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जीवन सत्व है ‘बारिश’!

बारिश,बारिश और बारिश.काले काले मेघ.हवा की तरंगों पर झूमते मेघ.हवा अपनी मस्ती में झूमती हुई.मेघों को अपनी ताल पर नचाती हुई.हवा अपने होने का जश्न मनाती हुई.मेघों को अपने से लपेटे हुए,छलांगें मारते हुए.अपने संगीत का निर्माण करते हुए टप टप से लेकर झमाझम की ध्वनि तक. एक एक बूंद धरती को छूकर अपना राग छेड़ती है,अपनी ध्वनि,अपने स्वर में स्वयं को अभिव्यक्त करती है. प्यासी धरती अपनी प्यास बुझाती है.तृप्त हो जाती है.तृप्त हो मदमाती हुई अपनी सृजन साधना में लीन हो जाती है. अपने सृजन से पूरी कायनात का भरण पोषण करती है.चारों ओर पेड़,पौधे,फूल पत्तियाँ जी भर कर स्नान करते हैं.बारिश के स्पर्श से दिन दोगुना फलते – फूलते हैं.चारों ओर जलमग्न धरती को देख प्राणी मन मल्हार गाता है. गर्मी से निजात पा अपना सुर संसार रचता है.

बारिश मतलब स्पर्श,धरती का,वनस्पति का,शरीर का,मन का स्पर्श. सारी इन्द्रियाँ भीग जाती हैं. एक तरह से मुक्त हो जाती हैं. जैसे कहीं अटका कूड़ा करकट साफ़ हो गया हो.जैसे बहुत समय से मन में बसा मवाद बह गया हो. मन की ग्रन्थियां खुल गई हों ..धुलकर निर्मल हो गई हों. स्पर्श,स्पर्श,स्पर्श..नए सृजन की साधना का संकल्प!

बारिश विज्ञान का एक बेहद जादुई,मनमोहक,सार्वभौमिक प्रयोग है. इसमें पानी,हवा,आग और धरती का अद्भुत खेल है. सूर्य धरती को तपाता है,धरती विरह की आग में तपने लगती है. उस पर हवा का दवाब कम होने लगता है. पानी से भरे समंदर की हवाएं तुरंत पानी लपेटे धरती की ओर दौड़ पड़ती हैं और झमाझम बरस कर धरती की प्यास बुझाती हैं.कितना आकर्षक,विहंगम वैज्ञानिक प्रयोग. दरअसल प्रकृति की हर घटना विज्ञान है. हाँ यह बात और है की उस घटना के सूत्रों को हम समझ पाएं और समझा पाएं… नहीं तो कुदरत का करिश्मा.

दरअसल बारिश प्रेम है. समंदर का हवाओं के माध्यम से धरती पर बरसता ‘प्रेम’ है बारिश. मेघ प्रेम खत हैं. मेघ प्रेम गीत हैं. बारिश कुदरत की प्रेम लीला है. बारिश सृजन विज्ञान है. धरती जब प्रेम में भीगती है तब वो धरती नहीं वसुंधरा हो जाती…सुंदर,खूबसूरत और हसीन. बिना नमी के सृजन सम्भव नहीं..नमी यानी प्रेम.. प्रेम यानी जीवन ‘सत्व’… जीवन सत्व है ‘बारिश’!


Manjul Bhardwaj
Founder – The Experimental Theatre Foundation www.etfindia.org
www.mbtor.blogspot.com
Initiator & practitioner of the philosophy ” Theatre of Relevance” since 12
August, 1992.

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