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फिल्म और टीवी से जुड़े हिंदी प्रेमियों ने कही दिल की बात

मुंबई। दिल्ली से आकर कोई मुंबई में फिल्म और टीवी से जुड़े हिंदी प्रेमी कलाकारों, निर्देशकों को आमंत्रित कर उनसे संवाद करे, उनका सम्मान करे तो इससे सुखद अनुभव कुछ नहीं हो सकता। मुंबई के फिल्म और टीवी में काम करने वालों की खासियत ये है कि फिल्मों और टीवी में तो वे हिंदी में बोलेंगे मर किसी सार्वजनिक मंच पर और मीडिया के सामने जते ही हिंदी भूलकर अंग्रेजी की गुलामी करने लगते हैं।

दिल्ली की संस्था साहित्य-संस्कृति-फाउंडेशन के श्री विजय कुमार मिश्रा ने सिनेमा और संस्कृति विषय पर रोचक परिसंवाद का आयोजन किया तो कई जाने माने कलाकारों, निर्देशकों ने हिंदी में अपनी बात कहकर इस धारणा को तोड़ दिया कि हिंदी फिल्म और टीवी जगत में काम करने वले अंग्रेजी की गुलामी में ही जीते हैं।

जाने माने अभिनेता श्री सलिल सुधाकर ने कहा कि ये धारणा ही गलत है कि जो चलता है वैसे ही फिल्में और धारावाहिक बनाएंगे। फिल्म व टीवी का माध्यम लोगों को जागरुक कनरे के लिए है उन्हें भटकाने के लिए नहीं। आज लोग समाज और रिवार से कटकर एकाकी हो गए हैं। पश्चिमी देशों से आई वेब सीरिज़ कुसंस्कृति को प्रचारित प्रसारित कर रही है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए श्री अनंत श्रीमाली ने कहा कि दर्शकों की मजबूरी है कि उन्हें मनोरंजन के नाम पर प्रदूषित सामग्री परोसी जा रही है। उत्सव फिल्म का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अगर निर्देशक की नीयत हो तो कामसूत्र पर भी बेहतरीन फिल्म बना सकता है।

फिल्म, विज्ञापन और टीवी के जगत में 10 हजार हिंदी प्रोमो लिख चुके श्री अंशुमान झा ने कहा कि मैं शब्दकार हूँ, हम बाज़ार के लिए लेखन करते हैं। मैं किसी समय, विचारधारा या सामाजिक संदेश देने के लिए नहीं लिखता। अगर कोई प्रेम कहानी है तो उसमें भजन नहीं गाये जा सकते। फिल्मों या टीवी धारावाहिकों का घटिया होना बाज़ार की माँग है और बाज़ार पूँजी से चलता है। उन्होंने कहा कि ये बूझना बड़ा मुश्किल है कि इस गिरावट के दौर के लिए कौन जिम्मेदार है दर्शक या फिल्म या टीवी की दुनिया। टीवी की लोकप्रियता टीआरपी से तय होती है और यही दर्शकों की पसंद होती है। एक ही शो के हजारों एपिसोड इसलिए चलते हैं कि दर्शक उन्हें पसंद करते हैं।

हिंदी पत्रिका अनभै के संपादक श्री रतन कुमार पांडेय ने कहा कि भाव सही हो तो परिणाम भी सही होगा।

उन्होंने कहा कि जब शादियों में ये है बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है गीत बजता है तो ऐसा लगता है कि दो आत्माओं के मिलन की बात हो रही है। जब एक बार आ जा आजा जैसा गीत बजता है तो लगता है किसी बदनाम गली से कोई आवाज़ आ रही है। आज बाज़ार के नाम पर सब-कुछ परोसा जा रहा है, बाजार शब्द हमारी परंपरा में निंदित शब्द रहा है। अकबर इलाहबादी ने भी कहा था-

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ

इस अवसर पर जाने माने ग़ज़लकार और मीडिया से जुड़े श्री आलोक श्रीवास्तव ने कहा कि जो मशालें जल रही है उनको अग्नि देने से बेहतर है, हम जो बुझ रही है उनको अग्नि देकर उन्हें बचाएँ।

उन्होंने कहा कि मंज़िलें क्या है रात क्या है, हौसला हो तो फ़ासला क्या है

तुम हमारे करीब बैठे हो अब दवा कैसी, दुआ क्या है, जब भी चाहेगा छीन लेगा वो सब उसी का है, आपका क्या है

चांदनी आज इसलिए नम है, चाँद की आँखों में चुभा क्या है

ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बे-ख़बर नहीं

अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया
मैं आप का रहूँगा मगर उम्र भर नहीं

आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएँगे कहाँ
आँखों से आगे उन की कोई रहगुज़र नहीं

कितना जिएँ कहाँ से जिएँ और किस लिए
ये इख़्तियार हम पे है तक़दीर पर नहीं

माज़ी की राख उलटीं तो चिंगारियाँ मिलीं
बे-शक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं

श्रोताओं की ज़बर्दस्त वाहवाही के बीच ग़ज़लों का दौर जारी रखते हुए उन्होंने कहा

बात करो तो, लफ़्ज़ों से भी ख़ुशबू आती है,
लगता है उस लड़की को भी उर्दू आती है.

तन्हाई में दिल से अक्सर ख़ुशबू आती है,
याद हमें अम्मा आती है, या तू आती है.

देख के उसको ख़ुद अपना भी होश नहीं रहता,
आँखों में लेकर वो ऐसा जादू आती है.

अपनों से दूरी के मौसम ज़ालिम होते हैं,
यूँ आती है पुरवा भी जैसे लू आती है.

जब भी माँ का ध्यान आता है, मेरी पेशानी-
पल भर में ही उसके चरणों को छू आती है.

दौलत ने कमज़र्फ़ों की तहज़ीब बदल डाली,
मेज़ पे अब खाने से पहले, दारू आती है.

हम ने भी तो दिल जीते हैं मीठे लफ़्ज़ों से-
हम कायस्थों को भी थोड़ी उर्दू आती है.

इस ग़ज़ल पर भी उन्हें ज़बर्दस्त दाद मिली और श्रोताओं ने उनको हाथों हाथ लिया

हर पाँच बरस में आऊँगा
स्याही ऊँगली पे लगाऊँगा
अपनी ताक़त दिखलाऊँगा
उस रोज़ समझ में आऊँगा
यूँ साधारण इंसान हूँ

मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

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मैं गुरूग्रंथ की वाणी हूँ
मैं गिरजा घर का ध्यान हूँ
मैं पूजन हूँ देवालय की,
मस्जिद की पाक अज़ान हूँ
मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

ना मैं चरित्र का दोहरा हूँ
ना कोई सियासी मोहरा हूँ
मैं ‘लेफ़्ट’ नहीं ‘राइट’ भी नहीं
अपनों से मेरी फ़ाइट भी नहीं
मैं तो नूतन अभियान हूँ
मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

ना धर्म की धाक जमाता हूँ
ना अपना धैर्य गवाता हूँ
ना जब-तब शोर मचाता हूँ
ना अपना देश जलाता हूँ
गौतम गांधी का मान हूँ
मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

मैं खेतों में मुरझाता हूँ
मैं सरहद पर मर जाता हूँ
मैं दफ़्तर-दफ़्तर पिसता हूँ
मैं कारोबार में घिसता हूँ
फिर भी ज़िंदा अभिमान हूँ
मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

हर पाँच बरस में आऊँगा
स्याही ऊँगली पे लगाऊँगा
अपनी ताक़त दिखलाऊँगा
उस रोज़ समझ में आऊँगा
यूँ साधारण इंसान हूँ
मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

मैं असली हिंदुस्तान हूँ
मैं सच्चा हिंदुस्तान हूँ

माँ को समर्पित गज़ल ने श्रोताओं को भिगोकर रख दिया

धूप हुई तो आंचल बनकर कोने-कोने छाई अम्मा,
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा.

उसने ख़ुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है,
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मा.

घर में झीने-रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा.

सारे रिश्ते-जेठ-दुपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा.

बाबूजी गुजरे; आपस में सब चीजें तक्सीम हुईं, तब-
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा.

इसके बाद दिल्ली से आए जाने माने कवि श्री शंभु शिखर ने अपनी हास्य रचनाओँ से श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। उन्होने कहा कि मैं हास्य इसलिए लिखता हूँ कि लोगों को तनाव से मुति दे सकूँ। उन्होंने कहा कि हमारे देश की संस्कृति में ही ये संभव है कि हमारे बिहार में जन्म से लेकर मृत्यु तक के लिए गीत गाए जाते हैं।

इस अवसर पर इप्टा की निवेदिता बौंठियाल ने समारोह में उपस्थित कलाकारों व निर्देशकों को सम्मानित कर उन्हें स्मृति चिन्ह प्रदान किया। कार्यक्रम में गैंग्स ऑफ वासेपुर के आदित्य कुमार, फिल्म प्रॉग के निरेदेशक रोहित खेतान, अभिनेत्री कामना पाठक, सारे जहाँ से अच्छा के श्री प्रकाश भारद्वाज, मधुबनी पेंटिग की जानी मानी कलाकार सुश्री पूजा कमारी, निर्देशक ऋत्विक मुखर्जी आदि का सम्मान किया गया।

सुश्री कंगना पाठक ने अपने विचारव्यक्त करते हुए कहा कि मैने लोकगीतों के साथ अपना बचपन बिताया है और और थिएटर से यात्रा शुरु कर टीवी पर पहचान बनाई है।

इस अवसर पर ओरिएंटल बैंक के राजभाषा अधिकारी श्री रवीन्द्र शांताराम अहिरे का भी स्वागत किया गया।

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