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महाभारत कालीन अस्त्र-शस्त्रों से जीवंत हुई हजारों साल पहले की महाभारत

महाभारत और रामायण के युद्ध में प्रमुख अंतर युग,उद्देश्य और युद्ध की प्रकृति का रहा है | रामायण त्रेता युग में आज से लगभग नौ लाख वर्ष पूर्व घटित हुई जबकि महाभारत द्वापरयुग में लगभग आज से पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ | रामायण का युद्ध भगवान राम और पंडित रावण के बीच सीमित था तो महाभारत में देश के सभी राज्य सम्मिलित थे और यह विश्वयुद्ध ही था | रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम मर्यादा ,त्याग और रिश्तों को महत्व देते हैं तो महाभारत में श्रीकृष्ण कूटनीति ,अधिकार और ज्ञान को प्रमुखता देते हैं | महाभारत में कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव आमने सामने हैं और दोनों के पक्ष में अपने अपने विश्वसनीय राज्यों के राजा और उनकी सेना हैं | अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में दोनों और कई महारथी हैं जिनसे हम सभी परिचित हैं | मगर इन महारथियों के शस्त्र और अस्त्र महारथियों के नाम की तरह ही अनुपम ,अनूठे , अलौकिक और विज्ञान सम्मत हैं और कईयों ने ये शस्त्र और अस्त्र अपने गुरुओं की सेवा कर उन्हें प्रसन्न कर या तपस्या कर महर्षि परशुराम , देवताओं के राजा इंद्र और सूर्यदेव आदि से प्राप्त किये थे | ऐसे ही शस्त्र और अस्त्र से परिचित कराती है उज्जयिनी में चल रहे विक्रमोत्सव के अंतर्गत , विक्रमादित्य शोध पीठ में लगी विशाल और भव्य प्रदर्शनी – महाभारत |

महाभारत प्रदर्शनी में महाभारत के युद्ध में दोनों और के सेनापतियों द्वारा ग्यारह विभिन्न जटिल व्यूह रचनाओं का उपयोग किया गया था और इन व्यूह रचनाओं को प्रतीकात्मकता से बहुत सुन्दरता से प्रदर्शित किया गया है | कौरवों की और से गुरु द्रोणाचार्य ने सबसे कठिन व्यूह रचना चक्रव्यूह निर्मित की थी जिसमें अन्दर जाने का रास्ता तो था मगर बाहर निकलने का नहीं और यह अर्जुन की अनुपस्थिति में उनके पुत्र ,अभिमन्यु को फंसाने के लिए थी और युद्ध के दिन अभिमन्यु इसमें फंसकर वीरगति को प्राप्त हुए थे | चक्रव्यूह से हम सभी भलीभांति परिचित हैं मगर युद्ध के अठारह दिनों में भीष्म ने गरुड़ व्यूह ,मंडल व्यूह और मकर व्यूह , अर्जुन द्वारा वज्र एवं अर्धचन्द्र व्यूह , पांडवों का क्रोंच व्यूह , गुरु द्रोण द्वारा चक्रशकट व्यूह , कच्छप व्यूह , श्रीन्गातका व्यूह , ओरमी व्यूह ,सर्वतोमुखी दंड व्यूह का प्रदर्शन हुबहू किया है क्योंकि ये व्यूह शत्रु की रणनीति को असफल करने के लिए निर्मित किये जाते थे और यह बताते हैं कि महाभारत काल में सेनापतियों का विवेक और चिंतन अत्यंत उन्नत और वैज्ञानिक था | उदहारण के लिए गरुड़ व्यूह , भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के अनुरूप था जिसमें सेना का अग्रभाग तेज , सुद्रढ़ पार्श्व और विस्तृत पृष्ठभाग | गरुढ व्यूह वेग ,प्रतीक और आक्रामक सैन्य कला का प्रतीक है और इन व्यूहों का आधार ज्यामिति भी है | प्रदर्शनी महाभारत में इन व्यूहों की रचना देखना रोमांचित करता है |

इस प्रदर्शनी में अर्जुन का प्रख्यात धनुष गांडीव [ जिसे अर्जुन को अग्निदेव द्वारा प्रदान किया गया था ], नकुल – सहदेव का आग्नेय धनुष , कर्ण का विजय धनुष , दुर्योधन का शरासन धनुष , युधिष्ठिर का रौद्र धनुष और वैजयंती धनुष , भीष्म का अजगव धनुष , अश्वथामा का कोदण्ड धनुष , घटोत्कच का पौलस्त्य धनुष , शिव जी का पिनाक धनुष , सुतसोम का आग्नेय धनुष . अर्जुन का अक्षय तुणीर [ कभी न समाप्त होने वाले बाणों का दिव्या तरकश ] आदि प्रतीकात्मकत रूप से प्रदर्शित किये गये हैं | भगवान श्रीकृष्ण का धर्म और न्याय का प्रतीक सुदर्शन चक्र भी दिव्यता के साथ यहाँ मौजूद है | भीम और दुर्योधन की गदाएँ , फरसे ,तलवार ,भाले और वज्र भी प्रदर्शनी में हैं और ऐसे करीब सौ से अधिक अस्त्र – शस्त्र यहाँ हैं | महाभारत में एक और अस्त्र ब्रह्मास्त्र का प्रयोग हुआ था | ब्रह्मास्त्र के अलावा ब्रह्मान्दास्त्र , ब्रह्म्शिरास्त्र , अन्जलिकास्त्र , नारायणास्त्र आदि भी दर्शाए गये हैं | चतुरंगिनी सेना के बारे में भी चित्रित और प्रदर्शित किया गया है |

असल में जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें सामने वाले को किसी भी तरह मारना – काटना ही युद्ध का प्रमुख उद्देश्य रहा है मगर महाभारत का महायुद्ध सिर्फ दो सेनाओं का भीषण युद्ध नहीं बल्कि उस समय की उन्नत प्रोद्योगिकी , ऋषियों के ज्ञान और योद्धाओं को शस्त्र का वरदान देना , अस्त्र और शस्त्र का मन्त्र की शक्तियों से चलना , महारथियों की विज्ञानपरक समझ से उपजे अस्त्र और शस्त्र का उपयोग था जिसमें रणनीतिक कौशल के लिए शास्त्र सम्मत व्यूह रचना के कारण महाभारत सबको आकर्षित करता है | पांडवों की और से भगवान श्रीकृष्ण ने बिना शस्त्र उठाये , अपने ज्ञान और कूटनीति से पांडवों को विजयी दिलाई | महाभारत के अस्त्र ,शस्त्र ,शौर्य और विज्ञान का दिव्य संगम है यह प्रदर्शनी महाभारत | अस्त्र और शस्त्र के साथ उनकी महत्ता को प्रदर्शित करते आलेख दर्शकों को सहूलियत प्रदान करते हैं |

प्रदर्शनी में पोस्टरों के जरिये महाभारत के अठारह दिन के युद्ध का वर्णन पढ़ना रोमांचित करता है | प्रदर्शनी के शोधकर्ता और क्यूरेटर राज बेंद्रे बताते हैं कि महाभारत शौर्य ,विज्ञान और आध्यात्म का संगम था और महाभारत सिर्फ युद्ध नहीं ,सभ्यता का आईना भी है | राज बेंद्रे के अनुसार इस प्रदर्शनी के लिए काफी अनुसन्धान किया गया है और प्रदर्शनी का उद्देश्य महभारत को पौराणिक ग्रन्थ के साथ भारत की प्राचीन सैन्य , वैज्ञानिक ,और रणनीतिक चेतना का दस्तावेज भी सिद्ध करना है | प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की परिकल्पना है विक्रमोत्सव और उनके सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. श्रीराम तिवारी के संयोजन में महाभारत प्रदर्शनी अनूठी और अनुपम ज्ञान का सागर है |

(लेखक डॉ. हरीश कुमार सिंह देश के जाने माने व्यंग्यकार एवँ स्तंभकार हैं और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं। इनके व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं)

‘द केरल स्टोरी-2’ से तिलमिलाए एजेंडा धारी अनुराग कश्यप

सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2’ में लव जिहाद की हिंदू पीड़िता को जबरन गोमांस खिलाकर इस्लाम कबूलने वाला दृश्य दिखाया गया। इस पर फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने गोमांस की तुलना खिचड़ी से कर पीड़िताओं के दर्द को हल्का अनुभव करार दिया है।

सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2 गोज बीयॉन्ड‘ का ट्रेलर हाल ही में जारी किया गया है। फिल्म में लव जिहाद मामलों में पीड़ित हिंदू लड़कियों के साथ अत्याचार की सच्चाई को दर्शाया गया है, जो झकझोर देने वाले हैं। फिल्म मेकर्स ने इसे हकीकत का आईना बताया है। लेकिन इसी बीच फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने फिल्म में पीड़िता को जबरन ‘बीफ’ यानी गोमांस खिलाने वाले दृश्य की खिचड़ी से तुलना की है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है, जिसमें रिपोर्टर ने अनुराग कश्यप से सवाल पूछा कि आपकी केरल स्टोरी-2 पर क्या राय है? इसका जवाब देते हुए अनुराग कश्यप कहते हैं, “फिल्म ‘बुलशिट’ है। ये प्रोपेगेंडा है। ऐसे कौन ‘बीफ’ खिलाता है, ऐसे कोई खिचड़ी भी नहीं खिलाता है।”

इसके बाद रिपोर्टर एक और सवाल पूछता है कि इस फिल्म को बनाने का उद्देश्य क्या है? इस पर अनुराग कश्यप ने कहा, “वो पैसा कमाना चाहते हैं। वो बस सबको खुश करना चाहते हैं, लोगों को बाँटना चाहते हैं। फिल्ममेकर एक लालची आदमी है।”

फिल्म पर अनुराग कश्यप की टिप्पणी का वीडियो वायरल होते ही विवाद शुरू हो गया। फिर ‘द केरल स्टोरी-2’ के फिल्म डायरेक्टर कामाख्य नारायण ने विवाद में उतरकर दिया। उन्होंने अनुराग कश्यप की टिप्पणी पर रिएक्ट करते हुए कहा कि समाज ने उन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है, वह मानसिक रूप से दुर्बल हो चुके हैं।

वीडियो में फिल्म के डायरेक्टर कामाख्य नारायण ने कहा, “ऑडियंस उन्हें गंभीरता (सीरियसली) से नहीं लेती है। पिछले कई सालों से उनकी सारी फिल्में फ्लॉप हो रही हैं। वो मानसिक रूप से दुर्बल हो चुके हैं। उनकों सच्चाई दिखती नहीं है। उनको ये नहीं दिख रहा कि हमारी बहनों को जबरन बीफ खिलाया जा रहा है, धर्म परिवर्तन करने के लिए। ये सत्य घटना है।”

नारायण आगे कहते हैं, उनको पूरी दुनिया से समस्या है। उनको नेटफ्लिक्स से समस्या है। उनको ब्राह्मणों से समस्या है। उनको फिल्म इंडस्ट्री से समस्या है। आजकल हमसे समस्या है उनको। उनको गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। हमारी फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित है, “हमें ये पता है। हम अनुराग जी के घर रिसर्च मैटेरियल भेज देंगे। वो तो लोगों के घर जूते-चप्पल भेजते हैं। मैं तो ये नहीं भेज सकता हूँ।”

फिल्म की रिसर्च को लेकर कामाख्य नारायण कहते हैं, “मैनें 1500 आर्टिकल पढ़े हैं। 70-80 FIR पढ़ी हैं। पीड़िताओं से मिला हूँ और उनसे मिलकर मैं पिछले कई साल से सो नहीं पाया हूँ। कोर्ट जजमेंट पढ़े हैं। ये सभी सत्य घटनाएँ हैं। समाज में हो रहा है। हम अपनी आँखो को बंद कर सकते हैं, लेकिन उससे सत्य नहीं बदलेगा। समाज में ये बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है।”

हिंदू लड़कियों को ‘जबरन गोमांस’ खिलाने के असल मामले

फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2’ ने हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर गोमांस खिलाने और धर्मांतरण कराने की सच्ची घटनाओं को उजागर किया है, जो आए दिन सामने आती हैं। ऐसी कई घटनाएँ हैं, जिनमें हिंदू लड़कियों को पहले प्रेमजाल में फँसाया जाता है, फिर बहला-फुसलाकर रेप और फिर गोमांस खिलाकर जबरन इस्लाम कबूलने को मजबूर किया जाता है।

चाहे वह रायबरेली का एक बच्चे का अब्बू मोहम्मद मुकीम हो, जिसने निकाह का झाँसा देकर दो साल तक रेप किया। फिर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन का दबाव डालने लगा और घर ले जाकर जबरन गोमांस तक खिलाया।

या फिर उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का अहमद रजा हो, जिसने चाकू की नोक पर हिंदू लड़की से बलात्कार किया और निकाह का झाँसा देकर अम्मी-अब्बू से मिलवाया। फिर घर ले जाकर अम्मी-अब्बू के सामने गोमांस खाने और नमाज पढ़ने की धमकी दी। जब पीड़िता ने इनकार किया, तो बेरहमी से पीटा।

महाराष्ट्र के संभाजीनगर का ताहेर पठान ने भी हिंदू लड़की के साथ यही किया। समीर पटेल बनकर पीड़िता से मिला, फिर प्रेमजाल में फँसाकर रेप किया। और अंत में अपना मकसद पूरा करने के लिए पीड़िता को बुर्का पहनने और गोमांस खाने को मजबूर किया। इस काम में उसकी अम्मीजान, अब्बाजान के साथ-साथ उसकी पहली बेगम आयेशा पठान भी शामिल थी, जिसके साथ ताहेर के 4 बच्चे भी थे।

ये कुछ गिने चुने मामले हैं, लेकिन आँकड़ा सोच से कही परे है। कई मामलों में FIR होती हैं, जिसमें चौंकाने वाले खुलासे होते हैं। कैसे ‘अब्दुल’ अपने जाल में फँसाकर हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन करा देते हैं। इससे कई हिंदू लड़कियों की जिंदगियाँ बर्बाद हुई हैं। ‘द केरल स्टोरी पार्ट-1’ और ‘पार्ट-2’ जैसी फिल्मों में इन्हीं पीड़ित हिंदू लड़कियों का दर्द दिखाकर ऐसे ‘अब्दुलों’ की सच्चाई को उजागर किया गया है।

हिंदू पीड़िताओं के दर्द पर अनुराग कश्यप का ‘खिचड़ी’ ह्यूमर

अब वापस आते हैं अनुराग कश्यप की टिप्पणी पर, तो बात सीधी है। अगर किसी हिंदू लड़की को उसकी मर्जी के बगैर जबरन गोमांस खिलाया गया है, तो यह सिर्फ फिल्म का एक दृश्य नहीं है, यह उन लव जिहाद की पीड़िताओं के दर्द की असलियत है। जिन मामलों का जिक्र फिल्म में है, जिन पीड़िताओं ने यह दर्द झेला है, उनके लिए यह कोई हल्का अनुभव नहीं रहा। ऐसे जख्म लंबे समय तक याद रहते हैं, और इन्हें शब्दों की चतुराई से छोटा नहीं किया जा सकता।

ऐसे में अनुराग कश्यप का यह कहना कि ‘ऐसे तो लोग खिचड़ी भी नहीं खिलाते’ आखिर क्या संदेश देता है। क्या यह टिप्पणी उन घटनाओं की गंभीरता को कम करके दिखाने की कोशिश है या फिर दर्द को एक सामान्य मजाक में बदल देने का अंदाज है। क्या जिन लड़कियों ने यह सब सहा, उनके लिए यह सिर्फ एक हल्की टिप्पणी भर है। इसका जवाब तो अनुराग कश्यप ही दे सकते हैं, जिन्हें बीफ पराठा शायद बेहद पसंद भी है।

जाहिर है खिचड़ी और गोमांस की तुलना करना कोई ह्यूमर में नहीं आता। ये दोनों एक चीज नहीं है, न ही इन्हें जबरन खिलाने के मायने एक हैं। आस्था, दर्द और जबरन जैसे शब्दों का वजन समझे बिना की गई तुलना अपने आप बहुत कुछ कह जाती है।

(फोटो साभार: TheHindu/Youtube/ANI)  
 
साभार-https://hindi.opindia.com/ से 

विज्ञान और अध्यात्म : ज्ञान का भारतीय मॉडल

डॉ. सी. वी. रमन ने प्रकाश के प्रकीर्णन (scattering of light) पर शोध कर 1930 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। उनका कार्य यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान भारतीय परंपरा में निरंतर जीवित और सक्रिय रहा है। रमन का कथन था—“प्रकृति स्वयं हमें प्रेरित करती है।” यह वाक्य वैज्ञानिक अवलोकन (scientific observation) और आध्यात्मिक संवेदना (spiritual sensitivity) के सुंदर मेल को प्रकट करता है।

पश्चिमी आधुनिक सोच में विज्ञान और अध्यात्म को अक्सर दो अलग रास्तों की तरह देखा जाता है—एक experiment (प्रयोग) और evidence (प्रमाण) पर आधारित, दूसरा experience (अनुभव) और faith (आस्था) पर। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा में यह दूरी इतनी स्पष्ट नहीं रही। यहाँ ज्ञान (knowledge) को एक समग्र यात्रा माना गया, जहाँ प्रकृति (nature) और चेतना (consciousness) दोनों की खोज समान रूप से महत्वपूर्ण थी। स्वामी विवेकानंद ने 1893 (Chicago) में कहा था कि विज्ञान और धर्म का लक्ष्य एक ही है—सत्य की खोज।

विज्ञान पूछता है—यह जगत कैसे काम करता है?
अध्यात्म पूछता है—मैं कौन हूँ और जीवन का अंतिम सत्य क्या है?
दोनों के प्रश्न अलग दिखते हैं, पर लक्ष्य एक है—सत्य।

भारत की scientific consciousness (विज्ञान चेतना) केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि तर्क (logic), जिज्ञासा (curiosity) और जिम्मेदारी से सोचने की आदत है। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय अध्यात्म ने वैज्ञानिक सोच को केवल प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि उसे एक गहरा दार्शनिक आधार (philosophical foundation) भी प्रदान किया।

वैदिक युग : प्रश्न से शुरू हुई खोज
भारतीय अध्यात्म का प्रारंभिक आधार ऋग्वेद है। इसमें नासदीय सूक्त ‘ नासदासीन्नो सदासात्तदानीं ‘ सृष्टि की उत्पत्ति पर प्रश्न उठाते हैं—“तब क्या था? किसने सृष्टि की?” यहाँ कोई अंतिम उत्तर थोपने की जल्दी नहीं है, बल्कि प्रश्न करने की स्वतंत्रता है। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific temper) की पहली सीढ़ी है – आश्चर्य और जिज्ञासा।

उपनिषदों में “नेति-नेति” (यह नहीं, वह नहीं) की पद्धति भी एक तरह की विश्लेषणात्मक विधि (analytical method) है—हर संभावना को परखकर सत्य तक पहुँचना। यह उसी प्रकार है जैसे विज्ञान में परिकल्पना (hypothesis) को जांचकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है।

इस प्रकार भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी माना—बाहरी खोज (outer exploration) और आंतरिक अनुभूति (inner realization) की संयुक्त यात्रा के रूप में। यहाँ प्रकृति, ग्रहों या शरीर का अध्ययन आध्यात्म से अलग नहीं समझा गया। भारतीय दृष्टि के अनुसार केवल बाहरी ज्ञान से जीवन का पूर्ण अर्थ नहीं मिलता और केवल आंतरिक साधना से संसार की कार्यप्रणाली नहीं समझी जा सकती; दोनों का संतुलन आवश्यक है।

प्राचीन विज्ञान : अध्यात्म की भूमि पर विकसित

प्राचीन भारत में गणित, खगोलशास्त्र (astronomy) और आयुर्वेद का विकास केवल तकनीकी आवश्यकता से नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। भारतीय गणितज्ञों ने decimal system (दशमलव पद्धति), zero (शून्य) और infinity (अनंत) जैसी क्रांतिकारी अवधारणाएँ दीं। ये खोजें केवल संख्याओं का विस्तार नहीं थीं, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था (cosmic order – ऋत) को समझने का प्रयास भी थीं—एक ऐसा विश्वास कि यह सृष्टि व्यवस्थित और अर्थपूर्ण है।

खगोलशास्त्र में ग्रह-नक्षत्रों की गति को केवल गणना का विषय नहीं माना गया, बल्कि एक नियमबद्ध ब्रह्मांड (ordered universe) की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। इसी प्रकार आयुर्वेद को “science of life” कहा गया। आयुर्वेद समग्र दृष्टि (holistic approach) अपनाता है—जहाँ शरीर, मन और आत्मा एक ही सूत्र में जुड़े माने जाते हैं। स्वास्थ्य को तीन दोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन के रूप में समझा गया। यह संतुलन हमें याद दिलाता है कि हम अलग-थलग अस्तित्व नहीं हैं, बल्कि प्रकृति का ही हिस्सा हैं। हमारे भीतर का सूक्ष्म जगत (microcosm) बाहर के विराट जगत (macrocosm) से जुड़ा है। जब प्रकृति में लय होती है, तब जीवन में भी लय आती है।

अध्यात्म ने विज्ञान को कैसे समृद्ध किया?

भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को तीन स्तरों पर दिशा दी—पहला, नैतिक दिशा (ethical direction), ताकि ज्ञान मानव कल्याण के लिए उपयोग हो। दूसरा, जिज्ञासा-प्रेरित खोज (curiosity-driven inquiry), जहाँ “मैं कौन हूँ?” और “यह जगत क्या है?” जैसे प्रश्न खोज की शुरुआत बने। तीसरा, समग्र दृष्टि (holistic vision), जिसमें मनुष्य, प्रकृति और ब्रह्मांड को परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था (interconnected reality) माना गया।

आधुनिक युग : क्वांटम फिजिक्स और वेदांत

आज के समय में भी विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद जारी है। विशेषकर Quantum Physics (क्वांटम भौतिकी) और Cosmology (ब्रह्मांड विज्ञान) के क्षेत्र में। जिनेवा स्थित विश्वप्रसिद्ध प्रयोगशाला CERN में भगवान शिव ‘नटराज’ की प्रतिमा स्थापित है। यह “कॉस्मिक डांस” यानी ‘ब्रह्मांड का नृत्य’ की प्रतीक है—सृष्टि लगातार बनती और बदलती रहती है। जैसे शिव का नृत्य निर्माण और विनाश के चक्र को दिखाता है, वैसे ही विज्ञान बताता है कि बहुत छोटे कण (particles) आपस में टकराते हैं, टूटते हैं और ऊर्जा में बदल जाते हैं। वैज्ञानिक Fritjof Capra ने कहा कि जो दृश्य भारतीय कलाकारों ने शिव के नृत्य में दिखाया, आज के वैज्ञानिक उसे कणों (particles) और ऊर्जा (energy) की गतिविधि में देखते हैं। यानी अलग भाषा है, पर कहानी एक ही है—ब्रह्मांड हमेशा गतिशील है।

क्वांटम फिज़िक्स का एक रोचक सिद्धांत है wave-particle duality (तरंग-कण द्वैत)। बहुत छोटे कण (particles) कभी तरंग (wave) की तरह व्यवहार करते हैं और कभी कण (particle) की तरह। यानी जो चीज़ हमें एक रूप में दिखती है, वह असल में उससे कहीं अधिक जटिल हो सकती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि वास्तविकता (reality) हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हमारी आँखों को दिखाई देती है। यही बात वेदांत के माया (illusion) सिद्धांत में भी कही गई है—दिखने वाली दुनिया अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक परत है जिसके पीछे गहरा सत्य छिपा है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक Erwin Schrödinger वेदांत से प्रभावित थे। उनका मानना था कि चेतना (consciousness) मूल रूप से एक ही है, अलग-अलग व्यक्तियों में बंटी हुई नहीं। यह विचार वेदांत के अद्वैत (non-duality) सिद्धांत से मिलता है, जहाँ सब कुछ एक ही सार्वभौमिक चेतना (universal consciousness) का हिस्सा माना जाता है।

इस प्रकार आधुनिक विज्ञान और वेदांत के बीच यह संवाद दिखाता है कि सत्य की खोज केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, बल्कि चेतना की गहराइयों तक फैली हुई है। जब विज्ञान और अध्यात्म साथ चलते हैं, तो हमारी समझ अधिक व्यापक, संतुलित और अर्थपूर्ण बनती है।

चेतना का प्रश्न : आज भी खुला संवाद

आज का आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड और मस्तिष्क का बहुत बारीक नक्शा बना सकता है। हम जान सकते हैं कि कौन-सा हिस्सा क्या काम करता है। लेकिन एक सवाल अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है—हम जो “अनुभव” करते हैं, जैसे खुशी, दुख, प्रेम या शांति, वह आखिर कैसे जन्म लेता है? यह व्यक्तिगत अनुभव (subjective experience) अभी भी विज्ञान के लिए एक रहस्य है। ऋषियों ने बहुत पहले कहा था कि भौतिक जगत को समझ लेना ही अंतिम ज्ञान नहीं है। उसके परे भी एक आयाम है— चेतना, जो केवल पदार्थ से परिभाषित नहीं होती क्योंकि वह हमारे अनुभव, सोच और आत्मबोध से जुड़ी है। आज ध्यान पर हो रहे वैज्ञानिक शोध दिखा रहे हैं कि यह तनाव कम कर सकता है और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इस तरह प्राचीन योग परंपरा और आधुनिक neuroscience के बीच एक रचनात्मक विमर्श विकसित हो रहा है—जहाँ बाहरी अध्ययन और आंतरिक अनुभव एक-दूसरे से सीख रहे हैं।

निष्कर्ष : एक समग्र समझ की ओर
इस पूरे विमर्श से स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में अध्यात्म और विज्ञान का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग (complementarity) का रहा है। प्राचीन वैदिक चिंतन से लेकर आधुनिक प्रयोगशालाओं तक, दोनों ने अलग-अलग तरीकों से एक ही लक्ष्य—सत्य—की खोज की है। यह कहना उचित नहीं कि आधुनिक विज्ञान ने प्राचीन आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है। किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि जब विज्ञान और अध्यात्म के बीच सार्थक संवाद स्थापित होता है, तो ज्ञान अधिक व्यापक और गहरा बनता है।

(लेखिका, डेंटल सर्जन हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएचडी हैं। देश भर के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में व वेबसाईटों पर स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करती हैं)

शिक्षा को हिंसक नहीं, संवेदनशील बनाना होगा

देश में इन दिनों बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं और सामान्य परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं। हर साल की तरह इस बार भी परीक्षा का मौसम केवल प्रश्नपत्रों और परिणामों का नहीं, बल्कि मानसिक दबाव, चिंता और असुरक्षा का मौसम बनता जा रहा है। छात्रों के चेहरों पर भविष्य की चिंता साफ पढ़ी जा सकती है। यह चिंता केवल अच्छे अंक लाने की नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के बोझ को ढोने की है। दुर्भाग्य यह है कि यह दबाव कई बार इतना असहनीय हो जाता है कि वह आत्मघाती या हिंसक रूप ले लेता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े एक भयावह सच उजागर करते हैं। वर्ष 2013 से 2023 के बीच छात्रों की आत्महत्या की दर में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के टूटने की कहानी है। इन आत्महत्याओं के पीछे पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं, सामाजिक तुलना और आर्थिक तनाव प्रमुख कारण बताए जाते हैं। लेकिन हाल में लखनऊ में जो घटना सामने आई, उसने इस संकट को एक और खतरनाक दिशा में मोड़ दिया है।

लखनऊ की घटना केवल परीक्षा दबाव की कहानी नहीं है, बल्कि परिवारों में बढ़ती संवेदनहीनता, संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दर्पण है। पुलिस जांच के अनुसार एक पैथोलॉजी लैब संचालक पिता अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे और उस पर नीट जैसी परीक्षा पास करने का लगातार दबाव बना रहे थे। घटना वाले दिन भी दोनों के बीच बहस हुई और 21 वर्षीय युवक ने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद उसने अपराध छिपाने के लिए शव के टुकड़े किए, कुछ बाहर फेंके, कुछ घर में छिपाए, छोटी बहन को धमकाया और पुलिस को गुमराह करने के लिए पहले लापता होने और फिर आत्महत्या की कहानी गढ़ी। यह सब बताता है कि यह क्षणिक आवेश नहीं था, बल्कि भीतर लंबे समय से पल रही कुंठा, आक्रोश और मानसिक विघटन का परिणाम था। प्रश्न यह है कि एक बेटे के भीतर इतनी नफरत कैसे पनप सकती है? क्या ‘कुछ बनने’ का दबाव इतना भारी हो सकता है कि वह रिश्तों को भी तार-तार कर दे? हर माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान सफल हो, प्रतिष्ठित करियर बनाए, समाज में सम्मान पाए। लेकिन जब यह चाहत संवाद और सहयोग की जगह नियंत्रण और दबाव का रूप ले लेती है, तब वह प्रेरणा नहीं, मानसिक उत्पीड़न बन जाती है। जब शिक्षा जीवन-निर्माण का माध्यम न होकर, विनाश का कारण बन जाती है।

भारत में नीट और जी जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए उम्मीद का प्रतीक हैं। नीट में पिछले वर्ष 23 लाख से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया, जबकि ज्वाइंट एन्टरेंस एक्जामिनेशन (जेईई) के एक सत्र में 13 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने आवेदन किया। इन लाखों विद्यार्थियों में से केवल कुछ हजार ही शीर्ष संस्थानों तक पहुंच पाते हैं। शेष विद्यार्थियों के हिस्से अक्सर निराशा, आत्मग्लानि और सामाजिक तुलना का दंश आता है। जब सफलता का पैमाना केवल रैंक और अंक बन जाए, तो असफलता जीवन का अंत प्रतीत होने लगती है। कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों में हर वर्ष आत्महत्या की खबरें सामने आती हैं। कोटा देश की कोचिंग राजधानी कही जाती है, जहां हजारों छात्र सपने लेकर पहुंचते हैं। लेकिन उन्हीं सपनों का बोझ कई बार उनके जीवन से भारी पड़ जाता है। यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का परिणाम है जिसमें प्रतियोगिता सहयोग से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है।

लखनऊ की घटना में एक और तथ्य उल्लेखनीय है-आरोपी छात्र की मां का निधन हो चुका था। घर में चाचा-चाची मौजूद थे, लेकिन क्या उस युवक की मनःस्थिति को समझने का प्रयास किया गया? क्या उसके भीतर के तनाव, अकेलेपन और भय को किसी ने सुना? यदि परिवार में नियमित संवाद होता, यदि मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लिया जाता जितनी अंकों को, तो शायद यह भयावह वारदात टाली जा सकती थी। आज समस्या केवल आत्महत्या तक सीमित नहीं है। बच्चे हिंसक भी हो रहे हैं। यह हिंसा बाहरी नहीं, भीतर से उपज रही है-कुंठा, अपमानबोध, तुलना और असफलता के भय से। जब बच्चे को यह महसूस होने लगे कि वह केवल एक ‘प्रोजेक्ट’ है, एक ‘इन्वेस्टमेंट’ है, जिसे किसी निश्चित पेशे में ढालना है, तब उसकी स्वतंत्र पहचान कुचल जाती है। वह या तो भीतर ही भीतर टूट जाता है या विस्फोट कर देता है।

शिक्षा का उद्देश्य जीवनदायिनी होना चाहिए-विवेक, संवेदना और आत्मविश्वास का विकास करना चाहिए। लेकिन जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा और रैंकिंग का माध्यम बन जाए, तो वह तनाव और हिंसा को जन्म देती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता, और न ही बनना चाहिए। विविध प्रतिभाओं को सम्मान देने वाली सामाजिक मानसिकता विकसित किए बिना यह संकट कम नहीं होगा। इस संदर्भ में तीन स्तरों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। पहला, परिवार। माता-पिता को यह समझना होगा कि अपेक्षा और दबाव में अंतर है।

अपेक्षा प्रेरणा देती है, दबाव भय पैदा करता है। बच्चों के साथ खुला संवाद, उनकी रुचियों को समझना, असफलता को स्वीकार्य बनाना और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। ‘तुम्हें डॉक्टर बनना ही है’ की जगह ‘तुम जो बनना चाहो, हम साथ हैं’ जैसी सोच विकसित करनी होगी। दूसरा, शिक्षा संस्थान। स्कूल और कोचिंग संस्थानों को केवल परिणाम देने वाली मशीन नहीं, बल्कि संवेदनशील संस्थान बनना होगा। नियमित काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएं और परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न न बनाने की संस्कृति विकसित करनी होगी। शिक्षकों को भी विद्यार्थियों की मानसिक दशा पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। तीसरा, सरकार और समाज। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और कलंकमुक्त बनाना होगा। परीक्षा प्रणाली में सुधार, वैकल्पिक करियर मार्गों को बढ़ावा, और कौशल आधारित शिक्षा पर जोर देना समय की मांग है। मीडिया को भी सनसनी की बजाय संवेदनशील रिपोर्टिंग करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इन घटनाओं को सामान्य न मानें। हर आत्महत्या और हर हिंसक घटना हमारे सामाजिक ताने-बाने में दरार का संकेत है। यदि हम इसे केवल ‘व्यक्तिगत मामला’ कहकर टाल देंगे, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। लखनऊ की घटना हमें झकझोरती है। यह बताती है कि शिक्षा का दबाव, पारिवारिक संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा मिलकर कितनी भयावह परिणति ला सकती है। अब समय है कि हम सामूहिक आत्ममंथन करें। शिक्षा को जीवन का उत्सव बनाएं, न कि भय का कारण। बच्चों को लक्ष्य दें, लेकिन उनके पंख न काटें। सपने दिखाएं, पर उन्हें सांस लेने की जगह भी दें। जब तक हम सफलता की परिभाषा को व्यापक नहीं करेंगे और बच्चों को अंक से अधिक मनुष्य मानना नहीं सीखेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा। परीक्षा का मौसम हर साल आएगा, लेकिन यदि हम संवेदनशील समाज बन सके, तो शायद अगली पीढ़ी के लिए यह मौसम भय का नहीं, आत्मविश्वास का प्रतीक बन सकेगा।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

कीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर(ओड़िशा) भारत का 22वां स्थापना दिवस पर यादगार समारोह

भुवनेश्वर। कीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर(ओड़िशा),भारत के 22वें विश्वविद्यालय स्थापना दिवस के अवसर पर चार विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय विभूतियों को कीट लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

कीट डीम्ड विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर (ओड़िशा),भारत के 22वें स्थापना दिवस के अवसर पर विशेष व्याख्यानमाला का आयोजन किया जबकि अवसर पर चार विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय विभूतियों को कीट लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित भी किया गया।सम्मानित अतिथि थे, जॉन ओपेनहैमर, संस्थापक एवं अध्यक्ष, कोलंबिया हॉस्पिटलिटी (अमेरिका) किरिण्डे ओसाजी नायक थिरो, मुख्य अधिष्ठाता, हनुपिटिया गंगाराम मंदिर, कोलंबो, के.एन. शांता कुमार, निदेशक,दी प्रिंटर्स(मैसूर) प्राइवेट लिमिटेड तथा बोर्ड सदस्य, प्रेस ट्रस्ट आफ इण्डिया.
गिट्रुल जिग्मे रिनपोचे, तिब्बती बौद्ध धर्म के आचार्य एवं आध्यात्मिक निदेशक, रीपा इंटरनेश्नल सेंटर, स्विट्ज़रलैंड।

अपने वक्तव्य में जॉन ओपेनहाइमर ने संस्थान की उन्मुक्त कण्ठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि कीट प्रांगण उनकी कल्पना से परे है और यह समाज पर स्थायी प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा, “आप समाज, अपने परिवार, अपने देश और पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखते हैं। अपने हृदय की आवाज़ का अनुसरण करें—तब निर्णय लेना आसान हो जाता है।”

मीडिया जगत के वरिष्ठ व्यक्तित्व के. एन. शांता कुमार ने कहा, “कीट केवल एक संस्थान की कहानी नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टि की कहानी है।” उन्होंने कहा कि भले ही मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, परंतु सत्य, विश्वसनीयता, सत्यापन और नैतिक पत्रकारिता आज भी इसकी आधारशिला हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से जिज्ञासु बने रहने, विश्वसनीयता को महत्व देने और जिम्मेदार नागरिक पत्रकारिता को अपनाने का आह्वान किया।

डॉ. किरिंदे अस्साजी नायक थेरो ने इस दिन को “इतिहास का आध्यात्मिक पुनर्मिलन” बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अनेक देशों और संस्थानों का दौरा किया है, किंतु करुणा, अनुशासन, मानवता और दूरदृष्टि का ऐसा समन्वय विरले ही देखने को मिलता है।

ग्येत्रुल जिग्मे रिनपोछे ने विनम्रता और करुणा पर बल देते हुए कहा, “सफलता पाने वाले बहुत होते हैं, परंतु विनम्र बने रहना ही सच्ची सफलता है।” उन्होंने ‘व्यावहारिक करुणा’ की बात करते हुए कहा कि इसके लिए जटिल दार्शनिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति संवेदनशील हृदय ही पर्याप्त है। उन्होंने अपनी दादी के शब्दों को स्मरण करते हुए कहा, “देने से कोई गरीब नहीं होता। जो नहीं देते, वही सदा गरीब रहते हैं। गरीबी मन में होती है।”

स्वागत भाषण में महान् शिक्षाविद् संस्थापक, प्रेफेसर अच्युत सामंत ने अपने आभार संबोधन में बताया कि कीट की कामयाबी का सफर एक साहसिक स्वप्न और दृढ़ संकल्प के साथ प्रारंभ हुई थी।

उन्होंने कहा, “अब तक की हमारी सारी उपलब्धियाँ कीट-कीस-कीम्स के विद्यार्थियों और कर्मचारियों की हैं। यह उनकी सफलता है।”

इस प्रकार कीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर(ओड़िशा) भारत का 22वां स्थापना दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि करुणा, सत्यनिष्ठा, विनम्रता और दूरदर्शी नेतृत्व के मूल्यों का भी उत्सव सिद्ध हुआ।

संस्कृत भाषा के शिलालेख और पौराणिक वास्तुकला: भोजशाला में हिंदू मंदिर तोड़कर ही बना था कमाल मौला मस्जिद

मध्य प्रदेश के धार में 24 फरवरी 2026 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भोजशाला परिसर में स्थित कमाल मौला मस्जिद को लेकर वैज्ञानिक रिपोर्ट इंदौर हाई कोर्ट में को सौंपी। ASI ने रिपोर्ट में कहा कि कमाल मौला मस्जिद को प्राचीन मंदिरों के अवशेषों, स्थापत्य, शिल्प और शिलालेखों के टुकड़ों का उपयोग करके बनाया गया था और यह मौजूदा ढाँचा कई सदियों बाद बिना संतुलन और एक समान डिजाइन के तैयार किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, ASI की टीम ने कुल 94 मूर्तियाँ और मूर्तिकला के हिस्से खोजे हैं, जिनमें भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव और तमाम पशु आकृतियाँ भी शामिल हैं और कई हिस्सों पर संस्कृत भाषा के शिलालेख भी मिले हैं, जो 12वीं से 16वीं सदी के माने जा रहे हैं। इन खोजों से यह संकेत मिलता है कि मंदिर शैली की वास्तुकला और कला पहले से यहाँ मौजूद थी।

वहीं सोमवार (23 फरवरी 2026) को भोजशाला की कमाल मौला मस्जिद विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। इस सुनवाई में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने मामला सुना और ASI की जाँच रिपोर्ट को आगे की प्रक्रिया का आधार बनाया।

कोर्ट ने देखा कि ASI की 98 दिनों में तैयार की गई 2100 पन्नों और 10 खंडों की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट पहले ही सीलबंद लिफाफे से खोली जा चुकी है और इसकी प्रति सभी पक्षों को पहले ही दी जा चुकी है। इसके बावजूद किसी पक्ष ने अभी तक इस रिपोर्ट पर कोर्ट में आपत्तियाँ, सुझाव या टिप्पणियाँ नहीं दी हैं।

अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में जिन प्राचीन प्रमाणों, शिलालेखों , मूर्तियों, सिक्कों और शोध निष्कर्षों का उल्लेख है, उस पर सभी पक्षों को अपनी लिखित आपत्तियाँ और राय कोर्ट में दो हफ्तों के भीतर पेश करना आवश्यक है। इसीलिए सभी याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों को 2 हफ्तों की मोहलत दी गई है।

कोर्ट ने यह भी साफ निर्देश दिया है कि यथास्थिति को बनाए रखा जाए, यानी वर्तमान में चल रही पूजा-नमाज की व्यवस्था में कोई बदलाव वहीं होगा, जब तक कोर्ट का अगला फैसला नहीं आता। अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 को होगी, जब कोर्ट इन आपत्तियों और सुझावों पर फैसला सुनेगी।

क्या है भोजशाला विवाद?

बता दें कि भोजशाला विवाद सालों से धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से संगीन मामला रहा है। हिंदू समुदय इसे वाग्देवी मंदिर के तौर पर पूजता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। ASI की रिपोर्ट इसी आधर पर तैयार की गई थी और अब कोर्ट ने दोनों समुदायों से अपने दावे और आपत्तियाँ प्रस्तुत करने को कहा है, ताकि अंतिम निर्णय लिया जा सके।

 

धार भोजशाला मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की जिस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट सीलबंद मान रहा था, वह दो साल से पक्षकारों के पास है। यह खुलासा सोमवार को उस वक्त हुआ जब हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सर्वेक्षण रिपोर्ट के बारे में जानकारी मांगी।

महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि सर्वेक्षण रिपोर्ट पूर्व में ही पक्षकारों को सौंपी जा चुकी है, लेकिन यह जानकारी न शासन ने सुप्रीम कोर्ट को दी न पक्षकारों ने, हालांकि इसके पीछे किसी की कोई दुर्भावना नहीं थी।

इस पर कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट पक्षकारों के पास है, वे चाहें तो इसे लेकर अपने सुझाव, आपत्ति 16 मार्च से पहले लिखित में कोर्ट में दे सकते हैं। आपत्ति, सुझाव पर सुनवाई के बाद कोर्ट इस मामले को अंतिम सुनवाई के लिए नियत कर देगी।

बता दें कि भोजशाला मामले को लेकर हाई कोर्ट में चार याचिकाएं और एक अपील चल रही है। सोमवार को इन सभी की सुनवाई एक साथ हुई। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को आदेश दिया था कि वह ज्ञानवापी की तरह भोजशाला का भी विज्ञानी सर्वे कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

यह सर्वे 98 दिन चला जिसके बाद एएसआई ने 2189 पेज की सर्वे रिपोर्ट तैयार की थी। 4 जुलाई 2024 को हाई कोर्ट के आदेश पर इस रिपोर्ट की प्रतिलिपि सभी पक्षकारों को उपलब्ध करवाई गई थी। इस बीच यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया जिसके बाद कोर्ट ने रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रखने के आदेश दिए थे।

जिन पक्षकारों के पास एएसआई सर्वे रिपोर्ट की प्रति है उन्होंने बताया कि-एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सर्वे में पाए गए स्तंभों और स्तंभों की कला और वास्तुकला से यह कहा जा सकता है ये स्तंभ पहले मंदिर का हिस्सा थे, बाद में मस्जिद के स्तंभ बनाते समय उनका पुन: उपयोग किया गया था।

मौजूदा संरचना में चारों दिशाओं खड़े 106 और आड़े 82 इस तरह से कुल 188 स्तंभ मिले हैं। इन सभी की वास्तुकला से इस बात की पुष्टि होती है कि ये स्तंभ मूल रूप से मंदिरों का ही हिस्सा थे।

उन्हें वर्तमान संरचना के लिए पुनर्उपयोग में लाने के लिए उन पर उकेरी गई देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को विकृत कर दिया गया।

मानव और जानवरों की कई आकृतियां, जिन्हें मस्जिदों में रखने की अनुमति नहीं है, उन्हें छैनी जैसे किसी वस्तु का इस्तेमाल कर विकृत किया गया था।

एएसआई ने रिपोर्ट में यह दावा भी किया है कि मौजूदा संरचना में संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे कई शिलालेख मिले हैं, जो भोजशाला के ऐतिहासिक, साहित्यिक और शैक्षिक महत्व को उजागर करते हैं।

एएसआई टीम को सर्वे में एक ऐसा शिलालेख मिला जिस पर परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख है। नरवर्मन ने 1094-1133 इस्वी के बीच शासन किया था। सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि पश्चिम क्षेत्र में लगाए गए कई स्तंभों पर उकेरे गए ”कीर्तिमुख”, मानव, पशु और मिश्रित चेहरों वाले सजावटी सामग्री को नष्ट नहीं किया गया था।

विश्व हिंदू परिषद् के प्रयासों से ओडिशा के सुंदरगढ़ में 210 जनजातीय लोगों ने की हिंदू धर्म में घर वापसी

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के करुआ बहाल में रविवार (23 फरवरी 2026) को विश्व हिंदू परिषद के तत्वावधान मे ‘आंचलिक जनजाति धर्मरक्षा महायज्ञ’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय ‘घर वापसी’ प्रमुख प्रबल प्रताप सिंह जूदेव के नेतृत्व में 210 जनजातीय लोगों की वैदिक मंत्रोच्चार और यज्ञ के माध्यम से हिंदू धर्म में घर वापसी कराई गई।

आयोजन स्वर्गीय कुमार दिलीप सिंह जूदेव की प्रेरणा से संचालित अभियान के तहत किया गया, जिसे उनके पुत्र प्रबल प्रताप सिंह जूदेव आगे बढ़ा रहे हैं। श्रद्धानंद जी के अवतरण दिवस पर प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने वैदिक मंत्र उच्चारण, यज्ञ के बाद मतांतरित लोगों के पाँव पखारकर सनातन धर्म में उनका स्वागत किया।

‘जनजातीय समाज’ भारत का आधार स्तंभ: प्रबल जूदेव

इस अवसर पर प्रबल जूदेव ने कहा, “जनजातीय समाज भारत के आधार स्तम्भ हैँ इसीलिए राष्ट्र विरोधी ताकतें इनको टारगेट करते हैँ। ओडिशा के जनजाति अपने गौरवपूर्ण पूर्वजों के इतिहास एवं योगदान को नहीं भूले। ओडिशा के कई अमर स्वतंत्रता सेनानी जैसे वीर सुरेंद्र साई, डोरा बिसोयी, चक्र बिसोयी, रिंडो माझी, धरणीधर नायक जैसे जनजाति योद्धाओं ने अंतिम साँस तक अंग्रेजो से जंग की और माँ भारती की रक्षा की।”

उन्होंने आगे कहा, “आज अंग्रेज खदेड़ दिए गए परन्तु मतांतरण का बीज बो दिया, जो हमारे धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। हमें संगठित होकर राष्ट्र विरोधी आसुरी शक्तियों से लड़ना होगा। जनजातीय हिंदू समाज की एकता ही राष्ट्र की शक्ति है।”

कार्यक्रम के दौरान ओडिशा के जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का भी उल्लेख किया गया और समाज को संगठित रहने का आह्वान किया गया।

साभार-https://hindi.opind   से

‘बतरस’ में बह निकली प्रेम की धाराएँ

मुंबई। शरत् ऋतु के मदनोत्सव और ‘वेलेंटाइन डे’ दोनो के उपलक्ष्य में ‘बतरस’ ने फ़रवरी महीने में ‘है प्रेम जगत में सार’ कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें मुम्बई के गोरेगाँव उपनगर में स्थित ‘केशव गोरे स्मारक भवन’ की छत विविधरूपी प्रेम-चर्चा से गुंजायमान हो उठी।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध कवि श्री विनोद दास जी ने ‘बतरस’ के साथ अपने आत्मीय संबंधों को याद करते हुए बताया कि वर्ष 2006 के आसपास जब इस कार्यक्रम की गोष्ठियाँ डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी के घर आयोजित होती थीं, तभी से उनका इससे जुड़ाव है। लगभग दो दशकों की इस निरंतरता पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की और डॉ.त्रिपाठी सहित बतरस-परिवार के सभी सदस्यों को साधुवाद दिया। विनोदजी ने वक्तव्य की शुरुआत इस सच से की कि “प्रेम पर बोला नहीं जाता, प्रेम किया जाता है।” प्रेम को शास्त्रीय बहस में बाँध देने से उसका रस कम हो जाता है, किंतु आज के समय में प्रेम पर चर्चा अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि समाज में घृणा और विभाजन का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। धर्म और जाति के आधार पर दूरी बढ़ाने वाली शक्तियों के बीच प्रेम पर संवाद करना एक सांस्कृतिक प्रतिरोध है।

श्री विनोदजी के अनुसार प्रेम की उत्पत्ति ‘आकर्षण’ या ‘लोभ’ से होती है। किसी के गुण, सौंदर्य या व्यक्तित्व से जो आकर्षण पैदा होता है, वही भाव गहन होकर सघन हो जाता है, तो प्रेम में रूपांतरित हो जाता है। शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि श्रृंगार ही प्रेम है, जिसमें संयोग और वियोग दोनों स्थितियाँ सम्मिलित हैं। कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में दुष्यंत-शकुंतला के प्रेम-विरह और पुनर्मिलन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना में प्रेम की गहरी परंपरा रही है। ‘भारत’ नामकरण भी प्रेम की सांस्कृतिक परिणति का ही परिणाम है।

‘वैलेंटाइन डे’ के प्रसंग में उन्होंने संत वैलेंटाइन का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेम की पक्षधरता के कारण उन्हें दंडित किया गया, जिससे सिद्ध होता है कि प्रेम सदैव सत्ता के लिए चुनौती रहा है। पाश्चात्य चिंतन से उन्होंने सुकरात और अरस्तू के विचारों का उल्लेख किया—जहाँ एक तरफ़ प्रेम को आदर्श की ओर ले जाने वाली शक्ति माना गया, वहीं इसके लिए सामाजिक सरोकार और नैतिकता को भी आवश्यक बताया गया। ज्याँ पॉल सार्त्र और सिमोन द बोउआर का संदर्भ देते हुए उन्होंने प्रेम में स्वतंत्रता और स्वायत्तता की अवधारणा को स्पष्टत: रेखांकित किया।

इस क्रम में हिंदी साहित्य में प्रेम के विविध रूपों की चर्चा करते हुए उन्होंने तुलसीदास के राम-सीता प्रसंग, कबीर के निर्गुण प्रेम, रीतिकालीन कवियों के दैहिक प्रेम, छायावाद में महादेवी वर्मा के आध्यात्मिक और नई कविता में व्यक्तिवादी प्रेम का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज प्रेम को पूरी स्वतंत्रता नहीं देता। उन्होंने शादी-प्रथा को प्रेम व यौन-आकांक्षा बनाम समाज के बीच संतुलन-नियंत्रण का साधन माना।

वक्तव्य के अंत में विनोद दास जी ने अपने काव्य-संग्रह ‘पतझड़ में प्रेम’, से इस शीर्षक कविता के साथ ‘गाँठ’ एवं ‘चालीस साल’ शीर्षक कविताओं का पाठ भी किया, जिनमें प्रेम के अनुभूत, परिपक्व और जीवनानुभव से जुड़े विविध आयामों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है॰॰॰। इस प्रकार उनका वक्तव्य प्रेम की सांस्कृतिक, दार्शनिक और साहित्यिक यात्रा का समग्र परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता हुए समकालीन संदर्भों में प्रेम की आवश्यकता को रेखांकित करने वाला सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम का वातावरण प्रेम और साहित्यिक सरसता से ओतप्रोत रहा। विविध विधाओं और स्वरों से सजी इस सांस्कृतिक संध्या ने उपस्थित श्रोताओं को भावनाओं के अनेक रंगों से परिचित कराया। कार्यक्रम का आरंभ शायर कृष्णा गौतम की प्रभावपूर्ण स्वरचित ग़ज़ल से हुआ। इसके पश्चात् कवयित्री अर्चना वर्मा सिंह ने गगन गिल की चर्चित कविता ‘प्रेम में लड़की शोक करती है’ का पाठ किया तथा अपनी स्वरचित कविता भी प्रस्तुत कर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।

कवि नीरज ने सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता ‘हे मेरी तुम’ का भावपूर्ण पाठ किया और साथ ही अपनी एक नज़्म सुनाकर कार्यक्रम में आत्मीयता का रंग घोला। कवयित्री अम्बिका झा ने वीरेन डंगवाल की कविता ‘प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं’ की प्रस्तुति के साथ अपनी स्वरचित कविता भी सुनायी। कवि अनिल गौड़ ने घनानंद के सवैये ‘अति सूधो सनेह को मार्ग है…’ का प्रभावशाली पाठ के साथ अपनी कविता भी पेश की। कवयित्री रीमा राय सिंह एवं लेखक विराट गुप्ता ने अपनी रचनाएं सुनायी। अपने सदाबहार निराले अंदाज़ में जवाहरलाल निर्झर ने लोकगीत सुनाकर सभी का मन मोह लिया। कमर हाजीपुरी के प्रेमगीत ने वातावरण को और अधिक भावमय बना दिया।

संगीत की धारा को आगे बढ़ाते हुए दीपक खेर जी ने फिल्म ‘संगम’ का प्रसिद्ध गीत “मेरा प्रेम पत्र पढ़ करके तुम नाराज़ न होना” गाकर श्रोताओं को रोमांचित कर दिया। प्रज्ञा मिश्रा ने नरेंद्र शर्मा की कविता ‘आज के बिछड़े न जाने कब मिलेंगे’ को संगीतबद्ध कर सुरमयी प्रस्तुति दी। अध्यापिका डॉ॰ जया दयाल ने सुरेश भट्ट लिखित एवं हृदयनाथ मंगेशकर के संगीत में लताजी द्वारा गाया मराठी गीत “मालवून टाक दीप” के भावपूर्ण गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का एक विशेष आकर्षण रहा प्राचार्य एवं कला-प्रेमी बृजेश सिंह का प्रस्तुतीकरण। उन्होंने सूरदास का पद ‘बूझत श्याम कौन तू गोरी’ इतनी लय और ताल के साथ प्रस्तुत किया कि दर्शकों की तालियाँ देर तक गूँजती रहीं।

वॉयस एक्टर सोनू पाहुजा ने अखलाक अहमद ज़ई की प्रेम कहानी ‘कटीले तारों का प्रेम’ का सशक्त पाठ किया। रंगकर्मी प्रमोद सचान ने सुरेंद्र वर्मा के नाटक ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ के प्रेमी राजा ‘ओक्काक’ को मंच पर जीवंत कर दिया, जिसे दर्शकों से ने विशेष सराहना मिली।

अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद प्रसिद्ध मंच अभिकल्पक (सेट डिज़ाइनर) एवं सुपरिचित रंग-निर्देशक जयंत देशमुख ने ‘बतरस’ को शुभकामनाएँ देते हुए कहा— “मेरे लिए प्रेम, बस प्रेम ही है…”। उनकी उपस्थिति एवं आत्मीय टिप्पणी बतरस-परिवार के लिए आत्मीय ऊष्मा प्रदान करने जैसी रही।

कार्यक्रम का आयोजन डॉ. मधुबाला शुक्ल ने किया था और अपने विशिष्ट एवं आत्मीय अंदाज़ में संचालन किया – मंच व मीडिया की युवा अभिनेत्री शाइस्ता खान ने। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

(लेखिका डॉ. मधुबाला शुक्ल एक प्रख्यात हिंदी साहित्यकार, समीक्षक और अध्येता हैं, जो अपनी संतुलित और तार्किक साहित्यिक समीक्षा के लिए जानी जाती हैं। उनकी प्रमुख कृति ‘कसौटी पर कृतियाँ’ में उन्होंने कालजयी साहित्यिक कृतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वे मुंबई में ‘बतरस’ और ‘चित्रनगरी संवाद मंच’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से साहित्यिक चर्चाओं से जुड़ी हैं।)

पैक्स सिलिका में भारत का होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि

इक्कीसवीं सदी का यह दौर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और तकनीकी आपूर्ति शृंकखलाओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दौर बन चुका है। ऐसे समय में भारत द्वारा एआई शिखर सम्मेलन का सफल आयोजन और उसके तुरंत बाद अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह पैक्स सिलिका से औपचारिक रूप से जुड़ना केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी और रणनीतिक कदम है। यह उस नए भारत की घोषणा है जो तकनीकी शक्ति, नैतिक दृष्टि और वैश्विक संतुलन-तीनों को साथ लेकर चलने का सामर्थ्य अर्जित कर रहा है। एआई समिट के माध्यम से भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अब केवल तकनीक का उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, बल्कि निर्माता और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। दुनिया की तीसरी बड़ी एआई शक्ति बनने की दिशा में यह एक ठोस चरणन्यास है।

दुर्लभ खनिजों और सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का लगभग 90 प्रतिशत वर्चस्व पिछले कुछ वर्षों से वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। कंप्यूटर चिप से लेकर रक्षा प्रणालियों और अंतरिक्ष तकनीक तक, हर क्षेत्र इन संसाधनों पर निर्भर है। इस पृष्ठभूमि में पैक्स सिलिका जैसे मंच की परिकल्पना एक संतुलित, विश्वसनीय और बहु-धु्रवीय तकनीकी ढांचे के रूप में की गई है। भारत का इस समूह में शामिल होना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि रणनीतिक और अनिवार्य निर्णय है। भारत की इंजीनियरिंग क्षमता, विशाल युवा प्रतिभा और उभरता हुआ सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम इस गठबंधन को नई मजबूती प्रदान करेगा। यह पहल किसी के विरुद्ध आक्रामकता नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में संतुलन और विविधता स्थापित करने का प्रयास है। जब शक्ति का केंद्रीकरण टूटता है और साझेदारी का विस्तार होता है, तभी विश्व व्यवस्था स्थिर और संतुलित बनती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत ने तकनीक को शासन और विकास के केंद्र में स्थापित किया है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और सेमीकंडक्टर मिशन जैसी पहलों ने एक मजबूत आधार तैयार किया है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के लिए एक मॉडल बन चुका है। आधार, यूपीआई और डिजिटल सेवाओं ने करोड़ों लोगों को आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ा है। इसी आधार पर एआई और चिप निर्माण के क्षेत्र में महत्वाकांक्षी कदम उठाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री की सक्रियता और वैश्विक मंचों पर भारत की प्रभावी उपस्थिति ने देश को एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित किया है। उनका दृष्टिकोण केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ने का है।

भारत में चिप डिजाइन, निर्माण और एआई अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बड़े निवेश आकर्षित किए जा रहे हैं। वैश्विक कंपनियाँ भारत को स्थिर लोकतंत्र, कुशल मानव संसाधन और दीर्घकालिक नीति स्थिरता वाले देश के रूप में देख रही हैं। पैक्स सिलिका जैसे अंतरराष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा बनने से भारत को तकनीकी सहयोग, संयुक्त अनुसंधान, पूंजी निवेश और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण में व्यापक लाभ मिलेगा। इससे न केवल चीन पर निर्भरता कम होगी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता भी सुदृढ़ होगी। यह भागीदारी भारत को अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों जैसी प्रमुख तकनीकी शक्तियों के साथ और अधिक निकटता से जोड़ेगी, जिससे वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भारत की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ेगी। भारत की विशेषता केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि भी है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से प्रेरित भारत एआई को मानव-केंद्रित विकास का माध्यम बनाना चाहता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में एआई के उपयोग से व्यापक जनकल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है।

यदि तकनीक कुछ शक्तियों के हाथों में सिमट जाए तो असंतुलन बढ़ता है, किंतु जब लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र इसका नेतृत्व करते हैं तो यह वैश्विक कल्याण का साधन बन सकती है। भारत का प्रयास है कि एआई के नैतिक मानदंड सार्वभौमिक हों और तकनीक का उपयोग हथियार के रूप में नहीं, बल्कि मानव प्रगति के साधन के रूप में हो।

भारत की दृष्टि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी प्रगति का उपकरण नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के विस्तार का माध्यम है। जिस देश ने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का मंत्र दिया, जिसने करुणा, अहिंसा और सह-अस्तित्व की परंपरा को जीवन-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया, वह एआई को भी केवल बाज़ार और प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि मानव कल्याण और वैश्विक संतुलन के संदर्भ में देखता है। भारत की सभ्यता-चेतना, जो महात्मा गांधी की अहिंसा और गौतम बुद्ध की करुणा से अनुप्राणित है, तकनीकी विकास को नैतिक अनुशासन से जोड़ने की प्रेरणा देती है। यहाँ विकास का अर्थ केवल गति नहीं, बल्कि दिशा भी है; केवल क्षमता नहीं, बल्कि संवेदना भी है।

यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जीवन की समग्रता-प्रकृति, समाज और मानव गरिमा के साथ जोड़ा जाए, तो भारत विश्व संरचना में ऐसा संतुलित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है जो तकनीक को विनाश का कारण बनने से रोककर उसे सृजन, समावेशन और मानव उत्कर्ष का सशक्त साधन बना दे।

आज दुनिया दो धु्रवों के बीच खड़ी दिखाई देती है-एक ओर केंद्रीकृत तकनीकी वर्चस्व, दूसरी ओर साझेदारी और संतुलन का मॉडल। भारत का उभार इस द्वंद्व को संतुलन में बदलने की क्षमता रखता है। भारत न टकराव की राह पर है, न निष्क्रियता कीय वह सक्रिय संतुलन की नीति अपना रहा है। यह संतुलन ही भविष्य की शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था का आधार बन सकता है। पैक्स सिलिका के माध्यम से भारत और उसके सहयोगी एक ऐसी नई दिशा दे सकते हैं जहाँ तकनीकी नवाचार का लाभ वैश्विक दक्षिण तक पहुँचे, आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शी हो और वैश्विक शक्ति-संतुलन स्थिर रहे। निस्संदेह, यह समय भारत के लिए ऐतिहासिक है। एआई और सेमीकंडक्टर के इस युग में भारत का यह कदम उसकी आर्थिक और तकनीकी शक्ति को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उभरती यह तकनीकी और एआई क्रांति न केवल भारत को सशक्त बना रही है, बल्कि विश्व को भी संतुलन और सहयोग की नई राह दिखा रही है। आने वाले वर्षों में यह साझेदारी नई सृष्टि का आधार बन सकती है-एक ऐसी सृष्टि जहाँ तकनीक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि समन्वय और शांति का माध्यम बने। भारत इस दिशा में दृढ़ता से अग्रसर है और विश्व नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए स्वयं को सक्षम बना रहा है।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
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हिंदू कालेज में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन

दिल्ली। हिंदू कालेज में राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषाओं में अध्ययन अध्यापन के संकल्प का स्मरण करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए मातृभाषाओं का सम्मान सबसे आवश्यक है।

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता के रूप में दर्शन शास्त्र की सह आचार्य डॉ अनन्या बरुआ ने कहा मातृभाषा में पढ़ना और सीखना अधिक बोधगम्य है जो हमारी क्षमताओं को और अधिक पढ़ाएगा। उन्होंने अपनी मातृभाषा असमिया में कुछ पदों का गायन करते हुए कहा कि साहित्य के साथ साथ विज्ञान और सामाजिकी में भी मातृभाषाओं के अधिकाधिक व्यवहार की जरूरत है। डॉ बरुआ ने भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि अकेले मणिपुर में ही अनेक आदिवासी भाषाएं हैं जिनमें देशज ज्ञान का भंडार है।

संस्कृत के शिक्षक डॉ पूरणमल वर्मा ने इस अवसर पर राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयं सेवकों को मातृभाषा में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि मातृभाषाओं का सम्मान हम सबका सामूहिक कर्त्तव्य है। डॉ वर्मा ने राजस्थानी की एक लोककथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित नैतिक मूल्यों की चर्चा भी की। संगोष्ठी में डॉ देवांशी मग्गू ने कहा कि घर में बोली जाने वाली भाषा वृहद ज्ञान, कौशल और अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके इसके लिए उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को आगे आना होगा। इससे पहले राष्ट्रीय सेवा योजना के अध्यक्ष निशांत सिंह ने प्राचार्य प्रो अंजू श्रीवास्तव का मातृ भाषा पर संदेश का वाचन किया, जिसमें बताया गया कि हिंदू कालेज में ही देश भर में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं के विद्यार्थी हैं जो मिलकर मातृ भाषा के हमारे सभी संकल्पों को पूरा कर सकते हैं।

राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डॉ पल्लव ने इस अवसर पर बताया कि महाविद्यालय की इकाई ने देश की अनेक भाषाओं को बोलने जानने वाले विद्यार्थियों को आपस में इन भाषाओं को सीखने और अधिकाधिक व्यवहार के लिए प्रोत्साहित करने के लिए गतिविधियों का आयोजन किया है। हिन्दी विभाग प्रभारी प्रो बिमलेंदु तीर्थंकर, डॉ नीलम सिंह सहित अन्य शिक्षकों ने भी संगोष्ठी में विचार व्यक्त किए। इससे पहले राष्ट्रीय सेवा योजना उपाध्यक्ष नेहा यादव ने सभी का फूलों का गुलदस्ता देकर स्वागत किया।
अंत में अध्यक्ष निशांत सिंह ने आभार व्यक्त किया।

अर्चिता द्विवेदी
जन संपर्क प्रमुख
राष्ट्रीय सेवा योजना
हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली
मो -9452536877