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शिलान्यास पत्थरों पर शोध करेगा विदेशी विश्वविद्यालय

भारत घूमने आए एक विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने जब कई ऐतिहासिक स्थलों की सैर करने के दौरान विभिन्न शहरों में मंत्रियों, अधिकारियों और नेताओं के नाम पर लगे शिलान्यास पत्थर देखे तो उन्हें हैरानी हुई। उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ कि हमारे देश में शिलान्यास पत्थर लगाकर ही पुल, स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड बनाने जैसे पुण्य सरकारी काम पूरे हो जाते हैं। भारत की इस अद्भुत और अविश्वसनीय निर्माण कला को देख सभी विदेशी छात्र-छात्राएँ दंग रह गए। अपने देश जाते ही उन्होंने अपने देश की सरकार को और अपने विश्वविद्यालय को लिखा कि जिन योजनाओं पर हमारी सरकारें करोड़ों रुपये खर्च करती है, उसके नाम मात्र के खर्च में तो भारत में शिलान्यास पत्थर लगाकार वह योजना पूरी कर ली जाती है। अब उस देश की सरकार ने भारत के शिलान्यास पत्थरों पर शोध करने के लिए एक शोध दल तैयार किया है। यह शोध दल भारत आकर देश भर में गाँव-गाँव में लगे शिलान्यास पत्थरों पर शोध कर एक रिपोर्ट तैयार करेगा।

इस संबंध में पत्र मिलते ही भारत सरकार के कई मंत्रालयों में इसका श्रेय लेने की होड़ मच गई। विदेश मंत्रालय का कहना था कि चूँकि ये शोधार्थी विदेश से आ रहे हैं इसलिए इस शोध काम को पूरा करवाने की जिम्मेदारी हमारी होगी। इधर पर्यटन मंत्रालय का कहना था कि चूँकि ये पर्यटन से जुड़ा मामला है और शोध करने वाले टूरिस्ट वीज़ा पर भारत आ रहे हैं इसलिए इस शोध का पूरा काम हमारे मंत्रालय की देखरेख में होगा। जब इस बारे में राज्य सरकारों को पता चला तो कई मुख्य मंत्रियों ने इस पर घोर आपत्ति जताई। हर राज्य के मुख्यमंत्री ने खुद के और राज्य के मंत्रियों द्वारा लगाए गए शिलान्यास पत्थरों की संख्या बढ़-चढ़कर बताई और कहा कि चूँकि हमारे राज्य में सबसे ज्यादा शिलान्यास पत्थर लगे हैं, इसलिए ये शोध केंद्र का नहीं बल्कि राज्य का विषय है। इस पर केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों ने आपत्ति लेते हुए कहा कि राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए अधिकांश शिलान्यास पत्थर केंद्र सरकार की योजनाओं के हैं और इन पर केंद्रीय मंत्रियों का भी नाम लिखा है, इसलिए कोई भी राज्य इस शोध में खुद भागीदार नहीं हो सकता। यह पूरा शोध केंद्र सरकार के उन सभी मंत्रालयों की निगरानी में होगा, जिनके शिलान्यास पत्थर लगे हैं।

इधर देश भर में इस शोध को लेकर गजब का उत्साह है, लोग अपने गाँव, शहर में लगे शिलान्यास पत्थरों का इतिहास खंगालने में लगे हैं। कई शिलान्यास पत्थरों ने तो तीन तीन पीढ़ियाँ देख ली मगर उनके काम पर आज तक एक ईंट तक नहीं लगी। लोगों ने तो शिलान्यास पत्थरों के साथ सेल्फी खींचकर विदेशी विश्वविद्यालय को भेजना शुरु कर दिया है। विदेशी विश्वविद्यालय के शोध छात्र भी इस बात से उत्साहित हैं कि भारत के लोग शिलान्यास पत्थरों को लेकर किस बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे हैं।

कई गाँवों और शहरों में तो बकायदा एसएमएस, वाट्सएप के साथ ही डोंडी पीटकर इस शोध के बारे में बताया जा रहा है। लोग अपने गाँव और शहर के बरसों पहले लगे शिलान्यास पत्थरों को खोज-खोजकर उनकी धुलाई सफाई में लगे हैं।

विदेशी शोध छात्र-छात्राओं ने कहा है कि वे उन सभी शिलान्यास पत्थरों को अपने शोध प्रोजेक्ट में शामिल करेंगे जिनको लगाए जाने के बाद वहाँ कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ है। इस रिपोर्ट को वे संयुक्त राष्ट्र संघ को भी सौंपेंगे ताकि दुनिया के बाकी देशों में भी सरकारी स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड या अन्य कोई भवन बनाने की ऐसी शॉर्टकट तकनीक अपना सकें और अपने देश के लोगों को बेवकूफ बना सकें। इनका कहना है कि हम अपने शोध में उन शिलान्यास पत्थरों को कतई शामिल नहीं करेंगे जहाँ पत्तर लगने के बाद गल्ती से कोई निर्माण कार्य हो गया हो, इससे हमारे शोध की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकता है।



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