आप यहाँ है :

नियति का महाभारत

युवा पीढ़ी के लेखक भुवनेश्वर उपाध्याय जो पूरी तरह से लेखन को अपना कर्म और धर्म मान चुके है। उनका नया उपन्यास महाभारत को पढ़ने का मौका मिला। अभी तक मैंने उनको एक कवि व्यंग्यकार और एक आलोचक के रूप में ही पढ़ा था। लेखक इस रचना के बाद, एक नये रूप में हमारे सामने आये है। मैं भुवनेश्वर उपाध्याय जी को एक आदर्शवादी लेखक के रूप में मानता हूँ। यह रचना भी इसी दर्शन के आधार पर लिखी गयी है।

महाभारत पर न जाने कितने लेखको ने अपनी कलम चलाई है और न जाने कितने लेखक इस विषय पर आगे भी लिखेंगे। लेकिन लेखक ने इसे इतिहास से वर्तमान को समझने के उद्देश्य से लिखा है।

जैसा कि लेखक कहता है कि जो महाभारत में नहीं है वो भारत में नहीं है। लेखक के इस मत से हमारे मत भिन्न हो सकते है। क्योंकि महाभारत के बाद भारत का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है लेकिन यह इस रूप में अलग है कि महाभारत की भीषण तबाही के कारणों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

महाभारत के कई पात्र पाठकों को अपने जैसे लग सकते है। असल में भुवनेश्वर उपाध्याय ने इसमें पात्रों का विश्लेष्ण अपने ही तरीके से पाठको के लिए एक बौद्धिक खुराक देने के लिए किया है।

एक सामन्ती समाज के दौर को पुनः लिखना जटिल तो है लेकिन लेखन का कौशल इसी चुनौती में देखने को है। उस दौर के सामाजिक संबंधो को मनोवैज्ञानिक रूप में खंगालना और फिर उसका सारगर्भित संवादों और परिस्थितियों की निर्माण कला इसका ख़ास शिल्प है।

इस रचना में यहाँ-वहां-जहाँ भी देखेंगे, धर्म, नियति, अहंकार , स्वार्थ जैसी शाशक वर्ग की एक मनोवृति को चिन्हित करने का प्रयास लेखक ने अपनी आदर्शवादी दृष्टी से किया है। शासक वर्ग चरित्र और उसके सत्य के पक्ष में अपने विचार रखे है। जो अनत: समय की नियति के रूप में स्वीकार किये गये है।यह आदर्शवादी धरना का से जुड़ा है जिसे भौतिकवादी कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे.

इस रचना के अधिकतर पात्र सत्ता के साथ जुड़े हुए है। किसी न किसी रूप में महाभारत में सक्रिय रूप से हिस्सेदार है। और वे सभी अपने बचाव के लिए एक से बढ़कर एक तर्क प्रस्तुत करते है। शासक वर्ग अपने बचाव् की लाख कोशिश करते है। लेकिन उनके द्वंद को लेखक पकड़ने की कोशिश करता है। उनके किये-धरे को मनोवैज्ञानिक रूप से रेखांकित करता है। अब पाठक पर निर्भर करता है कि महाभारत के लिए किसे दोषी माने, समय की नियति को या सत्ता की लालसा को।

लेखक: भुवनेश्वर उपाध्याय
पुस्तक : महाबरत के बाद
कीमत :12

image_pdfimage_print


Get in Touch

Back to Top