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देश में हिंदी संस्कृत और स्थानीय भाषा में शिक्षा देना जरुरीः जी माीधवन नायर

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन :इसरो: के पूर्व अध्यक्ष जी माधवन नायर ने कहा है कि शिक्षा को लेकर सभी राज्यों में तीन भाषाओं की नीति अपनाई जानी चाहिए और छात्रों को सर्वाधिक वैग्यानिक भाषाओं में से एक संस्कृत पढ़ने का भी विकल्प दिया जाना चाहिए।

पीटीआई-भाषा से श्री नायर ने कहा कि सभी राज्यों में तीन भाषाओं :हिन्दी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा: की नीति अपनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिन्दी एक संपर्क भाषा है, वहीं अंग्रेजी को हमारी प्रणाली से बाहर नहीं रखा जा सकता। प्राथमिक शिक्षा अधिक सक्षम तरीके से स्थानीय भाषा में दी जा सकती है। उन्होंने छात्रों को संस्कृत अध्ययन का विकल्प देने का भी पक्ष लिया। नायर ने कहा, संस्कृत सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है। मुझो लगता है कि इसे सीखने से व्यक्ति के विश्लेषण कौशल में सुधार होगा।

देश में शिक्षा गुणवाा में गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा ज्ञान देने की बजाय व्यवसाय की वस्तु बन चुकी है। उन्होंने परिसरों को उभरते राजनीतिक नेताओं के लिए प्रशिक्षण क्षेत्र बनाने की राजनीतिक दलों की प्रवृाि का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि बच्चों को सिर्फ तथ्य दिए जा रहे हैं, उन्हें वास्तविक शिक्षा नहीं दी जा रही और ज्यादातर मूल्यांकन परीक्षाएं विषय की उनकी समझा की जगह याददाश्त संबंधी परीक्षाएं हैं।

इसीलिए शिक्षा प्रणाली काफी बुरी तरह खराब हो चुकी है। परिणाम यह है कि जो लोग स्नातक या इंजीनियरिंग करने के बाद आते हैं, वे रोजगार के काबिल नहीं होते। उन्हें विषय की मूल समझा नहीं होती, उनके पास व्यावहारिक प्रयोज्यता की ग्यान दक्षता नहीं होती और इसका परिणाम दुखद स्थिति के रूप में निकल रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत के बहुत से निजी शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवाा सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है जो केवल छात्रों की आमद बढ़ाने और पैसा बनाने में रुचि रखते हैं।

नायर ने कहा, मुझो लगता है कि मूलत: शिक्षा इन दिनों ग्यान में उत्कृष्टता हासिल करने की जगह व्यवसाय की वस्तु बन गई है।

उन्होंने हालांकि कहा कि आईआईटी और बेंगलूरू स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस जैसे संस्थान अपने मानक अधिकांशत: इसलिए कायम रखे हुए हैं क्योंकि उन्हें अपने परिसरों में सर्वश्रेष्ठ छात्र मिलते हैं, लेकिन उन्हें वैश्विक दृष्टि के अनुरूप अपना स्तर बढ़ाने की आवश्यकता है।

नायर ने कहा कि किसी को भी शिक्षा के साथ राजनीति का घालमेल नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा, आज, एक बुरी प्रवृात्ति हावी है। बहुत से राजनीतिक दल हैं जो इन संस्थानों को अपने कैडर बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं, और इसे रोका जाना चाहिए। इसकी जगह इच्छुक राजनीतिक दल शिक्षण संस्थानों को इस तरह के उद्देश्य में बदलने की जगह राजनीतिक नेताओं के प्रशिक्षण के लिए अलग से कोई संस्थान शुरू कर सकते हैं।

शिक्षण में गुणवाा की अत्यावश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षकों का भी समय…समय पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

नायर ने गुरुकुल प्रणाली , खासकर शिक्षक-छात्र और अभिभावकों के बीच मजबूत संबंध से भी कुछ पाठ सीखने की वकालत की।

उन्होंने कहा, वह परिवेश बनाए जाने की आवश्यकता है। मूल्यांकन वार्षकि परीक्षा पर आधारित नहीं होना चाहिए। यह एक सतत मूल्यांकन होना चाहिए जहां माता-पिता भी बहुत ही वैग्यानिक तरीके से भागीदारी करें। शिक्षा के शुरुआती हिस्से में आधार मजबूती के लिए नैतिक अध्ययन शिक्षा दी जानी चाहिए।

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