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महबूबा मुफ़्ती नई राहें खोजे बिना जम्मू कश्मीर में शांति नहीं ला सकती

जम्मू कश्मीर, खास कर के कश्मीर घाटी की स्थिति आज बड़ी चिंता जनक है ! कश्मीर घाटी में एक आतंकवादी के मारे जाने के वाद आम जन ने आक्रोश जताएया है और करीब ४ सप्ताह वाद भी आज सिर्फ प्रदर्शनों में घायलों की वात ज्यादा हो रही है और ९ जुलाई से प्रदर्शन किस लिए शुरू हुए थे इस की वात कम हो रही है इस पर दिल्ली सरकार को अब तो सम्वेधान्शीलता से विचार करना ही होगा ! प्रदर्शन अव कश्मीर घाटी के बाहर भी दिखने लगे हैं और दक्षिण कश्मीर में जिस प्रकार से प्रदर्शन उपजे हैं इस से पीडीपी पर तो राजनीतिक प्रश्न लगते हैं !
साल २००२ के वाद जिस प्रकार की सत्ता की राजनिति जम्मू कश्मीर में हुई है उस से इस राज्य से सम्वंधित विषय उस स्थिति में पहुँच गए हैं यहां पर पर्थिक्तावादी और मूख्यधारा/ मूलधारा की विचारधारा के बीच लकीर खींचना कठिन हो गया है और इस का काफी हद तक लाभ आज अलगाब्बादी और भारत विरोधी संस्थायों एवं विचारकों को मिल रहा है ! ८ जुलाई के बाद कश्मीर घाटी में जो स्थिति वनी है उस पर भारत के नेतृत्व को घम्भीरता से चिंतन करना होगा! आज कश्मीर घाटी में धर्म और क्षेत्रवाद की दृष्टि से स्थिति अक्टूबर १९४७ से कहीं ज्यादा ख़राब है जिस के लिए भारत की केन्द्र में रही सरकारें भी दोष लगने से नहीं बच सकतीं!

कश्मीर घाटी का आम जन ( यहाँ तक के कुछ बुद्धिजीवी वर्ग भी ) साल १९९९ आते आते कई प्रकार की शंकाओं, राष्ट्रियता की भ्रान्तियों और अपनों द्वारा किए गए वैचारिक शोषण का शिकार हो चुका ! साल १९९८ – ९९ में मुफ़्ती मोहद सईद जी ने पीडीपी की नीब रख कर एक तरह से नेशनल कांफ्रेंस के ‘अटोनोमी’ के दर्पण में ही कश्मीर घाटी के आम निबासी को सेल्फ रूल के मुखोटे में इस राज्य की भारत गणराज्य से कुछ और अधिक दूरी और एक तरह से पाकिस्तान से नजदीकियां दीखने की कोशिश की थी और उसने सत्ता की दोड़ में कुछ सफलता पाई थी ! कांग्रेस पार्टी ने उस सेल्फ रूल के फ्रेमवर्क में कुछ बुरा नहीं देखा था और पीडीपी के साथ ६ साल राज किया ! ऐसा होने से अगर कुछ लोगों को यह लगने लग जाए कि जम्मू कश्मीर राज्य का अधिमिलन भारत के साथ पूर्ण नहीं हुआ है तो उन को पूरी तरह दोषी नहीं कहा जा सकता !. इसी प्रकार की वातें १९४७ के वाद लगातार होती रहीं हैं और केन्द्र की सरकारें भाई वतीजावाद और आर्थिक सुझाबों की चद्दर से अलगाववाद के बीजों को ढकती रही हैं !

संक्षेप में अगर कहें तो राजनीतिक दलों को जम्मू कश्मीर की राजनिति को केन्द्र के साथ प्रतिस्पर्धा और अन्तराष्ट्रीय झंझालों से निकालना होगा और आम जन के हित में जमीनी स्तर पर कार्य को प्राथमिकता देनी होगी ! ऐसा करने के लिए राजनिति से ऊपर उठ कर “शीर्ष” पर बैठे नेताओं को आम जन के बीच जाकर उन के मन की आज की स्थिति को परखने और उन के मन में घर कर चुकी शंकाओं के कारणों को समझने एवं उनके निवारण के रास्ते उन का विश्वास जीत कर दूंदने का अभियान चलाना होगा ! यहाँ तक क्षेत्रीय दलों का प्रश्न है आज के दिन ऐसा करने का दायित्व जम्मू कश्मीर पीडीपी के नेतृत्व पर कुछ ज्यादा ही है क्यों कि यह दल सत्ता में है !

यहाँ तक पीडीपी के सेल्फ रूल की बात है उस की बीजेपी-पीडीपी एजेंडा फार एलायन्स २०१५ में भी कहीं पर कोई बात नहीं की गई है ! इस लिए कश्मीर घाटी में पीडीपी के अपने ‘साथी’ एवं समर्थक और पीडीपी के नेशनल कांफ्रेंस जैसे विरोधी आज सेल्फ रूल फ्रेमवर्क के कुछ बिन्दुओं की महबूबा जी को अकसर याद दिलाते हैं ! इस के पीछे पीडीपी के विरोधिओं का सिर्फ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा है न कि कश्मीर घाटी में शांति वहाली ! पीडीपी ने भी अभी तक यह नहीं कहा है की उस ने अपने सेल्फ रूल के प्रस्तावों में कुछ वदलाव कर लिया है ! पर अव यह चुपी का खेल और आगे नहीं खेला जा सकता है क्यों कि अगर बीजेपी के साथ रह कर पीडीपी को जम्मू कश्मीर में शांति वहाल करनी है तो ‘मुख्य धारा दल’ की डेफिनिशन को और अधिक नहीं खींचा जा सकता है !

पीडीपी भी साल २००८ में जानती थी कि ऐसा समय आ सकता है क्यों कि अगर ऐसा न होता तो पीडीपी अपने सेल्फ रूल मसोदे को जिस को उस ने २५ अक्टूबर २००८ को सार्वजानिक किया था और जो २६ अक्टूबर २००८ को मीडिया में छपा था के मुख सन्देश में यह नहीं कहती कि < “ पीडीपी का यह जम्मू कश्मीर पर त्यार किया मसोदा एक आशावादी प्रयास है.... पीडीपी एक समाधान पेश नहीं कर रही है ... न ही कोई ऐसा ढोंग करती है .... इस लिए , हम ने इस मसोदे में जो प्रयास किया है वे एक internally consistent framework और समाधान की दिशा की और संकेत करता है ... इस मसोदे का सार किसी ऐसे creative framework for resolution में है जो संबधित दो राष्ट्रों की पर्भुसत्ता से कोई compromise नहीं करता हो ” ! जहाँ जिन २ राष्ट्रों का पीडीपी ने जिक्र किया है वे हैं भारत और पाकिस्तान ! इस लिए अगर पीडीपी १९४७ के महाराजा द्वारा शासित जम्मू कश्मीर रियासत को भारत का अंग समझती है, जम्मू कश्मीर के निबासियों का वास्तविक हित चाहती है , जम्मू कश्मीर राज्य के जम्मू- लदाख- कश्मीर क्षत्रों को एक रखना चाहती है और कश्मीर घाटी में शांति वहाली चाहती है तो फिर महबूबा मुफ़्ती जी को अपनी राजनीतिक कार्यप्रणाली और निति को बदलना होगा ! इस राह पर चलने के लिए और बीजेपी की केन्द्र सरकार के साथ एक “मुख्यधारा’ का राजनीतिक दल वन कर रहने के लिए पीडीपी को अपने सेल्फ रूल के मूल सिधान्तों में संशोधन करना ही होगा ! और अगर ऐसा नहीं किया गया तो अधिकांश समय विवादों में नष्ट होता रहेगा जिस से राज्य में शांति वहाली के प्रयास असफल रहेगे और अल्गाब्वादियों के लिए ‘उपजाऊ’ जमीन बनी रहेगी. पीडीपी को बने हुए डेड दशक हो चुका है और महबूबा मुफ़्ती भी काफी सुलझ चुकी है ! इस लिए यहाँ तक राजनीतिक प्रतिस्पर्दा का सम्बन्ध है वह बीजेपी – पीडीपी गठ्वंधन होने तक काफी हो चुकी है ! किसी को भी समय की आवश्यकता के अनुसार अपनी रणनीति में सुधार करने पड़ सकते हैं ! इस लिए पीडीपी को अब अपने राजनीतिक रथ को अन्तराष्ट्रीय विवादों/ झंझालों के पथ से उतार कर राज्य और केन्द्र से जुड़े विषयों की पटरी पर सीमित करना होगा तथा आम जन के हित में जमीनी स्तर पर कार्य को प्राथमिकता देनी होगी ! हाँ ऐसा करना कुछ हद तक पीडीपी के लिए अपने ही द्वारा बुने जाल को काटने जैसा होगा पर इस तथ्य को अपनाए विना महबूबा जी या उन का दल जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए अच्छे दिन नहीं ला सकता है ! महबूबा जी के राजनीतिक विरोधी तो महबूबा के लिए राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिए उन को कुछ पुराने वक्तव्य और कहे की ओर खींचना चाहेंगे और आम जन भी उन से कुछ ऐसे प्रश्न कर सकते हैं जिन के सहारे उन्हों ने अपना राजनीतिक सफ़र शुरू किया था ! पर फिर भी अगर महबूबा जी को अपने “सेल्फ रूल” के मूल सिधान्तों में कुछ फेर वदल करने के लिए आगे बढने के साथ साथ अपने साथियों को इस तथ्य से अवगत कराने को प्राथमिकता देना आज की जरूरत है ! अगर ऐसा नहीं किया गया तो उन को कुछ विवादस्पद विषयों का समय समय पर जिकर करना पड़ेगा जिस से बीजेपी को कठिनाई होगी और इस सरकार की शांतिपथ यात्रा का सपना सपना ही रह जाएगा ! यदि महबूबा मुफ़्ती जी पीडीपी को ‘कश्मीर’ केन्द्रित और ‘विदेश’ नीति केन्द्रित मुद्दों के जाल से बाहर निकालने की राह चुन लेती हैं तो शुरू में राजनीतिक स्तर पर उन को कश्मीर घाटी में काफी कठिनाई हो सकती है पर आने बाले सालों में उन के लिए कई ऐसे नए सहयोगी और नई राहें जम्मू और लदाख क्षेत्र में सामने होंगी जो उन को आज की राजनीतिक दूविदाओं से नीकाल कर ले जाएं गी ! कश्मीर घाटी में जरूर उन को अपने ही द्वारा दिखाई गई राहों से आम जन को वापिस लाने में कठिनाई होगी ! पर कुछ कीमत तो देनी ही होगी , चाहे घाटी में एक चुनाव में कुछ हानी ही झेलनी पड़े !. हाँ दिल्ली में बैठे नेताओं को भी बैचारिक स्तर पर कश्मीर घाटी में घर कर चुकी शंकाओं और मिथ्याओं को दूर करने के लिए कठिन परिश्रम करना होगा जिस के लिए आर्थिक सहायता और अप्पीज्मेंट में शांति ढूँढने वाले सलाहकारों के ‘परिवार’ को भी ‘सेवा निब्रित’ करना होगा ! यह कहना भी गलत नहीं होगा कि केन्द्र के सलाहकार आज तक मुख्यता वे रहे हैं जो जम्मू कश्मीर के भारत के साथ अधिमिलन को कुछ हद विवादित समझते रहे हैं जिस के संकेत ८ जुलाई के बाद केंद्र सरकार की विश्वसनीयता की घाटी में जो स्थिति दिख रही है उस से लिए जा सकते हैं! जिस राह पर चलने की सलाह यहाँ पर महबूबा जी को दी जा रही है उस में उन को दुर्गम स्थिति दिखेगी पर इन्ही राहों पर उन को ऐसे साथी और सहारे मिल जाएंगे जो काँटों को फूलों में बदलते दिखेंगे! (दया सागर एक बरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर विषयों के विशेषज्ञ हैं 9419796096 )



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