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दीना माझी नहीं, हम सब इस भ्रष्ट व्यवस्था की लाश ढो रहे हैं

“एक दशरथ मांझी था जिसने अपनी पत्नी की खातिर पहाड़ को काट-काट कर एक सड़क बना डाली थी। केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर उसने अकेले ही 360 फुट लम्बे, 30 फुट चौड़े और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काट कर दो क्षेत्रों वजीरगंज और अतरी की दूरी को 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिया था। जो काम सरकार और प्रशासन नहीं कर पाए वह दशरथ मांझी के हाथों ने कर दिखाया.!”

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“एक है ओडिशा का दीना मांझी जो अस्पताल द्वारा एम्बुलैंस उपलब्ध कराने से इंकार करने पर पत्नी के शव को कंधे पर उठाकर दस किलोमीटर तक चला। साथ में उसकी रोती-बिलखती बेटी भी थी। कालाहांडी के मनानी पटवा के गरीब आदिवासी दीना मांझी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह एम्बुलैंस का इंतजाम करता। भला हो कुछ पत्रकारों और लोगों का जिन्होंने प्रशासन से सम्पर्क कर उसे एम्बुलैंस उपलब्ध कराई.!”

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“ओडिशा के बालासौर का दूसरा दृश्य देखिये। जब ट्रेन से गिरकर एक वृद्धा की मौत हो जाती है और उसका शव पोस्टमार्टम के लिए छोड़ दिया गया था, ऐसे में एम्बुलैंस नहीं मिलने पर सफाई कर्मचारी ने शव का कूल्हा तोड़ कर उसे गठरी की तरह बना दिया और परिवार वाले लाश को जानवरों की तरह बांस से टांग कर अंतिम संस्कार के लिए ले गए.!”

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“आजादी के 70 वर्ष बाद हमें देश में ऐसे दृश्य देखने पड़े जिनको देखकर शरीर में सिहरन दौड़ जाती है। कालाहांडी में एक व्यक्ति की औसत आय आज भी महज 500 रुपए महीना है। बालासौर का नाम तो अंतरिक्ष क्षेत्र में काफी चर्चित है लेकिन आज भी वहां के लोगों को जीवन यापन के लिए कोई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं.!”

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“देश में आदिवासियों के कल्याण के लिए करोड़ों-अरबों की योजनाओं का ऐलान किया जाता है लेकिन इन योजनाओं की राशि आखिर जाती कहाँ है। हम स्वतंत्रता दिवस मनाएँ या गणतंत्र दिवस, हम मंगल पर यान भेजें या मिशन मून की तैयारी करें, इन सबका कोई अर्थ नहीं रह जाता, जब हाशिये पर खड़े लोगों को अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने के लिए भी कोई वाहन नहीं मिले.!”

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“यह शब्द न जाने कितनी बार दोहराये जाते हैं कि मानवता शर्मसार हो उठी है, मानवता कराह उठी है। दीना मांझी ने अपनी पत्नी की लाश ही नहीं ढोई, बालासौर में एक बेटे ने बांस पर अपनी वृद्ध माँ के शव को बांध कर एक शव को नहीं ढोया बल्कि उन्होंने व्यवस्था की लाश को ढोया है। किसी ने कोई कंधा नहीं दिया, दरिन्दगी की जिस मानसिकता का परिचय व्यवस्था ने दिया है उतना ही समाज ने भी दिया है.!”

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“इन घटनाओं ने ओडिशा सरकार ही नहीं बल्कि पूरे देश की व्यवस्था पर करारा तमाचा जड़ा है। समाज ने भी उनके दर्द, उनकी पीड़ा और उनकी वेदना को नहीं समझा। जीते जी तो उन्हें सम्मान नहीं मिला, मरने के बाद अंतिम विदाई भी अपमानजनक ढंग से हुई.!”

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“ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने फरवरी से महाप्रयाण योजना के तहत शवों को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त परिवहन सुविधा योजना शुरू की थी। इसी योजना के तहत मांझी ने भी मांग की थी कि उसे एम्बुलैंस मिल जाए लेकिन इस देश में सब कुछ आपकी आर्थिक या राजनीतिक हैसियत से तय होता है यहाँ तक कि प्राइवेट अस्पताल में लोगों का इलाज भी.!”

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“राज्य सरकारों ने चिकित्सा सेवाओं का ऐसा निजीकरण किया है कि उपचार की सुविधा केवल अमीरों को ही मिलती है। गरीब आदमी की हालत तो किसी जानवर से कम नहीं होती। प्राइवेट अस्पताल के गेट पर बच्चों को जन्म देते देखा गया है। निजी अस्पताल तो बिना बिल चुकाए लाश भी उठाने नहीं देते। सरकारी अस्पतालों में गरीबों को कौन पूछने वाला है। व्यवस्था तो संवेदनहीन हो ही चुकी है, समाज में भी संवेदनशीलता कहीं खो कर रह गई है.!”

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“एक तरफ भारत अमीर देशों की सूची में काफी ऊपर है, दूसरी तरफ यह चेहरा। यह हमारे सामाजिक उत्तरदायित्व की विफलता है। जरा सोचिये लोग सिर्फ तमाशबीन बने हुए थे। लोगों में क्या कोई दीना मांझी की 12 साल की बेटी का हृदय विदारक क्रन्दन नहीं देख रहा था.?”
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“अदम गोंडवी की रचना की दो पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगा:-
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”मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे,
हम अपने इस कालखंड का, एक नया इतिहास लिखेंगे.!”
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“जब तक व्यवस्था नहीं सुधरती, समाज की मानसिकता नहीं बदलती, आम आदमी व्यवस्था की लाश कंधों पर ढोता ही रहेगा.!”

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