आप यहाँ है :

पुरस्कार और सम्मान की राशि से किताबें खरीदते और बाँट देते हैं डॉ.चंद्रकुमार जैन

राजनांदगांव। नया साल, नए सवालों और नई उम्मीदों के साथ दस्तक दे चुका है। कुछ करना और करते रहना, कुछ पाना और कुछ खोना अगर ज़िन्दगी का उसूल है तो गौरतलब है दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ. चंद्रकुमार जैन ने अपनी बहुआयामी गतिविधियों के बीच एक पहलू ऐसा भी चुना है जिसमें वह चुपचाप बहुत कुछ करते आ रहे हैं। वे अक्षरों, भावों और विचारों की दुनिया के लिए लोगों में प्यार जगाने के लिए नई सदी की शुरुआत से ही, तब जब छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया था, अच्छा साहित्य मुफ्त भेंट करने का अभियान जारी रखे हुए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि बच्चों से लेकर उम्रदाज लोगों तक वे अब तक लगभग दस हजार पुस्तकें भेंट कर चुके हैं।

हाल ही में, मानवाधिकार दिवस पर उज्ज्वल फाउंडेशन के एक यादगार आयोजन में उन्होंने होनहार छात्र छात्राओं को अपनी सम्पादित कृति सीप के मोटी की प्रतियां बड़ी संख्या में उपहार स्वरूप देकर उन्हें पढ़ने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

डॉ.चंद्रकुमार जैन विविध प्रसंगों पर चीजें गिफ्ट में देने से किताबें भेंट करना बेहतर मानते हैं। इसलिए एक तरफ वे साहित्यिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक कार्यक्रम और बौद्धिक आयोजनों में अपनी बचत से स्वरचित रचनात्मक कृतियों से लेकर शोध ग्रन्थ तक तो दूसरी तरफ स्वामी विवेकानंद, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य, आचार्य विजय रत्नसुंदर सूरि जी महाराज सहित अनेक युवा लेखकों, कलाकारों की कृतियाँ भेंट करते आ रहे हैं। अपनी मातृ संस्था दिग्विजय कालेज और पूर्व में लबहादुरनगर,कमला कालेज और साइंस कालेज में भी अनेक अवसरों पर डॉ. जैन ने किताबें भेंट कर मिसाल पेश की जिसकी मुक्त कंठ से सराहना की गई। डॉ. जैन कई अवसरों पर उन्हें पुरस्कार और सम्मान में मिली राशि और उन क़िताबों को भी बाँट देने में सुकून महसूस करते हैं जिनकी जरूरत उनसे अधिक औरों को होती है।

डॉ.चंद्रकुमार जैन मानते हैं कि अच्छी पुस्तकें इंसान के साथ -साथ चलने वाले उजाले की तरह होती हैं। किताबों से बड़ा कोई मित्र संभव नहीं है। जब इंसान को निराशाएं घेर लें,चुनौतियाँ मुंह बाये खडी हों, क्षितिज पर आशा की कोई किरण भी न दिखती हो तब अगर कोई अच्छी किताब उसके हाथ लग जाये और वह उसकी सीख को अपना ले तो हालात बदलते देर नहीं लगती। उल्लेखनीय है कि पढ़ने, लिखने और बोलने की कला ने ही खुद डॉ.चंद्रकुमार जैन को अलग पहचान ही नहीं, अलग मक़ाम भी दिया है। इसलिए वो अक्षरों की दुनिया से सीखने और उसकी सौगात देने का कोई मौक़ा चूकना नहीं चाहते। यह सिलसिला जारी है, और डॉ. जैन की मानें तो नए साल में यह दौर और ज्यादा तेज चलेगा।



सम्बंधित लेख
 

ईमेल सबस्क्रिप्शन

PHOTOS

VIDEOS

Back to Top