Sunday, March 3, 2024
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एक दूसरे को समझने का अभाव ही तनाव को जन्म देता है – डॉ प्रणव भारती

उज्जैन। बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग हों, मौजूदा दौर पर प्रत्येक पीढ़ी किसी न किसी तरह के तनाव से गुजर रही है। तनाव की उपस्थिति में जीवन से प्रेम तत्व का लोप होता जा रहा है। इस संघर्षपूर्ण जीवन में हर कोई दबाव में है, किंतु हम दूसरों की परिस्थिति समझने का प्रयास ही नहीं करते। यह अवस्था ही वैचारिक मतभेद को जन्म देती है और यही से मानसिक तनाव आरंभ होता है। यह विचार अहमदाबाद की प्रसिद्ध कहानीकार एवं उपन्यासकार डॉ. प्रणव भारती ने व्यक्त किया है।

भारतीय ज्ञानपीठ में आयोजित कर्मयोगी कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ की प्रेरणा और पद्मभूषण डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की स्मृति में “मानसिक संत्रास की परिधि में पीढ़ियां” विषय आयोजित इक्कीसवीं अखिलभारतीय सद्भावना व्याख्यानमाला 2023 के छठवें दिन बतौर प्रमुख वक्ता डॉ. प्रणव भारती ने कहा कि वैचारिक मतभेद के कारण ही लगातार परिवार टूटते जा रहे हैं।

डॉ. प्रणव भारती ने आगे कहा कि परिवार में बिखराव से बच्चे स्वयं में सीमित होकर रह गए हैं और उनके अभिभावक अपनी ही समस्याओं में उलझे हुए हैं। परिवार टूटने के कारण ही अपनी बातों को साझा करने की स्थितियां नहीं बची हैं। यही परिस्थितियां मानसिक संत्रास को लगातार बढ़ा रही है। चुनौतियां हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। समाज में चुनौतियां पहले भी थी और वर्तमान में भी है, किंतु आज उनसे जूझने का दृष्टिकोण सकारात्मक नहीं रहा। धैर्य, संयम जैसे गुण अब दिखाई नहीं देते। ऐसी अवस्था तनाव का कारक बन जाती है।

आरंभिक काल में वेदों पर कार्य करने वाली और वेदों की ऋचाओं को बनाने वाली ऋषिकाओं के जीवन की चर्चा करते हुए डॉ. प्रणव भारती ने कहा ऋषिकाओं के जीवन में भी बहुत संघर्ष रहा, किंतु उन्होंने संघर्ष का सामना सकारात्मकता के साथ किया। तनाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, क्योंकि उनमें वैदिक संस्कारों का रोपण था। आज भी बच्चों और युवाओं में संस्कारों का रोपण करके तनाव को दूर किया जा सकता है।

महिलाओं की शिक्षा पर जोर देते हुए डॉ. प्रणव भारती ने कहा कि महिलाओं की भूमिका बहुत अधिक बढ़ जाती है। वह शिक्षित होगी तो दूसरों को संस्कारित कर पाएगी। ऐसा करते हुए वह न सिर्फ स्वयं बल्कि परिवार को भी तनाव मुक्त रख पाएंगी। लगातार सीखने रहने का और सक्रिय रहने का भाव सभी में होना चाहिए। सीखने की प्रवृत्ति इतनी सतत होना चाहिए कि सीख जहां से भी मिल रही है चाहे वह अपने से छोटे ही क्यों ना हो, हमें लेते रहना चाहिए, किंतु होता यह है कि अपने छोटों से सीख लेने में हमारा अहंकार हावी हो जाता है।

डॉ. प्रणव भारती ने आगे कहा कि कई बार हम अपनों से छोटे लोगों का असम्मान कर देते हैं। यह भी तनाव का बहुत बड़ा कारण बन जाता है। एक दूसरे से भावनाओं का आदान-प्रदान और विचारों को साझा करने के मंच अधिक से अधिक बढ़ाना होंगे। समूहों में, स्कूलों में, संस्थानों में चर्चाओं करने के मंच उपलब्ध होना चाहिए, तभी तनाव को दूर करके सकारात्मक जीवन जिया जा सकता है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, नागदा क्षेत्र प्रभारी ब्रह्मा कुमारी पूनम बहन ने कहा कि तनाव कोई रोग नहीं है, बल्कि तनाव एक प्रकार का दबाव है। जो भी इस दबाव को सकारात्मक ले लेता है वह कोई कविता बना लेता है या लेख लिख लेता है। तात्पर्य यह है कि दबाव को सकारात्मक लेने से वह किसी सृजन को जन्म देता है, किंतु दबाव को नकारात्मक रूप में लेने से वह तनाव का भागीदार होता है। तनाव को दूर करने के लिए हमें परिस्थिति को स्वीकार करते आना चाहिए।

पूनम बहन ने कहा कि हमें धैर्यतापूर्वक सुनने का गुण भी अपनाना होगा। होता यह है कि हम दूसरों की बातों को सुनने की अपेक्षा स्वयं की बातें कहना अधिक पसंद करते हैं। जबकि दूसरों को सुनने से ही उन्हें समझने का अवसर मिलता है। होना यह चाहिए कि हर परिस्थिति को चुनौती के रूप में स्वीकार करें, किंतु होता यह है कि हम संबंधित लोगों को ही चुनौती देना शुरू कर देते हैं। उनसे मतभेद करना शुरू कर देते हैं और चुनौती की तरफ हमारा ध्यान ही नहीं जाता है।

ब्रह्मा कुमारी की प्रभारी ने आगे कहा, “हमें इसका आकलन करते आना चाहिए कि हमारे नियंत्रण में क्या है? वास्तव में जो नियंत्रण से बाहर है हम उसे पाने में अधिक तनावग्रस्त हो जाते हैं। जीवन में भावनात्मक संतुलन का होना बहुत आवश्यक है। कुछ लोग होते हैं जो शिकायत मोड पर रहते हैं और कुछ होते हैं जो समाधान मोड पर रहते हैं। हमें हमेशा समाधान मोड पर ही रहना चाहिए। हमारे जीवन में कई प्रकार की रुचियां होगी। हमें उन रुचियां पर ध्यान देना होगा, ताकि जीवन और अधिक सुंदर और सफल बनेगा।”

कार्यक्रम के आरंभ में संस्थान की शिक्षिकाओं द्वारा सद्भावनापूर्ण गीत की प्रस्तुति दी गई। व्याख्यानमाला को उज्जैन के पहले कम्युनिटी रेडियो दस्तक 90.8 एफएम पर भी सुना जा रहा है। व्याख्यानमाला को सुनने के लिए भारतीय ज्ञानपीठ के सद्भावना सभागृह में एडवोकेट हरदयाल सिंह ठाकुर, सुश्री मनोज द्विवेदी, अतुल शर्मा, प्रदीप जोशी, एमएस लोहिया, देवराज सिंह डागोर, डॉ पिलकेंद्र अरोरा, डॉ शैलेंद्र पाराशर और खुशाल सिंह वाधवा सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी और पत्रकारगण उपस्थित थे। संचालन राष्ट्र भारती विद्यालय की प्राचार्य श्रीमती मयूरी वैरागी ने किया।

कल समापन दिवस पर सद्भावना व्याख्यानमाला में गोवा के अंतर भारतीय संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय पांडुरंग नाडकर्णी “राष्ट्रीय शिक्षा नीति और गांधीजी की वर्धा योजना” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे। समारोह की अध्यक्षता महर्षि पाणिनि वैदिक एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय प्रोफेसर विजय कुमार सी करेंगे।

इसे भी पढ़ें – हिंदुओं जैसी थी इस्लाम या ईसाई धर्म से पहले दुनिया भर में लोगों की जीवन शैली

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