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पत्रकार, चिंतक और दार्शनिक मुज़फ्फर हुसैन नहीं रहे

मुजफ्फर हुसैन (२० मार्च १९४० — १३ फरवरी २०१८)
हिंदी और उर्दू पत्रकारिता को एक नई धार देने वाले और हिंदी पाठकों को मध्य पूर्व से लेकर इस्लामी देशों की राजनीति, भूगोल, इतिहास, अर्थशास्त्र से लेकर सामाजिक और इस्लामिक दुनिया की जानी अनजानी सच्चाई से अवगत कराने वाले मूर्धन्य पत्रकार, लेखक और दार्शनिक पद्मश्री सम्मान से सम्मानित मुजफ्फर हुसैन (73) का मंगलवार शाम 6 बजे मुम्बई में निधन हो गया। वे अस्वस्थ थे। वे 30 जनवरी से मुंबई के पवई स्थित हीरानंदानी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती थे।

1945 में राजस्थान के बिजौलिया में जन्मे हुसैन की प्राथमिक से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा नीमच में हुई। पं. शिवनारायण गौड़ इनके गुरु रहे। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से एमएम व मुंबई यूनिवर्सिटी से एलएलबी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1965 से ही मुंबई में रहकर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे। हिन्दी, अंग्रेजी व गुजराती पर हुसैन की अच्छी पकड़ थी। वे भारत के राष्ट्रवादी पत्रकार व चिन्तक थे। उन्होंने व्यवसाय के रूप में पत्रकारिता को अपनाया। हिंदी और गुजराती के विभिन्न अखबारों में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। अपनी जवानी में मुंबई आए और जल्द ही कई भाषाओं में कुशल बन गए। उनके लेख देश-विदेश के ४२ दैनिकों एवं साप्‍ताहिकों में प्रकाशित होते थे और कई अखबारों में वे प्रति सप्‍ताह स्तंभ भी लिखते थे। वे औरंगाबाद के दैनिक ‘देवगिरी समाचार’ में सलाहकार संपादक के पद पर काम किया। वे नवभारत टाइम्स मुंबई में संवाददाता भी रहे।

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सन २००२ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। कई भाषाओं में प्रवीणता हासिल करने वाले हुसैन विभिन्न भाषाओं में कई पत्रिकाओं के लिए और कई स्थानीय दैनिक समाचार पत्रों के लिए भी लिखते थे। वे मुसलमानों के एक वर्ग में पनपनेवाली जेहादी मानसिकता के सदैव निंदक रहे। वे एक प्रतिष्ठित वक्ता के रूप में विभिन्न संस्थाओँ संस्थाओं एवं विश्‍वविद्यालयों में नियमित रुप से आमंत्रित किए जाते थे।

उनके लेखों को पढ़कर ही कई लोगों ने पत्रकारिता का ‘क ख ग’ भी सीखा। उनके लेख आज भी पत्रकारिता की एक ऐसी धरोहर हैं जिनके माध्यम से विश्व की राजनीति से लेकर मध्य पूर्व और मुस्लिम देशों के बारे में कई जाने अनजाने तथ्य जानने को मिलते हैं।

उनकी नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। इनमें सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ‘खतरे अल्पसंख्यक वाद’ (डेंजर्स आफ द माइनोरिटी) तीन भाषाओं में प्रकाशित हुई। 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने पद्मश्री अलंकरण से नवाजा। कई विश्वविद्यालयों में आपको लेक्चर के लिए बुलाया जाता रहा। हुसैन को डॉ. हेडगेवार प्रज्ञापीठ कोलकाता सहित कई संस्थाओं ने सम्मानित किया गया। हुसैन का भगवान महावीर की वाणी को आत्मसात कर जन-जन को परमात्मा के संदेशों के प्रति प्रेरित करने के लिए रतलाम में राष्ट्रसंत विजय जयंतसेन सूरिश्वर ने सम्मान किया था। हुसैन का विवाह मध्य प्रदेश के ही नीमच निवासी हाजी फखरुद्दीन की बेटी नफीसा हुसैन के साथ हुआ था। उनकी पत्नी बोहरा समाज द्वारा संचालित स्कूल में शिक्षिका थी।

मुजफ्फर हुसैन हिंदी में लिखने वाले ऐसे मुस्लिम लेखक थे जो सदैव मुस्लिम समाज को हिंदुओं के साथ समरस होने की वकालत करते रहे। अपने इसी नजरिये के साथ देश के कई अखबारों में वह स्तंभ लिखते रहे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं।

इस्लाम और शाकाहार नामक उनकी पुस्तक काफी चर्चित रही है। इसमें उन्होंने कुरान के विभिन्न अध्यायों में हिंसा से दूर रहने की जो सीख दी गई है, और हदीस व कुरान में किस हद तक शाकाहार का समर्थन किया गया है, उसे बहुत कुशलता प्रस्तुत किया है। इसमें ऐसे-ऐसे रहस्य उद‍्घाटित किए गए हैं जिन्हें पढ़कर आश्‍चर्य होता है। कुरान में दिए गए तथ्य के अनुसार, जब ईश्‍वर ने शाकाहार को ही उदरपूर्ति के लिए चुना था तो यह नहीं कहा जा सकता है कि इसलाम शाकाहार का समर्थक नहीं है। वास्तविकता यह है कि इसलाम ने शाकाहारी बनने के लिए असंख्य स्थानों पर प्रेरित किया है।

इस पुस्तक के तीसरे अध्याय का शीर्षक है—‘गाय और कुरान’, जो कृषि एवं भारतीयता के मर्म को स्पष्‍ट करता है। गाय चूँकि भारतीय अर्थव्यवस्था और अध्यात्म का प्राण है, इसलिए लेखक ने इस विषय पर सार्थक चर्चा की है। बकरा ईद के समय धर्म के नाम पर जिस तरह से हिंसा होती है उसकी इसलाम किस हद तक आज्ञा देता है, इसे कुरान की आयतों द्वारा समझाने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया गया है। ‘इसलाम और जीव-दया’ तथा ‘इसलामी साहित्य में शाकाहार’ अध्यायों में की गई चर्चा रोचक व प्रशंसनीय है। ‘इक्कीसवीं शताब्दी शाकाहार की’ अध्याय में लेखक ने चौंका देनेवाले रोचक तथ्य प्रस्तुत किए हैं।

अपने शानदार कॅरियर में उन्होंने साहित्य में कई राज्यस्तरीय और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार जीते। राष्‍ट्रीय स्तर के चौदह से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।2002 में पद्मश्री के अलावा उन्हें 2014 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पत्रकारिता के लिए लोकमान्य तिलक पुरस्कार तथा जीवन गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया।



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