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एंग्लों-इंडियन का रोचक इतिहास

हाल ही में जिम कारबेट पार्क गया था। वहां से लौटा तो सोचा कि क्यों न उस व्यक्ति के बारे में कुछ जानकारी हासिल की जाए, जिसके नाम पर यह संरक्षण वन बनाया गया। अचानक नजर एक ऐसे तथ्य पर पड़ी जो कि बड़ा रोचक था। इसके मुताबिक जिम कारबेट, रोजर बिन्नी व कैटरीना कैफ में एक बड़ी समानता है। वे तीनों ही एंग्लो इंडियन हैं। एंग्लो इंडियन शब्द बचपन से सुनता आया था और आज भी सुन रहा हूं।

बचपन में ऐसे लोगों को एंग्लो इंडियन कहा जाता था जो कि देखने में तो हमारे जैसे गिरते रंग वाले होते थे पर अंग्रेजी धारा प्रवाह बोलते थे। अंग्रेजों की तरह हैट लगाते। उनकी महिलाएं फ्राक पहनतीं। वे लोग चर्च जाते थे। ईस्टर मनाते थे। तब हम लोग उन्हें काला अंग्रेज कहकर बुलाते थे। उस समय समझ में नहीं आता था कि उनमें व आम ईसाइयों में क्या अंतर होता है। अब जब संसद में सवा साल से खाली पड़ी एंग्लो इंडियन समुदाय की सीटों को मनोनयन के जरिए भरे जाने की मांग तेज हो गई है तो इस वर्ग के बारे में जानकारी हासिल करना बहुत रुचिकर हो जाता है।

हमारे देश में यूरोप के लोगों का आना काफी पहले शुरु हो गया था। पहले 1498 में डच वास्कोडिगामा आया। फिर 1540 में पुर्तगाली आए। पुर्तगालियों ने जिन भारतीयों से शादी की उनके बच्चों को लुसो इंडियस का नाम दिया गया। 17 वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में प्रवेश हुआ। उसकी नियत इस देश पर जम चुकी थी। उसके लिए तभी शासन कर पाना संभव था जबकि यहां के लोग उसका साथ देते।

कंपनी ने अपने ब्रिटिश कर्मचारियों को स्थानीय लोगों के साथ शादी करने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया। ऐसे हर बच्चे के जन्म पर नकद इनाम दिया जाता था। तब भारत पहुंचने में बहुत समय लगता था इसलिए ब्रिटिश अफसर व कर्मचारियों को अपने परिवार को यहां लाने में दिक्कत होती थीं। इसलिए वे स्थानीय लोगों के साथ शादियां करने लगे। उनसे पैदा हुए बच्चों को यूरेशियन कहा जाता था। 19 वीं शताब्दी के अंत में स्वेज नहर का निर्माण पूरा हो जाने के कारण अंग्रेज महिलाओं का भारत आना आसान हो गया व ब्रिटिश उनसे ही विवाह करने लगे। तब भारतीय मां से पैदा हुए अंग्रेजों के बच्चे को ‘कच्चा बच्चा’ (अधपकी रोटी) कहा जाता था। वे सिर्फ रंग और शक्ल सूरत से ही भारतीय लगते थे। उनकी हरकतें पहनावा, व्यवहार सब कुछ अंग्रेजों जैसा ही था।

जब 1857 का गदर हुआ तो ब्रिटिश हुकूमत सतर्क हो गई। उन्होंने कानून बनाकर अंग्रेजों को भारतीय से शादी करने पर प्रतिबंध लगा दिया। ऐसे में इस वर्ग की दिक्कत यह पैदा हो गई कि अंग्रेज व भारतीय दोनों ही उनको हिकारत करने लगे। उनकी स्थिति हंस के पंख लगाए कौवे जैसी हो गई। अंग्रेज उन पर हिंदुस्तानी मूल का होने के कारण व भारतीय उनके अंग्रेजों के साथ होने के कारण अविश्वास करने लगे हालांकि इस वर्ग के लोगों की अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। वे ईसाई थे। उनके अपने अलग चर्च, व स्कूल थे। उनका खाना भी अंग्रेजों जैसा था। ‘जाल फ्रेजी’ सरीखे व्यंजन उनकी ही देन है। वे पश्चिमी संगीत जैज आदि में बेहद रुचि लेते थे। जब देश आजाद हुआ तो स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा न लेने के कारण इस वर्ग को लगा कि उनके लिए हिंदुस्तान में रह पाना मुश्किल हो जाएगा। वे पढ़े लिखे तो थे, इसलिए बड़ी तादाद में एंग्लो इंडियन कॉमनवेल्थ देशों जैसे आस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन आदि चले गए।

उन्हें अंग्रेजों के रहते ही एंग्लो इंडियन नाम दिया जा चुका था। इसकी दो परिभाषाएं थीं, पहले उन लोगों को एंग्लो इंडियन माना गया जो यूरोपीय मूल के थे पर उनका जन्म भारत में हुआ व वे यही पले बढ़े। इनमें रुडयर्ड किपलिंग, जॉर्ज ऑरवेल, रस्किन बांड आदि शामिल थे। बाद में इस परिभाषा के तहत उन लोगों को भी एंग्लो इंडियन माना गया, जिनके पिता यूरोपीय व मां भारतीय थीं। ऐसे लोगों की सूची बहुत लंबी हैं। इनमें क्लिफ रिचर्ड, क्रिकेटर नासिर हुसैन, फुटबाल खिलाड़ी माइकेल चोपड़ा शामिल हैं। बेन किंग्सले, एयरवाइस मार्शल मौरिस बरकार, लारा दत्ता, महेश भूपति, रोजर बिन्नी, फ्रैंक एंथोनी, पूर्व वायुसेनाध्यक्ष अनिल कुमार ब्राउनी, कैटरीना कैफ सभी इसी समुदाय से हैं।

आजादी के बाद जब संविधान बनाया जा रहा था तो इस वर्ग के चर्चित नेता फ्रैंक एंथोनी ने जवाहरलाल नेहरु पर संसद में एंग्लो इंडियन के लिए सीट आरक्षित किए जाने की मांग की। उनकी दलील थी कि इस वर्ग के ज्यादातर लोग विदेश जा चुके हैं। उनकी कुल संख्या तब करीब पांच लाख थी जो कि देश भर में बंटे हुए थे। इसलिए उनका संसद तक पहुंच पाना असंभव था। नेहरु ने उनके लिए लोकसभा में दो सीटों के मनोनयन की व्यवस्था कर दी। ऑल इंडिया एंग्लो इंडियन समुदाय के अध्यक्ष फ्रैंक एंथोनी मरने तक मनोनीत होते रहे। उन्होंने आइसीएसई शिक्षा प्रणाली विकसित करने में योगदान दिया व इसके पहले अध्यक्ष बने। शुरू में मनोनीत करने का प्रावधान 1960 तक के लिए किया गया था। उनके अलावा एईटी बैरो भी पहली बार मनोनीत किए गए थे। दो बार संविधान संशोधन कर 2020 तक एंग्लो इंडियन समुदाय के दो लोगों को मनोनीत किए जाने का प्रावधान कर दिया गया है।

केरल के चार्ल्स डियास व उत्तराखंड के इनग्रिड मैक लायड मनोनीत किए गए अंतिम सांसद थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी बीट्रिक्स डिसूजा व डेंजिल बैटकिनसन को मनोनीत किया था। पीवी नरसिंह राव ने अपनी सरकार के खिलाफ विश्वास मत लाए जाने के कुछ दिन पहले ही यह स्थान भरे थे।
चूंकि मनोनीत सदस्य राष्ट्रपति पद के चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते इसलिए तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन को देश का ऐसा एकमात्र एंग्लो इंडियन सांसद होने का गौरव हासिल है, जिसने इस चुनाव में 2012 में मतदान किया था। नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से यह दोनों ही सीटें खाली हैं।
इस समुदाय के लोग लगातार सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं कि उन्हें भरा जाए। पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ। उनका कहना है कि एक साल बीत गया है व पहले साल की संसदीय निधि की राशि से समुदाय वंचित रह गया है। वैसे भी इस समय देश में इस समुदाय की संख्या 80 हजार से सवा लाख के बीच है क्योंकि तमाम लोगों ने हिंदू व दूसरे धर्म स्वीकार कर लिए हैं।

-(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विनम्र उनका लेखन नाम है।)

 

साभार- http://www.nayaindia.com/ से 

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