“The Indian Eclipse 1898” एक वैज्ञानिक प्रकाशन है, जिसे British Astronomical Association (BAA) ने 1898 के भारत में दिखाई दिए पूर्ण सूर्यग्रहण के अध्ययन के आधार पर प्रकाशित किया था। यह पुस्तक 22 जनवरी 1898 को भारत में हुए पूर्ण सूर्यग्रहण (Total Solar Eclipse) के विस्तृत अवलोकनों और अनुसंधानों पर आधारित है।
यह ग्रहण भारत के मध्य और उत्तरी हिस्सों से होकर गुज़रा। इसे स्पष्ट रूप से डुमराँव में ही देखा गया था और यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि क्षेत्रों में भी दिखाई दिा था। ब्रिटेन और यूरोप के कई वैज्ञानिक दल विशेष रूप से भारत आए, क्योंकि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य का कोरोना (Corona) स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह पुस्तक 19वीं सदी के अंत की खगोल विज्ञान तकनीकों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उस समय फोटोग्राफी और स्पेक्ट्रोस्कोपी नई तकनीकें थीं—इस ग्रहण ने उनके उपयोग को आगे बढ़ाया।
भारत उस समय ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों के लिए यहाँ अभियान आयोजित करना संभव हुआ।
“The Indian Eclipse 1898” केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि 19वीं सदी के खगोल विज्ञान के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसने सूर्यग्रहण अध्ययन, सौर कोरोना की समझ और खगोलीय फोटोग्राफी के विकास में योगदान दिया। 1898 के पूर्ण सूर्यग्रहण के भारत में सामाजिक प्रभाव और उस अभियान में शामिल प्रमुख वैज्ञानिकों के बारे में जानकारी इस पुस्तक में दी गई है।
19वीं सदी के भारत में सूर्यग्रहण को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता था। बहुत से लोग गंगा-स्नान, मंत्र-जाप और दान-पुण्य करते थे। कई स्थानों पर लोग भोजन त्याग देते थे और ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करते थे। वैज्ञानिक दृष्टि और पारंपरिक मान्यताओं के बीच यह एक दिलचस्प समय था।
इतने वैज्ञानिकों के एक छोटे से गाँव में एकत्र हो जाना डुमरांव गाँव के लिए ही नहीं बल्कि आसपास के सैकड़ों गाँव के लेगों के लिए ये कुतुहल और रोमांच का विषय था।

ब्रिटिश वैज्ञानिकों के बड़े अभियान ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस सूर्यग्रहण की वजह से भारत में पहली बार बड़े पैमाने पर आधुनिक उपकरणों (कैमरा, टेलीस्कोप, स्पेक्ट्रोस्कोप) का सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। इससे शिक्षित वर्ग में खगोल विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ी। उस समय के अंग्रेज़ी और भारतीय समाचार पत्रों में ग्रहण की व्यापक रिपोर्टिंग हुई।
प्रसिद्ध ब्रिटिश खगोलशास्त्री नॉर्मन लॉकयर (Norman Lockyer) सूर्य के स्पेक्ट्रम और “हीलियम” तत्व की खोज से जुड़े। 1898 के ग्रहण अध्ययन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। स्पेक्ट्रोस्कोपी के अग्रणी वैज्ञानिकों में से एक विलियम हगिंस ( William Huggins) ने सूर्य के रासायनिक तत्वों का अध्ययन किया। तब के भारत के जाने माने खगोलशास्त्री केडी. नाएगामवाला (Kavasji Dadabhai Naegamvala) भी इस दल के प्रमुख सदस्य थे।
यह अभियान अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग का उदाहरण बना। भारत खगोलीय अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभरा। 1898 का सूर्यग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं था, बल्कि धार्मिक मान्यताओं और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद का क्षण था और भारत में वैज्ञानिक चेतना बढ़ाने का अवसर बना। 1898 के पूर्ण सूर्यग्रहण के समय बिहार के डुमराँव (Dumraon) क्षेत्र का विशेष महत्व था, क्योंकि पूर्ण ग्रहण की पट्टी वहाँ से भी गुज़र रही थी। उस समय डुमराँव रियासत के शासक थे।

महाराजा राम रणविजय सिंह डुमराँव राज, वर्तमान बिहार के बक्सर ज़िले में स्थित है। महाराजा ने ब्रिटिश और अन्य यूरोपीय वैज्ञानिकों का राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया।उनके ठहरने की व्यवस्था डुमराँव राजमहल या उसके आसपास की गई। शाही आतिथ्य (भोजन, सुरक्षा, सेवक) उपलब्ध कराए गए।

ग्रहण देखने के लिए खुले और साफ़ मैदान की आवश्यकता थी। महाराजा ने अपने क्षेत्र में उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया। वैज्ञानिकों को टेलीस्कोप, कैमरा और अन्य उपकरण स्थापित करने में स्थानीय सहयोग मिला।
उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए स्थानीय रियासतों का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण था। महाराजा ने परिवहन, संचार और सुरक्षा की व्यवस्था में मदद की। स्थानीय जनता को अनुशासित रखने और वैज्ञानिक कार्य में बाधा न आने देने के निर्देश दिए गए।
19वीं सदी के अंत में भारतीय रियासतों के लिए ब्रिटिश वैज्ञानिकों का स्वागत करना एक प्रतिष्ठा का विषय था। इससे डुमराँव रियासत की छवि एक प्रगतिशील और सहयोगी राज्य के रूप में उभरी। यह घटना परंपरा और आधुनिक विज्ञान के मिलन का प्रतीक बनी। डुमराँव जैसे छोटे रियासत क्षेत्र ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अभियान की मेजबानी की। इससे स्थानीय स्तर पर विज्ञान के प्रति जिज्ञासा और जागरूकता बढ़ी। यह घटना आज भी क्षेत्र के इतिहास में गौरवपूर्ण मानी जाती है।
कोरोना (Corona) का अध्ययनः पूर्ण ग्रहण के दौरान सूर्य की बाहरी परत “कोरोना” दिखाई देती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि कोरोना की आकृति सूर्य की सौर गतिविधि (Sunspot cycle) से जुड़ी होती है।1898 के अवलोकन ने यह पुष्टि की कि कोरोना की संरचना स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है।
स्पेक्ट्रम विश्लेषण (Spectroscopy)ः स्पेक्ट्रोस्कोप से सूर्य के प्रकाश को विभिन्न रंगों में विभाजित किया गया। इससे कोरोना में उपस्थित गैसों के संकेत मिले। हीलियम जैसे तत्वों के अध्ययन में भी यह तकनीक उपयोगी रही।
19वीं सदी के अंत में खगोलीय फोटोग्राफी नई तकनीक थी। लंबा एक्सपोज़र (Exposure) देकर कोरोना की तस्वीरें ली गईं। ग्रहण के फोटो के लिए काँच की प्लेट (Glass Plate Negatives) का उपयोग किया गया। यह उस समय की सबसे उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों में से एक थी।
इस सूर्य ग्रहण का वैज्ञानकों को कोरोना की संरचना पर महत्वपूर्ण डेटा मिला। सूर्य के वातावरण के बारे में नई समझ विकसित हुई। भविष्य के ग्रहण अभियानों के लिए तकनीकी मार्गदर्शन मिला।
सूर्य का सौर चक्र चक्र = लगभग 11 साल में पूरा होता है। 1898 का ग्रहण वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे कोरोना, सौर गतिविधि सौर धब्बों की संख्या के बढ़ने व -घटने का अध्ययन हुआ। इसकी पूर्णता की पट्टी भारत के महत्वपूर्ण भागों से गुज़री।
डुमराँव राज का विस्तृत इतिहास
डुमराँव (वर्तमान बक्सर ज़िला, बिहार) एक ऐतिहासिक रियासत थी।
स्थापना और वंशः डुमराँव राज, उज्जैनिया राजपूत वंश से संबंधित माना जाता है।
यह वंश स्वयं को परमार (Paramara) वंश की शाखा मानता है।
16वीं–17वीं सदी में इस क्षेत्र में इनका प्रभाव स्थापित हुआ।
डुमराँव के शासक मुगल शासन के अधीन ज़मींदार/राजा के रूप में कार्य करते थे।
बदले में उन्हें कर देना पड़ता था, लेकिन स्थानीय प्रशासन पर उनका नियंत्रण रहता था।
1764 की Battle of Buxar के बाद बिहार पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण स्थापित हुआ।
डुमराँव राज ब्रिटिश शासन के अधीन एक ज़मींदारी रियासत बन गया।
19वीं सदी में यह एक समृद्ध और प्रभावशाली ज़मींदारी थी।
महाराजा राम रणविजय सिंह 19वीं सदी के प्रमुख शासक थे।
डुमराँव संगीत परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध रहा। प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का जन्म डुमराँव में हुआ था।
स्वतंत्रता के बाद 1950 के बाद ज़मींदारी प्रथा समाप्त हुई।
डुमराँव राज की प्रशासनिक शक्ति खत्म हो गई, लेकिन ऐतिहासिक महत्व बना रहा।