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बाल आयोग की रिपोर्टः अंग्रेजी बर्बाद कर रही है बच्चों का भविष्य

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के एक अध्ययन में यह कहा गया है कि अंग्रेजी भाषा में बोलचाल, पाठ्यक्रम के अलावा दूसरी गतिविधियों में होने वाले खर्च व बेतहाशा महंगी शिक्षा कुछ ऐसे मुख्य कारण हैं जिनके चलते दिल्ली के निजी स्कूलों में पढ़ने वाले आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं.

वर्ष 2011 में स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले छात्र करीब 26 प्रतिशत थे जो वर्ष 2014 में गिरकर 10 प्रतिशत रह गया था. RTE (राइट टू एजूकेशन) अधिनियम की धारा 12 (1) (सी) निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों में कमजोर एवं वंचित वर्गों के बच्चों के लिये मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करती है. इसके अनुसार ऐसे स्कूलों को पहली क्लास पूर्वस्कूली शिक्षा में छात्रों की कुल क्षमता के कम से कम एक चौथाई हिस्से में कमज़ोर एवं वंचित वर्गों के बच्चों को दाखिला देना होता है.

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के अध्ययन के अनुसार, विशेषकर शुरुआती कक्षा यानि प्राइमरी एवं प्री-प्राइमरी स्तर की कक्षा में स्कूली पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले छात्रों का प्रतिशत प्राइमरी स्तर पर अधिक होता है.

यह संस्था भारत में बाल अधिकार संरक्षण की शीर्ष संस्था है. इसका यह अध्ययन पूरी दिल्ली के 650 स्कूलों में स्कूली पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले बच्चों के बारे में दिये गये वर्षवार डेटा पर आधारित था.

अध्ययन में कहा गया, ‘‘अभिभावकों का कहना है कि किताबें एवं पाठ्यक्रम से इतर गतिविधियों का खर्च बहुत अधिक होता है जिसके चलते वे स्कूल छोड़ देते हैं.’’ एनसीपीसीआर ने यह भी सुझाव दिया कि जहां तक संभव हो बच्चों को पढ़ाने का माध्यम उनकी मातृभाषा होनी चाहिए.



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