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मोदीजी पपीता नहीं कटहल बोने में यकीन रखते हैं

पपीते की खेती और कटहल की खेती का फ़र्क़ समझते हैं आप ? नहीं समझते तो बताए देता हूं। पपीता का पौधा लगाइए तो छ महीने में ही फल देने लगता है। पर फिर छ महीने बाद दिखाई भी नहीं देता है। लेकिन कटहल का पौधा लगाइए तो सात-आठ साल तक फल नहीं देता। कई बार सोलह साल तक भी फल नहीं देता। पर जब फल देना शुरु करता है तो सालों साल पीढ़ियों तक फल देता है। देता ही रहता है। तो नरेंद्र मोदी को पपीते की नहीं, कटहल की खेती करने का अभ्यास है। यक़ीन न हो तो कश्मीर में 370 की याद कर लीजिए। बालाकोट ,उरी सर्जिकल स्ट्राइक आदि भी। अच्छा सी ए ए , तीन तलाक़ आदि-इत्यादि भी आप जोड़ना चाहते हैं तो जोड़ लीजिए।

अलीगढ़ में आज राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर नरेंद्र मोदी ने फिर वही कटहल का एक पौधा लगाया है। बकौल मुख्य मीडिया के गुलामों के सिर्फ़ जाटों में पैठ की राह बनाने और किसान आंदोलन की हवा निकालने की क़वायद भर नहीं है यह राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय का शिलान्यास। इस शिलान्यास के मार्फ़त मोदी का असली मक़सद जिन्नावादी राजनीति पर अलीगढ़ी ताला लगाना ही है। सिर्फ़ अलीगढ़ में ही नहीं , समूचे देश में। अब मोदी इस मक़सद में कितना कामयाब होंगे यह आने वाला समय ही बताएगा। ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान बनाने में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और लखनऊ के मुसलामानों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में जिन्ना की फ़ोटो शान से लगी हुई है तो इस लिए भी कि यहां से पाकिस्तानपरस्ती की बदबू अभी तक नहीं गई है। जब भी कभी जिन्ना की फ़ोटो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से हटाने की बात उठती है , आग लग जाती है। यहां के पाकिस्तानपरस्त बड़ी ऐंठ से कहते हैं, पहले फला-फला जगह से जिन्ना की फ़ोटो हटाओ। तब देखेंगे। ईंट से ईंट बजाने पर उतर आते हैं।

ग़ौरतलब है कि जब मदन मोहन मालवीय ने बनारस में बनारस हिंदू विश्विद्यालय बनाया तो उस के संस्थापक सदस्यों में एक सर सैयद अहमद ख़ान भी थे। मालवीय जी से प्रेरणा ले कर वह अलीगढ़ आए और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनवाई। बनारस के राजा ने बनारस हिंदू विश्विद्यालय के लिए कई सारे गांव की ज़मीन दान में दी थी। उसी तर्ज पर सर सैयद अहमद ख़ान ने भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह से ज़मीन मांगी और महेंद्र प्रताप सिंह सहर्ष दे भी दी। अब अलग बात है कि जो सम्मान महेंद्र प्रताप सिंह को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी वालों को देना चाहिए था, कभी नहीं दिया। बल्कि भूल गए महेंद्र प्रताप सिंह को। अपमान की हद तक भूल गए। जिन्ना को सम्मान देने वाले लोग महेंद्र प्रताप सिंह को सम्मान दे भी कैसे सकते थे भला। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तो आज तक हिंदुत्व का गढ़ कभी नहीं बना। बनेगा भी नहीं। उस की बुनियाद आख़िर मदन मोहन मालवीय जैसे तपस्वी ने रखी है।

लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बहुत जल्दी ही मुस्लिम लीग की गिरफ़्त में आ गया। न सिर्फ़ मुस्लिम लीग की गिरफ्त में आया बल्कि मुस्लिम लीग का गढ़ भी बन गया। फिर पाकिस्तान बनाने का केंद्र भी बन गया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी केंद्रीय यूनिवर्सिटी होने के बावजूद आज भी मुस्लिम लीग की भयानक गिरफ्त में है। एक समय तो यह आतंकियों का अड्डा भी बन कर इतना बदनाम हुआ कि यहां से पढ़ कर निकले छात्रों को कहीं नौकरी भी मिलना मुहाल हो गया था। नतीज़तन फैकल्टी की फैकल्टी ख़ाली होने लगीं। फिर किसी तरह स्थिति संभली।

अभी भी मोदी के सात साल के शासन में तमाम कोशिशों के बावजूद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पर चढ़ा मुस्लिम लीग का रंग का फीका नहीं हुआ। नफ़रत का नश्तर और तेज़ हुआ है। हां , यह ज़रूर हुआ है कि मुस्लिम लीग की बदबू से बचने के लिए यहां कुछ लोगों ने कम्युनिस्ट होने का कपड़ा पहन लिया। पर सोच वही मुस्लिम लीग वाली रही। अपने को इतिहासकार बताने वाले इरफ़ान हबीब जैसे जहरीले लोग , ऐसे ही लोगों में शुमार हैं। जो हैं तो कट्टर लीगी लेकिन कपड़ा कम्युनिस्ट का पहनते हैं। और आर एस एस का कृत्रिम भय दिखा-दिखा कर अपना लीगी एजेंडा कायम रखते हैं।

एक वाकया है। जब पकिस्तान बन गया और मुस्लिम लीग के तमाम लोग भारत में ही रह गए तो अपना चेहरा छुपाने के लिए फ़ौरन कम्युनिस्ट पार्टी में दाख़िल हो गए। उन दिनों देश के शिक्षा मंत्री थे मौलाना आज़ाद। उन्हों ने मुस्लिम लीग पर एक टिप्पणी करते हुए तब कहा था कि एक सैलाब आया था, चला गया। पर कुछ गड्ढों में सैलाब का पानी रह गया है और बदबू मार रहा है। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में कम्युनिस्ट पार्टी का कपड़ा पहने मुस्लिम लीग के लोग मौलाना आज़ाद की इस बात पर बहुत खफा हुए। इस हद तक खफा हुए कि एक बार इन लीगी कम्युनिस्टों को पता चला कि मौलाना आज़ाद किसी ट्रेन से अलीगढ़ से गुज़रने वाले हैं। यह लोग अलीगढ़ रेलवे स्टेशन आए। रेल पटरियों पर बिखरे मानव मल को प्लास्टिक के थैलों में बटोरा। और जब ट्रेन आई तो मौलाना आज़ाद के डब्बे में चढ़ गए और वह मानव मल मौलाना आज़ाद की दाढ़ी में मल-मल कर लगा दिया। और डब्बे से उतर कर भाग गए।

मौलाना आज़ाद जब तक कुछ समझें तब तक ट्रेन चल चुकी थी। तो क्या मौलाना आज़ाद आर एस एस के थे ? फिर सोचिए कि आर एस एस के लोगों के साथ भी यह लोग क्या सुलूक़ करते होंगे भला ? सांप्रदायिक सोच और रंग में डूबे मुस्लिम लीग के लोगों का आज तक कोई सरकार कुछ नहीं कर पाई है। नरेंद्र मोदी सरकार भी नहीं। क्यों कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कवच-कुण्डल इन के पास है। अब इसी कवच-कुण्डल को बेअसर करने की क़वायद है महाराजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवसिटी। आप सोचिए कि जय भीम , जय मीम का नैरेटिव बनाने वाले मुस्लिम लीग ऊर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के लोग इस अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में दलितों को आरक्षण की सुविधा से वंचित रखते हैं। यहां जय भीम , जय मीम का नैरेटिव वह भूल जाते हैं। और देश भर में इसी जय भीम , जय मीम के तहत जब-तब आग लगा देते हैं।

तो मोदी , योगी ने एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। रही बात टिकैत के किसान आंदोलन की तो इस की मियाद उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव तक की है। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव खत्म , किसान आंदोलन खत्म। इसी लिए सरकार इन की कोई मांग मानने वाली नहीं है। इन की साज़िश में फंसने वाली नहीं है। शाहीन बाग़ से भी बुरा हश्र होगा इस किसान आंदोलन का। अव्वल तो तक-हार कर , कोई नतीज़ा न पा कर कांग्रेस किसान आंदोलन को फंडिंग बंद कर देगी। दूसरे , तब तक कम्युनिस्टों का जोश और रोजगार भी खत्म हो जाएगा।

2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव का परिणाम समय की दीवार पर अभी से लिखा दिख रहा है। अगर किसी को मोतियाबिंद है और वह समय की दीवार पर लिखी चुनाव परिणाम की इस इबारत को नहीं पढ़ पा रहा है तो बात और है। आप तो अभी बस राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय का आगाज़ देखिए। मोदी ने अगर आज कल्याण सिंह की याद करते हुए उन का आशीर्वाद भी इस अवसर पर सहेज लिया है तो उस का निहितार्थ भी देखिए। मोदी के पहले दिए गए योगी के भाषण की धार और आत्म विश्वास देखिए। मोदी के सामने योगी का ऐसा मुखर भाषण पहले कभी सुना हो तो मुझे ज़रा याद दिला दीजिए। टोटी यादव की लंतरानी और टिकैत की हेकड़ी में उस के बाद फ़र्क़ न दिखा हो तो बताइए।

फिर सौ बात की एक बात राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय रुपी पौधे के फल देने की प्रतीक्षा कीजिए। हां , आज बहुत तलाश किया कि कम्युनिस्ट का कपड़ा पहने लीगी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की कोई जहरीली प्रतिक्रिया कहीं दिख जाए इस राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय के बाबत पर नहीं दिखी। किसी ने देखी हो तो कृपया बताए भी। क्यों कि यह मोहतरम इरफ़ान हबीब रहते तो इसी अलीगढ़ में हैं। इतिहास के नाम पर तमाम फ़रेबी और झूठ में सनी इबारतें इसी अलीगढ़ में बैठ कर लिखी हैं।

पिछली बार जब मोदी ने वर्चुवली एड्रेस किया था , अलीगढ़ यूनिसिटी को तो इन मोहतरम इरफ़ान हबीब ने अजब-गज़ब जहर उगले थे। एक बार तो यह जनाब केरल चले गए थे। अपना बुढ़ापा भूल कर वहां के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से मंच पर दो-दो हाथ करने। उन के ए डी सी ने रोका तो ए डी सी के कपड़े फाड़ दिए। ए डी सी के बिल्ले , बैज फाड़ दिए। आप जानते ही होंगे कि किसी भी राज्यपाल का ए डी सी सेना का सम्मानित अफसर होता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ही पढ़े आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की भलमानसहत थी कि कोई विधिक कार्रवाई नहीं की जनाब के ख़िलाफ़। नहीं सरकारी सेवक के साथ हिंसा करने के जुर्म में अच्छी सेवा हो सकती थी।

मुझे पूरी आशंका थी कि जनाब मोदी की सभा में भी कुछ हिंसात्मक कार्रवाई कर कोई इतिहास रच सकते हैं , यह इतिहासकार महोदय। पर जाने क्यों आज जनाब ने दिल तोड़ दिया। मुमकिन है कहीं बैठे अपने इतिहास का पपीता नोश फ़रमाने में व्यस्त हो गए हों मोहतरम इरफ़ान हबीब।

साभार- http://sarokarnama.blogspot.com/ से

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