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वीरता की प्रतिमूर्ति हेलेना दत्त

जब जब देश पर संकट के बादल दिखाई दिए तब तब इस देश की वीर महिलाओं ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर बलिदानी मार्ग पर चलते हुए उन्हें सहयोग दिया| हमारी इस कथा की कथानायिका हेलेना दत्त जी भी इस प्रकार की नारियों में से एक थीं|

पूर्वी बंगाल जिसे आजकल हम बंगला देश के नाम से जानते हैं, इसके ढाका क्षेत्र के गाँव कालीगंज में एक सामान्य बंगाली परिवार में सन् १९१६ इस्वी में हमारी इस कथानायिका वीर बाला हेलेना का जन्म हुआ| सन् १९२६ ईस्वी में जब वह ढाका के हाई स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रही थी और उसकी आयु केवल दस वर्ष की ही थी, उस बालिका का संपर्क एक क्रांतिकारी महिला लीला नाग से हुआ| उनके इस संपर्क से हेलेना के लिए देश की स्वाधीनता का मार्ग जो अब तक बंद पडा था, खुल गया क्योंकि लीला नाग के संपर्क में आने के पश्चात् उन दोनों का समय समय पर मिलना आरम्भ हो गया| मिलने के इन अवसरों पर इनमें जो बाताहित होती, उस बातचीत के माध्यम से हेलेना दत्त को न केवल क्रांतिकारी गतिविधियों का ही ज्ञान होने लगा अपितु अब वह देश की आजादी के लिए होने वाली छोटी छोटी गतिविधियों में भी भाग लेने लगी| इन गतिविधियों के कारण हेलेना की निष्ठा क्रांतिकारी गतिविधियों तथा देश की स्वाधीनता के लिए प्रतिदिन बढ़ने लगीं|

लीला नाग से उसे जो मार्ग दर्शन हुआ उसके कारण हेलेना की देश की स्वाधीनता के लिए निष्ठा यहाँ तक बढ़ गई कि मात्र दो वर्ष में ही अर्थात् सन् १९२८ ईस्वी में विधिवत् रूप से “ दीपाली संघ” की सदस्य बन गई| अब हेलेना को स्वाधीनता सेनानी के रूप में तैयार किया जाने लगा तथा इस निमित्त वह शस्त्रास्त्र चलाना भी सीखने लगी | सन् १९३० ईस्वी में जो आन्दोलन हुआ, इसमें दीपाली संघ तथा श्री संघ के सदस्यों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया| वास्तव में सन् १९३० ईस्वी के आन्दोलन का आधार ही यह दोनों संगठन थे| अब तो हेलेना दत्त भी दीपाली संगठन के सक्रिय सदस्यों में गिनी जाने लगी थी| फिर वह इस आन्दोलन का अंग न बनती, यह कैसे संभव हो सकता था? इस प्रकार मात्र चौदह वर्षीय अवस्था में हेलना दत्त गुप्त रूप से पूर्ण समर्पण की भावना अपने अन्दर संजोये हुए इस आन्दोलन के सदस्यों के साथ जुड़ कर देश की स्वाधीनता का यह पुनीत कार्य करने लगी|

यह वह काल था जब देश की विदेशी सरकार क्रांतिकारियों पर सदा ही कोप दृष्टि बनाए रखती थी| अत: क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने वाले अंग्रेज की आँखों से बाख पावें, यह तो संभव ही न था| पारिणाम स्वरूप हेलेना दत्त भी शीघ्र ही सरकार की आँखों के लिए कंकर का काम करने लगी| बस फिर क्या था जो वीरांगना ढाका जिला के गाँव काली गंज से निकली थी, उस युवती को दिनांक १२ फरवरी सन १९३३ ईस्वी को सरकार ने भयंकर अपराधी मानते हुए उसे बंदी बना लिया| क्या अपराध था? बस एक ही अपराध कि वह क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेती है तथा क्रांतिकारियों को गतिविधियाँ बढाने के लिए सहायता भी देती रहती है| इतना ही नहीं उसके इस अपराध के कारण उसके निवास सथान की छान बीन भी की गई तो यहाँ से एक तमंचा भी बरामद किया गया| इस समय उसकी आयु मात्र सोलह वर्ष की ही थी| अत: अल्पायु का लाभ देते हुए उसे मात्र पांच वर्ष की जेल कि सजा सुनाई गई|

हेलेना दत्त पांच वर्ष की जेल काटकर सन् १९३७ इस्वी में जेल से बाहर आई| जेल से छूटने के पश्चात् दो वर्ष तक उसने शिक्षा पाप्ति का कार्य किया| अब तक यह वीरांगणा केवल हेलेना के नाम से ही जानी जाती थी किन्तु इन्ही दिनों उसका विवाह वीर क्रांतिकारी सुकुमार दत्त से हो गया और अब वह हेलेना दत्त बन गई और भविष्य में इस नाम से ही सुप्रसिद्ध हुई। उसके पति सुकुमार दत्त फारवर्ड ब्लाक के न केवल अग्रणी सदस्य ही थे अपितु एक कर्मठ कार्यकर्ता भी थे| अत: हेलेना का भी अपने पति के साथ हाथ बँटाने के लिए फॉरवर्ड ब्लाक में सम्मिलित होना अवश्यम्भावी दिखाई देने लगा| इस प्रकार कुछ ही दिनों में वह भी फारवर्ड ब्लाक में सम्मिलित होकर अपने पति के क्रांतिकारी कार्यों में हाथ बँटाने लगी|

जब भारत छोडो आन्दोलन को आरंभ करने का नाद निनादित हुआ तो हेलेना दत्त का हृदय एक बार फिर से फड़कने लगा| देश के लिए कुछ करने की उमंगें उसके अन्दर फिर से उठने लगीं| इस अवस्था में वह स्वयं को रोक न सकी, अपने आप को बांधकर न रख सकीं तथा एक दम से देश के कार्यों के लिए सक्रfय होकर देश हित के कार्यों में लग गई| अंग्रेज तो उसे पहले से ही जानते थे और इस कारण उस पर अपनी कोप दृष्टि बना ही रखी थी तथा हेलेना के आस पास स्वाधीनता किसी भी रूप में गतिविधियाँ देखते ही सन् १९३३ ईस्वी में हेलेना दत्त को अंग्रेज सरकार ने एक बार फिर से बंदी बनाकर दो वर्ष के लिए कारावास में भेज दिया| जेल की इस सजा से वह सन् १९४५ इस्वी को मुक्त हुई| इसके कुछ समय के पश्चात् ही अर्थात् दिनांक १५ अगस्त सन १९४७ ईस्वी को भारत स्वाधीन हो गया|

जो हेलेना दत्त अब तक देश की स्वाधीनता के लिए अँग्रेजों से जूझ रही थी,वह हेलेना दत्त अब देश के स्वाधीन होने के कारण इसके नव निर्माण के कार्यों में व्यस्त हो गई| वह भली प्रकार से जानती थी कि इस देश को दो सौ वर्ष तक फिरंगियों ने निरंतर लूटा है| यह ठीक है कि आज देश स्वाधीन हो चुका है किन्तु अब भी देश के नवयुवकों में देश के लिए भावना तैयार कारने की आवश्यकता को वह अनुभव कर रही थी, लोगों में कहीं स्वार्थ घर न क्र ले, इसलिए उन्हें ताप तथा त्याग के उपदेश की आवश्यकता को उसने अनुभव किया| देश के नवनिर्माण के इए यह सब आवश्यक भी था| अत: देश का एकनिष्ट सेवक बनते हुए हेलेना दत्त ने स्वयं को इस कार्य के लिए समर्पित कर दिया|

हम सब जानते हैं कि स्वतंत्रता सेनानी तो देश को जागरुक करने की इस क्रिया के सदा ही अभ्यस्त होते हैं और हेलेना दत्त का विगत जीवन भी क्रांतिकारी कार्य करने का ही रहा था| अत: क्रान्ति पथ की पथिक होने के कारण उसके लिए देश के नवनिर्माण के कार्यों को करने तथा नवयुवकों को जागृत करने के कार्यों में किसी प्रकार की भी कोई कठिनाई नहीं आई| हाँ! यदि वह चाहती तो इस प्रकार के त्यागपूर्ण कार्य करने के स्थान पर ,उसने विगत में देश के लिए जो कार्य किया था, उसका पूरा पूरा मूल्य इस देश से वसूल कर लेती किन्तु हेलेना में सत्ता सुख की तो कभी कोई लालसा थी ही नहीं! उसने सब प्रकार के प्रलोभनों से दूर ही रहना पसंद किया| सामाजिक उत्थान और देश का नवनिर्माण , आज यह एकमात्र उसका लक्ष्य था| अत: इस लक्ष्य को पाने के लिये उसने स्वयं को समर्पित कर दिया|

अब जब देश स्वाधीन था तथा देश को नवनिर्माण की आवश्यकता थी, इस अवस्था में कार्य का रूप भी बदलना ही था| अत: इसके लिए कार्य के नए रूप और नए ढंग की आवश्यकता को देखते हुए अनेक प्रकार के नए नए रूप से सामाजिक संस्थाओं का देश में उदय होने लगा| देश में सत्ता प्राप्ति के लिए अनेक नए राजनीतिक दलों का भी उदय हुआ| हेलेना दत्त ने भी इस प्रकार की संस्थाओं के माध्यम से ही देश के नवनिर्माण के प्रयास करने का निश्चय किया तथा उसने प्रजा सोशलिस्ट दल की सदस्यता ले ली तथा इस दल की सक्रिय सदस्या बनकर देश के उत्थान के कार्यों में लग गई| इस प्रकार अपने जीवन के अंत तक इस दल के माध्यम से ही देश के लिए कार्य करती रही|

डॉ..अशोक आर्य
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२०१०१२ गाजियाबाद उ.प्र.भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६
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