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विश्व हिंदू परिषद् के प्रयासों से ओडिशा के सुंदरगढ़ में 210 जनजातीय लोगों ने की हिंदू धर्म में घर वापसी

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के करुआ बहाल में रविवार (23 फरवरी 2026) को विश्व हिंदू परिषद के तत्वावधान मे ‘आंचलिक जनजाति धर्मरक्षा महायज्ञ’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के तहत छत्तीसगढ़ में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय ‘घर वापसी’ प्रमुख प्रबल प्रताप सिंह जूदेव के नेतृत्व में 210 जनजातीय लोगों की वैदिक मंत्रोच्चार और यज्ञ के माध्यम से हिंदू धर्म में घर वापसी कराई गई।

आयोजन स्वर्गीय कुमार दिलीप सिंह जूदेव की प्रेरणा से संचालित अभियान के तहत किया गया, जिसे उनके पुत्र प्रबल प्रताप सिंह जूदेव आगे बढ़ा रहे हैं। श्रद्धानंद जी के अवतरण दिवस पर प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने वैदिक मंत्र उच्चारण, यज्ञ के बाद मतांतरित लोगों के पाँव पखारकर सनातन धर्म में उनका स्वागत किया।

‘जनजातीय समाज’ भारत का आधार स्तंभ: प्रबल जूदेव

इस अवसर पर प्रबल जूदेव ने कहा, “जनजातीय समाज भारत के आधार स्तम्भ हैँ इसीलिए राष्ट्र विरोधी ताकतें इनको टारगेट करते हैँ। ओडिशा के जनजाति अपने गौरवपूर्ण पूर्वजों के इतिहास एवं योगदान को नहीं भूले। ओडिशा के कई अमर स्वतंत्रता सेनानी जैसे वीर सुरेंद्र साई, डोरा बिसोयी, चक्र बिसोयी, रिंडो माझी, धरणीधर नायक जैसे जनजाति योद्धाओं ने अंतिम साँस तक अंग्रेजो से जंग की और माँ भारती की रक्षा की।”

उन्होंने आगे कहा, “आज अंग्रेज खदेड़ दिए गए परन्तु मतांतरण का बीज बो दिया, जो हमारे धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। हमें संगठित होकर राष्ट्र विरोधी आसुरी शक्तियों से लड़ना होगा। जनजातीय हिंदू समाज की एकता ही राष्ट्र की शक्ति है।”

कार्यक्रम के दौरान ओडिशा के जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का भी उल्लेख किया गया और समाज को संगठित रहने का आह्वान किया गया।

साभार-https://hindi.opind   से

‘बतरस’ में बह निकली प्रेम की धाराएँ

मुंबई। शरत् ऋतु के मदनोत्सव और ‘वेलेंटाइन डे’ दोनो के उपलक्ष्य में ‘बतरस’ ने फ़रवरी महीने में ‘है प्रेम जगत में सार’ कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें मुम्बई के गोरेगाँव उपनगर में स्थित ‘केशव गोरे स्मारक भवन’ की छत विविधरूपी प्रेम-चर्चा से गुंजायमान हो उठी।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध कवि श्री विनोद दास जी ने ‘बतरस’ के साथ अपने आत्मीय संबंधों को याद करते हुए बताया कि वर्ष 2006 के आसपास जब इस कार्यक्रम की गोष्ठियाँ डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी के घर आयोजित होती थीं, तभी से उनका इससे जुड़ाव है। लगभग दो दशकों की इस निरंतरता पर उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की और डॉ.त्रिपाठी सहित बतरस-परिवार के सभी सदस्यों को साधुवाद दिया। विनोदजी ने वक्तव्य की शुरुआत इस सच से की कि “प्रेम पर बोला नहीं जाता, प्रेम किया जाता है।” प्रेम को शास्त्रीय बहस में बाँध देने से उसका रस कम हो जाता है, किंतु आज के समय में प्रेम पर चर्चा अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि समाज में घृणा और विभाजन का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। धर्म और जाति के आधार पर दूरी बढ़ाने वाली शक्तियों के बीच प्रेम पर संवाद करना एक सांस्कृतिक प्रतिरोध है।

श्री विनोदजी के अनुसार प्रेम की उत्पत्ति ‘आकर्षण’ या ‘लोभ’ से होती है। किसी के गुण, सौंदर्य या व्यक्तित्व से जो आकर्षण पैदा होता है, वही भाव गहन होकर सघन हो जाता है, तो प्रेम में रूपांतरित हो जाता है। शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि श्रृंगार ही प्रेम है, जिसमें संयोग और वियोग दोनों स्थितियाँ सम्मिलित हैं। कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में दुष्यंत-शकुंतला के प्रेम-विरह और पुनर्मिलन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना में प्रेम की गहरी परंपरा रही है। ‘भारत’ नामकरण भी प्रेम की सांस्कृतिक परिणति का ही परिणाम है।

‘वैलेंटाइन डे’ के प्रसंग में उन्होंने संत वैलेंटाइन का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेम की पक्षधरता के कारण उन्हें दंडित किया गया, जिससे सिद्ध होता है कि प्रेम सदैव सत्ता के लिए चुनौती रहा है। पाश्चात्य चिंतन से उन्होंने सुकरात और अरस्तू के विचारों का उल्लेख किया—जहाँ एक तरफ़ प्रेम को आदर्श की ओर ले जाने वाली शक्ति माना गया, वहीं इसके लिए सामाजिक सरोकार और नैतिकता को भी आवश्यक बताया गया। ज्याँ पॉल सार्त्र और सिमोन द बोउआर का संदर्भ देते हुए उन्होंने प्रेम में स्वतंत्रता और स्वायत्तता की अवधारणा को स्पष्टत: रेखांकित किया।

इस क्रम में हिंदी साहित्य में प्रेम के विविध रूपों की चर्चा करते हुए उन्होंने तुलसीदास के राम-सीता प्रसंग, कबीर के निर्गुण प्रेम, रीतिकालीन कवियों के दैहिक प्रेम, छायावाद में महादेवी वर्मा के आध्यात्मिक और नई कविता में व्यक्तिवादी प्रेम का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज प्रेम को पूरी स्वतंत्रता नहीं देता। उन्होंने शादी-प्रथा को प्रेम व यौन-आकांक्षा बनाम समाज के बीच संतुलन-नियंत्रण का साधन माना।

वक्तव्य के अंत में विनोद दास जी ने अपने काव्य-संग्रह ‘पतझड़ में प्रेम’, से इस शीर्षक कविता के साथ ‘गाँठ’ एवं ‘चालीस साल’ शीर्षक कविताओं का पाठ भी किया, जिनमें प्रेम के अनुभूत, परिपक्व और जीवनानुभव से जुड़े विविध आयामों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है॰॰॰। इस प्रकार उनका वक्तव्य प्रेम की सांस्कृतिक, दार्शनिक और साहित्यिक यात्रा का समग्र परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता हुए समकालीन संदर्भों में प्रेम की आवश्यकता को रेखांकित करने वाला सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम का वातावरण प्रेम और साहित्यिक सरसता से ओतप्रोत रहा। विविध विधाओं और स्वरों से सजी इस सांस्कृतिक संध्या ने उपस्थित श्रोताओं को भावनाओं के अनेक रंगों से परिचित कराया। कार्यक्रम का आरंभ शायर कृष्णा गौतम की प्रभावपूर्ण स्वरचित ग़ज़ल से हुआ। इसके पश्चात् कवयित्री अर्चना वर्मा सिंह ने गगन गिल की चर्चित कविता ‘प्रेम में लड़की शोक करती है’ का पाठ किया तथा अपनी स्वरचित कविता भी प्रस्तुत कर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।

कवि नीरज ने सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता ‘हे मेरी तुम’ का भावपूर्ण पाठ किया और साथ ही अपनी एक नज़्म सुनाकर कार्यक्रम में आत्मीयता का रंग घोला। कवयित्री अम्बिका झा ने वीरेन डंगवाल की कविता ‘प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं’ की प्रस्तुति के साथ अपनी स्वरचित कविता भी सुनायी। कवि अनिल गौड़ ने घनानंद के सवैये ‘अति सूधो सनेह को मार्ग है…’ का प्रभावशाली पाठ के साथ अपनी कविता भी पेश की। कवयित्री रीमा राय सिंह एवं लेखक विराट गुप्ता ने अपनी रचनाएं सुनायी। अपने सदाबहार निराले अंदाज़ में जवाहरलाल निर्झर ने लोकगीत सुनाकर सभी का मन मोह लिया। कमर हाजीपुरी के प्रेमगीत ने वातावरण को और अधिक भावमय बना दिया।

संगीत की धारा को आगे बढ़ाते हुए दीपक खेर जी ने फिल्म ‘संगम’ का प्रसिद्ध गीत “मेरा प्रेम पत्र पढ़ करके तुम नाराज़ न होना” गाकर श्रोताओं को रोमांचित कर दिया। प्रज्ञा मिश्रा ने नरेंद्र शर्मा की कविता ‘आज के बिछड़े न जाने कब मिलेंगे’ को संगीतबद्ध कर सुरमयी प्रस्तुति दी। अध्यापिका डॉ॰ जया दयाल ने सुरेश भट्ट लिखित एवं हृदयनाथ मंगेशकर के संगीत में लताजी द्वारा गाया मराठी गीत “मालवून टाक दीप” के भावपूर्ण गायन से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का एक विशेष आकर्षण रहा प्राचार्य एवं कला-प्रेमी बृजेश सिंह का प्रस्तुतीकरण। उन्होंने सूरदास का पद ‘बूझत श्याम कौन तू गोरी’ इतनी लय और ताल के साथ प्रस्तुत किया कि दर्शकों की तालियाँ देर तक गूँजती रहीं।

वॉयस एक्टर सोनू पाहुजा ने अखलाक अहमद ज़ई की प्रेम कहानी ‘कटीले तारों का प्रेम’ का सशक्त पाठ किया। रंगकर्मी प्रमोद सचान ने सुरेंद्र वर्मा के नाटक ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ के प्रेमी राजा ‘ओक्काक’ को मंच पर जीवंत कर दिया, जिसे दर्शकों से ने विशेष सराहना मिली।

अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद प्रसिद्ध मंच अभिकल्पक (सेट डिज़ाइनर) एवं सुपरिचित रंग-निर्देशक जयंत देशमुख ने ‘बतरस’ को शुभकामनाएँ देते हुए कहा— “मेरे लिए प्रेम, बस प्रेम ही है…”। उनकी उपस्थिति एवं आत्मीय टिप्पणी बतरस-परिवार के लिए आत्मीय ऊष्मा प्रदान करने जैसी रही।

कार्यक्रम का आयोजन डॉ. मधुबाला शुक्ल ने किया था और अपने विशिष्ट एवं आत्मीय अंदाज़ में संचालन किया – मंच व मीडिया की युवा अभिनेत्री शाइस्ता खान ने। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

(लेखिका डॉ. मधुबाला शुक्ल एक प्रख्यात हिंदी साहित्यकार, समीक्षक और अध्येता हैं, जो अपनी संतुलित और तार्किक साहित्यिक समीक्षा के लिए जानी जाती हैं। उनकी प्रमुख कृति ‘कसौटी पर कृतियाँ’ में उन्होंने कालजयी साहित्यिक कृतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वे मुंबई में ‘बतरस’ और ‘चित्रनगरी संवाद मंच’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से साहित्यिक चर्चाओं से जुड़ी हैं।)

पैक्स सिलिका में भारत का होना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि

इक्कीसवीं सदी का यह दौर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और तकनीकी आपूर्ति शृंकखलाओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दौर बन चुका है। ऐसे समय में भारत द्वारा एआई शिखर सम्मेलन का सफल आयोजन और उसके तुरंत बाद अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह पैक्स सिलिका से औपचारिक रूप से जुड़ना केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी और रणनीतिक कदम है। यह उस नए भारत की घोषणा है जो तकनीकी शक्ति, नैतिक दृष्टि और वैश्विक संतुलन-तीनों को साथ लेकर चलने का सामर्थ्य अर्जित कर रहा है। एआई समिट के माध्यम से भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अब केवल तकनीक का उपभोक्ता राष्ट्र नहीं, बल्कि निर्माता और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। दुनिया की तीसरी बड़ी एआई शक्ति बनने की दिशा में यह एक ठोस चरणन्यास है।

दुर्लभ खनिजों और सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला पर चीन का लगभग 90 प्रतिशत वर्चस्व पिछले कुछ वर्षों से वैश्विक चिंता का विषय बना हुआ है। कंप्यूटर चिप से लेकर रक्षा प्रणालियों और अंतरिक्ष तकनीक तक, हर क्षेत्र इन संसाधनों पर निर्भर है। इस पृष्ठभूमि में पैक्स सिलिका जैसे मंच की परिकल्पना एक संतुलित, विश्वसनीय और बहु-धु्रवीय तकनीकी ढांचे के रूप में की गई है। भारत का इस समूह में शामिल होना केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि रणनीतिक और अनिवार्य निर्णय है। भारत की इंजीनियरिंग क्षमता, विशाल युवा प्रतिभा और उभरता हुआ सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम इस गठबंधन को नई मजबूती प्रदान करेगा। यह पहल किसी के विरुद्ध आक्रामकता नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में संतुलन और विविधता स्थापित करने का प्रयास है। जब शक्ति का केंद्रीकरण टूटता है और साझेदारी का विस्तार होता है, तभी विश्व व्यवस्था स्थिर और संतुलित बनती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत ने तकनीक को शासन और विकास के केंद्र में स्थापित किया है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और सेमीकंडक्टर मिशन जैसी पहलों ने एक मजबूत आधार तैयार किया है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के लिए एक मॉडल बन चुका है। आधार, यूपीआई और डिजिटल सेवाओं ने करोड़ों लोगों को आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ा है। इसी आधार पर एआई और चिप निर्माण के क्षेत्र में महत्वाकांक्षी कदम उठाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री की सक्रियता और वैश्विक मंचों पर भारत की प्रभावी उपस्थिति ने देश को एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित किया है। उनका दृष्टिकोण केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ने का है।

भारत में चिप डिजाइन, निर्माण और एआई अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए बड़े निवेश आकर्षित किए जा रहे हैं। वैश्विक कंपनियाँ भारत को स्थिर लोकतंत्र, कुशल मानव संसाधन और दीर्घकालिक नीति स्थिरता वाले देश के रूप में देख रही हैं। पैक्स सिलिका जैसे अंतरराष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा बनने से भारत को तकनीकी सहयोग, संयुक्त अनुसंधान, पूंजी निवेश और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण में व्यापक लाभ मिलेगा। इससे न केवल चीन पर निर्भरता कम होगी, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता भी सुदृढ़ होगी। यह भागीदारी भारत को अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय देशों जैसी प्रमुख तकनीकी शक्तियों के साथ और अधिक निकटता से जोड़ेगी, जिससे वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में भारत की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ेगी। भारत की विशेषता केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि भी है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से प्रेरित भारत एआई को मानव-केंद्रित विकास का माध्यम बनाना चाहता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में एआई के उपयोग से व्यापक जनकल्याण सुनिश्चित किया जा सकता है।

यदि तकनीक कुछ शक्तियों के हाथों में सिमट जाए तो असंतुलन बढ़ता है, किंतु जब लोकतांत्रिक और समावेशी राष्ट्र इसका नेतृत्व करते हैं तो यह वैश्विक कल्याण का साधन बन सकती है। भारत का प्रयास है कि एआई के नैतिक मानदंड सार्वभौमिक हों और तकनीक का उपयोग हथियार के रूप में नहीं, बल्कि मानव प्रगति के साधन के रूप में हो।

भारत की दृष्टि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी प्रगति का उपकरण नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के विस्तार का माध्यम है। जिस देश ने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का मंत्र दिया, जिसने करुणा, अहिंसा और सह-अस्तित्व की परंपरा को जीवन-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया, वह एआई को भी केवल बाज़ार और प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि मानव कल्याण और वैश्विक संतुलन के संदर्भ में देखता है। भारत की सभ्यता-चेतना, जो महात्मा गांधी की अहिंसा और गौतम बुद्ध की करुणा से अनुप्राणित है, तकनीकी विकास को नैतिक अनुशासन से जोड़ने की प्रेरणा देती है। यहाँ विकास का अर्थ केवल गति नहीं, बल्कि दिशा भी है; केवल क्षमता नहीं, बल्कि संवेदना भी है।

यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जीवन की समग्रता-प्रकृति, समाज और मानव गरिमा के साथ जोड़ा जाए, तो भारत विश्व संरचना में ऐसा संतुलित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है जो तकनीक को विनाश का कारण बनने से रोककर उसे सृजन, समावेशन और मानव उत्कर्ष का सशक्त साधन बना दे।

आज दुनिया दो धु्रवों के बीच खड़ी दिखाई देती है-एक ओर केंद्रीकृत तकनीकी वर्चस्व, दूसरी ओर साझेदारी और संतुलन का मॉडल। भारत का उभार इस द्वंद्व को संतुलन में बदलने की क्षमता रखता है। भारत न टकराव की राह पर है, न निष्क्रियता कीय वह सक्रिय संतुलन की नीति अपना रहा है। यह संतुलन ही भविष्य की शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था का आधार बन सकता है। पैक्स सिलिका के माध्यम से भारत और उसके सहयोगी एक ऐसी नई दिशा दे सकते हैं जहाँ तकनीकी नवाचार का लाभ वैश्विक दक्षिण तक पहुँचे, आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शी हो और वैश्विक शक्ति-संतुलन स्थिर रहे। निस्संदेह, यह समय भारत के लिए ऐतिहासिक है। एआई और सेमीकंडक्टर के इस युग में भारत का यह कदम उसकी आर्थिक और तकनीकी शक्ति को नई ऊँचाइयों पर ले जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उभरती यह तकनीकी और एआई क्रांति न केवल भारत को सशक्त बना रही है, बल्कि विश्व को भी संतुलन और सहयोग की नई राह दिखा रही है। आने वाले वर्षों में यह साझेदारी नई सृष्टि का आधार बन सकती है-एक ऐसी सृष्टि जहाँ तकनीक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि समन्वय और शांति का माध्यम बने। भारत इस दिशा में दृढ़ता से अग्रसर है और विश्व नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए स्वयं को सक्षम बना रहा है।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

हिंदू कालेज में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन

दिल्ली। हिंदू कालेज में राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषाओं में अध्ययन अध्यापन के संकल्प का स्मरण करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए मातृभाषाओं का सम्मान सबसे आवश्यक है।

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता के रूप में दर्शन शास्त्र की सह आचार्य डॉ अनन्या बरुआ ने कहा मातृभाषा में पढ़ना और सीखना अधिक बोधगम्य है जो हमारी क्षमताओं को और अधिक पढ़ाएगा। उन्होंने अपनी मातृभाषा असमिया में कुछ पदों का गायन करते हुए कहा कि साहित्य के साथ साथ विज्ञान और सामाजिकी में भी मातृभाषाओं के अधिकाधिक व्यवहार की जरूरत है। डॉ बरुआ ने भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि अकेले मणिपुर में ही अनेक आदिवासी भाषाएं हैं जिनमें देशज ज्ञान का भंडार है।

संस्कृत के शिक्षक डॉ पूरणमल वर्मा ने इस अवसर पर राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयं सेवकों को मातृभाषा में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि मातृभाषाओं का सम्मान हम सबका सामूहिक कर्त्तव्य है। डॉ वर्मा ने राजस्थानी की एक लोककथा के माध्यम से भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित नैतिक मूल्यों की चर्चा भी की। संगोष्ठी में डॉ देवांशी मग्गू ने कहा कि घर में बोली जाने वाली भाषा वृहद ज्ञान, कौशल और अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके इसके लिए उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को आगे आना होगा। इससे पहले राष्ट्रीय सेवा योजना के अध्यक्ष निशांत सिंह ने प्राचार्य प्रो अंजू श्रीवास्तव का मातृ भाषा पर संदेश का वाचन किया, जिसमें बताया गया कि हिंदू कालेज में ही देश भर में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं के विद्यार्थी हैं जो मिलकर मातृ भाषा के हमारे सभी संकल्पों को पूरा कर सकते हैं।

राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डॉ पल्लव ने इस अवसर पर बताया कि महाविद्यालय की इकाई ने देश की अनेक भाषाओं को बोलने जानने वाले विद्यार्थियों को आपस में इन भाषाओं को सीखने और अधिकाधिक व्यवहार के लिए प्रोत्साहित करने के लिए गतिविधियों का आयोजन किया है। हिन्दी विभाग प्रभारी प्रो बिमलेंदु तीर्थंकर, डॉ नीलम सिंह सहित अन्य शिक्षकों ने भी संगोष्ठी में विचार व्यक्त किए। इससे पहले राष्ट्रीय सेवा योजना उपाध्यक्ष नेहा यादव ने सभी का फूलों का गुलदस्ता देकर स्वागत किया।
अंत में अध्यक्ष निशांत सिंह ने आभार व्यक्त किया।

अर्चिता द्विवेदी
जन संपर्क प्रमुख
राष्ट्रीय सेवा योजना
हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली
मो -9452536877

निर्मला आर्य की पुस्तक नैवेद्य का लोकर्पण

कोटा । अखिल भारतीय साहित्य परिषद कोटा इकाई की वरिष्ठ साहित्य कारा श्री मती निर्मला आर्य की पुस्तक नैवैद्य कविता संग्रह का लोकार्पण दिनांक रविवार को मौजी बाबा धाम कोटा में किया गया । कार्यक्रम की मुख्य वक्ता मुख्य ब्लाक शिक्षा अधिकारी स्नेह लता शर्मा ने कृतिकार और कृति का परिचय देते हुए बताया कि पुस्तक में लिखी गई कविताएं विभिन्न विषयों के साथ साथ लोक कल्याण, तमस का नाश, सामाजिक विकृति दूर करने का संदेश देती है । लेखिका ने अपनी रचित कविता ” नारी संकल्प ” का पाठ किया ।
कार्यक्रम अध्यक्ष पूर्व महापौर महेश विजय , विशिष्ठ अतिथि चित्तौड़ प्रान्त के अध्यक्ष विष्णु शर्मा ‘हरिहर’ तथा विशिष्ट रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर कई सहित्यकार भगवती प्रसाद गोतम, जीतेन्द्र, निर्मोही, डॉ. प्रभात सिंघल , योगी राज योगी, नन्द किशोर अनमोल , काली चरण राजपूत, प्रेम शास्त्री, महेश पंचोली, रेखा पंचोली, अनुराधा, पल्लवी न्याती दरक, डॉ. इंदु बाला एवं कई अन्य साहित्यकार तथा सेवा निवृत प्राचार्य उपस्थित रहे । अंत में सहित्य परिषद कोटा इकाई के महा मंत्री राम मोहन कौशिक ने सभी आगन्तुकों का धन्यवाद अर्पित किया ।

अमेजन के ग्लोबल लीगल हेड डेविड ए. ज़ापोल्स्की का कीट-कीस दौरा

डेविड ए. ज़ापोल्स्की को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित

भुवनेश्वर। कीट डीम्ड विश्विद्यालय ने अमेज़न (यूएस) के चीफ ग्लोबल अफेयर्स एवं लीगल ऑफिसर डेविड ए. जापोस्की को एक विशेष समारोह में कीट प्रतिष्ठित लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया। इस अवसर पर कीट-कीस-कीम्स के संस्थापक महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर अच्युत सामंत तथा अमेज़न इंडिया के अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

कीट के कुलपति प्रो. सरनजीत सिंह के साथ विस्तृत संवाद में श्री ज़ापोल्स्की ने भारत में अमेज़न की बढ़ती भागीदारी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की परिवर्तनकारी क्षमता पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि अमेज़न ने भारत में अब तक लगभग 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है, जिसमें डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर और क्लाउड कंप्यूटिंग में बड़े निवेश शामिल हैं। कंपनी के डेटा सेंटर मुंबई और हैदराबाद में संचालित हो रहे हैं। पिछले वर्ष ही भारत में अपनी उपस्थिति को और सुदृढ़ करने के लिए अतिरिक्त 35 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई।

उन्होंने कहा, “AI के वैश्विक विमर्श को दिशा देने में भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भारत ने स्पष्ट रूप से बताया है कि वह AI के माध्यम से क्या हासिल करना चाहता है। हमारी भूमिका उस महत्वाकांक्षा को समर्थन देने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना है।”

4 करोड़ छात्रों तक AI एवं STEM शिक्षा

श्री ज़ापोल्स्की ने भारत सरकार के साथ अमेज़न की साझेदारी की घोषणा की, जिसके तहत देशभर के 4 करोड़ सरकारी स्कूलों के छात्रों तक AI और STEM शिक्षा पहुंचाई जाएगी। इस पहल का उद्देश्य अगली पीढ़ी को AI-सक्षम कार्यबल के रूप में तैयार करना है।

उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) पहल को कंपनी की मूल दक्षताओं से जोड़ना चाहिए। अमेज़न अपनी तकनीकी और लॉजिस्टिक क्षमताओं का उपयोग आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास में करने के लिए प्रतिबद्ध है।

AI गवर्नेंस पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि AI का पूर्ण प्रभाव अभी समझा जाना बाकी है, फिर भी संतुलित और विचारशील नियमन आवश्यक है। मजबूत अनुपालन ढांचे के माध्यम से तकनीक का नैतिक और जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चा करते हुए — जहाँ वे एक वैज्ञानिक और संगीतकार बनने की आकांक्षा से लेकर ब्रुकलिन में अभियोजक और बाद में अमेज़न के शीर्ष कार्यकारी बने — उन्होंने छात्रों को केवल प्रतिष्ठा या वेतन के पीछे न भागने की सलाह दी।

उन्होंने कहा-“अपने मन की आवाज़ सुनिए। वही कीजिए जो आपको खुशी दे। जब आप अपने जुनून का अनुसरण करते हैं, तो अवसर स्वयं आपके पास आते हैं।” उन्होंने छात्रों को निरंतर सीखते रहने और जिज्ञासु बने रहने का संदेश दिया।


विश्व के सबसे बड़े आदिवासी आवासीय विद्यालय की परिसर का भ्रमणः

अपने ऐतिहासिक दौरे के दौरान श्री ज़ापोल्स्की ने कीस परिसर का भी भ्रमण किया और छात्रों से आत्मीय संवाद किया। उन्होंने संस्थान की उल्लेखनीय प्रगति और आदिवासी सशक्तिकरण के क्षेत्र में उसके योगदान की सराहना की।

यह दौरा कीट-कीस के वैश्विक नेतृत्व के साथ बढ़ते संबंधों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण सिद्ध हुआ।

1898 में हुए पूर्ण सूर्यग्रहण के लिए जाने माने वैज्ञानिक जब बिहार के छोटे से गाँव डुमराँव में आए

“The Indian Eclipse 1898” एक वैज्ञानिक प्रकाशन है, जिसे British Astronomical Association (BAA) ने 1898 के भारत में दिखाई दिए पूर्ण सूर्यग्रहण के अध्ययन के आधार पर प्रकाशित किया था। यह पुस्तक 22 जनवरी 1898 को भारत में हुए पूर्ण सूर्यग्रहण (Total Solar Eclipse) के विस्तृत अवलोकनों और अनुसंधानों पर आधारित है।

यह ग्रहण भारत के मध्य और उत्तरी हिस्सों से होकर गुज़रा। इसे स्पष्ट रूप से डुमराँव में ही देखा गया था और यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि क्षेत्रों में भी दिखाई दिा था। ब्रिटेन और यूरोप के कई वैज्ञानिक दल विशेष रूप से भारत आए, क्योंकि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य का कोरोना (Corona) स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह पुस्तक 19वीं सदी के अंत की खगोल विज्ञान तकनीकों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उस समय फोटोग्राफी और स्पेक्ट्रोस्कोपी नई तकनीकें थीं—इस ग्रहण ने उनके उपयोग को आगे बढ़ाया।

भारत उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों के लिए यहाँ अभियान आयोजित करना संभव हुआ।

“The Indian Eclipse 1898” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि 19वीं सदी के खगोल विज्ञान के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसने सूर्यग्रहण अध्ययन, सौर कोरोना की समझ और खगोलीय फोटोग्राफी के विकास में योगदान दिया। 1898 के पूर्ण सूर्यग्रहण के भारत में सामाजिक प्रभाव और उस अभियान में शामिल प्रमुख वैज्ञानिकों के बारे में जानकारी इस पुस्तक में दी गई है।

19वीं सदी के भारत में सूर्यग्रहण को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था। बहुत से लोग गंगा-स्नान, मंत्र-जाप और दान-पुण्य करते थे। कई स्थानों पर लोग भोजन त्याग देते थे और ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करते थे। वैज्ञानिक दृष्टि और पारंपरिक मान्यताओं के बीच यह एक दिलचस्प समय था।

इतने वैज्ञानिकों के एक छोटे से गाँव में एकत्र हो जाना डुमरांव गाँव के लिए ही नहीं बल्कि आसपास के सैकड़ों गाँव के लेगों के लिए ये कुतुहल और रोमांच का विषय था।

ब्रिटिश वैज्ञानिकों के बड़े अभियान ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया।  इस सूर्यग्रहण की वजह से भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर आधुनिक उपकरणों (कैमरा, टेलीस्कोप, स्पेक्ट्रोस्कोप) का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ।  इससे शिक्षित वर्ग में खगोल विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ी।  उस समय के अंग्रेज़ी और भारतीय समाचार पत्रों में ग्रहण की व्यापक रिपोर्टिंग हुई।

प्रसिद्ध ब्रिटिश खगोलशास्त्री नॉर्मन लॉकयर  (Norman Lockyer) सूर्य के स्पेक्ट्रम और “हीलियम” तत्व की खोज से जुड़े।  1898 के ग्रहण अध्ययन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्पेक्ट्रोस्कोपी के अग्रणी वैज्ञानिकों में से एक विलियम हगिंस ( William Huggins) ने सूर्य के रासायनिक तत्वों का अध्ययन किया।  तब के भारत के जाने माने खगोलशास्त्री  केडी. नाएगामवाला (Kavasji Dadabhai Naegamvala)  भी इस दल के प्रमुख सदस्य थे।

यह अभियान अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग का उदाहरण बना।  भारत खगोलीय अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरा।  1898 का सूर्यग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं था, बल्कि धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद का क्षण था और  भारत में वैज्ञानिक चेतना बढ़ाने का अवसर बना। 1898 के पूर्ण सूर्यग्रहण के समय बिहार के डुमराँव (Dumraon) क्षेत्र का विशेष महत्व था, क्योंकि पूर्ण ग्रहण की पट्टी वहाँ से भी गुज़र रही थी। उस समय डुमराँव रियासत के शासक थे।

महाराजा राम रणविजय सिंह  डुमराँव राज, वर्तमान बिहार के बक्सर ज़िले में स्थित है।  महाराजा ने ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय वैज्ञानिकों का राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया।उनके ठहरने की व्यवस्था डुमराँव राजमहल या उसके आसपास की गई।  शाही आतिथ्य (भोजन, सुरक्षा, सेवक) उपलब्ध कराए गए।

ग्रहण देखने के लिए खुले और साफ़ मैदान की आवश्यकता थी। महाराजा ने अपने क्षेत्र में उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया। वैज्ञानिकों को टेलीस्कोप, कैमरा और अन्य उपकरण स्थापित करने में स्थानीय सहयोग मिला।

उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए स्थानीय रियासतों का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण था। महाराजा ने परिवहन, संचार और सुरक्षा की व्यवस्था में मदद की। स्थानीय जनता को अनुशासित रखने और वैज्ञानिक कार्य में बाधा न आने देने के निर्देश दिए गए।

19वीं सदी के अंत में भारतीय रियासतों के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों का स्वागत करना एक प्रतिष्ठा का विषय था। इससे डुमराँव रियासत की छवि एक प्रगतिशील और सहयोगी राज्य के रूप में उभरी। यह घटना परंपरा और आधुनिक विज्ञान के मिलन का प्रतीक बनी। डुमराँव जैसे छोटे रियासत क्षेत्र ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अभियान की मेजबानी की। इससे स्थानीय स्तर पर विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और जागरूकता बढ़ी। यह घटना आज भी क्षेत्र के इतिहास में गौरवपूर्ण मानी जाती है।

कोरोना (Corona) का अध्ययनः पूर्ण ग्रहण के दौरान सूर्य की बाहरी परत “कोरोना” दिखाई देती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि कोरोना की आकृति सूर्य की सौर गतिविधि (Sunspot cycle) से जुड़ी होती है।1898 के अवलोकन ने यह पुष्टि की कि कोरोना की संरचना स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है।

स्पेक्ट्रम विश्लेषण (Spectroscopy)ः स्पेक्ट्रोस्कोप से सूर्य के प्रकाश को विभिन्न रंगों में विभाजित किया गया। इससे कोरोना में उपस्थित गैसों के संकेत मिले। हीलियम जैसे तत्वों के अध्ययन में भी यह तकनीक उपयोगी रही।

19वीं सदी के अंत में खगोलीय फोटोग्राफी नई तकनीक थी। लंबा एक्सपोज़र (Exposure) देकर कोरोना की तस्वीरें ली गईं। ग्रहण के फोटो के लिए काँच की प्लेट (Glass Plate Negatives) का उपयोग किया गया। यह उस समय की सबसे उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों में से एक थी।

इस सूर्य ग्रहण का वैज्ञानकों को कोरोना की संरचना पर महत्वपूर्ण डेटा मिला। सूर्य के वातावरण के बारे में नई समझ विकसित हुई। भविष्य के ग्रहण अभियानों के लिए तकनीकी मार्गदर्शन मिला।

सूर्य का सौर चक्र चक्र = लगभग 11 साल में पूरा होता है। 1898 का ग्रहण वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे कोरोना, सौर गतिविधि सौर धब्बों की संख्या के बढ़ने व -घटने का अध्ययन हुआ। इसकी पूर्णता की पट्टी भारत के महत्वपूर्ण भागों से गुज़री।

डुमराँव राज का विस्तृत इतिहास
डुमराँव (वर्तमान बक्सर ज़िला, बिहार) एक ऐतिहासिक रियासत थी।
स्थापना और वंशः डुमराँव राज, उज्जैनिया राजपूत वंश से संबंधित माना जाता है।
यह वंश स्वयं को परमार (Paramara) वंश की शाखा मानता है।
16वीं–17वीं सदी में इस क्षेत्र में इनका प्रभाव स्थापित हुआ।

डुमराँव के शासक मुगल शासन के अधीन ज़मींदार/राजा के रूप में कार्य करते थे।
बदले में उन्हें कर देना पड़ता था, लेकिन स्थानीय प्रशासन पर उनका नियंत्रण रहता था।
1764 की Battle of Buxar के बाद बिहार पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ।
डुमराँव राज ब्रिटिश शासन के अधीन एक ज़मींदारी रियासत बन गया।
19वीं सदी में यह एक समृद्ध और प्रभावशाली ज़मींदारी थी।

महाराजा राम रणविजय सिंह 19वीं सदी के प्रमुख शासक थे।
डुमराँव संगीत परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध रहा। प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म डुमराँव में हुआ था।
स्वतंत्रता के बाद 1950 के बाद ज़मींदारी प्रथा समाप्त हुई।
डुमराँव राज की प्रशासनिक शक्ति खत्म हो गई, लेकिन ऐतिहासिक महत्व बना रहा।

गुरुकुलों की राख पर आरक्षण का महाभोज

जब शिक्षा मंत्रालय अपने आँकड़ों की स्वर्णिम थाली बजाता है और कहता है, “देखो! समावेशन का सूर्य उदित हो चुका है”। तभी धरती के किसी भूले-बिसरे ग्राम में एक जर्जर पाठशाला अपनी अंतिम साँस लेती है। पाँच वर्षों में अठारह हज़ार से अधिक (18,000+) गुरुकुल-सदृश विद्यालय लोक से विलुप्त हो गए, मानो किसी अदृश्य यज्ञ में उनकी आहुति दे दी गयी हो। एक दशक में तिरानबे हज़ार से अधिक (93,000+) शिक्षालय विलय के नाम पर निगल लिए गए। जैसे, शिक्षा नहीं, राज्य का कोई भूगोल सुधारा जा रहा हो।

उधर, निजी विद्यापीठों की इंद्रसभा में पुष्पवृष्टि हो रही है! एक ही वर्ष में आठ हज़ार से अधिक नवीन शुल्क-देवालय अवतरित हुए। जहाँ प्रवेश का मंत्र “फीस स्वाहा” है और ज्ञान की देवी का वाहन अब ईएमआई है। यह कलियुग का नया उपनिषद है, “जो देयकं ददाति, सः विद्यां लभते” या “यः शुल्कं ददाति, स एव विद्यां प्राप्नोति”।

इधर आरक्षण पर महासमर छिड़ा है। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने आदेश दिया है, कि हर विद्यापीठ में शिक़ायतों की समितियाँ बनें। मानो धर्मराज की न्यायसभा उतर आयी हो। सोशल मीडिया के क्षत्रिय की-बोर्डों पर शस्त्र उठाए खड़े हैं; कोई 15%, कोई 7.5%, कोई 27% का शंखनाद कर रहा है। संविधान के श्लोकों में अनुसूचित जाति को 15% और अनुसूचित जनजाति को 7.5% का वरदान मिला, फिर मंडल के महामंत्र से अन्य पिछड़े वर्गों को 27% का कवच प्राप्त हुआ। कुल मिलाकर अर्धशतक की मर्यादा। जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने “लक्ष्मण-रेखा” कहकर अंकित कर दिया। फिर 2019 में 10% का एक और वर, ‘आर्थिक रूप से दुर्बल सवर्णों के लिए’ मानो देवताओं की सभा में एक अतिरिक्त आसन जोड़ दिया गया हो।

परन्तु, हे नीति-पुरुषों! प्रश्न यह नहीं कि स्वर्ग के द्वार पर कितने प्रतिशत का पुष्पचिह्न अंकित है? प्रश्न यह है, कि पृथ्वी पर वह पगडंडी ही कहाँ है जो स्वर्ग-द्वार तक ले जाये? जब मूल विद्यालय ही बंद हो जाएँ, जब ग्राम की सरस्वती-धारा ही सूख जाये, तब ‘आरक्षण का अमृत-पात्र’ किसे और कहाँ प्रदान करोगे?
आप कहते हो, “देखो! भागीदारी बढ़ी है; 3.85 करोड़ से 4.13 करोड़ तक पहुँच गयी!” अहो, अद्भुत! किंतु, जिनके गाँव की पाठशाला विलीन हो गयी, जिनके घर से निकटतम विद्यालय अब सात कोस दूर हैं, जिनकी जेब में बस किराये का भी वरदान नहीं, उनके लिए यह संख्या-पुराण किस काम का? वह तो अभी वर्णमाला के द्वार पर ही खड़े हैं; तुम उन्हें विश्वविद्यालय के सिंहासन का स्वप्न दिखा रहे हो!
यह वैसा ही है, जैसे किसी वनवासी को कहो, “तुम्हारे लिए राजमहल में आधा आसन सुरक्षित है” …और उसी क्षण उसका वन ही नीलाम कर दो। पहले बीज छीनो, फिर फल पर वाद-विवाद करो; पहले गुरुकुल गिराओ, फिर ‘प्रवेश-प्रतिशत’ पर धर्मयुद्ध छेड़ दो! कलियुग की यह लीला अद्भुत है!
अंततः आरक्षण का प्रश्न तो महाभारत का चक्रव्यूह है; कौन भीतर जाए? कौन बाहर रहे? परंतु, उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, कि अभिमन्यु को युद्धभूमि तक पहुँचने का रथ मिला भी या नहीं? जब मूल शिक्षा ही विलुप्त हो रही हो, तब प्रतिशतों की यह बहस ऐसे है, जैसे शून्य में राजसूय यज्ञ; धुआँ बहुत, अग्नि नहीं; घोष बहुत, प्रकाश नहीं!

डॉ स्वाति चौधरी #drswatichoudhary के फेसबुक पेज https://www.facebook.com/share/p/1CRqUuCGN3/ से साभार

नर्मदाप्रसाद उपाध्याय और अतुल तारे को मिला ‘हिन्दी गौरव अलंकरण 2026’

इंदौर। ‘मातृभाषा उन्नयन संस्थान’ द्वारा प्रेस क्लब में हिन्दी गौरव अलंकरण समारोह आयोजित किया गया। आयोजन में वर्ष 2026 के हिन्दी गौरव अलंकरण से वरिष्ठ साहित्यकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय व वरिष्ठ पत्रकार श्री अतुल तारे को विभूषित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल विष्णु सदाशिव कोकजे व अध्यक्षता देवी अहिल्या विवि, इंदौर के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई ने की। इस मौके पर भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी विशेष अतिथि थे।

स्वागत उद्बोधन डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’ एवं संचालन डॉ. अखिलेश राव ने किया।

हिन्दी गौरव अलंकरण समारोह में काव्य साधकों में नागदा से कमलेश दवे, माण्डव से डॉ. पंकज प्रसून चौधरी, उज्जैन से निशा पण्डित, बड़नगर से पुष्पेंद्र जोशी पुष्प और भोपाल से शिवांगी प्रेरणा को काव्य गौरव अलंकरण प्रदान किया गया।

मुख्य अतिथि श्री कोकजे ने कहा कि ’प्राथमिक पढ़ाई मातृभाषाओं में होगी, तब ही प्रगति सम्भव होगी। इच्छाशक्ति के बलवान होने से भाषाओं का विस्तार होगा।’

कुलगुरु प्रो. सिंघई ने कहा कि ‘भविष्य की चिंताओं के बीच भी हिन्दी ज़िंदा रहेगी। और हिन्दी के साथ-साथ देवनागरी का साथ चाहिए।’

प्रोफेसर (डॉ.) संजय द्विवेदी ने कहा कि ‘भाषा और भारतीयता की चिंता आवश्यक है। भाषा नहीं बची तो हम भी नहीं बचेंगे।
उन्होंने कहा कि वैचारिक आत्मदैन्य से मुक्ति जरूरी है, इसने हमारे आत्मविश्वास को समाप्त कर दिया है। प्रोफेसर द्विवेदी ने कहा उपनिवेशवाद की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आजादी के आठ दशकों बाद भी भारतीय भाषाओं का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है।

सम्मान मूर्ति नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि ‘लोक से हिन्दी समृद्ध है, इसी बीच साहित्य और कला के अंतरसंबंध मज़बूत होंगे और इनके बीच आज अन्तरानुशासन की आवश्यकता है।’

सम्मान मूर्ति अतुल तारे ने कहा कि ‘हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही है। आभासी दुनिया यानी एआई का युग है, इसमें अपनी भाषा से जुड़ाव स्व का बोध करवाता है।’

आयोजन में साहित्यकार संध्या राणे के कविता संग्रह ‘शुभम् करोति’ का लोकार्पण भी हुआ।

इस अवसर पर अरविंद तिवारी, पुरुषोत्तम दुबे, योगेन्द्रनाथ शुक्ल, डॉ. पद्मा सिंह, जयंत भिसे, हरेराम वाजपेयी, जय सिंह रघुवंशी उपस्थित रहे।

कई फलों की मिठास और फूलों की महक से सराबोर है श्री सुरेश प्रभु का व्यक्तित्व

मुंबई। मुंबई शहर ऐसे तो आयोजनों का शहर है प्रतिदिन यहाँ सैकड़ों आयोजन होते हैं, जिनमें कॉर्पोरेट से लेकर फिल्म, साहित्य और संस्कृति से जुड़े आयोजन सब शामिल हैं। लेकिन कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो हर दृष्टि से यादगार रह जाते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु पर मराठी में लिखी गई पुस्तक ध्येयधुंद (धुन के पक्के) के विमोचन का कार्यक्रम ऐसा ही एक यादगार रोमांचक और भावनाओं से भरा हुआ आयोजन था।

विशेष उल्लेखनीय रहा कि समारोह के केंद्रबिंदु होते हुए भी सुरेश प्रभु मंच पर न बैठकर श्रोताओं के बीच शांतिपूर्वक कार्यक्रम सुनते रहे, जबकि हाल में बैटे श्रोता श्री सुरेश प्रभु को मंच पर ना पाकर हैरान थे कि प्रभुजी मंच पर नहीं हैं तो कहाँ हैं।

श्री सुरेश प्रभु के बारे में कुछ रोचक लेख

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दादर स्थित सावरकर सभागृह के खचाखच भरे हाल में ये कार्यक्रम संपन्न हुआ और लगातार तीन घंटे तक चला।

द इनविज़िबल रूट्स: एक मालवणी आत्मा, वैश्विक व्यक्तित्व में – श्री सुरेश प्रभुइस समारोह में रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग का कोकण कोहिनूर सावरकर स्मारक में आलोकित हो उठा हो। हमारे प्रभु-प्रेमी मित्र नकुल पार्सेकर ने “ध्येयधुंद” पुस्तक तो लिखी, पर विषय कौन? हमारे ही सुरेश प्रभु साहब।

प्रभु का जीवन मानो दौड़ती लोकल ट्रेन का डिब्बा हो।

और भला कालनिर्णय के कर्ता-धर्ता जयराज साळगावकर वहाँ उपस्थित न होते, यह कैसे संभव था? साळगावकर के ‘कालनिर्णय’ ने हमें उपवास का दिन बताकर भोजन से दूर रखा, लेकिन जब प्रभु और साळगावकर साथ बैठते हैं, तो मालवणी अंदाज़ में जो बातचीत की चटपटी फुहार उड़ती है, उसका कोई मुकाबला नहीं।

साळगावकर द्वारा सुनाया गया मच्छिंद्र कांबली का किस्सा सुनकर तो हँसी के मारे पेट में बल पड़ गए। श्री साळगावकर ने बताया—एक बार प्रभु ने मच्छिंद्र कांबली से कहा, “अरे मच्छिंद्र, कभी गाँव में घर पर खाने आना।” इस पर मच्छिंद्र ने तुरंत जवाब दिया, “अरे सुरेश, पहले तुम चार दिन अपने ही घर पर खाना खा लो, तब पाँचवें दिन मैं तुम्हारे घर खाने आऊँगा!”

वास्तव में, प्रभु के घर भोजन के लिए जाना मानो मृगतृष्णा के पीछे दौड़ने जैसा है। जिस व्यक्ति का घर ही मानो भारतीय रेल या एयर इंडिया बन गया हो, वह स्वयं घर पर कब भोजन करेगा और अतिथियों को कब बुलाएगा? देशसेवा में स्वयं को समर्पित कर देना ही उनका सबसे बड़ा ‘व्यसन’ है—और जब वह व्यक्ति मालवणी हो, तो बात वहीं समाप्त हो जाती है।

आप एक मालवणी व्यक्ति को सिंधुदुर्ग से बाहर ले जा सकते हैं, लेकिन मालवणी आभा को उस व्यक्ति से कभी अलग नहीं कर सकते।

पर आश्चर्य इस बात का है कि इतना बड़ा वैश्विक व्यक्तित्व होने के बावजूद उनका स्वभाव बिल्कुल अपने मोहल्ले के भजी की दुकान पर बैठकर सहज गपशप करने वाले किसी अपने जैसे ही सरल व्यक्ति जैसा है। सावरकर स्मारक के उस गरिमामय वातावरण में, दिग्गजों की उपस्थिति के बीच, सावंतवाड़ी के एक सामान्य लेखक द्वारा एक असाधारण व्यक्तित्व पर पुस्तक लिखना—यह अपने आप में “सादा जीवन, उच्च विचार” का सजीव उदाहरण है।

मानो स्वयं सरस्वती ने व्यास से कहा हो—“अब आप थोड़ा विश्राम कीजिए, अगला अध्याय मैं लिखती हूँ।” और दृश्य भी कितना अनोखा—मंच पर सभी मान्यवर विराजमान, “सत्कार मूर्ति” के रूप में सुरेश प्रभु का सम्मान, लेकिन स्वयं प्रभु साहब मंच पर न बैठकर सामने दर्शकों की कुर्सी पर शांतिपूर्वक बैठे हुए! यह लेखक और जिस पर लिखा गया है—दोनों के ही सादगी के भाव का सीमोल्लंघन था।

अब नकुल से बस एक ही कहना है—पार्सेकर जी, दूसरा खंड जल्द प्रकाशित कीजिए। नहीं तो ऐसा न हो कि तब तक सुरेश प्रभु किसी दूसरे ग्रह पर “इंटर-गैलेक्टिक कमिटी” बनाने निकल जाएँ और आपको जानकारी जुटाने के लिए सीधे इसरो के चक्कर लगाने पड़ें!

— अनिकेत रविंद्र वालावलकरी

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने की। विशेष अतिथि के रूप में एबीपी माझा के कार्यकारी संपादक राजीव खांडेकर उपस्थित थे।

पुस्तक के लेखक अधिवक्ता नकुल पार्सेकर का कहना था कि सुरेश प्रभु के व्यक्तित्व, उनके राष्ट्रनिर्माण के प्रति समर्पण, सकारात्मक ऊर्जा और समाजाभिमुख कार्यशैली ने उन्हें सदैव प्रेरित किया। श्रीमती उमा प्रभु के मार्गदर्शन ने भी इस पुस्तक की संकल्पना को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “सुरेश प्रभु जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व पर लिखना हिमालय पर एक झाड़ी के बोलने जैसा साहस है,” फिर भी आठ महीनों के अथक परिश्रम से यह पुस्तक तैयार की गई।

बेहद अनुशासन व गरिमामयी ढंग से संपन्न इस आयोजन में उपस्थित वक्ताओं ने श्री सुरेश प्रभु को लेकर ऐसे ऐसे संस्मरण प्रस्तुत किए कि उनको बरसों से जानने वाले लोग भी रोमांचित हो गए।  कई बार तो ऐसा लगा जैसे परीकथा के किसी सर्वशक्तिमान  नायक की कोई कथा कही जा रही है या किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में बात हो रही है जो इस समाज की दुनिया से एक अलग तल पर जीता है।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने सुरेश प्रभु के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनके दूरदर्शी नेतृत्व और राष्ट्रसेवा के प्रति उनके समर्पण की प्रशंसा की। लेखक नकुल पार्सेकर ने अपने प्रास्ताविक में पुस्तक लेखन के पीछे की प्रेरणा और अनुभव साझा किए।

समारोह में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों सहित राज्य के बाहर से भी बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन के साथ राष्ट्रगान किया गया।

अपने संबोधन में  विशेष अतिथि के रूप में एबीपी माझा के कार्यकारी संपादक राजीव खांडेकर  ने   वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सुरेश प्रभु की विशिष्ट कार्यशैली पर प्रकाश डाला तथा पुस्तक के द्वितीय संस्करण की आवश्यकता व्यक्त की। श्री  राजीव खांडेकर ने कहा—जब भी मैं सुरेश प्रभु से मिलता हूँ, वे या तो किसी वैश्विक बैठक से लौट रहे होते हैं या किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए रवाना हो रहे होते हैं। उनके पासपोर्ट पर लगे मुहरों की गिनती करनी हो तो शायद एक स्थायी टैली ऑपरेटर रखना पड़े।

वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेटं सतीश मराठे ने भारत सरकार की नई राष्ट्रीय सहकार नीति समिति के अध्यक्ष के रूप में सुरेश प्रभु के कार्यों की सराहना की।सारस्वत बैंक के चेयरमैन गौतम ठाकुर ने बताया कि मात्र 37 वर्ष की आयु में बैंक की जिम्मेदारी संभालते हुए प्रभु ने संस्थान की मजबूत नींव रखी।

काल निर्णय कैलेंडेर के संस्थापक श्री  जयराम साळगावकर ने अपने पिताश्री स्व. जयंत साळगावकर के साथ प्रभु के आत्मीय संबंधों का उल्लेख किया। वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेट श्री  प्रफुल्ल छाजेड ने उन्हें अद्वितीय दूरदर्शी नेता बताया और उपस्थित जनसमूह से खड़े होकर सम्मान व्यक्त करने का आग्रह किया, जिस पर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

वरिष्ठ चार्टर्डएकाउंटेंट श्री शैलेष हरिभक्ति व नाबार्ड के अध्यक्ष व रिज़र्व बैंक के निदेशक मंडल के सदस्य केवी शिवाजी ने श्री सुरेश प्रभु के साथ की बरसों की यात्रा के रोचक संस्मरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनके जैसा दूरदृष्टि वाला राजनीतिक व्यक्ति आज के दौर में दुर्लभ है। श्री केवी शिवाजी ने कहा कि अगर सुरेश प्रबुजी पर अंग्रेजी में पुस्तक प्रकाशित हुई तो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष इस कार्यक्रम में आएँगे और म्ंच  से लेकर श्रोताओं की जगह राष्ट्राध्यक्षों से ही भर जाएगी। उन्हौंने कहा कि पूरी दुनिया के तमाम राष्ट्रपतियों और प्रधान मंत्रियों से लेकर हर राजनीतिज्ञ से श्री सुरेश प्रभु ने जो रिश्ते बनाए उसीका नतीजा था कि प्रधान मंत्री के शेरपा के रूप  में उन्होंने जी-जैसे विराट आयोजन में पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष भारत आए।

अपने संक्षिप्त उद्बोधन में  श्री सुरेश प्रभु ने विनम्रतापूर्वक कहा कि जीवित रहते उन पर पुस्तक लिखे जाने से उन्हें यह जानने का अवसर मिला कि लोग उनके कार्यों के बारे में क्या सोचते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा ध्येय रहा है कि  बिना किसी लाभ की अपेक्षा निरंतर कार्य करते रहना, और मैं सतत् इसी भाव से जीता हूँ। इस पुस्तक को उन्होंने अपने सामाजिक व सार्वजनिक जीवन की पूँजी बताया।

समारोह में महाराष्ट्र सहित कोलकाता, पटना, गोवा और सिंधुदुर्ग से अनेक गणमान्य व्यक्ति, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति, शिक्षाविद, पत्रकार एवं विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।  पूरे समय सभागार पूर्णतः भरा रहा और अंत में पुस्तक पर हस्ताक्षर एवं छायाचित्रों के लिए उत्साहपूर्ण प्रतिसाद देखने को मिला।

कार्यक्रम के मुख्य संयोजक डॉ. अमेय देसाई एवं श्री रविंद्र वाडेकर सहित आयोजन समिति के सभी सदस्यों के प्रयासों से यह समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सुप्रसिद्ध मंच संचालक स्मिता गावाणकर के प्रभावी संचालन ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।

इस आयोजन में वक्ताओं ने तो अपनी बात मन से कही, लेकिन श्रोताओं में बैठे लोगों में एक एक व्यक्ति ऐसा था जो सुरश प्रभुजी के बारे में कुछ न कुछ कहना चाहता था, जिनमें कॉर्पोरेट से लेकर बैंकिंग, राजनीति, सामाजिक व साहित्यिक जगत के जाने माने लोग शामिल थे ।

एक श्रोता का कहना था,कई फूलों की मिठास और फूलों की महक से सराबोर है श्री सुरेश प्रभु का व्यक्तित्व, वो अकेले एक ऐसे बगीचो के समान हैं कि आप उनके बारे में जितना जानो और जितना कहो वह आधा अधूरा रहेगा।

एक अन्य श्रोता ने कहा कि अगर हाल में बैठे सब लोगों को बोलने का मौका दिया जाता तो ये कार्यक्रम की दिन चलता और लोग हिलते भी नहीं । राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहते हु़ए किसी व्यक्ति के बारे में किसी आम आदमी का ये सोचना ही इस बात का प्रमाण है कि सुरेश प्रभु जैसे लोग जिस क्षेत्र में रहेंगे अपने कार्यों से उस क्षेत्र की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बढ़ा देंगे ।

पुस्तक का प्रकाशन स्वामीराज प्रकाशन के श्री रजनीश राणे तथा वर्धमान श्रुतगंगा ट्रस्ट के श्री संजय शहा के सहयोग से समय पर संपन्न हुआ।

इसके पूर्व  महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने निवास ‘वर्षा’ पर पूर्व दिवस पुस्तक का अनावरण  किय़ा।
 लोकभवन में राज्यपाल के करकमलों से भी पुस्तक का विमोचन हुआ।