Sunday, June 16, 2024
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राजनीति की कोयले की खान में किसी हीरे जैसे सुरेश प्रभु

राजनीति कोयले की खदान की तरह है। इल खदान में जो भी उतरता है उसके दामन पर कालिख लग ही जाती है, लेकिन मशहूर राजनेता सुरेश प्रभु इस कोयले की खदान में भी किसी हीरे की तरह चमकते दिखाई देते हैं। देश की राजनीति में सुरेश प्रभु एक ऐसे राजनेता हैं जो विगत कई वर्षों से राजनीति में हैं और केंद्र में कई विभागों में मंत्री पद का दायित्व निभाने के साथ ही लोक सभा और राज्य सभा के सदस्य भी रह चुके हैं लेकिन उनके राजनीतिक या व्यक्तिगत जीवन पर कहीं किसी तरह का कोई आरोप आज तक नहीं लगा है। एक सफल राजनीतिज्ञ एवं चिंतक होने के साथ साथ वे आज देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक ऋषिवुड विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) हैं।

वे अपने प्रशंसकों में भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने विपक्षी नेताओं में। सुरेश प्रभु भारतीय राजनीति में अजातशत्रु की तरह हैं जिनका कोई विरोधी नहीं। जो उनसे मिलता है वह उनका कायल हो जाता है और जो उनको जानता है या उनके बारे में पढ़ता है वह भी उनके प्रति नतमस्तक हो जाता है। अपनी धुन के पक्के, राजनीति में होने के बावजूद सुरेश प्रभु किसी टेक्नोक्रेट की तरह अपने काम में लगे रहते हैं। प्रशंसा और आत्म-प्रशंसा से दूर अपने समय का ज्यादा से ज्यादा उपयोग किताब पढ़ने में करते हैं और मौका मिलता है तो वैचारिक विमर्श के लिए समय निकालते हैं। राजनीति में होने के बावजूद भीड़, तालियां और स्वागत समारोह से कोसों दूर रहने वाले सुरेश प्रभु ने देश की राजनीति में अपनी एक अलग ही पहचान बनाई है।

कितने ही व्यस्त हों जब भी समय मिलता है अपने मित्रों से मिलने का समय निकाल ही लेते हैं। विगत कई महीने से सुरेश प्रभु साहब से मेरी मुलाकात नहीं हो पाई थी। अचानक उनका फोन आया कि यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान में उनसे मिलना है। वहां सहकारिता विभाग के किसी कार्यक्रम में कई लोगों और अधिकारियों से घिरे होने के बावजूद उन्होंने साथ बैठकर जमकर गपशप की। वहां मौजूद अपने हर परिचित से मिले और जब कुछ मीडिया कर्मी सहकारिता नीति के मसौदे को लेकर बात करने आए तो बहुत ही विनम्रतापूर्वक मना कर दिया और कहा कि मेरा काम है रिपोर्ट सरकार को देना। इस पर जो भी कहना है सरकार ही कहेगी।

वे 11वीं, 12वीं 13वीं और 14वीं लोक सभा में 1996 से 2009 तक महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग और रत्नागिरी से लोकसभा सदस्य रहे। इसके बाद वे हरियाणा और आंध्रप्रदेश से राज्य सभा सदस्य रहे। सुरेश प्रभु ने कबीर दास के ‘ज्यों की त्यों धर दीन्हीं रे चदरिया…’ की तर्ज पर अपना पूरा राजनीतिक जीवन साकार किया। अपने ऊपर कहीं कोई दाग नहीं लगने दिया, उल्टे अपने विरोधियों से वाहवाही और प्रशंसा ही अर्जित की।

कोई बड़ा नेता और या कॉर्पोरेट जगत की नामी हस्ती या कोई सामान्य व्यक्ति सुरेश प्रभु सबसे सहजता से घुल-मिल जाते हैं। अपने चाहने वाले से लेकर किसी अंजान व्यक्ति तक का कोई छोटा से छोटा या बड़े से बड़ा काम हो तो सुरेश प्रभु बेहिचक मदद करने के लिए तैयार रहते हैं। सुरेश प्रभु को लेकर कई हर किसी के पास ऐसे किस्से मिल जाएंगे कि किस तरह प्रभु साहब ने उसको मदद कर मुसीबत से बचा लिया।

मुंबई में सारस्वत बैंक के अध्यक्ष से लेकर लगातार चार बार लोक सभा के सदस्य, दो बार राज्य सभा के सदस्य, अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल से लेकर नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में कई अहम विभागों में अपनी सेवाएँ देने वाले सुरेश प्रभु पर कभी किसी ने कोई आरोप नहीं लगाया। न मीडिया में उन पर लगे किसी आरोपों पर चर्चा हुई न विपक्ष के नेताओँ ने कभी उन पर कोई आरोप लगाए। मंत्री बनते ही अपने घर पर ये लिखवा देना कि कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह का उपहार या फूलों का गुलदस्ता लेकर न आए, प्रभु साहब जैसा व्यक्ति ही कर सकता है।

आज सुरेश प्रभु राष्ट्रीय सहकारी नीति (नेशनल कोऑपरेटिव पॉलिसी) की 47 सदस्यीय समिति के अध्यक्ष के रूप में केंद्रीय सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के साथ कार्य कर रहे हैं। सरकार अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में सहकारी समितियों की हिस्सेदारी बढ़ाने के बारे में सोच रही है। सहकारिता पर मौजूदा राष्ट्रीय नीति – 2002 में तैयार की गई थी। भारत में लगभग 8.5 लाख सहकारी समितियां हैं, जिनके सदस्यों की संख्या लगभग 29 करोड़ है। ये सहकारी समितियां कृषि प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, आवास, बुनाई, ऋण और विपणन जैसी विभिन्न गतिविधियों में लगी हुई हैं। और हम सब जानते हैं कि सहकारी समितियों में किस तरह राजनीतिज्ञों ने कब्जा करके इनके मूल चरित्र को ही खत्म कर दिया है।

अमित शाह जब केंद्रीय सहकारिता मंत्री बने तब उनकी प्राथमिकता थी कि देश की सहकारी समितियों कों राजनेताओं और भ्रष्ट लोगों के मकड़ जाल से मुक्त किया जाए और सहकारी समितियों का लाभ उन लोगों तक पहुंचे जिनके लिए सहकारिता आंदोलन शुरू हुआ था। जाहिर है इसके लिए सुरेश प्रभु से उपयुक्त व्यक्ति और कौन हो सकता था। उन्होंने भी विगत कई महीने से सहकारी समितियों और सहकारिता आंदोलन से जुड़े लोगों से लगातार संपर्क करके राष्ट्रीय सहकारिता नीति का व्यापक मसौदा तैयार किया है। उनका ये काम देश के सहकारिता आंदोलन में मील का पत्थर साबित होगा।

पत्रकारिता में रहते हुए मुझे कई मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, नेताओं के साथ रहने, घूमने उनकी आम सभाएं, चुनाव सभाए कवर करने और लिखने का खूब मौका मिला, हर नेता मंत्री और मुख्यमंत्री की अपनी खासियतें होती थी जो उनके साथ रहने पर ही पता चलती थी, लेकिन सुरेश प्रभु के साथ यही अनुभव रहा कि वे जिस मंच पर जाते हैं वहाँ उस राष्ट्रीय सोच को पहुँचाने की कोशिश करते हैं। वो राजनीतिक बातें नहीं करते, वो अपनी बात से लोगों को राष्ट्रीय हित के उन मुद्दों से जोड़ने की कोशिश करते हैं जिससे वे जाने-अनजाने कटे हुए हैं। उनके वक्तव्यों में न तो राजनीतिक आश्वासन होता है, न किसी की छिछालेदारी, उनका जोर इस बात पर होता है कि वो क्या करने जा रहे हैं और इसमें देश के उद्योगपतियों की और समाज की क्या भूमिका हो सकती है।

अटलजी की सरकार में एक काबिल मंत्री होने के बावजूद उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा था, लेकिन इसके बाद उन्होंने कभी भी और कहीं भी इस बात की चर्चा नहीं की कि उन्होंने मंत्री पद क्यों छोड़ा। 1996 से लेकर 1999 तक पर्यावरण, वन, रसायन एवँ उर्वरक, उर्जा, भारी उद्योग मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभागों में मंत्री रहने के दौरान उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में जो उपलब्धियां हासिल की उससे प्रधान मंत्री श्री बाजपेयी इतने गदगद् थे कि उन्हें किसी भी हालत में मंत्री पद से हटाना नहीं चाहते थे। बाद में श्री वाजपेयी ने श्री प्रभु को नदियों को जोड़ने की योजना के लिए बनी टास्क फोर्स समिति का अध्यक्ष बनाकर और उन्हें मंत्री पद का स्तर देकर उनकी सेवाएं ली।

उर्जा मंत्री के रूप में सुरेश प्रभु ने देखा कि दिल्ली के अफसरों, नेताओँ और मंत्रियों के यहां जिस हिसाब से बिजली की खपत होती है उस हिसाब से बिजली की आमदनी नहीं हो रही है। एक चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में उनको ये बात बड़ी अजीब लगी कि बिजली की खपत और आमदनी में इतना अंतर क्यों है। उनका माथा ठनका और जब जांच कराई तो पता चला कि हर जगह बिजली तो धड़ल्ले से उपयोग हो रही है लेकिन बिल नाममात्र आ रहे हैं। पूरी जाँच रिपोर्ट लेकर वे अटलजी के पास पहुँचे और कहा कि ये बहुत गड़बड़ हो रही है। अटलजी ने कहा कि सबसे पैसे वसूलो। और ये सुरेश प्रभु ही थे जिन्होंने सरकारी अफसरों, नेताओँ और मंत्रियों से करोड़ों की वसूली भी की और हमेशा हमेशा के लिए बिजली चोरी रोक दी।

अटलजी को याद करते हुए सुरेश प्रभु कहते हैं -अटल जी से 1996 में मिला था, जब मैंने उनके साथ उनके पहले मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली थी। मैं किसी भी स्थान पर पहुंचने के लिए मीलों पैदल चलता था और सार्वजनिक परिवहन लेता था, जहां मैं उनकी मंत्रमुग्ध कर देने वाली वक्तृत्व कला को सुन सकूं। मैं उनके सबसे करीब उस मंच से सैकड़ों मीटर की दूरी पर था, जहां वह अपना भाषण देते थे और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं उसी प्रतिष्ठित शख्सियत से व्यक्तिगत रूप से मिल रहा हूं, उनके बगल में बैठा हूं और बातचीत कर रहा हूं। यह किसी सपने के सच होने से कहीं अधिक था। उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में दो बार और इस प्रकार कुल तीन बार शपथ ली और मैं उन तीन मंत्रियों में से एक था जिन्होंने तीनों बार उनके साथ शपथ ली।

अलग-अलग पार्टियों और विभिन्न गुटों के बड़े नेताओं वाली गठबंधन सरकार के प्रबंधन में उनकी अविश्वसनीय बुद्धिमत्ता से मैं मंत्रमुग्ध हो गया था। मैं उन्हें सबसे विवादास्पद मुद्दों पर आम सहमति पर पहुंचते देख आश्चर्यचकित था, जहां प्रत्येक पार्टी अपने अड़िग विचार रखती थी। मैं एनडीए कोर कमेटी का सदस्य था जो चुनौतीपूर्ण राजनीतिक मामलों पर निर्णय लेती थी। इस समिति के प्रमुख के रूप में, वह चतुराई और दृढ़तापूर्वक चर्चाओं का संचालन करते थे, यह सुनिश्चित करते थे कि किसी को ठेस न पहुंचे।

मैंने लंबे समय तक उनके नेतृत्व में काम किया, जिससे मुझे एक महान नेता के बारे में पता चला जो एक असाधारण अच्छे इंसान भी थे। उन्होंने हमेशा मुझे पिता के सामान प्रेम किया और देश हित में बड़े फैसले लेने में मेरा समर्थन और सहयोग किया| कभी किसी कार्य में दखलंदाजी नहीं की| उन्होंने पूरे दिल से मेरा समर्थन किया. उनके समर्थन से, मैंने बिजली अधिनियम पेश किया और बिजली क्षेत्र में सुधार शुरू किए, जिसके परिणामस्वरूप भारत बिजली आधिक्य देश बन गया।अटलजी ने मुझे नदियों को जोड़ने पर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया और पूरा सहयोग दिया। इसके लिए मुझे पूरे भारत में 5000 से अधिक रोड शो और हितधारकों के साथ बातचीत करने के लिए प्रेरित किया।

उसे खोने का मतलब था अपने भीतर का एक हिस्सा खोना। मैं उनके साथ बिताए समय को हमेशा याद करता हूं।

श्री सुरेश प्रभु उर्जा और जल संरक्षण से जुड़े कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहे और कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी धाक जमाई। अपने गृह क्षेत्र कोंकण में उनका एक एनजीओ मानव साधन विकास संस्था के नाम से चलता है जिसके माध्यम से वे हाशिये पर जी रहे लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम करते हैं। लेकिन अपने किसी भी काम का वे कोई राजनीतिक प्रपोगंडा नहीं करते। जो भी करते हैं परिणाममूलक होता है और अपना काम चुपचाप करते हैं।

जब पूरा देश लॉकडाउन और कोरोना की वजह से निराशा और अनिश्चिततता के माहौल से गुज़र रहा था, तब श्री सुरेश प्रभु ने इस माहौल में भी अपनी सक्रियता को विराम नहीं दिया। पूरे कोरोना काल में उन्होंने 200 से ज्यादा वेबनॉर के माध्यम से दुनिया के कई दिग्गजों से संवाद  किया। कोरोना की इस विषम परि स्थिति में उद्योग, कृषि, छोटे व मझले उद्योग, बैंक, सामाजिक संस्थानों से लेकर शासन और प्रशासन से लेकर अस्पतालों, की क्या भूमिका होना चाहिए – ऐसे तमाम विषयों पर प्रभु साहब ने जिस तरह से अपनी बात कही है अगर उनके ये वीडियो स्कूल और कॉलेजों में दिखाए जाएँ तो देश की नई पीढ़ी को आने वाले सालों के देश के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व औद्योगिक स्थितियों के बारे में बेहतर जानकारियाँ मिल सकती है। इसके साथ ही वो लोगों को अस्पताल में भर्ती कराने से लेकर ऑक्सीजन सिलेंडर पहुँचाने और विदेश में फँसे किसी जाने अनजाने व्यक्ति को मदद पहुँचाने का काम भी चुपचाप करते रहे।

लॉकडाउन के दौरान भी अपने कोंकण क्षेत्र के काजू उत्पादकों की ट्रांसपोर्ट की समस्या हो या आंध्रप्रदेश के मछुआरों की समस्या, उसकी तह में जाकर तत्काल संबंधित केंद्रीय मंत्री के सामने समस्या और समाधान दोनों प्रस्तुत करने का काम प्रभु साहब लगातार करते रहे।

प्रभु साहब किसी भी विषय पर बगैर देखे और बगैर लिखा भाषण पढ़े बोल सकते हैं। हर बार वे अपने धारदार तर्कों और आँकड़ों से हैरान कर देते हैं। वो वैश्विक अर्थ व्यवस्था पर बोल रहे हों या देश की अर्थ व्यवस्था पर, बड़े उद्योगों की दशा और दिशा पर बोल रहे हों या लघु उद्योंगों पर, किसानों की समस्या पर बोलें या व्यापारियों के मुद्दों पर, उनका हर वक्तव्य किसी छोटे मोटे शोध ग्रंथ जैसा होता है।

संसद से लेकर सड़क तक श्री सुरेश प्रभु की एक ऐसी छवि बनी है कि उनका नाम सुनते ही उनके विरोधी भी उनके कायल हो जाते हैं। न काहू से दोस्ती ना काहू से बैर की नीति पर चलने वाले सुरेश प्रभु को आज की राजनीति के ढाँचे में फिट करना मुश्किल है। विनम्रता की हद तक विनम्र और समय की पाबंदी से लेकर सादगी उनके व्यक्तित्व में ऐसी रची बसी है कि पहली बार उनसे मिलने वाला कोई भी व्यक्ति ये देखकर हैरान रह जाता है कि वह इतने लोकप्रिय और कद्दावर नेता के सामने है। मिलने वाला श्री प्रभु को नहीं भूल पाता है और न प्रभु साहब कभी उसको भूलते हैं। न प्रचार की कोई चाहत न मीडिया की सुर्खियों में रहने का शौक।

विदेश से कोई भी प्रतिनिधिमंडल या राष्ट्राध्यक्ष आता है तो वो सुरेश प्रभु से मिलने जरूर आता है। दुनिया का कोई ऐसा देश और राजनीतिज्ञ नहीं जिससे सुरेश प्रभु जी का व्यक्तिगत परिचय ना हो और ये परिचय भी मात्र औपचारिक नहीं बल्कि बेहद आत्मीय होता है। मोदीजी की पहली अमरीका यात्रा में जब अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा का आमना सामना सुरेश प्रभु जी से हुआ और जिस गर्मजोशी से उन्होंने प्रभुजी को गले लगाया उसे देखकर मोदीजी भी हैरान रह गए।

रेल मंत्री थे तो किसी भी नई गाड़ी को झंडी दिखाने के लिए बड़े बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करने की बजाय अपने कार्यालय में बैठकर ही उसको डिजिटल माध्यम से हरी झंडी दे देते थे। किसी भी काम को करेंगे तो न कोई शोर-शराबा न कोई दिखावा। काम के प्रति दीवानगी ऐसी कि जहाँ तक हो वहाँ तक पूरा समय अपने ऑफिस को देना और घर आकर देऱ रात तक हर विषय पर अध्ययन करना।

जिन विषयों पर बोलने में अच्छे से अच्छे विद्वान और राजनीतिज्ञ कतराते हैं, प्रभु साहब उन पर घंटों बोल सकते हैं और कई नए नए तथ्यों और आंकड़ों से आपको चौंका सकते हैं। प्रभु साहब जब बोलते हैं तो उनके चेहरे को देखिये, न कोई अभिमान न ये दिखावा कि मैं कोई बहुत बड़ी बात बताने जा रहा हूं, सब-कुछ इतनी सहजता से बोल जाते हैं कि सुनने वाले ठगे से रह जाते हैं।

जिन पुस्तकों और शोध का हवाला वो अपने भाषणों में देते हैं उनके बारे में कई लोग पहली बार ही सुन रहे होते हैं।

नवरात्रि में पूर्ण उपवास करते हुए गर्म पानी पीकर पूरे नौ दिन आराधना करने वाले सुरेश प्रभु अध्यात्म के साथ ही अपने धर्म और परंपराओं के प्रति भी उतने ही समर्पित हैं जितने अपने काम के प्रति।

प्रभु साहब दुनिया के कई देशों में कई अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में, व्याख्यानों में, सेमिनारों में ऐसे ऐसे मंचों पर जलवायु परिवर्तन, आर्थिक नीतियों, पर्यावरण से लेकर जल संकट पर अपने विचार व्यक्त करते हैं, जहाँ दुनिया भर के दिग्गज और कई बार तो संबंधित देशों के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री तक मौजूद होते हैं, वहाँ उनके व्याख्यान मिसाल बन जाते हैं। दुनिया का कोई ऐसा राष्ट्राध्यक्ष नहीं होगा जो प्रभु साहब को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता होगा। किसी भी कार्यक्रम के लिए दुनिया भर से भारत आने वाले प्रतिनिधि मंडल, विशेषज्ञ, सांसद, मंत्री, राजनेता, राष्ट्राध्यक्ष प्रभु साहब से जरूर मिलते हैं।

राजनीति में उन्होंने क्या ग़ज़ब पहचान बनाई। स्व. बाल ठाकरे उनको राजनीति में लाए। इसका भी रोचक किस्सा है। जब स्व. बाल ठाकरे सामना अखबार शुरू कर रहे थे तो कोई बैंक उनको लोन देने को राजी नहीं था, मगर सुरेश प्रभु ने सारस्वत बैंक के अध्यक्ष के रूप में स्व. बाला साहेब ठाकरे को दैनिक सामना के लिए लोन दे दिया था। उनकी इस बात पर स्व. ठाकरे ऐसे फिदा हुए कि उन्हें राजापुर से शिवसेना से चुनाव लड़वा दिया। सुरेश प्रभु पहली बार चुनाव लड़े और राजापुर से लोकसभा चुनाव जीते।

इसके आगे का किस्सा तो और भी जोरदार है। सुरेश प्रभु साहब मुंबई के खार के अपने छोटे से फ्लैट में बैठे थे तभी वहाँ जनता पार्टी के नेता स्व. मधु दंडवते आए, वो सुरेश प्रभु साहब को जनता पार्टी की ओर से राजापुर से अगला चुनाव लड़़वाना चाहते थे। स्व. मधु दंडवते 1977 से 1989 तक राजापुर से ही चुनाव जीतते आ रहे थे। लेकिन इससे भी मजेदार बात तो ये थी कि शरद पवार प्रभु साहब को एनसीपी से राजापुर सीट से चुनाव लड़वाना चाहते थे। जिस देश में लोकसभा की सीटें करोड़ों रुपए में बिकती है उस देश में एक व्यक्ति को तीन धुर विरोधी पार्टियां आगे रहकर चुनाव लड़वाने को उत्सुक हों तो उस आदमी की विश्वसनीयता और योग्यता का ग्राफ कितना ऊंचा होगा आप अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसी विश्वसनीयता देश के किसी भी राजनीतिज्ञ ने शायद ही हासिल की हो।

सुरेश प्रभु चार बार लगातार एक ही सीट राजापुर से लोकसभा चुनाव जीते हैं और दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए।

श्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में वे 2015 से 2017 तक रेल मंत्री, 2017 से 2019 तक केंद्रीय वाणिज्य, उद्योग एवं नागरिक उड्डयन मंत्री रहे। रेल मंत्री बने तो ट्वीटर पर रेल यात्रियों के चहेते हो गए। चलती गाड़ी में बच्चों को दूध और बिस्किट भिजवाने से लेकर बीमारों को दवाइयाँ और दिव्यांगों के लिए स्टेशन पर व्हील चेअर भिजवा कर प्रभु साहब ने पूरी दुनिया में भारतीय रेल्वे की एक अलग मानवीय पहचान बना दी। वे जी-20 और जी-7 देशों के लिए माननीय प्रधान मंत्री के शेरपा के रूप मे अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

केंद्र में श्री प्रभु जिस भी विभाग में रहे उसमें ऐसे ऐसे सुधार किए जो वर्षों से सरकारी फाईलों में धूल खा रहे थे। प्रभु साहब ने सस्ती लोकप्रियता पाने की बजाय उन सुधारों पर ध्यान दिया जो बीज की तरह थे। ये सुधार दिखते तो नहीं थे मगर अँधकार में पड़ा बीज जब वृक्ष बनकर फल-फूल और छाया देने लगता है तो बीज का महत्व समझ में आता है। आज देश बिजली को लेकर जिस तेजी से आत्मनिर्भर हो रहा है और देश भर में सौर ऊर्जा को लेकर जो जागरुकता फैली है वो सुरेश प्रभु सा. की दूरदर्शिता का ही नतीजा है।

सौर ऊर्जा को उन्होंने सरकारी फाईलों से निकालकर लोगों के घरों तक पहुँचाया और ऐसे कानून बनाए कि अपने घर से लेकर अपने कारखानों तक में सौर ऊर्जा पैदा करने वाला कोई भी व्यक्ति अपन ज़रुरत के हिसाब से बिजली का उपयोग कर बाकी की बिजली विद्युत विभाग को बेच सकता है। उनकी इस सोच ने देश में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांति कर दी। इसी तरह उन्होंने उत्तर पूर्व के सुदुर क्षेत्रों में बिजली की कमी को देखते हुए वहाँ बाँध निर्माण पर जोर दिया और बिजली के ट्रांसफार्मेशन में होने वाले लॉस को लगातार कम कर देश को बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील के पत्थर बने।

सुरेश प्रभु अटल बिहारी वाजपेयी के आंखों के तारे थे। इसीलिए अटलजी ने सुरेश प्रभु को देश की सभी नदियों को जोड़ने की अपनी महत्वकांक्षी योजना टॉस्कफोर्स ऑफ़ इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स का चेयरमैन नियुक्त किया था। सुरेश प्रभु को विश्वबैंक ने विश्व बैंक संसदीय नेटवर्क का सदस्य चुना था और उन्हें दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय समूह का चेयरमैन बनाया था। एशिया वीक ने सुरेश प्रभु को भारत के तीन ‘फ्यूचर लीडर ऑफ़ इंडिया’ में चुना था।

11 जुलाई 1953 को मुंबई में जन्मे सुरेश प्रभु की आरंभिक पढ़ाई देश को सचिन तेंदुलकर जैसे कई नामचीन क्रिकेटर देने वाले दादर के शारदाश्रम हाईस्कूल में हुई। सुरेश प्रभु की गणना असाधारण प्रतिभा वाले छात्रों में होती थी। शारदाश्रम से शिक्षा लेने वाले सुरेश प्रभु बाद में विले पार्ले के एमएल डहाणुकर कॉलेज से कॉमर्स में स्नातक किया और मुंबई के न्यू लॉ कॉलेज (रूपारेल कॉलेज कैंपस) से क़ानून की डिग्री हासिल की। इतना ही नहीं चार्टर्ड अकाउंटेंट की परीक्षा में उन्होंने 11 वीं रैंक हासिल की थी। बाद में वह देश में सबसे सफल चार्टर्ड अकाउंटेंट बने। वह दि इंस्टिट्यूट ऑफ़ चार्टर्ड अकाउंट ऑफ इंडिया के सदस्य हैं।

आपातकाल के दौरान विद्यार्थी रहे युवा सुरेश प्रभु ने किस तरह इस जुल्म के विरोध में मुंबई के खार क्षेत्र में पर्चे भी बाँटे थे।

श्री प्रभु उद्योग जगत के दिग्गजों के किसी सेमिनार को संबोधित कर रहे हों या दुनिया के किसी भी प्रतिष्ठित मंच पर किसी अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में, आम कार्यकर्ताओं के बीच खड़े हों या किसी अध्यात्मिक मंच पर, हर कोई उनकी कही हुई बात को ध्यान से सुनता है। सुरेश प्रभु के साथ न कोई लाव लश्कर होता है न कोई प्रोटोकाल, न सहायक। कार्यक्रमों में भी न हार पहनने का शौक न स्वागत समारोह का। कम से कम समय में अपनी बात कहना और अगले कार्यक्रम के लिए रवाना हो जाना। अपने भाषण में वे कभी किसी विरोधी की न तो छीछालेदारी करते हैं न उसकी कमियों पर कोई बात करते हैं।

सुरेश प्रभु के रेल मंत्री रहते हुए ही पूर्वोत्तर के कई इलाके पहली बार रेलवे के नक्शे में शामिल हुए हैं, और पूर्वोत्तर में भाजपा ने जो जीत हासिल की है उसमें सुरेश प्रभु का भी योगदान कम नहीं रहा है।

सुरेश प्रभु सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं लेकिन उनके ट्वीटर और फेसबुक पेज देखेंगे तो ऐसा नहीं लगेगा कि किसी राजनीतिज्ञ का पेज देख रहे हैं वहां आपको राष्ट्रीय नेताओं, वीर बलिदानियों, संस्कृति, कला, खेल व साहित्य से जुड़े लोगों के बारे में कुछ न कुछ देखने को मिलेगा।

प्रधान मंत्री श्री  नरेन्द्र मोदी ने खुद एक कार्यक्रम में कहा था कि सुरेश प्रभु ऐसे  रेल मंत्री हें जो तालियां बजवाने के लिए काम नहीं करते।

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एक निवेदन

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