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काश !हम अपनी परंपराओं के वैज्ञानिक सत्य को समझ पाएँ

हाल ही में ताऊजी का देहांत हो गया। जब माँ ने यह दुखद समाचार देने के लिए टेलीफोन किया तो साथ में यह भी निर्देश दिया कि अब हमें तेरह दिनों के सूतक का पालन करना पड़ेगा। सूतक के चलते मंदिर जाना और किसी भी सामाजिक या शुभ प्रसंग में सम्मिलित होना वर्जित है। माँ के मुख से यह सुनकर मैं अचरज में पड़ गया।

माँ, जो कि हमारे परिवार की पहली पोस्ट ग्रैजूएट थीं और वह भी गणित में, क्या अंधविश्वासी हो गई हैँ? माँ, एक विवेकशील, प्रगतिशील नारी, जो हाई स्कूल के छात्रों को गणित पढ़ाती हैं, और साथ ही उन्हें यह भी शिक्षा देती हैं कि गणित के नियमों को भी बिना परखे स्वीकार मत करो, क्या ऐसी सोच रखने वाली माँ अंधविश्वास में पड़ गई? चाहे कितना भी प्रयास करूं मैं इस बात को पचा नहीं पा रहा था। फिर भी, माँ ने कहा है तो सूतक का पालन तो करना ही था।

कुछ ही दिनों के पश्चात करोना महामारी फैलने लगी और जगह जगह लॉकडाउन घोषित किए गए। हर व्यक्ति जिसमे करोना बीमारी के लक्षण दिखाई दिए उसे 14 दिनों के क्वारंटाइन में रहना अनिवार्य था। तब मन में विचार आया, सूतक भी तो एक प्रकार से क्वारंटाइन ही हुआ। क्या यह संभव है कि कई प्रथाएँ जो पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही हैं, उनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार हो जो समय के साथ लुप्त हो गया हो? और इस विचार से अज्ञात हम इन प्रथाओं को अंधविश्वास समझने लगे हों?

मुझे सम्पूर्ण विश्वास था कि माँ ने निश्चय ही सूतक और ऐसी अन्य प्रथाओं में छिपे मूल वैज्ञानिक विचार को जानने का प्रयास किया होगा। मेरे मन में भी इन विचारों को जानने और समझने की इच्छा जागी। इस पथ पर मेरा मार्गदर्शन करने के लिए माँ से बेहतर और कौन हो सकता था? वैसे भी माँ ही तो सर्वप्रथम गुरु होती है.

एक लंबी छुट्टी मिलते ही मैं माँ के पास जा पहुंचा एक बार फिर से उनका शिष्य बनने। परंतु माँ के लिए तो मैं प्रथमतः उसका लाड़ला था, शिष्य तो बाद की बात थी। माँओं को तो अपने लाडले बच्चे को खिलाने पिलाने में एक अनूठा आनंद मिलता है। माँ के साथ अधिक से अधिक समय बिताने की लालसा से मैं भी उनके पीछे-पीछे रसोईघर में जा पहुंचा। वह मेरी मनपसंद खीर बनाने के लिए दूध उबाल रही थीं। माँ ने रसोईघर में ही मुझे मेरा पहला पाठ पढ़ाया। सचमुच, एक भारतीय रसोईघर में प्राचीन वैज्ञानिक सोच का एक पूरा भंडार देखने को मिलता है।

माँ ने पूछा, जानते हो हम दूध क्यों उबालते हैं? अरे! यह बात कौन नहीं जानता? कच्चे दूध में उपस्थित जीवाणुओं को मारने के लिए। इस क्रिया को तो नाम भी दिया गया है –पेस्चरैज़ेषन (pasteurisation), उस वैज्ञानिक के सम्मान में जिसने १५० वर्ष पूर्व इस तथ्य की खोज की के द्रव पदार्थों को उबालने से उनमें उपस्थित जीवाणु नष्ट हो जाते है। माँ मुसकुराई और पूछा कि क्या भारत में हम सिर्फ पिछले १५० सालों से दूध उबाल रहे हैँ? मन में तुरंत विचार आया –संक्रांति जैसे कई त्यौहार हैं जिनमें दूध उबालना एक विशिष्ट अनुष्ठान है।

नए घर में प्रवेश करने पर भी सर्वप्रथम किया जाने वाला मंगल कार्य दूध उबालना ही है। निश्चित रूप से, ये प्रथाएं १५० सालों से अधिक पुरानी हैं! मैंने टटोला तो माँ ने विस्तार से समझाया। महाभारत के वन पर्व के रामोपाख्यान में, और अन्य पुराणों में भी, दूध को उबालने के उल्लेख हैं। कई मंदिरों में (विशेष रूप से विष्णु और उनके विभिन्न स्वरूपों को समर्पित मंदिरों में) भगवान को मीठे दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपराएँ हैं, जहाँ दूध को पहले उबालना होता है। ओडिशा के पुरि में स्थित जगन्नाथ मंदिर में दूध से बने नैवेद्य चढ़ाने की परंपरा रही है।

Featured Image Credit: Sonja Perho’s Pinterest wal

साभार- https://www.indictoday.com/bharatiya-languages/hindi/ से

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