर मुश्किलें आईं तब सारे कश्मीरी पंडितों के प्रतिनिधि एकत्रित होकर गुरु साहब के सामने आए और संरक्षण मांगा। उन्होंने कहा कि तब से पूरी दुनिया में रहने वाले कश्मीरी पंडित गुरु साहब के साथ जुड़े हुए हैं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि श्री गुरु तेगबहादुर जी ने हिंदुओं और पूरे भारत पर जो उपकार किये हैं, उसे कोई नहीं भुला सकता। उन्होंने कहा कि औरंगजेब के शासन के दौरान 1675 में एक ऐसा बलिदान देखा, जिसने पूरे देश की जनता की हिम्मत तो बढ़ाईही, औरंगजेब के अत्याचार करने की ताकत को तोड़ने का काम भी किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और पंजाब में बहुत गहरा रिश्ता है और इसी भूमि को दशम पिता ने अपनी देहत्याग के लिए चुना। उन्होंने कहा कि सिख गुरुओं की वाणी के संत नामदेव जी की भक्ति परंपरा आज भी गुरु ग्रंथ साहिब में उपस्थित है।

श्री अमित शाह ने कहा कि गुरु तेगबहादुर जी ने देशभर के हिंदुओं और सिखों की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया और गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने कहा कि उन्होंने एक हाथ में माला औऱ दूसरे हाथ में भाला लेकर औरंजगजेब के अत्याचारों के खिलाफ सिखों को संगठित कर एक बहुत बड़ी लड़ाई की शुरूआत की।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नानकदेव जी महाराज से लेकर गुरु गोविंद सिंह जी तक सभी गुरूओं ने मुगलों की कई पीढ़ियों से धर्म को बचाने के लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रकार से समाज को ताकत देने का काम किया। उन्होंने कहा कि गुरु नानकदेव जी महाराज ने ज्ञान का प्रचार प्रसार किया और कई कुरीतियों को समाप्त किया। गुरु अंगददेव जी ने शिक्षा का प्रचार प्रसार किया, गुरु अमरदास जी ने सामाजिक समरसता का प्रचार प्रसार किया, गुरु रामदास जीने अनेक संस्थान स्थापित कर एक आधार दिया, गुरु अर्जन देव जी ने सांस्कृतिक समावेशिता के लिए काम किया, गुरु हरगोविंद जी साहिब ने भक्ति और धर्म की रक्षा का दर्शन दिया।

गुरु हरराय जी ने दया का भाव पूरे विश्व में प्रचारित किया, तेगबहादुर जी ने हिंद की चादर का स्वरूप पूरे विश्व के सामने रखा औऱ गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की औऱ गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश फैलाया। श्री शाह ने कहा कि सिंख पंथ के दसों गुरुओं ने एक ऐसी परंपरा बनाई है जो न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय है। उन्होंने कहा कि दसों गुरुओं के जीवन से प्रेरणा लेकर धर्म परिवर्तन के विरुद्ध सभी देशवासियों को एकजुट होना चाहिए।

सैकड़ों साल पहले भारत आए विदेशी विद्वानों और लेखकों ने भारत में क्या देखा

भारतीय इतिहास के निर्माण और संकलन में विदेशी विद्वानों, यात्रियों और राजदूतों का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत पर प्राचीन समय से ही भिन्न-भिन्न राजा और विदेशी आक्रमणकारी आते रहे हैं। इन विदेशी आक्रमणों के कारण भारत की राजनीति और इतिहास में समय-समय पर महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। भारत की धरती पर अनेक विदेशी यात्रियों ने अपना पाँव रखा है। इनमें से कुछ यात्री, विद्वान और दार्शनिक आक्रमणकारी सेना के साथ भारत में आये तो कुछ धार्मिक कारणों से। इतिहास लेखन में उनकी रूचि रही, इसलिए स्वाभाविक रूप से भारत का इतिहास भी लिखा गया।  स्वतन्त्र रूप से बाद के विदेशी विद्वानों ने भी अपने देश के भारत में आने वाले आक्रमणकारियों और शासकों के विषय में लिखा तो भारतीय इतिहास पुनः संग्रहीत हुआ।

विदेशी दार्शनिक, सन्त और विद्वान भी स्वतन्त्र रूप से भारत आये और भ्रमण किया, यहाँ रहे तो उन्होंने भी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का रोचक इतिहास समय- समय पर लिखा। इन विदेशी यात्रियों के विवरणों से भारतीय इतिहास की अमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। कई विदेशी यात्रियों एवं लेखकों ने स्वयं भारत की यात्रा करके या लोगों से सुनकर भारतीय संस्कृति से संबंधित ग्रंथों का प्रणयन किया है। विभिन्न राजाओं के भेजे हुए राजदूत भी यहाँ भारतीय शासकों के समय में आते रहे और कई वर्षों तक भारत में रह कर भारतीय इतिहास का संकलन किया। यद्यपि ये ग्रंथ पूर्णतया प्रमाणिक नहीं हैं, फिर भी इन ग्रंथों से भारतीय इतिहास-निर्माण में पर्याप्त सहायता मिलती है। विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरण से भारतीय इतिहास की जो जानकारी मिलती है, उसे तीन भागों में बांटा जा सकता है-1. यूनानी-रोमन लेखक, 2. चीनी लेखक और 3. अरबी लेखक।

यूनानी-रोमन लेखक:
यूनानी-रोमन विद्वानों एवं लेखकों की भारतीय इतिहास लेखन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राचीन काल से ही यूनानी लेखक यहाँ आते रहे और उन्होंने यहाँ के इतिहास लेखन में विशेष रूचि ली। बाद के यूनानी लेखकों ने भी पूर्ववर्ती लेखकों के उदाहरणों के आधार पर इतिहास लिखा, जो इतिहास की गुत्थियां सुलझाने में सहायक सिद्ध हुई। यूनानी-रोमन लेखकों के विवरण सिकंदर के पूर्व, उसके समकालीन तथा उसके पश्चात् की परिस्थितियों से संबंधित हैं। इसलिए इनको तीन वर्गों में बांटा जा सकता है- सिकंदर के पूर्व के यूनानी लेखक, सिकंदर के समकालीन यूनानी लेखक, सिकंदर के बाद के लेखक।

स्काइलेक्स पहला यूनानी सैनिक था जिसने सिंधु नदी का पता लगाने के लिए अपने स्वामी डेरियस प्रथम के आदेश से सर्वप्रथम भारत की भूमि पर कदम रखा था। इसके विवरण से पता चलता है कि भारतीय समाज में उच्चकुलीन जनों का काफी सम्मान था। इसके भौगोलिक ज्ञान को बाद के अन्य विद्वानों ने अपने विवरण में उल्लेख किया है। हेकेटिअस मिलेटस दूसरा यूनानी लेखक था जिसने भारत और विदेशों के बीच कायम हुए राजनीतिक संबंधों की चर्चा की है। छठीं शताब्दी ईसा के उत्तरार्द्ध में हिकेटिअस सिन्धु प्रदेश में आया। इसने पारसीकों के विवरणों के आधार पर और स्वयं के ज्ञान से सिन्धु प्रदेश के भूगोल के विषय में विस्तार से लिखा।

ईरानी सम्राट जेरेक्सस के वैद्य टेसियस ने सिकंदर के पूर्व के भारतीय समाज के संगठन, रीति-रिवाज, रहन-सहन इत्यादि का वर्णन किया है। किंतु इसके विवरण अधिकांशतः कल्पना-प्रधान और असत्य हैं। हेरोडोटस, जिसे ‘इतिहास का जनक’ कहा जाता है, ने 5वीं शताब्दी ई.पू. में ‘हिस्टोरिका’ नामक पुस्तक की रचना की थी। भारत की उत्तर-पश्चिमी जातियों के विषय में हमें जानकारी प्राप्त होती है। हेराडोटस की पुस्तक से भारत और फारस के संबंधों का वर्णन है। यद्यपि हेरोडोटस भारत की यात्रा नहीं की थी। केसिअस पारसीक शासक अतरजरक्सीज का राजवैद्य था। भारतीय ज्ञान लिखने का इसका स्रोत वे व्यापारी थे जो फारस व्यापार करने के लिए जाते थे और पारसीक अधिकारियों से प्राप्त विवरण के आधार पर अपना विवरण लिखा। लेकिन इसके विवरण में अतिरंजना है।

सिकन्दर की सेना में अनेक विद्वान, लेखक, सैनिक अधिकारी और कर्मचारी थे। इन्होंने भौगालिक मार्गों, और सांस्कृतिक दशा पर अच्छा प्रकाश डाला है। भारत पर आक्रमण के समय सिकंदर के साथ आने वाले लेखकों ने भारत के संबंध में अनेक ग्रंथों की रचना की। इनमें नियार्कस, आनेसिक्रिटस, अरिस्टोबुलस, चारस, यूमेनीस आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इन लेखकों ने तत्कालीन भारतीय इतिहास का अपेक्षाकृत प्रमाणिक विवरण दिया है। अरिस्टोबुलस ने ‘युद्ध का इतिहास’ (हिस्ट्री आफ वार) और आनेसिक्रिटस ने ‘सिकन्दर की जीवनी’ नामक यात्रा वृतान्त लिखा है। इनके विवरण काल्पनिक अवश्य हैं परन्तु इनके विवरणों के आधार पर बाद के यूनानी लेखकों ने बहुत अधिक सहारा लिया है।

सिकन्दर के बाद से तीसरी शताब्दी ई0पू0 तक यूनानी लेखकों, विद्वानों और दार्शनिकों की एक लम्बी श्रृंखला है, जिन्होंने सिकन्दर से लेकर भारतीय इतिहास की जानकारी अपने समय तक की दी है। इससे मौर्य वंश के इतिहास को जानने में सहायता मिलती है। चन्द्रगुप्त मौर्य का बहुत सा इतिहस तो हमें यूनानी विवरणों से ही प्राप्त हो जाता है। सिकंदर के बाद के यात्रियों और लेखकों में मेगस्थनीज, प्लिनी, टालमी, डायमेकस, डायोडोरस, प्लूटार्क, एरियन, कर्टियस, जस्टिन, स्ट्रैबो आदि उल्लेखनीय हैं। मेगस्थनीज यूनानी शासक सेल्यूकस की ओर से राजदूत के रूप में चंद्र्रगुप्त मौर्य के दरबार में करीब 14 वर्षों तक रहा। मेगस्थनीज ने भारत के सांस्कृतिक ज्ञान पर ‘इण्डिका’ नामक ग्रन्थ की रचना की। यद्यपि इसकी रचना ‘इंडिका’ का मूलरूप प्राप्त नहीं है, फिर भी इसके उद्धरण अनेक यूनानी लेखकों के ग्रंथों में मिलते हैं।

इन उद्धरणों को एकत्र कर डॉ. स्वानवेक ने 1846ई0 में प्रकाशित करवाया, और इसका अंग्रेजी अनुवाद 1891ई0 में मैक क्रिण्डल ने किया। मेगस्थनीज ने भारत के बारे में बहुत अच्छी और महत्वपूर्ण जानकारी दी है। मेगस्थनीज के विवरण के अनुसार भरत वर्ष का आकार समचतुर्भुज की तरह है। उसने भारत की कुल 56 नदियों का उल्लेख किया है, जिनमें से गंगा सबसे पवित्र नदी मानी जाती है। उसके अनुसार पाटलिपुत्र नगर भारत का सबसे बड़ा नगर था। जिसकी लम्बाई और चैड़ाई क्रमशः 80 स्टेडिया (16किमी.) और 15 स्टेडिया (3किमी.) थी। उसके अनुसार भारतीय साहसी, वीर और सत्यवादी होते हैं। पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन 6 समितियों द्वारा संचालित होता था।  उसने अपने विवरण में पाण्डय देश का भी उल्लेख करता है जहाँ पर पाण्डया नामक एक स्त्री शासन चलाती है।

मेगस्थनीज गन्ने और कपास (सिण्डन) की खेती का भी वर्णन करता है। उसके अनुसार भारतीय समाज में सात जातियाँ थी-ब्राह्मण और दार्शनिक, कृषक, ग्वाले और आखेटक, व्यापारी और श्रमजीवी, योद्धा, निरीक्षक और अमात्य और परामर्शदाता। यह जाति व्यवस्था उसने अपने मन से लिख दी और यह भारतीय जातियों से समानता नहीं रखती है। अतः हम यह कह सकते हैं कि मेगस्थनीज के विवरण से भारतीय संस्थाओं, भूगोल, समाज के वर्गीकरण, राजधानी पाटलिपुत्र आदि के संबंध में प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है।

सीरिया नरेश अन्तियोकस का राजदूत डाइमेकस, जो बिंदुसार के राजदरबार में काफी दिनों तक रहा, ने अपने समय की सभ्यता तथा राजनीति का उल्लेख किया है। इस लेखक की भी मूल पुस्तक अनुपलब्ध है। डायोनिसियस मिस्र नरेश टालमी फिलाडेल्फस के राजदूत के रूप में काफी दिनों तक सम्राट अशोक के राजदरबार में रहा था। स्ट्रैबो ईसा की प्रथम शताब्दी का एक यूनानी विद्वान था, इसने पर्यटन से अच्छा ज्ञान प्राप्त किया और पुराने विद्वानों के विवरणों के आधार पर अपना वृतान्त लिखा। इसने ‘भूगोल’ नामक ग्रन्थ की रचना की।अन्य पुस्तकों में अज्ञात लेखक की ‘पेरीप्लस आफ द एरिथ्रियन सी’, लगभग 150 ई. के आसपास का टालमी का ‘भूगोल’ (‘ज्योग्रफिका’), प्लिनी की ‘नेचुरल हिस्ट्री’ (ई. की प्रथम सदी) महत्त्वपूर्ण है । प्लिनी की ‘नेचुरल हिस्ट्री या प्राकृतिक इतिहास‘ से भारतीय पशु, पेड़-पौधों एवं खनिज पदार्थों की जानकारी मिलती है।

 प्लिनी भारत को बहुमूल्य पत्थरों और रत्नों का उत्पादक बताता है। प्लिनी के अनुसार ‘रोम, भारत से व्यापार करके अपना कोष रिक्त कर रहा है। रोम विलासिता की सामग्री आयात करने में प्रतिवर्ष दस करोड़ सेस्टर्स व्यय करता है। इसी प्रकार एरियन जो एक यूनानी विद्वान था, ने भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण काल की जानकारी देने के लिए ‘एनाबेसिस (सिकन्दर का आक्रमण)’ और ‘इण्डिका’ नामक दो पुस्तकों की रचना की। एनाबेसिस में सिकन्दर के अभियानों का वर्णन है। इसने अपना विवरण मेगस्थनीज और सिकन्दर के  समकालीन विद्वानों के विवरणों  के आधार लिखा। एरियन के अनुसार मेगस्थनीज पोरस के दरवार में उससे मिला था। एरियन ने भ्रामक  तथ्यों को निकाल कर सही एवं स्पष्ट भाषा में जानकारी प्रदान की। टालमी ग्रीक का निवासी था। इसने ‘भूगोल (ज्योग्राफी)’ नामक पुस्तक लिखी थी। इसमें भारत की सीमाओं पर प्रकाश डाला गया है। कर्टियस, जस्टिन और स्ट्रैबो के विवरण भी प्राचीन भारत इतिहास के अध्ययन की सामग्रियां प्रदान करते हैं। ‘पेरीप्लस आफ द एरिथ्रियन सी’ ग्रंथ में भारतीय बंदरगाहों एवं व्यापारिक वस्तुओं का विवरण मिलता है।

चीनी लेखक:
भारत और चीन दोनों में बौद्ध धर्म एवं संस्कृति का निरन्तर प्रसार हुआ। बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए के लिए चीनी बौद्ध विद्वान और अन्य लेखक भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने एवं अन्य राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भारत आते रहे। जिन्होंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना किया।चीनी लेखकों के विवरण से भी भारतीय इतिहास पर प्रचुर प्रभाव पड़ता है। चीन के प्रथम इतिहासकार शुमाचीन ने लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. में इतिहास की एक पुस्तक लिखी, जिससे प्राचीन भारत पर बहुत-कुछ प्रकाश पड़ता है। इसके बाद भारत आने वाले प्रायः सभी चीनी लेखक बौद्ध मतानुयायी थे और वे इस धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही भारत आये थे। चीनी बौद्ध यात्रियों में फाह्यान (399 से 413 ई.), शुंगयुन (518 ई.) ह्वेनसांग (629 से 645 ई.), इत्सिंग (673 से 695 ई.) आदि महत्त्वपूर्ण थे, जिन्होंने भारत की यात्रा की और अपने यात्रा-वृतांत में भारतीय रीति-रिवाजों, राजनैतिक स्थिति और भारतीय समाज के बारे में बहुत कुछ लिखा है।

फाह्यान बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजने के लिए कठोर यातनाएं सहता हुआ भारत में गुप्त वंश के महान् सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय में 399ई. में भारतीय अध्यात्म और संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करने आया था। मोक्षप्रदायिनी गंगा और पवित्र यमुना नदी के मैदानी भागों और प्रान्तों में फाह्यान ने भ्रमण किया। उसने गंगावर्ती प्रांतों के शासन-प्रबंध तथा सामयिक अवस्था का पूर्ण विवरण लिपिबद्ध किया है। उसकी रचना का नाम ‘फा-क्यों-की अर्थात् बौद्ध राजतंत्रों का वृतान्त’ है। स्वाभाविक रूप से इस पुस्तक में उस समय की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के विभिन्न तथ्य भी संग्रहीत हुए। फाह्यान ने अपने विवरण में भारत के दातव्य औषधालयों,कौड़ियों और चाण्डालों का उल्लेख किया है। यह चीनी यात्री भारत में स्थल मार्ग से आया था और इसकी वापसी हुई जल मार्ग से 414ई. में हुई। यद्यपि फाह्यान गुप्त वंश के महान् सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के विषय में कोई जानकारी नहीं देता है।

सुंगयुन 518ई. में भारत की यात्रा पर आया था। इसका उद्देश्य भी पूर्णतया धार्मिक था। यह भारत में 3 वर्ष तक रहकर 170 बौद्ध ग्रन्थों का संकलन किया। इसने हूण शासक मिहिरकुल का उल्लेख अपने यात्रा वृतान्त में किया है।

चीनी यात्रियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ह्वेनसांग को ‘प्रिंस आफ पिलग्रिम्स’ अर्थात् ‘यात्रियों का राजकुमार’, और ‘नीति का पण्डित’ कहा जाता है। उसकी उपाधि मोक्षदेव तथा महायानदेव थी। बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग  भारत में बौद्ध धर्म का ज्ञानार्जन करने के लिए पुष्यभूति वंश के सम्राट कन्नौज नरेश हर्षवर्धन (606-47 ई.) के शासनकाल में भारत आया था। ह्वेनसांग के पवित्र भूमि भारत पर पधारने का वर्ष 629ई0 माना जाता है। इसने लगभग 16वर्षों तक भारत में व्यतीत किया और छः वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। भारतीय धर्मों, संस्कृति और मानव जीवन,व्यापार का ह्वेनसांग ने अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। भारतीय सामाजिक वातावरण में उभरते अनैतिक स्वर का भी ह्वेनसांग ने स्वाद चखा था, उसकी एकाध बार चोर डाकुओं से मुठभेंड़ इुई थी।

इसकी भारत-यात्रा के वृतांत को ‘सी-यू-की’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें लगभग 138 देशों की यात्राओं का वर्णन है। ‘सियूकी’ प्राचीन भारतीस इतिहास के अनेक अध्यायों का और वर्धन वंश का तो विशेष रूप से इतिहास बताने वाली अपना पृथक महत्व रखने वाली महत्वपूर्ण रचना है। ह्वेनसांग बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का विद्वान था। हर्षवर्धन ने अपनी कन्नौज धर्म-सभा का अध्यक्ष इस महान् चीनी यात्री को ही बनाया था। उसके मित्र ह्नीली ने ‘ह्वेनसांग की जीवनी’ नामक ग्रंथ लिखा है जिससे हर्षकालीन भारत पर प्रकाश पड़ता है। ह्वेनसांग दक्षिण में कांची तक की यात्रा किया था उसने पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन (महामल्ल) का उल्लेख किया है।

सातवीं शताब्दी के अंत में इत्सिंग दक्षिण के समुद्र मार्ग से भारत आया था। उसके साथ 37 चीनी यात्रियों का एक दल भी 671 या 675ई. में भारत आया था। उसने यहाँ पर संस्कृत भाषा का अघ्ययन किया और अनेकों संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद भी किया। वह बहुत समय तक नालंदा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालयों में रहा। उसने बौद्ध शिक्षा संस्थाओं और भारतीयों की वेशभूषा, खानपान आदि के विषय में भी लिखा है। वह लिखता है कि अब से पाँच सौ वर्ष पूर्व श्री चेलिकेतो नामक राजा ने नालन्दा के मृग शिखावन में एक चीनी मंदिर का निर्माण करवाया था। विद्वानों ने इस चेलिकेतो का समीकरण गुप्त वंश के आदि राजा श्रीगुप्त से किया है। इत्सिंग अपने विवरण में भृतहरि का विवरण देता है और बताता है कि भृतहरि सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध थे। वह भारत को आर्यदेश कहता है। इनके अलावा मा-त्वा-लिन व चाऊ-जू-कुआ की रचनाओं से भी भारत के बारे में ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है। मा-त्वा-लिन ने हर्ष के पूर्वी अभियान एवं चाऊ-जू-कुआ ने चोलकालीन इतिहास पर प्रकाश डाला है।

तिब्बती लेखकः
तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ वैसे तो 12वीं शताब्दी के विद्वान हैं, लेकिन इन्होंने अपने ग्रंथों ‘कंग्यूर, और तंग्यूर’ के माध्यम से प्राचीन भारतीय इतिहास पर प्रकाश डाला। वह बौद्ध धर्मावलम्बी था। मौर्यों, शुंग, कुषाण वंश और गुप्त राजवंश की अनेक तथ्यात्मक जानकारी लामा तारानाथ के विवरण से मिलती है। तारानाथ बौद्ध लामा थे, अतः स्वाभाविक से बौद्ध धर्म के सापेक्ष लिखने के कारण तारानाथ की जानकारी भ्रम पैदा करती है, जैसे लामा तारानाथ का विवरण तो यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि शुंग वंश के शासक पुष्यमित्र शुंग बौद्ध धर्म का हत्यारा शासक था। उसकी रचना ‘ बौद्ध धर्म का इतिहास’ पूर्व -मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन का एक महतवपूर्ण स्रोत है। धर्म स्वामी के विवरणों से भी 13वीं शताब्दी के इतिहास पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। उसके विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि 13वीं शताब्दी के पूवार्द्ध में भी नालन्दा महाविहार पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। तत्कालीन राजनीतिक इतिहास पर भी धर्म स्वामी के यात्रा वृतान्त से प्रकाश पड़ता है।

अरबी लेखक:
आठवीं और नौवीं शताब्दी ई. में पश्चिमी एशिया से भारत व्यापारिक सम्बन्धपूर्ण पुष्ट हो चुका था। 10वीं शताब्दी तक दो आक्रमणकारी मुहम्मद बिन-कासिम और महमूद गजनबी भारत में अरबों का स्थायी निवास बना चुके थे। इसलिए स्वाभाविक रूप से अरब विद्वानों ने प्रकरणवश एवं स्वतंत्रता से भी भारत के विषय में लिखना प्रारम्भ कर दिया था। पूर्व मध्यकालीन भारतीय समाज और संस्कृति के विषय में सर्वप्रथम अरब व्यापारियों एवं लेखकों से जानकारी प्राप्त होती है। इन व्यापारियों और लेखकों में अल-बिलादुरी, फरिश्ता, अल्बरूनी, सुलेमान और अलमसूदी महत्त्वपूर्ण हैं जिन्होंने भारत के बारे में लिखा है। फरिश्ता एक प्रसिद्ध इतिहासकार था, जिसने फारसी में इतिहास लिखा है। उसे बीजापुर के सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय का संरक्षण प्राप्त था। महमूद गजनवी के साथ भारत आने वाले अल्बरूनी (अबूरिहान) ने संस्कृत भाषा सीख कर भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पूर्णरूप से जानने का प्रयास किया। उसने अपनी पुस्तक ‘तहकीक-ए-हिंद’ अर्थात् किताबुल-हिंद में भारतीय गणित, भौतिकी, रसायनशास्त्र, सृष्टिशास्त्र, ज्योतिष, भूगोल, दर्शन, धार्मिक क्रियाओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक विचारधाराओं का प्रशंसनीय वर्णन किया है।

नवीं शताब्दी में भारत आने वाले अरबी यात्राी सुलेमान ने प्रतिहार एवं पाल शासकों के समय की आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक दशा का वर्णन किया है। 915-16 ई. में भारत की यात्रा करने वाले बगदाद के यात्री अलमसूदी से राष्ट्रकूट एवं प्रतिहार शासकों के विषय में जानकारी मिलती है। महान् अरब इतिहासकार और इस्लाम धर्मशास्त्री तबरी उस समय के इस्लाम जगत् के प्रायः सभी प्रसिद्ध विद्या-केंद्र्र्रों में गया था और अनेक प्रसिद्ध विद्वानों से शिक्षा ग्रहण की थी।

इसके अतिरिक्त कुछ फारसी लेखकों के विवरण भी प्राप्त होते हैं जिनसे भारतीय इतिहास के अध्ययन में काफी सहायता मिलती है। इनमें फिरदौसी (940-1020 ई.) की रचना ‘शाहनामा’, राशिद-अल-दीन हमादानी (1247-1318 ई.) की ‘जमी-अल-तवारीख’, अली अहमद की ‘चचनामा’ (फतहनामा सिन्ध), मिन्हाज-उस-सिराज की ‘तबकात-ए-नासिरी’, जियाउद्दीन बरनी की ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ एवं अबुल फजल की ‘अकबरनामा’ आदि ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कृतियां हैं।

यूरोपीय यात्रियों में तेरहवीं शताब्दी में वेनिस (इटली) से आये सुप्रसिद्व यात्राी मार्कोपोलों द्वारा दक्षिण के पांड्य राज्य के विषय में जानकारी मिलती है।

साभार- https://worldwidehistory.com/  से

अब आतंकवाद पर होगा निर्णायक “प्रहार“

विभाजन की विभीषिका के साथ स्वतंत्र हुआ भारत, स्वतंत्रता के बाद से ही आतंकवाद से पीड़ित रहा किन्तु अभी तक उसके पास आतंकवाद से लड़ने की कोई स्पष्ट नीति या रणनीति ही नहीं थी। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता (जीरो टॉलरेंस) की नीति स्पष्ट हुयी। पहली बार माओवाद जैसे आतंकवाद को समाप्त करने के लिए एक तारीख तय की गई और उस दिशा में काम हुआ जिसका प्रभाव दिखाई देने लगा है। आतंकवादी हमले होने पर सीमा पार जाकर आतंकवादियों का दमन किया जाता है। अब भारत शत्रु के घर में घुसकर बदला लेता है, ऑपरेशन सिंदूर में भारत का क्रोध सम्पूर्ण विश्व ने देखा है।

आतंकवाद के बढ़ते खतरों व देश विरोधी षड्यंत्रों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने देश में पहली आतंकवाद रोधी नीति “प्रहार” जारी की है। प्रहार आतंकवाद के खिलाफ एक बहुस्तरीय रणनीति है जो खुफिया जानकारी के आधार पर चरमपंथी हिंसा की रोकथाम और उसे निष्क्रिय करने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य आतंकवादियों, उनके वित्तपोषकों और समर्थको को धन, हथियार और सुरक्षित ठिकानों तक पहुंच से वंचित करना है। इसमें साइबर क्राइम, ड्रोन हमलों. सीमा पार आतंकवाद और जटिल सुरक्षा खतरों से निपटने के सुगठित राष्ट्रीय ढांचे का भी उल्लेख किया गया है।

आजकल बहुत से आतंकवादी संगठन युवाओं की भर्ती के लिए इंटरनेट मीडिया का सहारा ले रहे हैं, इंटरनेट के माध्यम से ही साइबर ठगी आदि करके लिए धन संग्रह कर रहे हैं व लोगों की मानसिकता को अपने पक्ष में करने के लिए छद्म तरीके से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काम कर रहे हैं, प्रहार रणनीति आतंकवाद के इन नए तरीकों से निपटने का मार्ग दिखाती है।

केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा जारी की गई प्रहार रणनीति, भारत के अन्दर या विदेश से उत्पन्न होने वाले आतंकी खतरों का सामना करने के लिए सात प्रमुख स्तंभों पर आधारित है। इसमें पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा गया है कि, भारत के पड़ोस में अस्थिरता का इतिहास रहा है जिसके कारण अराजक क्षेत्र उत्पन्न हुए हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र के कुछ देशों ने कभी -कभी आतंकवाद को राज्यनीति के एक साधन के रूप मे इस्तेमाल किया है। इसके बावजूद भारत आतंकवाद को किसी विशेष धर्म, जातीयता, राष्टीयता या सभ्यता से नहीं जोड़ता। भारत ने हमेशा आतंकवाद और किसी भी तत्व द्वारा, किसी भी घोषित या अघोषित उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इसके उपयोग की स्पष्ट व निर्विवाद रूप से निंदा की है।

नीति दस्तावेज में कहा गया है कि भारत लगातार आतंकवाद के पीड़ितों के साथ खड़ा रहा है और इस पर अडिग है कि दुनिया में हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता। यही सैद्धांतिक दृष्टिकोण आतंकवाद के विरुद्ध नई दिल्ली की शून्य सहिष्णुता की नीति का आधार है। दस्तावेज में कहा गया है, भारत लंबे समय से सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद से प्रभावित रहा है, जिसमें जेहादी आतंकवादी संगठन और उनके सहयोगी संगठन भारत में आतंकी हमलों की योजना बनाने, समन्वय करने, सुविधा प्रदान करने एवं उन्हें अंजाम देने में संलिप्त हैं। भारत अलकायदा और इस्लामिक स्टेट आफ इराक एंड सीरिया जैसे वैश्विक आंतकी समूहों के निशाने पर रहा है। जो स्लीपर सेल्स के माध्यम से देश में हिंसा भड़काने का प्रयास कर रहे हैं।

नई प्रहार नीति मे बताया गया है कि, विदेशीर धरती से संचालित आतंकवादियों ने भारत में हिंसा को बढ़ावा देने के लिए साजिशें रची हैं और उनके लिए काम करने वाले पंजाब व जम्मू कश्मीर में आतंकी गतिविधियों और हमलो को अंजाम देने के लिए ड्रोन सहित नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। साजो सा’मान प्राप्त करने के लिए संगठित आपराधिक नेटवर्क से संपर्क स्थापित कर रहे हैं। अब आतकी इंटरनेट के नये तरीकों का भरपूर उपयोग करने लगे हैं।

प्रहार (PRAHAAR) की परिभाषा अंग्रेजी के सात शब्दों मे संयोजित है, जिसमें पहला है पी से प्रिवेंशन यानी नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए आतंकी हमलो की रोकथाम। दूसरा है आर से रिस्पॉन्स अर्थात त्वरित, आनुपातिक और सुनियोजित सैन्य व नागरिक प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना। तीसरा है ए से एग्रीगेटिंग इंटरनल कैपासिटीज अर्थात आतंरिक क्षमताओं को एकीकृत करना जिसमें केंद्र और राज्य की एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाना और सुरक्षा बलों का आधुनिक तकनीक (AI, ड्रोन) से लैस करना शामिल है। चौथा है एच से ह्यूमन राइट्स एंड रूल आफ ला -खतरों को कम करने के लिए मानवाधिकार और कानून व्यवस्था पर आधारित प्रतिक्रिया। पांचवां ए से अटेन्यूएटिंग रेडिकलाजेशन यानी कट्टरता सहित आतंकवाद में सहायता करने वाली परिस्थितियों को कम करना। छठा भी ए से है – एलाइनिंग इंटरनेशनल एफर्ट्स जिसमें आतंकवाद से मुकाबले के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में समन्वय करना शामिल है तथा अंतिम और सातवां है आर से रिकवरी एंड रेसिलिएंस यानी समग्र समाज को मानसिक और भौतिक रूप से सशक्त बनाना।

प्रहार नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि जेसे ही आतंकी समूहों की साजिश का पता चले उसे उसी समय समाप्त कर देना भी है। गृह मंत्रालय की यह नीति उसी समय आई है जब हाल ही में तमिलनाडु से 6 संदिग्धों को पकड़ा गया है और उनसे काफी सनसनीखेज जानकारियां सामने आ रही है।

भारत सरकार की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को प्रधानमंत्री मोदी हर वैश्विक मंच पर दोहराते रहे हैं किंतु अब सरकार ने प्रहार नीति जारी करके अपना संकल्प स्पष्ट कर दिया है कि भारत के खिलाफ साजिश रचने वाले चाहे जहां पर भी बसे हों बच नहीं सकेंगे।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं . 9198571540

फर्जी बेगम विलायत महल ने सबको बेवकूफ बनाया

उन्नीस सौ सत्तर का दशक।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक दिन अजीब नज़ारा देखने को मिला। एक रहस्यमयी महिला स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम में दाखिल हुई और देखते ही देखते उसने उस जगह को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया। कहा जाता है कि यह वही वीआईपी कक्ष था, जिसे कभी भारत के आख़िरी वायसराय लॉर्ड माउंटबैटन के लिए तैयार किया गया था।

महिला का व्यक्तित्व असाधारण था। लंबी, मजबूत कद-काठी, चेहरा पत्थर की मूर्ति जैसा स्थिर और आँखें ऐसी कि बिना पलक झपकाए किसी को भी देखती रहें। वह भारी भरकम रेशमी साड़ियाँ पहनती थी और अफ़वाह थी कि साड़ी की सिलवटों में हमेशा एक पिस्तौल छिपा रहता था।
उसके साथ दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। साथ में विदेशी कुत्ते और कुछ नेपाली नौकर थे।
कुछ ही दिनों में वीआईपी रूम का रूप बदल गया। फ़र्श पर फ़ारसी क़ालीन, दीवारों पर पेंटिंग्स,और शाही साज-सज्जा दिखाई देने लगी। महिला के लिए खाना चाँदी के बर्तनों में परोसा जाने लगा। पूरा माहौल किसी महल जैसा लगने लगा।
एक दिन स्टेशन मास्टर ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की। लेकिन अंदर जाने से पहले ही वर्दीधारी नौकरों ने उन्हें रोक दिया।

“जानते हैं, अंदर कौन हैं?”
स्टेशन मास्टर ने सिर हिलाया नहीं।
जवाब मिला।
“मलिका-ए-अवध, बेगम विलायत महल।”
यह सुनते ही स्टेशन मास्टर चुपचाप लौट गए।
दिन बीतते गए कभी कोई बेगम से सीधे बात करने की कोशिश करता तो उसे टोक दिया जाता।
बेगम से संवाद का तरीका अनोखा था।
अपनी बात कागज़ पर लिखो, उसे चाँदी की थाली में रखो। नौकर वह पर्ची बेगम के सामने ले जाते, ज़ोर से पढ़ते और जवाब लेकर लौटते।
बच्चों के सामने भी बेगम का वही रुतबा था, वे अपनी माँ को “हर हाईनेस” कहकर संबोधित करते।
यह विचित्र शाही जीवन लगभग एक दशक तक चलता रहा। जब लखनऊ में खबर पहुँची कि अवध की बेगम दिल्ली में रहती हैं, तो मिलने वालों की भीड़ उमड़ने लगी। खासकर शिया मुसलमानों में उत्सुकता और भावनात्मक जुड़ाव दिखा। कई लोग उन्हें देखकर भावुक हो जाते।

धीरे-धीरे अख़बारों में सुर्खियाँ छपने लगीं।
“वाजिद अली शाह के वंशज रेलवे स्टेशन में रहते हैं।”
वाजिद अली शाह अवध के आख़िरी नवाब थे।
लोकप्रिय किस्सों के अनुसार, 1856 में अंग्रेजों ने कुशासन का आरोप लगाकर अवध का विलय कर लिया। 1857 की क्रांति के बाद परिस्थितियाँ और बदल गईं। नवाब की शेष ज़िंदगी कलकत्ता में गुज़री। हालाँकि उनके कई वंशज लखनऊ में ही रहे।
दिल्ली में बेगम विलायत महल का प्रकरण जब प्रशासन तक पहुँचा, तो हलचल मच गई। उस दौर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा थे। राज्य सरकार की ओर से बेगम को लखनऊ लौटकर रहने के प्रस्ताव दिए गए।

कहानी के अनुसार, पहले नकद सहायता का प्रस्ताव आया, जिसे बेगम ने ठुकरा दिया। फिर मकान की पेशकश हुई, लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
मामला तब और चर्चित हो गया जब विदेशी पत्रकार इसमें दिलचस्पी लेने लगे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने रेलवे स्टेशन पर रहने वाली रानी की कहानियाँ छापीं।
आख़िरकार केंद्र सरकार तक बात पहुँची। तत्कालीन इंदिरा सरकार ने हस्तक्षेप किया। सरकारी प्रक्रिया के तहत 1985 में बेगम विलायत महल और उनके परिवार को दिल्ली के मालचा महल में रहने की अनुमति दी गई।

मालचा महल तुगलक काल की एक शिकारगाह का ढाँचा था, जो घने जंगलों के बीच स्थित था।
मालचा महल कहने को तो महल था पर उसकी हालत जर्जर थी। वहाँ न बिजली थी, न पानी। पत्थर की ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ और ऊपर जंग लगा लोहे का गेट।
मालचा महल में आने के बाद विलायत के परिवार ने महल के चारों ओर कँटीले तार और चेतावनी-पट्ट लगाए।
“बिना अनुमति प्रवेश वर्जित।”
“कुत्तों से सावधान।”
“अंदर आना जानलेवा हो सकता है।”
अंदर का माहौल किसी विचित्र संग्रहालय जैसा बताया जाता है। दीवारों पर हथियार, पुराने फ़र्नीचर, अवध के नवाबों की तस्वीरें, तलवारें और दुर्लभ सिक्के।
बेगम और उनका परिवार शायद ही कभी दिन में बाहर दिखता। स्थानीय लोगों के बीच रहस्य, अफ़वाह और किंवदंतियाँ फैलती रहीं।

दिल्ली के बीचों-बीच, जंगल में छिपा एक महल और उसमें रहता एक नवाबी परिवार।
कई वर्षों तक मालचा महल खबरों से लगभग गायब रहा। फिर 1997 में टाइम मैगजीन ने इस परिवार का इंटरव्यू प्रकाशित किया तब पता चला कि बेगम विलायत महल की 1993 में मृत्यु हो चुकी थी। बच्चों ने दावा किया की “बेगम ने हीरा निगलकर आत्महत्या कर ली थी।
बेगम के बेटे प्रिंस साइरस ने बताया कि उनकी माँ को महल के पास ही दफनाया गया था।

समय के साथ मालचा महल अफ़वाहों का केंद्र बन गया। किसी के लिए वह भूतिया महल था, तो किसी के लिए वहां गड़ा हुआ शाही ख़ज़ाना मौजूद था।
1994 में कुछ लोग महल में घुस आए। साइरस और उनकी बहन सकीना को भय हुआ कि कहीं कोई उनकी माँ की कब्र न खोद दे। कथा के अनुसार, उन्होंने बाद में शव को निकालकर जला दिया। अब दोनों बिल्कुल अकेले थे।
न कोई आय का साधन, न कोई सामाजिक सहारा।

इसके बावजूद उन्होंने महल छोड़ने से साफ इन्कार कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कीमती वस्तुएँ बेचनी शुरू कीं। जीवन कठिन होता गया, पर व्यवहार अब भी शाही परिवार जैसा रहा।
कहा जाता है कि विलायत महल के निधन के बाद भी दोनों ऐसे बर्ताव करते रहे मानो वह जीवित हों।
समय बीतता गया। इक्कीसवीं सदी आ गई।
मालचा महल अब और ज्यादा जर्जर हो चुका था। खबरें कभी-कभार अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखतीं, पर लोगों की दिलचस्पी घट चुकी थी।

फिर 2016 में कहानी ने एक दिलचस्प मोड़ लिया।
दिल्ली स्थित महिला पत्रकार एलेन बैरी के पास एक कॉल आया,बैरी उस समय द न्यूयॉर्क टाइम्स की साउथ एशिया ब्यूरो चीफ थीं।
कॉल करने वाले ने बताए कि उसका नाम प्रिंस साइरस है… और वो बैरी से मिलना चाहता था।
मुलाकात तय हुई और एक दिन जंगल के सुनसान रास्तों से गुजरते हुए वह मालचा महल पहुँचीं। ड्राइवर को बाहर रुकने को कहा और स्वयं अंदर चली गईं।
रिपोर्ट के अनुसार, अचानक झाड़ियों में हलचल हुई।
एक व्यक्ति सामने आया।
छोटा कद, बिखरे बाल, ऊँची कमर वाली जींस और चेहरे पर अजीब थकान।
उसने तेज़ आवाज़ में कहा।
मिस बैरी
ऐसा लगा मानो उसने बहुत समय से किसी से बातचीत न की हो।
वह बैरी को पत्थरों और काँटों से भरे रास्ते से महल के भीतर ले गया। ढीली कुंडी वाला लोहे का गेट खुला।
अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था।
खाली पत्थर के कमरे,
फीके पड़े कालीन,
पीतल के गमलों में सूखे पौधे।
दीवार पर विलायत महल की एक तस्वीर टंगी थी
ध्यानमग्न, स्थिर, लगभग अलौकिक।

साइरस उन्हें छत पर ले गया।
वह किनारे खड़ा होकर नीचे फैले जंगल और दूर दिखते धूल भरे शहर को देखने लगा।
जब बैरी ने परिवार के बारे में पूछा, तो साइरस ने सरकारों द्वारा किए गए “अन्याय” की लंबी कहानी सुनाई।
जब बैरी ने इंटरव्यू प्रकाशित करने की अनुमति मांगी, तो साइरस ने मना कर दिया।
“इसके लिए मेरी बहन सकीना की अनुमति ज़रूरी है।”
मुलाकातों का सिलसिला महीनों चलता रहा। हर बार कोई नया कारण, नई शर्त।

फिर एक रात फोन आया।
साइरस रो रहा था।
उसने बताया
“मेरी बहन सकीना की कई महीने पहले मृत्यु हो चुकी है।”
2017 में बैरी और साइरस की आख़िरी मुलाकात हुई।
कुछ समय बाद वो लंदन चली गईं लंदन में एक दिन उन्हें खबर मिली की प्रिंस साइरस की मौत हो गई।
बताया गया कि उन्हें डेंगू हुआ था।

साइरस ने अस्पताल जाने से इंकार कर दिया और आठ दिन की बीमारी के बाद उसे महल के फर्श पर मृत पड़ा पाया गया।
दिल्ली गेट कब्रिस्तान में सायरस का अंतिम संस्कार किसी लावारिस की तरह किया गया।
कब्र पर कोई नाम नहीं लिखा गया बस एक नंबर था DB33B
प्रिंस साइरस की मौत के बाद बैरी ने फिर एक बार मालचा महल गई , इस बार उन्हें कुछ पुराने खत मिले। तलाशी के दौरान वेस्टर्न यूनियन की रसीदें भी मिलीं जिनसे पता चला कि इंग्लैंड के ब्रेडफोर्ड शहर से उन्हें पैसे भेजे जाते थे।

साथ में एक पुराना पत्र भी मिला
उसमें लिखा था।
“भगवान के लिए अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करो। अगर मुझे कुछ हो गया, तो तुम्हारा क्या होगा?”
पत्र के अंत में हस्ताक्षर थे
शाहिद।

वैसे भी प्रिंस साइरस की मौत के बाद मामल और रहस्यमय हो गया था। सच्चाई को जानने की उत्सुकता बैरी को लखनऊ खींच गई। वहाँ बुज़ुर्गों से बातचीत में एक अलग ही तस्वीर उभरी।
कई लोगों ने बताया कि 1970 के दशक में भी विलायत महल के “शाही दावों” पर संदेह था।

“हमने सबूत मांगे थे। उन्होंने पुराने बर्तन और सामान दिखाए, लेकिन कोई आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं था”
लखनऊ से ठोस जानकारी न मिलने पर बैरी ने इंग्लैंड के ब्रेडफोर्ड का रुख किया और पत्र पर लिखे पते के आधार पर एक साधारण से घर तक पहुँचीं।
दरवाज़ा खुला सामने खड़ा था वही शख्स
शाहिद बट विलायत बेगम का सबसे बड़ा बेटा।
उसके चेहरे की बनावट साइरस से मिलती-जुलती।
घर की एक दीवार पर विलायत महल की तस्वीर टंगी हुई थी।
पहली बार कहानी ने निर्णायक मोड़ लिया।

बेगम विलायत महल का असली नाम था विलायत बट और पति का नाम था इनायतुल्लाह बट। इनायतुल्लाह बट लखनऊ यूनिवर्सिटी में रजिस्ट्रार थे।

1947 विभाजन का उथल-पुथल भरा दौर था इसी दौरान साइकिल से घर वापिस लौट रहे इनायतुल्लाह बट पर हमला हुआ था, इस घटना के बाद परिवार ने पाकिस्तान जाने का निर्णय लिया और विलायत पाकिस्तान चली गईं। जहां उसके पति इनायतुल्लाह बट को पाकिस्तान एविएशन में कोई बड़े से पद की नौकरी मिल गई थी।लेकिन भारत और खासकर लखनऊ उनके मन से कभी नहीं निकले।

फिर विलायत को एक और झटका लगा 1951 में उनके पति की अचानक मौत हो गई,इसके बाद कारणों का तो पता नहीं है लेकिन पाकिस्तान सरकार ने उनकी संपत्ति जब्त कर ली थी।
1954 में कराची में एक सनसनीखेज घटना का उल्लेख मिलता है जहाँ संपत्ति की जप्त करने से नाराज विलायत महल ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा को सार्वजनिक रूप से थप्पड़ जड़ दिया था।

इसके बाद उन्हें कुछ समय के लिए लाहौर के एक मेंटल अस्पताल में रखा गया और “इलाज” के नाम पर इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी दी गई।

अस्पताल से निकलने के बाद विलायत अपने छोटे बच्चों के साथ भारत लौट आईं और सीधे श्रीनगर पहुँचीं, जहाँ उसके काफी रिश्तेदार पहले से बसे हुए थे आवास मिलने वजह नहीं पता लेकिन श्रीनगर में उन्हें एक सरकारी आवास मिला, एड्रेस था जवाहर नगर, क्वार्टर नंबर 24 . यहीं से विलायत ने स्वयं को “अवध की रानी” बताना शुरू किया।

पड़ोसियों के अनुसार, वह अक्सर कहा करतीं: “हम अवध के शाही वारिस हैं।” न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जवाहर नगर के बुज़ुर्ग बताते थे कि कैसे विलायत ने घर के अंदर की दीवारें तुड़वा दीं।

कारण?“शाही बच्चे बाहर नहीं खेलते…
वे घर के अंदर क्रिकेट खेलेंगे।”
विलायत का व्यवहार अक्सर अजीब और कभी-कभी अपमानजनक माना जाता था। वे अपने बच्चों को आसपास के लोगों से बातचीत करने से रोकतीं और कहतीं
“ये मामूली लोग हैं… तुम शाही हो।”

दिल्ली आने के बाद विलायत ने अपने बच्चों की पहचान भी बदल दी। प्रिंस साइरस और प्रिंसेस सकीना
लेकि उनके असली नाम थे मिकी बट और फरहान या फरहाद बट लेकिन वो किसी नवाबी वंश के राजकुमार-राजकुमारी नहीं थे।

बैरी की पड़ताल में एक और दर्दनाक सच सामने आया। विलायत बट के वास्तव में तीन नहीं कुल चार या पांच बच्चे थे। तीसरे बेटे का नाम था असद बट, जब विलायत अपने दो छोटे बच्चों के साथ श्रीनगर छोड़कर चली गईं, असद वहीं रह गया, क्योंकि वह अपनी माँ की “शाही कल्पनाओं” का हिस्सा नहीं बनना चाहता था।

असद उसी खाली सरकारी क्वार्टर में अकेला रहने लगा।
न कोई देखभाल, न आमदनी, न सहारा। धीरे-धीरे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता गया। और फिर एक दिन…उसी घर में उसकी लाश मिली। यह इस परिवार का सबसे त्रासद अध्याय बन गया।

कश्मीर में रहते हुए विलायत ने अपने “शाही अधिकारों” को मान्यता दिलाने की कोशिश की।
वे सरकारी अधिकारियों से मिलीं और माँग रखी…
“डल झील के किनारे मेरे लिए एक महल बनवाया जाए।”
अधिकारियों ने विनम्रता से कहा कि
“अगर आप सच में अवध की रानी हैं, तो आपको लखनऊ जाना चाहिए।”
यह सुनकर विलायत क्रोधित हो उठीं।
“मैं जहाँ चाहूँ रह सकती हूँ।
मेरा परिवार भारत का सबसे अमीर शाही परिवार है!”
जब उनसे दस्तावेज़ माँगे गए, तो वे नाराज़ हो गईं।
उस दिन के बाद उन्होंने सरकारी अफसरों से मिलना लगभग बंद कर दिया।
यहीं से विलायत बेगम ने मीडिया का सहारा लेना शुरू किया।
स्थानीय अख़बारों में खबरें छपने लगीं
“अवध की आख़िरी बेगम”
इंटरव्यू में विलायत हमेशा दावा करतीं की
“अंग्रेजों ने 1856 में हमारा राज्य छीना।
लेकिन हमारा ख़ज़ाना, हमारे हीरे-जवाहरात सुरक्षित हैं।”
जब पत्रकार सबूत माँगते, जवाब मिलता
“हमारे दस्तावेज़ इतने कीमती हैं कि मामूली लोगों को नहीं दिखाए जा सकते।”
उन्नीस सौ सत्तर के दशक की शुरुआत में विलायत अपने दो बच्चों के साथ लखनऊ पहुँचीं।
चौक क्षेत्र में उन्होंने घोषणा की
“मैं बेगम विलायत महल हूँ।
अवध की आख़िरी रानी।
मेरा महल और जागीरें लौटाई जाएँ।”
लखनऊ स्तब्ध था।
कुछ लोग भावुक हुए।
कुछ संदेह में रहे।
इतिहासकारों और अवध के पुराने खानदानों से जुड़े लोगों ने स्पष्ट कहा
“अवध के इतिहास में इस नाम की कोई बेगम दर्ज नहीं है।”
जब अधिकारियों ने प्रमाण माँगे, विलायत ने पुराने बर्तन और तलवारें दिखाईं
लेकिन कोई आधिकारिक दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं कर सकी और विलायत के दावे खारिज कर दिए गए।
लखनऊ में असफल होने के बाद विलायत नई दिल्ली पहुँचीं।
और वहीं…
रेलवे स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम में उन्होंने डेरा डाल दिया।
यहीं से शुरू हुआ था विलायत। महल का “रेलवे-स्टेशन दरबार”
जिसकी कहानी हम पहले देख चुके हैं।
क्यों एक महिला ने अपनी और अपने बच्चों की ज़िंदगी को इतने बड़े भ्रम में ढाल दिया?
शाहिद बट ने बाद में बताया की “यह विभाजन का गहरा आघात था। पाकिस्तान में भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला पति की मृत्यु और मेंटल अस्पताल का अनुभव…एक के बाद एक झटकों ने उसे ऐसी मानसिक अवस्था में पहुँचा दिया,जहाँ उसने विलायत महल के रूप में अपना एक नया व्यक्तित्व गढ़ लिया।

यह लेख सत्य घटनाओं पर आधारित है। यह कहानी कोई ‘शाही स्कैम’ की नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला की है जो विभाजन के सदमे, व्यक्तिगत नुकसान और मानसिक बीमारी के कारण खुद को एक काल्पनिक शाही पहचान में पूरी तरह समाहित कर चुकी थी।

“यह विवरण अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित है। विभिन्न रिपोर्ट्स में कुछ घटनाओं, तिथियों या परिस्थितियों को लेकर मामूली अंतर देखने को मिलता है, इसलिए कुछ बिंदुओं में विवरण ऊपर-नीचे हो सकते हैं। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार की झूठी या भ्रामक जानकारी साझा करना नहीं है, बल्कि इतिहास, सामाजिक परिस्थितियों और इस प्रकरण से जुड़ी मानवीय व मानसिक पहलुओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।”

साभार-   https://www.facebook.com/share/p/1DzuJNDP6h/ से

तीन दिवसीय श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सव के पहले दिन भव्यतम निशान शोभा यात्रा

भुवनेश्वर। प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी तीन दिवसीय श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सवः2026 का आयोजन श्रीश्यामसेवा ट्रस्ट,झारपाड़ा की ओर से किया गया।सुरेश कुमार अग्रवाल,ट्रस्ट सेवा समिति के सचिव के कुशल नेतृत्व में तीन दिवसीय आयोजन के पहले दिन सुबह में भव्यतम निशान शोभा यात्रा स्थानीय मिलन मैदान,लक्ष्मीसागर से बैंड-बाजे के साथ निकाली गई।निशान शोभायात्रा से पूर्व श्रीश्याम सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष पवन कुमार गुप्ता,सचिव सुरेश कुमार अग्रवाल तथा ट्रस्टी चेतन टेकरीवाल आदि ने श्रीश्याम बाबा की पूजा-अर्चना की।प्राथना की कि वे अनुमति दें अपनी निशान शोभायात्रा के लिए।अवसर पर लगभग एक हजार श्रीश्याम भक्तों,माताओं और बहनों ने वासंती परिधानों में अपने-अपने हाथों में निशान(श्रीश्याम ध्वज) धारणकर बाजे-गाजे के साथ जयकारा लगाते चलीं। शोभायात्रा के आगे-आगे राजस्थानी नृत्य व वाद्ययंत्रों का सुमधुर वादन आयोजन को पूरी तरह से धर्ममय बना रहा था।श्रीश्याम के गगनभेदी जयकारे के साथ निशान शोभायात्रा स्थानीय झारपाड़ा श्रीश्याममंदिर पहुंची।मंदिर में सभी भक्तों ने श्रीश्याम नरेश को अपना-अपना निशान चढ़ाकर उन्हें मंदिर के गुंबज पर एक साल के लिए लगा दिया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार आज शाम में आयोजित होनेवाले भजन समारोह के मुख्य आकर्षण हैं कोलकाता के मशहूर भजन गायक गोपाल पड़िहार और बाबा खाटूनरेश के संग फूलों की होली।

सुबह के निशान शोभायात्रा को सफल बनाने में मनीष अग्रवाल,आशीष अग्रवाल,गोविंद अग्रवाल,साकेत अग्रवाल,नंदू पण्डित,पण्डित सत्यम मिश्रा,पण्डित शुभ झा,आनंद पुरोहित,राधेश्याम शर्मा और चिरंजी शर्मा आदि का पूर्ण सहयोग रहा।श्रीश्याम फाल्गुनी महोत्सवः2026 आगामी 28 फरवरी तक चलेगा।

कोटा की साहित्यकार डॉ. कृष्णा कुमारी ‘मरूभूमि शोध संस्थान,श्रीडूंगरगढ़’ में पुरस्कृत

कोटा। ”मरूभूमि शोध संस्थान’ श्रीडूंगरगढ़, बीकानेर के तत्वावधान में ‘ अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस’ को अनेक समरोहों के रूप भव्य एवं गरिमामय रूप से मनाया गया. इस अवसर पर कोटा की साहित्यकार डॉ. कृष्णा कुमारी को उनके राजस्थानी काव्य -संग्रह ‘अस्यो छै म्हारो गाँव’ को इस वर्ष का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘पं. मुखराम सिखवाल स्मृति राजस्थानी साहित्य सृजन पुरस्कार’ समारोहपूर्वक प्रदान किया गया। उन्हें सम्मान- पत्र, प्रतीक चिन्ह, उपरणा और 11,000 रु की नगद राशि प्रदान की गई,। यह पुरस्कार शिवप्रसाद सिखवाल परिवार, श्रीडूंगरगढ़ के सौजन्य से दिया गया। श्री विनोद सिखवाल एवं उनका परिवार भी उपस्थित रहे। उल्लेखनीय है कि कृष्णा कुमारी की प्रस्तुत कृति राजस्थान सरकार द्वारा समग्र शिक्षा के अंतर्गत प्रत्येक विद्यालय द्वारा क्रय की गई है. इसके दो संकरण प्रकाशित हैं.

इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. तेज सिंह जोधा, बीकानेर , को ‘महाराणा प्रताप राजस्थानी साहित्य सृजन पुरस्कार’ एवं साहित्यकार पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ , श्रीमती प्रेम, जयपुर को भी सम्मानित किया गया।कृष्णा कुमारी ने अपने विचार भी प्रकट किये।

उल्लेखनीय है कि कृष्णा कुमारी की 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अंतर्राष्ट्रीय,राष्ट्रीय, राज स्तरीय अनेक -अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हैं. राष्ट्र एवं राज्य स्तरीय पत्र- पत्रिकाओं में हजारों रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं, हो रही हैं ।

शिक्षा में न्यायपालिकाः संवाद की जरूरत या विवाद की राजनीति?

एक बार फिर शिक्षा से जुड़ा एक प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” शीर्षक अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मुकदमों का उल्लेख किए जाने पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी प्रकट की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह टिप्पणी कि “किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने नहीं दिया जाएगा” केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा की रक्षा का संकेत है। इसके बाद संबंधित अध्याय को हटाने और बाजार में उपलब्ध पुस्तकों को वापस लेने का निर्णय लिया गया। प्रश्न यह है कि क्या यह केवल एक संपादकीय चूक थी या हमारे शैक्षिक ढांचे में कहीं गहरी संरचनात्मक कमी है?

प्रश्न है कि स्कूली बच्चों को ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के बारे में जानकारी देने से किस हित की पूर्ति होने वाली है? लेकिन इसमें दो मत नहीं है कि न्यायिक तंत्र के साथ हर क्षेत्र में फैली भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय होने ही चाहिए। सबसे पहले यह भी स्वीकार करना होगा कि न्यायपालिका में लंबित मामलों और भ्रष्टाचार जैसे प्रश्न पूरी तरह काल्पनिक नहीं हैं। न्यायालयों में लंबित मुकदमों की संख्या करोड़ों में है, यह एक सार्वजनिक तथ्य है। कुछ मामलों में न्यायिक आचरण पर भी प्रश्न उठे हैं। परंतु उतना ही सत्य यह भी है कि भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर अपनी स्वतंत्रता, पारदर्शिता और सक्रियता से लोकतंत्र की रक्षा की है। पिछले वर्षों में शीर्ष न्यायाधीशों द्वारा अपनी संपत्तियों का सार्वजनिक विवरण देने की सहमति जैसे कदमों ने संस्थागत पारदर्शिता को सुदृढ़ किया है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि समस्या है या नहीं, प्रश्न यह है कि उसे किस भाषा, किस संतुलन और किस शैक्षिक दृष्टि से प्रस्तुत किया जाए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल तथ्य देना नहीं, दृष्टि देना है। यदि हम बच्चों को यह सिखाते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो साथ ही यह भी सिखाना होगा कि न्यायपालिका ने भ्रष्टाचार से लड़ने में कैसी भूमिका निभाई है, उसने प्रशासनिक दुरुपयोग पर कैसे अंकुश लगाया है, नागरिक अधिकारों की रक्षा में कैसे ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं। शिक्षा में आलोचना हो, पर निराशा नहीं, तथ्य हों, पर संतुलन भी हो। यदि किसी अध्याय में केवल संस्थागत विकृतियों का उल्लेख हो और सुधारात्मक प्रयासों, आदर्श उदाहरणों और संवैधानिक मूल्यों का समुचित विवेचन न हो, तो वह शिक्षा में मूल्यों एवं आदर्शों के बजाय अविश्वास का बीजारोपण बन सकता है। यह विवाद एक बड़े प्रश्न को भी जन्म देता है-पाठ्य पुस्तकों की निर्माण प्रक्रिया में बहुस्तरीय समीक्षा के बावजूद ऐसी सामग्री कैसे प्रकाशित हो जाती है? क्या संपादकीय बोर्ड में विविध दृष्टिकोणों का अभाव है? क्या विधि विशेषज्ञों, शिक्षाशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के बीच समन्वय पर्याप्त नहीं है? एक लोकतांत्रिक समाज में संस्थाओं की आलोचना वर्जित नहीं हो सकती, पर आलोचना और अवमूल्यन के बीच महीन रेखा होती है। शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी जैसी संस्थाओं का दायित्व है कि वे इस रेखा को पहचानें।

यह भी स्मरणीय है कि भ्रष्टाचार केवल न्यायपालिका तक सीमित समस्या नहीं है। हाल ही में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 182 देशों के बीच भारत की रैंक 91 है। पिछले साल के मुकाबले भारत ने 5 स्थान का सुधार किया है, यह स्थिति सुधार के बावजूद मध्य स्तर पर बनी हुई बताई गई है। इसका अर्थ है कि भ्रष्टाचार एक संरचनात्मक, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती है। यदि हम बच्चों को इसके बारे में पढ़ाते हैं तो उसे एक समग्र सामाजिक संदर्भ में पढ़ाया जाना चाहिए कि यह समस्या क्यों उत्पन्न होती है, इसे रोकने के लिए क्या संवैधानिक तंत्र हैं, नागरिकों की क्या भूमिका है और सुधार की संभावनाएं क्या हैं। केवल किसी एक संस्था को केंद्र में रखकर समस्या का चित्रण करना न तो शैक्षिक रूप से न्यायोचित है और न ही संवैधानिक संतुलन के अनुरूप।

न्यायपालिका की गरिमा का प्रश्न भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र तीन स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर आधारित है। यदि किसी एक स्तंभ के प्रति बच्चों के मन में अविश्वास की भावना बिना सम्यक् विश्लेषण के उत्पन्न हो जाए, तो यह दीर्घकाल में लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए हानिकारक हो सकता है। परंतु गरिमा की रक्षा का अर्थ यह भी नहीं कि समस्याओं पर मौन साध लिया जाए। गरिमा और पारदर्शिता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। न्यायपालिका की वास्तविक प्रतिष्ठा उसकी आलोचना सहने की क्षमता, आत्मसुधार की तत्परता और नैतिक दृढ़ता से बढ़ती है। इस संदर्भ में एक नई शैक्षिक संरचना की आवश्यकता अनुभव होती है। पाठ्य पुस्तकों में “संस्थागत अध्ययन” का प्रारूप इस प्रकार विकसित किया जा सकता है जिसमें तीन आयाम हों-संविधान द्वारा प्रदत्त भूमिका, वास्तविक चुनौतियां और सुधार की पहल। उदाहरण के लिए, न्यायपालिका पर अध्याय में उसके ऐतिहासिक निर्णय, जनहित याचिका की परंपरा, मौलिक अधिकारों की रक्षा, साथ ही लंबित मामलों की समस्या और न्यायिक सुधार आयोगों की सिफारिशों का संतुलित उल्लेख किया जाए। इससे छात्र न तो अंधभक्त बनेंगे और न ही निंदक, वे सजग नागरिक बनेंगे।

शिक्षा मंत्रालय को भी इस अवसर को आत्ममंथन के रूप में लेना चाहिए। विवाद के बाद अध्याय हटाना तात्कालिक समाधान हो सकता है, पर स्थायी समाधान नहीं। आवश्यकता है एक स्वतंत्र, बहुविषयी समीक्षा तंत्र की, जिसमें विधि विशेषज्ञ, पूर्व न्यायाधीश, शिक्षाशास्त्री, समाजशास्त्री और बाल मनोविज्ञान के जानकार शामिल हों। साथ ही, सार्वजनिक परामर्श की परंपरा विकसित की जा सकती है ताकि पाठ्य पुस्तकें केवल सरकारी दस्तावेज न रहकर सामाजिक सहमति का दस्तावेज बनें। न्यायपालिका भी इस प्रसंग में रचनात्मक पहल कर सकती है। यदि वह स्वयं विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के लिए न्यायिक साक्षरता कार्यक्रम आरंभ करे, न्यायालयों के कार्यप्रणाली पर सरल और संतुलित अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराए, तो इससे भ्रांतियों का निवारण होगा। न्यायपालिका की पारदर्शिता और संवादशीलता उसकी गरिमा को और सुदृढ़ करेगी।
अंततः यह विवाद हमें यह सोचने को विवश करता है कि हम अपने बच्चों को कैसी नागरिकता का संस्कार देना चाहते हैं।

क्या हम उन्हें केवल समस्याओं का बोध देंगे या समाधान की प्रेरणा भी देंगे? क्या हम उन्हें संस्थाओं पर अविश्वास करना सिखाएँगे, या सुधार में सहभागी बनने की चेतना से सम्पन्न बनायेंगे? लोकतंत्र का भविष्य पाठ्य पुस्तकों की पंक्तियों में ही आकार लेता है। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा में सत्य हो-पर संतुलित, आलोचना हो-पर रचनात्मक और संस्थाओं की गरिमा अक्षुण्ण रखते हुए सुधार की राह भी खुली रहे। भ्रष्टाचार एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती है, पर उसका समाधान संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर देने से नहीं, बल्कि उन्हें अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी बनाकर ही निकलेगा। शिक्षा का कार्य इसी संतुलन को साधना है। यदि यह विवाद हमें अधिक परिपक्व, संवादशील और उत्तरदायी शैक्षिक व्यवस्था की ओर ले जाए, तो यह एक नई दिशा, नई दृष्टि और नई संरचना के प्रादुर्भाव का अवसर सिद्ध हो सकता है। लोकतंत्र की सच्ची शक्ति आलोचना और आत्मसुधार के समन्वय में ही निहित है, और यही संतुलन हमारी पाठ्य पुस्तकों में भी प्रतिबिंबित होना।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133