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क्या टूट सकती है नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और गिर सकती है वर्तमान बिहार सरकार?

जनता दल (यू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह का राज्यसभा में कार्यकाल अगले महीने खत्म हो रहा है किंतु नीतीश कुमार व ललन सिंह के नेतृत्व वाली पार्टी ने उनकी जगह झारखंड के जदयू नेता खीरु महतो को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है।
राज्यसभा से टिकट कटने के बाद आरसीपी सिंह ने बिहार में पत्रकारों से बात करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कही है जिसके आधार पर समझा जा सकता है कि नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह के बीच दूरियां बढ़ गई है। इसका परिणाम क्या होगा ये निकट भविष्य में ही तय हो जाएगा।

आरसीपी सिंह जद यू में नीतीश के बाद दूसरे नंबर के नेता रहे हैं। ऐसे में आरसीपी सिंह के बयान बताते हैं कि जदयू में बड़ा भूचाल आना संभव है। इसका एक प्रभाव बिहार सरकार के भविष्य पर भी पड़ने की उम्मीद है।
आरसीपी सिंह ने पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का केंद्रीय मंत्री मंडल में रखना अथवा हटाना प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है। वो चाहें तो मैं छह महीने तक अभी मंत्री बने रह सकता हूँ। यानी आरसीपी सिंह ने एक तरह से यह बताने का प्रयास किया है कि उनके पास नीतीश के अलावा भी विकल्प है।
दूसरी बात में पत्रकारों के पूछे जाने पर कि 2019 में नीतीश कुमार ने कहा था कि केंद्रीय मंत्री मंडल में सांकेतिक हिस्सेदारी नहीं चाहिए। उसके बाद भी आप मंत्री मंडल में शामिल हुए तो क्या जद यू दुबारा केंद्रीय मंत्री मंडल में सांकेतिक भागीदार बनेगा? इस प्रश्न के उत्तर में आरसीपी सिंह ने कहा कि भाजपा के पास 303 सीटों का स्पष्ट बहुमत है। ये उनका बड़प्पन है कि उन्होंने आपको भी एक सीट दे दी। स्पष्ट रूप से यह भाषा किसी जद यू समर्थक की न होकर भाजपा समर्थक की प्रतीत होती है।
पत्रकार ने जब कहा कि नीतीश जी ने कहा था.. इस पर आरसीपी सिंह ने जवाब दिया कि जिसने भी कहा हो।
एक और प्रश्न में यह पूछे जाने पर कि आपको कब पता चला कि आपका टिकट कट चुका है तो श्री सिंह ने बताया कि जब आपने मीडिया में चलाया। यानी उनकी बात नीतीश कुमार से नहीं हुई। इसका स्पष्ट अर्थ है कि नीतीश और आरसीपी सिंह में दूरियां कितनी बढ़ गई है।
आरसीपी सिंह ने यह भी कहा कि मैंने पार्टी में 30- 32 प्रकोष्ठ खोला था जिसे अब 12 कर दिया “इन लोगों” ने। प्रश्न यह है कि “इन लोगों” का अर्थ क्या है? वे इन लोगों में किसे रखते हैं?
इसी कड़ी में उन्होंने इन प्रकोष्ठों के अध्यक्ष व नेताओं का भी जिक्र किया। संभव है कि ये नेता आरसीपी सिंह के गुट के हों जिन्हें अब पार्टी में साइड लाइन कर दिया गया है। प्रश्न उठता है कि आरसीपी सिंह का अगला कदम क्या होगा? क्या इन प्रकोष्ठ के निर्वासित नेताओं के साथ आरसीपी सिंह कोई नया दांव चलेंगे? क्या भाजपा भी एक विकल्प है?

आरसीपी सिंह कुर्मी समाज से आते हैं। भाजपा के पास बिहार में कुर्मी समाज से कोई बड़ा नेता नहीं है। विगत कुछ महिनीं से नीतीश कुमार लालू परिवार के करीब होते नजर आ रहे हैं। बिहार में राजद नेता तेजस्वी यादव ने जातीय आधारित जनगणना को लेकर मुख्यमंत्री के सामने चुनौती रख दी थी जिसके बाद नीतीश कुमार की भी दिलचस्पी इस ओर दिखी है। नीतीश इसे हथियार बना कर जदयू से अलग हुई पिछड़ी जातियों को अपने साथ दुबारा लाना चाहते हैं। नीतीश जातीय जनगणना के समर्थन में हैं और बिहार में जातीय आधारित जनगणना करवाने पर विचार कर रहे हैं। किंतु इसमें सबसे बड़ी बाधा भाजपा जदयू गठबंधन है।

जदयू एक क्षेत्रीय पार्टी है उसके लिए बिहार राज की सत्ता में बने रहना ही एक मात्र चुनौती है अतः ऐसे विषय पर अपनी राय बनाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। किन्तु बड़ा प्रश्न है कि भाजपा इसे कैसे स्वीकार कर सकती है? भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है और केंद्र में सत्ता में भी है। किसी राज्य में जातीय जनगणना को स्वीकृति देने का प्रभाव पूरे राष्ट्र में पड़ेगा। विभिन्न राज्यों से ऐसी मांग समय समय पर उठती रहती है। यदि भाजपा बिहार में इसे स्वीकार करती है तो पूरा देश नब्बे के दशक की जातीय हिंसा के चपेट में आ सकता है। जो प्रगति पथ पर चल रहे राष्ट्र के लिए उचित नहीं होगा। नीतीश कुमार अंदर से इस जनगणना के पक्ष में न भी हों किंतु भाजपा पर दबाव बनाने के लिए इसे अपबा हथियार बनाना चाहते हैं।

नीतीश की राजनीति सदा दबाव बनाने वाली रही है। वो जिनके साथ गठबंधन में रहते हैं सदैव उस पार्टियों पर दबाव बनाए रखना चाहते हैं। 2013 में भी उन्होंने ऐसा ही किया था। भाजपा नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार न बनाए इसके लिए भी खूब दबाव बनाया किंतु वह पहली बार था जब भाजपा उनके दबाव के आगे नहीं झुकी। परिणाम हुआ कि नीतीश राजद के साथ चले गए। वहाँ भी राजद पर दबाव बनाने का प्रयास किया, लालू यादव नहीं झुके परिणामस्वरूप गठबंधन टूट गया। नीतीश दुबारा भाजपा के साथ सत्ता में लौटे।
इन दिनों नीतीश भाजपा पर दबाव बनाने के लिए राजद के साथ खड़े होकर जातीय जनगणना का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि आरसीपी सिंह की नजदीकी भाजपा के साथ बढ़ रही थी अतः नीतीश कुमार द्वारा आरसीपी का राज्यसभा का टिकट काटे जाने का यह भी एक कारण हो सकता है। जातीय जनगणना की मांग के बाद नीतीश को उम्मीद है कि पिछड़ी जातियों के मतदाता उनसे जुड़ जाएंगे अतः उन्हें पिछड़ी जातियों के नेताओं की चिंता नहीं है। उनकी चिंता अगड़ी जातियों के वोटर खासकर भूमिहार वोटर को लेकर है। बिहार की राजनीति में भूमिहार का बड़ा प्रभाव है। इस कारण भी उन्होंने कुर्मी नेता आरसीपी सिंह की जगह भूमिहार नेता ललन सिंह के साथ जाना स्वीकार किया।

आरसीपी सिंह मूलतः बिहार के बिहारशरीफ क्षेत्र से आते हैं जिसे कुर्मी जाति का गढ़ माना जाता है। आरसीपी सिंह की जगह नीतीश कुमार ने जिन खीरु महतो को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है वह भी कुर्मी जाति से ही हैं और इनका मूल पैतृक घर बिहारशरीफ ही है। खीरु महतो को टिकट देकर नीतीश आरसीपी को उनकी हैसियत बताना चाहते हैं कि आपका वजूद एक कुर्मी नेता और आपका प्रभाव बिहारशरीफ तक ही सीमित है जैसा कि खीरु महतो का। खीरु महतो के माध्यम से नीतीश यह भी बताना चाहते हैं कि पार्टी उनके मर्जी के अनुसार ही चलेगी।

ब्यूरोक्रेसी से राजनीति में आए आरसीपी सिंह की ब्यूरोक्रेसी पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। इधर नीतीश भी ब्यूरोक्रेसी की कमान अपने हाथों में रखना चाहते हैं। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव राजद के साथ लड़ने वाले नीतीश का बाद में लालू यादव से मतभेद व कुछ ही महीनों बाद सरकार गिराने के पीछे का एक बड़ा कारण ब्यूरोक्रेसी पर पकड़ भी था। नीतीश चाहते थे कि प्रशासन उनके इशारे पर चले जबकि लालू यादव सीधा आदेश देने लगे थे। नीतीश सत्ता व पावर के बिना नहीं रह सकते। उनकी शक्तियों को कोई कमजोर करे यह उन्हें कतई स्वीकार नहीं है। क्या ब्यूरोक्रेसी पर आरसीपी सिंह की मजबूत पकड़ भी दोनो के बीच की दूरियों का कारण बना?

नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को पहले बिहार की राजनीति से दूर जाने दिया व केंद्र में मंत्री बनने के बाद ललन सिंह के साथ पार्टी के अंदर भी उनकी पकड़ कमजोर करते चले गए। धीरे धीरे पार्टी के अंदर उन नेताओं को हाशिए पर ला दिया गया जो आरसीपी सिंह के करीबी माने जाते थे।

अध्यक्ष रहते हुए आरसीपी सिंह द्वारा बनाए गए कई प्रकोष्ठों को भंग कर दिया गया। पार्टी के पावर सेंटर को भी बदल दिया गया। अंततः आज आरसीपी सिंह को राज्यसभा से बेदखल कर दिया गया। इन सभी बातों के बीच हमें नहीं भूलना चाहिए कि आरसीपी सिंह राजनीति के मझे हुए खिलाफ है और जदयू में पकड़ भी रखते हैं। पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के साथ उनकी नजदीकियां भी बढ़ी है। ऐसे में ये देखना होगा कि आरसीपी सिंह जदयू से अलग धड़ा खड़ा करते हैं या अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल होते हैं। यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही इसका प्रभाव बिहार की चल रही वर्तमान सरकार पर पड़ेगा। संभव है कि नीतीश भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दुबारा राजद के साथ सरकार बना ले। हालांकि इसकी संभावना कम है क्योंकि नीतीश को ये ज्ञात है कि राजद के साथ रह कर उनकी शक्तियां क्षीण ही होंगी बढ़ेगी नहीं। परिणाम जो भी हो बिहार को कुछ नया नहीं मिलने वाला।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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